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इस शारदीय नवरात्रि में पूजाघर/ घर के मंदिर भूलकर भी नहीं करें ये गलतियां वरना हो सकता हैं तनाव/टेंशन

प्रिय पाठकों/मित्रों, भगवान् की पूजा हर घर में की जाती है, लोग अपने घर में भगवान् को एक खास जगह देते है और उसी जगह पर रोज़ाना उनकी पूजा पाठ की जाती है,एक तरह से माना जाये तो ये स्थान हमारे घर में एक मंदिर के रूप में रहता है.मंदिर चाहे छोटा हो या बड़ा लेकिन उसका वास्तु के अनुसार ही होना शुभ माना जाता है. आज हम आपको आपके घर के मंदिर से जुड़ी ऐसी ज़रूरी बातो के बारे में बताने जा रहे है जिनका ध्यान रखना बहुत ही जरूरी होता है. अगर आप इन बातो का ध्यान नहीं रखते है तो इससे भगवान की कृपा घर-परिवार को नहीं मिल पाती है |
इस शारदीय नवरात्रि में पूजाघर/ घर के मंदिर भूलकर भी नहीं करें ये गलतियां वरना हो सकता हैं तनाव/टेंशन-Do-not-even-forget-the-house-in-this-monastery-Navaratri-These-mistakes-may-be-tension       घर के मंदिर में भगवान की मूर्तियां रखकर पूजा अर्चना करने की परंपरा सदियों पुरानी है। लेकिन वास्तु शास्‍त्र के अनुसार कुछ ऐसे देवी-देवताओं की मूर्त‌ियां भी हैं जिन्हें घर के मंद‌िर में नहीं रखना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इनके घर में होने पर सुख समृद्ध‌ि घर से चली जाती है। वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि आपके घर का पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ हैं तो पूजा का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता हैं फिर भी ऐसे पूजाघर में उत्तर अथवा पूर्वोत्तर दिशा में भगवान की मूर्तियाॅ या चित्र आदि रखने चाहिए । पूजाघर की देहरी को कुछ ऊँचा बनाना चाहिए । पूजाघर में प्रातःकाल सूर्य का प्रकाश आने की व्यवस्था बनानी चाहिए । पूजाघर में वायु के प्रवाह को संतुलित बनाने के लिए कोई खिड़की अथवा रोशनदान भी होनी चाहिए । पूजाघर के द्वार पर मांगलिक चि
न्ह, (स्वास्तीक, ऊँ,) आदि स्थापित करने चाहिए ।
      ब्रह्मा, विष्णु, महेश या सूर्य की मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम में होना चाहिए । गणपति एवं दुर्गा की मूर्तियों का मुख दक्षिण में होना उत्तम होता हैं । काली माॅ की मूर्ति का मुख दक्षिण में होना शुभ माना गया हैं । हनुमान जी की मूर्ति का मुख दक्षिण पश्चिम में होना शुभ फलदायक हैं । पूजा घर में श्रीयंत्र, गणेश यंत्र या कुबेर यंत्र रखना शुभ हैं । पूजाघर के समीप शौचालय नहीं होना चाहिए । इससे प्रबल वास्तुदोष उत्पन्न होता हैं । यदि पूजाघर के नजदीक शौचालय हो, तो शौचालय का द्वार इस प्रकार बनाना चाहिए कि पूजाकक्ष के द्वार से अथवा पूजाकक्ष में बैठकर वह दिखाई न दे । 
      पूजाघर का दरवाजा लम्बे समय तक बंद नहीं रखना चाहिए । यदि पूजाघर में नियमित रूप से पूजा नहीं की जाए तो वहाॅ के निवासियों को दोषकारक परिणाम प्राप्त होते हैं । पूजाघर में गंदगी एवं आसपास के वातावरण में शौरगुल हो तो ऐसा पूजाकक्ष भी दोषयुक्त होता हैं चाहे वह वास्तुसम्मत ही क्यों न बना हो क्योंकि ऐसे स्थान पर आकाश तत्व एवं वायु तत्व प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण इस पूजा कक्ष में बैठकर पूजन करने वाले व्यक्तियों की एकाग्रता भंग होती हैं तथा पूजा का शुभ फला प्राप्त नहीं होता । पूजा घर गलत दिशा में बना हुआ होने पर भी यदि वहां का वातावरण स्वच्छ एवं शांतिपूर्ण होगा तो उस स्थान का वास्तुदोष प्रभाव स्वयं ही घट जाएगा ।
       भगवान के दर्शन मात्र से ही कई जन्मों के पापों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। इसी वजह से घर में भी देवी-देवताओं की मूर्तियां रखने की परंपरा है। इस कारण घर में छोटा मंदिर होता है और उस मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं रखी जाती हैं। कुछ लोग एक ही देवता की कई मूर्तियां भी रखते हैं। हमारे वैदिक शास्त्रों में बताया गया है कि घर के मंदिर में किस देवता की कितनी मूर्तियां रखना श्रेष्ठ है।
 भगवान् श्रीगणेश की मूर्ति---- 
प्रथम पूज्य श्रीगणेश के स्मरण मात्र लेने से ही कार्य सिद्ध हो जाते हैं। घर में इनकी मूर्ति रखना बहुत शुभ माना जाता है। वैसे तो अधिकांश घरों में गणेशजी की कई मूर्तियां होती हैं, लेकिन ध्यान रखें कि गजानंद की मूर्तियों की संख्या 1, 3 या 5 नहीं होना चाहिए। यह अशुभ माना गया है। गणेशजी की मूर्तियों की संख्या विषम नहीं होना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार श्रीगणेश का स्वरूप सम संख्या के समान होता है, इस कारण इनकी मूर्तियों की संख्या विषम नहीं होना चाहिए। विषम संख्या यानी 1, 3, 5 आदि। घर में श्रीगणेश की कम से कम दो मूर्तियां रखना श्रेष्ठ माना गया है।
 शिवलिंग की संख्या और आकार--- 
ऐसा माना जाता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। घर में शिवलिंग रखने के संबंध में कुछ नियम बताए गए हैं। घर के मंदिर में रखे गए शिवलिंग का आकार हमारे अंगूठे से बड़ा नहीं होना चाहिए। ऐसा माना जाता है शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है, अत: घर में ज्यादा बड़ा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। इसके साथ ही घर के मंदिर में एक शिवलिंग ही रखा जाए तो वह ज्यादा बेहतर फल देता है। एक से अधिक शिवलिंग रखने से बचना चाहिए।
 हनुमानजी की मूर्तियां--- 
घर के मंदिर में हनुमानजी की मूर्ति की संख्या एक ही होनी चाहिए, क्योंकि बजरंग बली रुद्र (शिव) के अवतार हैं। घर में शिवलिंग भी एक ही होना चाहिए। मंदिर में बैठे हुए हनुमानजी की प्रतिमा रखना श्रेष्ठ होता है। घर के अन्य भाग में हनुमानजी की मूर्ति नहीं, ऐसी फोटो रखी जा सकती है, जिसमें वे खड़े हुए हों। घर के दरवाजे के पास उड़ते हुए हनुमानजी की फोटो रखी जा सकती है। ध्यान रखें पति-पत्नी को शयनकक्ष में हनुमानजी की मूर्ति या फोटो नहीं लगाना चाहिए। शयनकक्ष में राधा-कृष्ण का फोटो लगाया जा सकता है। 
 मां दुर्गा और अन्य देवियों की मूर्तियों की संख्या---- 
घर के मंदिर मां दुर्गा या अन्य किसी देवी की मूर्तियों की संख्या तीन नहीं होना चाहिए। यह अशुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो तीन से कम या ज्यादा मूर्तियां घर के मंदिर में रख सकते हैं। मूर्तियों के संबंध में श्रेष्ठ बात यही है कि मंदिर में किसी भी देवता की एक से अधिक मूर्तियां न हो। अलग-अलग देवी-देवताओं की एक-एक मूर्तियां रखी जा सकती है। 
आइये पंडित दयानन्द शास्त्री से जानते है घर-परिवार में खुशियां और शांति बनाएं रखने के लिए कुछ टिप्स/टोटके/उपाय---
  1. आपके घर के मंदिर के आसपास बाथरूम का होना अच्छा नहीं माना जाता है,इसके अलावा मंदिर को कभी किचन में भी नहीं बनवाना चाहिए,वास्तु के हिसाब से ये अच्छा नहीं माना जाता है. 
  2.  मंदिर को कभी भी अपने घर की दक्षिण और पश्चिम दिशा में ना बनवाये. ऐसा होने से परिवार के सदस्यों पर बहुत बुरा असर पड़ता है. मंदिर को हमेशा घर की पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए,ऐसा करने से घर में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. 
  3. इस बात का हमेशा ध्यान रखे की आप अपने घर के मंदिर में भगवान की जिन मूर्तियों को रखते है उनमे हमेशा एक इंच का फासला ज़रूर होना चाहिए, इसके अलावा भगवान को कभी भी आमने सामने नहीं रखना चाहिए. ऐसा होने से आपके जीवन में तनाव हो सकता है. 
  4.  वास्तु विज्ञान के मुताबिक भगवान भैरव की मूर्ति घर में नहीं रखनी चाह‌िए। वैसे तो भैरव, भगवान श‌िव का ही एक रूप हैं। लेकिन भैरव, तामस‌िक देवता हैं। तंत्र मंत्र द्वारा इनकी साधना की जाती है। इसल‌िए घर में भैरव की मूर्त‌ि नहीं रखनी चाह‌िए। 
  5. भगवान श‌िव का एक और रूप है- नटराज। वास्तु शास्त्र के अनुसार नटराज रूप वाली भगवान श‌िव की प्रत‌िमा भी घर में नहीं होनी चाह‌िए। इसका कारण यह है क‌ि नटराज रूप में श‌िव, तांडव करते हैं इसल‌िए इन्हें घर में न लाएं। 
  6. ग्रह शांति के लिए शनि की पूजा अर्चना तो की जाती है लेकिन ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक शनि की मूर्ति घर नहीं लानी चाहिए। शनि की ही तरह, ज्योत‌िषशास्‍त्र में राहु-केतु की भी पूजा की सलाह तो दी जाती है, लेक‌िन इनकी मूर्त‌ि घर लाने से मना किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंक‌ि राहु-केतु, दोनों छाया ग्रह होने के साथ ही पाप ग्रह भी है। 
  7. वास्तु शास्त्र के मुताबिक घर के मंदिर में भगवान की सिर्फ सौम्य रूप वाली मूर्त‌ियां ही होनी चाह‌िए। ऐसे में मां दुर्गा के कालरात्र‌ि स्वरूप वाली मूर्त‌ि भी घर में नहीं रखनी चाहिए। 

जानिए कुछ अतिरिक्त विशेष सावधानियां--- 
  1. किसी भी प्रकार के पूजन में कुल देवता, कुल देवी, घर के वास्तु देवता, ग्राम देवता आदि का ध्यान करना भी आवश्यक है। इन सभी का पूजन भी करना चाहिए। 
  2. पूजन में हम जिस आसन पर बैठते हैं, उसे पैरों से इधर-उधर खिसकाना नहीं चाहिए। आसन को हाथों से ही खिसकाना चाहिए।
  3. देवी-देवताओं को हार-फूल, पत्तियां आदि अर्पित करने से पहले एक बार साफ पानी से अवश्य धो लेना चाहिए। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग का रेशमी कपड़ा चढ़ाना चाहिए। माता दुर्गा, सूर्यदेव व श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग का, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सफेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए। 
  4. पूजन कर्म में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पूजा के बीच में दीपक बुझना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। 
  5. यदि आप प्रतिदिन घी का एक दीपक भी घर में जलाएंगे तो घर के कई वास्तु दोष भी दूर हो जाएंगे। 
  6. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है 
  7. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है। 
  8. दीपक हमेशा भगवान की प्रतिमा के ठीक सामने लगाना चाहिए। कभी-कभी भगवान की प्रतिमा के सामने दीपक न लगाकर इधर-उधर लगा दिया जाता है, जबकि यह सही नहीं है। 
  9. घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती उपयोग किया जाना चाहिए। जबकि तेल के दीपक के लिए लाल धागे की बत्ती श्रेष्ठ बताई गई है। 
  10. पूजन में कभी भी खंडित दीपक नहीं जलाना चाहिए। धार्मिक कार्यों में खंडित सामग्री शुभ नहीं मानी जाती है।
  11. शिवजी को बिल्व पत्र अवश्य चढ़ाएं और किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए अपनी इच्छा के अनुसार भगवान को दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए, दान करना चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी। --
  12. भगवान सूर्य की 7, श्रीगणेश की 3, विष्णुजी की 4 और शिवजी की 1/2 परिक्रमा करनी चाहिए। 
  13. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। इन सभी की पूरी जानकारी किसी ब्राह्मण (पंडित) से प्राप्त की जा सकती है। विशेष पूजन पंडित की मदद से ही करवाने चाहिए, ताकि पूजा विधिवत हो सके।
  14. घर में पूजन स्थल के ऊपर कोई कबाड़ या भारी चीज न रखें। 
  15. भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही शंख से जल चढ़ाना चाहिए। 
  16. पूजन स्थल पर पवित्रता का ध्यान रखें। चप्पल पहनकर कोई मंदिर तक नहीं जाना चाहिए। चमड़े का बेल्ट या पर्स अपने पास रखकर पूजा न करें। पूजन स्थल पर कचरा इत्यादि न जमा हो पाए। 
  17. किसी भी भगवान के पूजन में उनका आवाहन (आमंत्रित करना) करना, ध्यान करना, आसन देना, स्नान करवाना, धूप-दीप जलाना, अक्षत (चावल), कुमकुम, चंदन, पुष्प (फूल), प्रसाद आदि अनिवार्य रूप से होना चाहिए। 
  18. सभी प्रकार की पूजा में चावल विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं। पूजन के लिए ऐसे चावल का उपयोग करना चाहिए जो अखंडित (पूरे चावल) हो यानी टूटे हुए ना हो। चावल चढ़ाने से पहले इन्हें हल्दी से पीला करना बहुत शुभ माना गया है। इसके लिए थोड़े से पानी में हल्दी घोल लें और उस घोल में चावल को डूबोकर पीला किया जा सकता है। 
  19.  पूजन में पान का पत्ता भी रखना चाहिए। ध्यान रखें पान के पत्ते के साथ इलाइची, लौंग, गुलकंद आदि भी चढ़ाना चाहिए। पूरा बना हुआ पान चढ़ाएंगे तो श्रेष्ठ रहेगा। 

घर के मंदिर का बल्ब देता हें नुकसान/हानि—
 आजकल बहुत से लोग घरों या दुकानों में छोटा-सा मंदिर बनाकर उसमें गणेश जी या लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर देते हैं, वहां घी का दीपक जलाने की बजाय बिजली का बल्व लगा देते हैं। यदि आपने भी गणेश जी के स्थान में बिजली का लाल बल्ब जला रखा है तो इसे उतार दें। यह शुभदायक नहीं है, इससे आपके खाते में हानि के लाल अंक ही आएंगे। अतः घर के मंदिर में कभी भी बिजली के बल्व का इस्तेमाल न करें। कहते मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। 
    मंदिर वो स्थान है जहां से व्यक्ति को आत्मिक शांति के साथ ही सुख-समृद्धि भी मिलती है। लेकिन वास्तु के अनुसार घर के आसपास मंदिर का होना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे मंदिर आपका घर बिगाड़ सकते हैं। आपको ऐसे मंदिरों में नहीं जाना चाहिए जो आपके घर के पास है। अगर आप ऐसे मंदिरों में पूजा करते हैं तो उन मंदिरों के प्रभाव से आपका घर बिगड़ सकता है। आपकी पूजा पाठ का अशुभ फल आपके घर पडऩे लगता है।

जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)

रूद्राक्ष (रूद्र मतलब शिव, अक्ष मतलब आंसु इसलिए रूद्र अधिक अक्ष मतलब शिव के आंसु) विज्ञान में उसे म्संमवबंतचने ळंदपजतें त्वगइ के नाम से जाना जाता हैं, जो एक तरह का (फल) बीज हैं । जो कि एशिया खंड के कुछ भागों में जैसे की इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, भारत, नेपाल, श्रीलंका और अंदमान-निकोबार में पाये जाते हैं । कई वैज्ञानिको ने अपने लंबे प्रयोगात्मक अभ्यास के बाद कबूल किया हैं कि इस चमत्कारी बीज के कई फायदे हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिव, अध्यात्मिक और कई वैद्यकीय खूबीयां हैं जो इसके पहनने वाले को जीवन के कई कार्यक्षेत्र (जैसे की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) में मदद रूप होता हैं । कई पुराण, शास्त्रों और आयुर्वेदिय शास्त्रों में रूद्राक्ष के फायदे और महत्ता का तलस्पर्शीय वर्णन किया गया हैं । आज कई हजार सालो से राजा, साधु-संत और ऋषिमुनि रूद्राक्ष की पूजा करते आ रहे हैं और उसे पहनते आये हैं । 
जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)-Learn-how-to-use-Rudraksh-to-remove-his-disease-Rudraksh-treatment-of-various-diseases--       कहते हैं रूद्राक्ष पहनने वाले को अध्यात्मिक रूप में कई फायदे होते हैं, उससे संपत्ति और ख्याति भी बढ़ती हें ओर कई भौतिक सुख भी प्राप्त होते हैं । रूद्राक्ष या रूद्राक्षमाला पहनने से पहले जरूरी हैं कि किसी रूद्राक्ष थेयायिस्ट, ज्योतिषि, वैदिक अभ्यासु, आयुर्वेदिक डॉक्टर या फिर किसी ऐसे व्यक्ति जिसने रूद्राक्ष धारण किया हो । उनसे उनके अनुभवों को जान लेना जरूरी हैं ताकि रूद्राक्ष से होने वाले फायदों ाक रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति पूरी तरह लाभ उठा सके । रूद्राक्ष के दर्शन से लक्ष पुण्य, स्पर्श से कोटि-प्रमाण पुण्य, धारण करने से दशकोटि-प्रमाण पुण्य एवं इससे जप करने से लक्ष कोटि सहस्त्र तथा लक्ष कोटि शत-प्रमाण पुण्य की प्राप्ति होती हैं। श्री मद्देवीभागवत के अनुसार जिस प्रकार पुरूषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, मुनियों में कश्यप, अश्व समूहों में उच्चैः श्रवा, देवों में शिव देवियों में गौरी (पार्वती) सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह रूद्राक्ष सभी में श्रेष्ठ हैं।  
रूद्राक्ष उत्पत्ति की कथा :- 
 स्कन्ध पुराण के अनुसार प्राचीन समय में पाताल लोक का राजा मय बड़ा ही बलशाली, शुरवीर, महापराक्रमी और अजय राजा था । एक बार उसके मन में लौभ आया और पाताल से निकलकर अन्य लोको पर विजय प्राप्त की जाए एैसा मन में विचार किया । विचार के अनुसार पाताल लोक के दानवों ने अन्य लोकों के ऊपर आक्रमण कर दिया और अपने बल के मद में चुर मय ने हिमालय पर्वत के तीनों श्रृंगों पर तीन पूल बनाए । जिनमें से एक सोने का, एक चॉदी का और एक लोहे का था । इस प्रकार सभी देवताओं के स्थान पर पाताल लोक के लोगों का वहां राज्य हो गया । 
       सभी देवतागण इधन-उधर गुफा आदि में छुपकर अपना जीवन व्यतित करने लगे । अन्त में सभी देवतागण ब्रह्माजी के पास गये और उनसे प्रार्थना की कि पाताल लोक के महापराक्रमी त्रिपुरासुरों से हमारी रक्षा करें । तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि त्रिपुरासुर इस समय महापराक्रमी हैं । समय और भाग्य उसका साथ दे रहा हैं । अतः हम सभी को त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु की शरण में चलना चाहिए । हमारा मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा । इस प्रकार ब्रह्माजी सहित समस्त देवगण विष्णु लोक पहुॅचकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगें । देवगणों ने अपनी करूण कथा भगवान विष्णु को सुनाई और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की । भगवान विष्णु ने भी ब्रह्माजी की तरह भगवान शिव की शरण में जाने को कहा । तत्प्श्चात सभी देवगण भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुॅचे वहां उन्होने प्रभु से शरण मांगी और अपने जीवन की रक्षा हेतु प्रार्थना की । 
     तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा आदि सहित सभी देवतागण व स्वयं भगवान शिव पृथ्वी मंडल पर रथ को लेकर, तथा अपना धनुष बाण लेकर और स्वयं भगवान विष्णु दिव्य बाण बनकर भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए । इस प्रकार भगवान शिव ने सागर स्वरूप तूणिर को बांध युद्ध के लिए रवाना हुए । त्रिपुरासुरों के नगर में पहुॅचकर भगवान शिव ने शुलमणी भगवान नारायण स्वरूप धारण कर अमोघ बाण को धनुष में चढ़ाकर निशाना साधते हुए त्रिपुरासुर पर प्रहार किया जिससे त्रिपुरासुरों के तीनों त्रिपुर के जलते ही हाहाकार मच गई । त्रिपुर के दाह के समय भगवान शिव ने अपने रोद्र शरीर को धारण कर लिया और अपनी युद्ध की थकान मिटाने हेतु सुन्दर शिखर पर विश्राम करने हेतु पहुॅचे । विश्राम के बाद भगवान शिव जोर-जोर से हंसने लगे । भगवान रूद्र के नेत्रों से चार ऑसु टपक पड़े। उन्हीं चार बूंद अश्रुओं के उस शेल शिखर पर गिर जाने से चार अंकुर पैदा हुए । समयानुसार अंकुर बड़े होने से कोई पत्र, पुष्प व फल आदि से हरे-भरे हो गये और रूद्र के अश्रुकणों से उत्पन्न ये वृक्ष रूद्राक्ष नाम से विख्यात हुए । 
 जानिए रूद्राक्ष और रूद्राक्ष माला पहनने के फायदे--- 
 1 रूद्राक्ष अथवा रूद्राक्षमाला मनकी चंचलता दूर करता हैं, शांति देता हैं, बेचैनी दूर करता हैं, आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बढ़ाता हैं । 
 2 रूद्राक्ष में कई प्रकार के विटामिन हेते हैं जैसे कि विटामिन सी, जो रोगो से लड़ने वाली हमारे शरीर की प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाता हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिक तरंगे होती हैं, जो हमारे रूधिराभिसरण और रक्तचाप को काबू में रखता हैं । 
 3 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला की पूजा करने वाले और धारण करने वाले को रूद्राक्ष कालाजादू, मारण तंत्र, और बुरी आत्माओं से सुरक्षा प्रदान करता हैं । 
 4 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला पहननेवाले को रूद्राक्ष अकस्मात और अकुदरती मौत से बचाता हैं । 
 5 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला हमारे अंदर की विषयवासना, लालच, क्रोध और अहंकार को दूर करता हैं, और हृदय को शुद्ध करता हैं । 
 6 मंत्र सिद्धि में रूद्राक्षमाला इन्सान की अंतरज्ञान शक्ति तथा अति इंद्रिय शक्ति को बढ़ाता हैं। सही नियमों का पालन करके किसी खास हेतु से पहना गया रूद्राक्ष इच्छित वस्तु या लक्ष्य पाने में काफी मदद करता हैं । 
===================================================================== आइये जाने विभिन्न रुद्राक्ष और उनके औषधीय गुण--- 
 एकमुखी रूद्राक्ष :- एकमुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव-स्वरूप हैं, इसके धारण करने से बड़े से बड़े पापों का नाश होता हैं, मनुष्य चिंतामुक्त और निर्भय हो जाता हैं, उसे किसी भी प्रकार की अन्य शक्ति और शत्रु से कोई कष्ट भय नहीं होता जो एकमुखी रूद्राक्ष को धारण और पूजन करता हैं, उसके यहॉ लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, स्थिर हो जाती हैं । रूद्राक्षों में एकमुखी रूद्राक्ष सर्वश्रेष्ठ, शिव स्वरूप सर्वकामना सिद्धि-फलदायक और मोक्षदाता हैं। एकमुखी रूद्राक्ष से संसार के सभी सुख सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं । अपने प्रभाव से यह रूद्राक्ष कंगाल को राजा बना सकता हैं ।
       सच्चा एकमुखी रूद्राक्ष किसी भी असम्भव कार्य को सम्भव कर सकता हैं किन्तु यह बात आमतौर पर बाजार में मिलने वाले एक मुखी काजु दाना (भद्राक्ष) पर लागु नहीं होती हैं । सूर्य दक्षिण-नेत्र, हृदय, मस्तिष्क, अस्थि इत्यादि का कारक हैं। यह ग्रह भगन्दर, स्नायु रोग, अतिसार, अग्निमंदता इत्यादि रोगों का भी कारक बनता हैं, जब यह प्रतिकूल बन जाता हैं, तब यह विटामिन ए और विटामिन डी को भी संचालित करता है, जिसकी कमी से निशान्धता (रात में न दिखाई देना), हड्डीयों की कमजोरी जैसे रोग उत्पन्न हाते हैं । इन सब के निवारण के लिए एकमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए क्योकिं सूर्यजनित दोषों के निवारण हेतु ज्योतिषी माणिक्य रत्न धारण करने का परामर्श देते हैं । सूर्य प्रतिकूल-स्थानीय होकर विभिन्न रोगों को जन्म देते हैं । नेत्र सम्बन्धी रोग, सिरदर्द, हृदयरोग, हड्डी के रोग, त्वचा रोग, उदर सम्बन्धी रोग, तेज बुखार, जैसे सभी रोगो के निवारण हेतु रूद्राक्ष माला के मध्य में एकमुखी रूद्राक्ष को पिरोकर धारण करना चाहिए। 
 दोमुखी रूद्राक्ष :-  दोमुखी रूद्राक्ष हर गौरी (अर्धनारीश्वर) स्वरूप हैं, इसे शिव-शिवा-रूप भी कहते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित (धारण) होता हैं, उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि ईधन को जला डालती हैं । इस रूद्राक्ष का संचालन ग्रह चन्द्रमा (सोम) हैं । यह रूद्राक्ष हर प्रकार के रिश्तों में एकता बढ़ाता हैं, वशीकरण मानसिक शांति व ध्यान में एकग्रता बढ़ाता हैं । इच्छाशक्ति पर काबू, कुण्डली को जागृत करने में सहायता करता हैं । 
      स्त्री रोग जैसे गर्भाशय संबंधीत रोग शरीर के सभी प्रवाही और रक्त संबंधी बीमारियां, अनिद्रा, दिमाग, बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जलसम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग होते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मस्तिष्क विकार भी होते हैं । गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं। यह ग्रह हृदय, फेफडा, मस्तिष्क, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन-नली, शरीरस्थ इत्यादि का कारक हैं। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ो की बीमारी होती हैं। 
तीनमुखी रूद्राक्ष : - तीनमुखी रूद्राक्ष ब्रह्मस्वरूप हैं। इसमें ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनों शक्तियों का समावेश है। इसका प्रधान ग्रह मंगल हैं। मंगल को ज्योतिषशास्त्र में सेनापति का दर्जा दिया गया हैं। यह अग्निरूप हैं। इसको धारण करने से आत्मविश्वास, निर्भयता, द्वेश, उच्चज्ञान, वास्तुदोष आदि में फायदा होता हैं । मंगल यदि किसी भी दुष्प्रभाव में होता हैं तो उसे रक्त रोग, हैजा, प्लेग, चेचक, रक्तचाप, शक्ति क्षीणता, नारी अंगरोग, अस्थिभ्रंश, बवासीर, मासिक धर्म रोग, अल्सर, अतिसार, चोट लगना और घाव आदि रोग होते है। मंगल ग्रह की प्रतिकूलता से उत्पन्न इन सभी रोगों के निदान और निवारण के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष आवश्यक रूप से धारण करना चाहिए। वृश्चिक और मेष राशि वालो के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त ही भाग्योदयकारी हैं।
 चारमुखी रूद्राक्ष : - चारमुखी रूद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप माना गया हैं। यह चार वेदों का रूप भी माना गया हैं। चारमुखी रूद्राक्ष के धारणकर्ता की आँखों में तेजस्विता , वाणी में मधुरता तथा शरीर में स्वास्थ्य एवं अरोग्यजनित कान्ति उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, उनके चतुर्दिक सम्मोहन का प्रभाव मण्डल निर्मित हो जाता है। यह रूद्राक्ष मन की एकाग्रता को बढाता हैं जो लेखक, कलाकार, विज्ञानी, विद्यार्थी और व्यापारियों को लाभकारी हैं । इसके प्रभाव से चपलता, चातुर्य और ग्रहण शक्ति में लाभ होता हैं । इस रूद्राक्ष पर बुध ग्रह का नियंत्रण होता हैं। 
     ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को युवराज कहा जाता है। यह नपुंसक तथा सौम्य ग्रह हैं। बुध ग्रह विद्या , गणित , ज्ञान, गाल ब्लाडर , नाड़ी संस्थान आदि का कारक हैं। इसकी प्रतिकुलता से अपस्मार , नाक, कान तथा गले के रोग, नपुंसकता, हकलाना, सफेद दाग, मानसिक रोग , मन की अस्थिरता, त्वचारोग, कोढ़, पक्षाघात पीतज्वर , नासिका रोग , दमा आदि रोग होते हैं। इन सभी के निदान के लिए चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभप्रद हैं। व्यापारियों और मिथुन तथा कन्या राशि वालो को चारमुखी रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। पन्ने की जगह चारमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पन्ने से कई गुना लाभ प्राप्त हो सकता हैं 
 पाँचमुखी रूद्राक्ष : - पाँचमुखी रूद्राक्ष स्वयं रूद्र स्वरूप हैं इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। यह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी माना जाता हैं। इससे यशोवृद्धि और वैभव सम्पन्नता आती हैं। इसका संचालन ग्रह बृहस्पति है। इसके उपयोग से मानसिक शांति, बुरी आदतों से छुटकारा, मंत्र सिद्धी, पवित्र विचार, व अधिक कामेच्छा पर काबू पाया जा सकता हैं । यह ग्रह धन , वैभव , ज्ञान , गौरव , मज्जा , यकृत , चरण , नितंब का कारक है। 
     बृहस्पति बुरे प्रभाव में हो तो व्यक्ति को अनेक तरह के कष्ट होते है। बृहस्पति स्त्री के लिए पति तथा पुरूष के लिए पत्नि का कारक हैं। अतः इसकी प्रतिकुलता से निर्धनता और दाम्पत्य सुख में विध्न उत्पन्न होता है तथा चर्बी की बिमारी , गुर्दा , जाँघ , शुगर और कान सम्बन्धी बीमारिया पैदा होती हैं। मोटापा, उदर गांठ, अत्यधिक शराब सेवन, एनिमिया, पिलीया, चक्कर आना, व मांस पेशियों के हठीले दर्द आदि के निदान के लिए पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। धनु और मीन राशि वाले तथा व्यापारियों को पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। पुखराज से यह कहीं अधिक गुणकारी और सस्ता हैं।
 छः मुखी रूद्राक्ष : - यह रूद्राक्ष शिव पुत्र गणेश और कार्तिकेय स्वरूप है। इसके धारण से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं। इसमें गणेश और कार्तिकेय स्वरूप होने के कारण इसके धारणकर्ता के लिए गौरी विशेष रूप से वरदायिनी और माता की भाँती सदैव सुलभ होती है। इस रूद्राक्ष का नियत्रंक और संचालक ग्रह शुक्र हैं जो भोग विलास और सुख सुविधा का प्रतिनिधि हैं।
      इसके प्रयोग द्वारा प्रेम, कामसुख, संगीत, कविता, सृजनात्मक और कलात्मक कुशलता, समझदारी, ज्ञान और वाक्य चातुर्य में लाभ होता हैं । यह ग्रह गुप्तेन्द्रिय, पूरूषार्थ, काम वासना , उत्तम भोग्य वस्तु , प्रेम संगीत आदि का कारक हैं। इस ग्रह के दुष्प्रभाव से नेत्र, यौन, मुख, मूत्र, ग्रीवा रोग और जलशोध आदि रोग होते हैं । कोढ़, नपुंसकता और मंद कामेच्छा, पथरी और किडनी सम्बन्धि रोग, मुत्र रोग, शुक्राणु की कमी व गर्भावस्था के रोग आदि में छः मुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। वृष और तुला राशि वाले के लिए विशेष लाभकारी है।
 सातमुखी रूद्राक्ष : - सातमुखी रूद्राक्ष के देवता सात माताएँ और हनुमानजी हैं। पद्मपुराण के अनुसार सातमुखी रूद्राक्ष के सातो मुख में सात महाबलशाली नाग निवास करते हैं। सात मुखी रूद्राक्ष सप्त ऋषियों का स्वरूप हैं। यह रूद्राक्ष सम्पत्ति , कीर्ति और विजय श्री प्रदान करने वाला होता हैं। सात मुखी रूद्राक्ष साक्षात् अनंग स्वरूप है। अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होता हैं। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती हैं। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं।इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इसके प्रयोग से तंदुरूस्ती, सौभाग्य और सम्पत्ति, रूके हुए कार्य, निराशापन को दूर किया जाता हैं।
       वशीकरण, आत्मविश्वास में वृद्धि, कामसुख व स्थिर विकास के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए । इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि हैं यह रोग तथा मृत्यु का कारक हैं। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक हैं। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह हैं। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चितां, अस्थि रोग, क्षय, केंसर, मानसिक रोग, जोड़ो का दर्द, अस्थमा, बहरापन, थकान, आदि रोग हो सकते है। शनि ग्रह भाग्य का कारक भी हैं। कुपित होने पर यह हताशा , कार्य विलम्बन आदि उत्पन्न करता हैं। जन्म कुण्डली में यदि नवें घर तथा नवें घर के स्वामी से किसी भी तरह संबद्ध हो जाता हैं तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय कठिनाई से व देरी से होता हैं। शनि और शनि की ढैया और साड़ेसाती से पीड़ित लोगों को शनि ग्रह को शान्त करने के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभदायी हैं। 
आठमुखी रूद्राक्ष : - आठमुखी रूद्राक्ष में कार्तिकेय , गणेश ,अष्टमातृगण ,अष्टवसुकगण और गंगा का अधिवास माना गया है। इसके प्रयोग से शुत्रओं, विपत्तियों पर विजय प्राप्त होती हैं । दीर्घायु, ज्ञान, रिद्धी-सिद्धी के लिए व मन की एकाग्रता बढ़ाने हेतु भी यह रूद्राक्ष धारण किया जाता हैं । यह रूद्राक्ष मिथ्या भाषण से उत्पन्न पापों को नष्ट करता है। यह सम्पूर्ण विध्नों को नष्ट करता हैं। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है। जो छाया ग्रह हैं। इसमें शनि ग्रह की भांति शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाशहीनता का दोष हैं। यह शनि की तरह लम्बा ,पीड़ादायक ,अभाव ,योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात भी घटित कर देता हैं। चर्मरोग , फेफड़े की बीमारी , पैरों का कष्ट, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले व मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह हैं। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती हैं। 
 नौमुखी रूद्राक्ष : - नौमुखी रूद्राक्ष भैरव स्वरूप हैं। इसमें नौ शक्तियों का निवास हैं इसके धारण करने से सभी नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं। इसके धारण करने से यमराज का भय नहीं रहता हैं। इसके उपयोग से सफलता, सम्मान, सम्पत्ति, सुरक्षा, चतुराई, निर्भयता, शक्ति, कार्यनिपुणता, वास्तुदोष में लाभ लिया जा सकता हैं । नौमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह केतु हैं जो राहु की तरह ही छाया ग्रह हैं। जिस प्रकार राहु शनि के सदृश हैं , उसी प्रकार केतु मंगल के सदृश हैं। मंगल की तरह केतू भी अपने सहचर्य और दृष्टि के प्रभाव में आने वाले पदार्थो को हानि पहुँचाता हैं। केतू के कुपित होने पर फेफड़े का कष्ट , ज्वर , नेत्र पीड़ा, बहरापन, अनिद्रा, संतानप्राप्ति, उदर कष्ट, शरीर में दर्द दुर्घटना एवं अज्ञात कारणों से उत्पन्न रोग परेशान करते हैं। केतू को मोक्ष का कारक भी माना गया हैं। केतू ग्रह की शांति के लिए लहसुनिया रत्न का प्रयोग किया जाता हैं किन्तू नौमुखी रूद्राक्ष लहसुनियां रत्न से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं।
दसमुखी रूद्राक्ष : - दशमुखी रूद्राक्ष पर यमदेव , भगवान विष्णु , महासेन दस दिक्पाल और दशमहाविद्याआओं का निवास होता हैं। इसका इष्टदेव विष्णु हैं। यह सभी ग्रहों को शांत करता हैं । इसके उपयोग से पारिवारिक शांति, सभी प्रकार की सफलता, दिव्यता एवं एकता प्राप्त होती हैं । इसके धारण से सभी प्रतिकूल ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। इसके धारण से सभी नवग्रह शांत और प्रसन्न होते हैं। इस रूद्राक्ष का प्रभाव ग्रहातंरों तक जाता हैं और ग्रहातंरों से आता हैं। यह समस्त सुखों को देने वाला शक्तिशाली और चमत्कारी रूद्राक्ष हैं। इसके उपयेग से कफ, फैफड़े सम्बन्धि रोग, चिंता, अशक्ति, हृदय रोग आदि में लाभ होता हैं। 
 ग्यारहमुखी रूद्राक्ष : - ग्यारहमुखी रूद्राक्ष एकादश रूद्र स्वरूप हैं। यह अत्यन्त ही सौभाग्यदायक रूद्राक्ष हैं। एक सौ सहस्त्र गायों के सम्यक दान से जो फल प्राप्त होता हैं वह फल ग्यारहमुखी रूद्राक्ष के धारण करने से तत्काल प्राप्त होता है। इस रूद्राक्ष पर इन्द्र का स्वामित्व हैं इन्द्र की प्रसन्नता से ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती हैं। इसके धारण करने से समस्त इन्द्रिया और मन नियंत्रित होता हैं। इसके प्रयोग से कुण्डली जागरण, योग सम्बंधी एकाग्रता, वैद्यकिय कार्य, निर्भयता, निर्णय क्षमता एवं सभी प्रकार से अकस्मात सुरक्षा में लाभ होता हैं । यह रूद्राक्ष योग साधना में प्रवृत व्यक्तियों के लिए बहुत अनुकूल हैं। यह शरीर , स्वास्थ्य , यम नियम , आसन , षटकर्म या अन्य यौगिक क्रियाओं में आने वाली बाधाओं को नष्ट करता हैं। स्वास्थ्य को सुद्रण बनाने वाले साधकों के लिए यह भगवान शिव का अनमोल उपहार हैं। इसके प्रयोग से स्त्रीरोग, स्नायुरोग, पुराने हठीले रोगों से छुटकारा, शुक्राणु की कमी व संतानप्राप्ति में लाभ होता हैं ।  
बारहमुखी रूद्राक्ष : - बारहमुखी रूद्राक्ष आदित्य अर्थात सूर्य स्वरूप हैं। सभी शास्त्र और पुराणों में इस रूद्राक्ष पर सूर्य की प्रतिष्ठा मानी गई हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाला निरोगी और अर्थलाभ करके सुख भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता हैं दरिद्रता कभी उसे छू भी नहीं पाती। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार की दुर्घटनाओं से बचाकर शक्ति प्रदान करता हैं। जो मनुष्य सर्वाधिकार सम्पन्न बनकर सम्राट की तरह शासन करना चाहता हो उसे यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। क्योंकि सूर्य स्वयं बारहमुखी रूद्राक्ष पर प्रतिष्ठित होकर धारणकर्ता को सूर्यवत् तेजस्विता , प्रखरता और सम्राट स्वरूपता प्रदान करता हैं। 
      नेतृत्व के गुण, बड़े सम्मान, ताकत, आत्मसम्मान, आत्म विश्वास, प्रेरणा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, एवं ताकत आदि इसके प्रयोग से प्राप्त होते हैं। विश्व के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य इस रूद्राक्ष के माध्यम से धारणकर्ता के मन के भीतर के दुःख , निराशा , कुंठा , पीड़ा और दुर्भाग्य के अंधकार को दूर कर देता है। सूर्य तेजोपुंज हैं , अतः बारहमुखी रूद्राक्ष रूद्राक्ष भी धारणकर्ता को तेजस्वी और यशस्वी बना देता हैं। गुणों में यह माणिक्य से अधिक प्रभावी तथा मूल्य में अधिक सस्ता हैं। इसके प्रयोग द्वारा सरदर्द , गंजापन, बुखार, ऑखों के रोग, हृदय रोग, दर्द और बुखार, मुत्राशय एवं पित्ताशय की जलन जैसे रोगों में लाभ होता हैं। 
 तेरहमुखी रूद्राक्ष - तेरहमुखी रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव स्वरूप हैं। यह सभी कामनाओं और सिद्धियों को देने वाला हैं। इसे धारण करने से कामदेव प्रसन्न होते है। इसे धारण करने से वशीकरण और आकर्षण होता हैं । जीवन के सभी ऐशो-आराम, सुन्दरता, रिद्धी-सिद्धी और प्रसिद्धी, वशीकरण एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इसका उपयोग लाभकारी होता हैं। जो व्यक्ति सुधा-रसायन का प्रयोग करना चाहते हैं, जो धातुओं के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हैं जिसका स्वभाव रसिक हैं उन्हे इस रूद्राक्ष के धारण से सिद्धि प्राप्त होती हैं, सभी कामनाओं की पूर्ति अर्थ-लाभ, रस-रसायन की सिद्धियॉ और सम्पूर्ण सुख-भोग मिलता हैं । 
     इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास हैं इसीकारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियां प्रदान कराने में सक्षम हैं। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं। इसके उपयोग से किडनी, नपुंसकता, मुत्राशय के रोग, कोढ़, गर्भावस्था के रोग, शुक्राणु की कमी आदि में आश्चर्यजनक लाभ होता हैं ।
 चौदहमुखी रूद्राक्ष - चौदहमुखी रूद्राक्ष श्री कंठ स्वरूप हैं । यह रूद्रदेव की ऑखों से विशेष रूप से उत्पन्न हुआ हैं। जो व्यक्ति इस परमदिव्य रूद्राक्ष को धारण करता है, वह सदैव ही देवताओं का प्रिय रहता हैं । यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक हैं । यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला हैं । इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती हैं । इसके उपयोग द्वारा जातक की सभी तरह के बुरे तत्वों से रक्षा होती हैं । यह जातक को गरीबी से दूर रखता हैं । छटी इन्द्रीय व अर्न्तज्ञान तथा अतिंद्रिय शक्ति का मालिक बनाता हैं। चौदहमुखी रूद्राक्ष में हनुमान जी का भी अधिवास माना गया हैं यह रूद्राक्ष भूत, पिशाच, डाकिनी, शकिनी से भी रक्षा करता हैं । इससे बल और उत्साह का वर्धन होता हें । 
     इससे निभ्रयता प्राप्त होती हैं और संकटकाल में सरंक्षण प्राप्त होता हैं । विपत्ति और दुर्घटना से बचने के लिए हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले चौदहमुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिए । यह रूद्राक्ष चमत्कारी हैं । इससे अनंतगुण विद्यमान हैं । शास्त्र प्रमाण के अनुसार मानव-वाणी से इनके गुणों का व्याख्यान संभव नहीं हैं इसका धारणकर्ता स्वर्ग को प्राप्त करता हैं । वह चौदहों भुवनों का रक्षक और स्वामी बन जाता हैं। जिसने चौदहमुखी रूद्राक्ष धारणकर लिया शनि जैसा क्रोधी ग्रह भी लाख चाहकर उसका बुरा नहीं कर सकता । यह शास्त्रोक्त सत्य हैं । साधन सम्पन्न लोगों को आवश्यक रूप से इस दिव्य रूद्राक्ष का उपयोग अवश्य करना चाहिए। इसके प्रयोग द्वारा निराशापन, मानसिक रोग, अस्थमा, पक्षाघात, वायु के रोग, बहरापन, केंसर, चित्तभ्रम, थकान और पैरों के रोगों में लाभ होता हैं। 
 गौरी शंकर रूद्राक्ष :- मुख वाले रूद्राक्षों में गौरीशंकर रूद्राक्ष सर्वोपरि हैं, जिस प्रकार लक्ष्मी का पूजन उनके पति नारायण (विष्णुजी) के साथ करने लक्ष्मी-नारायण की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं ठीक इसी प्रकार गौरी (माँ पार्वती) के साथ देवाधिदेव भगवान शिव का पूजन करने से गौरी-शंकर की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष धारण पूजन से तो गौरीशंकर की कृपा निश्चित रूप से प्रापत होती ही हैं इससे किंचित मात्र भी संदेह नहीं हैं ।
      इसके उपयोग से पारिवारिक एकता, आत्मिक ज्ञान, मन और इंद्रियों पर काबू, कुण्डलिनी जागरण एवं पति-पत्नि की एकता में वृद्धि होती हैं। बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष के धारण करने से समूल नष्ट होता हैं जन्म के पाप इस रूद्राक्ष के धारण मात्र से काफूर हो जाते हैं गौरीशंकर रूद्राक्ष में गौरी स्वरूप भगवती पार्वती का निवास होने के कारण इस रूद्राक्ष पर भगवान शिव की विशेष कृपा हैं मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित मनुष्यों/स्त्रियों के लिए ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की भांति काम करता हैं । जन्म पत्री में यदि दुखदायी ‘‘कालसर्प योग‘‘ पूर्णरूप से अथवा आंसिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी + 9 मुखी + गौरीशंकर रूद्राक्ष अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योकिं कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं । 
 गणेश रूद्राक्ष :- सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक अडचनें और विलम्ब होने पर ‘‘गणेश रूद्राक्ष‘‘ का धारण चमत्कार दिखाता हैं । विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य हैं परम दुर्लभ हैं। इसके प्रयोग से विद्या व ज्ञान प्राप्ति, मानसिक असंतोष एवं सभी तरह के अवरोध दूर होते हैं । विशेष रूप से संतान बाधा एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता हैं । त्वचा रोग, हिचकी, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश, केंसर एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले दुष्परिणामों में उत्तम लाभ देता हैं। 
 पथरी रूद्राक्ष :- यह रूद्राक्ष उत्कृष्ट गुणवन्त रूद्राक्ष हैं । आमतौर पर पाए जाने वाले रूद्राक्ष से इसकी गुणवत्ता काफी उच्च होती हैं । इसमें विटामिन और इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो की मात्रा अधिक होती हैं । पथरी रूद्राक्ष कुदरती तौर पर मजबूत होने के कारण इसकी आयु कई सौ साल की होती हैं। उच्च परिणाम के लिए पथरी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए ।


जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत

सौरमंडल में मौजूद ग्रहों का हमारे जीवन पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह वही समझ सकता है जिसने इन बदलावों को कभी महसूस किया हो। यकीन मानिए, जिस नक्षत्र में हम जन्म लेते हैं, उस समय मौजूद ग्रह सारे जीवन हमें प्रभावित करते हैं। अब यह प्रभाव सकारात्मक होने के साथ नकारात्मक भी हो सकता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक ग्रह किसी एक राशि में कुछ समय तक रहता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक राशि में प्रवेश करने पर ये ग्रह ना केवल उस राशि, वरन् अन्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं। आज हम सूर्य राशि के वृष राशि में प्रवेश करने की घटना पर चर्चा करने जा रहे हैं। 14 मई, 2017 सूर्य ग्रह, वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य देव यहां पूरे एक महीने के लिए रहेंगे, और इसके बाद 15 जून को वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। 
Know-the-fate-of-people-who-will-change-the-Sun-in-Taurus-जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत         वैदिक ज्योतिष में सूर्य को नवग्रहों के राजा की उपाधि दी गई है। प्राणी जगत के लिए यह ऊर्जा का केन्द्र है, इसलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। प्रत्येक जातक की कुंडली में सूर्य उनके पिता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए यह पितृ कारक भी होता है। 14 मई 2017 रविवार को रात्रि 11:11 बजे सूर्य मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश करेगा और 15 जून 2017 गुरुवार को सुबह 05:47 पर वृषभ राशि से मिथुन राशि में गोचर करेगा। निश्चित ही सूर्य के इस गोचर का प्रभाव सभी 12 राशियों पर होगा। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार मेष का सूर्य लोगों को अप्रैल से ही सुख-सुविधाओं का जमकर आभास करा रहा है। 13 अप्रैल से शुरू हुई मेष संक्रांति ब्राह्मणों और धर्म-कर्म करने वालों सहित अन्य वर्ग के लोगों के लिए लाभप्रद है। 
        ज्योतिर्विद राजकुमार चतुर्वेदी के अनुसार सूर्य की यह युक्ति हालांकि सितंबर माह तक रहेगी,लेकिन 14 मई को सूर्य के वृष राशि में प्रवेश के करने के साथ ही कुछ दिनों के लिए यह लोगों को परेशान भी करेगा। वर्तमान में शनि धुन राशि में गोचर कर रहा है। मेष का सूर्य, शनि का धनु राशि में गोचर लोगों के लिए अच्छे दिन लेके आए हैं। ग्रहों इन युक्तियों से उद्योगों एवं निवेशों के लाभ में अप्रत्याशित वृद्धि होगी तो रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। स्वास्थ्य सेवाओं नवीन तकनीक का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगा। रियल और इन्फ्रा सेक्टर में गिरावट का दौर रहेगा। भूमि-मकानों की कीमतों में कमी के साथ-साथ किराये में भी कमी आएगी। 

वर्तमान में ऐसी है ग्रहों की चाल--- 
 उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार सूर्य वर्तमान में मेष राशि में चल रहा है। यह 14 मई को रात 10.55 बजे वृष राशि में प्रवेश करेगा। वर्तमान वृष राशि विचरण कर रहा मंगल 26 मई को मिथुन राशि में प्रवेश करेगा। मेष का बुध तीन जून को वृष में जाएगा। वर्तमान में कन्या राशि में विचरण कर रहा वक्र गति का गुरु 9 जून को कन्या राशि में मार्ग गति पकड़ लेगा तथा 12 सितंबर को कन्या राशि को छोड़कर तुला राशि में प्रवेश करेगा। मीन का शुक्र 31 मई को मेष राशि में प्रवेश करेगा। धनु राशि में वक्री हुआ शनि 25 अगस्त तक रहेगा। 

 जानिए क्या और केसा रहेगा यह रहेगा इस परिवर्तन का राशिगत प्रभाव--- (यह एक महीना वृषभ राशि के जातकों के साथ अन्य ग्यारह राशि के लिए कैसा रहेगा)-- 
  1. मेष: कुछ कठिनाइयां, छोटे भाई बहनों से विवाद। 
  2. वृष : पिता की सेहत में गिरावट, 21 जून के बाद समय अच्छा। 
  3. मिथुन : नाम एवं प्रसिद्धि मिलेगी, कानून से जुड़े मामलों में सफलता।  
  4. कर्क : परिवार को लेकर परेशानी, वाद-विवाद बढ़ सकता है। 
  5. सिंह : आय में वृद्धि की संभावना, प्रसिद्धि बढ़ेगी। 
  6. कन्या : मां की सेहत में गिरावट सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। 
  7. तुला : बड़ी उपलब्धि मिल सकती है, प्रोपर्टी से लाभ होगा। 
  8. वृश्चिक-: मानसिक तनाव, स्वास्थ्य में गिरावट।  
  9. धनु :- स्वास्थ्य में गिरावट, भाई-बहन के जीवन में समृद्धि। 
  10. मकर :- जून में उन्नति के दरवाजे खुलेंगे, लंबी यात्रा के योग। 
  11. कुंभ:- सपने सच होंगे, जून के बाद कार्य में अधिक मन लगेगा। 
  12. मीन :- खर्चे होंगे, मां की सेहत में गिरावट आएगी।

जानिए ज्योतिष में पंचक का प्रभाव और महत्त्व

Know-the-impact-and-significance-of-the-quintet-in-astrology-जानिए ज्योतिष में पंचक का प्रभाव और महत्त्वकिसी भी काम को मंगलमय ढ़ग से पूरा करने के लिए यह बहुत अवश्यक है की उसे शुभ समय पर किया जाए। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं की सभी नक्षत्रों का अपना-अपना प्रभाव होता है। कुछ शुभ फल देते हैं तो कुछ अशुभ लेकिन कुछ ऐसे काम होते हैं जो कुछ नक्षत्रों में नहीं करने चाहिए। उज्जैन के ज्योतिषी पंडित पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया जब चंद्रमा गोचर में कुंभ और मीन राशि से होकर गुजरता है तो यह समय अशुभ माना जाता है इस दौरान चंद्रमा धनिष्ठा से लेकर शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती से होते हुए गुजरता है इसमें नक्षत्रों की संख्या पांच होती है इस कारण इन्हें पंचक कहा जाता है। 
           कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हे विशेष रुप से पंचक के दौरान करने की मनाही होती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों के योग को ही पंचक कहा जाता है इसलिये पंचक को ज्योतिष शुभ नक्षत्र नहीं मानता अतः सावधानी रखें,ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों और नक्षत्र के अनुसार ही किसी कार्य को करने या न करने के लिये समय तय किया जाता है जिसे हम शुभ या अशुभ मुहूर्त कहते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में आरंभ होने वाले कार्यों के परिणाम मंगलकारी होते हैं जबकि शुभ मुहूर्त को अनदेखा करने पर कार्य में बाधाएं आ सकती हैं और उसके परिणाम अपेक्षाकृत तो मिलते नहीं बल्कि कई बार बड़ी क्षति होने का खतरा भी रहता है। 
           उज्जैन के ज्योतिषी पंडित पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया भारतीय ज्योतिष में पंचक को अशुभ माना गया है। इसके अंतर्गत धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र आते हैं। पंचक के दौरान कुछ विशेष काम करने की मनाही है। इस बार शुक्रवार (21 अप्रैल) की सुबह लगभग 10.14 बजे से पंचक शुरू हो गया था, जो 25 अप्रैल, मंगलवार की रात लगभग 09.03 तक रहेगा। 
      उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, शनिवार से शुरू होने के कारण ये मृत्यु पंचक कहलाएगा। पंचक कितने प्रकार का होता है और इसमें कौन से काम नहीं करने चाहिए, पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है। उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं। 
       उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है। 
  1. रोग पंचक--- उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार रविवार को शुरू होने वाला पंचक रोग पंचक कहलाता है। इसके प्रभाव से ये पांच दिन शारीरिक और मानसिक परेशानियों वाले होते हैं। इस पंचक में किसी भी तरह के शुभ काम नहीं करने चाहिए। हर तरह के मांगलिक कार्यों में ये पंचक अशुभ माना गया है।
  2. राज पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सोमवार को शुरू होने वाला पंचक राज पंचक कहलाता है। ये पंचक शुभ माना जाता है। इसके प्रभाव से इन पांच दिनों में सरकारी कामों में सफलता मिलती है। राज पंचक में संपत्ति से जुड़े काम करना भी शुभ रहता है। 
  3.  अग्नि पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मंगलवार को शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इन पांच दिनों में कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फैसले, अपना हक प्राप्त करने वाले काम किए जा सकते हैं। इस पंचक में अग्नि का भय होता है। इस पंचक में किसी भी तरह का निर्माण कार्य, औजार और मशीनरी कामों की शुरुआत करना अशुभ माना गया है। इनसे नुकसान हो सकता है। 
  4. मृत्यु पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनिवार को शुरू होने वाला पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। नाम से ही पता चलता है कि अशुभ दिन से शुरू होने वाला ये पंचक मृत्यु के बराबर परेशानी देने वाला होता है। इन पांच दिनों में किसी भी तरह के जोखिम भरे काम नहीं करना चाहिए। इसके प्रभाव से विवाद, चोट, दुर्घटना आदि होने का खतरा रहता है। 
  5. चोर पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। इस पंचक में यात्रा करने की मनाही है। इस पंचक में लेन-देन, व्यापार और किसी भी तरह के सौदे भी नहीं करने चाहिए। मना किए गए कार्य करने से धन हानि हो सकती है। 

इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है। इन दो दिनों में शुरू होने वाले दिनों में पंचक के पांच कामों के अलावा किसी भी तरह के शुभ काम किए जा सकते हैं| 
 जानिए उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसारपंचक के नक्षत्रों का शुभ फल-- मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार पंचक के नक्षत्रों का शुभ फल--
  1. घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इनमें चलित काम करना शुभ माना गया है जैसे- यात्रा करना, वाहन खरीदना, मशीनरी संबंधित काम शुरू करना शुभ माना गया है। 
  2. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र माना गया है। इसमें स्थिरता वाले काम करने चाहिए जैसे- बीज बोना, गृह प्रवेश, शांति पूजन और जमीन से जुड़े स्थिर कार्य करने में सफलता मिलती है। 
  3. रेवती नक्षत्र मैत्री संज्ञक होने से इस नक्षत्र में कपड़े, व्यापार से संबंधित सौदे करना, किसी विवाद का निपटारा करना, गहने खरीदना आदि काम शुभ माने गए हैं। 

 जानिए उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार केसा होता है पंचक के नक्षत्रों का अशुभ प्रभाव--- 
  1. धनिष्ठा नक्षत्र में आग लगने का भय रहता है। 
  2. शतभिषा नक्षत्र में वाद-विवाद होने के योग बनते हैं। 
  3. पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र है यानी इस नक्षत्र में बीमारी होने की संभावना सबसे अधिक होती है। 
  4. उत्तरा भाद्रपद में धन हानि के योग बनते हैं। 
  5. रेवती नक्षत्र में नुकसान व मानसिक तनाव होने की संभावना होती है। 

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पंचक में न करें ये 5 काम 
  1. पंचक में चारपाई बनवाना भी अच्छा नहीं माना जाता। ऐसा करने से कोई बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। 
  2. पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि जलने वाली वस्तुएं इकट्ठी नहीं करना चाहिए, इससे आग लगने का भय रहता है।
  3. पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है। 
  4. पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का कहना है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है। 
  5. पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से पहले किसी योग्य पंडित की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। यदि ऐसा न हो पाए तो शव के साथ पांच पुतले आटे या कुश (एक प्रकार की घास) से बनाकर अर्थी पर रखना चाहिए और इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार करना चाहिए, तो पंचक दोष समाप्त हो जाता है। ऐसा गरुड़ पुराण में लिखा है। 

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ये शुभ कार्य कर सकते हैं पंचक में---
 पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं। पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है। 
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पंचक में कुछ कार्य विशेष रूप से निषिद्ध कहे गए हैं- 
  1. पंचकों में शव का क्रियाकर्म करना निषिद्ध है क्योकि पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने पर कुटुंब या पड़ोस में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। 
  2. पंचकों के पांच दिनों में दक्षिण दिशा की यात्रा वर्जित कही गई है क्योंकि दक्षिण मृत्यु के देव यम की दिशा मानी गई है। 
  3. चर संज्ञक धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहने के कारण घास लकड़ी ईंधन इकट्ठा नहीं करना चाहिए। 
  4. मृदु संज्ञक रेवती नक्षत्र में घर की छत डालना धन हानि व क्लेश कराने वाला होता है।
  5. पंचकों के पांच दिनों में चारपाई नहीं बनवानी चाहिए।

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जानिए पंचक दोष दूर करने के उपाय- 
  1. लकड़ी का समान खरीदना अनिवार्य होने पर गायत्री यग्य करें।
  2. दक्षिण दिशा की यात्रा अनिवार्य हो तो हनुमान मंदिर में पांच फल चढ़ाएं। 
  3. मकान पर छत डलवाना अनिवार्य हो तो मजदूरों को मिठाई खिलाने के पश्चात छत डलवाएं।
  4. पलंग या चारपाई बनवानी अनिवार्य हो तो पंचक समाप्ति के बाद ही इस्तेमाल करें। पंचक के दौरान इस दौरान कोई पलंग, चारपाई, बेड आदि नहीं बनवाना चाहिये माना जाता है कि पंचक के दौरान ऐसा करने से बहुत बड़ा संकट आ सकता है। 
  5. शव का क्रियाकर्म करना अनिवार्य होने पर शव दाह करते समय कुशा के पंच पुतले बनाकर चिता के साथ जलाएं। पंचक में यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार विशेष विधि के तहत किया जाना चाहिये अन्यथा पंचक दोष लगने का खतरा रहता है जिस कारण परिवार में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। इस बारे में गुरुड़ पुराण में विस्तार से जानकारी मिलती है इसमें लिखा है कि अंतिम संस्कार के लिये किसी विद्वान ब्राह्मण की सलाह लेनी चाहिये और अंतिम संस्कार के दौरान शव के साथ आटे या कुश के बनाए हुए पांच पुतले बना कर अर्थी के साथ रखें और शव की तरह ही इन पुतलों का भी अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से करना चाहिये। 
  6. पंचक शुरु होने से खत्म होने तक किसी यात्रा की योजना न बनाएं मजबूरी वश कहीं जाना भी पड़े तो दक्षिण दिशा में जाने से परहेज करें क्योंकि यह यम की दिशा मानी जाती है। इस दौरान दुर्घटना या अन्य विपदा आने का खतरा आप पर बना रहता है। 

 विशेष सावधानी-- किसी भी उपाय को आरंभ करने से पहले अपने इष्ट देव का मंत्र जाप अवश्य करें।

14 मार्च 2017 (मंगलवार) से शुरू हो चुके हैं मल मास, विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित

जन सामान्य में प्रचलित मान्यता है कि खरमास में विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित है. जैसे विवाह आदि जैसे कार्य नही होते हैं. लोग सिर्फ ईश्वर-भजन, पूजा-पाठ आदि कर सकते हैं , ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस अवधि में अनुष्ठान, यज्ञ, पूजा-पाठ, हवन आदि करना अच्छा नहीं माना गया है. 
14-March-2017-Tuesday-have-started-from-Mal-Mas-marriage-Auspicious-work-baned-14 मार्च 2017 (मंगलवार) से शुरू हो चुके हैं मल मास, विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित          इस वर्ष 14 मार्च 2017 (मंगलवार) से मल मास शुरू हो चुके हैं, जो 13 अप्रैल 2017, गुरुवार तक रहेगा। इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो . ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की यदि आप मार्च के महीने में नया कार्य, व्यापार या गृह प्रवेश करना चाह‍ते हैं तो सावधानी रखें| कार्य-सिद्धि योग सकारात्मक ऊर्जा से सम्‍पन्न होते हैं। इसी कारण किसी भी नए कार्य को शुरू करने से पहले शुभ योग-संयोग को देख-परख लेना श्रेष्ठ होता हैं। 
          ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की यदि आपको किसी भी कारण से इस माह में नया कार्य आरंभ करना हो तो 17 मार्च, 24 मार्च या 28 मार्च अथवा 30 मार्च को सर्वदोषनाशक रवि योग में भी कर सकते है || 14 मार्च 2017 से खरमास प्रारंभ हो गया है। इसलिए हिन्दू मान्यता के अनुसार, एक महीने तक शुभ कार्य नहीं होंगे. यह खरमास 13 अप्रैल 2017 तक कायम रहेगा. वैदिक ज्योतिष और हिन्दू पंचांग गणना के अनुसार सूर्य एक राशि में एक महीने तक रहता है. जब सूर्य 12 राशियों का भ्रमण करते हुए बृहस्पति की राशियो, धनु और मीन, में प्रवेश करता है, तो अगले 30 दिनों यानि एक महीने की अवधि को खरमास कहा जाता हैं. इस साल 14 मार्च को सूर्य कुंभ राशि से निकल कर मीन राशि में प्रवेश कर रहा है. इसे मीन संक्रांति भी कहते हैं. 
         ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस समय में भवन-निर्माण संबंधित कार्य भी नहीं किये जाते हैं. कोई नया निवेश या व्यवसाय आदि भी नहीं शुरू की जाती है इस अवधि में बच्चे का मुंडन संस्कार भी नहीं होता है| साथ ही लोग नए घर में गृह-प्रवेश भी नहीं करते हैं . 14 मार्च,2017 (मंगलवार) से मल मास शुरू हो रहा है, जो 13 अप्रैल 2017, गुरुवार तक रहेगा। ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की धर्मग्रंथों के अनुसार, खर (मल) मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है। इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान की आराधना करने का विशेष महत्व है। 
          धर्मग्रंथों के अनुसार, इस मास में सुबह सूर्योदय के पहले उठकर शौच, स्नान, संध्या आदि अपने-अपने अधिकार के अनुसार नित्यकर्म करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम ग्रहण करने चाहिए। पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत का पाठ करना महान पुण्यदायक है। खरमास, यानि खराब महीना . वो महीना जब हर प्रकार के शुभ काम बंद हो जाते हैं. कोई नया काम शुरू नहीं किया जाता, इस मास के साथ आती है कई प्रकार की बंदिशें और साथ ही ये सलाह भी कि ज़रा बच कर रहिएगा, ज़रा सोच समझकर काम कीजिएगा . सूर्य प्रतिकूल हो तो हर कार्य में असफलता नजर आती है. भारतीय पंचांग पद्धति में प्रतिवर्ष पौष मास को खर मास कहते हैं .इसे मलमास काला महीना भी कहा जाता है.  लेकिन इस मास में भी कुछ योग होते हैं, जिनमें अति आवश्यक परिस्थितियों में कुछ कार्य किए जा सकते हैं. 
           पंडितों का कहना है कि पौष मास के समय अति आवश्यक परिस्थिति में सर्वार्थ सिद्ध योग, रवि योग, गुरु पुष्य योग अमृत योग में विवाह के कर्मों को छोड़कर अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं. लेकिन ये शुभ कार्य अति आवश्यक परिस्थिति में ही कर सकते हैं .वर्ष भर में दो बार खरमास आता है . जब सूर्य गुरु की राशि धनु या मीन में होता है .खरमास के समय पृथ्वी से सूर्य की दूरी अधिक होती है. इस समय सूर्य का रथ घोड़े के स्थान पर गधे का हो जाता है . इन गधों का नाम ही खर है इसलिए इसे खरमास कहा जाता हैजब सूर्य वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करता है, इस प्रवेश क्रिया को धनु की संक्रांति कहते हैं. यही मलमास है ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। भगवान की विशेष पूजा होनी चाहिए और भगवान की कृपा से देश तथा विश्व का मंगल हो एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो, इसके लिए व्रत-नियम आदि का आचरण करते हुए दान, पुण्य और भगवान की पूजा करना चाहिए। 
 पुरुषोत्तम मास के संबंध में धर्म ग्रंथों में वर्णित है- 
 येनाहमर्चितो भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे। 
धनपुत्रसुखं भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।। 
 अर्थात- पुरुषोत्तम मास में नियम से रहकर भगवान की विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तिपूर्वक उन भगवान की पूजा करने वाला यहां सब प्रकार के सुख भोगकर मृत्यु के बाद भगवान के दिव्य गोलोक में निवास करता है। 
        धर्म ग्रंथों में ऐसे कई श्लोक भी वर्णित है जिनका जप यदि खर मास में किया जाए तो अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल में श्रीकौण्डिन्य ऋषि ने यह मंत्र बताया था। मंत्र जाप किस प्रकार करें इसका वर्णन इस प्रकार है- 
 कौण्डिन्येन पुरा प्रोक्तमिमं मंत्र पुन: पुन:। 
जपन्मासं नयेद् भक्त्या पुरुषोत्तममाप्नुयात्।। 
ध्यायेन्नवघनश्यामं द्विभुजं मुरलीधरम्। 
लसत्पीतपटं रम्यं सराधं पुरुषोत्तम्।। 
 अर्थात- मंत्र जपते समय नवीन मेघश्याम दोभुजधारी बांसुरी बजाते हुए पीले वस्त्र पहने हुए श्रीराधिकाजी के सहित श्रीपुरुषोत्तम भगवान का ध्यान करना चाहिए। 
 गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्। 
गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।। 
 इस मंत्र का एक महीने तक भक्तिपूर्वक बार-बार जाप करने से पुरुषोत्तम भगवान की प्राप्ति होती है, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है। 
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जानिए भगवान विष्णु ने क्यों दिया इसे अपना नाम?
 धर्मग्रंथों के अनुसार, खर (मल) मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है। इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान की आराधना करने का विशेष महत्व है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस मास में सुबह सूर्योदय के पहले उठकर शौच, स्नान, संध्या आदि अपने-अपने अधिकार के अनुसार नित्यकर्म करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम ग्रहण करने चाहिए। पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत का पाठ करना महान पुण्यदायक है। 
           शास्त्रों के अनुसार इस मास में सुबह सूर्योदय से पहले उठकर अपने नित्य कामों से निवृत्त हो जाना चाहिए। और दिन भर भगवान विष्णु के नाम का जाप करना चाहिए। इसे विष्णु ने अपना नाम दिया था। इसका दूसरा नाम पुरुषोत्तम मास भी है। इस दिनों पर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए साथ ही गो दान, ब्राह्मण की सेवा, दान आदि देने से अधिक फल मिलता है। इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। भगवान की विशेष पूजा होनी चाहिए और भगवान की कृपा से देश तथा विश्व का मंगल हो एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो, इसके लिए व्रत-नियम आदि का आचरण करते हुए दान, पुण्य और भगवान की पूजा करना चाहिए। 
पुरुषोत्तम मास के संबंध में धर्म ग्रंथों में वर्णित है- 
 येनाहमर्चितो भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे। 
धनपुत्रसुखं भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।। 
 अर्थात- पुरुषोत्तम मास में नियम से रहकर भगवान की विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तिपूर्वक उन भगवान की पूजा करने वाला यहां सब प्रकार के सुख भोगकर मृत्यु के बाद भगवान के दिव्य गोलोक में निवास करता है। ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस खर मास में सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक श्रवण ही किया जाता है 
    ब्रह्म पुराण के अनुसार खर मास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है. अर्थात चाहे व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के अन्तर्गत खर मास यानी मल मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो निश्चित रूप से उसका इहलोक और परलोक नर्क के द्वार की तरफ खुलता है  इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अंदर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों से बेध दिया था सैकड़ों बाणों से घायल हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा 
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जानिए खरमास के महीने मे कैसे अपना भाग्योदय करें ?? 
 खर मास ऐसा महीना जब हम ना ही कुछ अच्छे कम की शुरुआत कर सकते हैं और ना ही कुछ खरीद सकतें हैं| ज्योतिषाचार्य एवम वास्तुशास्त्री पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस खर मास में क्या करना अच्छा है और क्या आपको नुकसान दे सकता है| 
 जानिए खर मास में क्या नही करना चाहिए :-- 
  1. कोई भी नई वस्तुएँ जैसे की घर, कार, इत्यादि ना खरीदे 
  2. घर के निर्माण का कार्य को शुरू ना करें और ना ही उस से संबंधित कोई भी समान खरीदें 
  3. कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, सगाई ना करें 
जानिए क्या करें खर मास में आप अपने भाग्य को अच्छा करने के लिए:-- 
  1. खर मास को पुरषोत्तम मास भी कहा जाता है जो भगवान विष्णु का नाम है, इसलिए इस मास के दोनों एकादशी मे भगवान विष्णु को खीर का भोग लगाएँ और उसमें तुलसी के पत्तों का प्रयोग करें
  2. इस समय पिलें वस्त्र, पीला रंग का अनाज, फल श्री हरी को अर्पण करें और फिर इन चीज़ों को दान कर दें
  3. खर मास मे माँ तुलसी के सामने गाय के घी का दीपक लगाएँ और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का जप करते हुए ११ बार परिक्रमा करें ऐसा करने से घर के सारे संकट और दुख ख़त्म हो जातें हैं और घर मे सुख शांति का वास होता है
  4.  ब्रह्म मुहर्त मे उठकर स्नान करके भगवान विष्णु को केसर युक्त दूध का अभिषेक करें और तुलसी के माला से ११ बार ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का जप करें
  5. हमारे .ग्रंथों के अनुसार पीपल के वृक्ष मे भगवान विष्णु का वास माना गया है इसलिए अगर आप पीपल के पेड़ मे जल को अर्पण करके गाय के घी का दीपक जलातें है तो आपके ऊपर भगवान विष्णु का आशीर्वाद हमेशा बना रहेगा
  6. खर मास मे प्रत्येक दिन श्री हरी का ध्यान करें और पीले पुष्प अर्पित करें, इससे आपके सारे मनोकामनाएँ पूरी होंगी
  7. दक्षिणावर्ती शंख की पूजा करनी चाहिए इस मास मे| कहा जाता है की दक्षिणावर्ती शंख की पूजा करने से श्री हरी विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी भ प्रसन्न होती हैं
  8. सुबह उठकर भागवत कथा को पढ़ें
  9. अगर आपको अपना प्रमोशन या पदोंउन्नति चाहिए तो खर मास के नवमी तिथि को कन्याओं को अपने घर पे बुला के भोजन कराएँ

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जानिए महाशिवरात्रि महात्म्य व पूजा विधान

 Know-the-majesty-and-worship-legislation-Shivaratri-2017-india-जानिए महाशिवरात्रि 2017 महात्म्य व पूजा विधान

       शिव यानि कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिव यानि शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ, रूद्र आदि। हिंदू देवी-देवताओं में भगवान शिव शंकर सबसे लोकप्रिय देवता हैं, वे देवों के देव महादेव हैं तो असुरों के राजा भी उनके उपासक रहे। आज भी दुनिया भर में हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये भगवान शिव पूज्य हैं। 
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  • महाशिवरात्रि 2017 में 24 फरवरी--- 
  • निशिथ काल पूजा- 24:08 से 24:59 
  • पारण का समय- 06:54 से 15:24 (25 फरवरी) 
  • चतुर्दशी तिथि आरंभ- 21:38 (24 फरवरी) 
  • चतुर्दशी तिथि समाप्त- 21:20 (25 फरवरी) 

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         हिंदु शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव मनुष्य के सभी कष्टों एवं पापों को हरने वाले हैं। सांसरिक कष्टों से एकमात्र भगवान शिव ही मुक्ति दिला सकते हैं। इस कारण प्रत्येक हिंदु मास के अंतिम दिन भगवान शिव की पूजा करके जाने-अनजाने मे किए हुए पाप कर्म के लिए क्षमा मांगने और आने वाले मास में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रावधान है। शास्त्रों के अनुसार, शुद्धि एवं मुक्ति के लिए रात्री के निशीथ काल में की गई साधना सर्वाधिक फलदायक होती है। अत: इस दिन रात्री जागरण करके निशीथ काल में भगवान शिव कि साधना एवं पूजा करने का अत्यधिक महत्व है।
            महाशिवरात्री वर्ष के अंत में आती है अत: इसे महाशिवरात्री के रूप में मनाया जाता है एवं इस दिन पूरे वर्ष में हुई त्रुटियों के लिए भगवान शंकर से क्षमा याचना की जाती है तथा आने वाले वर्ष में उन्नति एवं सदगुणों के विकास के लिए प्रार्थना की जाती है। महाशिवरात्रि का महा उत्सव फाल्गुड मास की त्रिद्रशी के दिन मनाई जाती है। मान्यता है की महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर ही भोलेनाथ और माता पार्वती विवाह के पावन सुत्र में बंधे थे, कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि इस दिन महादेव ने कालकूट नाम का विष पान कर अपने कंठ में रख लिया था कहा जाता है कि यह विष सागर मंथन में निकला था। शिवरात्रि के ही दिन बहुत समय पहले एक शिकारी को दर्शन देकर उसे पापो से मुक्त किया था। महाशिवरात्रि के इस पवित्र अवसर से एक पौराणिक कथा भी जुडी हैं। प्राचीन काल में, एक जंगल में गुरूद्रूह नाम के एक शिकारी रहते थे जो जंगली जानवरों के शिकार करके वह अपने परिवार का पालन-पोषण किया करते थे। 
           एक बार शिवरात्रि के दिन ही जब वह शिकार के लिए गया, तब संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई जानवर शिकार के लिए न मिला, चिंतित हो कर कि आज उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पडेगा, वह सूर्यास्त होने पर भी एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे एक पेड पर अपने साथ थोडा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ गया क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहां ज़रूर आयेगा। वह पेड "बेल-पत्र" का था और इसके नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढक जाने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था। 
           रात का पहला प्रहर बीतने से पहले ही एक हिरणी वहां पर पानी पीने के लिए आई। उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा। ऎसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदे पे़ड के नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गई। हिरणी ने जब पत्तों की खडखडाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर, शिकारी से, कांपते हुए बोली- "मुझे मत मारो।" शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड सकता। हिरणी ने शपथ ली कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी। तब वह उसका शिकार कर ले। शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है।
              समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है। शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने "जल्दी लौटना" कहकर ,उस हिरनी को जाने दिया। थोडी ही देर गुजरी कि एक और हिरनी वहां पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो, तीर सांधने लगा और ऎसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई। इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर, हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया। 
              अब तो वह इसी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि उन में से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा। इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर वनेचर (शिकारी ) को बडा हर्ष हुआ, अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वत: ही संपन्न हो गई लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज़ से वह हिरन सावधान हो गया। उसने व्याध (शिकारी ) को देखा और पूछा क्या करना चाहते हो। वह बोला-अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा। वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा कि मैं धन्य हूं कि मेरा ये ह्वष्ट-पुष्ट शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा लेकिन एक बार मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहां लौट आऊं। शिकारी का ह्रदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह कुछ विनम्र वाणी में बोला कि जो-जो यहां आये, सभी बातें बनाकर चले गये और अब तक नहीं लौटे, यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे, तो मेरे परिजनों का क्या होगा। 
               अब हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता। व्याध ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि "शीघ्र लौट आना।" रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू होते ही उस वनेचर के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था। उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गई अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा, "ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने कुटुंब का पालन करता रहा। अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा सब मृगों को यह कहकर कि "वे धन्य हैं"। वापिस जाने दिया। उसके ऎसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर गुह" नाम प्रदान किया। यह वही गुह थे जिनके साथ भगवान् श्री राम ने मित्रता की थी। अत: यह भी माना जाता है कि, शिवरात्री के दिन व्रत करने से सारे पाप से मुक्त हो जाते है और महादेव का दर्शन कर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
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इस वर्ष महाशिवरात्री का त्योहार (शुक्रवार) 24 फरवरी 2017के दिन मनाया जाएगा। हिंदु कलेंडर के अनुसार एक वर्ष में बारह शिवरात्रियां होतीं हैं। शिवरात्रि प्रत्येक हिन्दु माह की कृष्ण चतुर्दशी, जो कि माह का अंतिम दिन होता है के दिन मनाई जाती है। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी, महाशिवरात्री के रूप में, पूरे भारतवर्ष में धूम-धाम से मनाई जाती है। इसके दूसरे दिन से हिंदु वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन का आरंभ हो जाता है। 
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           ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शंकर एवं मां पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था तथा इसी दिन प्रथम शिवलिंग का प्राकट्य हुआ था। शिव रात्री के दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस दिन शिव भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, भगवान शिव का अभिषेक करते हैं तथा पंचक्षरी मंत्र का जाप करतें हैं। भगवान शिव सब देवों में वृहद हैं, सर्वत्र समरूप में स्थित एवं व्यापक हैं। इस कारण वे ही सबकी आत्मा हैं। भगवान शिव निष्काल एवं निराकार हैं। भगवान शिव साक्षात ब्रह्म का प्रतीक है तथा शिवलिंग भगवान शंकर के ब्रह्म तत्व का बोध करता है। इसलिए भगवान शिव की पूजा में निष्काल लिंग का प्रयोग किया जाता है। सारा चराचर जगत बिन्दु नाद स्वरूप है। 
        बिन्दु देव है एवं नाद शिव इन दोनों का संयुक्त रूप ही शिवलिंग है। बिन्दु रूपी उमा देवी माता है तथा नाद स्वरूप भगवान शिव पिता हैं। जो इनकी पूजा सेवा करता है उस पुत्र पर इन दोनों माता-पिता की अधिकाधिक कृपा बढ़ती रहती है। वह पूजक पर कृपा करके उसे अतिरिक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। आंतरिक आनंद की प्राप्ति के लिए शिवलिंग को माता-पिता के स्वरूप मानकर उसकी सदैव पूजा करनी चाहिए। भगवान शिव प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में स्थित अवयक्त आंतरिक अधिस्ठान तथा प्रकृति मनुष्य की सुव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान है। नमः शिवाय: पंचतत्वमक मंत्र है इसे शिव पंचक्षरी मंत्र कहते हैं। इस पंचक्षरी मंत्र के जप से ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।
         इस मंत्र के आदि में ॐ लगाकर ही सदा इसके जप करना चाहिए। भगवान शिव का निरंतर चिंतन करते हुए इस मंत्र का जाप करें। सदा सब पर अनुग्रह करने वाले भगवान शिव का बारंबार स्मरण करते हुए पूर्वाभिमुख होकर पंचक्षरी मंत्र का जाप करें। भक्त की पूजा से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। शिव भक्त जितना जितना भगवान शिव के पंचक्षरी मंत्र का जप कर लेता है उतना ही उसके अंतकरण की शुद्धि होती जाती है एवं वह अपने अंतकरण मे स्थित अव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान के रूप मे विराजमान भगवान शिव के समीप होता जाता है। उसके दरिद्रता, रोग, दुख एवं शत्रुजनित पीड़ा एवं कष्टों के अंत हो जाता है एवं उसे परम आनंद कि प्राप्ति होती है। भगवान शिव की पूजा आराधना की विधि बहुत सरल मानी जाती है।
           माना जाता है कि शिव को यदि सच्चे मन से याद कर लिया जाये तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में भी ज्यादा ताम-झाम की जरुरत नहीं होती। ये केवल जलाभिषेक, बिल्वपत्रों को चढ़ाने और रात्रि भर इनका जागरण करने मात्र से मेहरबान हो जाते हैं। वैसे तो हर सप्ताह सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है। हर महीने में मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है लेकिन साल में शिवरात्रि का मुख्य पर्व जिसे व्यापक रुप से देश भर में मनाया जाता है दो बार आता है। एक फाल्गुन के महीने में तो दूसरा श्रावण मास में। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को तो महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु कावड़ के जरिये गंगाजल भी लेकर आते हैं जिससे भगवान शिव को स्नान करवाया जाता हैं।
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जानिए महाशिवरात्रि महात्म्य व पूजा विधान 
       सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है।तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदर कहा जाता है।दोस्तों भगवान शिव की महिमा अपरंपार है,जो जल्द ही प्रसन्न होने वाले हैं।भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है...शिवरात्रि...जिसे त्रयोदशी तिथि, फाल्गुण मास, कृ्ष्ण पक्ष की तिथि को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।महाशिवरात्रि के महान पर्व की विशेषता है कि सनातन धर्म के सभी प्रेमी इस त्योहार को मनाते हैं। महाशिवरात्रि के दिन भक्त जप,तप और व्रत रखते हैं और इस दिन भगवान के शिवलिंग रुप के दर्शन करते हैं।इस पवित्र दिन पर देश के हर हिस्सों में शिवालयों में बेलपत्र, धतूरा, दूध,दही, शर्करा आदि से शिव जी का अभिषेक किया जाता है।देश भर में महाशिवरात्रि को एक महोत्सव के रुप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था।महाशिवरात्रि का महात्योहार हर्ष और उल्लास का महापर्व है। 
महाशिवरात्रि व्रत महात्म्य--- 
 हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले साधक को मोक्ष की प्राप्ती होती है।जगत में रहते हुए मुष्य का कल्याण करने वाला व्रत है महाशिवरात्रि। आज के दिन व्रत रखने से साधक के सभी दुखों,पीड़ाओं का अंत तो होता ही है साथ ही मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है। कहने का मतलब है कि शिव की सादना से धन-धान्य, सुख-सौभाग्य,और समृ्द्धि की कमी कभी नहीं होती। भक्ति और भाव से स्वत: के लिए तो करना ही चाहिए सात ही जगत के कल्याण के लिए भगवान आशुतोष की आराधना करनी चाहिए।मनसा...वाचा...कर्मणा हमें शिव की आराधना करनी चाहिए।
       भगवान भोलेनाथ..नीलकण्ठ हैं, विश्वनाथ है। हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रदोषकाल यानि सूर्यास्त होने के बाद रात्रि होने के मध्य की अवधि,मतलब सूर्यास्त होने के बाद के 2 घंटे 24 मिनट कि अवधि प्रदोष काल कहलाती है। इसी समय भगवान आशुतोष प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है।इसी समय सर्वजनप्रिय भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यही वजह है, कि प्रदोषकाल में शिव पूजा या शिवरात्रि में अवघड़दानी भगवान शिव का जागरण करना विशेष कल्याणकारी कहा गया है। 
        हमारे सनातन धर्म में 12 ज्योतिर्लिंग का वर्णन है।कहा जाता है कि प्रदोष काल में महाशिवरात्रि तिथि में ही सभी ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था।
 महाशिवरात्रि व्रत: विधि व पूजा विधान--- 
 महाशिवरात्रि का व्रत हमसब के लिए है। भोले भंडारी तो सबसे लिए निराले हैं...जिनकी महिमा का गुणगान जितना भी किया जाए उतना ही कम है।भोले तो अपने साधकों से पान फूल से भी प्रसन्न हो जाते हैं।बस भाव होना चाहिए। इस व्रत को जनसाधारण स्त्री-पुरुष , बच्चा, युवा और वृ्द्ध सभी करते है। धनवान,हो या निर्धन,श्रद्धालू अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिन रुद्राभिषेक और यज्ञ करते हैं,पूजन करते हैं।और भाव से भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने का सहर संभव प्रयास करते हैं। 
         महाशिवरात्रि का ये महाव्रत हमें प्रदोषनिशिथ काल में ही करना चाहिए। जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने में असमर्थ हो, उन्हें रात्रि के प्रारम्भ में तथा अर्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन अवश्य करना चाहिए। व्रत करने वाले पुरुष को शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान व नित्यकर्म से निवृत्त होकर ललाट पर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिवालय में जाना चाहिए और शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं भगवान शिव को प्रणाम करना चाहिये।
       तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिये- 
 शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌। निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥ 
    महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान व `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप व तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए।
 महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण--- 
महाशिवरात्रि पूजा विधान के समय ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप अवश्य करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ’समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करनी चाहिए। पश्चात कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करने का विधान हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है।
          अंतत: महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है,साथ ही भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।भगवान भोलेनाथ,महादेव,आशुतोष आप सभी की समस्त मनोकामनाओं को पूरा करें।। 
 जानिए क्यों कहते हैं शिवरात्रि/कालरात्रि -- 
 रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है। शिवरात्रि शब्द का प्रयोग इसलिए करते है क्यूंकि शिव बाबा का अवतरण(आना) घोर संकट के समय में हुआ है , जब 5 विकार जिनको माया (5 विकारों के समूह को माया कहते है) कहा जाता है समाज मे हर जगह 100% होते है. इन 5 विकारों से हम सबको छुड़ाने के लिए शिव बाबा धरा पर आते है और उनके आने की ख़ुशी मे शिवरात्रि का त्योहार हर साल बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। 
     माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया।

जानिए अंक ज्योतिष द्वारा वर्ष 2017 का राशिफल

वर्ष 2017 का अंक 1 है जो कि एक सार्वभौमिक अंक है। यह अंक वर्ष 2017 के सभी अंको के योग के बाद प्राप्त होता है- 2+0+1+7=10=1 
 By-the-year-2017-Learn-Numerology-Horoscope-जानिए अंक ज्योतिष द्वारा वर्ष 2017 का राशिफल        अंक 1 के अनुसार 2017 के बारे में कहा जा सकता है कि यह एक बहुत ही बेहतरीन एवं आशाओं, उम्मीदों व वादों से परिपूर्ण वर्ष हो सकता है। यह हमारी जीवन शैली, हमारे नज़रिये, हमारी सोच यहां तक कि हमारी कार्यशैली में एक सकारात्मक परिवर्तन की ओर भी संकेत करता है। इसलिये, एक दूरदर्शी सोच के साथ इस आने वाले साल में आगे बढ़ें यह आपके जीवन में कुछ बेहतर परिवर्तन ला सकता है। ऐसे करें अपनी अंकज्योतिष प्रोफाइल की गणना आपकी जन्मतिथि+जन्म माह+ सार्वभौमिक नंबर उदाहरण के तौर पर मान लिजिये आपका नाम राम है और 15 जुलाई को जन्में हैं तो 2017 के लिये आपका अंक इस प्रकार होगा।
 15+7+1=23=5 
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       2017 में जिनका वर्षांक 1 है वे जातक बहुत ही भाग्यशाली हैं। यह वर्ष आपकी सोच में बुहत ही बेहतर परिवर्तन लेकर आ सकता है। आपका जन्म क‌िसी भी महीने में 1, 10, 19, 28 तारीख को हुआ है तो साल 2017 आपके ल‌िए कई मामलों में सुखद और उन्नत‌ि दायक रहेगा। इस साल आपको अपने कार्यक्षेत्र में जमकर मेहनत करनी चाह‌िए क्योंक‌ि लाभ और उन्नत‌ि की अच्छी संभावना है। इस कारण आप अपने आस-पास एक सकारात्मक ऊर्जा को महसूस कर सकते हैं और अपने दिमाग में उपज रहे नये विचारों से आप अपनी लंबित परियोजनाओं को पूरा कर सकते हैं। इस साल आप पर चन्द्र ग्रह का प्रभाव रहेगा। नकारात्मक विचार दूर रहेंगे और आप अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस करेंगे। नौकरी व बिज़नेस में आपको धुँआधार सफलता मिलने वाली है। 
        अंक ज्योतिष 2017 के अनुसार इस दौरान आपकी तरक़्क़ी भी संभव है। जो लोग सेल्स या मार्केटिंग से जुड़ी नौकरी कर रहे हैं, उन्हें ज़्यादा फ़ायदा मिल सकता है। व्यक्तिगत संबंधों को भी आप अपने सकारात्मक विचारों से साधने में कामयाब हो सकते हैं। इस वर्ष असल में आप अपनी वास्तविक क्षमताओं से परिचित हो सकते हैं जो किन्हीं वजहों से या तो स्थिर थी या उन्हें भीतर के किसी कौने में दबा रखा था। इस समय महसूस कर सकते हैं कि आपका चीज़ों को देखने व समझने का नज़रिया नकारात्मक से सकारात्मक हो रहा है। आप एक दम ताजा विचारों से हर तरह की समस्याओं को आसानी से निपटाने में कामयाब हो सकते हैं। परिवार और मित्र आपकी सफलता में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। 
          आपके जीवन में 2017 में सब कुछ अच्छा हो रहा है इसका तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं है कि आपको समस्याओं का सामना बिल्कुल ही नहीं करना पड़ेगा। इसका अभिप्राय है कि आप अपनी ऊर्जा व उत्साह से इन समस्याओं को आसानी से हल कर सकते हैं। हालांकि यह ऊर्जा हो सकता है वर्ष की शुरुआत में आप महसूस न कर सकें लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा आप अपने अंदर के उत्साह को महसूस कर सकेंगें इसके बाद आप अपने कदम जीवन की उन्नति के पथ पर तेजी से बढ़ा सकते हैं। अपने इसी जोश के साथ कार्यों को सपंन्न करते हुए आप अपने लक्ष्यों को हासिल करने में भी कामयाबी हासिल कर सकते हैं। 
       इस वर्ष आप जिस भी काम में हाथ डालेंगें उसमें आपको सफलता मिल सकती है। यदि किसी नई नौकरी या वर्तमान नौकरी में पदोन्नति के इच्छुक हैं तो अपनी इन मनोकामनाओं को पूर्ण करने के अवसर भी प्रचूरता में आपको मिल सकते हैं बशर्ते आप इन अवसरों का लाभ उठाने के लिये तैयार रहें। व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने के लिये भी यह वर्ष आपके लिये श्रेष्ठ साबित हो सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकते हैं वर्षांक 1 वालों के लिये पूर्ण रूप से यह वर्ष बहुत ही भाग्यशाली रहने के आसार हैं। साल के 4 महीने अप्रैल, मई, अगस्त और स‌ितंबर आपके ल‌िए सबसे खास हैं। इन महीनों में अच्छे अवसर प्राप्त होंगे, मौके का लाभ उठाएं। 13 अप्रैल से 12 मई व 17 अगस्त से 16 सितंबर तक का समय ज़्यादा अच्छा रह सकता है। 
 मूलांक 1 के लिए उपाय--- 
आपके लिए सुनहरा लाल रंग शुभ है। लाल व नारंगी रंग के कपड़े पहना फ़ायदेमंद है। शिव व सूर्य की उपासना करना फलप्रद है। सूर्य को प्रातःकाल तांबे के पात्र से जल दें व लाल-नारंगी रुमाल जेब में रखें। रविवार को व्रत रखना उत्तम है। आपके लिए रविवार, सोमवार और गुरुवार शुभ व 1, 10, 19, 28 तारीख़ें अनुकूल रहेंगी। यदि इन तारीख़ों में रविवार का संयोग पड़ जाये तो समझिए की ये दिन अत्यंत अनुकूल व्यतीत होंगे। 4, 6, 7, 8 अंक वाले व्यक्तियों से बचें। 
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2017 में जिनका वर्षांक 2 है वे जातक बहुत ही भाग्यशाली हैं। आपकी जन्म‌‌त‌िथ‌ि क‌िसी भी महीन में 2, 11, 20, 29 तारीख है तो आप मूलांक दो के व्यक्त‌ि हैं। आपके ल‌िए यह वर्ष अधूरी चाहतों को पूरी करने वाला है। आप प्रयास करेंगे तो नौकरी में आपकी स्‍थ‌ित‌ि बेहतर होगी। कार्यक्षेत्र में अध‌िकार‌ियों का सहयोग प्राप्त होगा। यह वर्ष आपकी सोच में बुहत ही बेहतर परिवर्तन लेकर आ सकता है। इस कारण आप अपने आस-पास एक सकारात्मक ऊर्जा को महसूस कर सकते हैं और अपने दिमाग में उपज रहे नये विचारों से आप अपनी लंबित परियोजनाओं को पूरा कर सकते हैं। व्यक्तिगत संबंधों को भी आप अपने सकारात्मक विचारों से साधने में कामयाब हो सकते हैं।
      इस साल आपके ऊपर देव-गुरु बृहस्पति मेहरबान हैं। इसलिए आपकी पाँचों उंगलियाँ घी में रहने वाली हैं। ज़्यादा टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि पिछले साल जो उम्मीदें ध्वस्त हो गयी थीं वे इस साल सफलता रूपी बिल्डिंग की तरह फिर से खड़ी होने वाली हैं। नौकरी में आपको अपने बॉस का पूरा सहयोग मिलेगा। रुका हुआ प्रोमोशन इस साल ज़रुर हो जायेगा। इस वर्ष असल में आप अपनी वास्तविक क्षमताओं से परिचित हो सकते हैं जो किन्हीं वजहों से या तो स्थिर थी या उन्हें भीतर के किसी कौने में दबा रखा था। इस समय महसूस कर सकते हैं कि आपका चीज़ों को देखने व समझने का नज़रिया नकारात्मक से सकारात्मक हो रहा है। 
      आप एक दम ताजा विचारों से हर तरह की समस्याओं को आसानी से निपटाने में कामयाब हो सकते हैं। परिवार और मित्र आपकी सफलता में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। आपके जीवन में 2017 में सब कुछ अच्छा हो रहा है इसका तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं है कि आपको समस्याओं का सामना बिल्कुल ही नहीं करना पड़ेगा। इसका अभिप्राय है कि आप अपनी ऊर्जा व उत्साह से इन समस्याओं को आसानी से हल कर सकते हैं। हालांकि यह ऊर्जा हो सकता है वर्ष की शुरुआत में आप महसूस न कर सकें लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा आप अपने अंदर के उत्साह को महसूस कर सकेंगें इसके बाद आप अपने कदम जीवन की उन्नति के पथ पर तेजी से बढ़ा सकते हैं। अपने इसी जोश के साथ कार्यों को सपंन्न करते हुए आप अपने लक्ष्यों को हासिल करने में भी कामयाबी हासिल कर सकते हैं। 
       इस वर्ष आप जिस भी काम में हाथ डालेंगें उसमें आपको सफलता मिल सकती है। यदि किसी नई नौकरी या वर्तमान नौकरी में पदोन्नति के इच्छुक हैं तो अपनी इन मनोकामनाओं को पूर्ण करने के अवसर भी प्रचूरता में आपको मिल सकते हैं बशर्ते आप इन अवसरों का लाभ उठाने के लिये तैयार रहें। व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने के लिये भी यह वर्ष आपके लिये श्रेष्ठ साबित हो सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकते हैं वर्षांक 1 वालों के लिये पूर्ण रूप से यह वर्ष बहुत ही भाग्यशाली रहने के आसार हैं।सेहत भी इस वर्ष आपका अच्छा रहेगा, खान-पान का ध्यान रखें। आपके ल‌िए मार्च से अप्रैल का महीना व‌िशेष लाभप्रद रहेगा। 14 मार्च से 12 अप्रैल तक का समय विशेष अनुकूल रहेगा। 
 मूलांक 2 के लिए उपाय--- 
आपके लिए सोमवार, बुधवार और रविवार अत्यधिक अनुकूल रहेंगे। अगर सोमवार को 2, 11, 20 व 29 तारीख़ें पड़ें तो ये आपके लिए विशेष शुभ होंगी। आपके लिए सफ़ेद, हरा, सिंदूरी व क्रीम रंग शुभ है। इन रंगों के कपड़ों को ज़्यादा पहनें। 4 और 7 अंक वाले व्यक्तियों से बचें। जेब में सफ़ेद रुमाल रखना व शिवजी की पूजा करना शांतिवर्धक रहेगा। सोमवार का व्रत करना आपके लिए लाभकारी है। 
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जिनका व्यक्तिगत वर्षांक इस वर्ष 3 है उनके लिये भी 2017 एक अंक वालों के समान ही भाग्यशाली है। जिस प्रकार व्यक्तिगत वर्षांक 1 वाले असीम ऊर्जा व उत्साह से कार्यों को संपन्न करेंगें उसी तरह 3 अंक वाले भी 1 अंक वालों से पूर्णत: प्रेरित रहें इसकी उम्मीद की जा सकती है। ज‌िन लोगों की जन्म‌त‌िथ‌ि 3, 12, 21, 30 तारीख है उनके ल‌िए यह वर्ष उलझन और उतार-चढ़ाव भरा रह सकता है। आपको कार्यक्षेत्र में काफी संभलकर चलना होगा नहीं तो आपको परेशान‌ियों का सामना करना पड़ सकता है। अध‌िकार‌ियों से उलझने से बचें। आपके मन में नौकरी बदलने का व‌िचार आ सकता है। आप हमेशा कुछ कर गुजरने के लिये तत्पर रहेंगें। 2017 में आप अपनी ऊर्जा से अपनी क्षमताओं को इस कदर विकसित कर सकते हैं जिससे आपका जीवन भविष्य के लिये पूर्णत: परिवर्तित हो जाये। लेकिन यह भी सिर्फ आप पर ही निर्भर करेगा कि आप अपनी इस ऊर्जा से कोई उठा पाते हैं या नहीं। 
     इसलिये आपको यह ध्यान देने अथवा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि आपकी ऊर्जा का इस्तेमाल अनावश्यक गतिविधियों, फालतू के कार्यों या फिर महत्वहीन संबंधों में न हो। 2017 का समय ही आपके लिये वह सौभाग्यशाली समय है जिसमें आप अपनी इस अतिरिक्त ऊर्जा का प्रयोग अपने उन सपनों को, अपनी उन इच्छाओं को पूरा करने के लिये कर सकते हैं जिन्हें आप अपने अंदर दफन कर चुके हैं या फिर जिन्हें अपने जीवन में कभी पूरा करने का सपना देखते हैं। अपने कार्यों को करने में भी आपका अतीन्द्रिय ज्ञान आपका मार्गदर्शन करेगा। इसलिये अपने अंतर्मन की आवाज़ को जरुर सुनें वह क्या कहना चाहता है। जिस काम को करने की गवाही आपका मन न दे उसे न ही करें तो बेहतर होगा। वर्ष का उत्तरार्ध विशेष रूप से भाग्यशाली रहने के आसार हैं। 
          एक बेहतरीन वर्ष का आनंद लें। आपका मूड बहुत खुशगवार रहने के आसार हैं।यह साल आपके लिए सामान्य रहेगा और आप यूरेनस ग्रह की शरण में रहेंगे। आपके साथ कुछ रहस्यमयी व आकस्मिक घटनाएँ घट सकती हैं। जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव आने की सम्भावना है। बिज़नेस करने वाले बंधुओं को काम-धंधे में बड़ी इन्वेस्टमेंट करने से पहले सोच लेना चाहिए। अपने बॉस या ऊँचे अधिकारियों से उलझना आपके लिए घाटे का सौदा साबित होगा। 14 मार्च से 12 अप्रैल तक का समय आपके लिए सुनहरा अवसर लेकर आएगा। 
 मूलांक 3 के लिए उपाय--- 
आपके लिए गुरुवार, सोमवार और मंगलवार काफ़ी अनुकूल रहेंगे। अगर गुरुवार को 3, 12, 21 व 30 तारीख़ें पड़ जाएँ तो समझ लीजिए आपकी निकल पड़ी। आपके लिए पीला, सफ़ेद व लाल रंग शुभ है। इन रंगों के कपड़ों को ज़्यादा-से-ज़्यादा पहनें। जेब में पीला रुमाल हमेशा रखें। 5 व 6 अंक के व्यक्तियों को दूर से ही राम-राम करें। गुरुवार का व्रत रखें। 
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अंक ज्योतिषीय भविष्यवाणी के अनुसार व्यक्तिगत वर्षांक 4 वालों के लिये सुझाव है कि आप अपने किसी भी कार्य या परियोजना को क्रियांन्वित करने से पहले उसकी अच्छे से रूप रेखा तैयार करें व सुनियोजित तरीके से उस पर काम करें। इस वर्ष में आपके ऊपर बुध ग्रह की कृपा रहेगी। आपके दिमाग़ में नए-नए आइडिया आने वाले हैं, जिनसे आप कुछ अलग करके दिखायेंगे। इस साल अपनी क्रिएटिविटी से आप काफ़ी सफलता प्राप्त करेंगे। नौकरी व बिज़नेस में आप कुछ हटकर करने वाले हैं जिससे आपके विरोधियों को भी जलन होगी। आपके ऊपर अपने बॉस की कृपा बनी रहेगी। 
       अंक विज्ञान 2017 कहता है कि आप अपनी बातों के जादू से अपने सहकर्मियों को इम्प्रेस कर देंगे जिससे कई नए लोग भी आपके मुरीद बनेंगे। यदि आपने संबंधित कार्यक्षेत्र में अच्छे से शोध एवं जमीनी स्तर पर उस पर काम नहीं किया तो आपकी काबलियत धरी की धरही रह सकती है, लाख कोशिशों के बावजूद भी आपको अपेक्षानुसार परिणाम हासिल करने में दिक्कत आ सकती हैं। इसलिये बेहतर है जंग के मैदान में उतरने से पहले अपने सभी हथियारों को अच्छे से जांच-पड़ताल कर दुश्मन की हर चाल को बारीकि से समझ लें, अन्यथा आपके अथक प्रयास भी बेकार साबित होने की संभावनाएं प्रबल हैं। आपको निरंतर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, ग्रीष्मकाल में आपको इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। इस वर्ष आपको केवल अपने कामकाजी जीवन पर ही ध्यानकेंद्रित करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि अपनी सेहत का भी बराबर ध्यान रखना होगा। 
    यदि आप व्यायाम करने से कतराते रहे हैं तो इस आलस्य को त्याग दें और व्यायाम के लिये समय अवश्य निकालें और यदि आप यह कर रहे हैं तो इसे नियमित रूप से जारी रखें किसी तरह की कोताही न बरतें। यदि किसी भी प्रकार के शारीरिक कष्ट को महसूस कर रहे हैं तो चिकित्सकीय परामर्श के साथ-साथ जरुरी जांच पड़ताल अवश्य करवायें। इस वर्ष आप जितने भी प्रयास करेंगें आने वाले वर्षों में आपको जीवन में सफलता इनके अनुरूप ही मिलेगी। इसलिये अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारी के साथ निर्वाह करें। 2017 में परिजन आपके जीवन बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इस साल छात्रों को अपनी मेहनत का सुखद पर‌िणाम म‌िलने से खुशी होगी। आपके ल‌िए अगस्त एवं स‌ितंबर का महीना हर तरह से अनुकूल रहेगा। 17 अगस्त से 16 सितम्बर तक का समय जीवन में ख़ुशियों की बहार ला सकता है। 
 मूलांक 4 के लिए उपाय--- 
आपके लिए बुधवार और शनिवार फ़ायदेमंद रहेंगे। अगर इन वारों में 4, 13, 22 व 31 तारीख़ें पड़ जाएँ तो सफलता निश्चित जानिए। आपके लिए भूरा, खाकी, काला व नीला रंग विशेष शुभ है इसलिए इन रंगों के कपड़ों का ज़्यादा उपयोग करें। जेब में भूरा, काला या नीला रुमाल रखें। पक्षियों को रोज़ाना दाना डालें और दुर्गा जी की पूजा करें। 1, 2, 7 व 9 अंकों वाले व्यक्तियों से बचकर रहें। 
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जिनका वर्षांक 5 हैं अंक ज्योतिष के अनुसार 2017 में उनके जीवन में बहुत सारे बदलाव हो सकते हैं। अंक शास्त्र के अनुसार 2017 में आपके ऊपर शुक्र ग्रह का राज रहेगा। यह वर्ष सेहत के मामले में सुखद रहेगा। आप अध‌िकतर खुशम‌िजाज और आनंद‌ित रहेंगे। जो लोग वाहन खरीदना चाह रहे हैं उन्हें अपने प्रयास में सफलता म‌िलेगी। वैसे इस साल आपकी आय भी अच्छी रहेगी। आप लक्ज़री व ब्यूटी की तरफ़ ज़्यादा आकर्षित होंगे। आप नए गैजेट्स व कपड़े ख़रीदने में ख़ूब धन ख़र्च करने वाले हैं। नौकरी व बिज़नेस में आपको अच्छी सफलता मिलनी संभव है। ऑफ़िस में किसी व्यक्ति से आँखें चार हो सकती हैं। 
        अगर आप ऑटोमोबाइल, आर्ट्स, रेस्टोरेंट, होटल, म्यूज़िक व डांस, रेडीमेड गारमेंट्स, मॉडलिंग, पेंटिंग, एक्टिंग से जुड़ा कोई भी काम कर रहे हैं तो सफलता मिलनी निश्चित है। जो समय के साथ अपने जीवन में हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार कर आगे बढ़ेंगें वह बहुत अच्छा कर सकते हैं लेकिन यदि कोई स्वाभाविक रूप से हो रहे इन परिवर्तनों में बाधा उत्पन्न करेगा उसका जीवन काफी कष्टप्रद भी हो सकता है। इस वर्ष अचानक हुए कुछ परिवर्तनों से आप असमंजस की स्थिति में पड़ सकते हैं आपकी हालत ठीक उस व्यक्ति जैसी हो सकती है जो किसी किसी चौराहे पर खड़ा हो और उसे मालूम न हो कि जाना किधर है। इसलिये जिस भी रास्ते का चयन करें ठंडे दिमाग से पूरी तरह से सोच समझकर करें।
       ऐसे समय से बुद्धिमानी से यदि आप निर्णय लेते हैं तो यह आपके जीवन को बेहतर व आपकी मंजिल तक पंहुचने के मार्ग को सुगम बना सकता है। कुछ परिवर्तन आपके लिये बड़े ही आश्चर्यात्मक हो सकते हैं, लेकिन घबराएं नहीं बल्कि इनका सही इस्तेमाल कर आप एक लंबी छलांग लगाने में भी कामयाब हो सकते हैं। आप बस इन बदलावों को अपने मन से स्वीकार कर आगे बढ़ें इनके रास्ते में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करें। यह आपके भावी विकास के लिये बहुत मंगलकारी हो सकते हैं। आपके लिये इस वर्ष एक फायदेमंद बात यह है कि आपके पास दोराहे तक न पंहुचने के विकल्प होंगे। आप अपनी राह पर चलते हुए खुद सामंजस्य बैठा सकते हैं। बस आप के केवल अपनी मंजिल का ध्यान करते हुए नवीनतम जानकारियों पर अपनी पकड़ बनायें रखें। 
   अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिये हर संभव प्रयास व कठिन परिश्रम करते रहें, फिर आप हर हाल में मंजिल पाने में कामयाब हो सकते हैं। यह वर्ष स्वयं का सुधारने का भी बेहतर अवसर आपके लिये लेकर आ सकता है। अपनी सेहत के प्रति भी सचेत रहें और व्यायाम करते रहें। अपने खाने की आदत में भी सेहत के अनुसार जरुरी बदलाव करते हुए पौष्टिक आहार ग्रहण करें। अपने आदतों में सुधार का प्रण लेकर इस वर्ष को आप अपने आगामी जीवन का आधार बना सकते हैं।जरूरी है क‌ि आप अपने मन और वाणी पर संयम रखें। साल की अंत‌िम त‌िमाही आपके ल‌िए व‌िशेष रूप से सुखद रहेगी। 17 सितम्बर से 16 अक्टूबर तक का समय काफ़ी अच्छा रहेगा। 
 मूलांक 5 के लिए उपाय--- 
आपके लिए हरा, भूरा व ग्रे रंग अनुकूल है। इन रंगों के कपड़े ज़्यादा पहनें। जेब में हमेशा हरे रंग का रुमाल रखें। देवी सरस्वती व विष्णु जी की रोज़ाना पूजा करें। आपके लिए बुधवार अनुकूल है। अगर इस वार को 5, 14, 23 तारीख़ें पड़ जाएँ तो पाँचों उंगलियाँ घी में समझिये। 2 अंक के व्यक्तियों से बचकर चलें। 
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जिन जातकों का व्यक्तिगत वर्षांक 6 है वे इस वर्ष सामाजिक रूप से काफी सक्रिय रह सकते हैं। 2017 का पूरा साल आप लोगों से घिरे रहकर उनके साथ बातचीत करते हुए बीता सकते हैं। ज‌िनकी जन्मत‌िथ‌ि 6, 15, 24 है उनके ल‌िए साल 2017 कायक्षेत्र के मामले में उन्नत‌िदायक रहेगा। नौकरी में अध‌िकार‌ियों के साथ तालमेल बना रहेगा। इस साल आप पर नेपच्यून ग्रह का दबदबा रहेगा। 2017 का यह समय आपके लिए अच्छा है। आप अपनी नौकरी व बिज़नेस मीटिंग्स के चलते काफ़ी व्यस्त रहने वाले हैं। कोई नया बिज़नेस शुरू करने की प्लानिंग भी आप करने वाले हैं, जिससे आप अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा कमा सकते हैं। किसी बड़े प्रोजेक्ट को समय से पूरा करने के कारण आप अपने बॉस की वाहवाही लूटेंगे। नौकरी में आपका अनुशासन देखकर आपके विरोधी भी आपकी तारीफ़ करने पर मजबूर हो जायेंगे। 
        अपने आस-पास अत्यधिक गतिविधियों के कारण आप खुद को अभिभूत (थका हुआ, पूर्णतया पराजित) महसूस कर सकते हैं लेकिन इनके दूरगामी परिणाम आपके लिये काफी सहायक होंगे जोकि आपके लिये काफी सुखद व संतोषप्रद साबित हो सकते हैं। अपने जीवन में स्वयं को सर्वोपरि समझने की भूल न करें और अन्य लोगों से बातचीत कर उनसे प्रेरणा लें, सीख लें, इस वर्ष यही आपके लिये बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि किसी मोड़ पर आप इस सबसे उकताहट महसूस कर सकते हैं और सोच सकते हैं कि आप पर इतने सारे लोगों से डील करने का दबाव बनाया जा रहा है। आपको अपनी निजता के लिये भी इसे एक खतरे के रूप में देख सकते हैं लेकिन ऐसा न सोचें और समय के बहाव के साथ चलते चलिये, बल्कि उनकी संगत का ज्यादा से ज्यादा आनंद उठायें। वे किसी न किसी रूप में आपके करियर से लेकर रिश्तों तक में आपके मददगार हो सकते हैं। पहले तीन महीनों का समय तो आपके लिये इतनी तेजी से गुजर सकता है कि आपको यह भनक तक न लगे कि समय कब गुजर गया। घरेलू जीवन में आप खुद को बहुत सारे दायित्वों के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर सकते हैं। कई पारिवारिक समारोह की धुरी भी आपको बनना पड़ सकता है। 
      इसे बोझ समझने की बजाय जितना हो सकता है इन पलों का आनंद लें। हो सकता है भविष्य में इस तरह के मौके बहुत कम मिलें, अगला वर्ष इससे बहुत भिन्न हो सकता है यदि रोमांटिक जीवन की बात की जाये तो यह वर्ष आपके बहुत ही अच्छा रहने की उम्मीद की जा सकती है। यदि आप किसी को चाहते हैं और अपने प्यार का इजहार करने में किसी भी तरह की हिचकिचाहट महसूस करते हैं तो यह समय तमाम शंकाओं, भय आदि को त्यागकर सही नियत के साथ आगे बढ़ने का है। वर्षांक 6 आपके लिये मददगार है अपने भावों को साथी से अभिव्यक्त करें।साल का मध्‍य आपके ल‌िए उत्साहवर्धक रहेगा। 13 मई से 14 जून तक का समय आपके लिए कुछ अच्छे सरप्राइज़ ला सकता है।
 मूलांक 6 के लिए उपाय---
 आपके लिए सफ़ेद व नीला रंग अनुकूल है। इसलिए इन रंगों के कपड़ों को ज़्यादा पहनें। जेब में सफ़ेद रुमाल रखें। आपके लिए बुधवार, शुक्रवार व शनिवार शुभ हैं, अगर इन वारों में 6, 15 व 24 तारीख़ें पड़ जाएँ तो लाभदायक रहेंगी। शुक्रवार का व्रत रखना आपके लिए फ़ायदेमंद है। 1 व 2 अंक के व्यक्तियों से बचकर रहें। 
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वर्षांक 7 वालों के लिये 2017 बहुत ही अच्छा साल रहने के आसार हैं। जन्मत‌िथ‌ि 7, 16, 25 है तो यह वर्ष आपके ल‌िए अपनी कार्यक्षता और योग्यता द‌िखाने के ल‌िए अच्छा है आप अपनी मेहनत और लगनशीलता से नौकरी एवं व्यवसाय में कामयाबी की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। अंक ज्योतिष की दृष्टि से इस वर्ष आप पर शनि देव शासन करेंगे। अपनी नौकरी व बिज़नेस को लेकर आप काफी सीरियस रहेंगे। आपका प्लानिंग करके काम करना नौकरी में अचानक तरक़्क़ी दे सकता है। जोश व उत्साह से आप भरपूर रहेंगे। नौकरी में अपने टैलेंट के चलते इस दौरान आप विरोधियों की ईंट-से-ईंट बजा सकते हैं। स्टील, लोहा, मशीनरी, लेदर, प्रॉपर्टी, ऑयल व जूतों से जुड़ा बिज़नेस अगर कर रहे हैं तो सफलता मिलने की पूर्ण सम्भावना है। बिज़नेस में ईमानदारी बरतें व छल-कपट से दूर रहें। 
      आपके पिछले कुछ वर्ष हो सकता है मुश्किलात से भरे रहे हों और आने वाले वर्ष में भी शायद थोड़े बहुत कठिन प्रयास आपको करने पड़ें। लेकिन जिस आरामदायक समय की आपको आवश्यकता है 2017 में आपको वह आवश्यक रूप से मिलना चाहिये। इसका पूर्ण रूप से उपयोग करें। एक बेहतर रणनीति के साथ इस वर्ष काम करेंगें तो निश्चित तौर पर आने वाले समय के तनाव को भी आप कम कर सकते हैं। अपने भविष्य के विकास एवं करियर में समृद्धि के लिये आप 2017 में योजना बना सकते हैं। विभिन्न तकनीकों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ अपने सोचने के तरीके में भी आवश्यक बदलाव करें तो फायदेमंद रहेगा। जो सवाल व शंकाए आपको अक्सर परेशान करती हैं यह समय उन पर विजय प्राप्त करने का भी है। 
     इस वर्ष आपका रूझान आध्यात्मिकता की ओर भी हो सकता है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों के दौरान जो भी आप आत्मसात करेंगें वह बहुत सारी चीज़ों को समझने में आपके लिये सहायक सिद्ध हो सकता है। कुछ समय के लिये हो सकता है आप अपने चाहने वालों से अलगाव भी महसूस करें लेकिन जल्द ही आप परिस्थितियों को समझ कर उनके साथ समझौता कर सकते हैं। पिछले वर्षों के तनाव से मुक्त होकर 2017 में आप खुद को तरोताज़ा महसूस कर सकते हैं। आप अपने आपको उन आनंददायक रचनात्मक गतिविधियों में शामिल कर सकते हैं जो आपको सुकून दें और आपको एक खुशहाल व्यक्ति बनायें। सावधानी से अपने भविष्य की योजना बनाते हुए अपनी इस खुशहाली का इस साल आनंद लें। हो सकता है इस तरह का बेहतरीन समय आपको फिर मिले न मिले, इन पलों का लुत्फ़ उठायें। 16 जुलाई से 16 अगस्त तक का समय यादगार साबित हो सकता है। 
 मूलांक 7 के लिए उपाय-- 
आपके लिए गुरुवार व शनिवार शुभ हैं। अगर इन वारों को 7, 16, 25 तारीख़ें पड़ जाएँ तो समझिए आपकी निकल पड़ी। आपके लिए नीला, क्रीम, पीला, हल्का हरा व गुलाबी रंग शुभ है। इन रंगों के कपड़ों को ज़्यादा पहनें। पॉकेट में नीला, पीला या क्रीम कलर का रुमाल हमेशा रखें। शनि देव की रोज़ाना पूजा करें। 1, 2, 4 और 9 अंकों वाले व्यक्तियों से बचकर रहें। 
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व्यक्तिगत वर्षांक 8 साल 2017 में आपकी कामयाबी और विकास की ओर ईशारा कर रहा है। 8, 17, 26 तारीख को जिनका जन्मद‌िन है उनका मूलांक 8 है। इनके ल‌‌िए यह वर्ष संघर्षपूर्ण रह सकता है। आपको पर‌िश्रम के अनुकूल लाभ नहीं म‌िलने से न‌िराशा हो सकती है। अगर आप इस साल कोई नया काम शुरु करने की सोच रहे हैं तो सोच-समझकर कदम बढ़ाएं नहीं तो न‌ुकसान हो सकता है। उम्मीद है 2016 आपके लिये एक आरामदायक वर्ष रहा है। इस वर्ष आप पर मंगल ग्रह का स्वामित्व रहेगा। आप ऊर्जा और जोश से भरे रहेंगे। नौकरी और बिज़नेस में आप जी-तोड़ मेहनत करने वाले हैं, परन्तु परिणाम उम्मीद से थोड़ा कम मिल सकता है। इस दौरान कोई नया बिज़नेस शुरू न करें और किसी भी बिज़नेस में बड़ा निवेश करने से पहले सोच लें। प्रॉपर्टी, मशीनरी, लोहे के बिज़नेस से जुड़े हुए लोगों को अपने बिज़नेस में सतर्कता बरतनी चाहिए। पढ़ाई में इस साल आपका ध्यान थोड़ा कम लगने की संभावना है। अपने पैरों पर खड़ा होने के लिये जिस सफलता का इंतजार आप कर रहे हैं उसके लिये सक्रिय होने का यह बेहतर समय है। 
         निस्संदेह सफलता अचानक से आपकी झोली में नहीं आन पड़ेगी, उसके लिये हर किसी को प्रयास करने पड़ते हैं। लेकिन जब सितारे आपके साथ हों तो ऐसे में आप उनका कितने अच्छे से लाभ उठाते हैं यही निर्णायक रूप से एक सफल और असफल व्यक्ति में अंतर करता है। चीज़ों को समझने व कार्यों को करने में किसी भी तरह से हड़बड़ी दिखाने की आवश्यकता नहीं है। आगे बढ़ें लेकिन मजबूती से, जल्दबाजी में नहीं। व्यावसायिक जातकों के लिये यह साल बहुत ही सौभाग्यशाली रहने की संभावना है। जो भी मेहनत आप 2017 में करेंगे और जो प्रयास आपने सफलता अर्जित करने के लिये गत वर्ष किये हैं, इस वर्ष वास्तव में उनके संयुक्त परिणाम आपके पक्ष में होंगें, और जिन जातकों ने पिछले वर्ष पहले ही बहुत अच्छा किया है वे इस वर्ष और बेहतर करने की स्थिति में होंगे। 
    इसलिये वर्षांक 8 के सुअवसरों का लाभ उठायें और उद्देश्यों को पूर्ण करें। अधेड़ उम्र जातकों के लिये भी यह वर्ष बहुत अच्छा रहने के आसार हैं और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा व समृद्धि में वृद्धि होने की उम्मीद है। हालांकि अतीत की यादें आपको थोड़ा बहुत परेशान कर सकती हैं इसलिये इन्हें जितना हो सके नजरअंदाज करने की कोशिश करें और इन्हें अपनी सफलता के रास्ते में रोड़ा न बनने दें।सेहत के मामले में लापरवाही से बचें और सड़क पर चलते समय एवं जोख‌िम भरे काम करते हुए सजग रहें। एक अच्छे वर्ष के लिये शुभकामनाएं।वैसे भी 2017 में आपका वज़नबढ़ सकता है इसलिए रोज़ सुबह जॉगिंग करें। अंक ज्योतिष के मुताबिक़ 14 जनवरी से 13 फ़रवरी तक का समय आपके लिए एक नया सवेरा लेकर आ सकता है। 
 मूलांक 8 के लिए उपाय--- 
आपके लिए शनिवार व बुधवार काफ़ी बढ़िया रहेंगे। इन वारों में अगर 8, 17, 26 तारीख़ें पड़ जाएँ तो समझिए कि आपकी पौ बारह हो गई। आपके लिए काला, भूरा, गहरा नीला, हरा, बैंगनी रंग काफी शुभ हैं इसलिए इन रंगों के कपड़ों को ज़्यादा-से-ज़्यादा पहनें। जेब में काला रुमाल हमेशा रखें। शनिवार का व्रत रखें व किसी ग़रीब को खाना खिलाएँ। 1, 2 व 9 अंक के व्यक्तियों से सतर्क रहें। 
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अंक ज्योतिष के अनुसार 1 से लेकर 9 अंकों तक ज्योतिषीय भविष्यवाणी की जाती है हर वर्ष का अंक निकाला जाता है 9 वर्षों 9वें अंक के बाद यह चक्र पुन: आरंभ होता है। अत: जिन जातकों का व्यक्तिगत वर्षांक इस वर्ष 9 है, उन्हें पूर्व वर्षों में हासिल की गई उपलब्धियों का स्मरण करने की आवश्यकता है। साल 2017 उनके ल‌िए अनुकूल है ‌ज‌िनका जन्मद‌िन 9, 18, 27 तारीख को है। इस त‌िथ‌ि को जन्मे व्यक्त‌ि मूलांक 9 के अंतर्गत आते हैं। इस साल मूलांक 9 के व्यक्त‌ि नौकरी में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। अभी तक समाज से आपने जो कुछ भी हासिल किया है वक्त आ गया है कि आप भी अब समाज को अब कुछ लौटाना शुरु करें। यदि पिछले सालों में अपनी उपल्बधियों से आप संतुष्ट नहीं हैं तो अपनी गतिविधियों, कार्य परियोजनाओं का विश्लेषण कर नये सिरे से उनकी योजना अगले 9 वर्षीय चक्र के लिये तैयार करें। इस साल आपके ऊपर सूर्य नारायण की कृपा रहेगी। अपनी मेहनत और हौसले के दम पर आप हर क्षेत्र में बाज़ी मार लेंगे। 
         नौकरी और बिज़नेस में आप सूर्य के समान चमकने वाले हैं। बिज़नेस में कोई बड़ा मुनाफ़ा आपका इंतज़ार कर रहा है। इस दौरान प्रोमोशन मिलने की भी पूरी संभावना है। पुलिस डिपार्टमेंट, बिल्डिंग-मटेरियल-सीमेंट, प्रॉपर्टी, डॉक्टरी, केमिस्ट से जुड़ा अगर कोई काम कर रहे हैं तो गेंद आपके पाले में है। पिछले साल जो मेडिकल एंट्रेंस आप क्लियर नहीं कर पाए थे इस वर्ष उसमे झंडे गाड़ने के पूरे-पूरे योग हैं। यदि आप समझते हैं कि पिछले 9 सालों में आपने काफी कमाई की है तो इस वर्ष आप उसका कुछ हिस्सा मानव कल्याण के कार्यों में खर्च कर सकते हैं। आपको इसका लाभ अवश्य मिलेगा। अपने अनुभवों को अन्य के साथ सांझा करें और उन्हें लक्ष्यों तक पहुंचाने में उनकी मदद करें।
       मदद करने के विभिन्न तरीके अपनाकर आप इस नेक कार्य का आनंद उठा सकते हैं। इन विधियों पद्धतियों में अपनी रचनात्मकता का प्रयोग करें। आप अतीत की जिन गलतियों के कारण, जो उपलब्धियां हासिल करने से आप चूक गये हैं उन पर चिंतन करते हुए अपने भविष्य की योजनाओं को सुदृढ़ बना सकते हैं। 2017 पहले के सालों की अपेक्षा योजना बनाने व अपने लक्ष्यों को हासिल करने के मामले में आपके लिये काफी श्रेष्ठ रहने के आसार हैं। अपने दोस्तों की तरफ से भी आपको काफी सहयोग मिलने की उम्मीद है। पार‌िवार‌िक जीवन रोमांट‌िक और आनंदपूर्ण होगा। सेहत के मामले में बीते साल के मुकाबले यह साल आपके ल‌िए अध‌िक अनुकूल है। मैडिटेशन का सहारा लेकर आप मेंटली और स्ट्रांग बन सकते हैं 13 अप्रैल से 12 मई तक का समय आपके लिए बेहतरीन साबित हो सकता है। 
 मूलांक 9 के लिए उपाय--- 
आपके लिए मंगलवार, रविवार व सोमवार शुभ हैं। अगर इन वारों को 9, 18 व 27 तारीख़ें पड़ जाएँ तो सफलता आपके क़दम चूम सकती है। आपके लिए लाल, सिंदूरी रंग अनुकूल है। इसलिए इन कलर्स के कपड़ों को ज़्यादा अहमियत दें। हनुमान जी की डेली पूजा करना फ़ायदेमंद है। मंगलवार का व्रत रखें। 4, 5 व 7 अंकों के व्यक्तियों से बचकर चलें।
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