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जानिए वर्ष 2020 में कब मनेगी होली एवम कब होगा होलिका दहन

होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।
       भारत में मनाए जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है। हिंदुओं के लिए होली का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। लेकिन होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। वैष्णव परंपरा मे होली को, होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।
इस वर्ष 2020 की  होली पर बना है 3 ग्रहों का बहुत शुभ संयोग, श्रेष्ठ मुहूर्त में ही करें होली का पूजन, मिलेंगे शुभ वरदान---
रंगों का पर्व होली इस वर्ष (सोमवार) 10 मार्च 2020 को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पूर्व 09 मार्च को होलिका दहन होगा। होलिका दहन पर इस बार दुर्लभ संयोग बन रहे हैं।  फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए -
  • 1. पहला, उस दिन 'भद्रा' न हो। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।
  • 2. दूसरी बात, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।
यह रहेगा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त --
होलिका दहन मुहूर्त- शाम 6 बजकर 40 मिनट से 6:52 गोधूलि वेला अथवा 6:28 बजकर 40 मिनट से 08 बजे तक चर का चौघड़िए में ।
भद्रा दोपहर 1 बजकर 11 मिनीट तक
पूर्णिमा तिथि आरंभ- सुबह 3 बजकर 3 मिनट से (9 मार्च 2020)
पूर्णिमा तिथि समाप्त- रात 11 बजकर 16 मिनट तक (9 मार्च 2020)

होलिका दहन 2020 शुभ मुहूर्त 9 मार्च 2020 को यह रहेगा
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त- प्रदोष समय
होलिका दहन मुहूर्त : 18:40 से 21:07: तक

10 मार्च 2020 (रंगावली होली)--
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 8/9मार्च 2020 सुबह 3:03 बजे
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 9 मार्च 2020 रात 11:14 बजे

होलिका दहन की पूजा में रक्षो रक्षोघ्न सूक्त का पाठ होता है। तीन बार परिक्रमा की जाती है। लोग गेहूं,चना व पुआ-पकवान अर्पित करते हैं। सुबह उसमें आलू, हरा चना पकाते और खाते हैं। नहा धोकर शाम में मंदिर के पास जुटते हैं। नए कपड़े पहनकर भगवान को रंग-अबीर चढ़ाते हैं। भस्म सौभाग्य व ऐश्वर्य देने वाली होती है। होलिका दहन में जौ व गेहूं के पौधे डालते हैं। फिर शरीर में ऊबटन लगाकर उसके अंश भी डालते हैं। ऐसा करने से जीवन में आरोग्यता और सुख समृद्धि आती है। 
इस तरह करें होलिका पूजन --
होलिका दहन से पहले होलिका पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए। होलिका पूजन आप घर पर या फिर सार्वजानिक स्थल  पर जाकर भी कर सकते है। आजकल सभी लोग अपने घर पर पूजा ना करके सार्वजानिक स्थल पर ही जाते है। सभी लोग मंदिर या चौराहे पर कंडो, गुलरी और लकड़ी से होलिका सजाते है।
होलिका पूजन के लिए एक थाली में साबुत हल्दी,माला, रोली,फूल, चावल, मुंग, बताशे, कच्चा सूत, नारियल व एक लोटा जल लेकर बैठना चाहिए। इसके अतिरिक्त नई फसल की बालियां जैसे चने की बालियां या फिर गेहू की बालियां भी होनी चाहिए।
Know-when-Holi-and-Holika-Dahan-will-be-celebrated-in-the-year-2020-जानिए वर्ष 2020 में कब मनेगी होली एवम कब होगा होलिका दहन        होलिका पूजन शाम के समय किया जाता है। पूर्व या उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठे , सबसे पहले भगवान गणेश का समरण करे। इसके बाद भगवान नरसिंह को याद करते हुए गोबर से बनी हुई होलिका पर हल्दी, रोली, चावल, मुंग, बताशे अर्पित करने चाहिए। फिर होलिका पर जल चढ़ाये। उसके बाद होलिका के चारो और परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटे, यह परिक्रमा सात बार करनी चाहिए। होलिका पर प्रह्लाद का नाम लेकर फूल अर्पित करे और फिर भगवान को याद करते हुए नए अनाज की बालियां अर्पण करे। अंत में अपना और अपने परिवार का नाम लेकर प्रसाद चढ़ाये। और होलिका दहन के समय होलिका की परिक्रमा करे। फिर होलिका पर गुलाल डालने के बाद अपने बड़ो के पैरो में गुलाल डाल कर उनका आशीर्वाद ले।
           होलिका पूजन से हर प्रकार से बुराई पर जीत प्राप्त होत्ती है। होलिका पूजन परिवार में सुख, समृद्धि और शान्ति लाता है। कई जगह पर लोग होलिका पूजन के दिन व्रत भी करते है व्रत होलिका दहन के बाद ही खोला जाता है।होलिका पूजन पर भद्रा के समय का विशेष ध्यान रखे। भद्रा के समय होलिका पूजन नहीं किया जाता। उत्तर भारत के मध्यप्रदेश एवम राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। 
         होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं। अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियां जलाते हैं। होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है।  होलिका दहन तो रात्रि में होता है, परन्तु महिलाओं द्वारा इस सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है। महिलाएं एक पात्र में जल और थाली में रोली, चावल, कलावा, गुलाल और नारियल आदि लेकर होलिका माई की पूजा करती हैं। इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है और जल चढ़ाया जाता है। होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है।
इस तरह करें होलिका पूजन --
होली पूजन करने का तरीका अलग अलग क्षेत्रो अलग अलग पारम्परिक तरीको से होती है तो इस बात का भी विशेष ध्यान रखे। आप तरीका वही अपनाये जो आपके क्षेत्र में माना जाता है।
होली पर ध्यान रखने योग्य बात---
शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतया वर्जित है। यदि भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन कर दिया तो पीड़ा उठानी पड़ सकती है। इस दिन पुरुषों को भी हनुमानजी और भगवान भैरवदेव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।

जानिए होलिका दहन का महत्व---
होली दहन पर लोग होलिका को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करते हैं. हिंदू शास्त्रों के अनुमान मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने होलिका को आग में जलाकर अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी, इसलिए खुशी में होली का त्योहार मनाया जाता है. इस मान्यता के अनुसार छोटी होली के दिन लोग कुछ लकड़ियां इकठ्ठा करके उन्हें अच्छे से लगाकर होलिका मानते हुए जलाया जाता है।

होलिका दहन की पौराणिक कथा--
 पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है।

समझें होलाष्टक का महत्व--
इस बात का विशेष ध्यान रखें कि होलाष्टक के 8 दिन किसी भी मांगलिक शुभ कार्य को करना शुभ नहीं होता है। इसलिए भूलकर भी कोई शुभ काम न करें। इस दौरान शादी, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, हिंदू धर्म के 16 संस्कार, कोई भी नया व्यवसाय या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। होलिका दहन के बाद ही कोई भी शुभ कार्य का आरंम्भ करें।
    होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जात सकता है. "होलाष्टक" के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है. सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है. धुलेण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। होली की शुरुआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलैण्डी तक रहती है. इसके कारण प्रकृति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है. वर्ष 2020 में 3 मार्च 2020 से 9 मार्च, 2020 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी. होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है।
    होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं जिसके कारण शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिल पाता है. होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी. साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था . जिनमें एक को होलिका और दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है.होलाष्टक एक दिन का पर्व ना होकर जबकि आठ दिन का पर्व है।
होलाष्टक में उग्र रहते हैं सभी ग्रह--

जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए।होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं. इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं. जिसके कारण हानि की आशंका बढ़ जाती है।
     मानव मस्तिष्क पूर्णिमा से 8 दिन पहले कहीं न कहीं क्षीण, दुखद, अवसाद पूर्ण, आशंकित और निर्बल हो जाता है. ये अष्ट ग्रह, दैनिक कार्यकलापों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

होलिका दहन में होलाष्टक की विशेषता --
होलिका पूजन करने के लिये होली से आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी खास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है. जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है. जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है. होली का डंडा स्थापित होने के बाद संबन्धित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है।
होलाष्टक के दिन से शुरु होने वाले कार्य --
सबसे पहले इस दिन, होलाष्टक शुरु होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है. इस दिन इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध कर, इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है. इस दिन जगह-जगह जाकर सूखी लकडियां विशेष कर ऎसी लकडियां जो सूखने के कारण स्वयं ही पेडों से टूट्कर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर चौराहे पर एकत्र कर लिया जाता है।
होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है. इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है. व इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है. अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है. बच्चे और बडे इस दिन से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है.

होलाष्टक में कार्य निषेध --
होलाष्टक मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है. होलाष्टक के दिन से एक ओर जहां उपरोक्त कार्यो का प्रारम्भ होता है. वहीं कुछ कार्य ऎसे भी है जिन्हें इस दिन से नहीं किया जाता है. यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है. अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठिक आठ दिन पूर्व शुरु हो जाते है.
     होलाष्टक के मध्य दिनों में 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता है. यहां तक की अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शान्ति कार्य किये जाते है. इन दिनों में 16 संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है।

कामदेव को किया था भस्म -
होली की एक कहानी कामदेव की भी है। पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया। तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए। कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई। अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

होलिका दहन का इतिहास--
विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी ख़ुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।

होली के पर्व पर करें राशि अनुसार विशेष उपाय​ ---

मेष राशि ---
  • 1. इस राशि के जातक-जातिकाओं को किसी भी प्रकार की कारोबारी, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानी हो या इसका हमेशा भय बना रहता है, मेहनत का उचित फल नहीं मिलता हो। तो होलिका दहन के समय एक तांबे की कटोरी में चमेली का तेल, पांच लौंग और आंवले के पेड़ के पांच पत्ते, थोड़ा सा गुड़। यह सभी समान कटोरी में रख दें। मंगल गायत्री का 108 बार जाप करते हुए समस्त सामग्री को होलिका दहन के समय होलिका में अर्पित कर देना चाहिए। प्रात: काल सुबह होली की थोड़ी सी राख लेकर आएं और उस राख को चमेली के तेल में मिला कर अपने शरीर पर मालिश करें। किसी भी तरह की समस्या होगी उसका निवारण होगा। एक घंटे बाद हल्के गरम पानी से स्नान कर लें।
  • 2. दूसरे दिन ब्रह्ममुर्हूत्त में जहाँ होली जली थी वहाँ की सात चुटकी राख, सात तांबे के छेद वाले सिक्के, लाल कपड़े में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर टांग दें या इस सामग्री को अपनी तिजोरी में रख दें। धन लाभ अवश्य होगा।

वृषभ राशि--
  • 1. इस राशि के जातक-जातिकाओं को यदि व्यापारिक समस्या हो, घर में सुख शांति न हो, लेन-देन के मसलों से परेशानी हो, स्वास्थ्य अनुकूल न रहता हो, कारोबार से लाभ न मिल रहा हो तो चाँदी की कटोरी ले लें और उसमें थोड़ा सा दूध, पांच चुटकी चावल डाल दें, गुलमोहर के पांच पत्ते डाल दें। थोड़ा पांच चुटकी शक्कर, इन सारे सामानों को होलिका दहन के समय शिव गायत्री का 108 बार जाप करके अग्नि को समर्पित कर दें। कैसी भी व्यापारिक समस्या होगी उसका निवारण हो जाएगा।
  • 2. होली के प्रात:काल सफेद कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख और एक सिक्का चाँदी का बांध लें। इस सामग्री को अपनी तिजोरी में रख दें। कारोबारी सारी समस्याओं का निवारण होगा।

मिथुन राशि--
  • 1. अनावश्यक कलह, व्यापार में घाटा, अपनों का विरोध, मानसिक अस्थिरता, इन सारी समस्याओं के निवारण के लिए होलिका दहन के समय कांसे की कटोरी में 50 ग्राम हरे धनिया का रस, 108 दाने साबूत मूंग के, पीपल के पांच पत्ते, कोई भी हरे रंग की मिठाई – इन सारी सामग्रियों को अपने हाथ में रख कर ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे का 108 बार जाप करके इस सामग्री को होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. हरे कपड़े में 3 चुटकी होलिका दहन की राख, 3 हरे हकीक के पत्थर बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर बांध लें या इस सामग्री को तिजोरी में रख दें। कारोबारी समस्या का निवारण अवश्य होगा।

कर्क राशि --

  • 1. मानसिक अस्थिरता रहे, काम में रुचि नहीं रहे, अपनों से धोखा मिला करे, काम बदलने की प्रवृत्ति बढ़े, तो ऐसी अवस्था में सभी समस्याओं के समाधान के लिए एक कटोरी ले लें और उसमें थोड़ा सा दही रख लें, फिर उसमें पांच चुटकी चावल भी डाल लें, अशोक के सात पत्ते और सफेद पेठा की मिठाई ले लें। इन सबको कटोरी में रख कर अपने हाथ में रख लें। महामृत्युंजय का 108 बार जाप करके अग्नि को समर्पित कर दें। इससे सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. प्रात:काल सफेद कपड़े में होलिका दहन की राख 7 चुटकी, 7 गोमती चक्र बांधकर दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान या घर के मुख्य द्वार पर लटका दें अथवा अपनी तिजोरी में रख दें। महालक्ष्मी की कृपा अवश्य होगी।

सिंह राशि---
  • 1. यदि कारोबार में सफलता नहीं मिल रही हो, स्वास्थ्य अनुकूल नहीं हो, कार्यों में अप्रत्याशित बाधा आ रही हो तो होलिका दहन के दिन कांसे की कटोरी में थोड़ा सा घी ले लें, पांच चुटकी गेहूं, पांच चुटकी देसी खाण्ड, अशोक वृक्ष के पांच पत्ते, कटोरी में रखकर अपने हाथ में ले लें और सूर्य गायत्री का 108 बार जाप करके समस्त सामग्री को होलिका को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
  • 2. सुनहरे कपड़े में 5 चुटकी होलिका दहन की राख, तांबे के पत्र पर खुदा हुआ सूर्य यंत्र, पांच तांबे के पुराने सिक्के बांधकर जहाँ धन रखते हैं, यदि वहाँ रख दिया जाए तो व्यावसायिक प्रतिकूलताओं का शमन होगा। एक बात का ध्यान अवश्य रखें, सूर्य यंत्र को खोल कर घी का दिया व धूप अवश्य दिखाएं।

कन्या राशि--
  • 1. किसी काम में स्थिरता नहीं बनती हो, दिए हुए पैसे वापस नहीं मिल रहे हों, अपनों की वजह से हमेशा परेशानी झेलनी पड़ रही हो या कारोबारी या कानूनी समस्या हो तो ताम्बे की कटोरी में आंवले का थोड़ा सा तेल ले लें और पांच पत्ते नीम, पांच इलायची, नारियल से बनी मिठाई, इन सारी सामग्री को कटोरी में डाल कर अपने हाथ में रख लें और 108 बार बुध के बीज मंत्र का जाप करते हुए सारी सामग्री को हालिका में दहन कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. हरे कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख, 11 बलास्त (बीता) हरा धागा, छेद वाले तांबे के सात सिक्के बांध कर दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि के मुख्य द्वार पर टांग दें या अपने तिजोरी में रखने से कारोबार में वृध्दि होगी और सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

तुला राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें चाँदी की कटोरी में पांच छोटी चम्मच गाय के दूध की खीर ले लें, पांच पत्ते शीशम के, गेंदा के पांच फूल, इन सारी सामग्रियों को अपने हाथ में रख कर शिव षडाक्षरी मंत्र यानी ॐ नम: शिवाय का 108 बार जाप करके होलिका दहन के समय यह समस्त सामग्री अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. क्रीम रंग के कपड़े में 7 चुटकी होलिका दहन की राख, 7 कोड़ियां पीली धारी वाली बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। अवश्य लाभ होगा।

वृश्चिक राशि--
  • 1. इस राशि के जातक-जातिका यदि कार्य सफलता के लिए जूझना पड़ रहा हो और तब भी कार्य सफलता न मिल रही हो, कारोबार में लाभ न मिल रहा हो तो इन्हें तांबे की कटोरी में चमेली का तेल डाल कर, पांच साबूत लाल मिर्च, एक बुंदी का लड्डू, पांच गूलर के पत्ते, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में रखकर ॐ हं पवननन्दनाय स्वाहा का 108 बार जाप करके सारी सामग्री अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. लाल कपड़े में 17 चुटकी होलिका दहन की राख, 1 लाल मूंगा बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। कारोबार सम्बंधित सारी समस्या का निवारण होगा।

धनु राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक पीतल की कटोरी में देसी गाय का थोड़ा सा घी, थोड़ा सा गुड़, पांच चुटकी चने की दाल, पांच आम के पत्ते डाल अपने हाथ में रख लें फिर बृहस्पति गायत्री मंत्र का 108 बार जाप करके इन समस्त सामग्रियों को होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. पीले कपड़े में 9 चुटकी होलिका दहन की राख एवं 11 पीली कोड़ियां बांधकर अपनी तिजोरी में रख लें। कारोबार सम्बंधी कष्टों से छुटकारा मिल जाएगा।

मकर राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो, अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल थोड़ा सा लें, उसमें पांच चुटकी काली तिल, पांच बरगद के पत्ते, एक काला गुलाब जामुन मिठाई, इन समस्त सामग्रियों को अपने हाथ में लेकर ॐ शं शनैश्चराय नम: इस मंत्र का 108 बार जाप करके इस समस्त सामग्री को हालिका दहन के समय अग्नि में समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. नीले कपड़े में 11 चुटकी राख, 11 छोटी लोहे की कील बांधकर घर या व्यापारिक संस्था के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

कुम्भ राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो, अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक स्टील की कटोरी में तिल का तेल, 108 दानें साबूत उड़द के, खेजड़ी (झण्डी) के पांच पत्ते या कदंब के पांच पत्ते, पांच काली मिर्च, कोई भी काले रंग की एक मिठाई, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में रख कर मंगलकारी शनि मंत्र की 108 बार जाप करके होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. काले कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख, 7 काजल की डिब्बी बांधकर कारोबारी प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

 मीन राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अप्रत्याशित कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें कांसे की कटोरी में बादाम का तेल थोड़ा सा उसमें 108 जोड़े चने की दाल के, कोई भी थोड़ी सी पीली मिठाई, आम के पांच पत्ते, एक गांठ हल्दी, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में लेकर ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं गुरवे नम: मंत्र का 108 बार जाप करके इन समस्त सामग्रियों को हालिका दहन के दिन अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. पीले कपड़े में 7 चुटकी होलिका दहन की राख, तांबे के 7 सिक्के और 11 कौड़ी बांधकर घर, दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी व्यावसायिक पीड़ाओं से छुटकारा मिलेगा।
जानिए इस होली पर किस  राशि  वाले जातक किस रंग से होली खेले ---
  1. मेष - लाल
  2. वृषभ - नीला
  3. मिथुन - हरा
  4. कर्क - गुलाबी
  5. सिंह - आंरेन्ज
  6. कन्या - हरा
  7. तुला - नीला
  8. वृश्चिक - मैरून
  9. धनु - पीला
  10. मकर - नीला
  11. कुम्भ - परपल
  12. मीन - पीला

जानिए होली के दिन किस राशि वाले जातक को कौन सी खुशबू  प्रयोग करनी चाहिए --
  1. मेष - गुलाब
  2. वृषभ - चमेली
  3. मिथुन - चम्पा
  4. कर्क - लवैन्डर
  5. सिंह - कस्तूरी
  6. कन्या - नाग चम्पा
  7. तुला -बेला 
  8. वृश्चिक - रोज मैरी
  9. धनु -- केसर
  10. मकर -मुश्कम्बर
  11. कुम्भ - चन्दन
  12. मीन - लैमन ग्रास

जानिए होलिका दहन से पहले क्या करना चाहिए?
  1. होलिका दहन से पहले आपको और आपके सभी परिवार के सदस्यों को हल्दी का उबटन,सरसो तेल में मिलाकर पूरे बदन पर करना चाहिए।
  2. फिर सूखने के बाद उसे एक कागज में शरीर से छुड़ाकर जमा कर लें।
  3. फिर आप 5 या 11 गाय के उपले, एक मुट्ठी सरसो के दाने, नारियल का सूखा गोला लें।
  4. फिर नारियल के सूखे गोले में जौ,तिल,सरसो का दाना,शक्कर,चावल और घी भर लें।
  5. फिर उसे होलिका की जलती हुई अग्नि में प्रवाहित कर दें। साथ में उबटन के निकाले गए अंश को भी अग्नि में डाल दें ।
  6. होलिका दहन होने से पहले या फिर बाद में शाम के वक्त घर में उत्तर दिशा में शुद्ध घी का दीपक जलाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख शांति आती है।
  7. होलिका का परिक्रमा करने का भी बहुत महत्व है। ऐसा करने से हर तरह की परेशानियां, रोग और दोष खत्म हो जाते हैं। इसलिए आप परिक्रमा जरूर करें।
  8. सबसे पहली बात तो यह है कि रंग जरुर खेले ।
  9. इस दिन रंग खेलने से जीवन में खुशियों के रंग आते है और मनहूसियत दूर भाग जाती है | अगर आप घर से बाहर  जा कर होली नहीं खेलना  चाहते हैं तो घर पर ही  होली खेलिये लेकिन खेलिये जरुर |
  10. सुबह सुबह पहले भगवान को रंग चढ़ा कर ही होली खेलना शुरू कीजिये |
  11.  एक दिन पहले जब होली जलाई जाये तो उसमे जरुर भाग लें | अगर किसी वजह से आप रात में होलीं जलाने के वक्त शामिल न हो पायें तो अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले जलती हुई होली के निकट जाकर तीन परिक्रमा करें | होली में अलसी , मटर ,चना गेंहू कि बालियाँ और गन्ना इनमे से जो कुछ भी मिल जाये उसे होली की आग में जरुर   डालें |
  12. परिवार के सभी सदस्यों के पैर के अंगूठे से लेकर हाथ को सिर से ऊपर पूरा ऊँचा करके कच्चा सूत नाप कर होली में डालें |
  13. होली की विभूति यानि भस्म (राख) घर जरुर लायें पुरुष इस भस्म को मस्तक पर और महिला अपने गले में लगाये, इससे एश्वर्य बढ़ता है |
  14. घर के बीच में एक चौकोर टुकड़ा साफ कर के उसमे कामदेव का पूजन करें |
  15. होलिका वाले दिन कुछ मीठे पुए और पकौड़ी बनायें। इसे अलग निकाल कर रख दे और जब होलिका जले तो उसे होलिका में समर्पित कर दें। ऐसा करने से आपके घर में कभी भी अन्न या खाने की कमी नहीं होगी।आप अन्न से संपन्न होंगे।
  16. होलिका वाले दिन सुबह नहाने से पूर्व पूरे परिवार को सरसों का उबटन लगाएं। इस उबटन के झाड़न को इकठ्ठा कर लें और जब होलिका जले तो उसमे दाल दें। ऐसे कर के आप अपने घर परिवार के सदस्यों पर आने वाली विपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। इससे रोग भी दूर होते हैं।
  17. होलिका जलने के बाद उसकी राख को घर ले आइये और राख को घर के चारो तरफ और दरवाजे पर छिड़ दें। ऐसा करने से घर की निगेटिव एनर्जी ख़त्म होती है और घर में सुख-समृध्दि और धन का वास होता है।
  18. गाय के गोबर में जौ, अरसी, कुश मिलाकर छोटा उपला बना लें और इसे घर के मेन गेट पर लटका कर रख दें ऐसा करने सेे बुरी शक्तियों, टोने -टोटके से घर-परिवार बचा रहता है।
  19. होलिका दहन के अगले दिन इस राख को माथे पर लगाएं। बाएं से दाएं की ओर तीन रेख माथे पर खींचे। पहली रेखा महादेव, दूसरा रेखा महेश्वर और तीसरी रेखा शिव की है। इससे सभी देवता प्रसन्न होंगे।
  20.  मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए होलिका दहन के समय घर से सरसों के कुछ दाने लाएं और उन्हें होलिका दहन के समय होली में समर्पित करें। ज्योतिष पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी धन-धान्य में वृद्धि करती हैं। 

इन उपाय में घर और परिवार की उन्नति का राज छुपा है। होलिका वाले दिन पुरे परिवार को होलिका जलते हुए देखना भी जरुरी होता है।
जानिए होली के दिन क्या करें और क्या न करें ??
  • होली के दिन दाम्पत्य भाव से अवश्य रहें |
  •  होली के दिन मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव न रखें,  इससे साल भर आप शत्रुओं पर विजयी होते रहेंगे |
  • घर आने वाले मेहमानों को सौंफ और मिश्री जरुर खिलायें, इससे प्रेम भाव बढ़ता है |

जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व

इस कार्तिक महीने में कई धार्मिक अनुष्ठान और कार्यक्रम होंगे। इस महीने में खासतौर पर तुलसी और शालिग्राम की विशेष पूजा और आराधना की जाएगी। यह महीना त्योहारों का महीना भी होगा। इस महीने में व्रत, स्नान और दान करने से तमाम तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कार्तिक माह को सनातन हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है। कार्तिक माह में पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है।
    कार्तिक माह हिंदू पंचांग का आठवां महीना है। चातुर्मास में आने वाले 4 महीनों में ये चौथा महीना है। इस बार इसकी शुरुआत रेवती नक्षत्र और हर्षण योग के साथ हो रही है। इस महीने में कई बड़े त्योहार पड़ेंगे। यह महीना काफी महत्वपूर्ण है और इसकी शुरुआत शरद पूर्णिमा के अगले दिन से होती है। ग्रंथों के अनुसार इस माहीने में तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक इस बार 14 अक्टूबर 2019, सोमवार से शुरू हो रहा है, जो 12 नवंबर 2019, मंगलवार को समाप्त होगा।
Know-when-is-Kartik-Purnima-2019-Importance-of-karthik-month-जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व      हिंदू पंचांगों के अनुसार कार्तिक मास को सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने में दान पुण्य करने से घर-परिवार और कारोबार में सुख शांति आती है। कार्तिक मास में तुलसी विवाह का भी बड़ा महत्व है. इस महीने में तुलसी की श्रद्धा भाव से पूजा करने पर मनवांछित फल मिलते हैं। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे।हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस माह में 8 नवंबर 2019 को जहां देवउठनी एकादशी पर देव जागेंगे, वहीं 12 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा तक कई प्रमुख व्रत व त्योहार भी आएंगे।
    उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि तुलसी में साक्षात् मां लक्ष्मी का निवास माना गया है। इस चलते कार्तिक मास मेंं तुलसी के समीप दीपक जलाना शुभ माना गया है। ऋतु चक्र के आधार पर भी इस माह का महत्व है क्योंकि कार्तिक मास से लोगों का खान-पान और पहनावा बदलेगा। कार्तिक महीने में दान, पूजा-पाठ तथा स्नान का बहुत महत्व होता है तथा इसे कार्तिक स्नान की संज्ञा दी जाती है। यह स्नान सूर्योदय से पूर्व किया जाता है। स्नान कर पूजा-पाठ को खास अहमियत दी जाती है। साथ ही देश की पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व होता है। इस दौरान घर की महिलाएं नदियों में ब्रह्ममूहुर्त में स्नान करती हैं। यह स्नान विवाहित तथा कुंवारी दोनों के लिए फलदायी होता है। इस महीने में दान करना भी लाभकारी होता है। दीपदान का भी खास विधान है। यह दीपदान मंदिरों, नदियों के अलावा आकाश में भी किया जाता है। यही नहीं ब्राह्मण भोज, गाय दान, तुलसी दान, आंवला दान तथा अन्न दान का भी महत्व होता है।
      हिन्दू धर्म में इस महीने में कुछ परहेज बताए गए हैं। कार्तिक स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को इसका पालन करना चाहिए। इस मास में धूम्रपान निषेध होता है। यही नहीं लहुसन, प्याज और मांसाहर का सेवन भी वर्जित होता है। इस महीने में भक्त को बिस्तर पर नहीं सोना चाहिए उसे भूमि शयन करना चाहिए। इस दौरान सूर्य उपासना विशेष फलदायी होती है। साथ ही दाल खाना तथा दोपहर में सोना भी अच्छा नहीं माना जाता है।  पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी जी भगवान विष्णु की प्रिया हैं। तुलसी की पूजा कर भक्त भगवान विष्णु को भी प्रसन्न कर सकते हैं। इसलिए श्रद्धालु गण विशेष रूप से तुलसी की आराधना करते हैं। इस महीने में स्नान के बाद तुलसी तथा सूर्य को जल अर्पित किया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। यही नहीं तुलसी के पत्तों को खाया भी जाता है जिससे शरीर निरोगी रहता है। साथ ही तुलसी के पत्तों को चरणामृत बनाते समय भी डाला जाता है। यही नहीं तुलसी के पौधे का कार्तिक महीने में दान भी दिया जाता है। तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीया भी जलाया जाता है। अगर यह पौधा घर के बाहर होता है तो किसी भी प्रकार का रोग तथा व्याधि घर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। तुलसी अर्चना से न केवल घर के रोग, दुख दूर होते हैं बल्कि अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
      हिन्दू धर्म में पवित्र कार्तिक माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने अति पुष्करिणी कहा है।स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है वह इन्हीं तीन तिथियों की प्रातः स्नान करने से पूर्ण फल का भागी हो जाता है। त्रयोदशी को स्नानोपरांत समस्त वेद प्राणियों समीप जाकर उन्हें पवित्र करते हैं।  चतुर्दशी में समस्त देवता एवं यज्ञ सभी जीवों को पावन बनाते हैं, और पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप, तप, पूजन, कीर्तन दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। इन तीन दिनों में भगवत गीता एवं श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा का श्रवण, गीतापाठ विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने से प्राणी पापमुक्त-कर्ज मुक्त होकर भगवान श्रीविष्णु जी की कृपा पाता है।
    पवित्र कार्तिक महीने में झूठ बोलना, चोरी-ठगी करना, धोखा देना, जीव हत्या करना, गुरु की निंदा करने व मदिरापान करने से बचना चाहिए। एकादशी से पूर्णिमा तक के मध्य भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खुले आसमान में दीप जलाते हुए इस मंत्र -
 दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च ! नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् !!

अर्थात -
मै सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप अर्पित करता हूँ जो भगवान को अतिप्रिय है। साथ ही इसमंत्र का ''नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे ! नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः !! 

उच्चारण करते हुए, 'पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है, धर्म स्वरूप श्रीविष्णु को नमस्कार है, यमदेव को नमस्कार है तथा जीवन यात्रा के दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले भगवान रूद्र को नमस्कार है का उच्चारण करते हुए आकाशदीप जलाएं। 
इस प्रकार करने से कोई भी प्राणी कार्तिक माह में भगवान की कृपा का पात्र बन सकता हैं।
विशेष महत्व है कार्तिक महीने का ---
भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने इसी महीने में तारकासुर राक्षस का वध किया था इस कारण से इस महीने का नाम कार्तिक पड़ा। कार्तिक माह में भगवान कार्तिकेय और तुलसी की भी विशेष पूजा की जाती है। साथ ही इसी महीने तुलसी विवाह भी होता है। कार्तिक महीना महीने में विवाहित महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखेंगी। जिसमें महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखेंगी। वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिक माह बहुत ही पवित्र माना जाता है. भारत के सभी तीर्थों के समान पुण्य फलों की प्राप्ति एक इस माह में मिलती है. इस माह में की पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है इसके अलावा इसी महीने दीपावली, धनतेरस, रमा एकादशी और आंवला नवमी जैसे बड़े त्योहार होंगे।
इस साल कार्तिक अमावस्या 27 अक्टूबर 2019 से शुरू होकर 28 अक्टूबर 2919 यानी दो दिन चलेगी. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस 28 को मनाया जाएगा। 29 अक्टूबर को भाईदूज का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन बहनें अपने भाईयों की पूजा करती हैं।
8 नवंबर 2019 को तुलसी विवाह-
कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी को तुलसी विवाह की परंपरा है. इस साल 8 नवंबर को तुलसी विवाह किया जाएगा. इसके बाद 12 नवंबर को कार्तिक महीने का आखिरी दिन है. इस दिन कार्तिक अमावस्या मनाई जाती है. कार्तिक अमावस्या के दिन व्रत और ईष्टदेव की आराधना करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.
भगवान श्री कृष्ण का प्रिय है कार्तिक मास-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास भगवान श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय महीना है. राधा इस महीने में कृष्ण से रूठ गई थीं और उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बांधकर अपना गुस्सा उतारा था. मगर कृष्ण ने कुछ नहीं किया वे बस मुस्कुराते रहे. जब राधा का गुस्सा शांत हुआ तो उन्होंने कृष्ण से माफी मांगी. मगर कृष्ण ने राधा से कहा कि वे हमेशा उनसे बंधे ही रहना चाहते हैं. इसलिए उन्हें कार्तिक महीना काफी पसंद था.
कार्तिक में महिलाओं के पर्व ज्यादा--
17 अक्टूबर, शनिवार से प्रमुख पर्वों की शुरुआत करवा चौथ के साथ हो रही है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा पर्व है। इसके बाद स्कंद षष्ठी, रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी व्रत के साथ सौंदर्य का पर्व रूप चौदस, सुहाग पड़वा, आंवला नवमी जैसे पर्व भी महिलाओं से जुड़े हैं।
जानिए इस वर्ष 2019 के कार्तिक मास में किस दिन कौन सा पर्व मानेगा--
  1. 17 अक्टूबर - करवा चौथ
  2. 21 अक्टूबर - अहोई अष्टमी
  3. 24 अक्टूबर- रमा एकादशी व्रत
  4. 25 अक्टूबर- गोवत्स द्वादशी
  5. 25 अक्टूबर - धनतेरस
  6. 26 अक्टूबर- रूप चौदस
  7. 27 अक्टूबर- दीपावली
  8. 28 अक्टूबर- गोवर्धन पूजा, अन्नकूट
  9. 29 अक्टूबर - भाई दूज
  10. 2 नवंबर - सूर्य षष्ठी
  11. 4 नवंबर - गोपाष्टमी
  12. 5 नवंबर - आंवला नवमी
  13. 8 नवंबर - देवउठनी ग्यारस
  14. 11 नवंबर - वैकुंठ चतुर्दशी
  15. 12 नवंबर - कार्तिक पूर्णिमा (11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी)

सनातन धर्म में पूर्णिमा  को शुभ , मंगल और फलदायी माना गया है। हिन्दू पंचांग केअनुसार वर्ष में 16 पूर्णिमा होती है और इस 16 पूर्णिमा में  वैसाख, माघ और कार्तिक पूर्णिमा   को स्नान-दान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा (मंगलवार) 12 नवंबर 2019 को मनाई जाएगी।  ऐसा कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने अपना पहला अवतार लिया था. वे मत्स्य यानी मछली के रूप में प्रकट हुए थे. वैष्णव परंपरा में कार्तिक माह को दामोदर माह के रूप में भी जाना जाता है. बता दें कि श्रीकृष्ण के नामों में से एक नाम दामोदर भी है. कार्तिक माह में लोग गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान आदि करते हैं. कार्तिक महीने के दौरान गंगा में स्नान करने की शुरुआत शरद पूर्णिमा के दिन से होती है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होती है. कार्ती पूर्णिमा के दौरान उत्सव मनाने की शुरुआत प्रबोधिनी एकादशी के दिन से होती है. कार्तिक महीने मे पूर्णिमा शुक्ल पक्ष के दौरान एकदशी ग्यारहवें दिन और पूर्णिमा पंद्रहवीं दिन होती है. इसलिए कार्तिक पूर्णिमा उत्सव पांच दिनों तक चलता है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  पूर्णिमा यानी चन्द्रमा की पूर्ण अवस्था। पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा से जो किरणें निकलती हैं वह काफी सकारात्मक होती हैं और सीधे दिमाग पर असर डालती हैं। चूंकि चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक है, इसलिए पृथ्वी पर सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्रमा का ही पड़ता है। भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख, माघ और कार्तिक माह की पूर्णिमा स्नान-दान के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। इस पूर्णिमा में जातक को नदी या अपने स्नान करने वाले जल में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करना चाहिए और इसके बाद भगवान विष्णु का विधिवत पूजन करना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखकर एक समय भोजन करें। गाय का दूध, केला, खजूर, नारियल, अमरूद आदि फलों का दान करना चाहिए। ब्राह्मण, बहन, बुआ आदि को कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। 
      कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन वृषोसर्ग व्रत रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान कार्तिकेय और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान हैं। यह व्रत शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है। इसे नक्त व्रत भी कहा जाता है।इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, उज्जैन,कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। 
कार्तिक पूर्णिमा विधि विधान—-
कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है. अन्न, धन एव वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है इस दिन जो भी आप दान करते हैं उसका आपको कई गुणा लाभ मिलता है. मान्यता यह भी है कि आप जो कुछ आज दान करते हैं वह आपके लिए स्वर्ग में सरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में आपको प्राप्त होता है.
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है. शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें. आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें.
     नारद पुराण के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन स्नान आदि कर उपवास रखते हुए भगवान कार्तिकेय की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसी दिन प्रदोष काल में दीप दान करते हुए संसार के सभी जीवों के सुखदायक माने जाने वाले वृषोसर्ग व्रत का पालन करना चाहिए। इस दिन दीपों का दर्शन करने वाले जंतु जीवन चक्र से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन अगर संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्थान करना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्र उदय के बाद वरुण, अग्नि और खड्गधारी कार्तिकेय की गंध, फूल, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजा कर हवन करना चाहिए।
    इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उन्हें दान देना चाहिए। घर के बाहर दीप जलाना चाहिए और उसके पास एक छोटा सा गड्ढा खोदकर उसे दूध से भरना चाहिए। गड्ढे में मोती से बने नेत्रों वाली सोने की मछली डालकर उसकी पूजा करते हुए “महामत्स्याय नमः” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। पूजा के बाद सोने की मछली को ब्राह्मण को दान कर देनी चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था. सिख सम्प्रदाय को मानने वाले सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सगंध लेते हैं. अतः इस दिन गुरू नानक जयन्ती भी मनाई जाती है ।
दान और पूजा क्यों करें????
इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए। कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में व्रत करके वृष (बैल) दान करने से शिव पद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पत्ति बढ़ती है। इस दिन उपवास करके भगवान का स्मरण, चिंतन करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। इस दिन मेष (भेड़) दान करने से ग्रहयोग के कष्टों का नाश होता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस दिन कन्यादान से ‘संतान व्रत’ पूर्ण होता है। कार्तिकी पूर्णिमा से प्रारम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस दिन कार्तिक के व्रत धारण करने वालों को ब्राह्मण भोजन, हवन तथा दीपक जलाने का भी विधान है। इस दिन यमुना जी पर कार्तिक स्नान की समाप्ति करके राधा-कृष्ण का पूजन, दीपदान, शय्यादि का दान तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। कार्तिक की पूर्णिमा वर्ष की पवित्र पूर्णमासियों में से एक है।
      हिन्दू धर्म के वेदो, महापुराणों और शास्त्रो ने कार्तिक माह को हिंदी वर्ष का पवित्र और पावन महीना बताया है। कार्तिक माह की शुरुवात शरद या आश्विन पूर्णिमा के दिन से होती है जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन खत्म होती है। कार्तिक माह को स्नान माह भी कहा जाता है क्योकि इस दौरान लोग प्रतिदिन सुबह में पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान कर, पूजा अर्चना व् दान करते है। भीष्म पंचक और विष्णु पंचक का व्रत भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है। 
        ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैदिक काल में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 
      इस बार 23 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र दोपहर 16 बजकर 42 मिनिट तक रहेगा तत्पश्चात रोहिणी नक्षत्र लग जायेगा।।जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायरू श्री सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चैराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। कार्तिकी में यह तिथि देव दीपावली-महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। चान्द्रायणव्रत की समाप्ति भी आज के दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी आदि पवित्र नदियों के समीप स्नान के लिए सहस्त्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेले का रूप बन जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक माह को दामोदर माह भी कहा जाता है क्योकि भगवान विष्णु को दामोदर के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।  कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में अवतरित हुए थे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव जी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। त्रिपुरासुर के वध के पश्चात समस्त लोको के देवी देवताओ ने इस प्रसन्नता में गंगा नदी के किनारे असंख्य  दिये जलाये थे जिस कारण कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली भी कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी के किनारे वाराणसी में देव दीपावली मनाया जाता है। 
जानिए वर्ष 2018 में कार्तिक पूर्ण‍िमा पूजन विधि और समय---
कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा-अराधना करनी चाहिए |
वर्ष 2019 में कार्तिक पूर्णिमा की पूर्णिमा तिथि दिनांक 12 नवम्बर 2019  (मंगलवार) को है।  इस वर्ष दिनांक 11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी। यदि संभव हो पाए तो इस दिन गंगा स्नान भी करें. अगर हो सके तो पूरे दिन या एक समय व्रत जरूर रखें. कार्तिक पूर्ण‍िमा के दिन खाने में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. अगर हो सके तो ब्राह्मणों को दान दें. केवल इतना ही नहीं, शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने से पुण्य की प्राप्त‍ि होती है |
      गंध, अक्षत, पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, पीपल के पत्तों से गंगाजल से पूजन करें। पूजा गृह, नदियों, सरोवरों, मन्दिरों में दीपदान करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मिट्टी का दीपक अवश्य जलाएं। इससे हमेशा संतति सही रास्ते पर चलेगी। धन की कभी भी कमी नहीं होगी। सुख, समृद्धि में बढ़ोतरी होगी। जीवन में ऊब, उकताहट, एकरसता दूर करने का अचूक उपाय। व्रत से ऐक्सिडेंट-अकाल मृत्यु कभी नहीं होंगे। बच्चे बात मानने लगेंगे। परिवार में किसी को पानी में डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा नहीं होगा। बुरे वक्त में लिया कर्ज उतर जाएगा। आकस्मिक नेत्र रोग से बचाव होगा। नए मकान, वाहन आदि खरीदने के योग बनेंगे।
कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा ----
एक बार त्रिपुर नामक राक्षस ने कठोर तपस्या की, त्रिपुर की तपस्या का प्रभाव जड़-चेतन, जीव-जन्तु तथा देवता भयभीत होने लगे. उस वक्त देवताओं ने त्रिपुर की तपस्या को भंग करने के लिए खूबसूरत अप्सराएं भेजीं लेकिन इसके बावजूद भी वह त्रिपुर की तपस्या को विफल करने में असफल रहीं. त्रिपुर की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी स्वयं उसके सामने प्रकट हुए और उन्होंने त्रिपुर से वर मांगने के लिए कहा. 
     त्रिपुर ने वर मांगते हुए कहा कि 'न मैं देवताओं के हाथ से मरु, न मनुष्यों के हाथ से. ब्रह्मा जी से वर कती प्राप्ति होने के बाद त्रिपुर निडर होकर लोगों पर अत्याचार करने लगा. लोगों पर अत्याचार करने के बाद भी जब उसका मन नहीं भरा तो उसने कैलाश पर्वत पर ही चढ़ाई कर दी. यही कारण था कि त्रिपुर और भगवान शिव के बीच युद्ध होने लगा. भगवान शिव और त्रिपुर के बीच लंबे समय तक युद्ध चलने के बाद अंत में भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से त्रिपुर का वध कर दिया. इस दिन से ही क्षीरसागर दान का अनंत माहात्म्य माना जाता है. 
कार्तिक पूर्णिमा व्रत,पूजा विधि तथा महत्व ---
कार्तिक पूर्णिमा को स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। पूजा-अर्चना की समाप्ति के बाद अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए ।  दान ब्राह्मणो, बहन, भांजे आदि को देना चाहिए। ऐसी मान्यता है की कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। 
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शाम के समय वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु इस मंत्र का उच्चारण करते हुए चाँद देव को अर्घ्य देना चाहिए। एकादशी व् तुलसी विवाह से चली आ रही पंचक व्रत कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होती है। तो प्रेम से बोलिए भगवान विष्णु जी की जय हो।  आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं। इसीलिए दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा बिना विष्णु, श्रीगणेश के साथ की जाती है। लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह विष्णु स्वरूप शालिग्राम से होता है। इसी खुशी में देवता स्वर्गलोक में दिवाली मनाते हैं इसीलिए इसे देव दिवाली कहा जाता है।

सफलता का मंत्र---
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम…पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय…..पूर्णमेवावशिष्यते

क्यों किया जाता हें कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान ???
कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बड़ी संख्या में देश की सभी प्रमुख नदियों पर श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचते हैं। प्राचीन काल से ही यह प्रथा चली आ रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान का बड़ा ही महत्व है। आरोग्य प्राप्ति तथा उसकी रक्षा के लिए भी प्रतिदिन स्नान लाभदायक होता है। फिर भी माघ वैशाख तथा कार्तिक मास में नित्य दिन के स्नान का खास महत्व है। खासकर गंगा स्नान से।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  यह व्रत शरद पूर्णिमा से आरंभ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को संपन्न किया जाता है। इसमें स्नान कुआं, तालाब तथा नदी आदि में करना ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। कुरुक्षेत्र, अयोध्या तथा काशी आदि तीर्थों पर स्नान का और भी अधिक महत्व है। भारत के बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटी-छोटी बस्तियों में भी अनेक स्त्रीपुरुष, लड़के-लड़कियां कार्तिक स्नान करके भगवान का भजन तथा व्रत करते हैं। सायंकाल के समय मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीप जलाये जाते हैं। लंबे बांस में लालटेन बांधकर किसी ऊंचे स्थान पर कंडीलें प्रकाशित करते हैं। इन व्रतों को स्त्रियां तथा अविवाहित लड़कियां बड़े मनोयोग से करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे कुवांरी लड़कियों को मनपसंद वर मिलता है। तथा विवाहित स्त्रियों के घरों में सुख-समृद्धि आती है। 
जानिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी स्नान क्यों किया जाता है?
इसके कई कारण हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास को बहुत पवित्र और पूजा-अर्चना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। पुण्य प्राप्त करने के कई उपायों में कार्तिक स्नान भी एक है। पुराणों के अनुसार इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में किसी पवित्र नदी में स्नानकर भगवान विष्णु या अपने इष्ट की आराधना करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  ऐसा माना जाता है कलियुग में कार्तिक पूर्णिमा पर विधि-विधान से नदी स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।
       कार्तिक महीने में नदी स्नान का धार्मिक महत्व तो है साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्षा ऋतु के बाद मौसम बदलता है और हमारा शरीर नए वातावरण में एकदम ढल नहीं पाता। ऐसे में कार्तिक मास में सुबह-सुबह नदी स्नान करने से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है जो कि पूरा दिन साथ रहती है। जिससे जल्दी थकावट नहीं होती और हमारा मन कहीं ओर नहीं भटकता। साथ ही जल्दी उठने से हमें ताजी हवा से प्राप्त होती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही फायदेमंद होती है। ऐसे में ताजी और पवित्र नदी स्नान से कई शारीरिक बीमारियां भी समाप्त हो जाती है।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।
कार्तिक पूर्णिमा का क्यों हें इतना महत्व —-
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष पंद्रह पूर्णिमाएं होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर १६ हो जाती है।कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है । इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फाल मिलता है।
      कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। इस दिन किये जाने वाले अन्न, धन एव वस्त्र दान का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी दान किया जाता हैं उसका कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो कुछ दान करता है वह उसके लिए स्वर्ग में संरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में उसे पुनःप्राप्त होता है।
      मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान यानी बछड़ा दान करने से शिवपद की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है. इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी.वैष्णव मत में इस कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है क्योंकि इस दिन ही भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था. इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी (Maha kartiki Purnima) भी कहा गया है. यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है. अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है. इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है. कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा(KartikTripuri Poornima) के नाम से भी जाना जाता है. इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे. ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका नक्षत्र में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है.शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इसमें कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
दीप दान का है महत्व----
मत्स्य पुराण के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप-दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। इसलिए इस दिन ब्राह्मणों को विधिवत आदर भाव से निमंत्रित करके भोजन कराना चाहिए।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुर्नजन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि के वक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवप्रद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पति बढ़ती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरंभ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।
सिख धर्म के लिए भी खास है कार्तिक पूर्णिमा का दिन-----
सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानक। गुरु नानकदेव से मोक्ष तक पहुँचने के एक नए मार्ग का अवतरण होता है। इतना प्यारा और सरल मार्ग कि सहज ही मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है।गुरू नानक जयन्‍ती, 10 सिक्‍ख गुरूओं के गुरू पर्वों या जयन्तियों में सर्वप्रथम है। यह सिक्‍ख पंथ के संस्‍थापक गुरू नानक देव, जिन्‍होंने धर्म में एक नई लहर की घोषणा की, की जयन्‍ती है।गुरू नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) है। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं।
      गुरु नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु माने जाते हैं। इन्हें सिख धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। गुरु नानक जी का जन्मदिन प्रकाश दिवस के रूप में "कार्तिक पूर्णिमा" के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष गुरु नानक जयंती 12 नवंबर, 2019 को मनाई जाएगी। इस दिन जगह-जगह जुलूस निकाले जाते हैं और गुरुद्वारों में "गुरु ग्रंथ साहिब" का अखंड पाठ किया जाता है।
    कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि का विशेष महत्व होता है. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन दान का फल दोगुना या उससे भी ज्यादा मिलता है.शायद आप जानते नहीं होंगे कि कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था|
जन्म - 
  • श्री गुरु नानक देव जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी गांव में कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन 1469 को राएभोए के तलवंडी नामक स्थान में, कल्याणचंद (मेहता कालू) नाम के एक किसान के घर गुरु नानक का जन्म हुआ था। उनकी माता का नाम तृप्ता था। तलवंडी को ही अब नानक के नाम पर ननकाना साहब कहा जाता है, जो पाकिस्तान में है...गुरु नानक देव जी बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। बहुत कम आयु से ही उन्होंने भ्रमण द्वारा अपने उपदेशों और विचारों को जनता के बीच रखा।
  • गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। 
  • संत साहित्य में नानक अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।
  • सिक्‍ख समाज में कई धर्मों के चलन व विभिन्‍न देवताओं को स्‍वीकार करने के प्रति अरुचि ने व्‍यापक यात्रा किए हुए नेता को धार्मिक विविधता के बंधन से मुक्‍त होने, तथा एक प्रभु जो कि शाश्‍वत सत्‍य है के आधार पर धर्म स्‍थापना करने की प्रेरणा दी। 

इस कार्तिक पूर्णिमा पर करें ये उपाय/टोटके---(कार्तिक पूर्णिमा को ये उपाय करने से मां लक्ष्मी होगी प्रसन्न)---
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक मास में शुद्ध घी, तिलों के तेल और सरसों के तेल का दीपक जलाने से अश्वतमेघ यज्ञ जितना पुण्य प्राप्त होता है। इस माह में दीपदान करने से भगवान विष्णुक भी प्रसन्नन होते हैं। 
हिंदू धर्म शास्त्रों में भी कहा गया है कि – मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्यु: कपर्दका:।
अर्थात किसी व्यक्ति के पास धन-संपत्ति का अभाव होने पर उसके मित्र भी उसका साथ छोड़ देते है। प्राचीन मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी को ऐश्वर्य और वैभव की देवी कहा गया है। परंतु व्यक्ति को वैभव, ऐश्वर्य के साथ आनंद और सुख तभी मिलता है जब वह पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ धन कमाता है।

  1. इस महीने में लक्ष्मी जी के समक्ष दीप जलाने का भी अत्यधिक महत्व है। यह दीप जीवन के अंधकार को दूर कर, आशा की रोशनी देने का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक माह में घर के मंदिर, नदी के तट एवं शयन कक्ष में दीप जलाने का महत्व पाया गया है।
  2. यमुना जी पर कार्तिक स्नान का समापन करके भगवान श्री कृष्ण जी का राधा जी सहित पूजन करके दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से श्री कृष्ण जी की भक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा के महापर्व का लाभ उठाएं। इस पुनीत अवसर पर श्रद्धा तथा विश्वास पूर्वक पूजा पाठ और हवन इत्यादि करें।
  3. कार्तिक के पूरे माह में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके तुलसी को जल चढ़ाने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस माह में तुलसी के पौधे को दान करना भी शुभ माना गया है।
  4. माँ लक्ष्मी को गन्ना, अनार व सीताफल चढ़ाएँ। 
  5. सम्भव हो तो इस दिन मंदिर में भंडारा करवाएं। 
  6. दीपदान संध्याकाल में ही करें।
  7. कार्तिक माह में तुलसी का पूजन और सेवन करने से घर में सदा सुख-शांति बनी रहती है। तुलसी की कृपा से आपके घर से नकारात्मसक शक्ति दूर रहती है।
  8. इन दिनों दरिद्रता के नाश के लिए पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें।
  9. शाम के समय ‘वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरू’ मंत्र बोलते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान श्रेष्ठ कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के संबंध में ऋषि अंगिरा ने लिखा है कि इस दिन सबसे पहले हाथ-पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें। 
  10. यदि स्नान में कुश और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फलों से सम्पूर्ण पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  दान देते समय जातक हाथ में जल लेकर ही दान करें। स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है गृहस्थ व्यक्ति को तिल व आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है। 
  11. विधवा तथा सन्यासियों को तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मिट्टी को लगाकर स्नान करना चाहिए। इस दौरान भगवान विष्णु के ऊं अच्युताय नम:, ऊं केशवाय नम:, ऊॅ अनंताय नम: मन्त्रों का जाप करना चाहिए। 
  12. पूर्णिमा मां लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहती है। पूर्णिमा को प्रात: 5 बजे से 10:30 मिनट तक मां लक्ष्मी का पीपल के वृक्ष पर निवास रहता है। इस दिन जो भी जातक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है उस पर मां लक्ष्मीप्रसन्न होती है। 
  13. प्रातः काल उठकर व्रत रहने का संकल्प लें। 
  14. गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कीजिए। 
  15. श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। 
  16. श्री रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें। 
  17. इस पवित्र दिन पर चंद्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, प्रीति, अनुसुइया तथा छमा इन 6 कृतिकाओं का पूजन करें।
  18. कार्तिक पूर्णिमा के गरीबों को चावल दान करने से चन्द्र ग्रह शुभ फल देता है। इस दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिलकार चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते है। 
  19. ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक पूर्णिमा को घर के मुख्यद्वार पर आम के पत्तों से बनाया हुआ तोरण अवश्य बांधे। वैवाहिक व्यक्ति पूर्णिमा के दिन भूलकर भी अपनी पत्नी या अन्य किसी से शारीरिक सम्बन्ध न बनाएं, अन्यथा चन्द्रमा के दुष्प्रभाव आपको व्यथित करेंगे। 
  20. आज के दिन चन्द्रमा के उदय होने के बाद खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें। 

शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएं

मां दुर्गा का प्रत्येक स्वरूप मंगलकारी है और एक-एक स्वरूप एक-एक ग्रह से संबंधित है। इसलिए नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूप की पूजा प्रत्येक ग्रहों की पीड़ा को शांत करती है।देवी माँ या निर्मल चेतना स्वयं को सभी रूपों में प्रत्यक्ष करती है,और सभी नाम ग्रहण करती है। माँ दुर्गा के नौ रूप और हर नाम में एक दैवीय शक्ति को पहचानना ही नवरात्रि मनाना है।असीम आनन्द और हर्षोल्लास के नौ दिनों का उचित समापन बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक पर्व दशहरा मनाने के साथ होता है। नवरात्रि पर्व की नौ रातें देवी माँ के नौ  विभिन्न रूपों को को समर्पित हैं जिसे नव दुर्गा भी कहा जाता है।

। । या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: । ।
जानिए क्यों हैं माँ दुर्गा के नौ रूप---
Sharadiya-Navratri-2019-Worship-Goddess-Durga-Devi-according-to-your-zodiac-sign-food-शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएंइस वर्ष, नवरात्रि 29 सितंबर से शुरू हो रही है. यह नौ दिनों का त्योहार है, जो हिंदू धर्म और संस्कृति में बहुत महत्व रखता है. यह सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक है क्योंकि यह भगवान राम की जीत का जश्न मनाता है, जिन्होंने रावण पर अपनी लड़ाई से पहले देवी दुर्गा की पूजा की थी. शारदा नवरात्रि का त्योहार पूरे भारत मं धूम धाम से मनाया जाता है।नवरात्रि एक ऐसा त्यौहार है जिसे बहुत धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और देवी दुर्गा के नौ अवतारों को समर्पित नौ दिन बहुत शुभ माने जाते हैं. भारत के प्रत्येक भाग में, इसका एक अलग महत्व है. नवरात्रि से जुड़ी कहानी देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुई लड़ाई की है. उसने त्रिलोक (पृथ्वी, स्वर्ग और नरक) पर हमला किया, और देवता उसे हराने में सक्षम नहीं थे।
      अंत में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने मिलकर देवी दुर्गा की रचना की, जिन्होंने अंत में महिषासुर को हराया. देवी दुर्गा ने 15 दिनों तक उसके साथ युद्ध किया, जिसके दौरान दानव अपना रूप बदलता रहा. वह देवी दुर्गा को भ्रमित करने के लिए विभिन्न जानवरों में बदल जाता था. अंत में, जब वह एक भैंस में बदल गया, जब देवी दुर्गा ने उसे अपने त्रिशूल से मार डाला. यह महालया के दिन था कि महिषासुर का वध किया गया था.
       नवरात्रि के प्रत्येक दिन का एक अलग रंग होता है. नवरात्रि शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है नौ रातें- नव (नौ) रत्रि (रात). प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है. उत्तर पूर्व भारत के पूर्व और विभिन्न हिस्सों में, नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहां त्योहार राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। 
पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
वन्दे वांछित कामार्थे चंद्रार्घ्कृत शेखराम, सिंहरुढ़ा अष्टभुजा कुष्मांडा यशस्वनिम.
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी.”
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

यह भौतिक नहीं, बल्कि लोक से परे आलौकिक रूप है, सूक्ष्म तरह से, सूक्ष्म रूप। इसकी अनुभूति के लिये पहला कदम ध्यान में बैठना है। ध्यान में आप ब्रह्मांड को अनुभव करते हैं। इसीलिये बुद्ध ने कहा है, आप बस देवियों के विषय में बात ही करते हैं, जरा बैठिये और ध्यान करिये। ईश्वर के विषय में न सोचिये। शून्यता में जाईये, अपने भीतर। एक बार आप वहां पहुँच गये, तो अगला कदम वो है, जहां आपको विभिन्न मन्त्र, विभिन्न शक्तियाँ दिखाई देंगी, वो सभी जागृत होंगी।
     बौद्ध मत में भी, वे इन सभी देवियों का पूजन करते हैं। इसलिये, यदि आप ध्यान कर रहे हैं, तो सभी यज्ञ, सभी पूजन अधिक प्रभावी हो जायेंगे। नहीं तो उनका इतना प्रभाव नहीं होगा। यह ऐसे ही है, जैसे कि आप नल तो खोलते हैं, परन्तु गिलास कहीं और रखते हैं, नल के नीचे नहीं। पानी तो आता है, पर आपका गिलास खाली ही रह जाता है। या फिर आप अपने गिलास को उलटा पकड़े रहते हैं। 10 मिनट के बाद भी आप इसे हटायेंगे, तो इसमें पानी नहीं होगा। क्योंकि आपने इसे ठीक प्रकार से नहीं पकड़ा है। सभी पूजन ध्यान के साथ शुरू होते हैं और हजारों वर्षों से इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। ऐसा पवित्र आत्मा के सभी विविध तत्वों को जागृत करने के लिये, उनका आह्वाहन करने के लिये किया जाता था। हमारे भीतर एक आत्मा है। उस आत्मा की कई विविधतायें हैं, जिनके कई नाम, कई सूक्ष्म रूप हैं और नवरात्रि इन्हीं सब से जुड़े हैं – इन सब तत्वों का इस धरती पर आवाहन, जागरण और पूजन करना।
    नवरात्रि में देवी को खुश करने में पूजन-अर्चना के आलावा उनके भोग का भी विशेष महत्व होता है। ऐसे में जरूरी है कि नवरात्रि के दिन और उनसे सम्बंधित देवी मां की पसंद के हिसाब से ही भोग अर्पित किए जाएं। ऐसा करने से पूजा के फल में बहुत वृद्धि होती है। 
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की माँ दुर्गा की पूजन और आराधना के लिए पूर्व और दक्षिण अच्छी मानी जाती है। इसमें भी पूर्व की दिशा सर्वोत्तम होती है। इस दिशा को ज्ञान, बुद्धि और विवेक की दिशा माना जाता है। इसलिए जब आप माता की स्थापना करें तो उनकी स्थापना पूर्व दिशा में ही करें। इससे आपको अपनी पूजा का पूरा लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त नवरात्रि में अखण्ड जोत के लिए गाय के देसी घी का इस्तेमाल करना अच्छा माना जाता है। जब आप पूजा करते हैं तो आपका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। साथ ही आप माता की जोत की स्थापना कुछ इस तरह करें कि वह आपके सीधे हाथ पर हो। यह पूजा स्थान का अग्निकोण होता है। वहीं पूजा की अन्य सामग्री किसी भी दिशा में रखी जा सकती है। 
     आमतौर पर वास्तुशास्त्र में यह नियम निर्धारित है कि अग्नि से संबंधित कोई भी सामग्री नार्थ-ईस्ट अर्थात ईशान कोण में नहीं रखनी चाहिए लेकिन माता की जोत के साथ यह नियम लागू नहीं होता क्योंकि माता की ज्योति की सकारात्मकता इतनी अधिक होती है कि अगर आप उसे ईशान कोण में रखते हैं तो उसकी सकारात्मकता न सिर्फ उस दिशा की बल्कि पूरे घर की नकारात्मकता को खत्म कर देती है।  नवरात्रि के दिनों में अगर आपके पास कोई स्फटिक या पीतल का श्रीयंत्र है तो उसे पूजा स्थल में अवश्य रखें। इससे आपके लिए धन लाभ के योग बनते हैं। आप यह श्रीयंत्र नवरात्रि के किसी भी दिन स्थापित कर सकते हैं। ध्यान रखें कि आजकल बाजार में प्लास्टिक के श्रीयंत्र भी मिलते हैं, इन्हें पूजाघर में कभी न रखें। इससे आपको किसी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं होगा। 
    माता की चौकी के लिए लकड़ी या शुद्ध धातु जैसे चांदी या सोने का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन गलती से भी इसके लिए कभी भी प्लास्टिक की चौकी का इस्तेमाल न करें। इसके अतिरिक्त आप अपने पूजा स्थान में शुभ और मंगलदायक रंग जैसे लाल और पीले रंग का ही उपयोग में लेने चाहिए। उदाहरण के लिए माता की चौकी में इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े, पूजा के फल और फूल आदि में लाल और पीले रंग को ही महत्ता प्रदान करें। इस उपाय से घर में सकारात्मकता आती है। पीला रंग जहां ज्ञान, बुद्धि और विवेक के देवता सूर्य का प्रतीक है, वहीं लाल रंग शक्ति और मंगल को दर्शाता है।  वास्तु नियमानुसार आप जहां पर बैठकर पूजा कर रहे हैं उसके नीचे कभी भी लटका हुआ बीम नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो आप वहां से थोड़ा हटकर बैठें। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता।
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शारदीय नवरात्रि 2019 पर बन रहे है ये विशेष योग--
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इस नवरात्रि में बन रहा कलश स्थापना और सुख समृद्धि दायक संयोग--
इस बार कलश स्थापना के दिन ही सुख समृद्धि के कारक ग्रह शुक्र का उदय होना बेहद शुभ फलदायी है। शुक्रवार का संबंध देवी लक्ष्मी से है। नवरात्र के दिनों में देवी के सभी रूपों की पूजा होती है। शुक्र का उदित होना भक्तों के लिए सुख-समृद्धि दायक है। धन की इच्छा रखने वाले भक्त नवरात्र दे दिनों में माता की उपासना करके अपनी आर्थिक परेशानी दूर कर सकते हैं। इस दिन बुध का शुक्र के घर तुला में आना भी शुभ फलदायी है।
इस नवरात्र में 4 सर्वार्थ सिद्धि योग---
इस साल की नवरात्र इसलिए भी खास है क्योंकि इस बार पूरे नवरात्र के दौरान 4 सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहे हैं। ऐसे में साधकों को सिद्धि प्राप्त करने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। इस दौरान सभी शुभ काम शुरू कर सकते हैं। 29 सितंबर 2019, 2,6 और 7 अक्टूबर 2019 को भी यह शुभ योग बन रहा है। 
इस शारदीय नवरात्र में बना अमृत सिद्धि योग--
इस वर्ष नवरात्र में दूसरे पूजा यानी 30 सितंबर, चौथे पूजा यानी 2 अक्टूबर को अमृत सिद्धि नामक शुभ योग बन रहा है।
इस वर्ष 2019 की शारदीय नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में--
इस वर्ष नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में होने जा रहा है। इस नक्षत्र में ही कलश स्थापन जाएगा। हस्त नक्षत्र को 26 नक्षत्रों में 13वां और शुभ माना गया है। इसके स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं। इस नक्षत्र को ज्ञान, मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। इस नक्षत्र में कलश में जल भरकर पूजा का संकल्प लेना शुभ फलदायी माना गया है।
इस शुभ संयोग में होगा कलश स्थापना---
29 सितंबर को नवरात्र आरंभ होगा। इसी दिन भक्त 10 दिनों तक माता की श्रद्धा भाव से पूजा का संकल्प लेकर कलश बैठाएंगे, जिसे घट स्थापना भी कहते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस बार कलश स्थापना के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और द्विपुष्कर नामक शुभ योग बन रहा है। ये सभी घटनाएं नवरात्र का शुभारंभ कर रहे हैं।
इन शारदीय नवरात्र में आ रहे हैं दो सोमवार और रविवार--
इस बार नवरात्र का आरंभ रविवार को हो रहा है और इसका समापन मंगलवार को होगा। ऐसे में नवरात्र में दो सोमवार और दो रविवार आने वाले हैं। पहले सोमवार को देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी और अंतिम सोमवार को महानवमी के दिन सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नवरात्र में दो सोमवार का होना शुभ फलदायी माना गया हैं।
इस नवरात्र में बन रहा रवि योग--
इस वर्ष की शारदीय  नवरात्र में तीन दिन रवियोग बन रहा है। तीसरी पूजा यानी 1 अक्टूबर, छठे पूजा यानी 4 अक्टूबर और 7वीं पूजा यानी 5 अक्टूबर 2019 को यह शुभ योग बना है। 8 अक्टूबर 2019 को इसी योग में विजयादशमी का त्योहार भी मनाया जाएगा। इसी योग में देवी का विसर्जन भी होगा।
यह नवरात्र होगा पूरे 9 दिन का--
नवरात्र 9 दिनों का होता है और दसवें दिन देवी विसर्जन के साथ नवरात्र का समापन होता है लेकिन ऐसा हो पाना दुर्लभ संयोग माना गया है क्योंकि कई बार तिथियों का क्षय हो जाने से नवरात्र के दिन कम हो जाते हैं। लेकिन इस बार पूरे 9 दिनों की पूजा होगी और 10 वें दिन देवी की विदाई होगी। यानी 29 सितंबर 2019 से आरंभ होकर 7 अक्टूबर को नवमी की पूजा होगी और 8 अक्टूबर 2019 को देवी वसर्जन होगा।
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नवरात्रि में यदि आप अपनी राशि के अनुसार देवी का चयन कर साधना विधानपूर्वक करें तो आपको अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी।  इस नवरात्रि ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए आपकी राशि के अनुसार आपको किस देवी की पूजा करनी चाहिए ताकि आपको इच्छित फल मिल सके। 

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शैलपुत्री---
देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप है शैलपुत्री। मां का यह स्वरूप चंद्रमा से संबंधित है। इसलिए प्रथम दिन शैलपुत्री माता का पूजन करने से चंद्र से जुड़े समस्त दोष समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की चंद्र की अनुकूलता होने से मानसिक सुख-शांति प्राप्त होती है। देवी दुर्गा जी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के कपड़ों का रंग लाल होता है।ऐसे में आप भी लाल रंग पहन सकते हैं।  वृश्चिक राशि वाले जातकों को भगवती तारा या माता शैलपुत्री की उपासना करनी चाहिए।
     नवरात्र के पहले दिन देवी शैलपुत्री के स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन माता को गाय के दूध से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है। पिपरमिंट युक्त मीठे मसाला पान, अनार और गुड़ से बने पकवान भी देवी को अर्पण किए जाते हैं। पहले दिन घी नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। शंकरजी की पत्नी एवं नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है। इस दिन मां को घी का भोग लगाने से भक्त निरोगी रहते हैं और उनके सारे दुःख ख़त्म होते हैं।
मेष राशि के जातक को भगवती तारा, नील-सरस्वती या माता शैलपुत्री की साधना करनी से लाभ मिलता हैं।
मां शैलपुत्री का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रि उत्सव के दौरान माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों का सम्मान किया जाता है,एवं पूजा जाता है।जिसे नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है,शैल का मतलब शिखर।शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत (शिखर) की बेटी के नाम से जाना जाता है।आमतौर पर यह समझा जाता है,कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री है।लेकिन यह बहुत ही निम्न स्तर की सोच है।किन्तु इसका योग के मार्ग पर वास्तविक अर्थ है-चेतना का सर्वोच्चतम स्थान।यह बहुत दिलचस्प है,जब ऊर्जा अपने चरम स्तर पर है,तभी आप इसका अनुभव कर सकते है,इससे पहले कि यह अपने चरम स्तर पर न पहुँच जाए,तब तक आप इसे समझ नहीं सकते। क्योंकि चेतना की अवस्था का यह सर्वोत्तम स्थान है,जो ऊर्जा के शिखर से उत्पन्न हुआ है।यहाँ पर शिखर का मतलब है,हमारे गहरे अनुभव या गहन भावनाओं का सर्वोच्चतम स्थान।
           जब आप १००% गुस्से में होते हो तो आप महसूस करोगे कि गुस्सा आपके शरीर को कमजोर कर देता है।दरअसल हम अपने गुस्से को पूरी तरह से व्यक्त नहीं करते,जब आप १००% क्रोध में होते हैं,यदि पूरी तरह से क्रोध को आप व्यक्त करें तो आप इस स्थिति से जल्द ही बाहर निकल सकते है। जब आप १००%(100 प्रतिशत) किसी भी चीज में होते है, तभी उसका उपभोग कर सकते है,ठीक इसी तरह जब क्रोध को आप पूरी तरह से व्यक्त करेंगे तब ऊर्जा की उछाल का अनुभव करेंगे,और साथ ही तुरंत क्रोध से बाहर निकल जाएंगे। क्या आपने देखा है कि बच्चे कैसे व्यवहार करते हैं? जो भी वे करते हैं, वे 100% करते हैं।अगर वे गुस्से में हैं, तो वे उस पल में 100% गुस्से में हैं, और फिर तुरंत कुछ ही मिनटों के बाद वे उस क्रोध को भी छोड़ देते हैं।अगर वे नाराज हो जाते हैं, तो भी वे थक नहीं जाते हैं।लेकिन अगर आप गुस्सा हो जाते हैं,तो आपका गुस्सा आपको थका देता है।ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है,क्योंकि आप अपना क्रोध 100% व्यक्त नहीं करते हैं।अब इसका मतलब यह नहीं है,कि आप हर समय नाराज हो जाएँ।तब आपको उस परेशानी का भी सामना करना पड़ेगा जिसकी वजह से क्रोध आता है। जब आप किसी भी अनुभव या भावनाओँ के शिखर तक पहुंचते हैं,तो आप दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव करते हैं,क्योंकि यह चेतना का सर्वोत्तम शिखर है।शैलपुत्री का यही वास्तविक अर्थ है।
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ब्रह्मचारिणी
देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी। देवी के इस स्वरूप का संबंध मंगल से है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मंगल ग्रह से जुड़ी समस्त पीड़ाएं दूर हो जाती है। इससे रोग दूर होते हैं और आत्मविश्वास, आत्मबल में वृद्धि होती है।नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना में गहरे नीले (रॉयल ब्लू) रंग का उपयोग लाभदायक रहता हैं।
वृषभ एवम तुला राशि वाले जातक को श्री विद्या में माता षोडशी या माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए।नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा की ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा होती है। मातारानी को को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। देवी को इस दिन पान-सुपाड़ी भी चढ़ाएं।
मां ब्रह्मचारिणी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

वह जिसका कोई आदि या अंत न हो,वह जो सर्वव्याप्त,सर्वश्रेष्ठ है और जिसके पार कुछ भी नहीं।जब आप आँखे बंद करके ध्यानमग्न होते हैं,तब आप अनुभव करते हैं,कि ऊर्जा अपनी चरम सीमा,या शिखर पर पहुँच जाती है,वह देवी माँ के साथ एक हो गयी है और उसी में ही लिप्त हो गयी है। दिव्यता, ईश्वर आपके भीतर ही है, कहीं बाहर नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि, ‘मैं इसे जानता हूँ’, क्योंकि यह असीम है; जिस क्षण ‘आप जान जाते हैं’, यह सीमित बन जाता है और अब आप यह नहीं कह सकते कि, “मैं इसे नहीं जानता”, क्योंकि यह वहां है – तो आप कैसे नहीं जानते? क्या आप कह सकते हैं कि “मैं अपने हाथ को नहीं जानता।” आपका हाथ तो वहां है, है न? इसलिये, आप इसे जानते हैं। और साथ ही में यह अनंत है अतः आप इसे नहीं जानते | यह दोनों अभिव्यक्ति एक साथ चलती हैं। क्या आप एकदम हैरान, चकित या द्वन्द में फँस गए!
      अगर कोई आपसे पूछे कि “क्या आप देवी माँ को जानते हैं ?” तब आपको चुप रहना होगा क्योंकि अगर आपका उत्तर है कि “मैं नहीं जानता” तब यह असत्य होगा और अगर आपका उत्तर है कि “हाँ मैं जानता हूँ” तो तब आप अपनी सीमित बुद्धि से, ज्ञान से उस जानने को सीमा में बाँध रहे हैं। यह ( देवी माँ ) असीमित, अनन्त हैं जिसे न तो समझा जा सकता है न ही किसी सीमा में बाँध कर रखा जा सकता है।“जानने” का अर्थ है कि आप उसको सीमा में बाँध रहे हैं। क्या आप अनन्त को किसी सीमा में बांध कर रख सकते हैं? अगर आप ऐसा सकते हैं तो फिर वह अनन्त नहीं।
     ब्रह्मचारिणी का अर्थ है वह जो असीम, अनन्त में विद्यमान, गतिमान है। एक ऊर्जा जो न तो जड़ न ही निष्क्रिय है, किन्तु वह जो अनन्त में विचरण करती है। यह बात समझना अति महत्वपूर्ण है – एक गतिमान होना, दूसरा विद्यमान होना। यही ब्रह्मचर्य का अर्थ है।इसका अर्थ यह भी है की तुच्छता, निम्नता में न रहना अपितु पूर्णता से रहना। कौमार्यावस्था ब्रह्मचर्य का पर्यायवाची है क्योंकि उसमें आप एक सम्पूर्णता के समक्ष हैं न कि कुछ सीमित के समक्ष। वासना हमेशा सीमित बँटी हुई होती है, चेतना का मात्र सीमित क्षेत्र में संचार। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी सर्व-व्यापक चेतना है।
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चंद्रघंटा
देवी का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजन करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। जीवन में आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम में वृद्धि होती है। भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा के दौरान पीले रंग के कपड़े पहनना अच्छा माना जाता है। देवी दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए। 
गुड़ और लाल सेब भी मैय्या को बहुत पसंद है। ऐसा करने से सभी बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं।मिथुन एवम कन्या राशि वाले जातक को माता भुवनेश्वरी या माता चन्द्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। 
मां चंद्रघण्टा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि चन्द्रमा हमारे मन का प्रतीक है। मन का अपना ही उतार चढ़ाव लगा रहता है। प्राय:, हम अपने मन से ही उलझते रहते हैं – सभी नकारात्मक विचार हमारे मन में आते हैं, ईर्ष्या आती है, घृणा आती है और आप उनसे छुटकारा पाने के लिये और अपने मन को साफ़ करने के लिये संघर्ष करते हैं।   जैसे ही हमारे मन में नकरात्मक भाव, विचार आते हैं तो हम निरुत्साहित, अशांत महसूस करते हैं। हम विभिन्न तरीकों से इनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं पर यह मात्र कुछ समय के लिए ही काम करता है। कुछ समय पश्चात वही विचार फिर हमें घेर लेते हैं और वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहाँ से हमने शुरुआत करी थी। अतः इन विचारों से पीछा छुड़ाने के संघर्ष में न फँसे। ‘चंद्र’ हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है (ठीक वैसे ही जैसे चन्द्रमा घटता व बढ़ता रहता है)। ‘घंटा’ का अर्थ है जैसे मंदिर के घण्टे-घड़ियाल (bell)। आप मंदिर के घण्टे-घड़ियाल को किसी भी प्रकार बजाएँ, हमेशा उसमे से एक ही ध्वनि आती है। इसी प्रकार एक अस्त-व्यस्त मन जो विभिन्न विचारों, भावों में उलझा रहता है, जब एकाग्र होकर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तब ऊपर उठती हुई दैवीय शक्ति का उदय होता है - और यही चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा का अर्थ है।
        एक ऐसी स्थिति जिसमे हमारा अस्त-व्यस्त मन एकाग्रचित्त हो जाता है। अपने मन से भागे नहीं - क्योंकि यह मन एक प्रकार से दैवीय रूप का प्रतीक, अभिव्यक्ति है। यही दैवीय रूप दुःख, विपत्ति, भूख और यहाँ तक कि शान्ति में भी मौजूद है। सार यह कि सबको एक साथ लेकर चलें - चाहे ख़ुशी हो या गम - सब विचारों, भावनाओं को एकत्रित करते हुए एक विशाल घण्टे -घड़ियाल के नाद की तरह। देवी के इस नाम ‘चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा’ का यही अर्थ है और तृतीय नवरात्रि के उपलक्ष्य में इसे मनाया जाता है।

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कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी के कुष्मांडा स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप सूर्य से संबंधित है। इनकी पूजा से सूर्य ग्रह से मिल रही पीड़ाएं दूर हो जाती है। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। आर्थिक तरक्की होती है।नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी की उपासन के लिए हरे रंग का उपयोग लाभदायक रहेगा।माता के चौथे स्वरूप की उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी के इस रूप की कृपा से निर्णंय लेने की क्षमता में वृद्धि एवं मानसिक शक्ति अच्छी रहती हैं। इस तिथि को मालपुआ का भोग लगाना अच्छा होता हैं। भोग लगाने के बाद उसे बच्चों में वितरित करने से पुण्य फलों में वृद्धि होती हैं।
कूष्माण्डा का संस्कृत में अर्थ होता है लौकी,कद्दू। अब अगर आप किसी को मज़ाक में लौकी, कद्दू पुकारेंगे तो वह बुरा मान जाएंगे और आपके प्रति क्रोधित होंगे।लौकी, कद्दू गोलाकार है।अतः यहाँ इसका अर्थ प्राणशक्ति से है - वह प्राणशक्ति जो पूर्ण, एक गोलाकार, वृत्त की भांति।
मां कूष्माण्डा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भारतीय परंपरा के अनुसार लौकी, कद्दू का सेवन मात्र ब्राह्मण, महा ज्ञानी ही करते थे। अन्य कोई भी वर्ग इसका सेवन नहीं करता था। लौकी, कद्दू आपकी प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति को बढ़ाते है। लौकी, कद्दू के गुण के बारे में ऐसा कहा गया है, कि यह प्राणों को अपने अंदर सोखती है, और साथ ही प्राणों का प्रसार भी करती है। यह इस धरती पर सबसे अधिक प्राणवान और ऊर्जा प्रदान करने वाली शाक, सब्ज़ी है। जिस प्रकार अश्वथ का वृक्ष २४ घंटे ऑक्सीजन देता है उसी प्रकार लौकी, कद्दू ऊर्जा को ग्रहण या अवशोषित कर उसका प्रसार करते है।
सम्पूर्ण सृष्टि - प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष , अभिव्यक्त व अनभिव्यक्‍त - एक बड़ी गेंद , गोलाकार कद्दू के समान है। इसमें हर प्रकार की विविधता पाई जाता है - छोटे से बड़े तक। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, ‘ष् ’ का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंडा’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला – सृष्टि या ऊर्जा का छोटे से वृहद ब्रह्मांडीय गोला। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का संचार छोटे से बड़े में होता है। यह बड़े से छोटा होता है और छोटे से बड़ा; यह बीज से बढ़ कर फल बनता है और फिर फल से दोबारा बीज हो जाता है। इसी प्रकार, ऊर्जा या चेतना में सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होने की और विशाल से विशालतम होने का विशेष गुण है,जिसकी व्याख्या कूष्मांडा करती हैं,देवी माँ को कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ यह भी है, कि देवी माँ हमारे अंदर प्राणशक्ति के रूप में प्रकट रहती हैं।
       कुछ क्षणों के लिए बैठकर अपने आप को एक कद्दू के समान अनुभव करें। इसका यहाँ पर यह तात्पर्य है कि अपने आप को उन्नत करें और अपनी प्रज्ञा, बुद्धि को सर्वोच्च बुद्धिमत्ता जो देवी माँ का रूप है, उसमें समा जाएँ। एक कद्दू के समान आप भी अपने जीवन में प्रचुरता बहुतायत और पूर्णता अनुभव करें। साथ ही सम्पूर्ण जगत के हर कण में ऊर्जा और प्राणशक्ति का अनुभव करें। इस सर्वव्यापी, जागृत, प्रत्यक्ष बुद्धिमत्ता का सृष्टि में अनुभव करना ही कूष्माण्डा है।

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स्कंदमाता
देवी स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप बुध ग्रह को नियंत्रित करता है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से बुद्धि, ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। कार्य में लाभ प्राप्त होता है।नवरात्रि के पांचवें दिन भूरा (ग्रे) रंग पहनना शुभ माना जाता है।इस बार पांचवें दिन सरस्वती माता की पूजा की जाएगी। इस दिन देवी स्कंदमाता की की गई पूजा से भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। नवरात्र के पांचवे दिन देवी को शारीरिक कष्टों के निवारण के लिए माता का भोग केले का लगाएं फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करें। इस दिन बुद्धि में वृद्धि के लिए माता को मंत्रों के साथ छह इलायची भी चढ़ाएं।
देवी माँ का पाँचवाँ रूप स्कंदमाता के नाम से प्रचलित है। भगवान् कार्तिकेय का एक नाम स्कन्द भी है जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति के एक साथ सूचक है। स्कन्द इन्हीं दोनों के मिश्रण का परिणाम है। स्कन्दमाता वो दैवीय शक्ति है,जो व्यवहारिक ज्ञान को सामने लाती है – वो जो ज्ञान को कर्म में बदलती हैं।
मां स्कंदमाता का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

शिव तत्व आनंदमय, सदैव शांत और किसी भी प्रकार के कर्म से परे का सूचक है। देवी तत्व आदिशक्ति सब प्रकार के कर्म के लिए उत्तरदायी है। ऐसी मान्यता है कि देवी इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का समागम है। जब शिव तत्व का मिलन इन त्रिशक्ति के साथ होता है तो स्कन्द का जन्म होता है। स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत, आरम्भ का प्रतीक है.इसे हम क्रियात्मक ज्ञान अथवा सही ज्ञान से प्रेरित क्रिया, कर्म भी कह सकते हैं।
       प्रायः ऐसा देखा गया की है कि ज्ञान तो है, किंतु उसका कुछ प्रयोजन या क्रियात्मक प्रयोग नहीं होता। किन्तु ज्ञान ऐसा भी है, जिसका ठोस प्रोयोजन, लाभ है, जिसे क्रिया द्वारा अर्जित किया जाता है। आप स्कूल, कॉलेज में भौतिकी, रसायन शास्त्र पड़ते हैं जिसका प्रायः आप दैनिक जीवन में कुछ अधिक प्रयोग करते। और दूसरी ओर चिकित्सा पद्धति, औषधि शास्त्र का ज्ञान दिन प्रतिदिन में अधिक उपयोग में आता है। जब आप टेलीविज़न ठीक करना सीख जाते हैं तो अगर कभी वो खराब हो जाए तो आप उस ज्ञान का प्रयोग कर टेलीविज़न ठीक कर सकते हैं। इसी तरह जब कोई मोटर खराब हो जाती है तो आप उसे यदि ठीक करना जानते हैं तो उस ज्ञान का उपयोग कर उसे ठीक कर सकते हैं। इस प्रकार का ज्ञान अधिक व्यवहारिक ज्ञान है। अतः स्कन्द सही व्यवहारिक ज्ञान और क्रिया के एक साथ होने का प्रतीक है। स्कन्द तत्व मात्र देवी का एक और रूप है।
    हम अक्सर कहते हैं, कि ब्रह्म सर्वत्र, सर्वव्यापी है, किंतु जब आपके सामने अगर कोई चुनौती या मुश्किल स्थिति आती है, तब आप क्या करते हैं? तब आप किस प्रकार कौनसा ज्ञान लागू करेंगे या प्रयोग में लाएँगे? समस्या या मुश्किल स्थिति में आपको क्रियात्मक होना पड़ेगा। अतः जब आपका कर्म सही व्यवहारिक ज्ञान से लिप्त होता है तब स्कन्द तत्व का उदय होता है। और देवी दुर्गा स्कन्द तत्व की माता हैं।
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कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करता है। मां कात्यायनी की पूजा से बृहस्पति के दुष्प्रभाव दूर होते हैं। जीवन में संयम, धैर्य और प्रसिद्धि में वृद्धि में होती है। नवरात्रि के छठे दिन लोगों को नारंगी (ऑरेंज) रंग के कपड़े पहनने चाहिए।देवी माँ कात्यायनी की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन शहद का भोग लगाकर मां कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है। इस दिन देवी को प्रसन्न करने के लिए शहद और मीठे पान का भोग लगाया जाता हैं। सूक्ष्म जगत जो अदृश्य, अव्यक्त है, उसकी सत्ता माँ कात्यायनी चलाती हैं। वह अपने इस रूप में उन सब की सूचक हैं, जो अदृश्य या समझ के परे है। माँ कात्यायनी दिव्यता के अति गुप्त रहस्यों की प्रतीक हैं।
मां कात्यायनी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

क्रोध किस प्रकार से सकारात्मक बल का प्रतीक है और कब यह नकारात्मक आसुरी शक्ति का प्रतीक बन जाता है ? इन दोनों में तो बहुत गहरा भेद है। आप सिर्फ़ ऐसा मत सोचिये कि क्रोध मात्र एक नकारात्मक गुण या शक्ति है। क्रोध का अपना महत्व, एक अपना स्थान है। सकारात्मकता के साथ किया हुआ क्रोध बुद्धिमत्ता से जुड़ा होता है,और वहीं नकारात्मकता से लिप्त क्रोध भावनाओं और स्वार्थ से भरा होता है। सकारात्मक क्रोध एक प्रौढ़ बुद्धि से उत्पन्न होता है। क्रोध अगर अज्ञान, अन्याय के प्रति है तो वह उचित है। अधिकतर जो कोई भी क्रोधित होता है वह सोचता है कि उसका क्रोध किसी अन्याय के प्रति है अतः वह उचित है! किंतु अगर आप गहराई में, सूक्ष्मता से देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ऐसा वास्तव में नहीं है। इन स्थितियों में क्रोध एक बंधन बन जाता है। अतः सकारात्मक क्रोध जो अज्ञान, अन्याय के प्रति है, वह माँ कात्यायनी का प्रतीक है।
       आपने बहुत सारी प्राकृतिक आपदाओं के बारे में सुना होगा। कुछ लोग इसे प्रकृति का प्रकोप भी कहते हैं। उदाहरणतः बहुत से स्थानों पर बड़े - बड़े भूकम्प आ जाते हैं या तीव्र बाढ़ का सामना करना पड़ता है। यह सब घटनाएँ देवी कात्यायनी से सम्बन्धित हैं। सभी प्राकृतिक विपदाओं का सम्बन्ध माँ के दिव्य कात्यायनी रूप से है। वह क्रोध के उस रूप का प्रतीक हैं जो सृष्टि में सृजनता, सत्य और धर्म की स्थापना करती हैं। माँ का दिव्य कात्यायनी रूप अव्यक्त के सूक्ष्म जगत में नकारात्मकता का विनाश कर धर्म की स्थापना करता है। ऐसा कहा जाता है कि ज्ञानी का क्रोध भी हितकर और उपयोगी होता है,जबकि अज्ञानी का प्रेम भी हानिप्रद हो सकता है। इस प्रकार माँ कात्यायनी क्रोध का वो रूप है, जो सब प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
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कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप शनि ग्रह से संबंधित है। इसलिए सप्तम दिन पूजन करने से शनि की पीड़ा शांत होती है। शनि की साढ़ेसाती, ढैया आदि के दुष्प्रभाव कम होते हैं। नवरात्रि के सातवें दिन सफेद रंग कि कपड़े पहनने चाहिए।
मां कालरात्रि  का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण---
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

यह माँ का अति भयावह व उग्र रूप है। सम्पूर्ण सृष्टि में इस रूप से अधिक भयावह और कोई दूसरा नहीं। किन्तु तब भी यह रूप मातृत्व को समर्पित है। देवी माँ का यह रूप ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है।माँ कालरात्रि की पूजा भूत-प्रेतों से मुक्ति दिलवाने वाली होती हैं।देवी कालरात्रि की उपासना करने से सभी दुख दूर होते हैं। इस दिन माता को गुड़ के नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए । नकारात्मक शक्तियों से बचने के लिए आप गुड़ का भोग लगा सकते हैं। इसके अलावा नींबू काटकर भी मां को अर्पित कर सकते हैं।
सिंह राशि वाले जातक को माता पीताम्बरा या माता कालरात्रि की उपासना करनी चाहिए।
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महागौरी
देवी का आठवां स्वरूप महागौरी है। इनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप राहु को नियंत्रित करता है। राहू की पीड़ा होने पर जातक का जीवन अव्यवस्थित हो जाता है। महागौरी की पूजा से राहु शांत होता है। दुर्गा मां की आठवें दिन की पूजा गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए।
मां महागौरी का यह मंत्र करेें आपका कल्याण--
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्र के आंठवें दिन महागौरी के स्वरूप का वंदन किया जाता है। इस दिन नारियल का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि आती है। मां के इस रूप को नारियल का भोग लगाया जाता हैं। इस भोग से संतान सुख की प्राप्ति होती हैं। महागौरी की पूजा करने के बाद पूरी, हलवा और चना कन्याओं को खिलाना शुभ माना जाता है। इनकी पूजा से संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
महागौरी का अर्थ है - वह रूप जो कि सौन्दर्य से भरपूर है, प्रकाशमान है - पूर्ण रूप से सौंदर्य में डूबा हुआ है। प्रकृति के दो छोर या किनारे हैं - एक माँ कालरात्रि जो अति भयावह, प्रलय के समान है, और दूसरा माँ महागौरी जो अति सौन्दर्यवान, देदीप्यमान,शांत है - पूर्णत: करुणामयी, सबको आशीर्वाद देती हुईं। यह वो रूप है, जो सब मनोकामनाओं को पूरा करता है।
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सिद्धिदात्री--
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। 
देवी का नवम स्वरूप सिद्धिदात्री केतु ग्रह को नियंत्रित करता है। इनकी पूजा से केतु ग्रह के दुष्प्रभावों से राहत मिलती है। कर्क,धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि वालों को भी माता कमल/काली या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।इन सभी  राशि वाले जातक को कमला या माता सिद्धिदात्री की उपासना करने से सफलता मिलती हैं। इनकी पूजा आसमानी रंग (हल्के नील रंग) के कपड़े पहनकर करना शुभ माना जाता है।
नवरात्र के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री को जगत को संचालित करने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन माता को हलवा, पूरी, चना, खीर, पुए आदि का भोग लगाएं।कोई भी अनहोनी से बचने के लिए इस दिन मां के भोग में अनार को शामिल किया जाता हैं।
यह मन्त्र करेगा आपका कल्याण--
नवरात्रि का नौवां दिन--
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

हमारी प्रार्थना हैं कि ...
देवी महागौरी आपको भौतिक जगत में प्रगति के लिए आशीर्वाद और मनोकामना पूर्ण करती हैं, ताकि आप संतुष्ट होकर अपने जीवनपथ पर आगे बढ़ें। माँ सिद्धिदात्री आपको जीवन में अद्भुत सिद्धि, क्षमता प्रदान करती हैं ताकि आप सबकुछ पूर्णता के साथ कर सकें। सिद्धि का क्याअर्थ है? सिद्धि, सम्पूर्णता का अर्थ है – विचार आने से पूर्व ही काम का हो जाना। आपके विचारमात्र, से ही, बिना किसी कार्य किये आपकी इच्छा का पूर्ण हो जाना यही सिद्धि है।  आपके वचन सत्य हो जाएँ और सबकी भलाई के लिए हों। आप किसी भी कार्य को करें वो सम्पूर्ण हो जाए - यही सिद्धि है। सिद्धि आपके जीवन के हर स्तर में सम्पूर्णता प्रदान करती है। यही देवी सिद्धिदात्री की महत्ता है।

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