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सोमवार--भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होगा चंद्र ग्रहण

full-moon-willlunar-eclipse-सोमवार--भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होगा चंद्र ग्रहणइस वर्ष का पितृपक्ष यानि श्राद्धपक्ष आगामी 28 सितम्बर, 2015 (सोमवार) से आरम्भ होगा॥ इसी दिन (भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा) को खग्रास या ग्रस्तास्त चंद्रग्रहण भी होगा जो की केवल पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात के तटवर्ती क्षेत्र में ही अल्प अवधि (01 मिनट से 03 मिनट) के लिए दृश्य होगा  महाराष्ट्र, पंजाब,हरियाणा एवम दिल्ली तथा हिमाचल प्रदेश में इसका असर या प्रभाव नहीं होगा .
         इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 08 बजकर 20 मिनट तक ही रहेगी तत्पश्चात एकम तिथि आरम्भ हो जाएगी॥ चूँकि इस खग्रास चंद्र ग्रहण का आरम्भ सायंकाल 06 बजकर 37 मिनट से होगा और इसका समापन 09 बजकर 57 मिनट पर होगा॥ पण्डित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि यह ग्रहण सोमवार को हो रहा हैं इसलिए यह ग्रहण "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" कहलाएगा॥ 'चूड़ामणि चंद्रग्रहण' का स्नान, दान आदि की दृष्टी से विशेष महत्त्व होता हैं अतः जिन क्षेत्र में यह ग्रहण दिखाई देगा वहां इस इस प्रकार के दान का विशेष महत्त्व होगा॥ श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा चंद्र ग्रहण होने से इसका महत्त्व बहुत बढ़ गया हैं।। 
        इस दिन उज्जैन स्थित प्राचीन सिद्धवट तीर्थ पर ( मध्यप्रदेश) आकर पितृदोष या कालसर्प दोष/ याग की शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध, नागबलि-- नारायण बाली श्राद्ध कर्म करवाने से पितरों को मुक्ति मिलती हैं।।। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार का यह "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" मीन राशि और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हो रहा हैं। इसलिए यह ग्रहण इस राशि और नक्षत्र वाले व्यक्तियों के लिए अधिक पीड़ा परेशनिदायक हैं॥ इस मीन राशि के अलावा मेष, मिथुन, कर्क, कन्या,तुला, वृश्चिक एवम कुम्भ राशि वालों को भी सावधानी रखनी चाहिए॥ यह खग्रास या ग्रस्तास्त चंद्रग्रहण मुख्य रूप से अफ्रीका,यूरोप, पश्चिमी एशिया(चीन, रुस, थाईलैंड,आस्ट्रेलिया, म्यांमार और दक्षिण कोरिया) एवम अमेरिका में दृश्य होगा॥ 
      भारत में यह खग्रास चंद्रग्रहण भुज,पोरबन्दर एवम जामनगर तथा नालिया (गुजरात) एवम राजस्थान के शाहगढ़ और घोटारु में देखा जा सकेगा॥ पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिन क्षेत्रों में यह ग्रहण दृश्य होगा वहां इस ग्रहण का सूतक 27 सितम्बर, 2015(रविवार) को सायंकाल 06 बजकर 37 से आरम्भ होगा और चन्द्रास्त तक रहेगा॥ भारत में 28 सितम्बर को चन्द्रास्त का अधिकतम समय शाम को 06 बजकर 42 मिनट हैं॥ विशेष संकेत---जिन राशि या नक्षत्र वाले जातकों को इस ग्रहण का फल अशुभ हैं उन्हें ग्रहण का दर्शन नहीं करना चाहिए॥गर्भवती स्त्रियां विशेष सावधानी रखें॥ ग्रहण अवधि में भोजन नहीं करें। अपने इष्टदेव की आराधना, भजन एवम मन्त्र जप आदि सद्कार्य करें॥ शभम भवतु॥ कल्याण हो।। 
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जानिए की चन्द्रग्रहण कब होता है ??? 
 जब सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पड़ता है। चूंकि ग्रहों व उपग्रहों का अपना कोई प्रकाश नहीं है, ये केवल सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं अतः चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़ने के कारण ही चन्द्र ग्रहण होता है। चन्द्रग्रहण का प्रकार और उसकी लम्बाई चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों व उसके कक्षीय पथ पर निर्भर करती है। जब हम जमीन पर खड़े होते हैं और सूरज कि रोशनी हमारी शारीर पर पड़ती है, तो जमीन पर हमें अपनी परछाई दिखती है l ठीक इसी प्रकार चन्द्रमा और पृथ्वी पर सूर्य के प्रकाश के पड़ने पर परछाइयां आकाश में बनती हैं.चुकि पृथ्वी और चन्द्रमा का आकार गोल है, इसलिए इसकी परछाइयां शंकु के आकार कि होती हैं.ये परछाइयां बहुत लम्बी होती हैं l 
        जो पिण्ड सूरज से जितनी अधिक दुरी पर होगा, परछाइयां भी उतनी ही अधिक लम्बी होंगी . ग्रहण का अर्थ है , किसी पिण्ड के हिस्से पर परछाई पड़ने से कालापन (अंधेरा ) हो जाना . हम जानते है कि पृथ्वी सूर्य कि परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथ्वी कि परिक्रमा करता है ये दोनों ही हज़ारों मिल लम्बी परछाइयां बनाते हैं, घूमते-घूमते जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही सीधी रेखा में आ जाते है, तथा पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच में होती है, तो पृथ्वी कि परछाई या छाया, जो सूर्य के विपरीत दिशा में होती है, चन्द्रमा पर पड़ती है. यह भी कह सकते है. कि पृथ्वी के बीच में आ जाने से सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पहुच पाता .जितने स्थान पर प्रकाश नहीं पहुच पता, उतना स्थान प्रकाश रहित (अन्धकार युक्त) हो जाता है .यही चन्द्रग्रहण कहलाता है . ऐसी स्थिति पूर्णिमा के दिन ही आ सकती है . इसलिए चन्द्रग्रहण जब भी होता है, केवल पूर्णिमा के दिन ही होता है. चन्द्रमा का जितना हिस्सा परछाई से ढक जाता है, उतना ही चन्द्रग्रहण होता है . यदि पृथ्वी कि छाया पुरे चन्द्रमा को ढक लेती है, तो पूर्ण चन्द्रग्रहण हो जाता है . आमतौर पर एक वर्ष में चन्द्रमा के तीन ग्रहण होते हैं l जिनमें एक पूर्ण चन्द्रग्रहण होता है . अब प्रश्न उठता है कि पूर्णिमा तो हर महीने होती है, लेकिन चन्द्रग्रहण तो हर मास नहीं होता. इसका कारण यह है कि चन्द्रमा के घुमने के रास्ते का ताल पृथ्वी के भ्रमंपथ के ताल के साथ 5 डिग्री का कोण बंटा है. इस कारण चन्द्रमा पृथ्वी कि छाया के स्तर से उपर निचे घूमता है .कभी-कभी ही ये तीनों एक सीधे में आते हैं . अत: चन्द्रग्रहण हर पूर्णिमा को नहीँ पड़ता. गणित का प्रयोग करके खगोलविद् आसानी से यह बता देते हैं कि चन्द्रग्रहण कब पड़ेगा और वह कितने समय रहेगा.
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 जानिए की क्या सावधानियां रखें ग्रहण के दोरान..??? 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार यदि आप गर्भवती हैं, या आपके घर में कोई महिला गर्भवती है या फिर आप इस साल फेमिली प्‍लानिंग करने जा रहे हैं, तो ग्रहण की इन तिथियों को कैलेंडर में जरूरनोट कर लें। --इसके अलावा नया मकान, या नई दुकान लेने जा रहे हैं, तो इन ति‍थियों पर लेने से बचें। ---इन तिथियों पर आपकी करियर लाइव, निजी जीवन, आय के स्रोत, परिवार, प्रेम-संबंध, आदि में व्‍यापक परिवर्तन हो सकते हैं। खुशियां आ सकती हैं या हो सकता है दु:ख घर कर जाये, लिहाजा आपको इन तिथियों पर विशेष सावधानी बरतनी होगी। --बेहतर होगा यदि उन सभी बातों का पालन करें, जो बड़े बुजुर्ग बताते हैं। पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार गर्भवती स्त्री को सूर्य एवं चन्द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्योंकी उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें. । ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और किसी वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है,क्योंकि ऐसी धारणा है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं । 
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  1.  पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार क्या सावधानियां रखे ग्रहण के समय..???
  2.  ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए। 
  3.  ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता आती है ।
  4.  शौच करने से पेट में क्रमी रोग पकड़ता है । ये शास्त्र बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता। 
  5. ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है । 
  6. ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से सर्प की योनि मिलती है । 
  7. जीव-जंतु या किसी की हत्या करने से नारकीय योनी में भटकना पड़ता है ।
  8. ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश किया तो कुष्ठ रोगी के शरीर में जाना पड़ेगा। 
  9. ग्रहण के समय बाथरूम में नहीं जाना पड़े, ऐसा खायें। 
  10. ग्रहण के दौरान मौन रहोगे, जप और ध्यान करोगे तो अनंत गुना फल होगा। पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार ग्रहण विधि निषेध === 
  11.  सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्बदेख कर भोजन करना चाहिये । (1 प्रहर = 3 घंटे) 
  12. ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहियेव दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना औरभोजन करना – ये सब कार्य वर्जित हैं । 
  13.  ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके जल मे जल डाल देना चाहिए । ऐसा करने से देनेवालेको उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले को उसका दोष भी नहीं लगता। 
  14. कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये । 
  15. ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थाे मे तिल या कुशा डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिये ।
  16. ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति मे ही करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिये । 
  17. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्तहोता है । 
  18. तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु संतानयुक्त ग्रहस्थको ग्रहणऔर संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिये। 
  19.  स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षाे का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।
  20.  देवी भागवत में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये । 
  21.  देवी भागवत में आता है की सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। ग्रहण के अवसर पर पृथवी को नहीं खोदना चाहिए । 
  22.  पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर ( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालकक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।
  23.  ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए। 
  24. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। 
  25.  ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। 
  26. ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए।

 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार ग्रहण के समय केसे करें मंत्र सिद्धि .???
 1. ग्रहण के समय “ घ् ह्रीं नमः “ मंत्र का 10 माला जप करें इससे ये मंत्र सिद्धि हो जाता है । 
 2. श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके श्घ् नमो नारायणायश् मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणाशक्ति), कवित्व शक्ति तथा वाक सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
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 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा और स्नान मान्यता है कि चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ, अनुष्ठान, दान आदि का अत्यधिक फल मिलता है। मत्स्य पुराण के अनुसार ग्रहण काल के दौरान जातक को श्वेत पुष्पों और चन्दन आदि से चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। चन्द्र ग्रहण के खत्म होने पर जातक को स्नान और दान (विशेषकर गाय का दान) करना चाहिए।हिंदू धर्म की मान्‍यता के अनुसार चंद्र ग्रहण अच्‍छा नहीं माना जाता है। ग्रहण के कुप्रभाव से बचने के लिये इन तिथियों पर आप गरीबों को दान दें। गरीबों को भोजन करायें, मंत्रों का उच्‍चारण करें, जिनमें गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्‍ठ फल देगा। अपने ईष्‍ट देव का ध्‍यान करें। भोजन नहीं करें। ग्रहण के बाद स्‍नान करें और ताज़ा भोजन करें। साथ ही यदि आप गर्भवती हैं तो आपके होने वाले बच्‍चे पर ग्रहण के प्रभाव से बचाने के लिये एकांत स्‍थान पर बैठ जायें और ईश्‍वर का ध्‍यान करें। यह काम आप सूर्य ग्रहण के समय भी करें।
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 ग्रहण काल में चन्द्र के प्रभावों को शुभ करने के लिये चन्द्र की वस्तुओं का दान किया जाता है – 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए निम्न उपाय करे –ग्रहण में बालक, वृद्ध और रोगी के लिए कोई नियम शास्त्रों में नहीं बताया गया है । 
  1. चिटियों को पिसा हुआ चावल व आट्टा डाले । 
  2. चन्द्र की दान वस्तुओं में मोती, चांदी, चावल, मिसरी, सफेद कपड़ा,सफेद फूल, शंख, कपूर,श्वेत चंदन, पलाश की लकड़ी, दूध, दही, चावल, घी, चीनी आदि का दान करना शुभ रहेगा ,
  3. कुंडली के अनुसार चन्द्रमा को मन और माँ का कारक माना गया है जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस भाव में हो उसके अनुसार दान करना चाहिए . चन्द्र वृष राशी में शुभ और वृश्चिक राशी में अशुभ होता है , जब चन्द्र जन्म कुण्डली मे उच्च का या अपने पक्के भाव का हो तब चन्द्र से सम्बन्धित वस्तुऑ का दान नही करना चाहिए, अगर चन्द्र दितीय चतुर्थ भाव मे हो तो चावल चीनी दुध का दान न करे , यदि चन्द्र वृश्चिक राशी में हो तो चन्द्र की शुभता प्राप्त करने के लिए मन्दिर,मस्जिद, गुरुद्धारा, शमशान या आम जनता के लिए प्याउ( पानी की टंकी ) बनवाए या किसी मिटटी के बर्तन में चिड़ियों के लिये पानी रखे . 

चन्द्र का वैदिक मंत्र :- चंद्रमा के शुभ प्रभाव प्राप्त करने हेतु चंद्रमा के वैदिक मंत्र का 11000 जप करना चाहिए।.
”””ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः “””या “””ऊँ सों सोमाय नमः “”
 —-चन्द्र दोष दूर करने के लिए सोमवार, अमावस्या का दिन बहुत ही शुभ होता है। किंतु चन्द्र दोष से पीडि़त के लिए चन्द्रग्रहण के दौरान चन्द्र उपासना बहुत ही जरूरी होती है। शिव जी की आराधना करें। अपने श्री इष्ट देवताये नम:, का जाप करे…. 
 इस चंद्रग्रहण पर करें यह प्रयोग, बिजनेस में जरुर मिलेगी सफलता—- 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार यदि आपका बिजनेस ठीक नहीं चल रहा है तो घबराईए बिल्कुल मत क्यों की 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को को आने वाला चंद्र ग्रहण इस समस्या से छुटकारा पाने का श्रेष्ठ अवसर है। 
बिजनेस की सफलता के लिए चंद्रग्रहण के दिन यह प्रयोग करें-
 ऐसे करें प्रयोग—– पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को ग्रहण से पहले नहाकर लाल या सफेद कपड़े पहन लें। इसके बाद ऊन व रेशम से बने आसन को बिछाकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। जब ग्रहण काल प्रारंभ हो तब चमेली के तेल का दीपक जला लें। अब दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला लें तथा बाएं हाथ में 5 गोमती चक्र लेकर नीचे लिखे मंत्र का 54 बार जप करें- 
मन्त्र 
“”””ऊँ कीली कीली स्वाहा””” 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार अब इन गोमती चक्रों को एक डिब्बी में डाल दें और फिर क्रमश: 5 हकीक के दाने व 5 मूंगे के दाने लेकर पुन: इस मंत्र का 54 बार उच्चारण करें। अब इन्हें भी एक डिब्बी में डालकर उसके ऊपर सिंदूर भर दें। अब दीपक को बुझाकर उसका तेल भी इस डिब्बी में डाल दें। इस डिब्बी को बंद करके अपने घर, दुकान या ऑफिस में रखें। आपका बिजनेस चल निकलेगा।
 —-इस चंद्रग्रहण पर करें यह उपाय/टोटका, होगा अचानक धन लाभ—- चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को तंत्र शास्त्र के अनुसार ग्रहण के दौरान किया गया प्रयोग बहुत प्रभावशाली होता है और इसका फल भी जल्दी ही प्राप्त होता है। इस मौके का लाभ उठाकर यदि आप धनवान होना चाहते हैं तो नीचे लिखा उपाय करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी और आपको अचानक धन लाभ होगा। 
ऐसे करें उपाय/टोटका —- 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को ग्रहण के पूर्व नहाकर साफ पीले रंग के कपड़े पहन लें। ग्रहण काल शुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके ऊन या कुश के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने पटिए(बाजोट या चौकी) पर एक थाली में केसर का स्वस्तिक या ऊँ बनाकर उस पर महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें। इसके बाद उसके सामने एक दिव्य शंख थाली में स्थापित करें।अब थोड़े से चावल को केसर में रंगकर दिव्य शंख में डालें। घी का दीपक जलाकर नीचे लिखे मंत्र का कमलगट्टे की माला से ग्यारह माला जप करें- ये हें मंत्र—- 
 सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि मुक्ति मुक्ति प्रदायिनी। 
 मंत्र पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।। 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार मंत्र जप के बाद इस पूरी पूजन सामग्री को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में आपको अचानक धन लाभ होगा।
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 जानिए कुंडली के अनिष्ट कारक ग्रहण योग--- 
 हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है. चंद्रमा दुसरे भाव में शुभ फल देता है और अष्टम भाव में अशुभ फल देता है. चन्द्र ग्रह वृषव राशी में उच्च और वृश्चक राशी में नीच का होता है. जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है. 

 जानिए क्या होता हैं ग्रहण दोष..??? 
 ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .
                  पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग 18 महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है
 ---ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है.
 ----चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . 
        चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. 
        ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है 
 जानिए ग्रहण योग के लक्षण--- 
 दूसरो को दोष देने की आदत 
 वाणी दोष से सम्बन्ध ख़राब होते जाते है ,सम्बन्ध नहीं बचते
सप्तम भाव का दोष marriage सुख नहीं देता 
प्रथम द्वितीय नवम भाव में बनने वाले दोष भाग्य कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है ,
 मन हमेशा नकारात्मक रहता है , 
हमेशा आदमी depression में रहता है,
कभी भी ऐसे आदमी को रोग मुक्त नहीं कहा जा सकता
पैरो में दर्द होना , दूसरे को दोष देना ,खाने में बल निकलते है , 
 ---उपाय --- 
त्रयोदशी को रुद्राभिषेक करे specially शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को
खीरा कब्ज दूर करता है ,liver मजबूत करता है ,पित्त रोग में फायदा करता है ,जो लोग FAT कम करना चाहे उनको फायदा करता है, किडनी problems में फायदा करता है --ग्रहण योग वाले आदमी के पास काफी उर्जा होती है यदि वो उसे +वे कर ले तो जीवन में अच्छी खासी सफलता मिल जाती है 
ग्रहण योग के लक्षण
  1. घर में अचानक आग लग जाये या चोरी हो जाये 
  2. 12th house में चंद्रमा after marriage गरीबी दे देगा जानिए ग्रहण योगों को +ve करने का तरीका---
  3. गुरु के सानिध्य में रहे , 
  4. मंदिर आते जाते रहे , 
  5. हल्दी खाते रहे , 
  6. गाय के सानिध्य में रहे , 
  7. सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे , -
  8. चांदी का चौकोर टुकड़ा अपनी जेब में रखे यदि माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है , 
  9. संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर बना ले या किसी और के नाम पे रख दे , 
  10. कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम में खर्च करे , 

 किसी जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रहण योग निवारण का एक आसान उपाय ( इसे ग्रहण काल के मध्य में करे)---
 1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु के साथ है तो चूना पत्थर ले उसे एक भूरे कपडे में बांध कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा किसी मंदिर में चढ़ा दे.

गणेश चतुर्थी विशेष : गणेश चतुर्थी पर कैसे करें भगवान गणेश की आराधना

श्री गणेश चतुर्थी केवल उत्सव ही नहीं अपितु त्यौहार एवं व्रत भी है 
ganesh-chathurthi-17-september-2015-india-गणेश चतुर्थी विशेष : गणेश चतुर्थी पर कैसे करें भगवान गणेश की आराधना           प्रत्येक व्यक्ति इसे विविध रूप में तथा बडे धूमधाम से मनाता है । केवल भारत में ही नहीं, विदेश में भी गणेश चतुर्थी मनाई जाती है । भारत के लोकप्रिय त्यौहारों में दीपावली के उपरांत श्री गणेश चतुर्थी का ही नाम आता है । गणेश चतुर्थी घर में त्यौहार अथवा व्रत के रूप में मनाई जाती है, तो सामाजिक स्तर पर यह उत्सव के रूपमें मनाई जाती है । गणेशोत्सव के कारण समाज की सात्त्विकता तो बढती ही है, साथ ही सामाजिक संगठन भी साध्य होता है । भगवान श्री गणेश की पूजा से एक अजीब ऊर्जा का संचार साधक को मिलता हैं ।। 
         किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करने से पूर्व भगवान देवाधिदेव गणेश की पूजा--आराधना से संभावित कष्ट- परेशानियां सरलता से दूर हो जाते हैं ।। हिन्दू सनातन धर्म ग्रन्थ शिवपुराण के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेशजी की अवतरण-तिथि को गणेश चतुर्थी की पूजा धूम-धाम से मान्या जाता है| जबकि गणेशपुराणके अनुसार गणेशावतार भाद्रमाह शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण + पति = गणपति। संस्कृत कोषानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्र। ‘पति’ अर्थात स्वामी, ‘गणपति’ अर्थात पवित्रता के स्वामी।
 ---आइये जाने और समझे भगवान गणेश जी के स्वरूप को
 सामान्य भाषा में गणेश का अर्थ है जो ‘आत्म बोध’। जो निरंतर ‘स्व’ के ज्ञान के साथ बाधाओं को दूर करते हुए जीवन जीता है वह गणेश है। गणेश का अर्थ है एक आदर्श मनुष्य। गणेश का एक अर्थ ‘गणों का समूह’ भी है। सांसारिक अर्थों में ‘गणों’ का अर्थ है विभिन्न प्रकार के गुण और ऊर्जा (मनुष्य की प्रवृत्ति)। गणेश का सामान्य अर्थ है अपने स्व को पहचानते हुए निरंतर और अनंत ज्ञान की प्राक्ति कर बाधाओं को दूर करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त करना। हिंदू धर्म में एक नहीं, 65 हजार देवी-देताओं की पूजा होती है। सबकी अलग-अलग विशेषताएं हैं। सभी असल जीवन में जीने के खास मंत्र देते हैं। भगवान गणेश विघ्नविनाशक, मंगलमूर्ति माने जाते हैं। देवों में प्रथम पूज्य भगवान गणेश बुद्धि के देवता माने जाते हैं। सांसारिक जीवन में संपूर्ण गणेश अपने आप में जीने की सीख देते हैं। यहां हम बता रहे हैं कि गणेशजी की वेश-भूषा, उनके अस्त्र-शस्त्र और खान-पान के बारे में। 
 ----जानिए जीवन के लिए क्या सीख देते हैं भगवान् गणेश जी:
            सामान्य भाषा में गणेश का अर्थ है जो ‘आत्म बोध’। जो निरंतर ‘स्व’ के ज्ञान के साथ बाधाओं को दूर करते हुए जीवन जीता है वह गणेश है। गणेश का अर्थ है एक आदर्श मनुष्य। गणेश का एक अर्थ ‘गणों का समूह’ भी है। सांसारिक अर्थों में ‘गणों’ का अर्थ है विभिन्न प्रकार के गुण और ऊर्जा (मनुष्य की प्रवृत्ति)। गणेश का सामान्य अर्थ है अपने स्व को पहचानते हुए निरंतर और अनंत ज्ञान की प्राक्ति कर बाधाओं को दूर करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त करना। किसी भी काम की शुरूआत से पहले ‘औउम गणेशाय नम:’ मंत्र उच्चारण का अर्थ है कि हम जो भी कर रहे हैं हमारी बुद्धि उसमें हमारे साथ रहे। हाथी का सिर (बड़ा सिर और बड़े कान): हाथी का सिर जो सभी तरफ देख सकता है। एक आदर्श जीवन के लिए इंसान के अंदर की असीमित बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। गणेश का साधारण से बड़ा सिर एक सफल और आदर्श जीवन जीने के लिए बुद्धिमत्ता, समझदारी के साथ रहने की सलाह देता है। इसके अनुसार बुद्धिमत्ता का अर्थ है स्वतंत्र सोच और गहन चिंतन। यह दोनों ही मनुष्य तभी पा सकता है जब उसे आध्यात्मिक ज्ञान हो। आध्यात्मिक ज्ञान के लिए सुनना बहुत आवश्यक है। सुनने से अर्थ है गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान या गुरु से ज्ञान प्राप्त करना। 
      गणेश के बड़े कान इस श्रवण शक्ति को उच्च रखने का प्रतीक हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि इंसान कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो उसे हमेशा दूसरों के विचार और सुझावों को अवश्य सुनना चाहिए। सामान्य शब्दों में गणेश इस बात का प्रतीक हैं कि खुले विचारों के साथ दूसरों की राय और सुझावों को सुनकर उसमें से अपने लिए अनुकूल का चयन कर अमल करने वाला ही बुद्धिमान है। छोटा मुंह: कम बोलो। बड़ा सिर: बड़ा सोचो। 
 बड़े कान और छोटा मुंह:----सुनो ज्यादा, बोलो कम। 
सूंड:---एक तीव्र (विकसित) बुद्धि का प्रतीक है जो समझदारी से आती है। इस एक सूंड से एक बड़े वृक्ष को भी उखाड़कर फेंका जा सकता है और सुई को जमीन से भी उठाया जा सकता है। मतलब यह इंसान को संपूर्ण शक्तिशाली बनाता है, सभी परेशानियों को हल कर सकने में सक्षम बनाता है। 
 ----जानिए ज्योतिष, भगवान गणेश और ग्रहों का सम्बन्ध
 भगवान गणेश जी को हमारे वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह से संबद्ध किया जाता है। इनकी उपासना नवग्रहों की शांतिकारक व व्यक्ति के सांसारिक-आध्यात्मिक दोनों तरह के लाभ की प्रदायक है। अथर्वशीर्ष में इन्हें सूर्य व चंद्रमा के रूप में संबोधित किया है। सूर्य से अधिक तेजस्वी प्रथम वंदनदेव हैं। इनकी रश्मि चंद्रमा के सदृश्य शीतल होने से एवं इनकी शांतिपूर्ण प्रकृति का गुण शशि द्वारा ग्रहण करके अपनी स्थापना करने से वक्रतुण्ड में चंद्रमा भी समाहित हैं। पृथ्वी पुत्र मंगल में उत्साह का सृजन एकदंत द्वारा ही आया है। बुद्धि, विवेक के देवता होने के कारण बुध ग्रह के अधिपति तो ये हैं ही, जगत का मंगल करने, साधक को निर्विघ्नता पूर्ण कार्य स्थिति प्रदान करने, विघ्नराज होने से बृहस्पति भी इनसे तुष्ट होते हैं। धन, पुत्र, ऐश्वर्य के स्वामी गणेशजी हैं, जबकि इन क्षेत्रों के ग्रह शुक्र हैं। 
          इस तथ्य से आप भी यह जान सकते हैं कि शुक्र में शक्ति के संचालक आदिदेव हैं। धातुओं व न्याय के देव हमेशा कष्ट व विघ्न से साधक की रक्षा करते हैं, इसलिए शनि ग्रह से इनका सीधा रिश्ता है। चूँकि गणेशजी के जन्म में भी दो शरीर का मिलाप (पुरुष व हाथी) हुआ है। इसी प्रकार राहु-केतु की स्थिति में भी यही स्थिति विपरीत अवस्था में है अर्थात गणपति में दो शरीर व राहु-केतु के एक शरीर के दो हिस्से हैं। इसलिए ये भी गणपतिजी से संतुष्ट होते हैं। गणेशजी की स्तुति, पूजा, जप, पाठ से ग्रहों की शांति स्वमेव हो जाती है। किसी भी ग्रह की पीडा में यदि कोई उपाय नहीं सूझे अथवा कोई भी उपाय बेअसर हो तो आप गणेशजी की शरण में जाकर समस्या का हल पा सकते हैं। विघ्न, आलस्य, रोग निवृत्ति एवं संतान, अर्थ, विद्या, बुद्धि, विवेक, यश, प्रसिद्धि, सिद्धि की उपलब्धि के लिए चाहे वह आपके भाग्य में ग्रहों की स्थिति से नहीं भी लिखी हो तो भी विनायकजी की अर्चना से सहज ही प्राप्त हो जाती है। 
 ----भगवान गणेश और बुद्धि का सम्बन्ध
 प्रत्येक मनुष्य में दो प्रकार की बुद्धि होती है एक ‘स्थूल’ और दूसरी ‘तीव्र (तीक्ष्ण या सूक्ष्म बुद्धि)’। स्थूल बुद्धि हमेशा विपरीत आभासों की पहचान करती है जैसे काला-उजला, कठोर-मुलायम, आसान-कठिन आदि जबकि तीव्र बुद्धि सही-गलत, स्थायी-अस्थायी आदि के बीच अंतर की पहचान करती है। आत्मज्ञानी इंसान में ये दोनों ही बुद्धि विकसित होते हैं। ऐसे इंसानों की सोच प्रखर होती है और यह सही-गलत की पहचान कर सकने में सक्षम होता है। इस विकसित सोच के बिना इंसान एक स्पष्ट सोच नहीं रख पाता और हमेशा भ्रमित रहता है लेकिन जिसने इस स्पष्ट बुद्धि को पा ली उसका पूरा जीवन आसान हो जाता है। यह सूंड इसी अत्मज्ञानी बुद्धि का प्रतीक है।
         इसका एक और अर्थ यह भी है कि आत्मज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य संसार में विरोधाभासी विचारों से बहुत दूर रहता है। उसे अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण होता है और पसंदगी-नापसंदगी जैसी चीजों से बहुत दूर रहते हुए वह अपने लिए सही का चुनाव कर लेता है। 
  1. एकदंत: अच्छे को रखो, बुरे को छोड़ दो (अच्छी आदतें रखकर बुरे को दूर कर दो)। गणेश की बाईं तरफ का दांत टूटा है। इसका एक अर्थ यह भी है। मनुष्य का दिल बाईं ओर होता है। इसलिए बाईं ओर भावनाओं का उफान अधिक होता है जबकि दाईं ओर बुद्धि परक होता है। 
  2. बाईं ओर का टूटा दांत इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य को अपनी भावनाओं को अपने बुद्धि से नियंत्रण में रखना चाहिए। इसका दूसरा अर्थ है कि मनुष्य को पूरे विश्व को एक समझना चाहिए और खुद को उस विश्व का आंतरिक हिस्सा।
  3.  छोटी आंखें: एकाग्र चित्त। अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहो। मन को भटकने मत दो। 
  4. बड़ा पेट: अच्छी-बुरी सभी बातों/भावों को समान भाव से ग्रहण करना/समान भाव में लेना। दूसरे शब्दों में यह मनुष्य को उदार प्रवृत्ति का होने की सीख भी देता है। चारों हाथों के अलग-अलग भाव और शस्त्रों के अर्थ: कुल्हाड़ी: भावनाओं/मोह-माया से दूर रहना। दूसरे शब्दों में यह मनुष्य को अध्यात्मिक होने की सलाह देता है। अध्यात्मिकता की कुल्हाड़ी से इच्छा का विनाश। इसका एक अर्थ यह भी है कि बुद्धिमान मनुष्य पर अपने पुराने अच्छे-बुरे सभी कर्मों के प्रभाव से मुक्त (कटा) रहता है और खुशहाल जीवन जीता है। 
  5. हाथों में रस्सी: अपने लक्ष्य की ओर हमेशा अग्रसर रहना। लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहने के लिए हर संभव प्रयास करना। अध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह रस्सी भौतिकवादी संसार से बाहर निकलने के लिए हमेशा प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता है। 
  6. कमल: जैसे कीचड़ में होने के बावजूद कमल खिलता है और उसी में रहते हुए अपना अस्तित्व बरकरार रखता है उसी प्रकार संसार में रहते भी तमाम विषमताओं/विरोधों-परेशानियों का सामना करते हुए भी मनुष्य जीवन को मुक्त भाव से जीता है और अपनी विशेषताओं को खत्म नहीं देता।
  7. आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ: उच्च कार्यक्षमता और अनुकूलन क्षमता। परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेने की क्षमता विकसित करने वाले की हमेशा जीत होती है। इसका एक अर्थ यह भी है कि बुद्धिमान मनुष्य अपने साथ हमेशा दूसरों के भले का भी सोचता है।
  8.  नीचे की ओर हाथ: मतलब एक दिन हर किसी को मिट्टी में मिल जाना है। 
  9. लड्डू (मोदक): साधना का फल अवश्य मिलता है। यहां एक और बात यह है कि भगवान गणेश की किसी भी मुद्रा में उन्हें लड्डू खाते नहीं दिखाया जाता। इसका एक अर्थ यह भी है कि बुद्धिमान मनुष्य को पुरस्कार तो मिलते हैं लेकिन वह उन पुरस्कारों के मोह में कभी बंधता नहीं और उनके कुप्रभावों से हमेशा दूर ही रहता है। 
  10. चूहे की सवारी: इच्छाओं का प्रतीक है। जैसे चूहा की इच्छा कभी पूरी नहीं होती, उसे कितना भी मिले हमेशा खाता ही रहता है वैसे ही मनुष्य की इच्छाएं भी कितना भी मिले कभी तृप्त नहीं होती। गणेश हमेशा चूहे की सवारी करते हैं। इसका अर्थ है कि बेकाबू इच्छाएं हमेशा विध्वंस का कारण बनते हैं। इसलिए इन इच्छाओं को काबू में रखते हुए इसे अपने मनमुताबिक मोड़ो, न कि इन इच्छाओं के मुताबिक खुद को बहाओ। 
  11. एक पैर पर खड़ा होने का भाव: गणेश की यह अवस्था यह बताती है कि हालांकि दुनिया में रहते हुए मनुष्य को सांसारिक कर्म भी करने जरूरी हैं वस्तुत: इस सबमें एक संतुलन बनाए रखते हुए उसे अपने सभी अनुभवों को परे रखते हुए अपनी आत्मा से भी जुड़ाव रखना चाहिए और आध्यात्मिक होना चाहिए। जीवन में अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को कभी उपेक्षित नहीं करना चाहिए। 
  12. गणेश के पैरों में प्रसाद:--- धन और शक्ति का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि जो अपना जीवन सत्य की राह पर जीते हैं उन्हें संसार पुरस्कार जरूर देता है। अपने क्षेत्र में आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने वालों को सम्मान और धन अवश्य मिलता है चाहे उन्होंने इसकी कामना न की हो। प्रसाद के बारे में एक रोचक बात यह भी है कि भगवान गणेश के चित्रों में प्रसाद के साथ ही एक चूहा भी अवश्य रहता है और वह गणेश जी की तरफ देख रहा होता है। इसका अर्थ है कि पुरस्कार पाने के बाद भी इंसान को अपनी इच्छाओं और भावनाओं को काबू में रखना चाहिए। 

 ----जानिए श्री गणेशजीके विविध नाम
 मुद्गल ऋषि द्वारा रचित श्री गणेशसहस्रनाम में श्रीगणेशजी के एक सहस्र नाम दिए गए हैं । द्वादशनाम स्तोत्र में श्री गणेशके वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र इत्यादि बारह नाम हैं । श्री गणेशजीको ‘विघ्नहर्ता’ भी कहते हैं । विघ्नहर्ता अर्थात सभी विघ्नोंका हरण करनेवाले । 
 ----जानिए श्री गणेशजीको ‘विघ्नहर्ता’ कहने का अध्यात्मशास्त्रीय कारण
अष्ट दिशाओं में तीन सौ साठ विभिन्न तरंगें निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं । ये तरंगें रज एवं तमयुक्त होती हैं । इनमें रज तरंगों को तिर्यक तरंगें कहते हैं तथा तम तरंगों को विस्फुटित तरंगें कहते हैं । इन तरंगों के समुदाय होते हैं । इन समुदायों को गण कहते हैं । ये गण-समुदाय जीवसृष्टि पर अनिष्ट प्रभाव डालते हैं, जिससे जीवसृष्टि को विविध विघ्नों का सामना करना पडता है । श्री गणेशजी इन तरंग-समुदायों को नियंत्रित कर विघ्नों को हरते हैं अर्थात नष्ट करते हैं । साथ ही अधो अर्थात नीचे की एवं ऊर्ध्व अर्थात ऊपरकी दिशा पर भी वे नियंत्रण रखते हैं । इसलिए श्री गणेशजी को ‘विघ्नहर्ता’ कहते हैं । कार्यके अनुसार भी श्रीगणेशजी के विविध नाम हैं । 
 ------जानिए श्री गणेशजी की कुछ विशेषताएं
  1. प्रत्येक शुभकार्य में प्रथम पूजन होना
  2. किसी भी कार्यका शुभारंभ करनेको ‘श्री गणेश करना’ कहते हैं । श्री गणेशजी दसों दिशाओंके स्वामी हैं । दसों दिशाओंसे आनेवाले अच्छे एवं कष्टदायक स्पंदनोंपर श्री गणेशजीका ही नियंत्रण रहता है । प्रत्येक कार्यके आरंभमें श्रीगणेशजीका पूजन तथा स्मरण करनेसे दसों दिशाओंके मार्ग खुल जाते हैं परिणामस्वरूप जिस देवताका आवाहन किया जाता है, उनका तत्त्व पूजास्थानपर सहज आ सकता है । अर्थात श्री गणेशजी हमें आवश्यक देवतातत्त्वका लाभ करवाते हैं । इसी कारणसे किसी भी शुभकार्यके आरंभमें श्री गणेशजीका स्मरण, वंदन एवं पूजन किया जाता है । इसीको ‘महाद्वारपूजन’ अथवा ‘महागणपतिपूजन’ कहते हैं । 
  3. अनिष्ट शक्तियोंके कारण होनेवाले कष्टका निवारण करना
  4. समाज के अधिकांश व्यक्तियों के जीवन में अनेक अडचनें होती हैं । अनिष्ट शक्तियों के कारण भी उन्हें विविध शारीरिक तथा मानसिक कष्ट होते हैं; परंतु दुर्भाग्यसे अनेक व्यक्ति ऐसे कष्टों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं । कुछ लोग अनिष्ट शक्ति की पीडा के निवारण हेतु मंत्र-तंत्र जैसे उपाय करते हैं । इन उपायों का तात्कालिक परिणाम मिलता है । परंतु अनिष्ट शक्तियों के कष्ट का स्थायी निवारण साधना से ही हो सकता है । इसके लिए उच्च देवताओं की उपासना आवश्यक है । 
  5. ये सात उच्च देवता हैं – श्री गणपति, श्रीराम, मारुति, शिव, श्री दुर्गादेवी, भगवान दत्तात्रेय एवं भगवान श्रीकृष्ण । इन उच्च देवताओं में भाव सहित श्रीगणेशजी का नाम जप करने से अनिष्ट शक्तियों की पीडा से निवारण हो सकता है । अनिष्ट शक्तियों से पीडित व्यक्ति से बात करने पर उससे प्रक्षेपित रज-तमका परिणाम अन्य व्यक्तियों पर भी होता है । इसलिए उनके संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को प्रकृति के अनुसार सिरदर्द तथा जी मितलाना अर्थात नॉशिआ जैसे विविध प्रकार के कष्ट हो सकते हैं । श्री गणेशजी के नाम जप के चैतन्य से ये कष्ट घट जाते हैं । 

 ----श्री गणेशजीसे संबंधित तिथि---- 
 श्री गणेशजी की तत्त्व तरंगें सर्वप्रथम जिस तिथि को पृथ्वी पर आईं, वह तिथि थी चतुर्थी । तबसे श्री गणेशजी का एवं चतुर्थी का संबंध स्थापित हुआ । इस तिथि पर पृथ्वी के स्पंदन श्री गणेशजी के स्पंदनों के समान होते हैं । इसलिए वे एक-दूसरे के लिए अनुकूल होते हैं । अर्थात उस तिथि पर श्री गणेशजी के स्पंदन पृथ्वी पर अधिक प्रमाण में आते हैं । प्रत्येक मास की चतुर्थी के दिन पृथ्वी पर गणेशतत्त्व नित्य की तुलना में सौ गुना अधिक कार्यरत रहता है । इस तिथि पर की गई श्रीगणेशजी की उपासना से गणेशतत्त्व का लाभ अधिक होता है । इस दिन श्री गणेशजीके तारक एवं मारक तत्त्व भी अन्य दिनोंकी तुलनामें अधिक कार्यरत रहते हैं । इस दिन ब्रह्मांडसे भूमंडलपर गणेश तत्त्वकी तरंगें आकृष्ट होती हैं । इनके कारण वातावरणकी सात्त्विकता बढती है एवं रज-तम कणोंका विघटन होता है । विघटनका अर्थ है, रज-तमका प्रमाण घट जाना । प्रत्येक माहमें मुख्यतः दो चतुर्थी आती हैं । प्रथम शुक्लपक्षमें आनेवाली विनायकी चतुर्थी तथा दूसरी है, कृष्णपक्षमें आनेवाली संकष्टी चतुर्थी । मंगलवारके दिन आनेवाली चतुर्थीको ‘अंगारकी चतुर्थी’ कहते हैं । 
 ----जानिए की कैसे करें चंद्र दर्शन दोष से बचाव---- 
 प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रदर्शन करने के पश्चात् व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी की रात्रि को चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने के) पश्चात् आहार लेन का समय निषिद्ध किया गया है। जो व्यक्ति इस रात चन्द्रमा देखता हैं उन् व्यक्ति को झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों में लिखा गया है। यह भी माना जाता है की गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम मिलता है, इसमें किए संशय नहीं है। यदि आप जाने-अनजाने में चन्द्रमा देख भी लें तो इस मंत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए--- 
 ‘सिहः प्रसेनम् अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः। 
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥’

श्री कृष्ण जन्म अष्टमी 201 5 में शनिवार (5 सितम्बर 2015) शिक्षक दिवस को मनेगी

        जब-जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। चूँकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी अथवा जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष रात्रि बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झाँकियाँ सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। कृष्ण को लोग रास रसिया, लीलाधर, देवकी नंदन, गिरिधर जैसे हजारों नाम से जानते हैं. कृष्ण भगवान द्वारा बताई गई गीता को हिंदू धर्म के सबसे बड़े ग्रंथ और पथ प्रदर्शक के रूप में माना जाता है. कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण जी के ही जन्मदिवस के रूप में प्रसिद्ध है. 
        शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होने के बाद मनुष्य का भाग्य चमक जाता है। इंसान के जीवन की सभी समस्याएं नष्ट हो जाती हैं और अच्छा समय प्रारंभ हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्ति के लिए जन्माष्टमी का दिन श्रेष्ठ है। जन्माष्टमी के दिन भगवान कन्हैया का जन्म हुआ था अत: इस दिन श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना करना चाहिए। मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया जमुना के तट पे विराजे हैं मोर मुकुट पर कानों में कुण्डल कर में मुरलिया साजे है मानव जीवन सबसे सुंदर और सर्वोत्तम होता है. मानव जीवन की खुशियों का कुछ ऐसा जलवा है कि भगवान भी इस खुशी को महसूस करने समय-समय पर धरती पर आते हैं. 
        शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने भी समय-समय पर मानव रूप लेकर इस धरती के सुखों को भोगा है. भगवान विष्णु का ही एक रूप कृष्ण जी का भी है जिन्हें लीलाधर और लीलाओं का देवता माना जाता है मान्यता है कि द्वापर युग के अंतिम चरण में भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था. इसी कारण शास्त्रों में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन अर्द्धरात्रि में श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी मनाने का उल्लेख मिलता है. पुराणों में इस दिन व्रत रखने को बेहद अहम बताया गया है.

        हमारे शास्त्रों ऋग्वेद, यर्जुवेद से भविष्य पुराण, श्री पुराण से धर्म सिन्धु तक में स्पष्ट कहा गया है कि भाद्र पक्ष की कृष्ण पक्ष की अष्टमी में श्रीकृष्ण जी का जन्म मध्य रात्रि को 12 बजे हुआ था भगवन श्री कृष्ण के जन्म की कथा— श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्र रूप में हुआ था. कंस ने अपनी मृत्यु के भय से अपनी बहन देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था. कृष्ण जी जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी. चारो तरफ़ घना अंधकार छाया हुआ था. भगवान के निर्देशानुसार कुष्ण जी को रात में ही मथुरा के कारागार से गोकुल में नंद बाबा के घर ले जाया गया. नन्द जी की पत्नी यशोदा को एक कन्या हुई थी. वासुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को अपने साथ ले गए. कंस ने उस कन्या को वासुदेव और देवकी की संतान समझ पटककर मार डालना चाहा लेकिन वह इस कार्य में असफल ही रहा. दैवयोग से वह कन्या जीवित बच गई. इसके बाद श्रीकृष्ण का लालन–पालन यशोदा व नन्द ने किया. जब श्रीकृष्ण जी बड़े हुए तो उन्होंने कंस का वध कर अपने माता-पिता को उसकी कैद से मुक्त कराया था… 
         श्रीकृष्ण धरती पर जनकल्याण के लिए आए थे। उनका उद्देश्य धरती पर हो रहे अनाचार को मिटाना था। उन्होंने युग को नव-सृजन की दिशा में मोड़ा। ग्रंथों में अवतार का यही प्रयोजन है। स्कन्दपुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। 
           भविष्यपुराण का वचन है- 
       श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। 
        पूजन सामग्री की सूची——- 
     धूप बत्ती (अगरबत्ती), कपूर, केसर, चंदन, यज्ञोपवीत 5, कुंकु, चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, आभूषण, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान के पत्ते, पुष्पमाला, कमलगट्टे-, तुलसीमाला, धनिया खड़ा, सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा व दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद (मधु), शकर, घृत (शुद्ध घी), दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न , (पेड़ा, मालपुए इत्यादि), इलायची (छोटी), लौंग मौली, इत्र की शीशी, सिंहासन (चौकी, आसन), पंच पल्लव, (बड़, गूलर, पीपल, आम और पाकर के पत्ते), पंचामृत, तुलसी दल, केले के पत्ते , (यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित), औषधि, (जटामॉसी, शिलाजीत आदि), श्रीकृष्ण का पाना (अथवा मूर्ति) , गणेशजी की मूर्ति, अम्बिका की मूर्ति, श्रीकृष्ण को अर्पित करने हेतु वस्त्र, गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र, जल कलश (तांबे या मिट्टी का), सफेद कपड़ा (आधा मीटर), लाल कपड़ा (आधा मीटर), पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार), दीपक, बड़े दीपक के लिए तेल, बन्दनवार, ताम्बूल (लौंग लगा पान का बीड़ा), श्रीफल (नारियल), धान्य (चावल, गेहूँ), पुष्प (गुलाब एवं लाल कमल), एक नई थैली में हल्दी की गाँठ, खड़ा धनिया व दूर्वा आदि, अर्घ्य पात्र सहित अन्य सभी पात्र। 

व्रत-पूजन कैसे करें…????
 उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें—- 
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥ 
       अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए ‘सूतिकागृह’ नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए। फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें- ‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः। वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः। सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।’ अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें। ——————————-

 विश्व भर में मनाई जाती है जन्माष्टमी की खुशियां—-
            कृष्ण का जन्मोत्सव मात्र उनकी जन्मस्थली मथुरा ही नहीं, बल्कि भारतवर्ष सहित विश्व के अन्य देशों में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिरों की सजावट देखते ही बनती है। खासकर गोकुल, मथुरा और बृंदावन (उत्तरप्रदेश) के मंदिरों की तो बात ही निराली होती है। गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म लेने की सूचना प्रात: अष्टमी तिथि को प्रसारित हुई थी। अत: ब्रजमंडल में उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव सूर्योदय के समय विद्यमान उदयातिथि के रूप में उपलब्ध अष्टमी के दिन मनाया जाता है। इसी कारण इसे गोकुलाष्टमी कहा जाता है। 
        वैष्णव मंदिरों में जन्माष्टमी का उत्सव उदयातिथि वाले दिन ही मनाया जाता है। नंद के पुत्र-रत्‍‌न की प्राप्ति की खुशी में दूसरे दिन गोकुल में बड़े हर्ष के साथ उत्सव मनाया गया, जिसमें समस्त गोकुलवासियों ने भाग लिया। उस परंपरा का निर्वाह आज भी ब्रजमंडल में अत्यंत भव्य रूप में होता है। नंदोत्सव भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की नवमी को मनाया जाता है। इस उत्सव को स्थानीय भाषा में दधिकादो कहा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में इसका अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। इस उत्सव में भगवान के श्रीविग्रह पर कपूर, हल्दी, दही, घी, तेल, केसर तथा जल आदि चढ़ाने के बाद लोग बड़े हर्षोल्लास के साथ इन वस्तुओं का परस्पर विलेपन और सेवन करते हैं। कई स्थानों पर हाडी में दूध-दही भरकर, उसे काफी ऊंचाई पर टागा जाता है। युवकों की टोलिया उसे फोड़कर इनाम लूटने की होड़ में बहुत बढ़-चढ़कर इस उत्सव में भाग लेती हैं। 
        वस्तुत: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत केवल उपवास का दिवस नहीं, बल्कि यह दिन महोत्सव के साथ जुड़कर व्रतोत्सव बन जाता है। श्रीकृष्णावतार हुए पाच सहस्त्राब्दिया बीत चुकी हैं, परंतु उनका महात्म्य दिन दूना-रात चौगुना बढ़ता जा रहा है। श्रीकृष्ण हम सबके प्रेरणास्त्रोत हैं, जिनकी अमृतवाणी गीता के रूप में आज भी हमें जीवन जीने की कला सिखा रही है। ब्रजभूमि में भगवान श्रीकृष्ण कभी बड़े नहीं होते। भक्तों के अपार भाव को देखते हुये उन्हें हर साल जन्म लेना पड़ता है। बरसाना स्थित श्रीजी मंदिर हो अथवा नंदगाव का नंदभवन, अपने प्रभु के जन्म से पूर्व सजधज कर तैयार है। नंदगाव में जन्म लेने वाले कन्हैया को बरसाना का गोसाई समाज बधाई देने के लिए तत्पर दिखाई दे रहा है। विभिन्न लीलाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को कान्हा की ब्रजलीलाओं का दर्शन भी आकर्षण का केन्द्र रहता है। नंदगाव ही ऐसा स्थल है जहा भगवान आशुतोष भोलेनाथ को प्रभु के दर्शन काफी मन्नतों के बाद हुये और उनको एक बार तो नंद के द्वार से ही लौटा दिया गया था। ब्रज की परंपरा में खास बात यह है कि यहा जन्मोत्सव नहीं मनाया जाता बल्कि भक्तों में प्रभु के जन्म लेने का भाव होता है और उसी भाव से नंदोत्सव, लाला को झूला झुलाना, खिलौनों से खिलाने का भाव प्रभु के हर साल जन्म लेने के भाव को प्रदर्शित करता है। 

बरसाना में भी मनाता हें जन्मोत्सव—— 
         भगवान श्रीकृष्ण की आराध्य शक्ति राधारानी का गाव बरसाना भी आनंद कंद श्रीकृष्ण चंद्र के जन्मोत्सव की तैयारियों में डूबा हुआ है। सेवायत छैल बिहारी गोस्वामी के अनुसार यहा रात्रि बारह बजे भगवान श्याम सुंदर एवं राधारानी का पंचामृत अभिषेक कर आकर्षक श्रगार किया जाऐगा। गोसाईं समाज द्वारा परंपरागत बधाई गायन के साथ आने वाले भक्तों को पंजीरी का प्रसाद वितरण किया जाऐगा। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिऐ नगर पंचायत द्वारा रंगीली गली, पीली पोखर मार्ग, राधा बाग आदि मागरें पर सफाई व रोशनी के विशेष प्रबंध किये गये हैं। 

ननिहाल से आता है बधाई संदेश—— 
      नंदगाव में जन्माष्टमी की अपनी अनूठीे परंपरा है। यहा भादों मास के प्रारंभ से अष्टमी तक गोसाई समाज द्वारा बधाई गायन किया जाता है। अष्टमी के दिन दोपहर को कन्हैया की ननिहाल महराना गाव तथा गिडोह गाव से भाईचारा में चाव यानी बधाई आती है। चाव अर्थात एक परात अथवा डलिया में फल, मिष्ठान, वस्त्र, अलंकार आदि रखकर ग्रामीण नाचते गाते बधाई देने के लिऐ नन्द भवन पहुंचते हैं। रात्रि दस बजे ढाड़ी ढाड़िन लीला का अद्भूत मंचन किया जाता है। ढाड़ी गोवर्धन का रहने वाला था उसने नंद बाबा से कभी कुछ नहीं मागा। 

रात्रि बारह बजे जन्म लेंगे नन्दलाल—- 
          नन्दगाव में जन्माष्टमी के दिन रात्रि बारह बजे भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का अभिषेक किया जाएगा। ठीक बारह बजे प्रभु के पट खोल दिये जाते हैं और आरती उतारी जाती है। नन्दगाव की गली-गली नन्द के आनंद भयौ जय कन्हैया लाल के जयकारों से गूंज उठती है। खास बात यह है कि उसी समय प्रभु के स्पर्श वस्त्र को श्रद्धालुओं में बाटा जाता है, जिसे फरुआ भी कहा जाता है। इसको लेने के लिए श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में होड़ सी मची रहती है।
 नंद के आनंद भयौ जय कन्हैया लाल की——- 
      जन्मोत्सव के उपरात नंदगाव में नंदोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। बताते हैं कि कृष्ण के जन्म के अगले दिन बरसाना से राधारानी के माता पिता वृषभानु और कीरत रानी सखियों के साथ नन्द बाबा को बधाई देने आये थे। बरसाना के गोसाई समाज द्वारा उसी परंपरा का निर्वहन बड़े धूमधाम से किया जाता है। समाज बरसाना से नन्द भवन आकर बधाई गायन करता है। 

भोलेबाबा करते हैं कान्हा की झाड़ फूंक—– 
       कान्हा के जन्म की खबर सुनकर भगवान भोलेनाथ भी दर्शन करने के नन्द भवन पहुंचे, लेकिन उनके विकराल स्वरूप को देखकर यशोदा माता ने उन्हें दर्शन नहीं कराये। इस पर कान्हा रोने लगे तो भोले बाबा को बुलाकर झाड़-फूंक कराई गई। इस पर लाला हंसने लग गया। भाड खंभे पर चढ़कर नंदबाबा की वंशावली का बखान करता है। 

परिवार सहित विराजे हैं कान्हा—– 
      नंदगाव (उत्तरप्रदेश)में एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहा कान्हा अपने परिजनों के साथ विराजमान हैं। मंदिर में कान्हा के पिता नन्द बाबा, माता यशोदा रानी, बड़े भाई बलराम, सखा धनसुखा एवं मनसुखा तथा ससुराल की मर्यादा में कोने में दूर खड़ी राधारानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं।
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जनकल्याण के लिए जन्मे थे कान्हा—– 
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने अवतार लेने [प्रकट होने] के विषय में कहते है- — 
अजोऽपि सव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन। 
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥ 
     अर्थात ‘मैं अजन्मा और अविनाशी होते हुए तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूं।’ गीता के इस कथन से विदित होता है कि भगवान नित्य और शाश्वत है। इस दृश्य-जगत में लोक-कल्याण और जन-हित के उद्देश्य से धरा पर अवतरित होते है। ‘अवतार’ का शाब्दिक अर्थ है- अवतरित होना अर्थात ऊपर से नीचे आना। निजधाम से पृथ्वी पर जनकल्याण के बड़े उद्देश्य से पृथ्वी पर प्रत्यक्ष आगमन ही अवतार कहा जाता है। इसलिए ‘अवतार’ का भावार्थ हुआ- अव्यक्त का व्यक्तरूप में आविर्भाव। ग्रंथों में अवतारों की कई कोटि बताई गई है- जैसे अंशांशावतार, अंशावतार, आवेशावतार, कलावतार, नित्यावतार, युगावतार आदि। 
      शास्त्रों में ‘कृष्णावतार’ को ‘पूर्णावतार’ माना गया है, यानी श्रीकृष्ण के रूप में भगवान अपनी संपूर्ण ऊर्जा के साथ धरा पर आए थे। श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि द्वापर युग में जब अधर्मियों के अत्याचार से आक्रांत एवं पाप के भार से व्याकुल पृथ्वी करुण क्रंदन करते हुए ब्रह्माजी के पास पहुंची, तब सृष्टिकर्ता ने समस्त देवगणों को साथ लेकर भगवान की स्तुति की। उस समय ब्रह्माजी ने ध्यानावस्था में आकाशवाणी सुनी-
 ‘वसुदेवगृहे साक्षाद्भगवान पुरुष: पर:।’ 
       अर्थात वसुदेवजी के यहां साक्षात भगवान [परमपुरुष] ही प्रकट होंगे। कंस के कारागार में बंद वसुदेव-देवकी के समक्ष भगवान भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में शिशु के रूप में प्रकट हुए। अतएव भगवान का अवतरण, उनके जन्म लेने के सदृश ही प्रतीत हुआ। श्रीमद्भागवत के वक्ता शुकदेवजी कहते है- 
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। 
जगद्धिताय सोऽप्यत्र देही वा भाति मायया॥
      अर्थात ‘आप श्रीकृष्ण को समस्त प्राणियों की आत्मा [परमात्मा] जानें। भूलोक में भक्तजनों के उद्धार हेतु ये भगवान अपनी माया के कारण देहधारी-से प्रतीत होते हैं।’ श्रीमद्भागवत के एकादशवें स्कंध के 31वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम-गमन का संपूर्ण विवरण मिलता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने लोकहितार्थ जिस देह से 125 वर्ष लीलाएं कीं, वह देह भी अंत में नहीं मिली। उनकी देह दिव्य और अप्राकृत थी। वे अपने उसी दिव्य वपु [शरीर] से निजधाम पधारे। गीता में भगवान ने अर्जुन के माध्यम से समस्त प्राणियों को अपने अवतार लेने का प्रयोजन बताया गया है- 
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 
       अर्थात ‘जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात साकार-रूप से संसार में [लोगों के सम्मुख] प्रकट होता हूं।’ 
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥ 
अर्थात ‘साधु पुरुषों की रक्षा और पापियों के नाश हेतु तथा धर्म की स्थापना करने की लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।’ मान्यता है कि जब-जब ऐसी परिस्थितियां बनती है, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर उन्होंने उस समय लोगों पर हो रहे अनाचार को मिटाया और एक नए युग का सूत्रपात किया। इस वर्ष श्रीकृष्ण की 5239वीं जयंती जन्माष्टमी- व्रतोत्सव के रूप में मनाई जाएगी। श्रीकृष्ण जगद्गुरु के रूप में सारे संसार के पथ-प्रदर्शक है। 
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भगवान का देवकी के गर्भ में प्रवेश—— 
        भगवान श्रीकृष्ण सर्वप्रथम वसुदेवजी के हृदय में प्रविष्ट हुए, उनका प्रवेश होते ही वसुदेव सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के सदृश तेज से उद्भासित हो उठे। मानो उनके रूप में दूसरे यज्ञनारायण ही प्रकट हो गए। संसार को अभय देने वाले श्रीकृष्ण देवी देवकी के गर्भ में आविष्ट हुए इससे उस कारागृह में देवकी दिव्यदीप्ति से दमक उठीं। समस्त मथुरा नगर निश्चेष्ट होकर सो रहा था। घनघोर अंधकार से रात्रि व्याप्त थी। जब रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ क्योंकि वह वेदों से अतिरिक्त तथा दूसरों के लिए दुर्ज्ञेय लग्न था, उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। 
            अशुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ना तो स्वाभाविक ही नहीं था। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग सम्पन्न हो गया। जब आधा चंद्रमा उदय हुआ उस समय लग्न की ओर देखकर भयभीत हुए सूर्य आदि सभी ग्रह आकाश में अपने गति के क्रम को लाँघकर मीन लग्न में जा पहुँचे। शुभ तथा अशुभ सभी ग्रह वहाँ एकत्र हो गए। संसार की रचना करने वाले की आज्ञा से एक मुहूर्त के लिए वे सभी ग्रह प्रसन्नचित्त से ग्यारहवें स्थान में जाकर स्थित हो गए। 
        उस समय आकाश से वर्षा होने लगी। ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी। पृथ्वी अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में थी। दसों दिशाएं स्वच्छ एवं निर्मल हो गईं। ऋषि-मुनि, यक्ष-गंधर्व, किन्नर, देवता तथा देवियां सभी प्रसन्न एवं आनंदमग्न थे। उस समय अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। गंधर्वराज तथा विद्याधरियां गीत का गायन कर रही थीं। समस्त नदियाँ सुखपूर्वक प्रवाहित हो रही थीं। अग्निहोत्र की अग्नियां प्रसन्न होकर प्रज्वलित हो रही थीं। स्वर्ग में दुन्दुभियों एवं अन्य वाद्यों की ध्वनि होने लगी। उसी समय पृथ्वी माता एक नारी का रूप धारण करके स्वयं बंदीगृह में पहुंचीं। 
        वहां जय-जयकार, शंखनाद और हरिकीर्तन का शब्द गुंजायमान हो रहा था। इसी समय देवकी गिर पड़ीं, उनके पेट से वायु निकल गई और वहीं भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके देवकी के हृदयकमल के कोष से प्रकट हो गए। उनका शरीर अत्यंत कमनीय और परम मनोहर था। उनकी दो भुजाएँ थीं। हाथ में मुरली शोभायमान थी। कानों में मकराकृत कुण्डल सुशोभित थे। मुख मंद-मंद हास्य की छटा से प्रसन्न जान पड़ता था। 
      ऐसा ज्ञात होता था कि वे अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए कातर से दिखाई दे रहे हैं। श्रेष्ठ मणिरत्नों के सारतत्व से बने हुए आभूषण उनकी देहयष्टि की शोभा बढ़ा रहे थे। पीताम्बर से सुशोभित श्रीविग्रह की कांति नूतन जलधर के समान श्याम थी। चंदन, अगरु, कस्तूरी तथा कुंकुम के द्रव्य से निर्मित अंगराग उनके सर्वांग में लगा हुआ था। उनका मुख शरद पूर्णिमा के शशधर की शुभ्रा ज्योत्स्ना को भी तिरस्कृत कर रहा था। बिम्बफल के सदृश लाल अधर के कारण उनकी मनोहरता और भी बढ़ गई। उनके माथे पर मोरपंख के मुकुट और उत्तम रत्नमय किरीट से श्रीहरि की दिव्य ज्योति और भी जाज्वल्यमान हो उठी। 
       टेढ़ी कमर, त्रिभंगीझाँकी, वरमाला का श्रृंगार, वक्ष में श्रीवत्स की स्वर्णमयी रेखा और उस पर मनोहर कौस्तुभमणि की भव्य प्रभा अद्भुत शोभा पा रही थी। उनकी किशोर अवस्था थी, वे शांत स्वरूप भगवान श्री हरि, ब्रह्मा और महादेवजी के भी प्राणवल्लभ थे। वसुदेव और देवकी ने उन्हें अपने समक्ष इस प्रकार जब देखा तो उन्हें अत्यधिक आश्चर्य हुआ। वसुदेवजी ने अपनी पत्नी के साथ अश्रुपूरित नयन, पुलकित शरीर तथा नमस्तक हो दोनों हाथों को जोड़कर उनकी भक्तिभाव से प्रार्थना की। 
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जन्माष्टमी के दिन होती हें में मटकी/हांडी फोड़ प्रतियोगिता — 
         श्रीकृष्ण जी का जन्म मात्र एक पूजा अर्चना का विषय नहीं बल्कि एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस उत्सव में भगवान के श्रीविग्रह पर कपूर, हल्दी, दही, घी, तेल, केसर तथा जल आदि चढ़ाने के बाद लोग बडे हर्षोल्लास के साथ इन वस्तुओं का परस्पर विलेपन और सेवन करते हैं. कई स्थानों पर हांडी में दूध-दही भरकर, उसे काफी ऊंचाई पर टांगा जाता है. युवकों की टोलियां उसे फोडकर इनाम लूटने की होड़ में बहुत बढ-चढकर इस उत्सव में भाग लेती हैं. वस्तुत: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत केवल उपवास का दिवस नहीं, बल्कि यह दिन महोत्सव के साथ जुड़कर व्रतोत्सव बन जाता है. 
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क्यों दो दिन होती है जन्माष्टमी?
           भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव ज्यादातर दो दिन मनाया जाता है। उनका अवतार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के अंतर्गत वृष लग्न में हुआ था, परंतु इसके साक्षी केवल देवकी और वसुदेव जी ही थे। भगवान के निर्देशानुसार उन्हें रात में ही मथुरा के कारागार से गोकुल में नंद बाबा के घर ले जाया गया। वहां योगमाया के प्रभाव से सभी निद्रामग्न थे। यहां तक कि यशोदा माता को बालक श्रीकृष्ण की उपस्थिति का भान प्रात:काल प्रसव पीड़ा की मूच्र्छा से उठने के बाद ही हुआ।
        सुबह यह शुभ समाचार सारे गोकुल में फैल गया कि नंदबाबा के यहां पुत्र का जन्म हुआ है। इसी के कारण सनातन धर्म में यह विशेष व्यवस्था बनी कि वैष्णवों के अतिरिक्त अन्य सभी लोग अर्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी वाले दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे। किंतु वैष्णव गुरु से दीक्षा प्राप्त भक्तगण और साधु-संत अपने संप्रदाय के नियमानुसार सप्तमी से संयुक्त अर्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी तिथि को त्यागकर दूसरे दिन उदयातिथि के रूप में उपलब्ध अष्टमी के दिन व्रत रखते हैं। 
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——— ॥ गोविन्दाष्टकम्‌ ॥——- 
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं गोष्ठप्रांगण-रिंगल-लोलमनायासं परमायासम्‌। 
मायाकल्पित-नानाकारमनाकारं भुवनाकारं क्ष्माया नाथमनाथं प्रणमत गोविंद परमानन्दम्‌॥1॥ 

मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडन-शैशव-सन्त्रासं व्यादित-वक्त्रालोकित-लोकालोक-चतुर्दशलोकालिम्‌। 
लोक्त्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकं लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविंदं परमानन्दम्‌॥2॥ 

त्रैविष्टप-रिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम्‌। 
वैमल्य-स्फुटचेतोवृत्ति-विशेषाभासमनाभासं शैवं केवलशान्तं प्रणमत गोविंदं परमानन्दम्‌॥3॥ 

गोपालं भूलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालम्‌। गोपीखेलन-गोवर्धन-धृतिलीलालालित-गोपालम्‌। 
गोभिर्निगदित-गोविंद-स्फुटनामानं बहुनामान गोपीगोचरदूरं प्रणमत गोविंदं परमानन्दम्‌॥4॥ 

गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं भेदावस्थामभेदाभं शश्वद्गोखुर-निर्धूतोत्कृत-धूलीधूसर-सौभाग्यम्‌। 
श्रद्धाभक्ति-गृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्‌॥5॥ 

स्नानव्याकुल-योषिद्वस्त्रमुपादायागमुपारूढं व्यादित्सन्तीरथ दिग्वस्त्राद्युपदातुमुपाकर्षन्तम्‌। 
निर्धूतद्वय-शोक-विमोहं बुद्धं बुद्धेरप्यन्तस्थं सत्तामात्रशरीरं प्रणमत गोविंदं परमानन्दम्‌॥6॥ 

कान्तं कारणकारणमादिमनादिं कालमनाभासं कालिन्दीगत-कालियशिरसि मुहुर्नृत्यन्तं सुनृत्यन्तम्‌। 
कालं कालकलातीतं कलिताशेषं कलिदोषघ्नं कालत्रयगतिहेतुं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्‌॥7॥ 

वृंदावनभुवि वृंदारकगणवृन्दाराधित वन्देऽहं कुन्दाभामल-मन्दस्मेर-सुधानन्दं सुहृदानन्दम्‌। 
वन्द्याशेष-महामुनिमानस-वन्द्यं वृन्दपदद्वन्द्वं वन्द्योशेषगुणाब्धिं प्रणमत गोविंद परमानन्दम्‌॥8॥ 

गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविंदार्पितचेता यो गोविंदाच्युत माधव विष्णो गोकुल नायक कृष्णेति। 
गोविंदांघ्रिसरोज-ध्यानसुधाजल-धौतसमस्ताधो गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स समभ्येति॥9॥ 
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 ग्रहों ने बनाया हर कला में माहिर ‘कृष्ण’ को—– (भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली का विवेचन )—-
            ईश्वर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का ही नाम आता है व इन्हीं त्रिदेवों ने संसार को रचा। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो भगवान विष्णु बने पालनहार तो भगवान शिव ने संहार किया। वैसे शिवजी को आदि और अंत कहा जाता है तो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को 16 कलाओं का ज्ञाता। अवतार की श्रेणी में देखा जाए तो सिर्फ भगवान विष्णुजी ने ही अवतार लिए। 
      वे त्रेतायुग में राम के अवतार में अवतरित हुए तो द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के। जहाँ राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता रहे। राम आदर्शवादी थे तो श्रीकृष्ण ने छल, बल, कपट का सहारा लिया लेकिन उन्होंने जग की भलाई के लिए ही कार्य किया क्योंकि आज का युग कलियुग भगवान श्रीकृष्ण के गुणों वाला ही है। श्रावण के बाद भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में नंदगाँव मथुरा की जेल में पिता वसुदेव, माता देवकी के यहाँ हुआ।

 भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली का विवेचन —-
      कहते हैं भगवान ने माता कैकई को वचन दिया था कि माँ मैं तेरी कोख से द्वापर युग में जन्म लूँगा तो आपने अपना वचन निभाया। आपका जन्म वृषभ लग्न में हुआ। लग्न में तृतीयेश पराक्रम व भाई सखा आपका स्वामी चंद्रमा उच्च का होकर लग्न में होने से आपका व्यक्तित्व शानदार उत्तम कद-काठी के, हर कला में माहिर हुए। मंगल की नीच दृष्टि से आपके सगे भाई बलरामजी ने दूसरी माता रोहिणी की कोख से जन्म लिया। आज के युग में उसे परखनली या टेस्ट ट्‍यूब के रूप में जन्माते हैं। आपकी पत्रिका में द्वितीय वाणी, धन-कुटुंब भाव का स्वामी बुध उच्च का होकर पंचम भाव विद्या-संतान-मनोरंजन में होने से आपकी वाणी में विशेष प्रभाव होता है तभी आपकी वाणी के सशक्त प्रभाव से सभी प्रभावित थे।

 भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के विषय में उल्लेख मिलता है – 
‘जब परम शोभायमान और सर्वगुण संपन्न घडी आई, चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में आया| आकाश निर्मल तथा दिशाएँ स्वच्छ हुई, महात्माओं के मन प्रसन्न हुए, तब भाद्रपद मॉस की कृष्णपक्ष अष्टमी की मध्यरात्री में चतुर्भुज नारायण वासुदेव-देवकी के समक्ष बालक के रूप में प्रकट हुए|’ अर्थात भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ| इस स्कंध के अनुसार गर्गाचार्य ने इनका नामकरण संस्कार करते हुए इनका नाम ‘कृष्ण’ रखा और कहा- ‘इस बालक के नामाक्षर बड़े अच्छे हैं, पांच गृह उच्च क्षेत्र में हैं| मात्र राहू ही बुरे स्थान में है| गर्गाचार्य ने बताया कि जिसके सप्तम स्थान में नीच का राहू होता है, वह पुरुष कई स्त्रियों का स्वामी होता है| 
     श्रीकृष्ण सोलह कलाओं में प्रवीन थे| इन्होने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया और महाभारत के युद्ध में पाण्डवों को विजय दिलाई| आइये इनकी जन्म कुंडली के माध्यम से यह जाने कि किन योगों के कारण यह सोलह कलाओं में प्रवीण बने| भगवान श्रीकृष्ण कि कुंडली में उच्च का चन्द्रमा लग्न में ‘मृदंग योग’ बना रहा है| इस योग के परिणाम स्वरूप ही कृष्ण शासनाधिकारी बने| सात राशियों में समस्त गृह ‘वीणा योग’ का निर्माण कर रहे हैं| इस योग से ही कृष्ण गीत, नृत्य, संगीत में प्रवीण बने| इसी के माध्यम से महारास जैसा आयोजन सम्पन्न कराया| कुंडली में ‘पर्वत योग’ इन्हें यशस्वी व तेजस्वी बना रहे हैं, तो उच्च के लग्नेश व भाग्येश ने ‘लक्ष्मी योग’ बनाकर धनि व पराक्रमी बनाया| बुध अस्त होकर भी यदि उच्च का हो तो ‘विशिष्ट योग’ बनता है| ये योग इन्हें कूटनीतिज्ञ व विद्वान बना रहा है| 
  •       बलवान लग्नेश व मकर राशि का मंगल ‘यशस्वी योग’ बनाकर युगयुगांतर तक इन्हें आदरणीय व पूजनीय बना रहे हैं| वहीँ सूर्य से दूसरा गृह बुध व बुध से एकादश चन्द्र या गुरु हो तो , ‘भास्कर योग’ का निर्माण होता है| यह योग ही श्रीकृष्ण को पराक्रमी, भगवान के तुल्य सम्मान शास्त्रार्थी, धीर और समर्थ बना रहे हैं| इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण योग इनकी कुंडली में हैं| ऋणात्मक प्रभावकारी ‘ग्रहण योग’ ने इनके जीवन में कलंक भी लगाया| इस योग के प्रभाव स्वरूप ही कृष्ण ने अपने मामा का वध कर बुरा कार्य किया, तो स्यमंतक मणि के चोरी के झूठे कलंक का सामना भी इन्हें करना पड़ा| ग्रहों की स्थिति का आकलन करें, तो उच्च के लग्नेश लग्न भाव में निरूग व दीर्घायु [युग-युगांतर तक याद किये जा रहे हैं] बना रहे हैं|
  •  द्वितीयेश बुध पंचम भाव में प्रसिद्धि दिलाते हैं, लेकिन आखिरी समय में परेशानी भी देते हैं| इनके सामने ही इनके समस्त कुल का नाश हुआ| 
  • तृतीयेश चन्द्रमा लग्न में केतु के साथ होने से स्वजनों से दूर रखते हैं| इनका अधिकांश समय घर से बाहर व युद्ध क्षेत्र में ही बीता था| 
  • चतुर्थेश या सुखेश स्वग्रही सूर्य मातृभूमि से दूर रखते हैं| परिणाम स्वरूप जन्म होते ही श्रीकृष्ण को अपनी जन्मस्थली से दूर ले जाया गया व आजीवन उस जगह नहीं आ पाए| 
  • पंचमेश यदि पंचम भाव में हो तो सच्चरित्र पुत्रों का पिता, चतुर व विद्वान बनाते हैं, चतुराई में तो भगवान् श्रीकृष्ण की कहीं कोई सानी नहीं है| 
  • षष्टेश शुक्र छठे भाव में शत्रुहत्ता, योगिराज व अरिष्ट नाशक बनाते हैं| 
  • सप्तमेश नवं भाव में उच्च के मंगल स्त्री सुख में परिपूर्ण व रमणियों के साथ रमण करने वाले बनाते हैं| इनके आठ रानियाँ – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवंती, सत्या, कालिंदी, भद्रा, मित्रबिन्दा व लक्ष्मणा थीं| साथ ही राहू सप्तम में होने से नरकासुर के चंगुल से छुड़ाई 16000 राजकुमारियों ने भी इन्हें ही अपना पति माना| 
  • अष्टमेश सहज भाव में सहोदर रहित करते हैं| इनके कोई भी सहोदर जीवित नहीं बचा| बलराम से इनके सामान्य सम्बन्ध थे| 
  • भाग्येश शनि के छठे भाव में उच्च का होकर भी इन्हें रणछोड़दास बनाया| वहीँ दशमेश छठे भाव में जाकर आजीवन शत्रुओं द्वारा परेशान कराते रहे| बाल्यावस्था भी तकलीफ में गुजारी, एकादशेश गुरु जहां लक्ष्मीवान व सुखी कर रहे हैं, तो व्ययेश उच्च के मंगल में दान की प्रेरणा व लम्बी-लम्बी यात्राएं इन्हें आजीवन कराते रहे| ऐसे योगेशेवर कृष्ण की आराधना हमें नित्य प्रति करने से लाभ होता है| जहाँ इनका पूजन होता है, वहां समृद्धि, सुख, व समस्त वैभव मौजूद रहते हैं| 

उच्च के गृह:—– —
भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली में पांच ग्रह- चन्द्र, गुरु, बुध, शनि और मंगल उच्च के हैं| सूर्य और शुक्र स्वक्षेत्री हैं| —-लग्न में केतु, चंद्रमा के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा है| 
—–योगादियोग मृदंग योग, वीणा योग, पर्वत योग, लक्ष्मी योग, विशिष्ट योग, यशस्वी योग, भास्कर योग और ग्रहण योग बन रहे हैं| श्रीकृष्ण की कुंडली में ग्रहण योग को छोड़कर सभी अन्य योग शुभ हैं|
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतकथा—– (माहात्म्य सहित) इन्द्र उवाच— 
ब्रह्मपुत्र! मुनिश्रेष्ठ! सर्वशास्त्रविशारद!। 
ब्रूहि व्रतोत्तमं देव येन मुक्तिर्भवेन्नृणाम्‌। 
तद्व्रतं वद भो ब्रह्मन्‌! भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्‌॥ 
      इंद्र ने कहा है- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्‌! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए।
 नारद उवाच—– त्रेतायुगस्य चान्ते हि द्वापरस्य समागमे।
 दैत्यः कंसाख्य उत्पन्नः पापिष्ठो दुष्टकर्मकृत्‌॥ 
      इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ। उस दुष्ट व नीच कर्मी दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थी। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा। नारदजी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- हे महामते! उस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। 
      क्या यह संभव है कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र अपने मामा कंस की हत्या करेगा। इंद्र की सन्देहभरी बातों को सुनकर नारदजी ने कहा-हे अदितिपुत्र इंद्र! एक समय की बात है। उस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा कि ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिर्विद! मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके द्वारा होगी। ज्योतिषी बोले-हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी जो वाक्‌पटु है और आपकी बहन भी है। उसी के गर्भ से उत्पन्न उसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में ‘कृष्ण’ के नाम से विख्यात होगा, वही एक समय सूर्योदयकाल में आपका वध करेगा।
      ज्योतिषी की बातें सुनकर कंस ने कहा- हे दैवज, बुद्धिमानों में अग्रण्य अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा। ज्योतिषी बोले- हे महाराज! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। उसी युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए हे महाराज! आप अपनी रक्षा यत्नपूर्वक करें। इतना बताने के पश्चात नारदजी ने इंद्र से कहा- ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर हीकंस की मृत्युकृष्ण के हाथ निःसंदेह होगी। तब इंद्र ने कहा- हे मुनि! उस दुराचारी कंस की कथा का वर्णनकीजिए, और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस की मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी। 
     इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- उस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- मेरी इस प्राणों से प्रिय बहन की पूर्ण सुरक्षा करना। द्वारपाल ने कहा- ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात उसकी छोटी बहन दुःखित होते हुए जल लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। उस तालाब के किनारे एक घनघोर वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी।

महामृत्युञ्जय कवच कैसे करें प्रयोग और उठायें लाभ

क्या हैं महामृत्युञ्जय कवच ..??? 
mahamratyunjay-tantra-kavach-महामृत्युञ्जय कवच कैसे करें प्रयोग और उठायें लाभ        अपने स्वयं तथा परिवार की कुशलता के लिए महामृत्युञ्जय का कवच जरूरी है, और सावन में महामृत्युञ्जय मानो सोने पर सुहागा है, भगवान शिव महामृत्युञ्जय कहलाते हैं, शिव की शक्तियां जितनी अनंत, अपार व विराट हैं, उतना ही सरल है उनका स्वरूप व स्वभाव। इसी वजह से शिव भक्तों के मन में समाया शिव उपासना के आसान उपायों से भी मिलने वाली शिव कृपा का विश्वास ही हर भक्त के लिए सुखों का भंडार खोल देता है। 
      शास्त्रों के मुताबिक सांसारिक जीवन से जुड़ी ऐसी कोई मुराद नहीं जो शिव उपासना से पूरी न हो। विशेष रूप से शास्त्रों में बताए शिव उपासना के विशेष दिनों, तिथि और काल को तो नहीं चूकना चाहिए। इसी कड़ी में यहां बताई जा रही शिव मंत्र स्तुति, शिव पूजा व आरती के बाद बोलने से माना जाता है कि इसके प्रभाव से बुरे वक्त, ग्रहदोष या बुरे सपने जैसी कई परेशानियां दूर होती हैं- 
 दुरूस्वप्नदुरूशकुन दुर्गतिदौर्मनस्य, दुर्भिक्षदुर्व्यसन दुस्सहदुर्यशांसि। 
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्ति, व्याधीश्चनाशयतुमे जगतातमीशरू॥ 
         इस शिव स्तुति का सरल शब्दो में मतलब है कि- संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान शिव मेरे सभी बुरे सपनों, अपशकुन, दुर्गति, मन की बुरी भावनाएं, भूखमरी, बुरी लत, भय, चिंता और संताप, अशांति और उत्पात, ग्रह दोष और सारी बीमारियों से रक्षा करे। 
      धार्मिक मान्यता है कि शिव, अपने भक्त के इन सभी सांसारिक दुरूखों का नाश और सुख की कामनाओं को पूरा करते हैं। भगवान शिव महामृत्युञ्जय कहलाते हैं। शिव का यह रूप काल को पराजित करने या नियंत्रण करने वाले देवता के रूप में पूजित है। महामृत्युञ्जय की आराधना का निरोग होने, मौत को टालने या मृत्यु के समान दुरूखों का अंत करने में बहुत महत्व है। 
      शास्त्रों में महामृत्युञ्जय की उपासनाके लिए महामृत्युञ्जय मंत्र के जप का बहुत महत्व बताया गया है। इस महामृत्युञ्जय मंत्र का जप दैनिक जीवन में कोई भी व्यक्ति कर सकता है। लेकिन खास तौर पर जब कोई व्यक्ति रोग से पीडि़त हो या मानसिक अशांति या भय, बाधाओं से घिरा हो, तब इस मंत्र की साधना पीड़ानाशक मानी गई है। शास्त्रों में इस मंत्र के जप के विधि-विधान का पालन साधारण व्यक्ति के लिए कभी-कभी कठिन हो जाता है। हालांकि किसी योग्य ब्राह्मण से इस मंत्र का जप कराया जाना अधिक सुफल देने वाला होता है। फिर भी अगर किसी विवशता के चलते विधिवत मंत्र जप करना संभव न हो तो यहां बताया जा रहा है महामृत्युञ्जय जप का आसान उपाय। इसका श्रद्धा और आस्था के साथ पालन निश्चित रूप से कष्टों में राहत देगा
- इस मंत्र का जप यथासंभव रोग या कष्ट से पीडि़त व्यक्ति द्वारा करना अधिक फलदायी होता है। 
- ऐसा संभव न हो तो रोगी या पीडि़त व्यक्ति के परिजन इस मंत्र का जप करें।
 - मंत्र जप के लिए जहां तक संभव हो सफेद कपड़े पहने और आसन पर बैठें। मंत्र जप रूद्राक्ष की माला से करें।
 - महामृत्युञ्जय मंत्र जप शुरू करने के पहले यह आसान संकल्प जरूर करें
- मैं (जप करने वाला अपना नाम बोलें) महामृत्युञ्जय मंत्र का जप (स्वयं के लिए या रोगी का नाम) की रोग या पीड़ा मुक्ति या के लिए कर रहा हूं। महामृत्युञ्जय देवता कृपा कर प्रसन्न हो रोग और पीड़ा का पूरी तरह नाश करे।
 - कम से कम एक माला यानि 108 बार इस मंत्र का जप अवश्य करें। 

 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
      मंत्र जप पूरे होने पर क्षमा प्रार्थना और पीड़ा शांति की कामना करें। शास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव संहारकर्ता ही नहीं, कल्याण करने वाले देवता भी है। इस तरह शिव का काल और जीवन दोनों पर नियंत्रण है। यही वजह है कि व्यावहारिक जीवन में सुखों की कामनापूर्ति के लिए ही नहीं दुरूखों की घड़ी में शिव का स्मरण किया जाता है। शिव की भक्ति से दुरूख, रोग और मृत्यु के भय से छुटकारा पाने का सबसे प्रभावी उपाय है- महामृत्युंजय मंत्र का जप। 
       धार्मिक मान्यता है कि इस मंत्र जप से न केवल व्यक्तिगत संकट बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय आपदाओं और त्रासदी को भी टाला जा सकता है। यहां जानिए इनके अलावा भी कैसे विपरीत हालात या बुरी घड़ियों में भी इस मंत्र का जप जरूर करना चाहिएकृदृ
 - विवाह संबंधों में बाधक नाड़ी दोष या अन्य कोई बाधक योग को दूर करने में। 
- जन्म कुण्डली में ग्रह दोष, ग्रहों की महादशा या अंर्तदशा के बुरे प्रभाव की शांति के लिए। 
- संपत्ति विवाद सुलझाने के लिए। 
- महामारी के प्रकोप से बचने के लिए।
 - किसी लाइलाज गंभीर रोग की पीड़ा से मुक्ति के लिए।
 - देश में अशांति और अलगाव की स्थिति बनी हो। 
- प्रशासनिक परेशानी दूर करने के लिए। 
- वात, पित्त और कफ के दोष से पैदा हुए रोगों की निदान के लिए। 
- परिवार, समाज और करीबी संबंधों में घुले कलह को दूर करने के लिए। 
- मानसिक क्लेश और संताप के कारण धर्म और अध्यात्म से बनी दूरी को खत्म करने के लिए। 
- दुर्घटना या बीमारी से जीवन पर आए संकट से मुक्ति के लिए।

गुप्त नवरात्री 17 जुलाई 2015 से 25 जुलाई 2015 तक

       इस वर्ष गुप्त नवरात्री आषाढ़ मास की प्रतिपदा 17 जुलाई यानि की कल से शुरू होकर 25 जुलाई नवमी तक मान्य होगा । हिन्दू धर्म में नवरात्र मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्र के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है।

gupt-navratri-2015-गुप्त नवरात्री 17 जुलाई 2015  से 25 जुलाई 2015 तक


 गुप्त नवरात्र पूजा विधि- 
गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए। 
 जानिए गुप्त नवरात्रि का महत्त्व--- 
 देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं। इस नवरात्री की समाप्ति के साथ ही चातुर्मास प्रारंभ हो जाते हैं ,देवशयनी एकादसी से देवउठनी (देवप्रबोधनी )एकादसी के बीच चार माह को ऋषि परंपरा में विशेष महत्त्व प्राप्त है ! ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’। नौ शक्तियों से युक्त नवरात्रि कहलाते हैं। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं- 
उक्तं – ‘आश्विने वा ऽथवा माघे चैत्रें वा श्रावणेऽति वा।’ अर्थात आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र में वासंतिक नवरात्रि होते हैं। माघ व श्रावण के गुप्त नवरात्रि कहलाते हैं वहीं शारदीय नवरात्रि में देवी शक्ति की पूजा व बासंतिक नवरात्रि में विष्णु पूजा की प्रधानता रहती है…। 
 प्रतिदिन नौ दिनों तक यम, नियम, संयम व श्रद्धा से मार्कण्डेय पुराण अंतर्गत दुर्गा सप्तशती का पाठ भक्तगण करते हैं।
 ‘नमो दैव्ये महादैव्ये, शिवायै सततं नमः।
 नमः प्रकृत्यै भद्रायै, नियता: प्रणताः स्मताम्‌’॥ 
 गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां-- 
 गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।
 – गुप्त नवरात्रि में सुबह या विशेष रूप से रात्रि में दिन के मुताबिक देवी के अलग-अलग स्वरूपों का ध्यान कर सामान्य पूजा सामग्री अर्पित करें।
 —पूजा में लाल गंध, लाल फूल, लाल वस्त्र, आभूषण, लाल चुनरी चढ़ाकर फल या चना-गुड़ का भोग लगाएं। धूप व दीप जलाकर माता के नीचे लिखे मंत्र का नौ ही दिन कम से कम एक माला यानी 108 बार जप करना बहुत ही मंगलकारी होता है 
– सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
 शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।

जानिए की कैसे फ्रिज में रखा बासी/पुराना आटा आमंत्रित करता है, भटकती आत्माओं को

सभी जानते हैं की भोजन केवल शरीर को ही नहीं बल्कि हमारे मस्तिष्क को हमारे मन को हमारे विचारों को प्रभावित करता है !दूषित अन्न जल का सेवन न सिर्फ आपे शरीर और मन को बल्कि आपकी संतति को भी प्रभावित करता है !ऋषि मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये थे उसके अनुसार ताज़ा भोजन खानें से शरीर निरोगी होने के साथ साथ तरोताज़ा रहता है और बीमारियों को पन्पनें से रोकता है !लेकिन जब से फ्रिज का चलन अधिक हुआ है तब से घर घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बड़ा है!यही कारण है की परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है! 
         ताज़ा भोजन ताज़े विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध ,आलस्य ,औरर उन्माद का ग्राफ तेजी से बड रहा है !शास्त्रों में कहा गया है की बासी भोजन भूत भोजन होता है और इससे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य ,रोगों ,औरर उद्विग्र्ताओं से घिरा रहता है ! अक्सर हम देखतें है की गृहणियां कुछ समय बचाने के लिए रात को आटा गूंथ के लोई बनाकर रख देती है !औरर अगले दो चार दिन तक वही इस्तेमाल होता रहता है ! 
           गुंथे हुए आते को उस्सी तरह पिंड के सामान माना जाता है जो पिंड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किये जाते है !किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रिज में रखनें की परंपरा बन जाती है तब वें भूत और पितृ इस पिंड का भक्षण करनें के लिए घर में आने शुरू हो जाते है जो पिंड पाने से वंचित रह जाते है यही पितृ आटे की राखी हुई इस लोई को पिंड समझ तृप्ति पानें का उपक्रम करते रहते है !जिन परिवारों में इस प्रकार की परंपरा है (आटा गूंथ के रखनें की ) वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट , रोग - शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है !इस बासी और भूत भोजन का सेवन करनें वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना परता है ! 
           आप अपने इष्ट , परिजनों व् परोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पायेंगे की वे किसी न किसी परेशानी से घिरे रहते है !पुराने जमानें में हमारे बुजुर्ग गुंथा हुआ आटा रात में न रखनें की सलाह देते थे!उस जमाने में फ्रिज का कोई अस्तित्व नहीं था ,फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे के रहस्य की पूरी जानकारी थी .!मात्र कुछ समय बचानें के लिए हम अनजानें में स्वयं ही समस्याओं को आमंत्रित कर लेते है!
        ध्यान रखें, हमें ताज़ा भोजन बनाना चाहिए विशेषकर आटा ताज़ा ही गूंथना चाहिए !गूंथा हुआ आटा कभी भी रात में बचाकर नहीं रखना चाहिए !ऐसा करने से आप और आपका परिवार अनेकानेक परेशानियों/ समस्याओं से बचा रहेगा..

जानिए अनायास धन‍ प्राप्ति के विभिन्न योग (पैसा/धन मिलने के योग)

कुंडली में दूसरे भाव को ही धन भाव कहा गया है। इसके अधिपति की स्थिति संग्रह किए जाने वाले धन के बारे में संकेत देती है। कुंडली का चौथा भाव हमारे सुखमय जीवन जीने का संकेत देता है। पांचवां भाव हमारी उत्पादकता बताता है, छठे भाव से ऋणों और उत्तरदायित्वों को देखा जाएगा। सातवां भाव व्यापार में साझेदारों को देखने के लिए बताया गया है। इसके अलावा ग्यारहवां भाव आय और बारहवां भाव व्यय से संबंधित है। प्राचीन काल से ही जीवन में अर्थ के महत्व को प्रमुखता से स्वीकार किया गया। इसका असर फलित ज्योतिष में भी दिखाई देता है। केवल दूसरा भाव सक्रिय होने पर जातक के पास पैसा होता है, लेकिन आय का निश्चित स्रोत नहीं होता जबकि दूसरे और ग्यारहवें दोनों भावों में मजबूत और सक्रिय होने पर जातक के पास धन भी होता है और उस धन से अधिक धन पैदा करने की ताकत भी। ऐसे जातक को ही सही मायने में अमीर कहेंगे।
 
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः। स पण्डितः स श्रुतिमान गुणज्ञः। स एवं वक्ता स च दर्शनीयः। 
सर्वेगुणाः कांचनमाश्रयन्ति।। 
           नीति का यह श्लोक आज के अर्थ-प्रधान युग का वास्तविक स्वरूप व सामाजिक चित्र प्रस्तुत करता है। आज के विश्व में धनवान की ही पूजा होती है। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, वह कितना ही विद्वान हो, कितना ही चतुर हो, उसे महत्ता नहीं मिलती। इस प्रकार ऐसे बहुत से व्यक्ति मिलते हैं, जो सर्वगुण सम्पन्न हैं, परन्तु धन के बिना समाज में उनका कोई सम्मान नहीं है। 
         अतः यह आवश्यक है कि जन्म कुंडली में धन द्योतक ग्रहों एवं भावों का पूर्ण रूपेण विवेचन किया जाये। ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली में धन योग के लिए द्वितीय भाव, पंचम भाव, नवम भाव व एकादश भाव विचारणीय है। पंचम-एकादश धुरी का धन प्राप्ति में विशेष महत्व है। महर्षि पराशर के अनुसार जैसे भगवान विष्णु के अवतरण के समय पर उनकी शक्ति लक्ष्मी उनसे मिलती है तो संसार में उपकार की सृष्टि होती है। उसी प्रकार जब केन्द्रों के स्वामी त्रिकोणों के भावधिपतियों से संबंध बनाते हैं तो बलशाली धन योग बनाते हैं। यदि केन्द्र का स्वामी-त्रिकोण का स्वामी भी है, जिसे ज्योतिषीय भाषा में राजयोग भी कहते हैं। इसके कारक ग्रह यदि थोड़े से भी बलवान हैं तो अपनी और विशेषतया अपनी अंतर्दशा में निश्चित रूप से धन पदवी तथा मान में वृद्धि करने वाले होते हैं।
          पराशरीय नियम, यह भी है कि त्रिकोणाधिपति सर्वदा धन के संबंध में शुभ फल करता है। चाहे, वह नैसर्गिक पापी ग्रह शनि या मंगल ही क्यों न हो। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि जब धनदायक ग्रह अर्थात् दृष्टि, युति और परिवर्तन द्वारा परस्पर संबंधित हो तो शास्त्रीय भाषा में ये योग महाधन योग के नाम से जाने जाते हैं। लग्नेष, धनेष, एकादशेष, धन कारक ग्रह गुरु तथा सू0 व च0 अधिष्ठित राशियों के अधिपति सभी ग्रह धन को दर्शाने वाले ग्रह हैं। इनका पारस्परिक संबंध जातक को बहुत धनी बनाता है। नवम भाव, नवमेश भाग्येश, राहु केतु तथा बुध ये सब ग्रह भी शीघ्र अचानक तथा दैवयोग द्वारा फल देते हैं। धन प्राप्ति में लग्न का भी अपना विशेष महत्व होता है। ल
          ग्नाधिपति तथा लग्न कारक की दृष्टि के कारण अथवा इनके योग से धन की बढ़ोत्तरी होती है। योग कारक ग्रह (जो कि केन्द्र के साथ-साथ त्रिकोण का भी स्वामी हो) सर्वदा धनदायक ग्रह होता है। यह ग्रह यदि धनाधिपति का शत्रु भी क्यों न हो तो भी जब धनाधिपति से संबंध स्थापित करता है तो धन को बढ़ाता है। जैसे कुंभ लग्न के लिए, यदि लाभ भाव में योग कारक ग्रह ‘शुक्र’ हो और धन भाव में (वृ0) स्वग्रही हो तो अन्य बुरे योग होते हुए भी जातक धनी होता है, क्योंकि योग कारक ‘शुक्र’ व धनकारक ‘वृ0′ व लाभाधिपति ‘वृह’ का केन्द्रीय प्रभाव है। यद्यपि ये दोनों ग्रह एक दूसरे के शुभ हैं।
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दशाओं का प्रभाव---- 
धन कमाने या संग्रह करने में जातक की कुंडली में दशा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। द्वितीय भाव के अधिपति यानी द्वितीयेश की दशा आने पर जातक को अपने परिवार से संपत्ति प्राप्त होती है, पांचवें भाव के अधिपति यानी पंचमेश की दशा में सट्टे या लॉटरी से धन आने के योग बनते हैं। आमतौर पर देखा गया है कि यह दशा बीतने के साथ ही जातक का धन भी समाप्त हो जाता है। ग्यारहवें भाव के अधिपति यानी एकादशेश की दशा शुरू होने के साथ ही जातक की कमाई के कई जरिए खुलते हैं। ग्रह और भाव की स्थिति के अनुरूप फलों में कमी या बढ़ोतरी होती है। छठे भाव की दशा में लोन मिलना और बारहवें भाव की दशा में खर्चों में बढ़ोतरी के संकेत मिलते हैं। 
 शुक्र की महिमा------ 
किसी व्यक्ति के धनी होने का आकलन उसकी सुख सुविधाओं से किया जाता है। ऐसे में शुक्र की भूमिका उत्तरोत्तर महत्वपूर्ण होती जा रही है। किसी जातक की कुंडली में शुक्र बेहतर स्थिति में होने पर जातक सुविधा संपन्न जीवन जीता है। शुक्र ग्रह का अधिष्ठाता वैसे शुक्राचार्य को माना गया है, जो राक्षसों के गुरु थे, लेकिन उपायों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि शुक्र का संबंध लक्ष्मी से अधिक है। शुक्र के आधिपत्य में वृषभ और तुला राशियां हैं। इसी के साथ शुक्र मीन राशि में उच्च का होता है। इन तीनों राशियों में शुक्र को बेहतर माना गया है। कन्या राशि में शुक्र नीच हो जाता है, इसलिए कन्या का शुक्र अच्छे परिणाम देने वाला नहीं माना जाता। 
 लग्न के अनुसार पैसे वाले----- 
मेष लग्न के जातकों का शुक्र, वृष लग्न के जातकों का बुध, मिथुन लग्न के जातकों का चंद्रमा, कर्क लग्न वाले जातकों का सूर्य, सिंह लग्न वाले जातकों का बुध, कन्या लग्न वाले जातकों का शुक्र, तुला लग्न वाले जातकों का मंगल, वृश्चिक लग्न वाले जातकों का गुरु, धनु लग्न वाले जातकों का शनि, मकर लग्न वाले जातकों का शनि, कुंभ लग्न वाले जातकों का गुरु और मीन लग्न वाले जातकों का मंगल अच्छी स्थिति में होने पर या इनकी दशा और अंतरदशा आने पर जातक के पास धन का अच्छा संग्रह होता है या पैतृक संपत्ति की प्राप्ति होती है। अगर लग्न से संबंधित ग्रह की स्थिति सुदृढ़ नहीं है तो संबंधित ग्रहों का उपचार कर स्थिति में सुधार कर सकते हैं। 
 लग्न के अनुसार कमाने वाले----- 
कमाई के लिए कुंडली में ग्यारहवां भाव देखना होगा। इससे आने वाले धन और आय-व्यय का अंदाजा लगाया जा सकता है। मेष लग्न वाले जातकों का शनि, वृष लग्न का गुरु, मिथुन लग्न का मंगल, कर्क लग्न का शुक्र, सिंह लग्न का बुध, कन्या लग्न का चंद्रमा, तुला लग्न का सूर्य, वृश्चिक लग्न का बुध, धनु लग्न का शुक्र, मकर लग्न का मंगल, कुंभ लग्न का गुरु और मीन लग्न का शनि अच्छी स्थिति में होने पर जातक अच्छा धन कमाता है। इन ग्रहों की दशा में भी संबंधित लग्न के जातक अच्छी कमाई करते हैं। उन्हें पुराना पैसा मिलता है और पैतृक सम्पत्ति मिलने के भी इन्हें अच्छे अवसर मिलते हैं। 
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विभिन्न प्रमुख ज्योतिषीय ग्रन्थों वृहत पराशर होरा-शास्त्र, वृहतजातक, जातक तत्व, होरा सार, सारावली, मानसागरी, जातक परिजात आदि विभिन्न-विभिन्न धन योगों का विवरण प्राप्त होता है। परन्तु उनमें मुख्य जो अक्सर जन्मकुंडलियों में पाये जाते हैं तथा फलदायी भी हैं, जातक को धन इन युतियों मे मिलने का कारण बनता है:------ 
-----भाग्येश बुध से लाभेश मंगल कार्येश शुक्र सुखेश मंगल पंचमेश शुक्र लगनेश शनि धनेश शनि का गोचर से जन्म के बुध के साथ गोचर हो. 
-----कार्येश शुक्र का लाभेश मंगल सुखेश मंगल लगनेश शनि पंचमेश शुक्र धनेश शनि से गोचर से जन्म के कार्येश शुक्र के साथ गोचर हो.
 -----लाभेश मंगल का धनेश शनि लगनेश शनि से गोचर से जन्म के मंगल के साथ युति बने. -
----लगनेश शनि का सुखेश मंगल धनेश शनि पंचमेश शुक्र से गोचर से जन्म के शनि के साथ योग बने. 
----धनेश शनि का सुखेश मंगल पंचमेश शुक्र से योगात्मक रूप जन्म के शनि के साथ बने. 
----सुखेश मंगल के साथ पंचमेश शुक्र से गोचर से जन्म के मंगल के साथ योगात्मक रूप बने. 
-----अगर भाग्येश और षष्ठेस एक ही ग्रह हो 
----मकर लगन की कुंडली मे भाग्येश और षष्ठेश बुध एक ही ग्रह है,यह धन आने का कारण तो बनायेंगे लेकिन अधिकतर मामले मे धनेश,लगनेश,सुखेश,कार्येश के प्रति धन को या तो नौकरी से प्राप्त करवायेंगे या कर्जा से धन देने के लिये अपनी युति को देंगे. 
-----यदि चन्द्रमा से 6, 7, 8वें भाव में समस्त शुभ ग्रह विद्यमान हों और वे शुभ ग्रह क्रूर राशि में न हों और न ही सूर्य के समीप हों तो ऐसे योग (चन्द्राधियोग) में उत्पन्न होने वाला जातक धन, ऐश्वर्य से युक्त होता है तथा महान बनता है।
 -----अनफा व सुनफा योग जो चन्द्र से द्वितीय, द्वादश भाव में सूर्य को छोड़कर अन्य ग्रहों की स्थिति द्वारा बनते हैं, जातक अपने पुरुषार्थ से धन को प्राप्त करता है। या करने वाला होता है। 
-----एक भी शुभ ग्रह केन्द्रादि शुभ, स्थान में स्थित होकर, उच्च का हो व शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो तो धनाढ्य तथा राजपुरुष बना देता है।
 ----पुष्फल योग एक धन और यश देने वाला योग है, जिसमें चन्द्राधिष्ठित, राशि के स्वामी का लग्नेश के साथ होकर केन्द्र में बलवान होना अपेक्षित होता है। 
----लग्नेश द्वितीय भाव में तथा द्वितीयेश लाभ भाव में हो। 
----चंद्रमा से तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें स्थानों में शुभ ग्रह हों।
 -----पंचम भाव में चंद्र एवं मंगल दोनों हों तथा पंचम भाव पर शुक्र की दृष्टि हो। 
----चंद्र व मंगल एकसाथ हों, धनेश व लाभेश एकसाथ चतुर्थ भाव में हों तथा चतुर्थेश शुभ स्थान में शुभ दृष्ट हो। ----द्वितीय भाव में मंगल तथा गुरु की युति हो। 
----गज केसरी योग जिसमें बृहस्पति और चन्द्र का केन्द्रीय समन्वय होता है, धन एवं यश देने वाला होता है। ----यदि कुंडली में कर्क राशि में बुध और शनि 11वें भाव में हो तो जातक महाधनी होता है। (जा0त0)
 ----जिस जातक की कुंडली में लाभ भाव में ‘वृ0′ हों और पंचम भाव में सूर्य स्वगृही हों तो जातक की कुंडली में महाधनी योग बनता है। 
----कर्क राशि का चन्द्र लग्न भाव में वृ0 और म0 के साथ हो तो महाधनी योग बनता है। 
-----धनेश अष्टम भाव में तथा अष्टमेश धन भाव में हो। 
----पंचम भाव में बुध हो तथा लाभ भाव में चंद्र-मंगल की युति हो।
 ---गुरु नवमेश होकर अष्टम भाव में हो। 
----वृश्चिक लग्न कुंडली में नवम भाव में चंद्र व बृहस्पति की युति हो।
 ----मीन लग्न कुंडली में पंचम भाव में गुरु-चंद्र की युति हो। -
---कुंभ लग्न कुंडली में गुरु व राहु की युति लाभ भाव में हो। ----चंद्र, मंगल, शुक्र तीनों मिथुन राशि में दूसरे भाव में हों। 
----कन्या लग्न कुंडली में दूसरे भाव में शुक्र व केतु हो। 
----तुला लग्न कुंडली में लग्न में सूर्य-चंद्र तथा नवम में राहु हो। 
----मीन लग्न कुंडली में ग्यारहवें भाव में मंगल हो। 
----यदि जन्मकुंडली में स्वराशि का ‘वृ0′ लग्न भाव में ‘चन्द्रमा’ और ‘मं0′ के साथ हो तो महाधनी योग होता है। ---यदि स्वराशि का ‘षु’ लग्न भाव में चं0 और सूर्य से युक्त अथवा दृष्ट हो तो महाधनी योग होता है। 
----यदि कुंडली में लाभेश-धनभाव में और धनेश-लाभ भाव में हो तो जातक को धन लाभ बहुत अधिक कम प्रयास से प्राप्त होता है। 
---धनेश और लाभेश केन्द्रों में हो तो भी जातक को धन-लाभ होता है। 
---यदि धनेश लाभ भाव में हो तो जातक धनी होता है। 
----जन्म लग्न या पंचम भाव में मकर या कुंभ राशि का ‘श0′ हो और बु0 लाभ स्थान में हो तो जातक को सब प्रकार से धन लाभ होता है। 
---यदि जन्म लग्न में कर्क लग्न हो और लग्न में चं0, वृ0 तथा मं0 हो तो जातक को अचानक धन लाभ होता है।
 ----धन स्थान का स्वामी धन स्थान में, लाभ स्थान का अधिपति लाभ स्थान, धनेश, लाभेश लाभ स्थान में स्वराशि या मित्र राशि का अथवा उच्च का हो तो जातक धनवान होता है। 
---यदि जन्मकुंडली में लाभेश और धनेश लग्न में हो तो दोनों मित्र हों तो धन-योग बनता है और यदि लग्न का स्वामी धनेश और लाभेश से युक्त हो तो महाधनी योग बनता है। 
---यदि धनेश लग्न में और लग्न का स्वामी धन भाव में हो तो बिना प्रयत्न किये जातक धनवान होता है। 
---धन भाव में ‘गु0′ शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है। 
---जब जन्मकुंडली में धन स्थान में ‘शुक्र’ हो, शुभ ग्रह युक्त तथा दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है। “जन्मकुंडली में यदि ग्रह नीच राशि में भी स्थित हो तो भी यदि उसकी नीच राशि का स्वामी लग्न में या केन्द्र में स्थित हो अथवा उसकी उच्च राशि का स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो नीच भंग योग होता है व जातक धनी होता है।” 
----जब लग्न भाव का स्वामी त्रिकोण में स्थित हो, धन भाव का स्वामी लाभ भाव में हो, तथा धन भाव पर धनेश की दृष्टि हो तो कुंडली में महालक्ष्मी योग बनता है। 
----यदि भाग्य स्थान का स्वामी अपनी उच्च राशि में या मूल त्रिकोण अथवा स्वराशि में केन्द्र में स्थित हो, तो भी जातक धनी होगा। 
-----ग्यारहवें और बारहवें भाव का अच्छा संबंध होने पर जातक लगातार निवेश के जरिए चल-अचल संपत्तियां खड़ी कर लेता है। पांचवां भाव मजबूत होने पर जातक सट्टा या लॉटरी के जरिए विपुल धन प्राप्त करता है। 
 ------किसी भी जातक के पास किसी समय विशेष में कितना धन हो सकता है, इसके लिए हमें उसका दूसरा भाव, पांचवां भाव, ग्यारहवां और बारहवें भाव के साथ इनके अधिपतियों का अध्ययन करना होगा। इससे जातक की वित्तीय स्थिति का काफी हद तक सही आकलन हो सकता है। इन सभी भावों और भावों के अधिपतियों की स्थिति सुदृढ़ होने पर जातक कई तरीकों से धन कमाता हुआ अमीर बन जाता है। 
----किसी भी लग्न में पांचवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक सट्टा या अचानक पैसा कमाने वाले साधनों से कमाई का प्रयास करता है। चंद्रमा फलदाई हो तो ऐसे जातक अच्छी कमाई कर भी लेते हैं। 
 ----कारक ग्रह की दशा में जातक सभी सुख भोगता है और उसे धन संबंधी परेशानियां भी कम आती हैं।
 ----सातवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक साझेदार के साथ व्यवसाय करता है लेकिन धोखा खाता है।
 ----छठे भाव का ग्यारहवें भाव से संबंध हो तो, जातक ऋण लेता है और उसी से कमाकर समृद्धि पाता है।
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---भगवान के प्रकाश यौगिक क्रिया द्वारा और पदजनजपवाद द्वारा जातक के मुख, हथेली, कुंडली आदि का ध्यान रखकर सम्पत्ति, धन, लाभ, निधि आदि का ज्ञान कराना ही ज्योतिष और धन योग है। सम्पत्ति का संबंध भूमि से और धन का संबंध नगदी, सिक्के नोट आदि से है और लाभ का संबंध व्यापार, व्यवसाय, कपड़ा, मकान, वाहन आदि से संबंध है निधि का अर्थ है अनायास धन प्राप्त होना या आकस्मिक धन प्राप्त होना या अचानक पैतृक सम्पत्ति प्राप्त होना। 
----सर्वप्रथम जन्मकुंडली में धन योग या राजयोग का ज्ञान ग्रहों, राशि, नक्षत्र स्वामी, की क्रूरता सौम्यता स्थान की शुभता/अशुभता और ग्रहों के अधिकार संबंध दशा/अन्तरदशा, होरा, अष्टक वर्ग व गोचर का पारस्परिक संबंध होने से धन योग की शुभता और अशुभता का ज्ञान हो सकता है। 
 कारक :- धन का कारक गुरु है, धन प्रदाता स्थान 2, 1, 5, 6, 10, 11। धन योग/ राजयोग के द्वारा धन कैसे प्राप्त होगा और कहां से प्राप्त होगा और किस दिशा में और किसके द्वारा व कितना प्राप्त होगा व किस प्रकार धनयोग अशुभ हो जायेगा व उसका इलाज कैसे होगा। शुभ योग है तो उसे अधिक अशुभता। कभी-कभी जन्म कुंडली में धन योग होने पर भी उसे धन की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि धन योग को कम करने में (1) प्रेत बाधा, (2) संगत, (3) बुरे कर्म, (4) प्रारब्ध, (5) प्रायश्चित आदि कुछ चीजें तथा शष्टेश, अष्टमेश, द्वादशेष से संबंध द्वितीयेश, चतुर्थेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, एकादेश, युक्त, दृष्ट, परिवर्तन योग। 1. लग्न/लग्नेश 2, 4, 5, 6, 10, 11 के स्वामियों से संबंध हो धनेश का 4, 5, 6, 10, 11, चतुर्थेश का 5, 6, 10, 11, पंचमेश का 6, 10, 11 नवमेश का 10, 11 या 3, 6, 11 में राहु हो। कन्या राशि में राहु के साथ श0, मं0, षु0, हो तो कुबेर से भी अधिक धन प्राप्त होगा। गुरु/चं0 त्रिकोण में हो। 10वें और लग्न वृ0/षु0 हो। सू0/चं0 पर स्पष्ट दृष्टि हो तथा दूसरे घर में षुक्र हो और सू0/चं0 की दृष्टि हो, 2 गु0 हो। सू0/चं0 की राशि हो, दूसरे घर में गुरु हो बुध हो दृष्ट हो। 
             जन्म दिन का हो और चं0 स्वांश या मित्र नवांश में हो, गु0 की दृष्टि हो। जन्म राम का हो चं0 स्वांश मित्र नवांश में हो गुरु पर षुक्र की दृष्टि हो। निश्चय धन योग:- लग्न में, स्वगृही सूर्य हो। मं0/षु0 की दृष्टि या युति हो। लग्न में बुध/गुरु की युति या दृष्टि हो, लग्न में मं0 हो, लग्न में बुध हो, गुरु या शुक्र की युति हो, बुध या मं0 की दृष्टि हो। लग्न में षु0 हो या बुध या लग्न में शनि हो मंगल या गुरु दृष्टि हो। धन नैतिक/अनैतिक कार्य से:- नवमेश/दशमेश धन प्रदाय है, जिस ग्रह के साथ हो, उसके अनुसार नैतिक या अनैतिक कर्म से धन प्राप्त हो। अनैतिक चोरी, लॉटरी, मटका, जुआ/लग्न या चन्द्र से उपचय भावों में बुध, गुरु, शुक्र या तीनों ग्रह हो तो अधिक धन एक ग्रह हो तो कम। 
 धन मिलने का समय:- दूसरे घर में चन्द्र या कोई शुभ ग्रह व द्वितीयेश व लग्नेश हो तो उस समय लाभ कारक ग्रह की दशा/अंतरदशा में धन अवश्य मिलता है। अवस्था केन्द्र 1, 2, 11 में ग्रह उच्च और मित्र हो तो बाल्यवस्था में धन प्राप्त होगा। धनेश, लाभेश, लग्नेश, केन्द्र व त्रिकोण में हो तो मध्यम अवस्था में धन प्राप्त होगा। लग्नेश जहां हो उस स्थान का स्वामी लग्नेश में आ जाये तो वृद्धावस्था में धन प्राप्त होगा। 
किस दिशा/देश/विदेश :- चर लग्न हो/लग्नेश चर में हो और शीघ्रगामी ग्रह की दृष्टि हो तो विदेश से धन प्राप्त होगा। स्थिर लग्न/लग्नेश स्थिर राशि में हो और स्थिर ग्रहों की दृष्टि हो तो उसी देश में धन प्राप्त होगा। 
 किस दिशा:- दशा नाथ की राशि, लाभेश की दिशा, द्वितीयेश की दिशा में जो बलवान हो, उस दिशा में धन प्राप्त होगा। 
 किस के द्वारा:- दशम में सूर्य – पिता दशम में चन्द्र – माता दशम में मंगल – शत्रु/भाई दशम में बुध – मित्र दशम में गुरु – विद्या दशम में शुक्र – स्त्री से दशम में शनि – दासों से धन संख्या:- उच्च राशि में सूर्य हो तो – एक हजार उच्च राशि में चन्द्र हो तो – एक लाख उच्च राशि में मंगल हो तो – एक शत लाख उच्च राशि में बुध हो तो – करोड़ उच्च राशि में गुरु हो तो – अरब उच्च राशि में शुक्र हो तो – खरब उच्च राशि में शनि हो तो – कम/अल्प द्वितीयेश गोपुरांश हो और शुक्र पारवंतांश हो तो धन प्राप्त होगा। 
 उपजीविका:- 1. दशम में जो ग्रह हो, उसकी प्रकृति के अनुसार दो तीन हो तो उनमें बलवान ग्रह/दशमेश जहां स्थित हो, उस ग्रह को प्रकृति के अनुसार होगी। वराहमिहिर के अनुसार दशमेश जिसके नवांश में स्थित हो, उस नवांश के अनुसार जीविका, उपजीविका का व्यवसाय से संबंध होता हैं। तत्काल धन:- धनेश/दशमेश युक्त हो या संबंध हो। 1, 2, 11 अपने स्वामी से युक्त हो तब। लग्न में 2, 11 भाव स्वामी हो। लाभेश पर 2, 4, की दृष्टि हो तथा नवम की भी दृष्टि चं0/मं0 लग्नेश में किसी स्थान में हो तो व्यय भाव में शुक्र/शनि/बुध हो तो धन संग्रह करने की आदत रहती है। 
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ज्योतिषीय धन आने के उपाय----
 ----वक्री मंगल के लिये यह जरूरी है कि किसी से भी कोई वस्तु बिना मूल्य चुकाये नही ले,हो सके तो दान मे दी जाने वाली वस्तुओं का परित्याग करे. 
----वक्री मंगल से अधिकतर मामले मे बात झूठ के सहारे से पूरी की जाती है इसलिये झूठ का सहारा नही ले और जो भी है उसे हकीकत मे बयान करने से मंगल सहायक हो जायेगा. 
---कभी भी नाखून दांत हड्डी सींग बाल आदि से बने सामान का प्रयोग नही करे,और ना ही घर मे रखें. 
----मूंगा सवा सात रत्ती का गोल्ड मे या तांबे मे पेंडेंट की शक्ल मे बनवा कर गले मे धारण करे.
 ---भाग्येश को बल देने के लिये चौडे पत्ते वाले पेड घर मे लगायें,दांत साफ़ रखे,किसी प्रकार की झूठी गवाही या ---इसी प्रकार के दस्तावेज को प्रस्तुत करने के बाद अपने काम को निकालने की कोशिश नही करे,अन्यथा झूठे मुकद्दमे या इसी प्रकार के आक्षेप बजाय धन देने के पास से भी खर्च करवा सकते है. 
----बायें हाथ की कनिष्ठा उंगली मे सवा पांच रत्ती का पन्ना पहिने. 
-----किसी भी पीर फ़कीर का दिया ताबीज या यंत्र घर या पूजा मे नही रखें. 
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यदि आपने देखा ऐसा सपना तो मिलेगा धन
---- सपनों का काफी गहरा संबंध है हमारे भविष्य से। स्वप्न ज्योतिष के अनुसार सपनों से हमारी भविष्य संबंधी सफलता-असफलता जुड़ी रहती है। यदि हमें निकट भविष्य में धन मिलने के योग हैं, तो इस संबंध में भी सपने यह योग बता देते हैं। धन प्राप्ति के योग बताने वाले कुछ सपने इस प्रकार हैं-
 ----मुर्दा उठाकर ले जाते देखना---- आकस्मिक धन की प्राप्ति हो सकती है। इस धन से संकट आ सकता है और यह धन स्वयं के उपयोग में नहीं आएगा। 
---मछली देखना---- स्वप्न में मछली दिखाई दे तो धन-दौलत की प्राप्ति होती है। मंत्री पद और उच्च पदवी की प्राप्ति होती है। पाया हुआ धन बरकती होता है तथा जीवनभर चलता है।
 ---शव यात्रा देखना--- विदेश से लाभ की प्राप्ति हो सकती है। धन-मान, सम्मान मिलने की संभावना होती है। अचानक गढ़ा धन प्राप्ति का योग बनता है।
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यदि आपका ये अंग फड़के तो जानिए की धन मिलेगा--- 
 सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार हमारे शरीर के विभिन्न अंगों के फड़कने के कई कारण होते हैं। किसी अंग के फड़कने से शुभ समाचार की प्राप्ति होती है, तो किसी अंग का फड़कना अशुभ माना जाता है।वैसे तो हमारे शरीर के दाहिने अंग के फड़कने को शुभ और बाएं अंग को अशु माना जाता है। लेकिन महिलाओं के लिए यह विपरीत है। महिलाओं के बाएं अंग का फड़कना शुभ माना जाता है।
 ----यदि आपके दाहिने पैर की पिंडली फड़क रही है तो आपको अचानक कहीं से पैसे मिलने की संभावना बनी रहती है। 
---निचले होंठ का फड़कना जीवन साथी या प्रेमी या प्रेमिका से सुख और पैसों का सुख मिलने का इशारा होता है। होंठ का दाहिना कोना फड़कना आपको मित्रों से अचानक धन लाभ होने का संकेत देता है।
 ----दाहिनी आंख का कोना फड़कना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसे में आपको पैसों के साथ-साथ कोई बहुत शुभ समाचार प्राप्त होने की संभावना होती है। बाएं ओर की आंख का फड़कना अशुभ माना जाता है। 
-----यदि आपको दोनों होंठ एक साथ फड़कते हैं तो आपको पैसा और किस्मत दोनों का योग बनता है। यदि किसी व्यक्ति की दाहिनी हथेली फड़ती है तो उसे धन का लाभ प्राप्त होता है। यदि दाहिना हाथ फड़कता है तो भी पैसे साथ व्यक्ति को मान सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। 
----यदि किसी व्यक्ति के दोनों भौहों के बीच फड़कन होती है तो ऐसे इंसान को सुख-सुविधाएं प्राप्त होने की संभावनाएं होती है। ऐसा व्यक्ति निकट भविष्य में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के कंठ या गला फड़फड़ाता है तो यह भी शुभ सगुन है। माथे का फड़कना भी शुभ संकेत देता है। माथा फड़कने से व्यक्ति को भूमि भवन संबंधित लाभ होने की संभावना रहती है।
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