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कैसे पहचाने की हमारा बुध ग्रह खराब है

We-have-to-recognize-how-bad-the-planet-Mercury-कैसे पहचाने की हमारा बुध ग्रह खराब है       बुध ग्रह एक शुभ और रजोगुणी प्रवृत्ति का है। यह किसी भी स्त्री में बुद्धि, निपुणता, वाणी ..वाकशक्ति, व्यापार, विद्या में बुद्धि का उपयोग तथा मातुल पक्ष का नैसर्गिक कारक है। यह द्विस्वभाव, अस्थिर और नपुंसक ग्रह होने के साथ-साथ शुभ होते हुए भी जिस ग्रह के साथ स्थित होता है, उसी प्रकार के फल देने लगता है। अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ, अशुभ ग्रह के अशुभ प्रभाव देता है। अगर यह पाप ग्रहों के दुष्प्रभाव में हो तो स्त्री कटु भाषी, अपनी बुद्धि से काम न लेने वाली यानि दूसरों की बातों में आने वाली या हम कह सकते हैं कि कानो की कच्ची होती है। जो घटना घटित भी न हुई उसके लिए पहले से ही चिंता करने वाली और चर्मरोगों से ग्रसित हो जाती है। 
           वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य और शुक्र, बुध के मित्र ग्रह हैं तथा बुध, चन्द्रमा को अपना शत्रु मानता है. बुध शनि, मँगल व गुरु से सम सम्बन्ध रखता है. बुध मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है. बुध कन्या राशि में 15 अंश से 20 अंश के मध्य होने पर अपनी मूलत्रिकोण राशि में होता है. बुध कन्या राशि में 15 अंश पर उच्च स्थान प्राप्त करता है. बुध मीन राशि में होने पर नीच राशि में होता है. बुध को पुरुष व नपुंसक ग्रह माना गया है तथा यह उत्तर दिशा का स्वामी हैं. बुध का शुभ रत्न पन्ना है , बुध तीन नक्षत्रों का स्वामी है अश्लेषा, ज्येष्ठ, और रेवती (नक्षत्र) इसका प्रिय रंग हरे रंग, पीतल धातु,और रत्नों में पन्ना है । 
         बुध से प्रभावित जातक हंसमुख, कल्पनाशील, काव्य, संगीत और खेल में रुचि रखने वाले, शिक्षित, लेखन प्रतिभावान, गणितज्ञ, वाणिज्य में पटु और व्यापारी होते हैं। वे बहुत बोलने वाले और अच्छे वक्ता होते हंै। वे हास्य, काव्य और व्यंग्य प्रेमी भी होते हैं। इन्हीं प्रतिभाओं के कारण वे अच्छे सेल्समैन और मार्केटिंग में सफल होते हैं। इसी कारण वे अच्छे अध्यापक और सभी के प्रिय भी होते हैं और सभी से सम्मान पाते हैं। बुध बहुत संुदर हैं। इसलिए उन्हें आकाशीय ग्रहों मंे राजकुमार की उपाधि प्राप्त है। उनका शरीर अति सुंदर और छरहरा है। वह ऊंचे कद गोरे रंग के हैं। उनके सुंदर बाल आकर्षक हैं वह मधुरभाषी हैं। बुध, बुद्धि, वाणी, अभिव्यक्ति, शिक्षा, शिक्षण, गणित, तर्क, यांत्रिकी ज्योतिष, लेखाकार, आयुर्वेदिक ज्ञान, लेखन, प्रकाशन, नृत्य-नाटक, और निजी व्यवसाय का कारक है। बुध मामा और मातृकुल के संबंधियों का भी कारक है। बुध बुद्धि का परिचायक भी है अगर यह दूषित चंद्रमा के प्रभाव में आ जाता है तो स्त्री को आत्मघाती कदम की तरफ भी ले जा सकता है।  
        बुध ग्रह मिथुन तथा कन्या राशी का स्वामी हैं तथा इन दोनों राशियों पर ही इस ग्रह का शुभ एवं अशुभ प्रभाव पड़ता हैं. बुध मिथुन व कन्या राशी का स्वामी हैं इसलिए इन राशियों के व्यक्ति में कुछ विशेष गुण होते हैं जिनकी जानकारी नीचे दी गई हैं| बुध सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। यह व्यक्ति को विद्वता, वाद-विवाद की क्षमता प्रदान करता है। यह जातक के दांतों, गर्दन, कंधे व त्वचा पर अपना प्रभाव डालता है। यह कन्या राशि में उच्च एवं मीन राशि में नीच का होता है। बुध एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के सानिध्य में ही रहता है। जब कोई ग्रह सूर्य के साथ होता है तो उसे अस्त माना जाता है। 
          यदि बुध भी 14 डिग्री या उससे कम में सूर्य के साथ हो, तो उसे अस्त माना जाता है। लेकिन सूर्य के साथ रहने पर बुध ग्रह को अस्त का दोष नहीं लगता और अस्त होने से परिणामों में भी बहुत अधिक अंतर नहीं देखा गया है। बुध ग्रह कालपुरुष की कुंडली में तृतीय और छठे भाव का प्रतिनिधित्व करता है। बुध की कुशलता को निखारने के लिए की गयी कोशिश, छठे भाव द्वारा दिखाई देती है। जब-जब बुध का संबंध शुक्र, चंद्रमा और दशम भाव से बनता है और लग्न से दशम भाव का संबंध हो, तो व्यक्ति कला-कौशल को अपने जीवन-यापन का साधन बनाता है। जब-जब तृतीय भाव से बुध, चंद्रमा, शुक्र का संबंध बनता है तो व्यक्ति गायन क्षेत्र में कुशल होता है। अगर यह संबंध दशम और लग्न से भी बने तो इस कला को अपने जीवन का साधन बनाता है। इसी तरह यदि बुध का संबंध शनि केतु से बने और दशम लग्न प्रभावित करे, तो तकनीकी की तरफ व्यक्ति की रुचि बनती है। 
 बुध ग्रह के शुभ प्रभाव :--- 
 जिस व्यक्ति की कुंडली में बुध ग्रह की दशा शांत और प्रभावी होती हैं. वह वाक् कला अर्थात बोलने में या किसी भी प्रकार का भाषण देने में निपूर्ण होता हैं | बुध ग्रह विद्या व तेज बुद्धि का सूचक होता हैं. इसलिए बुध ग्रह के मिथुन और कन्या राशी के व्यक्ति का दिमाग अधिक तेज होता हैं तथा वो पढाई में भी अच्छे होते हैं | बुध ग्रह व्यापर और स्वास्थ्य के लिए शुभ माना जाता हैं. इसलिए इस ग्रह की दोनों राशियों के व्यक्ति व्यापर करने में कुशल होते हैं तथा उनका स्वास्थ्य भी अधिकतर ठीक रहता हैं.
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क्या होता जब बुध ग्रह खराब असर देने लगता है ??
 यदि आप पर बुध ग्रह का अशुभ प्रभाव पड़ रहा है तो आपको व्यापार, दलाली, नौकरी आदि कार्यों में नुकसान उठाना पड़ेगा। बुध ग्रह के कमजोर होने पर व्यक्ति को व्यापर, नौकरी या व्यवसाय में भी हानि हो सकती हैं | आपकी सूंघने की शक्ति कमजोर हो जाएगी।बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से प्रभावित व्यक्ति की सूंघने की शक्ति कमजोर हो जाती हैं. समय पूर्व ही दांत खराब हो जाएंगे।कुंडली में बुध ग्रह की दशा के खराब होने पर व्यक्ति को दांतों से सम्बंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं. बुध ग्रह की दशा खराब होने पर व्यक्ति के दांत कमजोर हो जाते हैं और उन्हें दांतों में दर्द होने की भी शिकायत हो जाती हैं. आपके मित्रों से संबंध बिगड़ जाएंगे। संभोग की शक्ति क्षीण हो जाएगी। 
       इसके अलावा यदि आप तुतले बोलते हैं तो भी बुध ग्रह अशुभ माना जाएगा। बुध ग्रह के अशांत होने पर मिथुन और कन्या राशी के व्यक्तियों की वाक् कला अर्थात बोलने की क्षमता कम हो जाती हैं |  व्यक्ति खुद ही अपने हाथों से बुध ग्रह को खराब कर लेता है, जैसे यदि आपने अपनी बहन, बुआ और मौसी से संबंध बिगाड़ लिए हैं तो बुध ग्रह विपरीत प्रभाव देने लगेगा। यदि आपकी बहन, बुआ और मौसी किसी विपत्ति में है, तो भी आपका बुध ग्रह अशुभ प्रभाव वाला माना जाएगा। कुंडली में यदि बुध ग्रह केतु और मंगल के साथ बैठा है तो यह मंदा फल देना शुरू कर देता है। शत्रु ग्रहों से ग्रसित बुध का फल मंदा ही रहता है। 
        ऐसे में यह उपरोक्त सभी तरह के संकट खड़े कर देता है। आठवें भाव में बुध ग्रह शनि और चंद्र के साथ बैठा है तो पागलखाना, जेलखाना या दवाखाना किसी भी एक की यात्रा करा देता है। जब कुंडली मै बुध और मंगल दोनों नीच राशि मे होते तो जातक कर्ज की स्थिति मे आ जाता है, जो जीवन भर नही उतर पाता । बुध ख़राब होने पर स्किन (त्वचा) के रोग हो जाते हैं| यदि किसी भी स्त्री का बुध शुभ प्रभाव में होता है वे अपनी वाणी के द्वारा जीवन की सभी ऊँचाइयों को छूती हैं, अत्यंत बुद्धिमान, विद्वान् और चतुर और एक अच्छी सलाहकार साबित होती हंै। व्यापार में भी अग्रणी तथा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी समस्याओं का हल निकाल लेती हैं। 
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 क्या उपाय या प्रयास करे की बुध ठीक हो ?? 
 यदि कुंडली में बुध ग्रह नीच का या शत्रु ग्रहों के साथ बैठा है तो आपको मां दुर्गा की भक्ति करना चाहिए। बेटी, बहन, बुआ और साली से अच्छे संबंध रखने चाहिए। हिजड़ो याने व्रहन्नल्ला की सेवा करें। झूठ बोलते रहने से बुध अपना बुरा असर जारी रखता है इसलिए सच बोलने का अभ्यास करें। घर की तुलसी की सेवा रोज करे,ध्यान रखे की तुलसी कभी सूखने नही पाये। बड़े पत्ते वाले वृक्ष की सेवा करे,जैसे बरगद आदि । बुध ग्रह की शक्ति के लिए प्रत्येक बुधवार और अमावस्या को व्रत करना चाहिए तथा पन्ना धारण करना चाहिए। बुध ग्रह की दशा खराब होने पर व्यक्ति को गौ सेवा करनी चाहिए. बुध ग्रह के प्रभाव से बचने के लिए अपने खाने में से तीन भाग निकाल दें. अब एक हिस्सा गाय को खिलायें. दूसरा हिस्सा कौवें को खिलायें तथा तीसरा हिस्सा कुत्ते को खिलायें. बुध ग्रह की शांति के लिए आप गाय को हरा चारा, हरी घास तथा हरा साग खिला सकते हैं.
       बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए उड़द की दाल का सेवन करना चाहिए तथा आप इसका दान भी दे सकते हैं. बुध ग्रह के कमजोर होने पर व्यक्ति को छोटी – छोटी बालिकाओं को भोजन करना चाहिए. बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए व्यक्ति को किन्नरों को हरी साड़ी तथा सुहाग की सारी सामग्री दान करनी चाहिए. ब्राह्मण को हाथी दांत, हरा वस्त्र, मूंगा, पन्ना, स्वर्ण, कपूर, शस्त्र, खट्टे फल तथा घृत दान करने चाहिए। नवग्रह मंडल में इनकी पूजा ईशान कोण में की जाती है। इनका प्रतीक बाण तथा रंग हरा है। जिन लोगों की कुंडली में बुध अशुभ फल दे रहा है, वे इस दिन साबूत मूंग न खाएं और इसका दान करें।
       मंगलवार की रात को हरे मूंग भिगोकर रखें और बुधवार की सुबह यह मूंग गाय को खिलाएं। हरे मूंग (साबुत), हरी पत्तेदार सब्जी का सेवन और दान, हरे वस्त्र को धारण और दान देना उपुयक्त है। तांबे के गिलास में जल पीना चाहिए। अगर कुंडली न हो और मानसिक अवसाद ज्यादा रहता हो तो सफेद और हरे रंग के धागे को आपस में मिला कर अपनी कलाई में बाँध लेना चाहिए। अगर बुध ग्रह की अंतर्दशा चल रही हैं तो आपको गणेशअथार्विशीर्ष का पाठ करना चाहिए | 
       याददाश्त (मेमोरी) कम हो जायें इसके लिए हरी मिर्च,आंवला, हरी सब्जियों का खूब सेवन करें | बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए व्यक्ति कनिष्ठा उंगली में पन्ना या ओनेक्स की अंगूठी धारण कर सकते हैं. इसके अलावा बुध ग्रह के कमजोर होंने पर व्यक्ति को रोजाना माँ दुर्गा की अराधना करनी चाहिए तथा दुर्गा सप्तशती और दुर्गा सप्तश्लोक के मन्त्रों का जाप कर सकते हैं| गणेशअथर्वशीर्ष का पाठ करे | पन्ना धारण करे या हरे वस्त्र धारण करे यदि संभव न हो तो हरा रुमाल साथ रक्खे |
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बुध के उपरोक्त मन्त्र का जाप करने से भी बुध ग्रह की शान्ति मिलेगी--- 
 बुध मंत्र - इनके जप का बीज मंत्र 'ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः' तथा सामान्य मंत्र 'बुं बुधाय नमः' है। बुध मंत्र का जाप 14 बार किया जाता है।
 प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम। सौम्यं सौम्य गुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम।। 
 ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय् नम: । ॐ त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे स्मरजन काय धीमहि तन्नो विणु: प्रचोदयात्। 
 जब भी आपका कोई कार्य नही होता तब आप किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करे, जिनका जन्म बुधवार को हुआ, और जिनकी राशि मिथुन या कन्या हो, उससे काम करवाये सफलता अवश्य मिलती है ।

जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्ध

Know-your-life-marital-status-and-relationship-of-Venus-जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्धआज की इस आधुनिक जीवन शेली में मनुष्य को एक से अधिक जीवन साथी की (सिर्फ शर्रारिक सम्बन्ध ) के लिए जरूरत लगती हैं परन्तु ऐसे जातको के कुंडली के योग ही उनको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! अब बात आती हैं की ऐसे कोन-कोन से योग होते हैं जो हमको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! वर्तमान में अधिकतर कुंडलियो में शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग फलित होता हैं या जातक एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! परन्तु सिर्फ शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध होने से कोई भी ज्योतिषी किसी जातक के चरित्र का आंकलन नहीं कर सकता हैं ! इस योग मैं हमारी कुंडली के भावो का भी योगदान रहता हैं | 
              मेरे विचार से समाज में हो रहे ऐसे कई परिवर्तन इसके कारण हैं. और यह कई कारणों से हो सकता है ...जैसे पति की नपुंसकता , पत्नी का दुर्व्यवहार , समय का अभाव , आपसी समझ का अभाव , वगेरह वगेरह . हमको इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्यों से कोई मतलब नहीं है अपितु इसके ज्योतिषीय कारणों की चर्चा ज़रूर करेंगे |आज के समय में किसी को अच्छे बुरे की परवाह नहीं है और सभी लोग अंधों की तरह अपने स्वार्थों की पूर्ती करने में लगे हुए हैं. हम रोज़ ही अखबारों में पढ़ते रहते हैं की फलां स्त्री का अनैतिक यौन समबन्धों के कारण क़त्ल हो गया, फलां के साथ वैसा हो गया. आजकल स्वाप्पिंग का चलन भी बहुत हो चुका है और हमारे जाने बिना यह बढ़ता ही जा रहा है. कॉलसेंटर कल्चर ने भी स्त्री पुरुष के विवाह पूर्व और विवाहेतर समबन्धों को बढाने में बहुत योगदान दिया है. इन्हीं सब कारणों के चलते विवाह नाम की क्रिया और परिवार नाम का संस्थान बहुत अन्धकार में जा चूका है. 
          यहाँ तक की बड़े परिवारों में रक्त सम्बंधोयों के मध्य ही यौन सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं और किसी को पता नहीं चलता. जब तक पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है. पंचम भाव और पंचम का उपनक्ष्त्र स्वामी विवाह पूर्व प्रेम सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध आदि के होते है अन्य बातों के अलावा, शुक्र काम का मुख्य करक गृह है और रोमांस प्रेम आदि पर इसका अधिपत्य है. मंगल व्यक्ति में पाशविकता और तीव्र कामना भर देता है और शनि गुप्त रास्तों से कामाग्नि की पूर्ती करने को प्रेरित करता है. ज्योतिषशास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न पंचम सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। प्रेम होना अलग बात है और प्रेम का विवाह में परिणत होना अलग बात है। 
            ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।ऐसा नहीं है कि केवल इन्हीं स्थितियो मे प्रेम विवाह हो सकता है। अगर आपकी कुण्डली में यह स्थिति नहीं बन रही है तो कोई बात नहीं है हो सकता है कि किसी अन्य स्थिति के होने से आपका प्रेम सफल हो और आप अपने प्रेमी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करें। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । 
        शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। कुंडली के सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवं उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे | ज्योतिष शास्त्र का एक सर्वमान्य नियम यह है कि स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि तथा उच्चराशि में स्थित ग्रह उस भाव का नाश नहीं करता, बल्कि वह उस भाव के फल की वृद्धि करता है। किन्तु नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित ग्रह भाव को नष्ट कर देता है। अतः मांगलिक योग ग्रह, स्वराशि, मूल त्रिकोण रशि तथा उच्च राशि में होने पर दोषदायक नहीं होता है। किन्तु इस योग को बनाने वाला ग्रह नीच राशि या शत्रु राशि में हो तो अधिक दोष दायक होता है। 
 बृहद पराशर होरा शास्त्र में कहा गया है की—- 
 सुखीकान्त व पुः श्रेष्ठः सुलोचना भृगु सुतः। काब्यकर्ता कफाधिक्या निलात्मा वक्रमूर्धजः।।।
       तात्पर्य यह है कि शुक्र बलवान होने पर सुंदर शरीर, सुंदर मुख, अतिसुंदर नेत्रों वाला, पढने लिखने का शौकीन कफ वायु प्रकृति प्रधान होता है। 
 **** शुक्र के अन्य नामः- 
भृगु, भार्गव, सित, सूरि, कवि, दैत्यगुरू, काण, उसना, सूरि, जोहरा (उर्दू का नाम) आदि हैं। 
 **** शुक्र का वैभवशाली स्वरूपः- 
यह ग्रह सुंदरता का प्रतीक, मध्यम शरीर, सुंदर विशाल नेत्रों वाला, जल तत्व प्रधान, दक्षिण पूर्व दिशा का स्वामी, श्वेत वर्ण, युवा किशोर अवस्था का प्रतीक है। चर प्रकृति, रजोगुणी, स्वाथी, विलासी भोगी, मधुरता वाले स्वभाव के साथ चालबाज, तेजस्वी स्वरूप, श्याम वर्ण केश और स्त्रीकारक ग्रह है। इसके देवता भगवान इंद्र हैं। इसका वाहन भी अश्व है। इंद्र की सभा में अप्सराओं के प्रसंग अधिकाधिक मिलते हैं। यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है. 
           यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है. लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा) सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है. सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं | 
          पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है| जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है. पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है. वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है. अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है.
               एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिफर् गुण मिलान से कुछ नही होता. जैसे - कि यदि शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग दोस्त क साथ बनता हैं! यदि शुक्र या मंगल दोनों में से कोई भी गृह नवम भाव कि का स्वामी हो तो जातक क सम्बन्ध अपने देवर( पति को छोटा भाई ) या साली (पत्नी कि छोटी बहन ) क साथ सम्बन्ध बनते हैं ! परन्तु इस योग क मध्य में १२ भाव का सम्बन्ध होना आवश्यक हैं तभी इस योग को फल मिलता हैं! क्यों कि ज्योतिष शास्त्र में १२ भाव को शय्या सुख का भाव बोला जाता हैं और बिना शय्या सुख के दो जातको के मध्य में सम्बन्ध नहीं बन सकता हैं! यदि इस योग में शनि गृह कि युति या द्रष्टि समबन्ध हो तो जातक के सम्बन्ध अपने से बड़े जातक से बनते हैं और यदि रहू /केतु कि युति या सम्बन्ध बने तो नीच लोगो के साथ सम्बन्ध बनते हैं !यदि इस योग क मध्य में सूर्य हो तो किसी बड़े पद के जातक/जातिका से सम्बन्ध बनाते हैं! यदि शुक्र और मंगल के साथ बुध या शनि गृह कि भी युति हो जाये तो जातक सम्लेगिक होता हैं! यह योग यह योग शुक्र व् केतु कि युति होने से भी फलित होता हैं ऐसा कुछ एक कुंडलियो में देखा गया हैं इस योग के भंग होने का योग किसी एक गृह का वक्री होने पर होता हैं परन्तु वो गृह वक्री होकर निर्बल होना चाहिए! 
          अब बात आती हैं कि इस योग का खुलना और छुपा रहने का क्या योग होगा ? उसके कुछ योग इस प्रकार से देखे गए हैं जैसे :- यदि शुक्र व् मंगल की युति या योग पर गुरु कि द्रष्टि हो तो यह योग छुपा रहता हैं क्यों कि गुरु हमारे सभी नवग्रहों में सब से बड़ा हैं और वोह सब कुछ छुपा लेता हैं या उस क निचे सब कुछ छिप जाता हैं!परन्तु गुरु कुंडली में जिस भाव का स्वामी होगा उस भाव से सम्बंधित जीव कि जानकारी में यह योग होगा परन्तु सब से छुपा हुआ ही रहेगा और यदि यह योग ४भव में बने तो भी छुपा हुआ रहता हैं क्यों कि चतुर्थ भाव जमीन के नीचे के भाव को भी दर्शता हैं यह योग क्यों छुपा हुआ रहता हैं इस कि चर्चा हम बाद में करंगे! यदि नवमांश कुंडली में शुक्र और मंगल कि युति किसी भी एक राशी में बने तो भी कृष्ण योग बनता हैं! वैदिक ज्योतिष के अनुसार तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगल होता है और इस भाव में शुक्र होने पर जातक की पत्नी मर्द के समान जातक की हर मुसीबत में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाली होती है| 
              जातक पर आने वाली किसी भी मुशीबत को अपने उपर पहले लेने वाली होती है लेकिन शुक्र यानी की पत्नी में मंगल यानी की पुरुष के ज्यादा गुण होने केकारण जातक को अपनी पत्नी से पूर्ण रूप से शारीरिक सुख नही मिल पाता| यहाँ शुक्र के समय यदि जातक पराई औरत के चक्कर में पड़ता है तो उसको उपरलिखित पत्नी से साथ मिलना के योग कम हो जाता है| अब कई बार हमारे मन में आता हैं कि हम सिर्फ शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग का निर्माण क्यों मानते हैं या हमारे गुरुजनों ने शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग को क्यों फलित माना हैं! ज्योतिष शाश्त्र में शुक्र को प्रेम का कारक मानते हैं और मंगल को उत्तेजना का कारक कहा जाता हैं जब भी प्रेम और उत्तेजना कि युति योगी तो कृष्ण योग का निर्माण होगा 
---मंगल+शुक्र- हर प्रकार के कलाकारों (फिल्मी सितारों) में डांस, ड्रामा एवं स्त्री जाति पर प्रभुत्व और सफलता प्राप्त करने के लिए। 
--यदि कुंडली में शुक्र बलि हो तो जातक का प्रेम निश्छल होता हैं! यदि कुंडली में ५,७,११,१२ भाव कि युति या कोई भी एक सम्बन्ध बने तो कृष्ण योग का उपयोग वियेवासयिक कार्यो में होता हैं और यदि कुंडली में ५,८,१२ भावेशो कि युति या सम्बन्ध बने तो बदनामी का योग भी बनता हैं! क्यों कि अष्टम भाव बदनामी का भाव होता हैं और यदि इस योग में १,५,६,८,१२ व् शनी कि युति हो जाये तो जातक किसी कोर्ट केस में फश जाता हैं! यदि इस योग पर कोई भी ज्योतिषी और प्रकाश डालना चाहे तो उनका स्वागत हैं! 
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यदि सप्तमेश शुक्र-- 
  1. तीसरे घर में हो : बहुत ज्यादा पाप प्रभाव में हो, तब व्यक्ति के उसके भाई की पत्नी के साथ अथवा महिला के उसकी बहिन के पति के साथ सम्बन्ध हो सकते हैं किन्तु वह बहुत पाप प्रभाव में होना चहिये. 
  2. चतुर्थ भाव में हो : और राहू – केतु के साथ हो तब जातक की पति / पत्नी के चाल चलन पर शक किया जा सकता है. 
  3. पंचम भाव में हो : और बहुत अधिक पीड़ित हो तो जातक की पत्नी किसी और के शिशु को जन्म दे सकती है. -
  4. छठे भाव में हो : और बहुत पीढित हो तो व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है , साथ ही शुक्र भी बहुत कमजोर होना चहिये तथा उसका विवाह ऐसी महिला के साथ हो सकता है जो बीमार होगी तथा व्यक्ति को विवाहित जीवन का आनंद नहीं लेने देगी. 
  5.  एकादश भाव में हो : तो व्यक्ति के अनेक सम्बन्ध हो सकते हैं अता दो शादियाँ कर सकता है | 

  • शुक्र और यूरेनस का ख़राब द्रष्टि सम्बन्ध शादी के लिए तैयार लड़कियों से सुख के पूर्ती करवाता है .
  • चन्द्र का शुक्र के साथ खराब सम्बन्ध दुसरे की पत्नियों से सुख दिलवाता है. 
  • शुक्र चन्द्र यूरेनस नेप्तून यदि १,२,५,७,११,में हों तो दुसरे के साथ आनंद प्राप्त करता है.शनि से गोपनीयता बनी रहती है , मंगल से इच्छा को कर्म में परिवर्तित करने की ऊर्जा आती है ,गुरु का अच्छा प्रभाव हो तो सब कुछ ठीक चलता रहता है किन्तु विपरीत प्रभाव हुआ तो शिशु का जन्म हो सकता है और सामने वाली जातक कानून का सहारा ले सकती है और व्यक्ति को बहुत नुक्सान दे सकती है | 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है । 
  • यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं । 
  • लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है । 
  • मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।
  • यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है । 
  • सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 
  • यदि शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं । 
  • मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है ।
  • जब मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है । 
  • यदि मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है । 
  • जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो । 
  • किसी जातक की कुंडली में शुक्र चन्द्र का योग ज्यादाअशुभ फल नही देता| यदि किसी पाप ग्रह या शत्रु ग्रह की दृष्टी इन दोनों पर हो तो फिर जातक की माँ और पत्नी के सम्बन्ध अच्छे नही रह पाते| 
  • कुंडली में शुक्र मंगल का योग होने पर शुभ फल मिलते है| जातक अपने भाई बहनों की सहायता करने वाला होता है| यदि इन दोनों पर राहू या केतु की दृष्टी पडती हो तो जातक दिन रात मुशीबत पर मुशीबत झेलता है | जातक की पत्नी को भी काफी समस्या का सामना करना पड़ता है| 
  • सूर्य शुक्र का योग जातक के विवाहिक जीवन में किसी प्रकार की कमी कर देता है हालांकि जातक में आत्मविश्वास बढ़ जाता है| 

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सप्तम भाव और तुला राशि :--- 
  1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है । 
  2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है । 
  3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।
  4.  तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है । 
  5.  दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है 

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  1. ****सुख साधनों का कारक भी है शुक्र:- शुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह] कामेच्छा] वीर्य] प्रेम वासना] रूप सौंदर्य] आकर्षण] धन संपत्ति] व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत] ग्रहस्थ जीवन का सुख] आभूषण] नृत्य] श्वेत और रेशमी वस्त्र] सुगंधित और सौंदर्य सामग्री] चांदी] हीरा] शेयर] रति एवं संभोग सुख] इंद्रिय सुख] सिनेमा] मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य] शैया सुख] काम कला] कामसुख] कामशक्ति] विवाह एवं प्रेमिका सुख] होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।
  2.  ****शुक्र की अशुभताः- यदि आपके जन्मांक में शुक्र जी अशुभ हैं तो आर्थिक कष्ट] स्त्री सुख में कमी] प्रमेह] कुष्ठ] मधुमेह] मूत्राशय संबंधी रोग] गर्भाशय संबंधी रोग और गुप्त रोगों की संभावना बढ जाती है और सांसारिक सुखों में कमी आती प्रतीत होती है। शुक्र के साथ यदि कोई पाप स्वभाव का ग्रह हो तो व्यक्ति काम वासना के बारे में सोचता है। पाप प्रभाव वाले कई ग्रहों की युति होने पर यह कामवासना भडकाने के साथ साथ बलात्कार जैसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है। शुक्र के साथ मंगल और राहु का संबंध होने की दशा में यह घेरेलू हिंसा का वातावरण भी बनाता है। 

 **** जानिए अशुभ शुक्र के लिए क्या करें:- 
अशुभ शुक्र की शांति के लिए शुक्र से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए] जैसे चांदी चावल दूध श्वेत वस्त्र आदि। 
  1.  दुर्गाशप्तशती का पाठ करना चाहिए।
  2. कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करना चाहिए। 
  3. हीरा धारण करना चाहिए। यदि हीरा संभव न हो तो अर्किन, सफेद मार्का, सिम्भा, ओपल, कंसला, स्फटिक आदि शुभवार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण करना चाहिए। 
  4. शुक्र का बीज मंत्र भी लाभकारी होगा। 

  1. 1- ऊँ शं शुक्राय नमः। 
  2. 2- ऊँ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। 
इन मंत्रों का जाप भी अरिष्ट कर शुक्र शांति में विशेष लाभ प्रद माना गया है।
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एक सुशील और समर्पित स्त्री के ---
यदि किसी कुंडली में सप्तम भाव का उपनक्ष्त्र स्वामी शुक्र , शनि अथवा मंगल न हो और वह शनि शुक्र मंगल के नक्षत्र में न विराजमान हो तो वह स्त्री पूर्ण चरित्रवान होगी.यदि उसका लग्न लाभेश के नक्षत्र मैं हो और उसपर गुरु की द्रष्टि हो तो वह निश्चित ही पूर्ण रूप से संयमित होगी | =====================================================

जानिए धनु राशि में शनिदेव के आगमन का आपकी राशि पर प्रभाव

Know-your-zodiac-impact-of-the-arrival-of-Saturn-in-Sagittarius-जानिए धनु राशि में शनिदेव के आगमन का आपकी राशि पर प्रभावशनि देव, 26 जनवरी, 2017 को लगभग 21:34 बजे वृश्चिक राशि से धनु राशि में गोचर/प्रवेश करेगा/करने जा रहे है । धनु राशि के स्वामी देव गुरु बृहस्पति है , गोचर का प्रभाव ज्योतिष शास्त्र में चंद्र राशि पर आधारित होता है , राशियों के हिसाब से यह उतना अधिक सटीक नहीं होता है जितना वास्तविक प्रभाव आपकी व्यक्तिगत जन्मकुंडली में जन्म के समय ग्रहों के गोचर और ग्रहो के शुभ अशुभ पराभव पर निर्भर करता है। अतः आप अपनी जन्म कुंडली के आधार पर ही कोई उपाय करे।शनि की कुल दशा 19 वर्ष होती है और इसके अलावा साढ़ेसाती तथा दो ढैय्या का समय जोड़ा जाए तो शनि किसी के भी जीवन को लगभग 31 साल तक प्रभावित करता है। 
               शनि 30 वर्ष में उसी राशि में पुन: लौटता है। इसी लिए किसी के जीवन में तीन से अधिक बार साढ़ेसाती नहीं लगती। अक्सर एक व्यक्ति 3री साढ़ेसाती के आस पास परलोक चला जाता है। यही कारण है कि जीवन में अधिकतर उपाय शनि के ही किए जाते हैं। शनि को ग्रहों में सर्वोच्च न्यायाधीश कहा गया है जो अनुचित कार्य करने वालों को समय आने पर दंड देता है। शनि को सूर्य पुत्र भी कहा जाता है परंतु जब कुंडली में यह दोनों ग्रह ,एक ही भाव में हों या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो अनिष्ट फल देते हैं। यह वह ग्रह है जो राजा को रंक बना देता है और जमीन से आसमान पर भी ले जाता है। यह शत्रु भी है और मित्र भी। शुक्र की राशि तुला में शनि उच्चस्थ होते हैं और मेष में नीचस्थ। जिस भाव में बैठते हैं उसका भला करते हैं परंतु 3री, 7वीं और 10वीं दृष्टि से अनिष्टता प्रदान करते हैं। कभी एक परिमाण से फलादेश का परिणाम नहीं देखा जाता। 
          ग्रहो का गोचर लिखते समय स्थान और देश का भी ध्यान रखना चाहिए इस समय हम शनि देव का गोचर भारत वर्ष के दिल्ली शहर से कर रहे है विभिन्न देशो में उसके आक्षांस और देशांतर को भी ध्यान में रखना चहिये जैसे भारत वर्ष में शनि देव का धनु राशि में गोचर 26 जनवरी 2017 को रात्रि 10 :40 बजे कर रहे है , साथ ही शनि देव धनु राशि में 6 अप्रैल 2017 को वक्री हो जायेगे जब कोई ग्रह वक्री होता है तो उसकी चाल उल्टी जो जाती है जिससे शनि देव का गोचर धनु राशि से वृश्चिक राशि में 21 जून 2017 को होगी ,वृश्चिक राशि में शनि देव 25 अगस्त 2017 को मार्गी होंगे और धनु राशि में पुनः प्रवेश 26 अक्टूबर 2017 को करेगे इसके उपरांत वह 24 जनवरी 2020 को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेगे। शनि देव की चाल बहुत ही मंद गति से होती है धनु राशि में यह 2.5 साल रहने के बाद 24 जनवरी, 2020 को मकर राशि में प्रवेश करेगे ।
वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करने से मकर राशि के जातकों के लिए शनि की साढ़े साती प्रारम्भ हो जाएगी । वृश्चिक राशि वाले जातको के लिये यह अंतिम चरण की साढ़े साती होगी तथा तुला राशि वाले जातक साढ़े साती से मुक्त हो जायेंगे। शनि के धनु राशि मे आते ही कन्या राशि के जातको की लघु कल्याणि ढ्य्या आरम्भ होगी तथा वृष राशि वाले जातको की अष्ठम शनि की ढ्य्या आरम्भ हो जायेगी।
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रोग, शोक और संकटों को दूर करने वाले शनि देव का राशि परिवर्तन सभी राशि के जातकों को प्रभावित करेगा। ढैया और साढ़ेसाती से पीड़ित राशियों के जातकों के जीवन में हलचल मच सकती है। कहते हैं कि साढ़ेसाती के समय न्याय प्रिय ग्रह शनि व्यक्ति को उसके पूर्व जन्म व वर्तमान में किए गए शुभ और अशुभ कर्मों का फल देते हैं। इसलिए कुछ लोगों को यह समय बहुत ही सुखदायी तो कुछ के लिए बहुत ही कष्टदायी होता है। 
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क्या होती है शनि की साढ़ेसाती व शनि की ढैया---- 
आमतौर पर शनि एक राशि पर ढाई वर्ष तक रहते हैं। जिस राशि में शनि प्रवेश करते हैं उस राशि में और उससे पहले एवं बाद की राशि वाले व्यक्ति को अधिक प्रभावित करते हैं। शनि की इस स्थिति को साढ़ेसाती कहा जाता है। किसी व्यक्ति की राशि से शनि जब चौथे या आठवें घर में होते हैं तो उनकी ढैया होती है। साढ़ेसाती की तरह ढैया को भी कष्टकारी माना जाता है। ढैया कुल ढाई साल की होती है। 
 शनि की साढ़ेसाती व शनि की ढैया की शांति के उपाय--- 
पण्डित"विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिन राशि वालों के लिए शनि की ढैया या साढ़ेसाती चल रही हो उन्हें सुन्दरकांड, रामायण या हनुमान चालीसा का नित्य पाठ तथा शनि का व्रत करना चाहिए। शनिवार को प्रात:काल पीपल के वृक्ष में जलदान तथा सायंकाल दीपदान करना चाहिए। काले घोड़े की नाल की अंगूठी शनिवार को मध्यमा अंगुली में धारण करनी चाहिए। शनिवार का व्रत तथा शनि का दान करना चाहिए। 
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शनि की ढैय्या --- 
मेष राशि पर शनि का अष्टम ढैय्या,वही 2 नवम्बर से आरंभ है और लगभग अढ़ाई साल रहेगा। इस राशि के लोगों के खर्चे बढ़ सकते हैं। सिंह राशि में चतुर्थ ढैय्या शुरू हुआ है जो 26 अक्तूबर ,2017 तक रहेगा। कुल मिला कर तुला राशि की साढ़ेसाती की अवधि 9 सितम्बर,2009 से 26 अक्तूबर 2017 तक है। वृश्चिक में इसका प्रभाव 15 नवम्बर 2011 से आरंभ हुआ है और 24 जनवरी 2020 तक रहेगा। इसी प्रकार धनु राशि की साढ़ेसाती जो 2 नवम्बर 2014 से शुरु हुई है, वह 17 जनवरी 2023 तक रहेगी। 
          इन राशियों या इनसे संबंधित तिथियों के अलावा यदि कोई आपको साढ़ेसाती या ढैय्या के बारे कुछ और बताता है तो वह गलत है। 2017 वर्ष मे शनि का गोचर बहुत अस्थिर रहेने वाला है क्योकि यह कुछ समय के लिये वक्री हो कर पुनः वृश्चिक राशि मे आ जायेगा और दोबारा लगभग ऑक्तूबर तक मार्गी होकर धनु राशि मे प्रवेश करेगा । शनि का गोचर केवल चंद्र राशि से 3,6,11 भावो मे ही शुभ फल देता है इस प्रकार शनि के धनु राशि मे आने से कुम्भ ,वृष तथा तुला राशि के जातको को शुभ फल मिलने सम्भव है । 
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जानिए शनिदेश का प्रभाव --- 
शनि देव एक न्याय प्रिय ग्रह है ,शनि के नक्षत्र हैं,पुष्य,अनुराधा, और उत्तराभाद्रपद.यह दो राशियों मकर, और कुम्भ का स्वामी है। तुला राशि में २० अंश पर शनि परमोच्च है और मेष राशि के २० अंश प परमनीच है नीलम शनि का रत्न है।शनि की तीसरी, सातवीं, और दसवीं द्रिष्टि मानी जाती है। आपकी कुंडली में शनि किस भाव में है, इससे आपके पूरे जीवन की दिशा, सुख, दुख आदि सभी बात निर्धारित हो जाती है। किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य से अपनी जन्मकुंडली दिखा कर ही उपाय करे । भारतीय ज्योतिष में शनि को नैसर्गिक अशुभ ग्रह माना गया है। शनि कुंडली के त्रिक (6, 8, 12) भावों का कारक है। पाश्चात्य ज्योतिष भी है। 
        अगर व्यक्ति धार्मिक हो, उसके कर्म अच्छे हों तो शनि से उसे अनिष्ट फल कभी नहीं मिलेगा। शनि से अधर्मियों व अनाचारियों को ही दंड स्वरूप कष्ट मिलते हैं। शनि सूर्य,चन्द्र,मंगल का शत्रु है , बुध,शुक्र को मित्र तथा गुरु को सम मानता है। शारीरिक रोगों में शनि को वायु विकार,कंप, हड्डियों और दंत रोगों का कारक माना जाता है, रोग , शोक ,भय , दंड , न्याय , धन , कर्ज , दुःख , दारिद्र्य , सम्पन्नता और विपन्नता , असाध्य रोग , अत्यंत सज्जनता और दुर्दांत अपराधी , अति इमानदार और अत्यंत धोखेबाज इत्यादि का कारक शनि देव को माना गया है।
 ये होगा शनि देव का धनु राशि में गोचर का प्रभाव ---- 
शनि देव के धनु राशि में गोचर का देश दुनिया पर व्यापक प्रभाव देखने को मिलेगा , इस प्रभाव के तहत विभिन्न देशों के राजनीतिक हलकों, उच्च शिक्षा से जुड़े विभिन्न संस्थान, धर्म, धार्मिक स्थल, दुर्घटना , दैवीय आपदा के साथ राजनितिक उथल पुथल देखने को मिलेगी। जब गोचर शनि चंद्र लग्न से चैथे, सातवें और दसवें स्थान में जाता है, तो उसे कंटक शनि कहते है तब साधारण रूप से कंटक शनि मानसिक दुःख की वृद्धि करता है, जीवन को अव्यवस्थित बनाता है और इस कारण नाना प्रकार के दुःखों का सामना करवाता है। जब गोचर का शनि चंद्र लग्न से चैथे स्थान में होता है, तब जातक के निवास स्थान में अवश्य ही परिवर्तन होता है और उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ जाता है।
         चंद्र लग्न से जब गोचर का शनि सातवें स्थान में होता है, तब जातक का परदेश वास होता है और यदि वह सप्तम स्थान पर चर राशि का हो, तो यह फल अवश्य ही होता है। चंद्र लग्न से यदि गोचर का शनि दसवें स्थान में होता है, तब जातक के व्यवसाय एवं नौकरी आदि में गड़बड़ी होती है और असफलताएं मिलती हैं। इस प्रकार कुंडली में स्थित अशुभ शनि के प्रभाव, गोचर शनि के दुष्प्रभाव तथा दशा-अंतर्दशाओं में होती है 
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जानिए किस राशि पर कट होगा प्रभाव शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का :- 
शनि साढ़े साती की गणना चंद्र राशि के अनुसार अर्थात जन्म के समय जिस राशि में चंद्रमा होता है उससे वर्तमान में अर्थात गोचर में शनि की स्थिति के अनुसार होती है अर्थात जन्म कालिक चंद्र राशि से गोचर भ्रमण के दौरान शनि जब द्वादश भाव में आता है तो “साढ़े साती” का प्रारंभ हो जाता है और चंद्र राशि तथा चन्द्र राशि से दूसरे भाव में जब तक रहता है तब साढ़े साती बनी रहती है और जब तीसरी राशि में प्रवेश करता है तो साढ़े साती समाप्त हो जाती है। इस समय शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव तुला , वृश्चिक और धनु राशि पर है। मकर राशि के जातकों के लिए “शनि साढ़े साती” प्रारम्भ हो जाएगी| तुला राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव अंतिम चरण है जो 26 जनवरी 2017 को समाप्त हो जाएगा। परंतु शनि की चाल वक्री व मार्गी होने के कारण तुला राशि वालों को इस प्रभाव से पूरी तरह मुक्ति 26 अक्तूबर 2017 को ही मिलेगी। तुला राशि की साढ़ेसाती की अवधि 9 सितम्बर,2009 से 26 अक्तूबर 2017 तक है |
 वृश्चिक राशि :- इस राशि पर साढ़ेसाती 15 नवम्बर 2011 को आरंभ हुई थी और 2 नवम्बर 2014 से दूसरा चरण आरंभ हो गया है। यहां शनि अपनी शत्रु राशि में नीच चंद्रमा के साथ रहेगा। वृश्चिक में इसका प्रभाव 15 नवम्बर 2011 से आरंभ हुआ है और 24 जनवरी 2020 तक रहेगा। धनु राशि वालों की साढ़ेसाती 2 नवंबर 2014 को आरंभ हुई है यानी इसका प्रथम चरण शुरू हो चुका है। धनु राशि की साढ़ेसाती जो 2 नवम्बर 2014 से शुरु हुई है, वह 17 जनवरी 2023 तक रहेगी। 
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जानिए किस राशि पर होगा शनि की ढैय्या का प्रभाव---- 
 वर्तमान में शनि देव की ढैया का प्रभाव मेष , सिंह राशि पर रहेगा , मेष राशि पर शनि का अष्टम ढैय्या,वही 2 नवम्बर से आरंभ है और लगभग अढ़ाई साल रहेगा। इस राशि के लोगों के खर्चे बढ़ सकते हैं। सिंह राशि में चतुर्थ ढैय्या शुरू हुआ है जो 26 अक्तूबर ,2017 तक रहेगा। 
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 जानिए शनि देव का धनु राशि में गोचर का सभी राशियों पर क्या होगा प्रभाव - 
 शनिदेव किसी के जीवन में क्या फल देगा, शुभ प्रभाव होंगे या अशुभ , इसका विवेचन, कुंडली के 12 भावों, 12 राशियों,27 नक्षत्रों, शनि की दृष्टि, उसकी गति, वक्री या मार्गी स्थिति, कारकत्व, जातक की दशा, गोचर , साढ़ेसाती या ढैय्या, ग्रह के नीच, उच्च या शत्रु होने या किसी अन्य ग्रह के साथ होने , ग्रह की डिग्री ,विशेष योगों, कुंडली के नवांश आदि के आधार पर किया जाता है, केवल एक सूत्र से नहीं। शुक्र की राशि तुला में शनि उच्चस्थ होते हैं और मेष में नीचस्थ। जिस भाव में बैठते हैं उसका भला करते हैं परंतु 3री, 7वीं और 10वीं दृष्टि से अनिष्टता प्रदान करते हैं। केवल राशियों के फलादेश से परिणाम नहीं देखा जाता क्योंकि कुल 12 रशिया है और 1 ही नाम से 12 करोड़ से अधिक लोग आते है कोई राजा है कोई रंग है कई महलो में रह रहे है कई खुले आसमान में कई लोग जेल में है तो कई हॉस्पिटलों में अपने कर्म भोग रहे है इसलिए ग्रहों का गोचरीय प्रभाव अपनी जन्म पत्रिका ही जाने। 
जानिए आपकी राशि पर कैसा होगा शनि का असर--- 
  1. मेष: इस राशि वालों के लिए पूरा साल उठापटक व अस्थिरता वाला रहेगा। स्वास्थ्य ठीक रहेगा, लेकिन नौकरी व व्यवसाय में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। 
  2. वृष: इस साल बीमारियां बार-बार परेशान करेंगी। बनते हुए काम में बार-बार रुकावटें आएंगी। नौकरी व व्यवसाय की स्थिति भी अच्छी नही रहेगी। 
  3. मिथुन: धन प्राप्ति के योग बनेंगे। खर्च भी ज्यादा होगा। घर-परिवार में सुख-शांति का माहौल होगा। परिवार व मित्रों से पूरा सहयोग मिलेगा। 
  4. कर्क: छठवें भाव का शनि मध्यम फल देगा। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। संतान व परिवार की ओर से परेशानी हो सकती है। बिजनेस बढ़ाने की योजना पर काम होगा। 
  5. सिंह: इस राशि के लिए उम्मीदों से भरा साल होगा। स्वास्थ्य अच्छा होगा। पुराने रोगों से मुक्ति मिलेगी। विवादों का निबटारा होगा। रुका हुआ पैसा मिल सकता है। 
  6. कन्या: कन्या राशि वालों के लिए यह साल चुनौतियों से भरा होगा। छोटे-छोटे कामों के लिए भी पूरी कोशिश करनी पड़ेगी। बैंक बैलेंस में कोई खास इजाफा नही होगा। 
  7. तुला: इस राशि वालों को शनि मिश्रित फल देगा। स्वास्थ्य ठीक रहेगा, लेकिन पैसों को लेकर उठापटक करनी पड़ सकती है। काम का दबाव ज्यादा रहेगा। 
  8. वृश्चिक: इस राशि के लिए यह साल कुछ खास नही रहेगा। नौकरी और बिजनेस में चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। स्टूडेंट्स को उनकी मेहनत का फल मिलेगा। 
  9. धनु: हेल्थ को लेकर समस्याएं रहेंगी साथ ही बिजनेस में भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मेहनत के मुताबिक परिणाम नही मिलेंगे। फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखें। 
  10. मकर: व्यर्थ की यात्रा। बिजनेस में उतार-चढ़ाव। नया घर खरीदने का मन बन सकता है। दुश्मन नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। नौकरी में प्रमोशन के चांस बन सकते हैं। 
  11. कुंभ: आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर होगी। इनकम के सोर्स बनेंगे। परिवार व दोस्तों के सहयोग से तरक्की मिल सकती है। परिवार में कोई शुभ प्रसंग आ सकता है। 
  12. मीन: बिजनेस में सफलता के योग। नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है। अजनबी लोगों पर भरोसा न करें। कोई अपना ही आपको धोखा दे सकता है। विरोधी परास्त होंगे। 

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इन उपायों से होगा लाभ--- 
जब भी जीवन में शनि की दशा हो या शनि अगोच्रस्थ हो तो सुन्दर काण्ड का पाठ.हनुमान और शनि चालिसा का पाठ, दशरथ कृत शनि स्त्रोत्र का पाठ ,शनि मन्दिर मे पूजन दान,तिल, सरसो तेल से शिवलिगँ का अभिषेक , महामृत्युन्जय जप ,शनि के मँत्र का जप,माँ काली ,कालरात्री की पूजा,कुता , कोऑ, कबुतर, चीटीँ और गाय को नियमित भोजन दे ,श्री कृष्ण की पूजन , ,अमावस्या की पूजा की पूजा दान,छाता या जूते का दान करना इनमें से कोई भी उपाय नियमित रूप से करने से शनि के अशुभ प्रभावो में कमी आती है ।

जानिए मंगल का कुम्भ राशि में गोचर का आपकी राशि पर प्रभाव

मंगल का कुंभ राशि में गोचर, 11 दिसंबर 2016 
Know-your-zodiac-Tue-effects-of-transit-in-the-Aquarius-जानिए मंगल का कुम्भ राशि में गोचर का आपकी राशि पर प्रभावज्योतिष शास्त्र में मंगल को एक शक्तिशाली ग्रह बताया गया है। मंगल ग्रह महत्वाकांक्षा, आत्मविश्वास और अहंकार आदि का प्रतिनिधित्व करता है। ज्योतिषाचार्य पंडित पंडित विशाल दयानन्द शास्त्री के अनुसार मंगल का सीधा प्रभाव मनुष्य के स्वभाव और आत्मविश्वास पर पड़ता है। कुंडली में मंगल की अच्छी दिशा बेहद कामयाब बनाती है लेकिन वहीं मंगल की बुरी दिशा होने से कष्ट और विपत्ति भी आती है।
           11 दिसंबर 2016 (रविवार )की शाम को लगभग 7 बजे से को मंगल ग्रह मकर राशि से संचरण करते हुए कुंभ राशि में प्रवेश कर चूका हैं। मंगल ग्रह कुंभ राशि में 20 जनवरी 2017 (शुक्र
वार) तक स्थित रहेगा। मंगल का यह गोचर हमारे जीवन में बड़े बदलाव लेकर आएगा हालांकि ये बदलाव लाभदायक और हानिकारक दोनों हो सकते हैं। जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से आपकी राशि के अनुसार मंगल के कुम्भ में इस गोचर का आपके जीवन पर क्या होगा असर, यह जानने के लिए पढ़ें विशेष प्रस्तुति। (ध्यान रखें--यह राशिफल आपकी लग्न के आधार पर है। )
 जानिए कौन सी राशि पर क्या - क्या होगा मंगल के गोचर का प्रभाव (11 दिसम्बर 2016 से 20 जनवरी 2017 तक)आइये देखते हैं: 
  1.  मेष राशि-- मंगल ग्रह आपके 11वें भाव में गोचर कर रहा है, जो महत्वाकांक्षा, सफलता और लंबी यात्रा को दर्शा रहा है। जीवन में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इस दौरान होने वाली उन्नति और वृद्धि से आप खुद हैरान हो जाएंगे। व्यक्तित्व विकास होने से स्वभाव में परिवर्तन होगा। आय में बढ़ोतरी होने की संभावना है,आकर्षक लाभ भी होगा। परिजनों का ध्यान रखें और किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले अच्छे से सोचें। संवाद की कमी की वजह से आपके और जीवन साथी के बीच ग़लतफहमी हो सकती है। कुछ वक्त अपने परिजनों के साथ बीताएं। कुल मिलाकर मंगल के गोचर से ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होगी। आपकी राह में आने वाली समस्याएं स्वत: ही दूर हो जाएंगी। आप हर कठिनाई को आसानी से पार कर जाएंगे। 
  2.  वृषभ राशि--- क्रोधी स्वभाव का मंगल ग्रह आपके 10वें भाव में संचरण कर रहा है। यह घर आपके करियर, व्यवसाय, प्रसिद्धि और पहचान का कारक होता है। इस वक्त में अपने आसपास के माहौल को लेकर सजग रहें। आंख मूंदकर किसी भी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करें क्योंकि ऐसा संभव है कि कोई आपको हानि पहुंचा सकता है। ऐसे लोगों से दूर रहने की कोशिश करें जो निराशावादी विचारों का वातावरण निर्मित करते हों। परिवार के साथ सैर पर जाने के लिए उत्साहित रहेंगे। पत्नी का व्यवहार सहयोगपूर्ण रहेगा। ऐसे लोगों से सावधान रहें जो आपसे मित्रता करने की कोशिश करे, क्योंकि कुछ लोग आपके भोलेपन का फायदा उठा सकते हैं। परिजनों के प्रति स्नेह का भाव रखें और उनका ख्याल रखें। 
  3.  मिथुन राशि--- मंगल आपके 9वें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपके भाग्य, शिक्षा, गुरू और धर्म से जुड़ा है। इस वक्त में इच्छा और लालसा पर आपका नियंत्रण रहेगा। किसी खास अभियान पर जाने या समुद्री और हवाई यात्रा के योग हैं। बच्चे आपका स्नेह पाने के लिए इच्छुक रहेंगे हालांकि व्यस्त होने की वजह से आप परिजनों और बच्चों को वक्त नहीं दे पाएंगे। प्रियतम का भरपूर सहयोग मिलेगा। सभी से अच्छे संबंध रखें और उन्हें निभाकर चलें। मन में आशावादी भाव रखें और सोचें कि आने वाला कल बेहतर होगा। स्वयं की सुरक्षा का खास ख्याल रखें।
  4.  कर्क राशि-- हठधर्मी स्वभाव का मंगल ग्रह आपके 8वें भाव में गोचर कर रहा है। यह भाव आपकी आयु, जीवन, बड़े बदलाव और क्रांतिकारी परिवर्तन को दर्शाता है। इस दौरान ज्यादा नहीं सोचें और तनाव बिल्कुल नहीं लें। क्योंकि दिमाग पर ज्यादा भार बढ़ने से आप ठीक तरह से काम नहीं कर पाएंगे। इस वजह से एकाग्रता की कमी होगी। नियमित रूप से योग और ध्यान करें ताकि मानसिक शांति मिले। बेवजह के विचार दिमाग में नहीं लाएं, कुशलता के साथ काम करें। अचानक कोई लाभ हो सकता है। प्रेमिका के साथ अच्छा वक्त बीताएंगे। नई ऊर्जा का संचार होगा। 
  5.  सिंह राशि--- मंगल ग्रह आपके 7वें भाव में संचरण कर रहा है। यह भाव जीवन साथी, व्यवसाय, साझेदारी और विदेशी संबंधों से संबंधित है। रिश्तों में तनाव होने से हताशा और परेशानी बढ़ेगी। इस दौरान जल्दबाजी में फैसला लेने से बचें। सड़क दुर्घटना की आशंका है इसलिए तेज गति से वाहन नहीं चलाएं। शांति और सद्भाव के साथ रहें। लोगों को सुनें और उनकी बातों और आचरण का आकलन कर उन्हें जवाब दें। हालांकि आपका स्वभाव उग्र और झगड़ालूु प्रवृत्ति का है, लेकिन अच्छी सोच की मदद से आप इससे छुटकारा पा सकते हैं। 
  6. कन्या राशि--- मंगल ग्रह आपके छठवें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर स्वास्थ, व्यवसाय और कठिन परिश्रम से संबंधित है। यह समय आपकी आजीविका और व्यवसाय के लिए बेहद अच्छा है क्योंकि आपको हर मोर्चे पर सफलता मिलेगी। जिस काम में आप हाथ डालेंगे, अच्छा करेंगे और उस पर आपको गर्व महसूस होगा। अपार सफलता की वजह से आप आसमान की बुलंदियों पर होंगे। हालांकि इस दौरान आप अहंकारी हो जाएंगे। सभी तरह के मुद्दों पर परिचर्चा में सफलता मिलेगी और कामयाबी आपके कदम चूमेगी। 
  7. तुला राशि-- मंगल आपके पांचवें भाव में प्रवेश कर रहा है। यह घर बुद्धि, विद्या और प्रेम संबंध आदि को दर्शाता है। इस गोचर के फलस्वरूप आपके अंदर आलस्य का भाव आएगा। इस दौरान कई अच्छे मौके मिलने की संभावना है लेकिन आलस्य की वजह से आप इन अवसरों से चूक जाएंगे। भौतिक सुख सुविधाओं को पाने की तीव्र इच्छा होगी। आमदनी बढ़ने के योग भी हैं। जो छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की योजना बना रहे हैं, वे अपनी योजना को कुछ वक्त के लिए टाल दें। मन में अचानक से घर की साज-सज्जा करने का विचार आएगा। कड़ी मेहनत के बाद भी अगर थोड़ा ही फल मिले तो निराश नहीं होयें, छोटी-छोटी सफलता में ही खुशी ढूंढने का प्रयास करें। जीवन में कुछ बड़ा करने की सोचिये। एक बात समझ लें कि, खुशियां बाहर मत ढूंढिये आपके घर में ही खुशियों का संसार बसा है। 
  8.  वृश्चिक राशि--- मंगल आपके चौथे भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपके प्रयास, कौशल और भाई-बहनों से संबंधित है। गोचर के दौरान आपके स्वभाव में उग्रता बढ़ेगी क्योंकि मंगल एक हठधर्मी स्वभाव का ग्रह है जिसका असर आपके व्यवहार पर पड़ेगा। हताशा बढ़ने से अचानक क्रोधित हो जाएंगे, इसलिए घर और ऑफिस में शांति और संयम के साथ काम लें। उग्र स्वभाव की वजह से परिवार में विवाद की स्थिति बन सकती है। हालांकि इस दौरान जीवन साथी आपकी भावनाओं को समझने की कोशिश करेगा। आय बढ़ेगी और आकर्षक लाभ होगा। जमीन और प्रॉपर्टी में निवेश करने की इच्छा होगी। शेयर बाजार से भी जबर्दस्त मुनाफे का योग है। 
  9.  धनु राशि--- मंगल आपके तीसरे भाव में गोचर कर रहा है। यह घर छोटे भाई-बहन, पराक्रम और धैर्य से संबंधित है। इस समय में जो भी परिस्थितियां बनेंगी आप खुद को उनमें ढाल लेंगे। गुण और कौशल में बढ़ोतरी होगी इसकी छाप आपके काम में देखने को मिलेगी। राह में कई चुनौतियां आएंगी लेकिन सभी बाधाओं को पार कर जीत आपकी ही होगी। छोटे भाई-बहन आपके जीवन में कई खुशियां लेकर आएंगे। कभी वे आपके मजबूत कंधे बनेंगे तो कभी अच्छे दोस्त। ऐसा कोई मामला जिसकी वजह से आप लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे हैं उसका समाधान हो जाएगा। कोर्ट-कचहरी से जुड़े मामलों में जीत के योग हैं। वे लोग जो काफी समय से यात्रा का मन बना रहे हैं उनकी ये कामना पूरी होगी। 
  10.  मकर राशि--- मंगल आपके दूसरे भाव में संचरण कर रहा है। यह घर भाषा, संचार, परिवार और आर्थिक पक्ष को दर्शाता है। मंगल के गोचर के दौरान कहासुनी और झगड़े हो सकते हैं। किसी खास व्यक्ति से विवाद होने की वजह से रिश्तों पर बुरा असर पड़ेगा। इस दौरान क्रोध पर नियंत्रण रखें। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। लोगों को बेवजह चिड़ाने और परेशान करने की कोशिश नहीं करें। जिस सोसायटी में आप रह रहे हैं वहां लोगों के प्रति विनम्रता का भाव रखें।
  11.  कुंभ राशि--- मंगल आपकी राशि में गोचर कर रहा है। यह समय आपके लिए थोड़ा मुश्किल होगा। इस दौरान स्वभाव उग्र रहेगा और क्रोध के चलते वाणी पर संयम नहीं रहेगा। मंगल के प्रभाव की वजह से आपका व्यवहार हठधर्मी रहेगा। आपके स्वभाव और कर्म के परिणाम स्वरूप आप दुखी हो सकते हैं। इसलिए परिस्थितियों को समझें और जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लें। किसी भी कीमत पर जोखिम उठाने का साहस नहीं दिखाएं, नहीं तो परेशानी हो सकती है। मंगल के प्रभाव से रचनात्मक और विनाशकारी दोनों तरह की ऊर्जा मिलेगी लेकिन यह आप पर निर्भर करता है कि इसका सही इस्तेमाल कैसे करा जाए। आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी लेकिन मंगल के प्रभाव के चलते अपनी राह से भटक या पीछे हट सकते हैं। कुल मिलाकर उग्र स्वभाव रहने की वजह से परेशानी उठानी पड़ेगी, हालांकि समझदारी और हालात को देखकर निर्णय लेने से आप इन परेशानियों से बच सकते हैं। 
  12.  मीन राशि-- मंगल आपके 12वें भाव में गोचर कर रहा है। यह घर आपकी शैया सुख, अनिंद्रा, विदेश मामले और यात्रा से संबंधित है। आय में अचानक वृद्धि होगी और आप बेहिसाब तरीके से खर्च करेंगे। शक्ति और सामर्थ्य से आत्मविश्वास बढ़ेगा। इस दौरान मिलने वाले हर अवसर में सफलता प्राप्त करेंगे। विदेश यात्रा पर जाने के योग भी बन रहे हैं। सामाजिक जीवन में सुधार होगा,लोगों से मेल मिलाप बढ़ेगा। जीवन में आगे बढ़ने के लिए दोस्तों और अन्य लोगों से भरपूर सहयोग लें। किसी के मनोबल को ठेस पहुंचाने के बजाय उसका आत्मविश्वास बढ़ाएं। वे विरोधी जिन्होंने आपको नुकसान पहुंचाया था, उनको अपनी गलती का अहसास होगा। तनाव से बचने के लिए ज्यादा नहीं सोचें, बस काम पर अपना ध्यान दें।

जानिए सातमुखी रुद्राक्ष के लाभ और प्रयोग

 Learn-the-benefits-of-using-Rudraksh-Satmuki-जानिए सातमुखी रुद्राक्ष के लाभ और प्रयोगरुद्राक्ष को भारत में बेहद पवि़त्र माना जाता है। शिव पुराण मेंरुद्राक्ष के 38 प्रकार बताए गए हैं। इसमें कत्थई रंग के 12 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पति सूर्य के नेत्रों से, श्वेत रंग के 16 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पति चंद्र के नेत्रों से तथा कृष्ण वर्ण वाले 10 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पत्ति अग्नि के नेत्रों से मानी जाती है, ये ही इसके 38 भेद हैं। शिव पुराण में रुद्राक्ष के महत्व पर लिखा गया है कि संसार में रुद्राक्ष की माला की तरह अन्य कोई दूसरी माला फलदायक और शुभ नहीं है। हमारी भारतीय संस्कृति में रुद्राक्ष का बहुत महत्व है। रूद्र के अक्ष अर्थात् रूद्र की आंख से निकले अश्रु बिंदु को रुद्राक्ष कहा गया है। आपने साधु-संतों को रुद्राक्ष की माला पहने या रुद्राक्ष की माला से जप करते हुए देखा होगा। 
           ज्योतिष विज्ञान के अनेक जानकार भी समस्या के निवारण के लिए रुद्राक्ष पहनाते हैं। अनेक रोगों के लिए भी रुद्राक्ष की माला बिना जाने पहन लेते हैं या फिर इसका मजाक उड़ाते हैं।रुद्राक्ष का मानव शरीर से स्पर्श महान गुणकारी बतलाया गया है । इसकी महत्ता शिवपुराण, महाकालसंहिता, मन्त्रमहार्णव, निर्णय सिन्धु, बृहज्जाबालोपनिषद्, लिंगपुराणव कालिकापुराण में स्पष्ट रूप से बतलाई गई है । चिकित्सा विज्ञान की बात करें तो रुद्राक्ष के उपयोग से स्नायु रोग, स्त्री रोग, गले के रोग, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), मिरगी, दमा, नेत्र रोग, सिर दर्द आदि कई बीमारियों में लाभ होता है। दाहिनी भुजा पर रुद्राक्ष बांधने से बल व वीर्य शक्ति बढती है । वात रोगों का प्रकोप भी कम होता है । कंठ में धारण करने से गले के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, टांसिल नहीं बढता । स्वर का भारीपन भी मिटता है । कमर में बांधने से कमर का दर्द समाप्त हो जाता है ।। रुद्राक्ष के फल पेड़ पर लगते हैं। ये पेड़ दक्षिण एशिया में मुख्यत: जावा, मलेशिया, ताइवान, भारत एवं नेपाल में पाए जाते हैं। 
          भारत में ये असम, अरूणाचल प्रदेश और देहरादून में पाए जाते हैं। रुद्राक्ष के फल से छिलका उतारकर उसके बीज को पानी में गलाकर साफ किया जाता है और रुद्राक्ष निकाला जाता है। रुद्राक्ष को शुद्ध जल में तीन घंटे रखकर उसका पानी किसी अन्य पात्र में निकालकर, पहले निकाले गए पानी को पिने से बेचैनी, घबराहट, मिचली व आंखों का जलन शांत हो जाता है । दो बूंद रुद्राक्ष का जल दोनों कानों में डालने से सिरदर्द में आराम मिलता है । रुद्राक्ष का जल हृदय रोग के लिए भी लाभकारी है । 
          चरणामृत की तरह प्रतिदिन दो घूंट इस जल को पीने से शरीर स्वस्थ रहता है । इस प्रकार के अन्य बहुत से रोगों का उपचार रुद्राक्ष से, आयुर्वेद में वर्णित है ।। सात मुखी रुद्राक्ष को माँ लक्ष्मी की कृपा से भरपूर माना गया है | कामदेव का स्वरुप पाने वाला यह रुद्राक्ष अनन्त नाम से जाना गया है | महाशिवपुराण के अनुसार स्वर्ण आदि धातुओं की चोरी या बेईमानी करने के पाप से मुक्ति प्रदान करने में यह रुद्राक्ष सहायक माना गया है |कहते हैं रुद्राक्ष जितना छोटा हो, यह उतना ही ज्यादा प्रभावशाली होता है। सफलता, धन-संपत्ति, मान-सम्मान दिलाने में सहायक होता है रुद्राक्ष, लेकिन हर चाहत के लिए अलग-अलग रुद्राक्ष को धारण किया जाता है। 
           भारत में रुद्राक्ष का सिर्फ धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व नहीं है बल्कि इसका ज्योतिषीय महत्व भी है। शिव के अंश के तौर पर ज्योतिषियों ने खगोलीय गणना के हिसाब से हर मुख वाले रुद्राक्ष का अलग-अलग महत्व बताया है। शिव पुराण में स्वयं शिव ने सभी रुद्राक्षों का अलग-अलग महत्व बताया है। एकमुखी रुद्राक्ष को शिव ने अपना ही रूप बताया है और इसे भोग और मोक्ष रूपी फल देने वाला माना है। इस रुद्राक्ष को आक्षेय तिथि को अभिमंत्रित करके पूजा में रखने से लक्ष्मी के नहीं रूठने और घर में शांति आने की बात कहीं गई है। वेसे, रुद्राक्ष संबंधी कुछ नियम भी हैं, जैसे- रुद्राक्ष की जिस माला से आप जाप करते हैं उसे धारण नहीं किया जाना चाहिए। रुद्राक्ष को किसी शुभ मुहूर्त में ही धारण करना चाहिए। इसे अंगूठी में नहीं जड़ाना चाहिए। कहते हैं, जो पूरे नियमों का ध्यान रख श्रद्धापूर्वक रुद्राक्ष को धारण करता है, उनकी सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहा जाता है कि जिन घरों में रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहां मां लक्ष्मी का वास होता है। यह भगवान शंकर की प्रिय चीज मानी जाती है। 
 जानिए सात मुखी रुद्राक्ष धारण के लाभ--
 एैसे मनुष्य जिनका भाग्य उनका साथ नहीं देता और नौकरी या व्यापार में अधिक लाभ नहीं होता एैसे जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए क्योंकि इसके धारण से धन का अभाव व् दरिद्रता दूर होकर व्यक्ति को धन, सम्पदा, यश, कीर्ति एवं मान सम्मान की भी प्राप्ति होती है चूँकि इस रुद्राक्ष पर लक्ष्मी जी की कृपा मानी गई है और लक्ष्मी जी के साथ गणेश भगवान की भी पूजा का विधान है इसलिए इस रुद्राक्ष को गणपति के स्वरुप आठ मुखी रुद्राक्ष के साथ धारण करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है |
            ग्रन्थों के अनुसार सात मुखी रुद्राक्ष पर शनि देव का प्रभाव माना गया है इसलिए जो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान हों या जोड़ो के दर्द से परेशान हों उनके लिए शनि देव की कृपा प्राप्त होने के कारण से यह रुद्राक्ष लाभदायक हो सकता है | सात मुखी होने के कारण से शरीर में सप्त धातुओं की रक्षा करता है और शरीर के मेटाबोलिज्म को दुरुस्त करता है |यह गठिया दर्द ,सर्दी, खांसी, पेट दर्द ,हड्डी व मांसपेशियों में दर्द ,लकवा ,मिर्गी ,बहरापन ,मानसिक चिंताओं ,अस्थमा जैसे रोगों पर नियंत्रण करता है । इसके अतिरिक्त यौन रोगों ,हृदय की समस्याओं ,गले के रोगों में भी फायदेमंद है । सात मुख वाले रुद्राक्ष पहनने मात्र से ही सप्त ऋषियों का सदा आशीर्वाद रहता है ,जिससे मनुष्य का सदा कल्याण होता है । इसके साथ ही यह सात माताओं ब्राह्मणी ,माहेश्वरी कौमारी ,वैष्णवी ,इन्द्राणी ,चामुण्डा का मिला -जुला रूप भी है । 
          इन माताओं के प्रभाव से यह पूर्ण ओज ,तेज ,ज्ञान ,बल तथा सुरक्षा प्रदान करके आर्थिक ,शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों को दूर करता है । यह उन सात आवरणों का भी दोष मिटाता है जिससे मानव शरीर निर्मित होता है ,यथा-पृथ्वी ,जल ,वायु , अग्नि ,आकाश ,महत्व तथा अहंकार । सात मुख वाला रुद्राक्ष धन -सम्पति ,कीर्ति तथा विजयश्री प्रदान करने वाला होता है । इसको धारण करने से धनागमन बना रहता है ,साथ ही व्यापर ,नौकरी में भी उन्नति होती है । 
         यह रुद्राक्ष सात शक्तिशाली नागों का भी प्रिय है । सात मुखी रुद्राक्ष साक्षात अनंग स्वरूप है ,अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है ,इसलिए इसको पहनने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है और पूर्ण स्त्री -सुख मिलता है । इसको पहनने से स्वर्ण चोरी के पाप से मुक्ति मिलती है । सात मुखी रुद्राक्ष महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है । यह शनि द्वारा संचालित होता है । आर्थिक शारीरिक और मानसिक विपत्तियों से ग्रस्त लोगों के लिए यह कल्पतरु के सामान है । किसी भी तरह की विषाक्ता से ग्रस्त व्यक्ति यदि इसे धारण करें तो वह इस कष्ट से मुक्ति अवश्य प्राप्त करता है । ज्योतिष के अनुसार मारक ग्रह की दशा होने पर इसे धारण कर सकते हैं । यह रक्षा कवच का कार्य करता है और व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाता है । 
 सात मुखी रुद्राक्ष के फायदे--- 
  1.  ----जो लोग कोर्ट-कचहरी के मामलों में फंसे हों या जो जातक शनि की साढ़ेसाती, शनि की ढैया या शनि की महादशा से प्रभावित हैं उनके लिए यह रुद्राक्ष एक बेहद उपयोगी माना गया है। 
  2. ----सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है तथा यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। 
  3.  --- सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से आर्थिक स्थिति में मजबूती आती है, एवं मन शान्त रहता है।
  4.  ---महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए इस रुद्राक्ष की माला को धारण करना लाभकारी माना जाता है। 
  5. ---सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से गणेश व लक्ष्मी जी की विशेष कृपा बनी रहती है, जिसके कारण घर व परिवार में सुख व समृद्धि बनी रहती है। 
  6.  ----- नौकरी वाले जातक यदि सातमुखी रुद्राक्ष धारण करते है, तो उनके कैरियर में प्रगति होती है तथा उनका बॉस काफी प्रभावित रहता है। 
  7.  ---स्नायु तन्त्र से सम्बन्धित रोगों में सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। 
  8.  --- सातमुखी रुद्राक्ष को पहनने से शनि ग्रह से सम्बन्धित दोषों जैसे साढ़ेसाती, ढैय्या आदि का शमन होता है। ----मकर और कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि है इसलिए दोनों राशि के जातकों के लिए सात और चौदह मुखी रुद्राक्ष को पहनना शुभ बताया गया है।
  9.  ----शिवपुराण के अनुसार इस रुद्राक्ष को धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है।सात मुखी रुद्राक्ष परम सौभाग्य दायी है. यश कीर्ति की प्राप्ति होती है. गुप्त धन भी प्राप्त होता है. इसके देवता हनुमान है. शनि के दोषों को दूर करने में यह सहायक है |
  10.  ----सात मुखी रुद्राक्ष धारण करने से ज्ञान, तेज, बल, अर्थ, व्यापार में उन्नति आदि संभव है. स्त्री सुख भी पूर्ण रूप से मिलता है. 
  11. ----सात मुखी रुद्राक्ष के अध्यात्मिक प्रभाव - सात मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मणि आदि सात लोक माताओं का स्वरुप माना जाता है। इस धारण करने से महान सम्पति तथा आरोग्य प्राप्त होता है। यदि इसे पवित्र भावना से धारण किया जाये तो आत्म ज्ञान की प्राप्ति होती है। सात रुद्राक्ष काम देव का सूचक है। कामुक लोग इसे अपनी काम वासना के लिए भी धारण करते हैं। 
  12. ---सात मुखी रुद्राक्ष के वैज्ञानिक प्रभाव - जो बच्चे बचपन से ही दुबले पतले होते है ऐसे बच्चो कों सात मुखी रुद्राक्ष मक्खन में घिस कर खिलाने से बच्चा स्वस्थ हो जाता है। एवं जो व्यक्ति नपुंसक होते हैं वे यदि सुबह शाम सात मुखी रुद्राक्ष कों मधु के साथ घिस कर सेवन करे तो काफी फायदा होता है। 

 सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र--- 
 सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र “ॐ हूँ नमः” है |
        इस रुद्राक्ष को धारण के पश्चात इसी मंत्र की तीन या पांच माला रोज़ अगर जाप किया जाए तो इस रुद्राक्ष की क्षमता कई सो गुना बढ़ जाती है और धारक को धन एवं यश की प्राप्ति होती है अतः हर नौकरी या व्यवसाय करने वाले मनुष्य को सात मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए | 
 धारण विधिः- किसी भी मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीनो दिन गंगाजल में केसर दूध मिलाकर निम्न मन्त्र से- ''ऊँ ऐं हीं श्री क्लीं हूं सौः जगत्प्रसूतये नमः'' से सातमुखी रुद्राक्ष पर जल छिड़के। इसके बाद गंध अक्षत, दूर्वा, पुष्प, बेल-पत्र, धतूरा चढ़ाकर विधिवत् पूजन करें। तत्पश्चात् निम्न मन्त्र से ''ऊँ ऐं हीं श्रीं क्लीं हूं सौः जगत्प्रसूयते'' से 108 बार हवन करना चाहिए। और 7 बार हवन-अग्नि की परिक्रमा करके सातमुखी रुद्राक्ष को गले या भुजा में धारण करें।रूद्राक्ष को हमेशा सोमवार के दिन प्रात:काल शिव मन्दिर में बैठकर गंगाजल या कच्चे दूध में धो कर, लाल धागे में अथवा सोने या चांदी के तार में पिरो कर धारण किया जा सकता है।
        रुद्राक्ष को रखने का स्थल शुद्ध एवं पवित्र होना चाहिए । रुद्राक्ष भाग्य शाली व्यक्ति को हो मिलता है, इसे पूजा घर में रखना अत्यंत लाभदायक है । येन केन प्रकारेण यदि आपको असली रुद्राक्ष की प्राप्ति हो जाये, तो आप इसे श्रद्धा विश्वास एवं विधिपूर्वक धारण करें, आपका जीवन सर्वतोन्मुखी विकास की ओर अग्रसर होगा । नहीं तो इसे पूजा घर में रखकर श्रद्धा पूर्वक पूजन करें, आपकी भाग्योन्नति तत्काल शुरू हो जाएगी ।।

ज्योतिष द्वारा जानिए की केसा हैं आपका मित्र...फ्रेंड या दोस्त

संसार में खून के रिश्ते ईश्वर बनाता है। ये रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें हम स्वयं नहीं चुन सकते, इन्हें स्वीकार करना हमारी नियति होती है, लेकिन एक रिश्ता ऐसा भी होता है, जो हम स्वयं बनाते हैं, वह रिश्ता है ‘मित्रता’ का। यह रिश्ता दो व्यक्तियों के मध्य समान विचारधारा, समान रुचियों के कारण बनता है। मित्रों, किसी भी जन्मपत्री में मुख्य रूप से मित्र का विचार पंचम भाव से किया जाता है तथा एकादश भाव से मित्र की प्रकृति एवं तृतीय भाव से मित्र से होने वाले हानि-लाभ का विचार किया जाता है। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक प्राणी किसी न किसी ग्रह, राशि व लग्न के प्रभाव में होता है और मित्रता जातक की कुंडली तय करती है। 
By-astrology-Friend-or-of-your-friend-ज्योतिष द्वारा जानिए की केसा हैं आपका मित्र...फ्रेंड या दोस्त        ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रहों में पांच प्रकार की मित्रता होती है। परम मित्र, मित्र, शत्रु, अधिशत्रु एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार तात्कालिक मैत्री। इसी प्रकार राशियों में भी आपसी मैत्री संबंध होते हैं। कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, द्वितीय, पंचम, सप्तम व एकादश भाव और बुध ग्रह प्रमुख रूप से मित्रता के कारक होते हैं। कुंडली का सीधा संबंध भाव, ग्रह व राशियों से होता है। तीनों प्रकार के संबंध जीवन की दिशा तय करते हैं। 
           पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार मनुष्य जीवन के सारे महत्वपूर्ण रिश्ते जन्म से मिलते हैं जो हमारे हाथ में नहीं होते है लेकिन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और करीबी रिश्ता जो हम बनाते हैं वह दोस्ती का रिश्ता होता है यह रिश्ता कब और किससे बनता है साथ ही आप और आपके दोस्त के आचार-विचार, रहन-सहन सब कुछ सितारों से बनते हैं इसलिए आपकी जन्मकुंडली, आपका लग्न व आपकी राशि बताती है कौन आपका सच्चा दोस्त होगा | 
        ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारी कुंडली में स्थित सभी नौ ग्रहों की भी आपस में मित्रता और शत्रुता होती है। इनके संबंधों का भी प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक प्राणी किसी न किसी ग्रह, राशि व लग्न के प्रभाव में होता है और मित्रता जातक की कुंडली तय करती है। ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रहों में पांच प्रकार की मित्रता होती है। परम मित्र, मित्र, शत्रु, अधिशत्रु एवं ग्रहों की स्थितिनुसार तात्कालिक मैत्री। इसी प्रकार राशियों में भी आपसी मैत्री संबंध होते हैं।
           कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, द्वितीय, पंचम, सप्तम व एकादश भाव और बुध ग्रह प्रमुख रूप से मित्रता के कारक होते हैं। कुंडली का सीधा संबंध भाव, ग्रह व राशियों से होता है। तीनों प्रकार के संबंध जीवन की दिशा तय करते हैं। उग्र व गर्म मिजाज.... दो विभिन्न व्यक्तियों, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी का आपसी संबंध राशियों के तत्व पर आधारित होता है। हमारा शरीर पंच तत्त्वों से बना है और 12 राशियां इन्हीं में से 4 तत्वों में विभाजित की गई है। अग्नि, भूमि, वायु (इसमें आकाश तत्व भी शामिल है) व जल। मेष, सिंह व धनु राशियां अग्नि तत्व प्रधान अर्थात ये उग्र व गर्म मिजाज वाली राशियां होती हैं। वृष, कन्या व मकर राशियां भूमि या पृथ्वी तत्त्व प्रधान होने के कारण धैर्यशाली व ठंडे मिजाज वाली, मिथुन, तुला व कुंभ राशियां वायु तत्त्व प्रधान होने के कारण अस्थिर चित्त व द्विस्वभाव वाली होती हैं।
 राशियों में गहरी मित्रता---- 
पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार कर्क , वृश्चिक व मीन राशियां जल तत्व प्रधान हैं। ये धीर-गंभीर व विशाल हृदया होती हैं। ज्योतिष के मुताबिक एक ही तत्व की राशियों में गहरी मित्रता होती है। पृथ्वी, जल तत्त्व और अग्नि, वायु तत्त्वों वाले जातकों की भी पटरी अच्छी बैठती है। अग्नि व वायु तत्त्व वालों की मित्रता भी होती है। लेकिन पृथ्वी, अग्नि तत्त्व, जल तथा अग्नि तत्व एवं जल तथा वायु तत्त्वों वाले जातकों में शत्रुता के संबंध होते हैं। तत्व के अलावा राशियों के स्वभाव पर भी मित्रता का असर होता है। राशियों के हिसाब से देखें तो स्वयं की राशि के अलावा मेष, सिंह व धनु राशि वालों की मित्रता मिथुन, तुला व कुंभ राशि वाले लोगों से होती है। वृष, कन्या व मकर राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, वृश्चिक व मीन राशि वाले लोगों से ज्यादा पटती है। सिर्फ राशियां ही नहीं ग्रहों की भी मित्रता में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नव ग्रहों में सूर्य-सिंह राशि, चंद्रमा-कर्क राशि, मंगल-मेष व वृश्चिक, बुध-मिथुन व कन्या, गुरु-धनु व मीन राशि, शुक्र-वृष व तुला तथा शनि-मकर व कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। शास्त्रों में इनमें नैसर्गिक मैत्री संबंध बताए गए हैं। 
            पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की जन्म कुंडली में मौजूद नवमांश कुंडली के अनुसार मनुष्य का आचरण या स्वभाव जाना जा सकता है । इस संसार में मोजुद प्राणियों में मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है । इसके चेहरे पर कुछ और होता है और अंदर मन मे कुछ और होता है ।। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मनुष्य के स्वभाव को जानना बहुत मुश्किल काम है । कुछ मनुष्य देखने मे बहुत सुंदर होते है लेकिन मन से बहुत काले कपटी और घमंड या ईगो तथा गंदगी से भरे होते है । इसको जानने के लिए किसी भी जातक की नवमांश कुंडली का प्रयोग करना चाहिए । 
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ज्योतिष अनुसार राशियां भी जिम्मेदार---- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार दो विभिन्न व्यक्तियों, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी का आपसी संबंध राशियों के तत्व पर आधारित होता है। हमारा शरीर पंच तत्वों से बना है और 12 राशियां इन्हीं में से 4 तत्वों में विभाजित की गई हैं। ‘अग्नि’ ‘भूमि’, ‘वायु’ (इसमें आकाश तत्व भी शामिल है) व जल। मेष, सिंह व धनु राशियां अग्नि तत्व प्रधान अर्थात ये उग्र व गर्म मिजाज वाली राशियां होती हैं। वृष, कन्या व मकर राशियां भूमि या पृथ्वी तत्व प्रधान होने के कारण धैर्यशाली व ठंडे मिजाज वाली, मिथुन, तुला व कुंभ राशियां वायु तत्व प्रधान होने के कारण अस्थिर चित्त व द्विस्वभाव वाली होती हैं। कर्क, वृश्चिक व मीन राशियां जल तत्व प्रधान हैं। ये धीर-गंभीर व विशाल हृदया होती हैं।
         पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार एक ही तत्व की राशियों में गहरी मित्रता होती है। पृथ्वी, जल तत्व और अग्नि, वायु तत्वों वाले जातकों की भी पटरी अच्छी बैठती है। अग्नि व वायु तत्व वालों की मित्रता भी होती है लेकिन पृथ्वी, अग्नि तत्व, जल तथा अग्नि तत्व एवं जल तथा वायु तत्वों वाले जातकों में शत्रुता के संबंध होते हैं। तत्व के अलावा राशियों के स्वभाव पर भी मित्रता का असर होता है। राशियों के हिसाब से देखें तो स्वयं की राशि के अलावा मेष, सिंह व धनु राशि वालों की मित्रता मिथुन, तुला व कुंभ राशि वाले लोगों से होती है। वृष, कन्या व मकर राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, वृश्चिक व मीन राशि वाले लोगों से ज्यादा पटती है। 
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दोस्ती पर पीले रंग का प्रभाव---
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार पीला रंग शुभ चीज़ों और मंगल कार्यों से संबंध रखता है. ज्योतिष में इसे बृहस्पति का रंग माना जाता है. पीले रंग का संबंध दोस्ती से है, लेकिन रोमांस से नहीं. वैसे ज्योतिष कहता है कि दोस्ती को प्रेम में बदलने के लिए पीले रंग का प्रयोग लाभकारी है. वैवाहिक जीवन में पीले रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए. बेडरूम में भी पीले रंग का प्रयोग सामान्य रूप से नहीं करना चाहिए. हां, संतानहीन हों तो कुछ समय के लिए पीले रंग की बेडशीट बिछाएं और बेडरूम में पीले रंग के पर्दों का भी प्रयोग करें || 
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दोस्ती में होता है ग्रहों का बोलबाला --- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार सिर्फ राशियां ही नहीं, ग्रहों की भी मित्रता में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नवग्रहों में सूर्य-सिंह राशि, चंद्रमा-कर्क राशि, मंगल-मेष व वृश्चिक, बुध-मिथुन व कन्या, गुरु-धनु व मीन राशि, शुक्र-वृष व तुला तथा शनि-मकर व कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। शास्त्रों में इनमें नैसर्गिक मैत्री संबंध बताए गए हैं। इसके अलावा ग्रहों में तात्कालिक मैत्री भी होती है, जो इनकी कुंडली में स्थिति के अनुसार होती है जैसे मंगल व शनि कुंडली में एक साथ बैठे हों तो इनमें तात्कालिक मैत्री संबंध होते हैं। मोटे तौर पर हम ग्रहों की तीन प्रकार-मित्रता, शत्रुता व साम्यता के बारे में जानकारी लेते हैं। 
 आइए देखें ग्रहों के नैसर्गिक मैत्री संबंध क्या हैं :--- 
  1. सूर्य :--- सूर्य के चंद्रमा, मंगल व गुरु मित्र होते हैं। शनि-शुक्र शत्रु व बुध से साम्यता के संबंध हैं। इस प्रकार सिंह राशि वाले की मित्रता मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु व मीन राशि वालों से व मकर, कुंभ, वृष व तुला वाले लोगों से शत्रुता होती है। सूर्य तेज व अधिकारिता के स्वामी हैं अत: इनकी चाहत रखने वाले से मैत्री संबंध व शनि व शुक्र क्रमश: सेवा व आराम पसंद होते हैं इसलिए इनसे शत्रुता होती है। 
  2. चंद्र :--- चंद्र ग्रह के अधिकांश ग्रह मित्र होते हैं परंतु बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतू इन्हें पसंद नहीं करते। बुध, शुक्र, गुरु, शनि मित्र व सिर्फ मंगल से शत्रुता होती है। चंद्रमा जल प्रधान व मंगल अग्नि तत्व प्रधान होते हैं। जाहिर है कि आग और पानी में मित्रता नहीं हो सकती। 
  3. मंगल :--- मंगल के मित्र शनि व सूर्य होते हैं। चंद्र व गुरु से साम्यता व शुक्र व बुध से शत्रुता के संबंध होते हैं। इस प्रकार मेष व वृश्चिक राशि वाले लोगों की मित्रता कर्क, धनु व मीन से तथा वृष, तुला, मिथुन व कन्या राशि से शत्रुता होती है। 
  4. बुध :--- इस ग्रह के सूर्य, गुरु व चंद्र मित्र होते हैं। शनि से इनकी शत्रुता होती है। इस प्रकार मिथुन व कन्या राशि वाले लोगों की मित्रता सिंह, कर्क, धनु व मीन राशि के लोगों से होती है। मकर व कुंभ राशि से असामान्य संबंध होते हैं। 
  5. गुरु :-- गुरु के मंगल, चंद्र, शनि मित्र व शुक्र तथा बुध से शत्रुता होती है। इस प्रकार धनु व मीन राशि के लोगों की मेष, वृश्चिक, कर्क, मकर व कुंभ से मित्रता तथा वृष, तुला व मिथुन, कन्या से शत्रुतापूर्ण संबंध होते हैं। गुरु स्वयं मर्यादा में रहना सिखाते हैं जबकि बुध व शुक्र दोनों ही आदतन इससे दूर रहने वाले होते हैं। 
  6. शुक्र :-- इसके गुरु, सूर्य मित्र व मंगल शत्रु होते हैं। इस प्रकार शुक्र की राशि वृष व तुला वाले लोगों की मित्रता, सिंह, धनु व मीन राशि वालों से तथा मेष व वृश्चिक राशि के लोगों से शत्रुतापूर्ण संबंध होते हैं। चंद्रमा, बुध व शनि के साथ इनके समानता के संबंध होते हैं। 
  7.  शनि :--- इस ग्रह की गुरु, चंद्र, मंगल से मित्रता व शनि सूर्य से शत्रुता रखते हैं। अत: मकर व कुंभ राशि वाले लोगों की मित्रता मेष, वृश्चिक, कर्क, धनु व मीन राशि के लोगों से होती है। सिंह राशि के लोगों से मित्रता नहीं होती है। 

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ज्योतिष के अनुसार मैत्री के प्रमुख भाव ---- 
पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार मित्रता का प्रमुख भाव एकादश भाव है जो आय भाव भी है जिसके जितने अच्छे मित्र होंगे, आय भाव उतना ही मजबूत होगा। अन्यथा कमजोर होगा। इस भाव में यदि सूर्य हो तो ऐसे जातक की उच्च पदासीन, सत्तासीन व राजनीतिक लोगों से मित्रता होगी। चंद्रमा इस भाव में होने पर मित्र कलाकार, वायुयान चालक, जहाज के कैप्टन, नाविक आदि मित्र होंगे। यदि एकादश भाव में मंगल है तो मित्र खिलाड़ी, पहलवान, कुक आदि प्रकृति के लोग होंगे व बुध इस भाव में होने पर व्यावसायिक वृत्ति के लोग, गुरु इस भाव में होने पर बैंकिंग, वित्त धार्मिक आस्था, दार्शनिक आदि मित्र होंगे। 
        शुक्र इस भाव में होने पर अभिनय क्षेत्र, स्त्री जातक, कलाकार आदि मित्रों की संख्या अधिक होगी। शनि एकादश भाव में होने पर नौकरी पेशा, सेवावृत्ति, अपनी आयु से अधिक उम्र वाले लोगों से मैत्री संबंध होते हैं। यदि इस भाव में राहु या केतू हो तो ऐसे व्यक्ति के छद्म मित्रों व अपनी जाति से इतर लोगों से मित्रों की संख्या अधिक होती है। वह अपने लोगों से दूर-दूर रहता है।
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जानिए बुध ग्रह और दोस्ती/मैत्री /फ्रेंडशिप का सम्बन्ध --- 
 पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार बुध को मित्रता का नैसर्गिक ग्रह माना जाता है। इस प्रकार बुध इन भावों से संबंध बना ले, तो जातक के जीवन में मित्रों की संख्या अधिक होती है। इन भावों तथा बुध के अतिरिक्त जब किन्हीं दो जातकों के राशि स्वामी, लग्न स्वामी, नक्षत्र स्वामी आदि एक ही हो जाएं अथवा उनमें मित्रता हो, तो उन जातकों के मध्य मित्रता होना स्वाभाविक है। 
  •  ---पंचम भाव में यदि दो या उससे अधिक पाप ग्रह स्थित हों या उसे देखते हों, तो जातक के जीवन में मित्रों का सुख नहीं होता। पंचमेश यदि पंचम, नवम, एकादश अथवा तृतीय भाव में स्थित हो और उसको पाप ग्रह नहीं देखते हों और न ही युति करते हों, तो जातक को मित्रों का सुख होता है। 
  • ---एकादश तथा पंचम भाव के स्वामी यदि युति करते हुए त्रिकोण या केंद्र भावों में स्थित हो, तो जातक की मित्रता श्रेष्ठ व्यक्तियों से होती है। यदि तृतीयेश की स्थिति शुभ हो, तो उसे मित्रों से लाभ भी होता है। 
  • ----तृतीयेश यदि बली तथा शुभ ग्रहों से युक्त होकर शुभ स्थानों में स्थित हो अथवा तृतीयेश का शुभ संबंध पंचमेश या एकादशेश से हो जाए, तो तत्सम्बन्धी ग्रह की राशि वाले जातकों की मित्रता से उसको अधिक लाभ की प्राप्ति होगी। 
  • ----बुध एवं मंगल पंचम भाव के विशेष योगकारी ग्रह हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में बुध अथवा मंगल योगकारी अथवा मित्रक्षेत्री होकर पंचम में स्थित हों, तो उस जातक के जीवन में मित्रों की कमी नहीं होती है। 

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पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार जानिए अपनी जन्म कुंडली अनुसार कौन सा ग्रह किस दूसरे ग्रह का मित्र, शत्रु तथा सम (न मित्र और न शत्रु) है---- 
  • --- सूर्य ग्रह की मित्रता चंद्र, मंगल और गुरु से है, शुक्र तथा शनि से इसकी शत्रुता है और बुध ग्रह से सम भाव है। ---- चंद्र के बुध, सूर्य मित्र हैं। मंगल, शुक्र, शनि तथा गुरु समय है। 
  • --- मंगल ग्रह के सूर्य, चंद्र और गुरु मित्र हैं, बुध शत्रु है और शुक्र तथा शनि से इसका सम भाव है। 
  • --- बुध ग्रह की मित्रता सूर्य तथा शुक्र मित्र हैं, चंद्र शत्रु है और मंगल गुरु तथा शनि सम है। 
  • --- गुरु की मित्रता सूर्य, चंद्र और मंगल से है। कुछ ज्योतिष के विद्वान गुरु और चंद्र एक-दूसरे को शत्रु भी मानते हैं। 
  • --- शुक्र के बुध और शनि मित्र हैं, सूर्य और चंद्र शत्रु हैं तथा मंगल और गुरु समय हैं। 
  • ---- शनि ग्रह बुध और शुक्र से मित्रता रखता है जबकि सूर्य, चंद्र, मंगल को शत्रु मानता है। गुरु से सम भाव है। ---राहु और केतु छाया ग्रह माने जाते हैं, विद्वानों के अनुसार राहु और केतु दोनों शुक्र और शनि से मित्रता रखते हैं एवं सूर्य, चंद्र मंगल तथा गुरु इन चारों ग्रह से शत्रुता रखते हैं। बुध इन दोनों ग्रहों से सम भाव रखता है। 
  • ---सूर्य, चंद्र, मंगल और गुरु ये चारों ग्रह राहु तथा केतु से शत्रुता मानते हैं जबकि शुक्र और शनि राहु-केतु के मित्र हैं। बुध इन दोनों से सम भाव रखता है। 
  • --जेसे यदि किसी जातक की कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह शुभ हो और नवमांश मे नीच या अशुभ हो या 6,8,12 मे बैठा हो तथा शनि राहू केतू से पीड़ित हो तो जातक बाहर से सुंदर तथा अंदर से काला होता है । 
  •  ----- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह शुभ हो और नवमांश मे भी शुभ हो तथा शुभ ग्रहों से युति या दृष्टि मे हो तो ऐसा जातक बाहर से भी सुंदर और अंदर से भी सुंदर होता है । 
  •  ---- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह क्रूर या पापी हो तथा नवमांश मे शुभ दृष्टि हो या शुभ राशि मे या वर्गोत्तम हो तो ऐसा जातक बाहर से कुरूप या स्पष्टवादी तथा अंदर से भी सुंदर होता है । 
  • ----- जेसे यदि किसी जातक की लग्न कुंडली मे लग्न का स्वामी ग्रह क्रूर या पापी हो और नवमांश मे भी पापी नीच या 6,8,12 मे हो या अशुभ राशि मे हो तो ऐसा जातक बाहर से भी कुरूप तथा अंदर से भी कुरूप और गंदगी से भरा होता है ।

जानिए केसा होगा नव वर्ष 2016

 नववर्ष 2016 का शुभारंभ शुक्रवार, पोष माह की कृष्ण पक्षीय सप्तमी को होने जा रहा हैं।। इस दिन चन्द्रमा कन्या राशि का और उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा।।। 
    Will-Know-New-year-2016-जानिए केसा होगा नव वर्ष 2016
  1. इस वर्ष शुक्र प्रभावी होने से चीनी, चांवल और खाद्यान्न का उत्पादन ठीक होगा।।वर्षा समुचित होगी।। 
  2. इस वर्ष व्यापारी वर्ष को सुख और लाभ मिलेगा।। 
  3. इस वर्ष सोना, फेशनेबल कपडे और विलासिता का सामान और सौन्दर्य प्रसादन वस्तुओ का बाजार तेज रहेगा।। 
  4.  शासक वर्ग द्वारा अपने समर्थकों और उनकी जय जयकार करने वालों का अधिक ध्यान रखा जायेगा।। 
  5. शुक्र के प्रभाव स्वरूप छेड़खानी और बलात्कार जेसी घटनाओं में वृद्धि होगी।। 
  6. इस वर्ष आकस्मिक प्राकृतिक आपदा के कारण किसान और जनता दोनों प्रभावित होंगें।। 
  7. सरकार और शासक वर्ग को बहुत कठिन हालात से गुजरना होगा।।
  8.  महंगाई बढ़ने के कारण जनता में असन्तोष बढ़ेगा।। 
  9. ज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत का वर्चस्व बढ़ेगा।। 
  10. विदेश निति सभी स्थानों पर कामयाब होगी और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का स्वप्न पूर्ण होगा।। 
  11.  पडोसी मुल्क अपनी हरकतों से परेशानी बढ़ाते रहेंगें।। 
  12. बम विस्फोट, आगजनी और आतंकी घटनाओं से आमजन प्रभावित होगा।। 
  13. पडोसी मुल्क के कारण कोई बड़ा हादसा या अपूरणीय क्षति संभावित हैं।। 
  14. भारत के रक्षा बजट में वृद्धि होगी।। 
  15.  इस वर्ष महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा।। 
  16. महिला उत्थान की योजनाएं सफल होगी।। 
  17. लोकसभा और राज्यसभा के साथ साथ अन्य उच्च पदों पर महिलाएं अपना प्रभाव बढ़ने में कारगर रहेंगी।।
  18.  धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भारत सुदृढ़ होगा।। 
  19. पेट्रोलियम और भूमिगत उर्वरा शक्ति मिलने से भारत को लाभ होगा।।
  20. आर्थिक रूप से उन्नति होगी।। 
  21. किसी बड़े और प्रभावी नेता का दुर्घटना में प्रभावित होने की योग बनता हैं।। 

 वर्षा--- इस वर्ष रोहिणी का वास् पर्वत पर होने एवम् समय वास कुम्हार के घर होने से वर्षा साधारण होगी।। चारे और अनाज की कमी से आमजन और पशु त्रस्त रहेंगें।। 
  • इस वर्ष जो, गेंहूँ,रुई,चना और चावल तथा तिलहन की फसल वर्षा की कमी से प्रभावित होकर नष्ट होना संभावित हैं।। 
  • अनेक स्थानों पर तेज हवाओ के कारण भी फसलों को नुकसान संभव हैं।। अतः वर्षा की कमी से खाद्यान्न और कृषि उपज की स्थिति कमजोर रहेगी।। 
  • आगामी वर्ष 2017 में होने वाली अतिवृष्टि इस वर्ष हुयी पानी की कमी को पूर्ण में कारगर होगी।।
  • देश में बढ़ाता भूजल स्तर चिंता का विषय बनेगा।। 
  •  देश में आर्थिक सुधर की नयी नयी योजनाएं बनेगी जो नाकाफी होंगी।। 

            ****श्री प्रणव मुखर्जी(राष्ट्रपति) की प्रचलित नाम से कन्या राशि वनती हैं जिसमे वर्ष लग्न से अष्टम में हैं।।आठ सितम्बर अक्टूबर में स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी आवश्यक हैं।।। 
          ***प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी वृश्चिक राशि से प्रभावित हैं।। वर्तमान में वृश्चिक राशि पर शनि की साढ़े सटी चल रही हैं।। अतः इस वर्ष मोदी जी को नाना प्रकार की कठिनाइयों से गुजरना होगा।। विरोधी पक्ष अड़ंगे डालकर सफलता में अवरोध पेदा करेगा।। मोदी जी अपनी सूझबूझ से देश को उन्नति में मार्ग पर ले जाने में सक्षम होंगें।। 
         **** श्रीमति सोनिया गांधी----इनकी जन्म लग्न कर्क और जन्म राशि मिथुन हैं।। वर्तमान में मिथुन राशि में चौथा शनि चल रहा गें जिसके कारण पार्टी में विरोध उभरेगा।। वृश्चिक का शनि होने से इनका स्वास्थ भी प्रभावित होगा।। इतना होने के बाद भी अपनी सुझबुझ से पार्टी को आगे बढ़ने में कामयाब होगी।। 
      इस वर्ष 2016 में सोने के भावों में भारी गिरावट रहेगी।। इस वर्ष जनवरी, आपर्क, जुलाई और दिसम्वर में सोने के भाव बहुत निचे आ जायेंगें।। इसके साथ साथ शेयर मार्केट या सेंसेक्स में भी उतार चढ़ाव बना रहेगा।। जनवरी, जुलाई और नवम्बर में तेजी रहेगी बाकि के समय मंदी ही बनी रहेगी।। डॉलर मजबूत बना रहेगा।। 2016 के अंतिम महीनों में रुपया थोडा मजबूत हो सकता हैं।।

जानिए आपकी जन्म कुंडली के राहु और वास्तु दोष का सम्बन्ध

       सामान्य प्रचलित धारणा के अनुसार यदि कुंडली मेँ सात ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल ,बुध ,गुरु, शुक्र और शनि ) जब राहु केतु के बीच स्थित हो जाते हैँ तो कालसर्प योग माना जाता हैं या बनता है ।। 
Know-your-horoscope-Rahu-and-architectural-defects-relations-जानिए आपकी जन्म कुंडली के राहु और वास्तु दोष का सम्बन्ध      पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार समान्यतः यदि किसी जातक( व्यक्ति) की जन्मकुंडली मेँ कालसर्प योग होता है तो उसे जिंदगी भर संघर्ष और कठिनाई से गुजरना पड़ता है व्यक्ति को जिंदगी भर काम काज स्वास्थ्य नौकरी व्यवसाय संबंधित परेशानी का सामना करना पड़ता है और ऐसी परिस्थिति में उसे ज्योतिर्विद कालसर्प योग/दोष पूजा का सलाह देते हैँ लेकिन 90 प्रतिशत जातक कहते हैँ कि पूजा से लाभ नहीँ हुआ और जीवन मेँ संघर्ष बरकरार है और इसका कारण समझ नहीं पाते है।। परन्तु पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इसका प्रमुख कारण होता है व्यक्ति की जन्मकुंडली मे कालसर्प योग होने की वजह से उत्पन्न हुआ उसके घर मे वास्तु दोष।। 
 कालसर्प योग की वजह से घर में निन्नलिखित वास्तु दोष पाए जाते हैँ---- 
  1. घर का मुख्य द्वार दक्षिण पूर्व और दक्षिण दक्षिण पूर्व के बीच होना, उत्तर पूर्व और पूर्व उत्तर पूर्व के बीच होना, पश्चिम उत्तर पश्चिम में होना , उत्तर उत्तर पश्चिम मे होना।। 
  2. घर का नॉर्थ ईस्ट मेँ शौचालय ,किचन , सीढ़ियाँ या उत्तर पूर्व का कटा होना।। 
  3. दक्षिण पश्चिम मेँ शौचालय का होना और साउथ का नीचा होना या पूजा घर गलत जगह पर होना साथ साथ ही ब्रह्म स्थान में भी वास्तुदोष होना । 

       पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब कोई व्यक्ति घर खरीदता है या किराए पर घर लेता है तो उस व्यक्ति को घर उस के ग्रहोँ के अनुसार ही मिलते हैँ यानी अगर जन्म कुंडली मेँ ग्रह की स्थिति खराब है तो उसके घर मेँ वास्तुदोष निश्चित ही पाए जाते हैँ ।। अगर जन्म कुंडली मेँ राहु खराब हो और जैसी स्थिति राहु की होगी घर मेँ टॉयलेट उसी जगह पर होता है और राहु के बुरे स्थिति होने की वजह से राहु की दशा अंतर्दशा मेँ व्यक्ति को दोहरा कष्ट झेलना पड़ता है ।। कई बार कुछ व्यक्ति ऐसे आते हैँ इनकी कुंडली में बहुत सारे ग्रहो की स्थिति अच्छी होती है फिर भी उनकी जीवन मेँ सफलता प्राप्ति नहीं होती इसका प्रमुख कारण है घर में वास्तु दोष का होना ।। हमारे वेदिक ज्योतिष ग्रन्थ एवम् ज्योतिर्विद ग्रहोँ की उपाय तो सही बताते हैँ लेकिन घर में वास्तु दोष होने के कारण उससे लाभ नहीँ मिलता और लोगो का ज्योतिष और उसके प्रभाव से विश्वास उठने लगता है बिना कारण या वजह जाने।। 
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जानिए पूजन में दीपक का महत्त्व एवम् प्रकार-- =================== 
इस चराचर जगत में जीवन जीने के लिए प्राणि मात्र को प्रकाश चाहिए। बिना प्रकाश के वह कोई भी कार्य नहीं कर सकता। सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रकाश सूर्य का है। इसके प्रकाश में अन्य सभी प्रकाश समाए रहते हैं। इसीलिए कहा गया है-- 
 शुभं करोति कल्याण आरोग्यं सुख संपदम्। 
 शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपज्योतिः नमोस्तुते। 
      पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिस व्यक्ति के हाथ में सूर्य रेखा स्पष्ट, निर्दोष तथा बलवान होती है या कुंण्डलीमें सूर्य की स्थिति कारक, निर्दोष तथा बलवान होती है, वह धनवान, कीर्तिवान, ऐश्वर्यवान होता है और दूसरे के मुकाबले भारी पड़ता है। वह बुराई से दूर रहता है। इसलिए पूजा पाठ में पहले ज्योति जलाकर प्रार्थना की जाती है कि कार्य समाप्ति तक स्थिर रह कर साक्षी रहें। पूजन के समय देवताओं के सम्मुख दीप उनके तत्व के आधार पर जलाए जाते हैं | 
         देवी मां भगवती के लिए तिल के तेल का दीपक तथा मौली की बाती उत्तम मानी गई है। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए देशी घी का दीपक जलाना चाहिए। वहीं शत्रु का दमन करने के लिए सरसों व चमेली के तेल सर्वोत्तम माने गए हैं। देवताओं के अनुकूल बत्तियों को जलाने का भी योग है| भगवान सूर्य नारायण की पूजा एक या सात बत्तियों से करने का विशेष महत्व है वहीं माता भगवती को नौ बत्तियों का दीपक अर्पित करना सर्वोत्तम कहा गया है। हनुमान जी एवं शंकरजी की प्रसन्नता के लिए पांच बत्तियों का दीपक जलाने का विधान है। इससे इन देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। अनुष्ठान में पांच दीपक प्रज्वलित करने का महत्व अनूठा है- सोना, चांदी, कांसा, तांबा, लौहा। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दीपक जलाते समय उसके नीचे सप्तधान्य (सात प्रकार का अनाज) रखने से सब प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यदि दीपक जलाते समय उसके नीचे गेहू रखें तो धन-धान्य की वृद्धि होगी। यदि दीपक जलाते समय उसके नीचे चावल रखें तो महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी। इसी प्रकार यदि उसके नीचे काले तिल या उड़द रखें तो स्वयं मां काली भैरव, शनि, दस दिक्पाल, क्षेत्रपाल हमारी रक्षा करेंगे। इसलिए दीपक के नीचे किसी न किसी अनाज को रखा जाना चाहिए। साथ में जलते दीपक के अंदर अगर गुलाब की पंखुड़ी या लौंग रखें, तो जीवन अनेक प्रकार की सुगंधियों से भर उठेगा। यहाँ विभिन्न धातुओं के दीपकों का महत्व एवम् प्रभाव का उल्लेख किया जा रहा है जिन्हें जलाने से उनसे संबद्ध मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 
  1.  सोने का दीपक:---- सोने के दीपक को वेदी के मध्य भाग में गेहूं का आसन देकर और चारों तरफ लाल कमल या गुलाब के फूल की पंखुड़ियां बिखेर कर स्थापित करें। इसमें गाय का शुद्ध घी डालें तथा बत्ती लंबी बनाएं और इसका मुख पूर्व की ओर करें। सोने के दीपक में गाय का शुद्ध घी डालते हैं तो घर में हर प्रकार की उन्नति तथा विकास होता है। इससे धन तथा बुद्धि में निरंतर वृद्धि होती रहेगी। बुद्धि सचेत बुरी वृत्तियों से सावधान करती रहेगी तथा धन सही स्रोतों से प्राप्त होगा। 
  2.  चांदी का दीपक:--- पूजन में चांदी के दीपक को चावलों का आसन देकर सफेद गुलाब या अन्य सफेद फूलों की पंखुड़ियों को चारों तरफ बिखेर कर पूर्व दिशा में स्थापित करें। इसमें शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। चांदी का दीपक जलाने से घर में सात्विक धन की वृद्धि होगी। 
  3.  तांबे का दीपक:---- तांबे के दीपक को लाल मसूर की दाल का आसन देकर और चारों तरफ लाल फूलों की पंखुड़ियों को बिखेर कर दक्षिण दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें और बत्ती लंबी जलाएं। तांबे के दीपक में तिल का तेल डालने से मनोबल में वृद्धि होगी तथा अनिष्टों का नाश होगा। 
  4.  कांसे का दीपक:---- कांसे के दीपक को चने की दाल का आसन देकर तथा चारों तरफ पीले फूलों की पंखुड़ियां बिखेर कर उत्तर दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें। कांसे का दीपक जलाने से धन की स्थिरता बनी रहती है। अर्थात जीवन पर्यन्त धन बना रहता है। 
  5.  लोहे का दीपक:---- लोहे के दीपक को उड़द दाल का आसन देकर चारों तरफ काले या गहरे नीले रंग के पुष्पो की पंखुड़ियां बिखेर कर पश्चिम दिशा में स्थापित करें। इसमें सरसों का तेल डालें। लोहे के दीपक में सरसों के तेल की ज्योति जलाने से अनिष्ट तथा दुर्घटनाओं से बचाव हो जाता है।

 जानिए कैसे करें ग्रहों की पीड़ा निवारण हेतु दीपक का प्रयोग :---- 
 पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिस प्रकार पूजा में नवग्रहों को अंकित किया जाता है वैसे ही चौकी( बाजोट या पाटिया) के मध्य में सोने के दीपक को रखा जाता है। सोने के दीपक में सूर्य का वास होता है। सबसे पहले इसकी चैकी को तांबे में मढ़वाने का अर्थ है शरीर में रंग की शुद्धता तथा प्रचुरता क्योंकि तांबे में मंगल का वास है और शरीर में मंगल खून का नियंत्रक है। 
       इसी तरह दीपकों को चैकी पर रखने का क्रम है। जिस प्रकार पूजा क्रम में सूर्य मंडल को मध्य में रखकर पूजा की जाती है और माना जाता है कि सूर्य के चारों तरफ आकाश में उससे आकर्षित होकर सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते रहते हैं और उपग्रह अपने ग्रह के साथ सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। उसी प्रकार अन्य दीपक सोने के दीपक के चारों तरफ स्थापित किए जाते हैं। मिट्टी या आटे का दीपक एक बार जलकर अशुद्ध हो जाता है। उसे दोबारा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।। यह दीपक पीपल एवं क्षेत्रपाल के लिए विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इन पांच दीपकों को जलाने से सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं साथ ही अन्य देवता प्रसन्न होते हैं। इससे तीनों बल बुद्धिबल, धनबल और देहबल की वृद्धि होती है और विघ्न बाधाएं दूर हो जाती हैं। इस प्रकार यह दीप ज्योति जहां जप पूजा की साक्षी होती है, वहीं वह जीवन में इतना उपकार भी करती है कि जातक ग्रह की कृपा प्राप्त कर लेता है।।। 
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जानिए आपके लग्न अनुसार आपका मारकेश कोन होगा ??? 
 सामान्य प्रचलित धरना अनुसार किसी जातां की जन्मकुण्डली में जो ग्रह मृत्यु या मृत्यु के समान कष्ट दें उन्हें मारकेश कहा जाता है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आप स्वयं अपनी जन्मकुंडली देखकर जान सकते है कि कौन सा ग्रह अपनी दशा में मारकेश का रूप लेंगे। कैसे ..??? 
 जानिए आपकी जन्मकुंडली के लग्नानुसार अपना मारकेश---- 
  1.  मेष लग्न- मेष लग्न में स्थित शुक्र दूसरे एंव सातवें भाव का मालिक है, किन्तु फिर भी जातक के जीवन को समाप्त नहीं करेगा। यह गम्भीर व्याधियों को जन्म दे सकता है। मेष लग्न में शनि दशवें और ग्यारहवें भाव का अधिपति होकर भी अपनी दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट देगा। 
  2.  वृष लग्न -वृष लग्न में स्थित मंगल सातवें एंव बारहवें भाव का मालिक होता है जबकि बुध दूसरे एंव पांचवें भाव का अधिपति होता है। वृष लग्न में शुक्र, गुरू व चन्द्र मारक ग्रह माने जाते है। 
  3.  मिथुन लग्न ----मिथुन लग्न में चन्द्र व गुरू दूसरे एंव सातवें भाव के अधिपति है। चन्द्रमा प्रतिकूल स्थिति में होने पर भी जातक का जीवन नष्ट नहीं करता है। मिथुन लग्न में बृहस्पति और सूर्य मारक बन जाते है। 
  4.  कर्क लग्न--- कर्क लग्न में शनि सातवें भाव का मालिक होकर भी कर्क के लिए कष्टकारी नहीं होता है। सूर्य भी दूसरे भाव का होकर जीवन समाप्त नहीं करता है। लेकिन कर्क लग्न में शुक्र ग्रह मारकेश होता है। 
  5.  सिंह लग्न ----सिंह लग्न में स्थित शनि सप्तमाधिपति होकर भी मारकेश नहीं होता है जबकि बुध दूसरे एंव ग्यारहवें भाव अधिपति होकर जीवन समाप्त करने की क्षमता रखता है। 
  6.  कन्या लग्न----कन्या लग्न में स्थित सूर्य बारहवें भाव का मालिक होकर भी मृत्यु नहीं देता है। यदि द्वितीयेश शुक्र , सप्तमाधिपति गुरू तथा एकादश भाव का स्वामी पापक्रान्त हो तो मारक बनते है किन्तु इन तीनों में कौन सा ग्रह मृत्यु दे सकता है। इसका स्क्षूम विश्लेषण करना होगा। 
  7.  तुला लग्न --- तुला लग्न में स्थित दूसरे और सातवें भाव का मालिक मंगल मारकेश नहीं होता है, परन्तु कष्टकारी पीड़ा जरूर देता है। इस लग्न में शुक्र और गुरू यदि पीडि़त हो तो मारकेश बन जाते है। 
  8.  वृश्चिक लग्न ---यहाँ स्थित गुरू दूसरे भाव का मालिक होकर भी मारकेश नहीं होता है। यदि बुध निर्बल, पापक्रान्त हो अथवा अष्टम, द्वादश, या तृतीय भावगत होकर पापग्रहों से युक्त हो जाये तो मारकेश का रूप ले लेगा। 
  9.  धनु लग्न --- यहाँ स्थित शनि द्वितीयेश होने के उपरान्त भी मारकेश नहीं होता है। बुध भी सप्तमेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। शुक्र निर्बल, पापक्रान्त एंव क्रूर ग्रहों के साथ स्थिति हो तो वह मारकेश अवश्य बन जायेगा। 
  10.  मकर लग्न ---मकर लग्न में स्थित शनि द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है क्योंकि शनि लग्नेश भी है। सप्तमेश चन्द्रमा भी मारकेश नहीं होता है। मंगल एंव गुरू यदि पापी या अशुभ स्थिति में है तो मारकेश का फल देंगे। 
  11.  कुम्भ लग्न ---यहाँ स्थित बृहस्पति द्वितीयेश होकर मारकेश है किन्तु शनि द्वादशेश होकर भी मारकेश नहीं है। मंगल और चन्द्रमा भी यदि पीडि़त है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है। 
  12.  मीन लग्न -- यहाँ स्थित मंगल द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। मीन लग्न में शनि और बुध दोनों मारकेश सिद्ध होंगे। अष्टमेश सूर्य एंव षष्ठेश शुक्र यदि पापी है और अशुभ है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है।।
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