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जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय

इस छोटे से उपाय द्वारा बदकिस्मत लोगों की भी किस्मत साथ देने लगेगी ---- 
  भरसक कोशिशों के बाद भी आप किसी काम में बार-बार असफल हो रहे हैं या मेहनत के अनुसार सफलता नहीं मिल पा रही है। ऐसे में किस्मत या भाग्य का साथ न होने की बात कही जाती है। ज्यादा धन या पैसा कमाने के लिए किस्मत का साथ होना बहुत जरूरी है अन्यथा इस मनोकामना की पूर्ति होना असंभव सा ही है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से दुर्भाग्य पीछा छोड़ देता है और भाग्य साथ देने लगता है। 
If-you-do-not-measure-it-with-luck-जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय इस छोटे से उपाय द्वारा बदकिस्मत लोगों की भी किस्मत साथ देने लगेगी
     यदि आपको भी पूरी मेहनत के बाद उचित सफलता प्राप्त नहीं हो रही है तो प्रतिदिन सूखे आटे में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गाय को खिलाएं। ऐसा नियमित रूप से प्रतिदिन करें। गाय को सभी शास्त्रों के अनुसार पूजनीय एवं पवित्र माना गया है। गाय में ही सभी देवी-देवताओं का वास है और इसकी पूजा करने से भक्त को भाग्य का साथ मिलता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गौमाता को संतुष्ट करने पर वे सेवक को सेवा के प्रतिफल में आशीर्वाद स्वरूप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। गाय को सूखे आटे में हल्दी मिलाकर खिलाने से वे अतिप्रसन्न होती हैं।।

     कई बार इंसान चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता और कई बार उसे बैठे बैठे मिल जाता है ये किस्मत का खेल है, कई बार जब किस्मत साथ न दे तो लोग गम में डूब जाते है किसी को ईश्वर तो किसी को ज्योतिषी याद आते है, कभी कभी जब किसी कि किस्मत साथ दे रही होती है तो हम अक्सर उसे अपनी योग्यता मान लेते हैं कई लोग समय का लाभ उठा लेते है तो कई ऊपर से नीचे आ जाते है। मेरा कहने का अर्थ है इंसान का कभी न कभी वक्त के साथ किस्मत भी साथ देती है जब उसके पुण्य कर्म अच्छे होते है इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करो, अपने धर्म का पालन करो किस्मत के बारे मे तो मे हर मनुष्य थोड़ी बहुत जानकारी रखता है, कहते हैं जब हम कड़े परिश्रम करने के बाद सफलता प्राप्त करते है तो वह हमारे कर्म है लेकिन जब हम बिना मेहनत के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं उसे किस्मत कहते है। 
 ****करे नई उर्जा का संचार---- 
यदि आप अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करना चाहते है तो ऐसा नियमित रूप से करेगे तो इससे आपके सितारे चमक उठेगे। ब्रह्म बेला में उठ कर इश्वर का नाम, ध्यान, योग और पूजा करने से अकस्मात् लाभ होता है। 
 1. सूर्योदय से पूर्व ब्रह्मा बेला में उठे, और अपने दोनों हांथो की हंथेली को रगरे और हंथेली को देख कर अपने मुंह पर फेरे, क्योंकि :- शास्त्रों में कहा गया है की कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती । करमूले स्थिता गौरी, मंगलं करदर्शनम् ॥ हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, तथा हाथ के मूल मे सरस्वती का वास है अर्थात भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है, ज़िसके बल पर हम धन अर्थात लक्ष्मी अर्जित करतें हैं। जिसके बल पर हम विद्या सरस्वती प्राप्त करतें हैं।इतना ही नहीं सरस्वती तथा लक्ष्मी जो हम अर्जित करते हैं, उनका समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभू स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। ऐसे में क्यों न सुबह अपनें हाथ के दर्शन कर प्रभू की दी हुई ताकत का लाभ उठायें।।
 इन उपायों/ प्रयोगों द्वारा चमकेगी आपकी भी किस्मत----- 
 तंत्र शास्त्र व ज्योतिष के अंतर्गत ऐसे कई छोटे-छोटे उपाय हैं, जिन्हें करने से थोड़े ही समय में व्यक्ति की किस्मत बदल सकती है। मगर बहुत कम लोग इन छोटे-छोटे उपायों के बारे में जानते हैं। जो लोग जानते हैं वे ये उपाय करते नहीं और अपनी किस्मत को ही दोष देते रहते हैं। जानिए कुछ अचूक उपाय या प्रयोग जिन्हें सच्चे मन से करने से आपकी किस्मत चमक सकती है। 
 ये उपाय इस प्रकार हैं--- 
  1. रोज सुबह जब आप उठें तो सबसे पहले दोनों हाथों की हथेलियों को कुछ क्षण देखकर चेहरे पर तीन चार बार फेरें। धर्म ग्रंथों के अनुसार हथेली के अग्र भाग में मां लक्ष्मी, मध्य भाग में मां सरस्वती व मूल भाग (मणि बंध) में भगवान विष्णु का स्थान होता है। इसलिए रोज सुबह उठते ही अपनी हथेली देखने से भाग्य चमक उठता है। 
  2.  भोजन के लिए बनाई जा रही रोटी में से पहली रोटी गाय को दें। धर्म ग्रंथों के अनुसार गाय में सभी देवताओं का निवास माना गया है। अगर प्रतिदिन गाय को रोटी दी जाए तो सभी देवता प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामना पूरी करते हैं। 
  3. अगर आप चाहते हैं कि आपकी किस्मत चमक जाए तो प्रतिदिन चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे। 
  4. घर में स्थापित देवी-देवताओं को रोज फूलों से श्रृंगारित करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि फूल ताजे ही हो। सच्चे मन से देवी-देवताओं को फूल आदि अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं व साधक का भाग्य चमका देते हैं। 
  5.  घर को साफ-स्वच्छ रखें। प्रतिदिन सुबह झाड़ू-पोछा करें। शाम के समय घर में झाड़ू-पोछा न करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं और साधक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ सकता है।

2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या 9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय

     नया साल सभी के लिए कुछ ना कुछ नया और शुभ लेकर आता है। इस साल भी शनि दोष से पीडि़त या फिर अन्य ग्रहों की उल्टी चाल से ग्रस्त लोगों को अपनी पीड़ा दूर करने के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। नए साल 2016 की पहली शनिश्चरी अमावस्या 9 जनवरी 2016 को है। इसे लेकर शनि मंदिरों में तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं। इसी के साथ पीडि़त लोग भी अपने कष्टों से निजात पाने के लिए खास उपाय कर सकते हैं। शनिश्चरी अमावस्या शनिवार को सुबह 7:40 बजे से शुरू होकर दूसरे दिन 10 जनवरी 2016, रविवार सुबह 7:20 बजे तक रहेगी।

-January-9-2016-The-first-shaneshchari-amavasya-these-are-measures-2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या  9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय
 ये उपाय करें---- 

  1. सुंदरकांड का पाठ, हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। 
  2. सरसों या तिल के तेल के दीपक में दो लोहे की कीलें डालकर पीपल पर रखें।
  3. शनिदेव पर तिल या सरसों के तेल का दान करें। 
  4. चीटीं को शक्कर का बूरा डालें। 
  5. अपने वजन के बराबर सरसों का खली (पीना) गौशाला में डालें। 
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ श्री शनिस्तोत्रम्----- 
 यह स्तोत्र जातकों के हर प्रकार के कष्टों को दूर करने वाला है। यह स्तोत्र मानसिक अशांति, पारिवारिक कलह व दांपत्य सुख में दरार पाटने में समर्थ है। यदि इस स्तोत्र का 21 बार प्रति शनिवार को लगातार 7 शनिवार को पाठ किया जाये साथ ही शनिदेव का तैलाभिषेक से पूजन किया जाए तो निश्चय ही इन बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
 ‘‘तुष्टोददाति वैराज्य रुष्टो हरति तत्क्षणात्’’ धन्य है शनिदेव। शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं भी आशुतोष बन गये। प्रस्तुत स्तोत्र ज्वलंत उदाहरण है।
-January-9-2016-The-first-shaneshchari-amavasya-these-are-measures-2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या  9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय       राजा दशरथ शनि से युद्ध करने उनके पास गये थे, किन्तु धन्य है शनिदेव - जिसने शत्रु को मनचाहा वरदान देकर सेवक बना लिया। विशेष कहने की आवश्यकता नहीं, स्वयं शनि-स्तोत्र ही इसका प्रमाण है। अत: इसका स्तवन, श्रवण से लाभान्वित हो स्वयं को कृतार्थ करना चाहिए। शनि का प्रकोप शान्त करने के लिए पुराणों में एक कथा भी मिलती है कि महाराजा दशरथ के राज्यकाल में उनके ज्योतिषियों ने उन्हें बताया कि महाराज, शनिदेव रोहिणी नक्षत्र को भेदन करने वाले हैं। 
       जब भी शनिदेव रोहिणी नक्षत्र का भेदन करते हैं तो उस राज्य मेें पूरे बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होती है और अकाल पड़ जाता है। इससे प्रजा का जीवित बच पाना असम्भव हो जाता है। महाराज दशरथ को जब यह बात ज्ञात हुई तब वह नक्षत्र मंडल में अपने विशेष रथ द्वारा आकाश मार्ग से शनि का सामना करने के लिए पहुँच गये। शनिदेव महाराज दशरथ का अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुए और वरदन मांगने के लिए कहा। शनिदेव को प्रसन्न देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा कि हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें। शनि महाराज प्रसन्न थे और उन्होंने तुरन्त उन्हें वचन दिया कि उनकी पूजा पर उनके रोहिणी भेदन का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसके साथ यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा किये गये इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर भी मेरा अशुभ प्रभाव कभी नहीं पड़ेगा। 
 श्री शनि चालीसा----- 
 शनि चालीसा का पाठ सबसे सरल है। अतः यहां सर्वाधिक प्रचलित चालीसा प्रस्तुत की जा रही है। शनि चालीसा भी हनुमान चालीसा जैसे ही अति प्रभावशाली है। शनि प्रभावित जातकों के समस्त कष्टों का हरण शनि चालीसा के पाठ द्वारा भी किया जा सकता है। सांसारिक किसी भी प्रकार का शनिकृत दोष, विवाह आदि में उत्पन्न बाधाएं इस शनि चालीसा की 21 आवृति प्रतिदिन पाठ लगातार 21 दिनों तक करने से दूर होती हैं और जातक शांति सुख सौमनस्य को प्राप्त होता है। अन्य तो क्या पति-पत्नी कलह को भी 11 पाठ के हिसाब से यदि कम से कम 21 दिन तक किया जाये तो अवश्य उन्हें सुख सौमनस्यता की प्राप्ति होती है।
 श्री शनि चालीसा---- 
 दोहा---- 
जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज। 
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।। 

 चौपाई---- 
 जयति-जयति शनिदेव दयाला। 
 करत सदा भक्तन प्रतिपाला।। 

चारि भुजा तन श्याम विराजै। 
 माथे रतन मुकुट छवि छाजै।। 

परम विशाल मनोहर भाला। 
 टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।। 

कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै। 
 हिये माल मुक्तन मणि दमकै।। 

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। 
 पल विच करैं अरिहिं संहारा।। 

पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। 
 यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।

 सौरि मन्द शनी दश नामा। 
 भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।। 

जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं। 
 रंकहु राउ करें क्षण माहीं।। 

पर्वतहूं तृण होई निहारत। 
 तृणहंू को पर्वत करि डारत।। 

राज मिलत बन रामहि दीन्हा। 
 कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।। 

बनहूं में मृग कपट दिखाई। 
 मात जानकी गई चुराई।। 

लषणहि शक्ति बिकल करि डारा। 
 मचि गयो दल में हाहाकारा।। 

दियो कीट करि कंचन लंका।
 बजि बजरंग वीर को डंका।। 

नृप विक्रम पर जब पगु धारा। 
 चित्रा मयूर निगलि गै हारा।। 

हार नौलखा लाग्यो चोरी।
 हाथ पैर डरवायो तोरी।।

 भारी दशा निकृष्ट दिखाओ। 
 तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।

 विनय राग दीपक महं कीन्हो। 
 तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।। 

हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी। 
 आपहुं भरे डोम घर पानी।। 

वैसे नल पर दशा सिरानी। 
 भूंजी मीन कूद गई पानी।। 

श्री शकंरहि गहो जब जाई। 
 पारवती को सती कराई।। 

तनि बिलोकत ही करि रीसा। 
 नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।। 

पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी। 
 बची द्रोपदी होति उघारी।। 

कौरव की भी गति मति मारी। 
 युद्ध महाभारत करि डारी।। 

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। 
 लेकर कूदि पर्यो पाताला।। 

शेष देव लखि विनती लाई। 
 रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।। 

वाहन प्रभु के सात सुजाना। 
 गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।। 

जम्बुक सिंह आदि नख धारी। 
 सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।। 

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। 
 हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।। 

गर्दभहानि करै बहु काजा। 
 सिंह सिद्धकर राज समाजा।।

 जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै। 
 मृग दे कष्ट प्राण संहारै।। 

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। 
 चोरी आदि होय डर भारी।। 

तैसहिं चारि चरण यह नामा। 
 स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।। 

लोह चरण पर जब प्रभु आवैं। 
 धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।। 

समता ताम्र रजत शुभकारी। 
 स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।। 

जो यह शनि चरित्रा नित गावै। 
 कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।। 

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
 करैं शत्राु के नशि बल ढीला।। 

जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
 विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।। 

पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत। 
 दीप दान दै बहु सुख पावत।। 

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। 
 शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।। 

 दोहा--- 
 प्रतिमा श्री शनिदेव की, लोह धातु बनवाय। 
प्रेम सहित पूजन करै, सकल कष्ट कटि जाय।। 

चालीसा नित नेम यह, कहहिं सुनहिं धरि ध्यान।
 नि ग्रह सुखद ह्नै, पावहिं नर सम्मान।। 
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दशरथ कृत शनि स्तोत्र---- (हिन्दी पद्य रूपान्तरण)----
 हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले।
 कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले।। 

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे। 
सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे।।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले। 
हे दीर्घ नेत्र वालेे, शुष्कोदरा निराले।। 

भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले। 
कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले।।

 तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे। 
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।।

 हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।
 हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ।।

 हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे। 
 हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे।। 

हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी। 
हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी।। 

विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।
 स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे।। 

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी। 
तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी।। 

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे।। 

नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो।
 हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो।। 

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले। 
 स्वीकारो भजन मेरे।
 स्वीकारो नमन मेरे।। 

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि। 
वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये।। 

उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।।

 हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता। 
मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता।। 

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। शनि पूज्य चरण तेरे।। 

हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर। 
हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर।। 

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै। 
बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै।। 

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। 
 हैं पूज्य चरण तेरे।। 
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आरती श्री शनिदेव की----  कर्मफल दाता श्री शनिदेव की भक्ति और आरती करने से हर प्रकार के कष्टों का शमन हो जाता है। श्री शनिदेव को काला कपड़ा और लोहा बहुत प्रिय है। उन्हें आक का फूल बहुत भाता है। शनिवार और अमावस्या तिथि को उनको उड़द, गुड़, काले तिल और सरसों का तेल चढ़ाना लाभप्रद रहता है। श्रद्धापूर्वक उनकी आरती करने से सब प्रकार की प्रतिकूलताएं समाप्त हो जाता हैं। 
 दोहा---- 
 जय गणेश, गिरजा, सुवन, मंगल करण कृपाल।
 दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल।। 
 जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहं विनय महाराज। 
 करहंु कृपा रक्षा करो, राखहुं जन की लाज।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

प्रेम विनय से तुमको ध्याऊं, सुधि लो बेगि हमारी।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

देवों में तुम देव बड़े हो, भक्तों के दुख हर लेते। 
रंक को राजपाट, धन-वैभव, पल भर में दे देते। 
तेरा कोई पार न पाया तेरी महिमा न्यारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

वेद के ज्ञाता, जगत-विधाता तेरा रूप विशाला। 
कर्म भोग करवा भक्तों का पाप नाश कर डाला। 
यम-यमुना के प्यारे भ्राता, भक्तों के भयहारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

स्वर्ण सिंहासन आप विराजो, वाहन सात सुहावे। 
श्याम भक्त हो, रूप श्याम, नित श्याम ध्वजा फहराये।
 बचे न कोई दृष्टि से तेरी, देव-असुर नर-नारी।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

उड़द, तेल, गुड़, काले तिल का तुमको भोग लगावें। 
लौह धातु प्रिय, काला कपड़ा, आक का गजरा भावे।
 त्यागी, तपसी, हठी, यती, क्रोधी सब छबी तिहारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

शनिवार प्रिय शनि अमावस, तेलाभिषेक करावे। 
शनिचरणानुरागी मदन तेरा आशीर्वाद नित पावे। 
छाया दुलारे, रवि सुत प्यारे, तुझ पे मैं बलिहारी।
 आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।।

क्या ज्योतिषीय उपाय "ग्रह-मंत्र साधना" भी विज्ञान है.

What-astrological-remedy-planet-mantra-meditation-is-also-science-क्या ज्योतिषीय उपाय "ग्रह-मंत्र साधना" भी विज्ञान है.      मंत्र ध्वनि-विज्ञान का सूक्ष्मतम विज्ञान है मंत्र-शरीर के अन्दर से सूक्ष्म ध्वनि को विशिष्ट तरंगों में बदल कर ब्रह्मांड में प्रवाहित करने की क्रिया है जिससे बड़े-बड़े कार्य किये जा सकते हैं ! प्रत्येक अक्षर का विशेष महत्व और विशेष अर्थ होता है ! प्रत्येक अक्षर के उच्चारण में चाहे वो वाचिक,उपांसू या मानसिक हो विशेष प्रकार की ध्वनि निकलती है तथा शरीर में एवं विशेष अंगो नाड़ियों में विशेष प्रकार का कम्पन पैदा करती हैं जिससे शरीर से विशेष प्रकार की ध्वनि तरंगे निकलती है जो वातावरण-आकाशीय तरंगो से संयोग करके विशेष प्रकार की क्रिया करती हैं ! विभिन्न अक्षर (स्वर-व्यंजन) एक प्रकार के बीज मंत्र हैं ! विभिन्न अक्षरों के संयोग से विशेष बीज मंत्र तैयार होते है जो एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालते हैं, परन्तु जैसे अंकुर उत्पन्न करने में समर्थ सारी शक्ति अपने में रखते हुये भी धान,जौ,गेहूँ अदि संस्कार के अभाव में अंकुर उत्पन्न नहीं कर सकते वैसे ही मंत्र-यज्ञ आदि कर्म भी सम्पूर्ण फलजनित शक्ति से सम्पन्न होने पर भी यदि ठीक-ठीक से अनुष्ठित न किये जाय तो कदापि फलोत्पादक नहीं होते हैं ! घर्षण के नियमों से सभी लोग भलीभातिं परिचित होगें !
       घर्षण से ऊर्जा आदि पैदा होती है ! मंत्रों के जप से भी श्वास के शरीर में आवागमन से तथा विशेष अक्षरों के अनुसार विशेष स्थानों की नाड़ियों में कम्पन(घर्षण) पैदा होने से विशेष प्रकार का विद्युत प्रवाह पैदा होता है, जो साधक के ध्यान लगाने से एकत्रित होता है तथा मंत्रों के अर्थ (साधक को अर्थ ध्यान रखते हुए उसी भाव से ध्यान एकाग्र करना आवश्यक होता है) के आधार पर ब्रह्मांड में उपस्थित अपने ही अनुकूल उर्जा से संपर्क करके तदानुसार प्रभाव पैदा होता है ! रेडियो,टी०वी० या अन्य विद्युत उपकरणों में आजकल रिमोट कन्ट्रोल का सामान्य रूप से प्रयोग देखा जा सकता है.. इसका सिद्धान्त भी वही है ! 
      मंत्रों के जप से निकलने वाली सूक्ष्म उर्जा भी ब्रह्मांड की उर्जा से संयोंग करके वातावरण पर बिशेष प्रभाव डालती है ! हमारे ऋषि-मुनियों ने दीर्घकाल तक अक्षरों,मत्राओं, स्वरों पर अध्ययन प्रयोग, अनुसंधान करके उनकी शक्तियों को पहचाना जिनका वर्णन वेदों में किया है इन्ही मंत्र शक्तियों से आश्चर्यजनक कार्य होते हैं जो अविश्वसनीय से लगते हैं,यद्यपि समय एवं सभ्यता तथा सांस्कृतिक बदलाव के कारण उनके वर्णनों में कुछ अपभ्रंस शामिल हो जाने के वावजूद भी उनमें अभी भी काफी वैज्ञानिक अंश ऊपलब्ध है बस थोड़ा सा उनके वास्तविक सन्दर्भ को दृष्टिगत रखते हुए प्रयोग करके प्रमाणित करने की आवश्यकता है ! पदार्थ जगत में विस्फोट होता है उर्जा की प्राप्ति के लिये पदार्थ को तोड़ना पड़ता है परन्तु चेतना जगत में मंत्र एवं मात्रिकाओं का स्फोट किया जाता है ..शारीरिक रोग उत्पन्न होने का कारण भी यही है कि जैव-विद्युत के चक्र का अव्यवस्थित हो जाना या जैव-विद्युत की लयबद्धता का लड़खड़ा जाना ही रोग की अवस्था है जब हमारे शरीर में उर्जा का स्तर निम्न हो जाता है तब अकर्मण्यता आती है तथा मंत्र जप के माध्यम से ब्रह्मांडीय उर्जा-प्रवाह को ग्रहण करके अपने शरीर के अन्दर की उर्जा का स्तर ऊचा उठाया जा सकता है और अकर्मण्यता को उत्साह में बदला जा सकता है चुकि संसार के प्राणी एवं पदार्थ सब एक ही महान चेतना के अंशधर है,इसलिये मन में उठे संकल्प का परिपालन पदार्थ चेतना आसानी से करने लगती है.. जब संकल्प शक्ति क्रियान्वित होती है तो फिर इच्छानुसार प्रभाव एवं परिवर्तन भी आरम्भ हो जाता है ! 
       जातक जन्म कुंडली में उपस्थित "शुभ ग्रह-मंत्र साधना" से मन, बुद्धि, चित अहंकार में असाधारण परिवर्तन होता हे..... विवेक, दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और बुद्धि के विशेष रूप से उत्पन्न होने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुखों का निवारण हो जाता है वैज्ञानिक परिभाषा में हम इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि मंत्र विज्ञान का सच यही है कि यह वाणी की ध्वनि के विद्युत रूपान्तरण की अनोखी विधि है ! हमारा जीवन,हमारा शरीर और सम्पूर्ण ब्रह्मांण जिस उर्जा के सहारे काम करता है,उसके सभी रूप प्रकारान्तर में विद्युत के ही विविध रूप हैं.. मंत्र-विद्या में प्रयोग होने वाले अक्षरों की ध्वनि (उच्चारण की प्रकृति अक्षरों का दीर्घ या अर्धाक्षर, विराम, अर्धविराम आदि मात्राओं) इनके सूक्ष्म अंतर प्रत्यन्तर मंत्र-विद्या के अन्तर-प्रत्यन्तरों के अनुरूप ही प्रभावित व परिवर्तित किये जा सकते हैं.. मंत्र-विज्ञान के अक्षर जो मनुष्य की वाणी की ध्वनि जो शरीर की विभिन्न नाड़ियों के कम्पन से पैदा होते हैं तथा जो कि मानव के ध्यान एवं भाव के संयोग से ही विशेष प्रकार कि विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं वही जैव-विद्युत आन्तरिक या बाह्य वातावरण को अपने अनुसार ही प्रभावित करके परिणाम उत्पन्न करती है ! सही मंत्र का चुनाव किसी योग्य विद्वान से परामर्श पश्चात् ही करना श्रेयकर रहेगा। सभी मंत्र सभी जातको के लिए सामान रूप से हितकारी नहीं होते, अतः सावधानी जरुर बरतें।"

जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें

Here-on-this-Navratri-Durga-A-few-things-to-note-in-the-text-जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें
  1. दुर्गा सप्तशती के किसी भी चरित्र -का कभी भी आधा पाठ ना करें एवं न कोई वाक्य छोड़े। 
  2.  पाठ को मन ही मन में करना निषेध माना गयाहै। अतः मंद स्वर में समान रूप से पाठ करें। 
  3. पाठ केवल पुस्तक से करें यदि कंठस्थ हो तो बिना पुस्तक के भी कर सकते हैं। 
  4.  पुस्तक को चौकी पर रख कर पाठ करें। हाथ में लेकर पाठ करने से आधा फल प्राप्त होता है। 
  5. पाठ के समाप्त होने पर बालाओं व ब्राह्मण को भोजन करवाएं। 
 जानिए कि अभिचार कर्म में किन नर्वाण मंत्र का प्रयोगहोता हैं।। जैसे--- 
  1. मारण के लिए : ---ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै देवदत्त रं रंखे खे मारय मारय रं रं शीघ्र भस्मी कुरू कुरू स्वाहा। 
  2. मोहन के लिए :---- क्लीं क्लीं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैविच्चे देवदत्तं क्लीं क्लीं मोहन कुरू कुरूक्लीं क्लींस्वाहा॥ 
  3. स्तम्भन के लिए : ----ऊँ ठं ठं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेदेवदत्तं ह्रीं वाचं मुखं पदं स्तम्भय ह्रींजिहवांकीलय कीलय ह्रीं बुद्धि विनाशय -विनाशय ह्रीं।ठं ठं स्वाहा॥ 
  4. आकर्षण के लिए :---- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदतं यंयं शीघ्रमार्कषय आकर्षय स्वाहा॥ 
  5.  उच्चाटन के लिए:----ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तफट् उच्चाटन कुरू स्वाहा। 
  6. वशीकरण के लिए :-- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तंवषट् में वश्य कुरू स्वाहा। 
  7. सर्व सुख समृद्धि के लिए--- 
 ।।सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।। 
 ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। 
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 जय जय श्री अम्बे माँ दुर्गा माँ .... ॐ एम् ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ।। 
 नोट : मंत्र में जहां "देवदत्त" शब्द आया है वहां संबंधित व्यक्ति का नाम लेना चाहिये।। 
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ऐसे करें " माँ" की आराधना(एक भावांजलि--कविता)---- 
माँ तुम आओ सिंह की सवार बन कर ।। 
माँ तुम आओ रंगो की फुहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ पुष्पों की बहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सुहागन का श्रृंगार बनकर ।। 
माँ तुम आओ खुशीयाँ अपार बनकर ।। 
माँ तुम आओ रसोई में प्रसाद बनकर ।। 
माँ तुम आओ रिश्तो में प्यार बनकर ।। 
माँ तुम आओ बच्चो का दुलार बनकर ।। 
माँ तुम आओ व्यापार में लाभ बनकर ।। 
माँ तुम आओ समाज में संस्कार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सिर्फ तुम आओ, क्योंकि तुम्हारे आने से ये सारे।। 
सुख खुद ही चले आयेगें। तुम्हारे दास बनकार ।। 
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इस नवरात्रि पर इन उपायों द्वारा करें कार्य बाधा का शमन
  1. नित्य प्रात: काल स्नानदि से निवृत होकर गीता के ग्यारवे अध्याय का पाठ करने से कार्यो मे आने वाली बाधायें नष्ट हो जाती है । 
  2. गीता के ग्यारवे अध्याय के 36 वे श्लोक को लाल स्याही से लिखकर घर मे टांग दे । सभी प्रकार की बाधायें दूर हो जायेगी ।
  3. अपने दिन का आरंभ करते समय जब आप बाहर निकले तो पहले दाया पांव बाहर निकालें । आपके वांछित कार्यो मे कोई बाधा नही आयेगी । 
  4. घर से निकलते समय कोई मीठा पदार्थ -गुड़, शक्कर, मिठाई या शक्कर मिला दही खा ले ।कार्यों की बाधा दूर हो जायेगी ।
  5. तुलसी के तीन चार पत्तो को ग्रहण करके घर से बाहर जाने पर भी कार्यों की सभी बाधाए दूर हो जाती है । 
  6. अगर बार-बार कार्यों मे बाधा आ रही हो तो अपने घर मे श्यामा तुलसी का पौधा लगाऐ । समध्याकाल शुध्द घी का दीपक जलाऐं ।
  7. 5 बत्ती का दीपक हनुमानजी के मंन्दिर मे जला आयें । इससे सभी प्रकार की बाधाएं और परेशानियां दूर हो जायेगी । 
  8. प्रात:काल भगवती दूर्गा को पॉच पुष्प चढाएं । आपके कार्यों की सभी बाधाऐ दूर हो जायेगी । 
  9. घर से बाहर निकलते समय जिधर का स्वर चल रहा हो , उसी तरफ का पैर पहले बाहर निकाले । इससे कार्यों मे बाधा नही आयेगी ।

चंद्रग्रहण पर करें ग्रहण दोष से मुक्ति के उपाय

जानिए कुंडली के अनिष्ट कारक ग्रहण योग---
       हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है. चंद्रमा दुसरे भाव में शुभ फल देता है और अष्टम भाव में अशुभ फल देता है ।। 
       
पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार चन्द्र ग्रह वृषभ राशी में उच्च और वृश्चक राशी में नीच का होता है. जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है.
 जानिए क्या होता हैं ग्रहण दोष..??? 
 ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। 
चूड़ामणि चंद्रग्रहण चंद्रग्रहण पर करें ग्रहण दोष से मुक्ति के उपाय-In-the-year-2015-two-total-lunar-eclipses-will-occur-One-Total-Solar-Eclipse-and-one-partial      इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . 
      .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है 
         अगर आकड़ों की बात करें तो राहु केतु एक राशि का भोग 18 महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है
 ---ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है. 
 ----चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं ।। कुंडली चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं ।।
        पंडित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है ।। 
        पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है ।। जिस जातक की जन्म कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बन रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है ।।
        ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है ।। 
 जानिए ग्रहण योग के लक्षण---
  1.  दूसरो को दोष देने की आदत 
  2.  वाणी दोष से सम्बन्ध ख़राब होते जाते है ,सम्बन्ध नहीं बचते
  3.  सप्तम भाव का दोष marriage सुख नहीं देता 
  4.  प्रथम द्वितीय नवम भाव में बनने वाले दोष भाग्य कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है , 
  5.  मन हमेशा नकारात्मक रहता है , 
  6.  हमेशा आदमी depression में रहता है, 
  7.  कभी भी ऐसे आदमी को रोग मुक्त नहीं कहा जा सकता 
  8.  पैरो में दर्द होना , दूसरे को दोष देना ,खाने में बल निकलते है , 
 उपाय 
  1. त्रयोदशी को रुद्राभिषेक करे specially शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को 
  2. खीरा कब्ज दूर करता है ,liver मजबूत करता है ,पित्त रोग में फायदा करता है ,जो लोग FAT कम करना चाहे उनको फायदा करता है, किडनी problems में फायदा करता है 
  3. ग्रहण योग वाले आदमी के पास काफी उर्जा होती है यदि वो उसे +वे कर ले तो जीवन में अच्छी खासी सफलता मिल जाती है 

 ग्रहण योग के लक्षण
  1.  घर में अचानक आग लग जाये या चोरी हो जाये 
  2.  12th house में चंद्रमा after marriage गरीबी दे देगा जानिए ग्रहण योगों को +ve करने का तरीका--- 
  3.  गुरु के सानिध्य में रहे , 
  4.  मंदिर आते जाते रहे , 
  5.  हल्दी खाते रहे , 
  6.  गाय के सानिध्य में रहे , 
  7.  सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे , 
  8.  घर के पश्चिमी हिस्से की सफाई करे ,मंगल वार शनिवार को श्रम दान करे , 
  9.  चांदी का चौकोर टुकड़ा अपनी जेब में रखे यदि माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है , 
  10.  संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर बना ले या किसी और के नाम पे रख दे ,
 कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम में खर्च करे , किसी जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रहण योग निवारण का एक आसान उपाय ( इसे ग्रहण काल के मध्य में करे)
 1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु के साथ है तो चूना पत्थर ले उसे एक भूरे कपडे में बांध कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा किसी मंदिर में चढ़ा देवें।।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि यह चंद्र ग्रहण सोमवार (28सितम्बर,2015) को हो रहा हैं इसलिए यह ग्रहण "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" कहलाएगा॥ 'चूड़ामणि चंद्रग्रहण' का स्नान, दान आदि की दृष्टी से विशेष महत्त्व होता हैं अतः जिन क्षेत्र में यह ग्रहण दिखाई देगा वहां इस इस प्रकार के दान का विशेष महत्त्व होगा॥ श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा चंद्र ग्रहण होने से इसका महत्त्व बहुत बढ़ गया हैं।। 
     इस दिन उज्जैन स्थित प्राचीन सिद्धवट तीर्थ पर ( मध्यप्रदेश) आकर अपनी जन्म कुंडली, चंद्र कुंडली और नवमांश कुंडली में स्थित ग्रहण दोष के साथ साथ पितृदोष या कालसर्प दोष/ याग की शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध, नागबलि-- नारायण बाली श्राद्ध कर्म करवाने से पितरों को मुक्ति मिलती हैं।।। 
    पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार का यह "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" मीन राशि और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हो रहा हैं। इसलिए यह ग्रहण इस राशि और नक्षत्र वाले व्यक्तियों के लिए अधिक पीड़ा परेशनिदायक हैं॥ इस मीन राशि के अलावा मेष, मिथुन, कर्क, कन्या,तुला, वृश्चिक एवम कुम्भ राशि वालों को भी सावधानी रखनी चाहिए॥
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