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जानिए क्या हैं चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी)

Know-what-are-the-medical-astrology -2017-जानिए क्या हैं चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी)आज के दौर में ज्योतिष विद्या के बारे में अनेकों भ्रान्तियाँ फैली हैं। कई तरह की कुरीतियों, रूढ़ियों व मूढ़ताओं की कालिख ने इस महान विद्या को आच्छादित कर रखा है। यदि लोक प्रचलन एवं लोक मान्यताओं को दरकिनार कर इसके वास्तविक रूप के बारे में सोचा जाय तो इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता। यह व्यक्तित्व के परीक्षा की काफी कारगर तकनीक है। इसके द्वारा व्यक्ति की मौलिक क्षमताएँ, भावी सम्भावनाएँ आसानी से पता चल जाती हैं। साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किन दुर्योगों को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना है। लेकिन इसके लिए इसके स्वरूप एवं प्रक्रिया के विषय को जानना जरूरी है। 
          आज का विज्ञान व वैज्ञानिकता इस सत्य को स्वीकारती है कि अखिल ब्रह्माण्ड ऊर्जा का भण्डार है। यह स्वीकारोक्ति यहाँ तक है कि आधुनिक भौतिक विज्ञानी पदार्थ के स्थान पर ऊर्जा तरंगों के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। उनके अनुसार पदार्थ तो बस दिखने वाला धोखा है, यथार्थ सत्य तो ऊर्जा ही है। इस सृष्टि में कोई भी वस्तु हो या फिर प्राणि- वनस्पति, वह जन्मने के पूर्व भी ऊर्जा था और मरने के बाद भी ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तरंगों का एक हिस्सा बन जायेगा। 
         विज्ञानविद् एवं अध्यात्मवेत्ता दोनों ही इस सत्य को स्वीकारते हैं कि ब्रह्माण्डव्यापी इस ऊर्जा के अनेकों तल- स्तर एवं स्थितियाँ हैं जो निरन्तर परिवॢतत होती रहती हैं। इनमें यह परिवर्तन ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय का कारण है। हालाँकि यह परिवर्तन क्यों होता है- इस बारे में वैज्ञानिकों एवं अध्यात्मविदों में सैद्धान्तिक असहमति है। वैज्ञानिक दृष्टि जहाँ इस परिवर्तन के मूल कारण मात्र सांयोगिक प्रक्रिया मानकर मौन धारण कर लेती है। वहीं आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसे ब्राह्मीचेतना से उपजी सृष्टि प्रकिया की अनिवार्यता के रूप में समझता है। इसके अनुसार मनुष्य जैसे उच्चस्तरीय प्राणी की स्थिति में परिवर्तन उसके कर्मों, विचारों, भावों एवं संकल्प के अनुसार होता है। ज्योतिष विद्या का आधारभूत सब यही है।
           यद्यपि इस विद्या के विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि जीवन व्यापी परिवर्तन के इस क्रम में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के विविध स्तर भी किसी न किसी प्रकार से मर्यादित होते हैं। ऊर्जा के इन विभिन्न स्तरों को ज्योतिष के विशेषज्ञों ने प्रतीकात्मक संकेतों में वर्गीकृत किया है। नवग्रह, बारह राशियाँ, सत्ताइस नक्षत्र इस क्रमिक वर्गीकरण का ही रूप है। प्रतीक कथाओं, उपभागों एवं रूपकों में इनके बारे में कुछ भी क्यों न कहा गया हो, पर यथार्थ में ये ब्रह्माण्डीय ऊर्जा धाराओं के ही विविध स्तर व स्थितियाँ हैं। 
            ज्योतिष के मर्मज्ञ एवं आध्यात्मिक ज्ञान के विशेषज्ञ दोनों ही एक स्वर से इस सच्चाई को स्वीकारते हैं कि मनुष्य के जन्म के क्षण का विशेष महत्त्व है। यूँ तो महत्त्व प्रत्येक क्षण का होता है, पर जन्म का क्षण व्यक्ति को जीवन भर प्रभावित करता रहता है। ऐसा क्यों है? तो इसका आसान सा जवाब यह है कि प्रत्येक क्षण में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विशिष्ट शक्तिधाराएँ किसी न किसी बिन्दु पर किसी विशेष परिमाण में मिलती हैं। मिलन के इन्हीं क्षणों में मनुष्य का जन्म होता है। इस क्षण में ही यह निर्धारित हो पाता है कि ऊर्जा की शक्तिधाराएँ भविष्य में किस क्रम में मिलेंगी और जीवन में अपना क्या प्रभाव प्रदर्शित करेंगी।
 चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी) के संबंध में कुछ नियम वेद-पुराणों में भी दिये गये हैं--- 
 विष्णु पुराण तृतीय खंड अध्याय-11 के श्लोक 78 में आदेश है कि भोजन करते समय अपना मुख पूर्व दिशा, उत्तर दिशा में रखें । उससे पाचन क्रिया उत्तम रहती है और शरीर स्वस्थ रहता है। 
              इसी प्रकार विष्णु पुराण तृतीय अंश अध्याय-11 के श्लोक 111 में उल्लेख है कि शयन करते समय अपना सिर पूर्व दिशा में, या दक्षिण दिशा में रख कर सोवें। इससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है। उत्तर दिशा में सिर रख कर कभी नहीं सोवें, क्योंकि उत्तर दिशा में पृथ्वी का चुंबक नार्थ उत्तरी ध्रुव है और मानव शरीर का चुंबक सिर है। अतः 2 चुंबक एक दिशा में होने से असंतुलन होगा और नींद ठीक से नहीं आएगी तथा स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा। उच्च रक्तचाप हो जाएगा। शायद इसी कारण भारतवर्ष में मृत शरीर का सिर उत्तर में रखते हैं। 
           कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका निभा सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका नहीं निभाते, परंतु जन्मपत्रिका, या हस्तरेखा के आधार पर ज्योतिषी यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि उक्त व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी होने की संभावना है, जैसे जन्मपत्रिका में तुला लग्न, या राशि पीड़ित हो, तो व्यक्ति को कमर के निचले वाले भाग में समस्या होने की संभावना रहती है। जन्मपत्रिका में बीमारी का घर छठवां स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है। तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार की ओर इंगित करता है, जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो, तो टी.बी. की बीमारी की संभावना रहती है और तृतीय स्थान में शुक्र पीड़ित हो, तो शर्करा की बीमारी 'मधुमेह' की संभावना रहती है। शनि, या राहु तृतीय स्थान में पीड़ित होने पर जहर खाना, पानी में डूबना, ऊंचाई से गिरना और जलने से घाव होना आदि की संभावना बनती है। 
          बात केवल मनुष्य की नहीं है, उस क्षण में जन्मने वाले मिट्टी, पत्थर, मकान- दुकान, कुत्ता, बिल्ली, वृक्ष- वनस्पति सभी का सच एक ही है। यही कारण है कि ज्योतिष के मर्मज्ञ व विशेषज्ञ प्रत्येक जड़ या चेतन का ऊर्जा चक्र या कुण्डली तैयार करते हैं। यह चक्र प्रायः ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की नव मूल धाराओं या नवग्रह एवं बारह विशिष्ट शक्तिधाराओं या राशियों को लेकर होता है। यदि गणना सही ढंग से की गई है तो इन ऊर्जा धाराओं के सांयोगिक प्रभाव इन पर देखने को मिलते हैं। परन्तु मनुष्य की स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। वह न तो जड़ पदार्थों की तरह एकदम अचेतन है और न वृक्ष- वनस्पतियों या अन्य प्राणियों की तरह अर्धचेतन। इसे तो आत्मचेतन कहा गया है। इसमें दूरदर्शी विवेकशीलता का भण्डार है। यही वजह है कि वह स्वयं को अपने ऊपर पड़ने वाले ब्रह्माण्डीय ऊर्जा प्रवाहों के अनुसार समायोजित करने में सक्षम है। 
           जहाँ तक ज्योतिष की बात है तो वह जन्म क्षण के अनुसार बनाये गये ऊर्जा चक्र के क्रम में यह निर्धारित करती है कि इस व्यक्ति पर कब कौन सी ऊर्जा धाराएँ किस भाँति प्रभाव डालने वाली हैं। इस चक्र से यह भी पता चलता है कि विगत में किये गये किन कर्मों, संस्कारों अथवा प्रारब्ध के किन कुयोगों अथवा सुयोगों के कारण उसका जन्म इस क्षण में हुआ। यह ज्ञान ज्योतिष का एक भाग है। इसी के साथ इसका दूसरा हिस्सा भी जुड़ा हुआ है। यह दूसरा हिस्सा इन विशिष्ट ऊर्जाधाराओं के साथ समायोजन के तौर- तरीकों से सम्बन्धित है। अर्थात् इसमें यह विधि विज्ञान है कि किन स्थितियों में हम क्या करें? यानि कि क्या उपाय करके मनुष्य अपने जीवन में आने वाले सुयोगों व सौभाग्य को बढ़ा सकता है। और किन उपायों को अपना कर वह अपने कुयोगों को कम अथवा निरस्त कर सकता है। प्रत्येक स्थिति को सँवारने के लिए अनेकों विधियाँ हैं और सभी प्रभावकारी हैं। 
        आध्यात्मिक चिकित्सक इनमें से किसी भी विधि को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। यह सब उनकी विशेषज्ञता पर निर्भर है। हालाँकि इन पंक्तियों में इस सच को स्वीकारने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि आज के दौर में ऐसे विशेषज्ञ व मर्मज्ञ नहीं के बराबर हैं, जो अध्यात्म साधना और ज्योतिष विद्या दोनों में निष्णात हों, पर कुछ दशक पूर्व भारतीय विद्या के महा पण्डित महामहोपाध्याय डॉ. गोपीनाथ कविराज के गुरु स्वामी विशुद्धानन्द जी महाराज के जीवन में यह दुर्गम सुयोग उपस्थित हुआ था। हिमालय के दिव्य क्षेत्र ज्ञानगंज के साधना काल में उन्होंने अपने गुरुओं से अध्यात्म चिकित्सा के साथ ज्योतिष विद्या में भी मर्मज्ञता प्राप्त की थी। वह ज्योतिष के तीनों आयामों- १. गणित ज्योतिष, २. योग ज्योतिष एवं देव ज्योतिष में पारंगत थे। गणित ज्योतिष को तो सभी जानते हैं। इसमें जन्म समय के अनुसार गणना करके फलाफल का विचार किया जाता है। 
          योग ज्योतिष में योग विद्या के द्वारा व्यक्ति के माता- पिता के मिलन का पता करते हैं, इसकी गणना गर्भाधान के क्षण से की जाती है, न कि जातक के भूमिष्ट होने के क्षण से। देव ज्योतिष में कई आश्चर्य प्रकट होते हैं। जैसे व्यक्ति के नाम से ही उसकी कुण्डली बना देना। उसके वस्त्र अथवा किसी परिचित व्यक्ति को आधार मानकर उसके जन्म चक्र एवं फलाफल का ठीक- ठीक विवेचन कर देना। व्यक्ति को देखकर उसकी पत्नी अथवा किसी दूर- दराज के रिश्तेदान की जन्म कुण्डली बना देना और उसका सही फलाफल बता देना। स्वामी विशुद्धानन्द अपनी अध्यात्म चिकित्सा में ज्योतिष के इन आयामों का समयानुसार उपयोग करते थे।
      रोहणी कुमार चेल महाशय ने उनके साथ हुए अपने अनुभव को बताते हुए कहा है, कि जब वह पहली बार उनसे मिलने गये तो अपने हैण्ड बैग में स्वयं की एवं पत्नी की कुण्डली लेकर गये थे। मकसद जिन्दगी की कुछ समस्याओं का समाधान पाना था। पर ज्यों ही वह बैठे और कुण्डली निकालने लगे, त्यों ही विशुद्धानन्द जी ने उन्हें टोक दिया और कहा रुको यह कहते हुए उन्होंने किताब के अन्दर रखा कागज निकाला। इस कागज में न केवल उनकी वरन् उनकी पत्नी की कुण्डली थी बल्कि फलाफल आदि का विवरण लिखा था।
       आश्चर्यचकित रोहणी कुमार चेल ने अपने पास रखी एवं विशुद्धानन्द महाराज द्वारा बतायी गयी कुण्डलियों को मिलाया। इसमें पत्नी की कुण्डली तो एकदम वही था, पर उनकी कुण्डली में जन्म लग्र अलग थी। जिज्ञासा करने पर उन्होंने कहा कि मेरी बनायी कुण्डली ही सही है, क्योंकि तुम्हारे पास की कुण्डली यदि सही होती तो तुम साधारण इंसान न होकर अवतार होते। और तुम हमारे पास न आते, बल्कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आता। क्योंकि तुम्हारे पास की जो कुण्डली है उसमें वर्णित जन्म लग्र के साथ ब्रह्माण्ड की जो ऊर्जाधाराएँ जिस क्रम में मिल रही थीं, वह सब कुछ असाधारण था। ऐसे समय मंस तो मानव जन्म घटित ही नहीं होता। वह तो एक असाधारण क्षण था। इस वार्तालाप के साथ ही उन्होंने उनकी आध्यात्मिक चिकित्सा के सारे सरंजाम जुटा दिये। इस चिकित्सा की प्रक्रिया में कतिपय तंत्र की तकनीकें भी शामिल थीं। 
            चिकित्सा शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र दोनों प्राचीन विज्ञान हैं मनुष्य जीवन को स्वस्थ रखने में दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है !चिकित्सा और ज्योतिष दोनों ही सब्जेक्ट समाज के लिए बहुत उपयोगी हैं और इन दोनों ही विषयों की आवश्यकता समाज के लगभग प्रत्येक व्यक्ति को पड़ती रहती है कोई बीमार होगा तो उसे दवा चाहिए और जो किसी भी विषय में परेशान होगा उसे ज्योतिष का सहयोग चाहिए यही कारण है कि समाज का लगभग हर व्यक्ति अपने को औषधि वैज्ञानिक अर्थात डॉक्टर एवं ज्योतिष वैज्ञानिक अर्थात ज्योतिषी सिद्ध करने का प्रयास कैसे भी करता रहता है || ज्योतिषी को 3, 6, 8 स्थान के ग्रहों की शक्ति देखनी चाहिए। यदि यह पता लग जाए कि भविष्य में कौनसी बीमारी की संभावना है, तो उससे बचने के उपाय करते रहेंगे, जैसे हृदय रोग होने की संभावना होगी तो वसा वाले पदार्थ नहीं खाएंगे और मानसिक तनाव से बचने का प्रयास करेंगे। इसी प्रकार सर्दी की तासीर की संभावना है, तो उससे बचते रहेंगे। 
            यदि आधुनिक भारत के डॉक्टर ज्योतिष का ज्ञान रखें, तो वे सरलता से निदान कर के, उचित इलाज करने में सक्षम होंगे। इसी प्रकार ज्योतिषीयों को भी मानव शरीर का ज्ञान होना आवश्यक है, जैसे जन्मपत्री में जो राशि, या ग्रह छठवें, आठवें, या बारहवें स्थान में पीड़ित हो, या इन स्थानों के स्वामी हो कर पीड़ित हो, तो उनसे संबंधित बीमारी की संभावना रहती है। इस संदर्भ में यहां, जन्मपत्री के अनुसार प्रत्येक स्थान और राशि से शरीर के कौन-कौन से अंग प्रभावित होते हैं, उनकी संक्षेप में सभी को जानकारी दी जा रही है। 

  1.  मेष राशि/लग्न : यह अग्नि तत्व राशि है। यह मस्तिष्क सिर, जीवन शक्ति और पित्त को प्रभावित करती है। इस लग्न वाला व्यक्ति श्रेष्ठ जीवन शक्ति वाला होता है।  ऐसा व्यक्ति माणिक धारण करे, तो स्वास्थ्य उत्तम रहने की संभावना है। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा बीमारियों का पूर्वानुमान लगाया जाता है। डॉक्टर, व्यक्ति के रोगी होने पर उसका इलाज करते हैं, परंतु ज्योतिष एक ऐसी विद्या है जिसके द्वारा बीमारियों का पूर्वानुमान लगा कर उनसे बचने के उपाय किये जाते हैं, बीमारी से बचा जा सकता है, या उसकी तीव्रता कम की जा सकती है। 
  2.  वृष राशि/लग्न : यह पृथ्वी तत्व राशि है। यह मुख, नेत्र, कंठ नली, आंत तथा वात को प्रभावित करती है। इस लग्न वाला सामान्यतः स्वस्थ रहता है। गले में संक्रमण की शिकायत इन व्यक्तियों को अधिक रहती है। इसके लिए सावधानी बरतें, तो उत्तम होगा। 
  3.  मिथुन राशि/ लग्नः यह वायु तत्व राशि है। यह कंठ, भुजा, श्वास नली, रक्त नली, श्वास क्रिया तथा कफ को प्रभावित करती है। इस लग्न वाले की जीवन शक्ति सामान्य रहती है। 
  4.  कर्क राशि/ लग्नः यह जल तत्व राशि है। यह वक्ष स्थल, रक्त संचार और पित्त को प्रभावित करती है। इस राशि-लग्न वालों को मूंगा लाभकारी है जो जीवनदायिनी औषधि का काम करता है। 
  5.  सिंह राशि/लग्न : यह अग्नि तत्व राशि है। यह जीवन शक्ति, हृदय, पीठ, मेरुदंड, आमाशय, आंत और वात को प्रभावित करती है इस लग्न, राशि वाले में जीवन शक्ति अधिक रहती है। इनके लिए मूंगा जीवन शक्तिदायक और लाभदायक है। 
  6.  कन्या राशि/लग्न : जन्मपत्रिका में छठा स्थान बीमारी का स्थान माना जाता है। इस कारण जन्मपत्री का परीक्षण करते समय छठवें स्थान, या कन्या राशि का सूक्ष्म और सावधानी से परीक्षण करना चाहिए। यह पृथ्वी तत्व राशि है। यह उदर के बाहरी भाग, हड्डी, आंतें, मांस और कफ को प्रभावित करती है। 
  7.  राशि तुला/ लग्न : यह वायु तत्व राशि है। यह कम, श्वास क्रिया तथा पित्त को प्रभावित करती है। इस लग्न वालों के स्वास्थ्य के लिए नीलम लाभकारी है। 
  8.  वृश्चिक राशि/ लग्न : या यह जल तत्व राशि है। यह जननेंद्रिय, गुदा, गुप्तांग, रक्त संचार और वात को प्रभावित करती है। 
  9.  धनु राशि/लग्न : यह अग्नि तत्व राशि है। यह जांघ, नितंब तथा कफ और पाचन क्रिया को प्रभावित करती है। इसके लिए पीला पुखराज लाभकारी है। 
  10.  मकर राशि/लग्न : यह पृथ्वी तत्त्व राशि है। यह जांघ, घुटनों के जोड़, हड्डी, मांस तथा पित्त को प्रभावित करती है। इनके लिए नीलम और हीरा लाभकारी हैं। 
  11.  कुंभ राशि/लग्न : यह वायु तत्त्व राशि है। यह घुटने, जांघ के जोड़, हड्डियों-नसों, श्वास क्रिया तथा वात को प्रभावित करती है। 
  12.  मीन राशि/लग्नः यह जल तत्त्व राशि है। यह पांव, पांव की उंगलियों, नसों, जोड़ों, रक्त संचार तथा कफ को प्रभावित करती है। इनके स्वास्थ्य के लिए मोती लाभकारी है। 
 ज्योतिष द्वारा रोगों की पहचान व चिकित्सा ज्योतिषशास्त्र में जन्म कुंडली, वर्ष कुंडली, प्रश्न कुंडली, गोचर तथा सामूहिक शास्त्र की विधाएँ व्यक्ति के प्रारब्ध का विचार करती हैं, उसके आधार पर उसके भविष्य के सुख-दु:ख का आंकलन किया जा सकता है। चिकित्सा ज्योतिष में इन्हीं विधाओं के सहारे रोग निर्णय करते हैं तथा उसके आधार पर उसके ज्योतिषीय कारण को दूर करने के उपाय भी किये जाते हैं। इसलिए चिकित्सा ज्योतिष को ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या भी कहा जाता है। 
      अंग्रेजी में इसे मेडिकल ऐस्ट्रॉलॉजी कहते हैं। मन और शरीर के मध्य तारतम्य स्वास्थ्य है तथा इस तारतम्य का टूटना ही रोग है। जन्मपत्रिका में सूर्य चन्द्रमा, लग्न की स्थिति एवं कुछ अन्य योग यह तय करते है कि हमारी जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी होगी। बृहत पाराशर होरा शास्त्र में कुछ विशेष परिस्थितियों में हुए जन्म को अशुभ जन्म माना गया है। यदि इन विशेष स्थितियों में जन्म हो तो ये जन्म पत्रिका के अन्य शुभ योगों को नष्ट कर देते हैं। 
अशुभ जन्म में निम्न स्थितियों का वर्णन किया गया है। 

  1. अमावस्या 
  2. कृष्ण चतुर्दशी 
  3. भद्रा करण 
  4. भाई या पिता का एक नक्षत्र 
  5. संक्रान्ति 
  6. क्रान्तिसाम्य-सूर्य और चन्द्रमा की क्रांति समान हो 
  7. सूर्य ग्रहण 
  8. चन्द्र ग्रहण 
  9. व्यतिपातादि दुर्योग 
  10. त्रिविद्य गण्डान्त 
  11.  यमघण्ट योग 
  12. तिथि क्षय 
  13. ग्धादि योग 
  14. त्रिखल जन्म 
  15. विकृत प्रसव 
  16. तुला मास 
  17. सार्प शीर्ष-
वृश्चिक संक्रांति मास में अमावस्या का जन्म हो और सूर्य-चन्द्रमा अनुराधा नक्षत्र के तीसरे या चौथे चरण में हो तो सार्प शीर्ष दोष होता है। जीवन भय, घातक रोग, धन आदि का क्षय। जब तक शांति न हो शिवालय में घी का दीपक जलाएं। 
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जन्मजात रोग-प्रतिरोधात्मक क्षमता---- 
सूर्य चन्द्रमा और लग्न जन्मपत्रिका में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए इन तीनों का बली होना अत्यंत आवश्यक है। यदि ये तीनों बली हो तो व्यक्ति आदिव्याधि से बचा रहता है। अष्टम भाव आयु का भाव है, इसलिए अष्टम भाव और अष्टमेश का भी बली होना आवश्यक है। 
जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता निम्न स्थितियों में अच्छी रहती है :--- 

  • 1. बली लग्र एवं लग्नेश 
  • 2. लग्न एवं लग्नेश का शुभ कतृरि में होना 
  • 3. 3,6,11 में अशुभ ग्रह एवं गुलिक 
  • 4. केन्द्र-त्रिकोण में शुभ ग्रह होना 
  • 5. अष्टम भाव में शनि होना।
  • 6. बली अष्टमेश 
  • 7. बली आत्मकारक 
  • 8. लग्न व अष्टम भाव में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु होना 
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  जन्म पत्रिका में लग्र, सूर्य, चंद्र के चक्र बिंदुओ से शरीर के बाहरी, भीतरी रोग को आसानी से समझा जा सकता है। लग्र बाहर के रोगो का, तथा सूर्य भीतर के रोग, तेज, प्रकृति का तथा चंद्रमा मन उदर का प्रतिनिधी होता है। इन तीनों ग्रहों का अन्य ग्रहों से पारस्परिक संबध या शत्रुता ही शरीर के विभिन्न रोगो को जन्म देती है। रक्तचाप के लिए चन्द्र, मंगल और शनि ग्रह को अधिक उत्तरदायी माना गया है। शनि ग्रह और साढ़े साती से व्याप्त भय तथा विनाश की चर्चा अक्सर की जाती है, हजारों उपाय भी किये जाए हैं। लेखक ने भी ऐसी ग्रह दशा से पीड़ित लोगों को रक्तचाप से ग्रसित होना बताया है। रक्तचाप की भांति मुधमेह भी आम रोग हो गया है। मानसिक तनाव और अनियमित खान-पान को इसका कारण बताया गया है।
           ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बताया गया है कि सूर्य-चन्द्र द्वादश भाव में स्थित हों, राहु और सूर्य सप्तम स्थान में हों, शनि और मंगल के साथ चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें स्थान में स्थित हों तो व्यक्ति नेत्रहीन होगा। किसी भी जन्म पत्रिका का षष्ठ भाव रोग का स्थान होता है। शरीर में कब, कहां, कौन सा रोग होगा वह इसी से निर्धारित होता है। यहां पर स्थित क्रूर ग्रह पीड़ा उतपन्न करता है। उस पर यदि शुभ ग्रहो की दृष्टि न हो तो यह अधिक कष्टकारी हो जाता है। प्रश्न कुण्डली रोग के विषय में जानकारी प्राप्त करने का साधारण तरीका है | 
 जानिए रोग के कारक ग्रह---
  1.  सूर्य के कारण--बुखार, हृदय सम्बन्धी रोग, नेत्र रोग, सिर दर्द, अस्थियों में तकलीफ, पित्त दोष ये ऐसे रोग हैं जिनके कारक ग्रह सूर्य हैं | हृदय, पेट, पित्त, दांयीं आंख, घाव, जलने का घाव, गिरना, रक्त प्रवाह में बाधा आदि के लिए सूर्य उत्तरदायी होता है |।। ज्योतिष के मुताबिक सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह सूर्य है। सूर्य का सीधा असर इंसान की आंखों, हड्डियों और आत्मविश्वास पर होता है। अगर सूर्य की दशा और दिशा आपके पक्ष में न हो तो आप आंखों और हड्डियों से जुड़ी किसी बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं। सूर्य, सिंह राशि का स्वामी है। 
  2. चन्द्रमा के कारण--सर्दी - खांसी, फेफड़ों में परेशानी, नजला, जुकाम, क्षय रोग, श्वास सम्बन्धी रोग एवं मानसिक रोगों के लिए चन्द्र उत्तरदायी होता है | |चंद्रमा को शांति का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक दिमाग और खून से जुड़ी बीमारियों का संबंध चंद्रमा की दशा से है। चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है। 
  3. मंगल के कारण-- शरीर के तरल पदार्थ, रक्त बायीं आंख, छाती, दिमागी परेशानी, महिलाओं में मासिक चक्र, सिर, जानवरों द्वारा काटना, दुर्घटना, जलना, घाव, शल्य क्रिया ऑपरेशन, उच्च रक्तचाप, गर्भपात इत्यादि के लिए मंगल उत्तरदायी होता है |। मंगल- मंगल ग्रह इंसान की ताकत और हिम्मत पर सीधा असर करता है। ज्योतिषियों के मुताबिक मंगल की दशा बिगड़ने पर इंसान की ताकत और प्रभाव में कमी आ सकती है। मंगल ग्रह वृश्चिक और मेष राशि का स्वामी है। 
  4.  बुध के कारण--एलर्जी, पागलपन, हिस्टीरिया, चर्म रोग, मिर्गी एवं सन्निपात और गला, नाक, कान, फेफड़े, आवाज, बुरे सपने आदि के लिए बुध उत्तरदायी होता है |। अगर आपकी बोलचाल की क्षमता पर असर पड़े तो मतलब बुध की दशा ठीक नहीं है। ज्योतिषियों की मानें तो त्वचा से जुड़ी बीमारियां भी बुध की दशा पर निर्भर करती हैं। बुध कन्या और मिथुन राशि का स्वामी है। 
  5.  गुरु के कारण -- यकृत, शरीर में चर्बी, मधुमेह, शुक्र चिरकालीन बीमारियां, कान इत्यादि के लिए गुरु उत्तरदायी होता है |। पीलिया, पेट की खराबी, गुर्दे में परेशानी, वायु विकार, मोटपा जैसे रोगों के लिए गुरू उत्तरदायी होते है |लीवर और कान से जुड़ी समस्या का सीधा संबंध बृहस्पति ग्रह से होता है। अगर बृहस्पति की दशा और दिशा आपके अनुकूल नहीं है तो लीवर और सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। बृहस्पति, धनु और मीन राशि का स्वामी है। 
  6.  शुक्र के कारण--- शुक्र के प्रभाव से गुप्त रोग, कमज़ोरी, प्रदर, मधुमेह,मूत्र में जलन, गुप्त रोग, आंख, आंतें, अपेंडिक्स, मधुमेह, मूत्राशय में पथरी आदि का सामना करना होता है|इंसान के काम करने की क्षमता पर सीधा असर डाल सकता है शुक्र। शुक्र की दशा ठीक न होने पर यौन रोगों से जुड़ी समस्या भी हो सकती है। शुक्र तुला और वृषभ राशि का स्वामी है। 
  7.  शनि के कारण-- जोड़ों में दर्द, नाड़ी सम्बन्धी दोष, गठिया, सूखा, पेट दर्द और पांव, पंजे की नसें, लसिका तंत्र, लकवा, उदासी, थकान की तकलीफ का कारण शनि उत्तरदायी होता है |। ज्योतिषियों के मुताबिक शनि की ग्रह दशा इंसान के जीवन पर खासा असर डालती है लेकिन सेहत के हिसाब से शनि नाड़ी तंत्र को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। नस-नाड़ी से जुड़ी बीमारी शनि ग्रह की दशा ठीक नहीं होने पर हो सकती है। शनि मकर और कुंभ राशि का स्वामी है । 
  8.  राहु के कारण-- हडि्डयां, जहर फैलना, सर्प दंश, क्रॉनिक बीमारियां, डर आदि के लिए राहु उत्तरदायी होता है |। 
  9.  केतु के कारण-- हकलाना, पहचानने में दिक्कत, आंत्र, परजीवी इत्यादि के लिए केतु उत्तरदायी होता है | 
उपचार स्थिती-- प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन होता है जबकि चन्द्रमा बलवान हो और 1, 5, 7 एवं 8 भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार से रोग का ईलाज संभव हो पाता है.पत्रिका में तृतीय, षष्टम, नवम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार के उपरान्त रोग से मुक्ति मिलती है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों और सप्तमांश बलवान हों तो रोग का निदान संभव होता है.चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह की स्थिति से ज्ञात होता है कि रोगी को दवाईयों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा. इसके आलावा अलग अलग ग्रहों के उपचार के साथ साथ रोगो से बचने के लिये महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। -ऊँ नम: शिवाय मंत्र का सतत जाप करें। -ऊँ हूँ जूँ स: इन बीज मंत्रो का चौबीसो घंटे जाप करे। -शिव का अभिषेक करें।

जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्ध

Know-your-life-marital-status-and-relationship-of-Venus-जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्धआज की इस आधुनिक जीवन शेली में मनुष्य को एक से अधिक जीवन साथी की (सिर्फ शर्रारिक सम्बन्ध ) के लिए जरूरत लगती हैं परन्तु ऐसे जातको के कुंडली के योग ही उनको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! अब बात आती हैं की ऐसे कोन-कोन से योग होते हैं जो हमको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! वर्तमान में अधिकतर कुंडलियो में शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग फलित होता हैं या जातक एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! परन्तु सिर्फ शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध होने से कोई भी ज्योतिषी किसी जातक के चरित्र का आंकलन नहीं कर सकता हैं ! इस योग मैं हमारी कुंडली के भावो का भी योगदान रहता हैं | 
              मेरे विचार से समाज में हो रहे ऐसे कई परिवर्तन इसके कारण हैं. और यह कई कारणों से हो सकता है ...जैसे पति की नपुंसकता , पत्नी का दुर्व्यवहार , समय का अभाव , आपसी समझ का अभाव , वगेरह वगेरह . हमको इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्यों से कोई मतलब नहीं है अपितु इसके ज्योतिषीय कारणों की चर्चा ज़रूर करेंगे |आज के समय में किसी को अच्छे बुरे की परवाह नहीं है और सभी लोग अंधों की तरह अपने स्वार्थों की पूर्ती करने में लगे हुए हैं. हम रोज़ ही अखबारों में पढ़ते रहते हैं की फलां स्त्री का अनैतिक यौन समबन्धों के कारण क़त्ल हो गया, फलां के साथ वैसा हो गया. आजकल स्वाप्पिंग का चलन भी बहुत हो चुका है और हमारे जाने बिना यह बढ़ता ही जा रहा है. कॉलसेंटर कल्चर ने भी स्त्री पुरुष के विवाह पूर्व और विवाहेतर समबन्धों को बढाने में बहुत योगदान दिया है. इन्हीं सब कारणों के चलते विवाह नाम की क्रिया और परिवार नाम का संस्थान बहुत अन्धकार में जा चूका है. 
          यहाँ तक की बड़े परिवारों में रक्त सम्बंधोयों के मध्य ही यौन सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं और किसी को पता नहीं चलता. जब तक पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है. पंचम भाव और पंचम का उपनक्ष्त्र स्वामी विवाह पूर्व प्रेम सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध आदि के होते है अन्य बातों के अलावा, शुक्र काम का मुख्य करक गृह है और रोमांस प्रेम आदि पर इसका अधिपत्य है. मंगल व्यक्ति में पाशविकता और तीव्र कामना भर देता है और शनि गुप्त रास्तों से कामाग्नि की पूर्ती करने को प्रेरित करता है. ज्योतिषशास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न पंचम सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। प्रेम होना अलग बात है और प्रेम का विवाह में परिणत होना अलग बात है। 
            ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।ऐसा नहीं है कि केवल इन्हीं स्थितियो मे प्रेम विवाह हो सकता है। अगर आपकी कुण्डली में यह स्थिति नहीं बन रही है तो कोई बात नहीं है हो सकता है कि किसी अन्य स्थिति के होने से आपका प्रेम सफल हो और आप अपने प्रेमी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करें। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । 
        शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। कुंडली के सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवं उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे | ज्योतिष शास्त्र का एक सर्वमान्य नियम यह है कि स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि तथा उच्चराशि में स्थित ग्रह उस भाव का नाश नहीं करता, बल्कि वह उस भाव के फल की वृद्धि करता है। किन्तु नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित ग्रह भाव को नष्ट कर देता है। अतः मांगलिक योग ग्रह, स्वराशि, मूल त्रिकोण रशि तथा उच्च राशि में होने पर दोषदायक नहीं होता है। किन्तु इस योग को बनाने वाला ग्रह नीच राशि या शत्रु राशि में हो तो अधिक दोष दायक होता है। 
 बृहद पराशर होरा शास्त्र में कहा गया है की—- 
 सुखीकान्त व पुः श्रेष्ठः सुलोचना भृगु सुतः। काब्यकर्ता कफाधिक्या निलात्मा वक्रमूर्धजः।।।
       तात्पर्य यह है कि शुक्र बलवान होने पर सुंदर शरीर, सुंदर मुख, अतिसुंदर नेत्रों वाला, पढने लिखने का शौकीन कफ वायु प्रकृति प्रधान होता है। 
 **** शुक्र के अन्य नामः- 
भृगु, भार्गव, सित, सूरि, कवि, दैत्यगुरू, काण, उसना, सूरि, जोहरा (उर्दू का नाम) आदि हैं। 
 **** शुक्र का वैभवशाली स्वरूपः- 
यह ग्रह सुंदरता का प्रतीक, मध्यम शरीर, सुंदर विशाल नेत्रों वाला, जल तत्व प्रधान, दक्षिण पूर्व दिशा का स्वामी, श्वेत वर्ण, युवा किशोर अवस्था का प्रतीक है। चर प्रकृति, रजोगुणी, स्वाथी, विलासी भोगी, मधुरता वाले स्वभाव के साथ चालबाज, तेजस्वी स्वरूप, श्याम वर्ण केश और स्त्रीकारक ग्रह है। इसके देवता भगवान इंद्र हैं। इसका वाहन भी अश्व है। इंद्र की सभा में अप्सराओं के प्रसंग अधिकाधिक मिलते हैं। यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है. 
           यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है. लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा) सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है. सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं | 
          पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है| जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है. पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है. वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है. अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है.
               एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिफर् गुण मिलान से कुछ नही होता. जैसे - कि यदि शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग दोस्त क साथ बनता हैं! यदि शुक्र या मंगल दोनों में से कोई भी गृह नवम भाव कि का स्वामी हो तो जातक क सम्बन्ध अपने देवर( पति को छोटा भाई ) या साली (पत्नी कि छोटी बहन ) क साथ सम्बन्ध बनते हैं ! परन्तु इस योग क मध्य में १२ भाव का सम्बन्ध होना आवश्यक हैं तभी इस योग को फल मिलता हैं! क्यों कि ज्योतिष शास्त्र में १२ भाव को शय्या सुख का भाव बोला जाता हैं और बिना शय्या सुख के दो जातको के मध्य में सम्बन्ध नहीं बन सकता हैं! यदि इस योग में शनि गृह कि युति या द्रष्टि समबन्ध हो तो जातक के सम्बन्ध अपने से बड़े जातक से बनते हैं और यदि रहू /केतु कि युति या सम्बन्ध बने तो नीच लोगो के साथ सम्बन्ध बनते हैं !यदि इस योग क मध्य में सूर्य हो तो किसी बड़े पद के जातक/जातिका से सम्बन्ध बनाते हैं! यदि शुक्र और मंगल के साथ बुध या शनि गृह कि भी युति हो जाये तो जातक सम्लेगिक होता हैं! यह योग यह योग शुक्र व् केतु कि युति होने से भी फलित होता हैं ऐसा कुछ एक कुंडलियो में देखा गया हैं इस योग के भंग होने का योग किसी एक गृह का वक्री होने पर होता हैं परन्तु वो गृह वक्री होकर निर्बल होना चाहिए! 
          अब बात आती हैं कि इस योग का खुलना और छुपा रहने का क्या योग होगा ? उसके कुछ योग इस प्रकार से देखे गए हैं जैसे :- यदि शुक्र व् मंगल की युति या योग पर गुरु कि द्रष्टि हो तो यह योग छुपा रहता हैं क्यों कि गुरु हमारे सभी नवग्रहों में सब से बड़ा हैं और वोह सब कुछ छुपा लेता हैं या उस क निचे सब कुछ छिप जाता हैं!परन्तु गुरु कुंडली में जिस भाव का स्वामी होगा उस भाव से सम्बंधित जीव कि जानकारी में यह योग होगा परन्तु सब से छुपा हुआ ही रहेगा और यदि यह योग ४भव में बने तो भी छुपा हुआ रहता हैं क्यों कि चतुर्थ भाव जमीन के नीचे के भाव को भी दर्शता हैं यह योग क्यों छुपा हुआ रहता हैं इस कि चर्चा हम बाद में करंगे! यदि नवमांश कुंडली में शुक्र और मंगल कि युति किसी भी एक राशी में बने तो भी कृष्ण योग बनता हैं! वैदिक ज्योतिष के अनुसार तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगल होता है और इस भाव में शुक्र होने पर जातक की पत्नी मर्द के समान जातक की हर मुसीबत में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाली होती है| 
              जातक पर आने वाली किसी भी मुशीबत को अपने उपर पहले लेने वाली होती है लेकिन शुक्र यानी की पत्नी में मंगल यानी की पुरुष के ज्यादा गुण होने केकारण जातक को अपनी पत्नी से पूर्ण रूप से शारीरिक सुख नही मिल पाता| यहाँ शुक्र के समय यदि जातक पराई औरत के चक्कर में पड़ता है तो उसको उपरलिखित पत्नी से साथ मिलना के योग कम हो जाता है| अब कई बार हमारे मन में आता हैं कि हम सिर्फ शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग का निर्माण क्यों मानते हैं या हमारे गुरुजनों ने शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग को क्यों फलित माना हैं! ज्योतिष शाश्त्र में शुक्र को प्रेम का कारक मानते हैं और मंगल को उत्तेजना का कारक कहा जाता हैं जब भी प्रेम और उत्तेजना कि युति योगी तो कृष्ण योग का निर्माण होगा 
---मंगल+शुक्र- हर प्रकार के कलाकारों (फिल्मी सितारों) में डांस, ड्रामा एवं स्त्री जाति पर प्रभुत्व और सफलता प्राप्त करने के लिए। 
--यदि कुंडली में शुक्र बलि हो तो जातक का प्रेम निश्छल होता हैं! यदि कुंडली में ५,७,११,१२ भाव कि युति या कोई भी एक सम्बन्ध बने तो कृष्ण योग का उपयोग वियेवासयिक कार्यो में होता हैं और यदि कुंडली में ५,८,१२ भावेशो कि युति या सम्बन्ध बने तो बदनामी का योग भी बनता हैं! क्यों कि अष्टम भाव बदनामी का भाव होता हैं और यदि इस योग में १,५,६,८,१२ व् शनी कि युति हो जाये तो जातक किसी कोर्ट केस में फश जाता हैं! यदि इस योग पर कोई भी ज्योतिषी और प्रकाश डालना चाहे तो उनका स्वागत हैं! 
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यदि सप्तमेश शुक्र-- 
  1. तीसरे घर में हो : बहुत ज्यादा पाप प्रभाव में हो, तब व्यक्ति के उसके भाई की पत्नी के साथ अथवा महिला के उसकी बहिन के पति के साथ सम्बन्ध हो सकते हैं किन्तु वह बहुत पाप प्रभाव में होना चहिये. 
  2. चतुर्थ भाव में हो : और राहू – केतु के साथ हो तब जातक की पति / पत्नी के चाल चलन पर शक किया जा सकता है. 
  3. पंचम भाव में हो : और बहुत अधिक पीड़ित हो तो जातक की पत्नी किसी और के शिशु को जन्म दे सकती है. -
  4. छठे भाव में हो : और बहुत पीढित हो तो व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है , साथ ही शुक्र भी बहुत कमजोर होना चहिये तथा उसका विवाह ऐसी महिला के साथ हो सकता है जो बीमार होगी तथा व्यक्ति को विवाहित जीवन का आनंद नहीं लेने देगी. 
  5.  एकादश भाव में हो : तो व्यक्ति के अनेक सम्बन्ध हो सकते हैं अता दो शादियाँ कर सकता है | 

  • शुक्र और यूरेनस का ख़राब द्रष्टि सम्बन्ध शादी के लिए तैयार लड़कियों से सुख के पूर्ती करवाता है .
  • चन्द्र का शुक्र के साथ खराब सम्बन्ध दुसरे की पत्नियों से सुख दिलवाता है. 
  • शुक्र चन्द्र यूरेनस नेप्तून यदि १,२,५,७,११,में हों तो दुसरे के साथ आनंद प्राप्त करता है.शनि से गोपनीयता बनी रहती है , मंगल से इच्छा को कर्म में परिवर्तित करने की ऊर्जा आती है ,गुरु का अच्छा प्रभाव हो तो सब कुछ ठीक चलता रहता है किन्तु विपरीत प्रभाव हुआ तो शिशु का जन्म हो सकता है और सामने वाली जातक कानून का सहारा ले सकती है और व्यक्ति को बहुत नुक्सान दे सकती है | 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है । 
  • यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं । 
  • लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है । 
  • मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।
  • यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है । 
  • सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 
  • यदि शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं । 
  • मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है ।
  • जब मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है । 
  • यदि मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है । 
  • जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो । 
  • किसी जातक की कुंडली में शुक्र चन्द्र का योग ज्यादाअशुभ फल नही देता| यदि किसी पाप ग्रह या शत्रु ग्रह की दृष्टी इन दोनों पर हो तो फिर जातक की माँ और पत्नी के सम्बन्ध अच्छे नही रह पाते| 
  • कुंडली में शुक्र मंगल का योग होने पर शुभ फल मिलते है| जातक अपने भाई बहनों की सहायता करने वाला होता है| यदि इन दोनों पर राहू या केतु की दृष्टी पडती हो तो जातक दिन रात मुशीबत पर मुशीबत झेलता है | जातक की पत्नी को भी काफी समस्या का सामना करना पड़ता है| 
  • सूर्य शुक्र का योग जातक के विवाहिक जीवन में किसी प्रकार की कमी कर देता है हालांकि जातक में आत्मविश्वास बढ़ जाता है| 

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सप्तम भाव और तुला राशि :--- 
  1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है । 
  2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है । 
  3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।
  4.  तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है । 
  5.  दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है 

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  1. ****सुख साधनों का कारक भी है शुक्र:- शुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह] कामेच्छा] वीर्य] प्रेम वासना] रूप सौंदर्य] आकर्षण] धन संपत्ति] व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत] ग्रहस्थ जीवन का सुख] आभूषण] नृत्य] श्वेत और रेशमी वस्त्र] सुगंधित और सौंदर्य सामग्री] चांदी] हीरा] शेयर] रति एवं संभोग सुख] इंद्रिय सुख] सिनेमा] मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य] शैया सुख] काम कला] कामसुख] कामशक्ति] विवाह एवं प्रेमिका सुख] होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।
  2.  ****शुक्र की अशुभताः- यदि आपके जन्मांक में शुक्र जी अशुभ हैं तो आर्थिक कष्ट] स्त्री सुख में कमी] प्रमेह] कुष्ठ] मधुमेह] मूत्राशय संबंधी रोग] गर्भाशय संबंधी रोग और गुप्त रोगों की संभावना बढ जाती है और सांसारिक सुखों में कमी आती प्रतीत होती है। शुक्र के साथ यदि कोई पाप स्वभाव का ग्रह हो तो व्यक्ति काम वासना के बारे में सोचता है। पाप प्रभाव वाले कई ग्रहों की युति होने पर यह कामवासना भडकाने के साथ साथ बलात्कार जैसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है। शुक्र के साथ मंगल और राहु का संबंध होने की दशा में यह घेरेलू हिंसा का वातावरण भी बनाता है। 

 **** जानिए अशुभ शुक्र के लिए क्या करें:- 
अशुभ शुक्र की शांति के लिए शुक्र से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए] जैसे चांदी चावल दूध श्वेत वस्त्र आदि। 
  1.  दुर्गाशप्तशती का पाठ करना चाहिए।
  2. कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करना चाहिए। 
  3. हीरा धारण करना चाहिए। यदि हीरा संभव न हो तो अर्किन, सफेद मार्का, सिम्भा, ओपल, कंसला, स्फटिक आदि शुभवार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण करना चाहिए। 
  4. शुक्र का बीज मंत्र भी लाभकारी होगा। 

  1. 1- ऊँ शं शुक्राय नमः। 
  2. 2- ऊँ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। 
इन मंत्रों का जाप भी अरिष्ट कर शुक्र शांति में विशेष लाभ प्रद माना गया है।
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एक सुशील और समर्पित स्त्री के ---
यदि किसी कुंडली में सप्तम भाव का उपनक्ष्त्र स्वामी शुक्र , शनि अथवा मंगल न हो और वह शनि शुक्र मंगल के नक्षत्र में न विराजमान हो तो वह स्त्री पूर्ण चरित्रवान होगी.यदि उसका लग्न लाभेश के नक्षत्र मैं हो और उसपर गुरु की द्रष्टि हो तो वह निश्चित ही पूर्ण रूप से संयमित होगी | =====================================================

जानिए मंगल का कुम्भ राशि में गोचर का आपकी राशि पर प्रभाव

मंगल का कुंभ राशि में गोचर, 11 दिसंबर 2016 
Know-your-zodiac-Tue-effects-of-transit-in-the-Aquarius-जानिए मंगल का कुम्भ राशि में गोचर का आपकी राशि पर प्रभावज्योतिष शास्त्र में मंगल को एक शक्तिशाली ग्रह बताया गया है। मंगल ग्रह महत्वाकांक्षा, आत्मविश्वास और अहंकार आदि का प्रतिनिधित्व करता है। ज्योतिषाचार्य पंडित पंडित विशाल दयानन्द शास्त्री के अनुसार मंगल का सीधा प्रभाव मनुष्य के स्वभाव और आत्मविश्वास पर पड़ता है। कुंडली में मंगल की अच्छी दिशा बेहद कामयाब बनाती है लेकिन वहीं मंगल की बुरी दिशा होने से कष्ट और विपत्ति भी आती है।
           11 दिसंबर 2016 (रविवार )की शाम को लगभग 7 बजे से को मंगल ग्रह मकर राशि से संचरण करते हुए कुंभ राशि में प्रवेश कर चूका हैं। मंगल ग्रह कुंभ राशि में 20 जनवरी 2017 (शुक्र
वार) तक स्थित रहेगा। मंगल का यह गोचर हमारे जीवन में बड़े बदलाव लेकर आएगा हालांकि ये बदलाव लाभदायक और हानिकारक दोनों हो सकते हैं। जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से आपकी राशि के अनुसार मंगल के कुम्भ में इस गोचर का आपके जीवन पर क्या होगा असर, यह जानने के लिए पढ़ें विशेष प्रस्तुति। (ध्यान रखें--यह राशिफल आपकी लग्न के आधार पर है। )
 जानिए कौन सी राशि पर क्या - क्या होगा मंगल के गोचर का प्रभाव (11 दिसम्बर 2016 से 20 जनवरी 2017 तक)आइये देखते हैं: 
  1.  मेष राशि-- मंगल ग्रह आपके 11वें भाव में गोचर कर रहा है, जो महत्वाकांक्षा, सफलता और लंबी यात्रा को दर्शा रहा है। जीवन में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इस दौरान होने वाली उन्नति और वृद्धि से आप खुद हैरान हो जाएंगे। व्यक्तित्व विकास होने से स्वभाव में परिवर्तन होगा। आय में बढ़ोतरी होने की संभावना है,आकर्षक लाभ भी होगा। परिजनों का ध्यान रखें और किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले अच्छे से सोचें। संवाद की कमी की वजह से आपके और जीवन साथी के बीच ग़लतफहमी हो सकती है। कुछ वक्त अपने परिजनों के साथ बीताएं। कुल मिलाकर मंगल के गोचर से ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होगी। आपकी राह में आने वाली समस्याएं स्वत: ही दूर हो जाएंगी। आप हर कठिनाई को आसानी से पार कर जाएंगे। 
  2.  वृषभ राशि--- क्रोधी स्वभाव का मंगल ग्रह आपके 10वें भाव में संचरण कर रहा है। यह घर आपके करियर, व्यवसाय, प्रसिद्धि और पहचान का कारक होता है। इस वक्त में अपने आसपास के माहौल को लेकर सजग रहें। आंख मूंदकर किसी भी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करें क्योंकि ऐसा संभव है कि कोई आपको हानि पहुंचा सकता है। ऐसे लोगों से दूर रहने की कोशिश करें जो निराशावादी विचारों का वातावरण निर्मित करते हों। परिवार के साथ सैर पर जाने के लिए उत्साहित रहेंगे। पत्नी का व्यवहार सहयोगपूर्ण रहेगा। ऐसे लोगों से सावधान रहें जो आपसे मित्रता करने की कोशिश करे, क्योंकि कुछ लोग आपके भोलेपन का फायदा उठा सकते हैं। परिजनों के प्रति स्नेह का भाव रखें और उनका ख्याल रखें। 
  3.  मिथुन राशि--- मंगल आपके 9वें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपके भाग्य, शिक्षा, गुरू और धर्म से जुड़ा है। इस वक्त में इच्छा और लालसा पर आपका नियंत्रण रहेगा। किसी खास अभियान पर जाने या समुद्री और हवाई यात्रा के योग हैं। बच्चे आपका स्नेह पाने के लिए इच्छुक रहेंगे हालांकि व्यस्त होने की वजह से आप परिजनों और बच्चों को वक्त नहीं दे पाएंगे। प्रियतम का भरपूर सहयोग मिलेगा। सभी से अच्छे संबंध रखें और उन्हें निभाकर चलें। मन में आशावादी भाव रखें और सोचें कि आने वाला कल बेहतर होगा। स्वयं की सुरक्षा का खास ख्याल रखें।
  4.  कर्क राशि-- हठधर्मी स्वभाव का मंगल ग्रह आपके 8वें भाव में गोचर कर रहा है। यह भाव आपकी आयु, जीवन, बड़े बदलाव और क्रांतिकारी परिवर्तन को दर्शाता है। इस दौरान ज्यादा नहीं सोचें और तनाव बिल्कुल नहीं लें। क्योंकि दिमाग पर ज्यादा भार बढ़ने से आप ठीक तरह से काम नहीं कर पाएंगे। इस वजह से एकाग्रता की कमी होगी। नियमित रूप से योग और ध्यान करें ताकि मानसिक शांति मिले। बेवजह के विचार दिमाग में नहीं लाएं, कुशलता के साथ काम करें। अचानक कोई लाभ हो सकता है। प्रेमिका के साथ अच्छा वक्त बीताएंगे। नई ऊर्जा का संचार होगा। 
  5.  सिंह राशि--- मंगल ग्रह आपके 7वें भाव में संचरण कर रहा है। यह भाव जीवन साथी, व्यवसाय, साझेदारी और विदेशी संबंधों से संबंधित है। रिश्तों में तनाव होने से हताशा और परेशानी बढ़ेगी। इस दौरान जल्दबाजी में फैसला लेने से बचें। सड़क दुर्घटना की आशंका है इसलिए तेज गति से वाहन नहीं चलाएं। शांति और सद्भाव के साथ रहें। लोगों को सुनें और उनकी बातों और आचरण का आकलन कर उन्हें जवाब दें। हालांकि आपका स्वभाव उग्र और झगड़ालूु प्रवृत्ति का है, लेकिन अच्छी सोच की मदद से आप इससे छुटकारा पा सकते हैं। 
  6. कन्या राशि--- मंगल ग्रह आपके छठवें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर स्वास्थ, व्यवसाय और कठिन परिश्रम से संबंधित है। यह समय आपकी आजीविका और व्यवसाय के लिए बेहद अच्छा है क्योंकि आपको हर मोर्चे पर सफलता मिलेगी। जिस काम में आप हाथ डालेंगे, अच्छा करेंगे और उस पर आपको गर्व महसूस होगा। अपार सफलता की वजह से आप आसमान की बुलंदियों पर होंगे। हालांकि इस दौरान आप अहंकारी हो जाएंगे। सभी तरह के मुद्दों पर परिचर्चा में सफलता मिलेगी और कामयाबी आपके कदम चूमेगी। 
  7. तुला राशि-- मंगल आपके पांचवें भाव में प्रवेश कर रहा है। यह घर बुद्धि, विद्या और प्रेम संबंध आदि को दर्शाता है। इस गोचर के फलस्वरूप आपके अंदर आलस्य का भाव आएगा। इस दौरान कई अच्छे मौके मिलने की संभावना है लेकिन आलस्य की वजह से आप इन अवसरों से चूक जाएंगे। भौतिक सुख सुविधाओं को पाने की तीव्र इच्छा होगी। आमदनी बढ़ने के योग भी हैं। जो छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की योजना बना रहे हैं, वे अपनी योजना को कुछ वक्त के लिए टाल दें। मन में अचानक से घर की साज-सज्जा करने का विचार आएगा। कड़ी मेहनत के बाद भी अगर थोड़ा ही फल मिले तो निराश नहीं होयें, छोटी-छोटी सफलता में ही खुशी ढूंढने का प्रयास करें। जीवन में कुछ बड़ा करने की सोचिये। एक बात समझ लें कि, खुशियां बाहर मत ढूंढिये आपके घर में ही खुशियों का संसार बसा है। 
  8.  वृश्चिक राशि--- मंगल आपके चौथे भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपके प्रयास, कौशल और भाई-बहनों से संबंधित है। गोचर के दौरान आपके स्वभाव में उग्रता बढ़ेगी क्योंकि मंगल एक हठधर्मी स्वभाव का ग्रह है जिसका असर आपके व्यवहार पर पड़ेगा। हताशा बढ़ने से अचानक क्रोधित हो जाएंगे, इसलिए घर और ऑफिस में शांति और संयम के साथ काम लें। उग्र स्वभाव की वजह से परिवार में विवाद की स्थिति बन सकती है। हालांकि इस दौरान जीवन साथी आपकी भावनाओं को समझने की कोशिश करेगा। आय बढ़ेगी और आकर्षक लाभ होगा। जमीन और प्रॉपर्टी में निवेश करने की इच्छा होगी। शेयर बाजार से भी जबर्दस्त मुनाफे का योग है। 
  9.  धनु राशि--- मंगल आपके तीसरे भाव में गोचर कर रहा है। यह घर छोटे भाई-बहन, पराक्रम और धैर्य से संबंधित है। इस समय में जो भी परिस्थितियां बनेंगी आप खुद को उनमें ढाल लेंगे। गुण और कौशल में बढ़ोतरी होगी इसकी छाप आपके काम में देखने को मिलेगी। राह में कई चुनौतियां आएंगी लेकिन सभी बाधाओं को पार कर जीत आपकी ही होगी। छोटे भाई-बहन आपके जीवन में कई खुशियां लेकर आएंगे। कभी वे आपके मजबूत कंधे बनेंगे तो कभी अच्छे दोस्त। ऐसा कोई मामला जिसकी वजह से आप लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे हैं उसका समाधान हो जाएगा। कोर्ट-कचहरी से जुड़े मामलों में जीत के योग हैं। वे लोग जो काफी समय से यात्रा का मन बना रहे हैं उनकी ये कामना पूरी होगी। 
  10.  मकर राशि--- मंगल आपके दूसरे भाव में संचरण कर रहा है। यह घर भाषा, संचार, परिवार और आर्थिक पक्ष को दर्शाता है। मंगल के गोचर के दौरान कहासुनी और झगड़े हो सकते हैं। किसी खास व्यक्ति से विवाद होने की वजह से रिश्तों पर बुरा असर पड़ेगा। इस दौरान क्रोध पर नियंत्रण रखें। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। लोगों को बेवजह चिड़ाने और परेशान करने की कोशिश नहीं करें। जिस सोसायटी में आप रह रहे हैं वहां लोगों के प्रति विनम्रता का भाव रखें।
  11.  कुंभ राशि--- मंगल आपकी राशि में गोचर कर रहा है। यह समय आपके लिए थोड़ा मुश्किल होगा। इस दौरान स्वभाव उग्र रहेगा और क्रोध के चलते वाणी पर संयम नहीं रहेगा। मंगल के प्रभाव की वजह से आपका व्यवहार हठधर्मी रहेगा। आपके स्वभाव और कर्म के परिणाम स्वरूप आप दुखी हो सकते हैं। इसलिए परिस्थितियों को समझें और जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लें। किसी भी कीमत पर जोखिम उठाने का साहस नहीं दिखाएं, नहीं तो परेशानी हो सकती है। मंगल के प्रभाव से रचनात्मक और विनाशकारी दोनों तरह की ऊर्जा मिलेगी लेकिन यह आप पर निर्भर करता है कि इसका सही इस्तेमाल कैसे करा जाए। आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी लेकिन मंगल के प्रभाव के चलते अपनी राह से भटक या पीछे हट सकते हैं। कुल मिलाकर उग्र स्वभाव रहने की वजह से परेशानी उठानी पड़ेगी, हालांकि समझदारी और हालात को देखकर निर्णय लेने से आप इन परेशानियों से बच सकते हैं। 
  12.  मीन राशि-- मंगल आपके 12वें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपकी शैया सुख, अनिंद्रा, विदेश मामले और यात्रा से संबंधित है। आय में अचानक वृद्धि होगी और आप बेहिसाब तरीके से खर्च करेंगे। शक्ति और सामर्थ्य से आत्मविश्वास बढ़ेगा। इस दौरान मिलने वाले हर अवसर में सफलता प्राप्त करेंगे। विदेश यात्रा पर जाने के योग भी बन रहे हैं। सामाजिक जीवन में सुधार होगा,लोगों से मेल मिलाप बढ़ेगा। जीवन में आगे बढ़ने के लिए दोस्तों और अन्य लोगों से भरपूर सहयोग लें। किसी के मनोबल को ठेस पहुंचाने के बजाय उसका आत्मविश्वास बढ़ाएं। वे विरोधी जिन्होंने आपको नुकसान पहुंचाया था, उनको अपनी गलती का अहसास होगा। तनाव से बचने के लिए ज्यादा नहीं सोचें, बस काम पर अपना ध्यान दें।

ज्योतिष द्वारा जानिए की केसा हैं आपका मित्र...फ्रेंड या दोस्त

संसार में खून के रिश्ते ईश्वर बनाता है। ये रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें हम स्वयं नहीं चुन सकते, इन्हें स्वीकार करना हमारी नियति होती है, लेकिन एक रिश्ता ऐसा भी होता है, जो हम स्वयं बनाते हैं, वह रिश्ता है ‘मित्रता’ का। यह रिश्ता दो व्यक्तियों के मध्य समान विचारधारा, समान रुचियों के कारण बनता है। मित्रों, किसी भी जन्मपत्री में मुख्य रूप से मित्र का विचार पंचम भाव से किया जाता है तथा एकादश भाव से मित्र की प्रकृति एवं तृतीय भाव से मित्र से होने वाले हानि-लाभ का विचार किया जाता है। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक प्राणी किसी न किसी ग्रह, राशि व लग्न के प्रभाव में होता है और मित्रता जातक की कुंडली तय करती है। 
By-astrology-Friend-or-of-your-friend-ज्योतिष द्वारा जानिए की केसा हैं आपका मित्र...फ्रेंड या दोस्त        ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रहों में पांच प्रकार की मित्रता होती है। परम मित्र, मित्र, शत्रु, अधिशत्रु एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार तात्कालिक मैत्री। इसी प्रकार राशियों में भी आपसी मैत्री संबंध होते हैं। कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, द्वितीय, पंचम, सप्तम व एकादश भाव और बुध ग्रह प्रमुख रूप से मित्रता के कारक होते हैं। कुंडली का सीधा संबंध भाव, ग्रह व राशियों से होता है। तीनों प्रकार के संबंध जीवन की दिशा तय करते हैं। 
           पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार मनुष्य जीवन के सारे महत्वपूर्ण रिश्ते जन्म से मिलते हैं जो हमारे हाथ में नहीं होते है लेकिन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और करीबी रिश्ता जो हम बनाते हैं वह दोस्ती का रिश्ता होता है यह रिश्ता कब और किससे बनता है साथ ही आप और आपके दोस्त के आचार-विचार, रहन-सहन सब कुछ सितारों से बनते हैं इसलिए आपकी जन्मकुंडली, आपका लग्न व आपकी राशि बताती है कौन आपका सच्चा दोस्त होगा | 
        ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारी कुंडली में स्थित सभी नौ ग्रहों की भी आपस में मित्रता और शत्रुता होती है। इनके संबंधों का भी प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक प्राणी किसी न किसी ग्रह, राशि व लग्न के प्रभाव में होता है और मित्रता जातक की कुंडली तय करती है। ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रहों में पांच प्रकार की मित्रता होती है। परम मित्र, मित्र, शत्रु, अधिशत्रु एवं ग्रहों की स्थितिनुसार तात्कालिक मैत्री। इसी प्रकार राशियों में भी आपसी मैत्री संबंध होते हैं।
           कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, द्वितीय, पंचम, सप्तम व एकादश भाव और बुध ग्रह प्रमुख रूप से मित्रता के कारक होते हैं। कुंडली का सीधा संबंध भाव, ग्रह व राशियों से होता है। तीनों प्रकार के संबंध जीवन की दिशा तय करते हैं। उग्र व गर्म मिजाज.... दो विभिन्न व्यक्तियों, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी का आपसी संबंध राशियों के तत्व पर आधारित होता है। हमारा शरीर पंच तत्त्वों से बना है और 12 राशियां इन्हीं में से 4 तत्वों में विभाजित की गई है। अग्नि, भूमि, वायु (इसमें आकाश तत्व भी शामिल है) व जल। मेष, सिंह व धनु राशियां अग्नि तत्व प्रधान अर्थात ये उग्र व गर्म मिजाज वाली राशियां होती हैं। वृष, कन्या व मकर राशियां भूमि या पृथ्वी तत्त्व प्रधान होने के कारण धैर्यशाली व ठंडे मिजाज वाली, मिथुन, तुला व कुंभ राशियां वायु तत्त्व प्रधान होने के कारण अस्थिर चित्त व द्विस्वभाव वाली होती हैं।
 राशियों में गहरी मित्रता---- 
पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार कर्क , वृश्चिक व मीन राशियां जल तत्व प्रधान हैं। ये धीर-गंभीर व विशाल हृदया होती हैं। ज्योतिष के मुताबिक एक ही तत्व की राशियों में गहरी मित्रता होती है। पृथ्वी, जल तत्त्व और अग्नि, वायु तत्त्वों वाले जातकों की भी पटरी अच्छी बैठती है। अग्नि व वायु तत्त्व वालों की मित्रता भी होती है। लेकिन पृथ्वी, अग्नि तत्त्व, जल तथा अग्नि तत्व एवं जल तथा वायु तत्त्वों वाले जातकों में शत्रुता के संबंध होते हैं। तत्व के अलावा राशियों के स्वभाव पर भी मित्रता का असर होता है। राशियों के हिसाब से देखें तो स्वयं की राशि के अलावा मेष, सिंह व धनु राशि वालों की मित्रता मिथुन, तुला व कुंभ राशि वाले लोगों से होती है। वृष, कन्या व मकर राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, वृश्चिक व मीन राशि वाले लोगों से ज्यादा पटती है। सिर्फ राशियां ही नहीं ग्रहों की भी मित्रता में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नव ग्रहों में सूर्य-सिंह राशि, चंद्रमा-कर्क राशि, मंगल-मेष व वृश्चिक, बुध-मिथुन व कन्या, गुरु-धनु व मीन राशि, शुक्र-वृष व तुला तथा शनि-मकर व कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। शास्त्रों में इनमें नैसर्गिक मैत्री संबंध बताए गए हैं। 
            पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की जन्म कुंडली में मौजूद नवमांश कुंडली के अनुसार मनुष्य का आचरण या स्वभाव जाना जा सकता है । इस संसार में मोजुद प्राणियों में मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है । इसके चेहरे पर कुछ और होता है और अंदर मन मे कुछ और होता है ।। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मनुष्य के स्वभाव को जानना बहुत मुश्किल काम है । कुछ मनुष्य देखने मे बहुत सुंदर होते है लेकिन मन से बहुत काले कपटी और घमंड या ईगो तथा गंदगी से भरे होते है । इसको जानने के लिए किसी भी जातक की नवमांश कुंडली का प्रयोग करना चाहिए । 
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ज्योतिष अनुसार राशियां भी जिम्मेदार---- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार दो विभिन्न व्यक्तियों, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी का आपसी संबंध राशियों के तत्व पर आधारित होता है। हमारा शरीर पंच तत्वों से बना है और 12 राशियां इन्हीं में से 4 तत्वों में विभाजित की गई हैं। ‘अग्नि’ ‘भूमि’, ‘वायु’ (इसमें आकाश तत्व भी शामिल है) व जल। मेष, सिंह व धनु राशियां अग्नि तत्व प्रधान अर्थात ये उग्र व गर्म मिजाज वाली राशियां होती हैं। वृष, कन्या व मकर राशियां भूमि या पृथ्वी तत्व प्रधान होने के कारण धैर्यशाली व ठंडे मिजाज वाली, मिथुन, तुला व कुंभ राशियां वायु तत्व प्रधान होने के कारण अस्थिर चित्त व द्विस्वभाव वाली होती हैं। कर्क, वृश्चिक व मीन राशियां जल तत्व प्रधान हैं। ये धीर-गंभीर व विशाल हृदया होती हैं।
         पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार एक ही तत्व की राशियों में गहरी मित्रता होती है। पृथ्वी, जल तत्व और अग्नि, वायु तत्वों वाले जातकों की भी पटरी अच्छी बैठती है। अग्नि व वायु तत्व वालों की मित्रता भी होती है लेकिन पृथ्वी, अग्नि तत्व, जल तथा अग्नि तत्व एवं जल तथा वायु तत्वों वाले जातकों में शत्रुता के संबंध होते हैं। तत्व के अलावा राशियों के स्वभाव पर भी मित्रता का असर होता है। राशियों के हिसाब से देखें तो स्वयं की राशि के अलावा मेष, सिंह व धनु राशि वालों की मित्रता मिथुन, तुला व कुंभ राशि वाले लोगों से होती है। वृष, कन्या व मकर राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, वृश्चिक व मीन राशि वाले लोगों से ज्यादा पटती है। 
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दोस्ती पर पीले रंग का प्रभाव---
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार पीला रंग शुभ चीज़ों और मंगल कार्यों से संबंध रखता है. ज्योतिष में इसे बृहस्पति का रंग माना जाता है. पीले रंग का संबंध दोस्ती से है, लेकिन रोमांस से नहीं. वैसे ज्योतिष कहता है कि दोस्ती को प्रेम में बदलने के लिए पीले रंग का प्रयोग लाभकारी है. वैवाहिक जीवन में पीले रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए. बेडरूम में भी पीले रंग का प्रयोग सामान्य रूप से नहीं करना चाहिए. हां, संतानहीन हों तो कुछ समय के लिए पीले रंग की बेडशीट बिछाएं और बेडरूम में पीले रंग के पर्दों का भी प्रयोग करें || 
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दोस्ती में होता है ग्रहों का बोलबाला --- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार सिर्फ राशियां ही नहीं, ग्रहों की भी मित्रता में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नवग्रहों में सूर्य-सिंह राशि, चंद्रमा-कर्क राशि, मंगल-मेष व वृश्चिक, बुध-मिथुन व कन्या, गुरु-धनु व मीन राशि, शुक्र-वृष व तुला तथा शनि-मकर व कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। शास्त्रों में इनमें नैसर्गिक मैत्री संबंध बताए गए हैं। इसके अलावा ग्रहों में तात्कालिक मैत्री भी होती है, जो इनकी कुंडली में स्थिति के अनुसार होती है जैसे मंगल व शनि कुंडली में एक साथ बैठे हों तो इनमें तात्कालिक मैत्री संबंध होते हैं। मोटे तौर पर हम ग्रहों की तीन प्रकार-मित्रता, शत्रुता व साम्यता के बारे में जानकारी लेते हैं। 
 आइए देखें ग्रहों के नैसर्गिक मैत्री संबंध क्या हैं :--- 
  1. सूर्य :--- सूर्य के चंद्रमा, मंगल व गुरु मित्र होते हैं। शनि-शुक्र शत्रु व बुध से साम्यता के संबंध हैं। इस प्रकार सिंह राशि वाले की मित्रता मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु व मीन राशि वालों से व मकर, कुंभ, वृष व तुला वाले लोगों से शत्रुता होती है। सूर्य तेज व अधिकारिता के स्वामी हैं अत: इनकी चाहत रखने वाले से मैत्री संबंध व शनि व शुक्र क्रमश: सेवा व आराम पसंद होते हैं इसलिए इनसे शत्रुता होती है। 
  2. चंद्र :--- चंद्र ग्रह के अधिकांश ग्रह मित्र होते हैं परंतु बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतू इन्हें पसंद नहीं करते। बुध, शुक्र, गुरु, शनि मित्र व सिर्फ मंगल से शत्रुता होती है। चंद्रमा जल प्रधान व मंगल अग्नि तत्व प्रधान होते हैं। जाहिर है कि आग और पानी में मित्रता नहीं हो सकती। 
  3. मंगल :--- मंगल के मित्र शनि व सूर्य होते हैं। चंद्र व गुरु से साम्यता व शुक्र व बुध से शत्रुता के संबंध होते हैं। इस प्रकार मेष व वृश्चिक राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, धनु व मीन से तथा वृष, तुला, मिथुन व कन्या राशि से शत्रुता होती है। 
  4. बुध :--- इस ग्रह के सूर्य, गुरु व चंद्र मित्र होते हैं। शनि से इनकी शत्रुता होती है। इस प्रकार मिथुन व कन्या राशि वाले लोगों की मित्रता सिंह, कर्क, धनु व मीन राशि के लोगों से होती है। मकर व कुंभ राशि से असामान्य संबंध होते हैं। 
  5. गुरु :-- गुरु के मंगल, चंद्र, शनि मित्र व शुक्र तथा बुध से शत्रुता होती है। इस प्रकार धनु व मीन राशि के लोगों की मेष, वृश्चिक, कर्क, मकर व कुंभ से मित्रता तथा वृष, तुला व मिथुन, कन्या से शत्रुतापूर्ण संबंध होते हैं। गुरु स्वयं मर्यादा में रहना सिखाते हैं जबकि बुध व शुक्र दोनों ही आदतन इससे दूर रहने वाले होते हैं। 
  6. शुक्र :-- इसके गुरु, सूर्य मित्र व मंगल शत्रु होते हैं। इस प्रकार शुक्र की राशि वृष व तुला वाले लोगों की मित्रता, सिंह, धनु व मीन राशि वालों से तथा मेष व वृश्चिक राशि के लोगों से शत्रुतापूर्ण संबंध होते हैं। चंद्रमा, बुध व शनि के साथ इनके समानता के संबंध होते हैं। 
  7.  शनि :--- इस ग्रह की गुरु, चंद्र, मंगल से मित्रता व शनि सूर्य से शत्रुता रखते हैं। अत: मकर व कुंभ राशि वाले लोगों की मित्रता मेष, वृश्चिक, कर्क, धनु व मीन राशि के लोगों से होती है। सिंह राशि के लोगों से मित्रता नहीं होती है। 

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ज्योतिष के अनुसार मैत्री के प्रमुख भाव ---- 
पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार मित्रता का प्रमुख भाव एकादश भाव है जो आय भाव भी है जिसके जितने अच्छे मित्र होंगे, आय भाव उतना ही मजबूत होगा। अन्यथा कमजोर होगा। इस भाव में यदि सूर्य हो तो ऐसे जातक की उच्च पदासीन, सत्तासीन व राजनीतिक लोगों से मित्रता होगी। चंद्रमा इस भाव में होने पर मित्र कलाकार, वायुयान चालक, जहाज के कैप्टन, नाविक आदि मित्र होंगे। यदि एकादश भाव में मंगल है तो मित्र खिलाड़ी, पहलवान, कुक आदि प्रकृति के लोग होंगे व बुध इस भाव में होने पर व्यावसायिक वृत्ति के लोग, गुरु इस भाव में होने पर बैंकिंग, वित्त धार्मिक आस्था, दार्शनिक आदि मित्र होंगे। 
        शुक्र इस भाव में होने पर अभिनय क्षेत्र, स्त्री जातक, कलाकार आदि मित्रों की संख्या अधिक होगी। शनि एकादश भाव में होने पर नौकरी पेशा, सेवावृत्ति, अपनी आयु से अधिक उम्र वाले लोगों से मैत्री संबंध होते हैं। यदि इस भाव में राहु या केतू हो तो ऐसे व्यक्ति के छद्म मित्रों व अपनी जाति से इतर लोगों से मित्रों की संख्या अधिक होती है। वह अपने लोगों से दूर-दूर रहता है।
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जानिए बुध ग्रह और दोस्ती/मैत्री /फ्रेंडशिप का सम्बन्ध --- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार बुध को मित्रता का नैसर्गिक ग्रह माना जाता है। इस प्रकार बुध इन भावों से संबंध बना ले, तो जातक के जीवन में मित्रों की संख्या अधिक होती है। इन भावों तथा बुध के अतिरिक्त जब किन्हीं दो जातकों के राशि स्वामी, लग्न स्वामी, नक्षत्र स्वामी आदि एक ही हो जाएं अथवा उनमें मित्रता हो, तो उन जातकों के मध्य मित्रता होना स्वाभाविक है। 
  •  ---पंचम भाव में यदि दो या उससे अधिक पाप ग्रह स्थित हों या उसे देखते हों, तो जातक के जीवन में मित्रों का सुख नहीं होता। पंचमेश यदि पंचम, नवम, एकादश अथवा तृतीय भाव में स्थित हो और उसको पाप ग्रह नहीं देखते हों और न ही युति करते हों, तो जातक को मित्रों का सुख होता है। 
  • ---एकादश तथा पंचम भाव के स्वामी यदि युति करते हुए त्रिकोण या केंद्र भावों में स्थित हो, तो जातक की मित्रता श्रेष्ठ व्यक्तियों से होती है। यदि तृतीयेश की स्थिति शुभ हो, तो उसे मित्रों से लाभ भी होता है। 
  • ----तृतीयेश यदि बली तथा शुभ ग्रहों से युक्त होकर शुभ स्थानों में स्थित हो अथवा तृतीयेश का शुभ संबंध पंचमेश या एकादशेश से हो जाए, तो तत्सम्बन्धी ग्रह की राशि वाले जातकों की मित्रता से उसको अधिक लाभ की प्राप्ति होगी। 
  • ----बुध एवं मंगल पंचम भाव के विशेष योगकारी ग्रह हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में बुध अथवा मंगल योगकारी अथवा मित्रक्षेत्री होकर पंचम में स्थित हों, तो उस जातक के जीवन में मित्रों की कमी नहीं होती है। 

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पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार जानिए अपनी जन्म कुंडली अनुसार कौन सा ग्रह किस दूसरे ग्रह का मित्र, शत्रु तथा सम (न मित्र और न शत्रु) है---- 
  • --- सूर्य ग्रह की मित्रता चंद्र, मंगल और गुरु से है, शुक्र तथा शनि से इसकी शत्रुता है और बुध ग्रह से सम भाव है। ---- चंद्र के बुध, सूर्य मित्र हैं। मंगल, शुक्र, शनि तथा गुरु समय है। 
  • --- मंगल ग्रह के सूर्य, चंद्र और गुरु मित्र हैं, बुध शत्रु है और शुक्र तथा शनि से इसका सम भाव है। 
  • --- बुध ग्रह की मित्रता सूर्य तथा शुक्र मित्र हैं, चंद्र शत्रु है और मंगल गुरु तथा शनि सम है। 
  • --- गुरु की मित्रता सूर्य, चंद्र और मंगल से है। कुछ ज्योतिष के विद्वान गुरु और चंद्र एक-दूसरे को शत्रु भी मानते हैं। 
  • --- शुक्र के बुध और शनि मित्र हैं, सूर्य और चंद्र शत्रु हैं तथा मंगल और गुरु समय हैं। 
  • ---- शनि ग्रह बुध और शुक्र से मित्रता रखता है जबकि सूर्य, चंद्र, मंगल को शत्रु मानता है। गुरु से सम भाव है। ---राहु और केतु छाया ग्रह माने जाते हैं, विद्वानों के अनुसार राहु और केतु दोनों शुक्र और शनि से मित्रता रखते हैं एवं सूर्य, चंद्र मंगल तथा गुरु इन चारों ग्रह से शत्रुता रखते हैं। बुध इन दोनों ग्रहों से सम भाव रखता है। 
  • ---सूर्य, चंद्र, मंगल और गुरु ये चारों ग्रह राहु तथा केतु से शत्रुता मानते हैं जबकि शुक्र और शनि राहु-केतु के मित्र हैं। बुध इन दोनों से सम भाव रखता है। 
  • --जेसे यदि किसी जातक की कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह शुभ हो और नवमांश मे नीच या अशुभ हो या 6,8,12 मे बैठा हो तथा शनि राहू केतू से पीड़ित हो तो जातक बाहर से सुंदर तथा अंदर से काला होता है । 
  •  ----- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह शुभ हो और नवमांश मे भी शुभ हो तथा शुभ ग्रहों से युति या दृष्टि मे हो तो ऐसा जातक बाहर से भी सुंदर और अंदर से भी सुंदर होता है । 
  •  ---- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह क्रूर या पापी हो तथा नवमांश मे शुभ दृष्टि हो या शुभ राशि मे या वर्गोत्तम हो तो ऐसा जातक बाहर से कुरूप या स्पष्टवादी तथा अंदर से भी सुंदर होता है । 
  • ----- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह क्रूर या पापी हो और नवमांश मे भी पापी नीच या 6,8,12 मे हो या अशुभ राशि मे हो तो ऐसा जातक बाहर से भी कुरूप तथा अंदर से भी कुरूप और गंदगी से भरा होता है ।

कैसा रहेगा आपकी राशि का भविष्यफल 2016 में

   निश्चित रूप से आप ने कभी ना कभी खुद से जरूर पूछा होगा, क्या यह हो सकता है कि आप इस वर्तमान स्थिति के बजाय किसी और स्थिति में होते ? क्या आपने कभी सोचा है कि कोई उच्च शक्ति आप के जीवन को दिशा दे रही हैं। राशिफल प्राचीन समय से आपको दिशा देता आ रहा है और आपके भविष्य को सामने लता हैं, चाहे वो अच्छा हो या बुरा । 
know-How-about-your-Predictions-in-2016-yearly-horroscope-कैसा रहेगा आपकी राशि का भविष्यफल 2016 में         अपने भविष्य को बदलना शयद संभव न हो पर अपने भविष्य की घटनाओ के लिए तैयार रहना जरूरी हैं । पृथ्वी अनंत ब्रह्मांड के माध्यम से सैकड़ो सितारों के निकट संपर्क में हैं , इसीलिए वह आपस में काफी जुड़े हुए हैं । अगर सभी ग्रह संतुलित हैं तो आपका जीवन , व्यवसाय , स्वास्थ्य इत्यादि सभी कुछ अच्छा रहेगा । यदि ग्रह सन्तुलनत में नहीं है तो ये सभी कुछ मुश्किल हैं । यदि आप को इन आने वाली घटनाओ के बारे में पहले से जानकारी नही होगी तो शायद आप इन से निपटने के लिए सही ढंग से तैयार नही रहेंगे । 
       वर्ष 2016 में अपने जीवन में आने वाले किसी भी प्रकार के आश्चर्य से सावधान रहने के लिए, अपनी कुंडली 2016 को जानिए । अनिश्चित भविष्य के बारे में अनुमान लगाना भूल जाइये । हर राशिचक्र में कुछ विशिस्ट लक्षण और गुण होते है जो आपके जीवन की दिशा तय करते हैं । राशिफल इन सभी गुणो को ध्यान में रखकर बनाया जाता हैं । अपने भविष्य को बदलने की चेष्टा तभी की जा सकती है जब आपको उसके बारे में पूर्वानुमान हो। अपनी कुंडली 2016 आपको वह अनुमान लगाने की क्षमता दे सकता हैं । आप जान सकते हैं, आपके जीवन में वह सुनहरे अवसर कब आएंगे जब आप व्यसाय और निजी जीवन में बेहतर कर सकते है। आपको मालूम होग कब आप को अपने शरीर और स्वास्थ्य के विषय में अधिक सतर्क रहने की जरूरत हैं । 
          ज्योतिषानुसार भविष्य जानने का सबसे सटीक तरीका राशिफल होता है। माना जाता है कि राशिफल द्वारा जीवन की कई घटनाओं के विषय में आप पूर्वानुमान लगा सकते हैं। तो चलिए के द्वारा आप भी जान लीजिए वर्ष 2016 आपके लिए कैसा रहेगा।आपि राशि के राशिफल 2016 के द्वारा आप अपने प्यार, व्यापार, कारोबार और स्वास्थ्य आदि के बारे में जान सकते हैं। हर कोई चाहता है अपने आने वाले कल को जानना, समझना। इसलिए में लेकर आया हूँ आपके आने वाले कल का भविष्यफल। भविष्य की गुत्थी को सुलझाने के लिए अभी पढ़ें राशिफल 2016... 
  1.  2016 का मेष राशिफल---- यह साल आपको ढेरों ख़ुशियाँ देेने वाला होगा। कारोबार से अच्छी आमदनी होगी, लेकिन इसमें थोड़ी देर भी हो सकती है। यदि आप कारोबारी हैं तो खुले हाथ पैसे ख़र्च करने और निवेश करने में एहतियात बरतें। शेयर बाज़ार में भी पैसे लगाने से परहेज़ करें। पारिवारिक कलह से थोड़ी परेशानी हो सकती है, लेकिन ख़ुद को इससे दूर रखने की कोशिश करें। यह वर्ष प्रेम-संबंधों के अनुकूल नहीं है, भरपूर शारीरिक सुख भी मिलने की संभावना कम है। इस वर्ष ‘बिन बुलाए बराती’ न बनें यानि बिना मतलब के झगड़ों में न पड़ें, इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, उल्टा नुक़सान ही होगा। अच्छे दिनों की शुरूआत अगस्त माह के बाद होगी, लेकिन पूरे वर्ष सावधान रहना आपके लिए हितकर होगा।वैदिक ज्योतिष के मुताबिक़ आपके लिए यह वर्ष मिला-जुला परिणाम देने वाला है। गृहस्थ जीवन को लेकर कुछ तनाव हो सकता है, हालाँकि पेशेवर ज़िन्दगी में सफलता आपके क़दमों को चूमेगी। लेकिन आपको ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीें हैं, ख़ुशियाँ धीरे-धीरे ही मिलेंगी। यदि क़ारोबारियों की बात करें, तो इस समय किसी भी प्रकार का निवेश न करना ही ठीक होगा। शेयर बाज़ार से दूर ही रहें तो बेहतर होगा। अनावश्यक रूप से पैसे ख़र्च करने की आदत को नियंत्रित करना बेहद ही ज़रूरी है। संभव है कि प्रेम-संबंधों में कुछ ख़ास रोचकता न रहे और भरपूर यौन-सुख भी प्राप्त नहीं हो। बेकार की बातोंं पर ध्यान न दें तो ही अच्छा है। हमेशा आवेश में रहने की आदत आपको नुक़सान पहुँचा सकती है। ज़िन्दगी में रौनक अगस्त माह के बाद ही आएगी, लेकिन पूरे साल सतर्क रहने की आवश्यकता है...यह वर्ष आपको विभिन्न प्रकार के मिश्रित फल देने वाला है, कुछ मीठे होंगे तो कुछ खट्टे भी हो सकते हैं। यह समय इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि पारिवारिक रिश्तों में सामंजस्य स्थापित करने में की कुछ दिक्कतें आ सकती है, लेकिन चिन्ता करने की कोई ख़ास बात नहीं है, यदि आप कोशिश करेंगे तो इसे संभालने में सफल रहेंगे। आर्थिक स्थिति की बात करें तो यह मुनाफ़ा देने वाला और आशाजनक परिणाम देने वाला होगा। लाभ की प्राप्ति में थोड़ी देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं। कारोबारी इस समय अत्यधिक निवेश करने और ख़र्च करने से परहेज़ करें। स्टॉक मार्केट से दूर ही रहें तो बेहतर होगा, क्योंकि लाभ होने की संभावना न के बराबर है। रिश्तों के बीच प्यार की अहमियत को समझें। यह समय अपने प्यार को बेहतर समझने और उस पर ध्यान देने वाला है, तथा यह आपके रोमांटिक एवं यौन जीवन के यह लिए ज़रूरी भी है। अपने प्रिय के साथ भरपूर समय बिताएँ, वरना रिश्तों का आनंद उठाने से वंचित रह जाएंगे। अगस्त महीने के बाद आपके सितारे बदलने वाले हैं, लेकिन सतर्कता पूरे साल ज़रूरी है। अतः अपने बेहतर कल की तैयारी में जी-जान से जुट जाएँ। 
  2.  2016 का वृषभ राशिफल---- ख़ुशियों की सौगात लिए नया साल आपका इंतज़ार कर रहा है। जीवनसाथी से पूरे साल ख़ुशियाँ मिलेंगी। नौकरी पेशा लोगों के लिए साल का कुछ समय परेशानियों भरा हो सकता है, जबकि व्यापारियों को बेहतर लाभ होगा। आपका प्रेम-संबंध एक नए मुक़ाम पर पहुँचेगा, जो पूरे साल आपको प्रफुल्लित करेगा। आपकी कामोत्तेजना अनैतिक संबंधो के लिए बाध्य कर सकती है और आपको असहाय भी बना सकती है। अपनी भावनाओं पर क़ाबू रखना आपके लिए हितकर होगा। यह वर्ष आपको एक नई ऊँचाई पर ले जाने वाला होगा।सितारे कहते हैं कि वृषभ राशि के लिए यह साल ख़ुशियोंं भरा रहेगा। यदि जीवनसाथी के साथ सच्चा प्यार और स्नेह है, तो सब कुछ निर्बाध रूप से चलेगा। इस वर्ष आपका वैवाहिक जीवन आनंदमय रहेगा और आप अपने प्रिय के साथ सुखमय पल बिताएंगे। नौकरीपेशा लोगों को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। क़ारोबारियों को तत्काल मुनाफ़ा नहीं होगा, लेकिन धीरे-धीरे अवश्य होगा। प्रेम-संबंधो में प्रगाढ़ता आएगी, जो आपको पल-पल आनंदित करेगी। जितना ज़्यादा आप अंदर से ख़ुश रहेंगे, उतने ही आप सफल भी होंगे। प्रेमी के प्रति आपकी उदासीनता कुछ ऐसे रिश्तों की ओर इशारा कर रही है, जो उचित नहीं मालूम होते हैं। निजी प्रेम-संबंधों से भटकाव होने के कारण ऐसा हो सकता है। हालाँकि आप काफ़ी समझदार हैं। अवांछित संबंधों से दूरी बनाकर रहें तो बेहतर होगा। यह साल आपके लिए आर्थिक रूप से मददगार साबित होगा। 
  3.  2016 का मिथुन राशिफल---- आपके लिए यह साल सर्वोत्तम सालों में से एक साबित होगा। जीवनसाथी के साथ रिश्तों में प्रगाढ़ता आएगी, लेकिन जीवनसाथी के बेरूखी के कारण रिश्तेदारों से कुछ अनबन भी हो सकती है। इस बीच सेहत का ख़याल रखना भी ज़रूरी है, जैसे कहा भी गया है- ‘हेल्थ इज़ वेल्थ’, अर्थात् स्वास्थ्य ही धन है। इसके लिए खानपान पर ध्यान दें और व्यायाम करें। आय में कमी रहने की संभावना है, अतः ज़रूरी जगहों पर ही पैसे ख़र्च करें और कर्ज़ लेने से भी पूरी तरह परहेज़ करें। यह साल कारोबारियों को बेहतर मुनाफ़ा देने वाला होगा। प्रेम-संबंधों में पूरे साल मधुरता क़ायम रहेगी।ग्रहों की चाल बताती है कि इस साल का ज़्यादातर भाग आपके अनुकूल रहेगा। प्यार और स्नेह के कारण जीवनसाथी के क़रीब रहेंगे, जो कि आप दोनों के सामंजस्य पर भी निर्भर करता है। जीवनसाथी का संबंध रिश्तेदारों के साथ मधुर रहेगा। स्वास्थ्य के प्रति गंभीर रहें, पौष्टिक आहार लें और व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें; कहा भी गया है - ‘स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है’। ख़र्चों पर नियंत्रण रखें, क्योंकि आय में थोड़ी कमी रहने की संभावना है। आर्थिक संकटों से बचने के लिए कर्ज़ लेने से परहेज़ करें, ऐसे समय में कुछ लोग व्याकुल होकर अवैध रास्तों का चुनाव करते हैं जो कि कदापि उचित नहीं है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार 2016 व्यापारियों के लिए मुनाफ़े वाला वर्ष साबित होगा। प्रेम-संबंधों में मधुरता आएगी। कुछ सामान्य दिक़्क़तों को छोड़कर यह साल आपके लिए कुछ ख़ास कष्टप्रद नहीं है।
  4.  2016 का कर्क राशिफल---- व्यक्तिगत तौर पर यह वर्ष आपके लिए सौगातों की बौछार करने वाला है, लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि आप दूसरे लोगों और रिश्तेदारों की अच्छाई के लिए सोचें। स्वास्थ्य का ख़याल रखना भी ज़रूरी है, पुरानी बीमारी आपको फिर से परेशान कर सकती है। किसी ग़ैर के उपर विश्वास करना आपके लिए घातक हो सकता है। धन संबंधी मामलों में भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। कुछ लोग आपके विरूद्ध षड्यन्त्र भी रच सकते हैं। नौकरी बदलने के लिए यह वर्ष सर्वथा उपयुक्त है। आपके ऊपर नए कार्य की ज़िम्मेदारी भी आ सकती है। वेतन में वृद्धि होने की प्रबल संभावना है। अपने प्यार के लिए आप किसी भी परंपरा को तोड़ सकते हैं, चाहे वह कोई सामाजिक परंपरा ही क्यों न हो। हालांकि यह वर्ष प्रेम-संबंधों के लिए काफ़ी अनुकूल है, लेकिन साथ में कामोत्तेजना पर काबू रखना भी ज़रूरी है।वर्ष कुंडली के अनुसार कर्क राशि वाले निजी ज़िन्दगी का भरपूर आनंद उठाएंगे, हालाँकि मुमकिन है कि परिवार के सभी सदस्यों के साथ संबंध अच्छे न रहेें। स्वास्थ्य को लेकर सावधान रहने की आवश्यकता है, किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आने की संभावना है। आमदनी के प्रति भी सावधान रहें। वित्तीय मामलों में किसी के ऊपर आँख मूंदकर विश्वास करना आपके लिए घातक हो सकता है। अपने आँख और कान को खोलकर रखें; कुछ लोग आपके ख़िलाफ़ साज़िश भी रच सकते हैं। नौकरी बदलने के लिए यह साल सर्वोत्तम है, अतः इसके लिए प्रयासरत रहें। इस राशि के कुछ जातकों को नई ज़िम्मेदारी भी मिल सकती है और वेतन में भी वृद्धि होने के आसार हैं। कर्क राशि के कुछ जातक प्यार की ख़ातिर सामाजिक बंधनों को भी तोड़ सकते हैं। इस वर्ष अपनी काम-ऊर्जा पर नियंत्रण रखना आपके यौन-जीवन के लिए बेहतर साबित होगा। 
  5.  2016 का सिंह राशिफल----- यह वर्ष आपकी सफलता के सारे द्वार खोलेगा। जीवनसाथी और रिश्तेदारों के साथ मधुर संबंध बरक़रार रहेंगे। गरिष्ठ आहार और मदिरासेवन से परहेज़ करना आपको कई सारी बीमारियों से बचा सकता है, जैसे - मोटापा। इस वर्ष लक्ष्मी आपके ऊपर मेहरबान रहेंगी। नौकरीपेशा वाले लोग और कारोबारियों को धन की कमी नहीं रहेगी। आर्थिक रूप से यह वर्ष सुनहरा साबित होगा। चारों तरफ़ से शोहरत हासिल होगी। मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। अविवाहितों को विवाह के प्रस्ताव मिलेंगे तथा प्रेम-संबंधो में आश्चर्यजनक मधुरता देखने को मिलेगी। यौन जीवन का बेहतर सुख प्राप्त होगा और पूरा साल आनंद के साथ गुज़रेगा।वर्षफल के मुताबिक़ आपके लिए यह साल किसी उपहार से कम नहीं है। आपके जीवन का हर एक पहलू सही दिशा से होकर गुज़रेगा। जीवनसाथी और क़रीबियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रहेंगे। सेहत की बात करें तो वजन बढ़ सकता है। इसे नियंत्रित करने की कोशिश करें, रोग-रहित काया के लिए भारी आहार लेने से परहेज़ करें। शराब से दूरी बनाना आपकी सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। यदि आपकी आर्थिक स्थिति की बात करें, तो यह काफ़ी हद तक ठीक-ठाक रहने वाली है। धन में वृद्धि के साथ-साथ जमा-पूँजी में भी बढ़ोत्तरी होगी। आप चाहे कहीं नौकरी करते हों या ख़ुद का क़ारोबार हो, मुनाफ़े का होना हर हाल में सुनिश्चित है। पेशेवर ज़िन्दगी में प्रसिद्धि मिलेगी। 2016 के राशिफल के अनुसार प्रेम-संबंधों में भी सुधार नज़र आ रहा है। अविवाहित लोगों के हाथ इस वर्ष पीले हो सकते हैं। यौन-जीवन में भी चार-चांद लगने वाला है तथा शारीरिक सुख भी प्राप्त होगा। जीवनसाथी के साथ अंतरंग क्षणों का आनंद लेंगे। 
  6.  2016 का कन्या राशिफल--- पूरा वर्ष तो संतोषजनक रहेगा, लेकिन जीवनसाथी से रिश्तों के बीच थोड़ी दूरियाँ बढ़ने की संभावना है। परिवार से विवाद भी हो सकता है। सेहत को लेकर चिंताएँ हो सकती हैं, अतः इसके प्रति सतर्क रहें और खान-पान पर विशेष ध्यान दें। बृहस्पति के बारहवें घर में बैठे होने के कारण कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है तथा लक्ष्मी भी आपसे नाराज़ हो सकती हैं। पूरे वर्ष बृहस्पति आपके ऊपर अपना प्रभाव डालेगा। बिज़नेसमैन को कुछ ख़ास मुनाफ़ा नहीं होगा, लेकिन अगस्त के बाद आपके अच्छे दिनों की शुरूआत ज़रूर होगी। नौकरी पेशा वालों पर इसका कुछ ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। संगी-साथियों के साथ रिश्ते अच्छे रहेंगे, लेकिन इसके लिए अपनी मानसिकता को बदलने की ज़रूरत है।दुर्भाग्यवश, जीवनसाथी के साथ संबंधों में मधुरता की कमी रह सकती है। परिजनों के साथ भी नोेंक-झोंक होने की ज़्यादा संभावना है। ज़िन्दगी का हर एक पहलू आपको परेशानी देने वाला हो सकता है; सेहत भी प्रभावित हो सकती है। सेहत का ख़याल रखना आपके हाथ में है, इसलिए इसके प्रति गंभीर रहें। वित्त से संबंधित कुछ नुक़सान होने की संभावना है। बृहस्पति के बारहवें घर में मौजूद होने के कारण परेशानियाँ और भी बढ़ सकती है। अगस्त तक अपनी महत्वाकांक्षाओं पर क़ाबू रखें। इसके बाद का समय आपके हित में होने वाला है। हालाँकि, यदि आप नौकरी-पेशा नहीं हैं, तो ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होगी। प्रेम-संबंधों की बात करें तो यह वास्तव में बेहतर समय रहेगा, यदि आप अपने विचारों पर नियंत्रण रखते हैं तो। 
  7.  2016 का तुला राशिफल---- संयुक्त परिवारों में मतभेद हो सकता है लेकिन छोटे परिवार की स्थिति बेहतर रहेगी, यानि ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ वाली पंक्ति सार्थक होगी। जीवनसाथी के ऊपर विश्वास करना फ़ायदे का सौदा होगा। कुछ लोगों के अपने पार्टनर के साथ रिश्ते ख़राब हो सकते हैं। बच्चों की देखभाल को लेकर थोड़ी चिंता हो सकती है। नौकरी पेशा लोगों के लिए यह वर्ष बहुत ही अच्छा है, लेकिन कारोबारियों के लिए थोड़ा मुश्किल भरा वक़्त हो सकता है। 11 अगस्त के बाद आपको ऐसा महसूस हो सकता है कि आपकी स्थिति पहले से ख़राब होती जा रही है। अप्रत्याशित व्यय होने की भी संभावना है। लोगों के साथ बातचीत करते वक़्त सतर्कता बनाएँ रखें। प्रेम-संबंधों में अनावश्यक रूप से समय बर्बाद न करें, जीवनसाथी के साथ बेहतर तालमेल आपको ज़िम्मेदार पार्टनर के रूप में साबित करेगा। यौन सुखों के लिए शरीर को दाँव पर न लगाएँ।तुला राशि के ऐसे जातक जिनका संयुक्त परिवार है, उनके परिजनोंं के बीच आपसी सौहार्द की कमी रहेगी। वहीं दूसरी तरफ़ छोटे परिवारों में ख़ुशी का माहौल रहेगा, यानि इस मामले में ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ की बात सही साबित होगी। अपने जीवनसाथी के ऊपर किसी प्रकार का शक़ न करें तो बेहतर होगा। इस साल तुला राशि के कुछ जातकों का पारिवार से संबंध ख़राब हो सकता है। यदि संतान की बात की जाए तो वे आपको थोड़ी परेशानी दे सकते हैं। नौकरीपेशा लोगों के लिए समय बेहतर है, लेकिन क़ारोबारियों को अपने क़ारोबार में कुछ परेशाानियों का सामना करना पड़ सकता है। 11 अगस्त के बाद आपके बेहद ही अच्छे दिन आने वाले हैं। हालाँकि, अचानक से ख़र्च भी बढ़ने की संभावना है। पैसों के लेन-देन में सावधानी बरतें, अन्यथा परेशानियाँ बढ़ सकती हैं। प्रेम-संबंधों में भी संयम बरतने की आवश्यकता है। जीवनसाथी के साथ ताल-मेल बिठाकर चलने की ज़रूरत है। शारीरिक सुख के साथ शरीर का ख़याल रखना भी ज़रूरी है। 
  8.  2016 का वृश्चिक राशिफल---- जैसे पानी और मछली का रिश्ता अटूट होता है, ठीक वैसे ही आपको भी अपने जीवनसाथी के साथ अटूट सामंजस्य स्थापित करना होगा। व्यक्तिगत तौर पर कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अच्छे भविष्य के लिए पिता का सहयोग प्राप्त होगा। बच्चों का मनोभाव आपको बेचैन कर सकता है। अपने कार्यों में किसी तरह की कोताही न बरतें, आलस्य का परित्याग करें, वरना मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अगस्त तक धन को संंचित करना फ़ायदेमंद रहेगा, परंतु इस महीने के बाद निवेश किया जा सकता है। हालाँकि प्यार के इज़हार में देर करना किसी को शायद ही पसंद हो, लेकिन आपको इसके लिए अगस्त तक का इंतज़ार करना होगा, वरना आप किसी शक़ के घेरे में आ सकते/सकती हैं। यौन सुखों का भरपूर आनंद मिलेगा लेकिन उचित दूरी बनाकर रहना फ़ायदे का सौदा हो सकता है।इस वर्ष वृश्चिक राशि वालों को जीवनसाथी के साथ सामंजस्य बना कर चलना होगा। निजी ज़िन्दगी में लगातार उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। बच्चों का व्यवहार आपको कुछ हद तक तनाव दे सकता है। आलस्यपूर्ण रवैया अपनाने से परहेज़ करें। आमोद-प्रमोद और मनोरंजन में समय बिताने के कारण आपके कार्यों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। धन को सुरक्षित रखें और अगस्त तक जितना ज़्यादा हो सके, पैसे संचित करने का प्रयास करें। इस महीने के बाद ही निवेश करना उचित होगा। यदि प्रेम-संबंधों की बात करें तो इसमें धैर्य से काम लें तथा आपसी रिश्तों के बीच किसी तरह के शक़ को पैदा न होने दें। अगस्त तक प्रेम-संबंधों के प्रति सावाधान रहने की आवश्यकता है। वैवाहिक जीवन और शारीरिक सुखों का भरपूर आनंद मिलेगा। हालाँकि इससे दूरी बनाना आपके लिए बेहतर होगा। 
  9.  2016 का धनु राशिफल---- परिवार और भाई-बहनों के साथ तक़रार होने की संभावना है। यदि आप किसी पुरानी बीमारी से ग्रसित हैं तो इस समय स्वास्थ्य का ख़याल रखना आपका परम कर्तव्य होना चाहिए। खान-पान पर भी ध्यान दें तथा दूषित पदार्थ खाने से परहेज़ करें। नौकरीपेशा लोगों के लिए यह साल आशाजनक परिणाम देने वाला होगा और अगस्त के बाद का समय आपको नई बुलंदियों पर ले जाएगा। अपने व्यवहार में संयम बरतें, वरना अनावश्यक रूप से किसी झमेले में फँस सकते हैं। संबंधों को बिगाड़ने से बेहतर है कि उसे सुदृढ़ बनाने की कोशिश करें। आर्थिक स्थितियों में स्थिरता आएगी। आपके ख़िलाफ़ साज़िश रची जा सकती है, अतः सतर्क रहें। कारोबारी अवैध कार्यों से दूर रहें, अन्यथा जेल की चक्की भी पीसनी पड़ सकती है।कभी-कभी परिजनों के साथ विवाद हो सकता है। भाई-बहनों से भी विवाद होने की संभावना है। इस वर्ष आप दूषित भोजन और दूषित पानी पीने से बीमार हो सकते हैं, इसलिए सावधानी अपेक्षित है। नौकरीपेशा लोगों के लिए यह वर्ष अनुकूल है। अगस्त तक अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें, इसके बाद स्थितियों में स्वतः ही सुधार होगा। लोगों के साथ वाद-विवाद करने से परहेज़़ करें तथा सलीके से पेश आएँ, व्यवहार में परिवर्तन करना आपके लिए काफ़ी महत्वपूर्ण रहेगा। यदि आर्थिक जीवन की बात करें तो सब-कुछ बेहतर है, लेकिन ख़ुद को गद्दारों और जालसाज़ों से दूर रखने की कोशिश करें। व्यापारियों के लिए यह वर्ष अनुकूल नहीं रहेगा। अपने क्रिया-कलापों और निर्णयों के प्रति भी सावधान रहें, वरना कुंडली में संकेत है कि कारागृह का मुँह देखना पड़ सकता है। विपरित परिस्थितियों में ग़ैरक़ानूनी मसलों से दूर ही रहें तो बेहतर होगा। वैसे, इस साल ज़िन्दगी के प्रत्येक मोड़ पर अपनी क्षमतानुसार प्रयास ज़रूर करते रहें। 
  10.  2016 का मकर राशिफल----- यह साल आपके लिए ख़ुशियों की सौगात लेकर आया है, लेकिन सुख-दुःख तो सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए कुछ व्यक्तिगत परेशानीयों का सामना भी करना पड़ सकता है और जीवनसाथी के साथ विवाद मुमकिन है। जैसे तरकश से निकला हुआ तीर वापस नहीं आता है, वैसे ही जिह्वा से निकली वाणी को वापस नहीं लिया जा सकता है, अतः सोच-विचार कर बोलें। सेहत का उचित ख़याल रखें, कब्ज़ियत, सरदर्द और थकान हो सकती है। केतु के प्रभाव से रहित जातकों को इस साल बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त होगा। कार्यस्थल पर प्रतिष्ठा में वृृद्धि होगी। कॅरियर बनाने के नए और बेहतर मौक़े मिलेंगे। यह वर्ष व्यापारियों को समृद्धि और अच्छे मुनाफ़े देेने वाला साबित होगा, सरकारी ठेके मिलने के आसार हैं। प्रेम-संबंधों के लिए भी यह साल अनुकूल रहने वाला है।निजी ज़िन्दगी से आपको उतनी सुख-शांति नहीं मिलेगी, जितना कि आप उम्मीद करेंगे। जीवनसाथी और परिजनों के साथ तक़रार हो सकती है, जिसके कारण परिवार का माहौल बिगड़ने की संभावना है। अपनी वाणी मेें संयम बरतें, वरना इसके दुःख़द परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। सरदर्द, बदहज़मी और मानसिक तनाव आपके स्वस्थ जीवन को प्रभावित कर सकता है। यदि आपके ऊपर राहु औऱ केतु की दशा नहीं है, तो आर्थिक लाभ होना निश्चित है। नौकरी-पेशे से भी आपको अत्यधिक लाभ होगा और प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। कुछ लोगों को नई नौकरी मिलेगी और ऐसी ही स्थिति व्यापारियों की भी रहेगी, उन्हें सरकारी ठेके मिलेंगे और मुनाफ़े का सौदा होगा। यह साल प्रेम-संबंधों के लिए भी बेहतर साबित होगा। कुल मिलाकर यह साल आपके लिए बेहतर सालों में से एक होगा। 
  11.  2016 का कुम्भ राशिफल----- परिवार को लेकर कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन बृहस्पति के सातवें भाव में बैठे होने के कारण परेशानियाँ टल भी सकती हैं। परिवार में मतभेद तो होते ही हैं, लेकिन इसके लिए परिवार से नाता तोड़ना ठीक नहीं होगा, इस समय स्वविवेक से फ़ैसला लेना उचित होगा। मस्तिष्क और गुप्तांगो में कुछ दिक़्क़तें हो सकती हैं, लेकिन उचित सावधानी बरतने से आप इससे बच भी सकते हैं। लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी तथा मित्रों की ओर से भी लाभ प्राप्त होगा, लेकिन दानवीर कर्ण बनने की कोशिश न करें। नौकरी पेशा लोगों की पदोन्नती होगी, कामों की तारीफ़ होगी और चहुमुखी उन्नति भी होगी। कारोबारी वर्ग की बात की जाए तो उनके लिए भी यह वर्ष सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला होगा। प्रेम-संबंधों में स्थिरता बनी रहेगी।गृहस्थ जीवन सामान्य रहेगा। थोड़ी-बहुत दिक़्क़त हो सकती है, लेकिन बृहस्पति के सातवें भाव में मौजूद रहने के कारण मामला ज़्यादा नहीं बिगड़ेगा। जो लोग पारिवारिक विवाद से ऊब कर परिवार से दूर जाना चाहते हैं, उनके लिए ऐसा क़दम उठाना उनकी इच्छा-शक्ति पर निर्भर करता है। गुप्तांगों और मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें तथा पूरी तरह सावधानी बरतें। इस वर्ष आपकी आर्थिक स्थिति शानदार रहने वाली है। बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ-साथ दोस्तों का भी भरपूर सहयोग मिलेगा। किन्तु आपको ज़्यादा दरियादिली नहीं दिखानी है और न ही दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठाना है। नौकरी पेशा लोगों को शोहरत, मान-सम्मान के साथ-साथ पदोन्नती भी मिलेगी। आपके वरिष्ठ और सहकर्मी आपको एक कुशल कर्मचारी के रूप में देखेंगे और आपकी तारीफ़ करेंगे। क़ारोबारियों के लिए भी यह वर्ष बेहतर साबित होने वाला है, इसलिए मायूस होने की ज़रूरत नहीं है। प्रेम-संबंधों में मधुरता क़ायम रहेगी। 
  12.  2016 का मीन राशिफल------ आप ऐसा महसूस करेंगे कि सबकुछ आपकी इच्छानुसार नहीं हो रहा है तथा पारिवारिक मतभेदों का सामना भी करना पड़ सकता है। सामानों के खोने की आशंका है, अतः सतर्क रहें। स्वास्थ्य संबंधी कुछ दिक़्क़तें हो सकती हैं, जैसे - लिवर, किडनी और आँत में दिक़्क़तें हो सकती हैं। इस साल वेतन में वृद्धि होने के ज़्यादा आसार हैं, लेकिन नौकरी की प्रारंभिक अवस्था में छोटी-मोटी परेशानियों से भी वास्ता हो सकता है। यह आपके जीवन का सबसे प्रभावशाली वर्ष साबित होगा। यदि सौभाग्य से आप व्यापारी हैं फिर तो सोेने पर सुहागा है। यह साल आपको ढेरों मुनाफ़ा देने वाला है, लेकिन अगस्त के बाद। जीवनसाथी की तलाश के लिए भी समय उपयुक्त है और प्रेम-संबंध एक नए मुक़ाम को हासिल करेगा।यह वर्ष आपके लिए थोड़ा संघर्ष-प्रधान हो सकता है। मुमकिन है कि पारिवारिक जीवन में भी कुछ निराशा रहे। लेकिन आप क़तई चिन्ता न करें, क्योंकि उचित व्यवहार और अच्छे विचारों के द्वारा आप इनसे उबर सकते हैंं। हालाँकि, आपकी एक छोटी ग़लती भी बड़ा नुक़सान कर सकती है, अतः कुछ भी करने से पहले पूरी एहतियात बरतें। आँत, लीवर और कि़डनी में समस्या चिन्ता का कारण बन सकती है। आर्थिक स्थिति सामान्य रहेगी। नौकरी के शुरूआती दिनों में कुछ परेशानी हो सकती है; हालाँकि सफलता आपको मिलेगी, किन्तु देर से। क़ारोबारियों को अगस्त के बाद अपार सफलता मिलने वाली है। प्रेम-संबंधों में भी अगस्त के बाद सुख़द परिणाम मिलने के आसार हैं, इससे पहले प्यार के मामलों में पूरी तरह से संयम बरतें।
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