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श्री कृष्ण जन्माष्टमी - होता हैं जीवन सार्थक करने का पावन पर्व

जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण जन्मोत्सव इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 24/25 अगस्त 2016 को मनाया जाएगा
Krishna-Janmashtami-festival-this-year-will-be-celebrated-on-24/25-August-2016-जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण जन्मोत्सव इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 24/25 अगस्त 2016 को मनाया जाएगा           जन्माष्टमी जिसके आगमन से पहले ही उसकी तैयारियां जोर शोर से आरंभ हो जाती है पूरे भारत वर्ष में इस त्यौहार का उत्साह देखने योग्य होता है. चारों का वातावरण भगवान श्री कृष्ण के रंग में डूबा हुआ होता है. जन्माष्टमी पूर्ण आस्था एवं श्रद्ध के साथ मनाया जाता है|| पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु कृष्ण रुप में अवतार लिया, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं|| श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं|| 
               भूलोक पर जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि केअवजित मुहूर्त में अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया । एक ऐसा अवतार जिसके दर्शन मात्र से प्राणियो के, घट घट के संताप, दुःख, पाप मिट जाते है | जिन्होंने इस श्रृष्टि को गीता का उपदेश दे कर उसका कल्याण किया, जिसने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत पढाया, यह उनका जन्मोत्सव है | 
          हमारे वेदों में चार रात्रियों का विशेष महातव्य बताया गया है दीपावली जिसे कालरात्रि कहते है,शिवरात्रि महारात्रि है,श्री कृष्ण जन्माष्टमी मोहरात्रि और होली अहोरात्रि है| जिनके जन्म के सैंयोग मात्र से बंदी गृह के सभी बंधन स्वत: ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए, माँ यमुना जिनके चरण स्पर्श करने को आतुर हो उठी, उस भगवान श्री कृष्ण को सम्पूर्ण श्रृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना गया है | इसी कारण वश जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। | इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। 
         जन्माष्टमी का व्रत "व्रतराज" कहा गया है। इसके सविधि पालन से प्राणी अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्य राशि प्राप्त कर सकते है | योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। ब्रजमंडल में श्री कृष्णाष्टमी "नंद-महोत्सव" अर्थात् "दधिकांदौ श्रीकृष्ण" के जन्म उत्सव का दृश्य बड़ा ही दुर्लभ होता है | भगवान के श्रीविग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढा ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं तथा छप्पन भोग का महाभोग लगते है। वाद्ययंत्रों से मंगल ध्वनि बजाई जाती है। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है। सम्पूर्ण ब्रजमंडल "नन्द के आनंद भयो - जय कन्हैय्या लाल की" जैसे जयघोषो व बधाइयो से गुंजायमान होता है| 
जानिए कृष्ण जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त--- 
 भगवान श्रीकृष्ण का ५२४३वाँ जन्मोत्सव निशिता पूजा का समय = २४:०६+ से २४:५१+ अवधि = ० घण्टे ४५ मिनट्स मध्यरात्रि का क्षण = २४:२८+ २६th को, पारण का समय = १०:५२ के बाद पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र का समाप्ति समय = १०:५२ दही हाण्डी - २६th, अगस्त को अष्टमी तिथि प्रारम्भ = २४/अगस्त/२०१६ को २२:१७ बजे अष्टमी तिथि समाप्त = २५/अगस्त/२०१६ को २०:०७ बजे 
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  1. जन्माष्टमी 2016 25 अगस्त निशिथ पूजा– 00:00 से 00:45 (25 अगस्त) 
  2. पारण– 10:35 (26 अगस्त) के बाद 
  3. रोहिणी समाप्त- 10:35 (26 अगस्त) 
  4. अष्टमी तिथि आरंभ – 22:17 (24 अगस्त) 
  5. अष्टमी तिथि समाप्त – 20:07 (25 अगस्त)
        जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है । उसमें भी जन्माष्टमी की पुरी रात, जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्व है ।  पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार भविष्य पुराण में लिखा है कि जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उनके धर में गर्भपात नहीं होता । 🙏 एकादशी का व्रत हजारों - लाखों पाप नष्ट करनेवाला अदभुत ईश्वरीय वरदान है लेकिन एक जन्माष्टमी का व्रत हजार एकादशी व्रत रखने के पुण्य की बराबरी का है । 🙏 एकादशी के दिन जो संयम होता है उससे ज्यादा संयम जन्माष्टमी को होना चाहिए । बाजारु वस्तु तो वैसे भी साधक के लिए विष है लेकिन जन्माष्टमी के दिन तो चटोरापन, चाय, नाश्ता या इधर - उधर का कचरा अपने मुख में न डालें । 🙏 इस दिन तो उपवास का आत्मिक अमृत पान करें ।अन्न, जल, तो रोज खाते - पीते रहते हैं, अब परमात्मा का रस ही पियें । अपने अहं को समाप्त कर दें। 
जन्माष्टमी : पूजन सामग्री-- 
 भगवान कृष्‍ण के जन्माष्टमी पर पूजन सामग्री का भी काफी महत्व होता है। आपके लिए पेश हैं पूजन सामग्री की सूची :-
पूजन सामग्री : श्रीकृष्ण का पाना (अथवा मूर्ति), गणेशजी की मूर्ति, अम्बिका की मूर्ति, सिंहासन (चौकी, आसन), पंच पल्लव, (बड़, गूलर, पीपल, आम और पाकर के पत्ते), पंचामृत, तुलसी दल, केले के पत्ते, (यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित), औषधि, (जटामॉसी, शिलाजीत आदि) दीपक, बड़े दीपक के लिए तेल, बन्दनवार, अर्घ्य पात्र सहित अन्य सभी पात्र। 
सुगंधित एवं अन्य सामग्री : इत्र की शीशी, धूप बत्ती (अगरबत्ती), कपूर, केसर, चंदन, यज्ञोपवीत 5, कुंकु, चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, आभूषण, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, मौली, पान के पत्ते, पुष्पमाला, कमलगट्टे-, तुलसीमाला। 
धन धान्य : धनिया खड़ा, सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा व दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद (मधु), शक्कर, घृत (शुद्ध घी), दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न, (पेड़ा, मालपुए इत्यादि), इलायची (छोटी), लौंग, ताम्बूल (लौंग लगा पान का बीड़ा), श्रीफल (नारियल), धान्य (चावल, गेहूं), पुष्प (गुलाब एवं लाल कमल), एक नई थैली में हल्दी की गांठ आदि। 
वस्त्र : श्रीकृष्ण को अर्पित करने हेतु वस्त्र, गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र, जल कलश (तांबे या मिट्टी का), सफेद कपड़ा (आधा मीटर), लाल कपड़ा (आधा मीटर), पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार)। 
 श्री कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत महात्यम:- 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी संपूर्ण भारत में भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग उपवास रखते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति जन्माष्टमी का व्रत विधि-विधानानुसार करता है, उसके समस्त पाप मिट जाते हैं व सुख समृद्धि मिलती है। संपूर्ण भारत में भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग उपवास रखते हैं। आरती के बाद दही, माखन, पंजीरी व अन्य प्रसाद भोग लगाकर बांटे जाते हंै। कुछ लोग रात में ही पारण करते हैं और कुछ दूसरे दिन ब्राह्मणों को भोजन करा कर स्वयं पारण करते हैं। 
         शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति जन्माष्टमी का व्रत विधि-विधानानुसार करता है, उसके समस्त पाप मिट जाते हैं व सुख समृद्धि मिलती है। भविष्य पुराण के जन्माष्टमी व्रत-माहात्म्य में यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराज के अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है। व्रतकर्ता भगवत्कृपा का भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं।दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। गृहस्थों को पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मंत्र से दूसरे दिन प्रात:हवन करके व्रत का पारण करना चाहिए। जिन भी लोगो को संतान न हो, वंश वृद्धि न हो, पितृ दोष से पीड़ित हो, जन्मकुंडली में कई सारे दुर्गुण, दुर्योग हो, शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाले को एक सुयोग्य,संस्कारी,दिव्य संतान की प्राप्ति होती है, कुंडली के सारे दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाते है और उनके पितरो को नारायण स्वयं अपने हाथो से जल दे के मुक्तिधाम प्रदान करते है | 
         देवताओं में भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अकेले ऐसे अवतार हैं जिनके जीवन के हर पड़ाव के अलग रंग दिखाई देते हैं। उनका बचपन लीलाओं से भरा पड़ा है। उनकी जवानी रासलीलाओं की कहानी कहती है, एक राजा और मित्र के रूप में वे भगवद् भक्त और गरीबों के दुखहर्ता बनते हैं तो युद्ध में कुशल नितिज्ञ। महाभारत में गीता के उपदेश से कर्तव्यनिष्ठा का जो पाठ भगवान श्री कृष्ण ने पढ़ाया है आज भी उसका अध्ययन करने पर हर बार नये अर्थ निकल कर सामने आते हैं। भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेने से लेकर उनकी मृत्यु तक अनेक रोमांचक कहानियां है। इन्ही श्री कृष्ण के जन्मदिन को हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले और भगवान श्री कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की कृपा पाने के लिये भक्तजन उपवास रखते हैं और श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। 
          भविष्य पुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ निम्न किसी भी मंत्र का अधिकाधिक जप करें- 
  1.  "ॐ नमो नारायणाय" 
  2. सिद्धार्थ: सिद्ध संकल्प: सिद्धिद सिद्धि: साधन:" 
  3.  "ॐ नमों भगवते वासुदेवाय" 
  4.  "श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने"
  5. प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:"
  6.  "श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय"

         उपर्युक्त मंत्र में से किसी का भी का जाप करते हुए सच्चिदानंदघन श्रीकृष्ण की आराधना करें। इससे परिवार में व कुटुंब में व्याप्त तनाव, समस्त प्रकार की समस्या, विषाद, विवाद और विघटन दूर होगा खुशियां घर में वापस लौट आएंगी। 
गौतमी तंत्र में यह निर्देश है- 
प्रकर्तव्योन भोक्तव्यं कदाचन। कृष्ण जन्मदिने यस्तु भुड्क्ते सतुनराधम:। 
निवसेन्नर केघोरे यावदाभूत सम्प्लवम्॥  
अर्थात- अमीर-गरीब सभी लोग यथाशक्ति-यथासंभव उपचारों से योगेश्वर कृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। जब तक उत्सव सम्पन्न न हो जाए तब तक भोजन कदापि न करें। जो वैष्णव कृष्णाष्टमी के दिन भोजन करता है, वह निश्चय ही नराधम है। उसे प्रलय होने तक घोर नरक में रहना पडता है। अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो 'जयंती' नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नाम वाली ही कही जाएगी। 
        वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। 
 व्रत-पूजन कैसे करें ???
 श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना गया है। साधारणतया इस व्रतके विषय में दो मत हैं । स्मार्त लोग अर्धरात्रि स्पर्श होनेपर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी में भी उपवास करते हैं , किन्तु वैष्णव लोग सप्तमी का किन्चिन मात्र स्पर्श होनेपर द्वितीय दिवस ही उपवास करते हैं । वैष्णवों में उदयाव्यपिनी अष्टमी एवं रोहिणी नक्षत्र को ही मान्यता एवं प्रधानता दी जाती हैं | उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश, द्रव्य दक्षिणा और गंध लेकर संकल्प करें- ॐ विष्णुíवष्णुíवष्णु:अद्य शर्वरी नाम संवत्सरे सूर्ये दक्षिणायने वर्षतरै भाद्रपद मासे कृष्णपक्षे श्रीकृष्ण जन्माष्टम्यां तिथौ भौम वासरे अमुकनामाहं(अमुक की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्ग सिद्धि द्वारा श्रीकृष्ण देवप्रीतये जन्माष्टमी व्रताङ्गत्वेन श्रीकृष्ण देवस्य यथामिलितोपचारै:पूजनं करिष्ये। 
   यदि उक्त मंत्र का प्रयोग व उच्चारण कठिन प्रतीत हो तो निम्न मंत्र का प्रयोग भी कर सकते है 
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धयेश्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥ 
 स्तुति:- 
 कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम । 
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम । 
सर्वांगे हरिचन्दनम सुरलितम, कंठे च मुक्तावलि । 
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ॥

       यदि संभव हो तो मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मी जी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए। अर्धरात्रि के समय शंख तथा घंटों के निनाद से श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सम्पादित करे तदोपरांत श्रीविग्रह का षोडशोपचार विधि से पूजन करे | 
निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-
'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः। 
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः। 
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।' 
          उसके पश्चात सभी परिजनों में प्रसाद वितरण कर सपरिवार अन्न भोजन ग्रहण करे और यदि संभव हो तो रात्रि जागरण करना विशेष लाभ प्रद सिद्ध होता है जो किसी भी जीव की सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ति करता है |इसके आलावा कृष्ण जन्म के समय "राम चरित मानस" के "बालकांड" में "रामजन्म प्रसंग" का पाठ आथवा "विष्णु सहस्त्रनाम" , "पुरुष सूक्त" का पाठ भी सर्वस्य सिद्दी व सभी मनोरथ पूर्ण करने वाला है | आज के दिन "संतान गोपाल मंत्र", के जाप व "हरिवंश पुराण", "गीता" के पाठ का भी बड़ा ही महत्व्य है | यह तिथि तंत्र साधको के लिए भी बहु प्रतीक्षित होती है, इस तिथि में "सम्मोहन" के प्रयोग सबसे ज्यादा सिद्ध किये जाते है | यदि कोई सगा सम्बन्धी रूठ जाये, नाराज़ हो जाये, सम्बन्ध विच्छेद हो जाये,घर से भाग जाये, खो जाये तो इस दिन उन्हें वापिस बुलाने का प्रयोग अथवा बिगड़े संबंधो को मधुर करने का प्रयोग भी खूब किया जाता है | 
 श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पूजन फल-- 
जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं। 
जन्माष्टमी का महत्व
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से सोलह कलाओं से युक्त भगवान श्री कृष्ण का जनम हुआ। इस दिन को रोहिणी नक्षत्र का दिन भी कहते हैं। इस दिन देश के समस्त मंदिरों का श्रृंगार किया जाता है। कृष्णावतार के उपलक्ष्य में झांकियां सजाई जाती हैं।भगवान कृष्ण का श्रृंगार करके झूला सजाया जाता है। पुरुष और औरतें रात्रि १२ बजे तक व्रत रखतें हैं। रात को १२ बजे शंख और घंटों की आवाज से श्री कृष्ण के जन्म की खबर चारों दिशाओं में गूँज उठती है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है। प्रसाद ग्रहण कर व्रत को खोला जाता है। 
 कथा :-
 द्वापर युग में जब पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार बढने लगा तो पृथ्वी गाय का रूप धारण कर अपने उद्दार के लिए ब्रह्मा जी के पास गई। ब्रह्मा जी सब देवताओं को साथ लेकर पृथ्वी को भगवान विष्णु जी के पास क्षीर सागर ले गए। उस समय भगवन विष्णु अन्नत शैया पर सो रहे थे। स्तुति करने पर भगवान् की निद्रा भंग हो गई। भगवान ने ब्रह्मा और सब देवताओं से जब आने का कारण पूछा तो पृथ्वी ने उनसे यह आग्रह किया कि वे उसे पाप के बोझ से बचाएँ। यह सुनकर विष्णु जी बोले- मैं बज्र मंडल में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा। आप सब देवतागण बज्र में जाकर यादव वंश की रचना करो। इतना कहकर भगवन अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद सभी देवताओं ने यादव वंश की रचना की। 
       द्वापर युग के अंत में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करता था। उसके पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक सिंहासन से उतारकर खुद राजा बन गया। कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ निश्चित हो गया। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ के साथ जा रहा था तो आकाशवाणी हुई हे कंस! जिस देवकी को बड़े प्यार से विदा करने जा रहा है उसका आठवां पुत्र तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। आकाशवाणी की बात सुनकर कंस क्रोधित हो गया और देवकी को मारने के लिए तेयार हो गया। उसने सोचा न देवकी होगी न उसका पुत्र। तब वासुदेव जी ने कंस को समझाया की तुम्हें देवकी से तो कोई भय नहीं है। देवकी की आठवीं संतान मैं तुम्हें सौंप दूंगा। 
           वासुदेव कभी झूठ नहीं बोलते थे तो कंस ने वासुदेव की बात स्वीकार कर ली। वासुदेव-देवकी को कारागार में बंद कर दिया गया। उसी समय नारद जी वहां पहुंचे और कंस से कहा की ये कैसे पता चलेगा की आठवां गर्भ कौन सा है। गिनती प्रथम से शुरू होगी या अंतिम से। कंस ने नारद के परामर्श पर देवकी के गर्भ से पैदा होने वाले सभी बालकों को मारने का निश्चय कर लिया। इस प्रकार कंस ने देवकी के ७ बालकों की हत्या कर दी। भाद्र पद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उनके जन्म लेते ही जेल की कोठरी में प्रकाश फैल गया। वासुदेव-देवकी के सामने शंख,चक्र,गदा और पदमधारी चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट कर कहा कि-अब मैं बालक का रूप धारण करता हूँ तुम मुझे गोकुल के नन्द के यहाँ पहुंचा दो और उनकी अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दो। तत्काल वासुदेव की हथकड़ियाँ खुल गयीं,दरवाजे अपने आप खुल गए,पहरेदार सो गए। 
      वासुदेव श्रीकृष्ण को टोकरी में रखकर गोकुल की और चल दिए। रास्ते में यमुना श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श करने के लिए बढने लगी। भगवान ने अपने पैर लटका दिए। चरण स्पर्श के बाद यमुना घट गई। वासुदेव यमुना पार करके गोकुल के नन्द के यहाँ गए। बालक कृष्ण को यशोदा की पास सुलाकर कन्या को लेकर वापिस कंस की कारागार में आ गए। जेल के दरवाजे बंद हो गए, वासुदेव के हाथों में फिर से हथकड़ियाँ लग गयी। कन्या के रोने पर कंस को खबर दी गयी। कंस ने कारागार में जाकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा परन्तु वह कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली, हे कंस! तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है। यह सुनकर कंस व्याकुल हो गया और उसने कृष्ण को मारने के लिए कई राक्षस भेजे लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी आलौकिक माया से सभी का संघार कर दिया। बड़े होकर श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर पुन: उग्रसेन को राजगद्दी पर बिठाया। श्रीकृष्ण की पुण्य तिथि को तभी से सारे देश में हर्षौल्लास से मनाया जाता है। भादव श्रीकृष्णाष्टमी को जन्माष्टमी कहते हैं। 
       इस दिन की रत को यदि रोहिणी नक्षत्र हो तो कृष्ण जयंती होती है। रोहिणी नक्षत्र के आभाव में केवल जन्माष्टमी व्रत का ही योग होता है। इस दिन सभी स्त्री-पुरुष नदी में तिल मिलाकर नहाते हैं। पंचामृत से भगवान कृष्ण की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। उन्हें सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों से सजाकर सुन्दर झूले में विराजमान किया जाता है। धूप-दीप पुष्पादि से पूजन करते हैं। आरती उतारते हैं और माखन-मिश्री आदि का भोग लगाते हैं। हरी का गुणगान करते हैं। १२ बजे रात को खीरा चीरकर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म करते हैं। इस दिन गौ दान का विशेष महत्त्व होता है। इस अकेले व्रत से करोड़ों एकादशी व्रतों का पुण्यफल प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भारत में मनाया जाने वाला एक प्रसिद त्यौहार है। यह अगस्त या सितम्बर के महीने में आता है। इस दिन भक्त लोग भजन गाते हैं। 
          दिन भर तरह-तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं तथा रात को कृष्ण प्रकट के बाद उन्हें भोग लगाते हैं और फिर इन व्यंजनों को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। यह त्यौहार भारत में ही नहीं विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भी बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से जगमगा उठती है। कान्हा की रासलीलाओं को देखने के लिए भक्त दूर-दूर से मथुरा पहुँचते हैं। मंदिरों को ख़ास तौर पर सजाया जाता है। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झूलाया जाता है। जगह-जगह रासलीलाओं का आयोजन किया जाता है। 
 विधि:- 
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत सनातन धर्म के लोगों के लिए अनिवार्य माना जाता है। जो वैष्णव कृष्णाष्टमी के दिन भोजन करता है वो निश्चय ही नराधम है। उसे प्रलय होने तक घोर नरक में रहना पड़ता है। भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति का दूध,दही,शहद,यमुनाजल आदि से अभिषेक होता है। उसके उपरांत विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। कुछ लोग रात्रि को १२ बजे गर्भ से जन्म लेने के प्रतीक स्वरुप खीरा चीरते हैं। जागरण:-धर्मग्रंथों में जन्माष्टमी के दिन जागरण का विधान भी बताया गया है। इस रात्री को भगवान के नाम का संकीर्तन या उनके मन्त्र "नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप भी करते हैं। श्रीकृष्ण का जाप करते हुए सारी रात जागने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जन्मोत्सव के पश्चात घी की बत्ती,कपूर आदि से आरती करते हैं। इस दिन वैसे तो पूरा दिन व्रत रखते हैं लेकिन असमर्थ फलाहार कर सकते हैं। पुराणों में यह कहा जाता है कि जिस राष्ट्र या राज्य में यह व्रतोत्सव किया जाता है वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का तांडव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। सभी को सुख-समृधि प्राप्त होती है। व्रतकर्ता भगवान की कृपा पाकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अंत में वैकुंठ जाता है। व्रत करने वालों के सब क्लेश दूर हो जाते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा जाता है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान,नाम अथवा मन्त्र जपते हुए जागने से संसार की मोह-माया से मुक्ति मिलती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इस व्रत का पालन करना चाहिए। 
जन्माष्टमी के विभिन्न रंग रुप---
 यह त्यौहार विभिन्न रुपों में मान्या जाता है कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों और इत्र की सुगंन्ध का उत्सव होता तो कहीं दही हांडी फोड़ने का जोश और कहीं इस मौके पर भगवान कृष्ण के जीवन की मोहक छवियां देखने को मिलती हैं मंदिरों को विशेष रुप से सजाया जाता है|| कृष्ण भक्त इस अवसर पर व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है तथा कृष्ण रासलीलाओं का आयोजन होता है|| श्री जन्माष्टमी के शुभ अवसर समय भगवान कृष्ण के दर्शनों के लिएए दूर दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं. श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर ब्रज कृष्णमय हो जाता है. मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है. मथुरा के सभी मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया जाता है|| भगवन श्री कृष्ण की जन्म स्थली मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पंहुचते हैं भगवान के विग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर लोग उसका एक दूसरे पर छिडकाव करते हैं. इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है तथा भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है|| 
इस जन्माष्टमी पर इन सरल उपायों से करें अपनी समस्या का समाधान --- 
 दारिद्रय निवारण के लिए- 
' श्री हरये नम:' मंत्र का यथाशक्ति जप करें तथा श्रीकृष्ण भगवान के विग्रह का पंचोपचार पूजन कर पंचामृत का नेवैद्य लगाएं। 
 कस्ट नाश व सुख-शांति के लिए-
 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें। श्रीकृष्ण भगवान के विग्रह का पंचामृत से अभिषेक कर मेवे का नेवैद्य लगाएं। यह मंत्र कल्पतरु है। 
 विपत्ति-आपत्ति से बचने के लिए- 
 'श्रीकृष्ण शरणं मम्' इस मंत्र का जप करें। शांति तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए- ' ॐ क्लीं हृषिकेशाय नम:' इस मंत्र का जप करें। 
 विवाहादि के लिए-
 'श्री गोपीजन वल्लभाय स्वाहा' मंत्र का जप करें तथा राधाकृष्ण के‍ विग्रह का पूजन करें। 
 घर में सुख-शांति के लिए-
 'ॐ नमो भगवते रुक्मिणी वल्लभाय स्वाहा' मंत्र का जप करें तथा कृष्ण-रुक्मणी का चित्र सामने रखें। 
संतान प्राप्ति के लिए- 
 'ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।।'
 निम्न मंत्र की 1 माला नित्य करें। निश्चित ही संतान प्राप्ति होती है तथा उच्चारण का विशेष ध्यान रखें। 
धन-संपत्ति के लिए- 
 'ॐ श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नम:'। श्री लक्ष्मी-विष्णु की प्रतिमा रखकर पंचोपचार पूजन कर जपें। 
 शत्रु शांति के लिए - 
 'ॐ उग्र वीरं महाविष्णुं ज्वलंतं सर्वतोमुखम्। नृ‍सिंह भीषणं भद्रं, मृत्युं-मृत्युं नमाम्यहम्।।' भगवान नृ‍सिंह की सेवा अत्यंत लाभदायक है। निम्न मंत्र की एक माला नित्य करने से शत्रु शांति, टोने-टोटके, भूत-प्रेत आदि से बचाव होता है ! 
 विशेष :=परोल्लिखित मंत्रों में पूजन में तुलसी का प्रयोग अवश्य करें। पूर्वाभिमुख होकर। कुशासन तथा श्वेत वस्त्र का उपयोग करें।

​राखी /रक्षाबंधन 18 अगस्त 2016 (गुरुवार) को मनाई जाएगी

हमारा देश भारत त्योहारों का देश है । यहाँ विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं । हर त्योहार अपना विशेष महत्त्व रखता है । रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक त्योहार है । यह भारत की गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक त्योहार भी है । यह दान के महत्त्व को प्रतिष्ठित करने वाला पावन त्योहार है ।हम सभी जानते हैं की रक्षा बंधन का त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। उत्तरी भारत में यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित है और इस त्यौहार का प्रचलन सदियों पुराना बताया गया है। इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती हैं और भाई अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए अपना स्नेहाभाव दर्शाते हैं। रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । 
Rakhi-Raksha-Bandhan-on-August-18-2016-Thursday-will-be-celebrated-​राखी /रक्षाबंधन 18 अगस्त 2016 (गुरुवार) को मनाई जाएगी          इस वर्ष 2016 में रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त (गुरुवार) को मनाया जायेगा || वैदिक काल में श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे । श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी । यज्ञ की समाप्ति पर यजमानों और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी । इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ । इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । इसी दिन ब्राह्मण वर्ग आज भी श्रावणी उपक्रम भी संपन्न करता हैं अर्थात जनेऊ/यग्योपवीत बदलने का कार्य करता हैं || बाद में इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा । हिन्दू धर्म में प्रत्येक पूजा कार्य में हाथ में कलावा ( धागा ) बांधने का विधान है. यह धागा व्यक्ति के उपनयन संस्कार से लेकर उसके अन्तिम संस्कार तक सभी संस्करों में बांधा जाता है. राखी का धागा भावनात्मक एकता का प्रतीक है. स्नेह व विश्वास की डोर है. धागे से संपादित होने वाले संस्कारों में उपनयन संस्कार, विवाह और रक्षा बंधन प्रमुख है।
         पुरातन काल से वृक्षों को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा है। बरगद के वृक्ष को स्त्रियां धागा लपेटकर रोली, अक्षत, चंदन, धूप और दीप दिखाकर पूजा कर अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती है। आंवले के पेड़ पर धागा लपेटने के पीछे मान्यता है कि इससे उनका परिवार धन धान्य से परिपूर्ण होगा। वह भाइयों को इतनी शक्ति देता है कि वह अपनी बहन की रक्षा करने में समर्थ हो सके। श्रवण का प्रतीक राखी का यह त्यौहार धीरे-धीरे राजस्थान के अलावा अन्य कई प्रदेशों में भी प्रचलित हुआ और सोन, सोना अथवा सरमन नाम से जाना गया || 
 येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल: । 
तेन त्वां प्रति बच्चामि, रक्षे! मा चल, मा चल ।। 
           अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ । हे रक्षासूत्र! तू भी अपने कर्त्तव्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना । रक्षा बंधन का उल्लेख हमारी पौराणिक कथाओं व महाभारत में मिलता है और इसके अतिरिक्त इसकी ऐतिहासिक व साहित्यिक महत्ता भी उल्लेखनीय है। रक्षाबंधन से सम्बंधित पूजा के लिए हिन्दू पंचांग अनुसार दोपहर के बाद का समय (अपराह्न ) ही सर्वश्रेठ माना गया है. अपराह्न के बाद रक्षाबंधन के लिए केवल प्रदोष काल ही उपयुक्त है. रक्षाबंधन के लिए सबसे अधिक अनुपयुक्त समय भद्रा माना गया है. भद्रा काल हिन्दू वेदों के अनुसार किसी भी तरह के शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, इसीलिए जहाँ तक हो सके भद्रा काल में रक्षा बंधन से सम्बंधित कोई भी पूजा नहीं करनी चाहिए || उत्तर भारत के कई प्रान्तों में प्रातः काल में राखी/ रक्षा सूत्र बंधने की प्रथा है. यहाँ ये बात ध्यान देने लायक है कि पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्थ में भद्रा काल होता है. अतः रक्षा सूत्र या राखी बंधने और पूजन के समय के लिए भद्रा काल के समाप्त हो जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए ||
राखी /रक्षाबंधन 2016 के लिए शुभ महूर्त----
 इस वर्ष 2016 में रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त, को मनाया जाएगा. पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को दोपहर बाद से आरंभ होगा किंतु भद्रा व्याप्त रहेगी. इसलिए शास्त्रानुसार यह त्यौहार 18 अगस्त को संपन्न किया जाए तो अच्छा रहेगा. परंतु परिस्थितिवश यदि भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को त्यागकर भद्रा पुच्छ काल में इसे करना चाहिए|| जब भी कोई कार्य शुभ समय में किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता में वृ्द्धि होती है. भाई- बहन के रिश्ते को अटूट बनाने के लिये इस राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त समय में करना चाहिए || 
        वर्ष 2016 में श्रावणी पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को हो जाएगा. परन्तु भद्रा व्याप्ति रहेगी. इसलिए शास्त्रानुसार यह त्यौहार 18 अगस्त को 5:55 से 14:56 या 13:42 से 14:56 तक मनाया जा सकता है || सामान्यत: उतरी भारत जिसमें पंजाब, दिल्ली, हरियाणा आदि में प्रात: काल में ही राखी बांधने का शुभ कार्य किया जाता है. परम्परा वश अगर किसी व्यक्ति को परिस्थितिवश भद्रा-काल में ही रक्षा बंधन का कार्य करना हों, तो भद्रा मुख को छोड्कर भद्रा-पुच्छ काल में रक्षा - बंधन का कार्य करना शुभ रहता है. शास्त्रों के अनुसार में भद्रा के पुच्छ काल में कार्य करने से कार्यसिद्धि और विजय प्राप्त होती है. परन्तु भद्रा के पुच्छ काल समय का प्रयोग शुभ कार्यों के के लिये विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए || 
 18 अगस्त (बृहस्पतिवार), 2016 को रक्षा बंधन मुहूर्त-- 
05:55 से 14:56 तक अपराह्न काल में रक्षाबंधन 2016 के लिए शुभ महूर्त--- 13:42 से 14:56 (वर्ष 2016 में रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी) 
आइए रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर जानें कैसे बांधे अपने भाई को राखी.... 
  •  * प्रातः स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। 
  • * अब दिनभर में किसी भी शुभ मुहूर्त में घर में ही किसी पवित्र स्थान पर गोबर से लीप दें। 
  • * लिपे हुए स्थान पर स्वस्तिक बनाएं। 
  • * स्वस्तिक पर तांबे का पवित्र जल से भरा हुआ कलश रखें। 
  • * कलश में आम के पत्ते फैलाते हुए जमा दें। 
  • * इन पत्तों पर नारियल रखें। 
  • * कलश के दोनों ओर आसन बिछा दें। (एक आसन भाई के बैठने के लिए और दूसरा स्वयं के बैठने के लिए) 
  • * अब भाई-बहन कलश को बीच में रख आमने-सामने बैठ जाएं। 
  • * इसके पश्चात कलश की पूजा करें।
  •  * फिर भाई के दाहिने हाथ में नारियल तथा सिर पर टॉवेल या टोपी रखें। 
  • * अब भाई को अक्षत सहित तिलक करें। 
  • * इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। 
  • * पश्चात भाई को मिठाई खिलाएं, आरती उतारें और उसकी तरक्की व खुशहाली की कामना करें। 
  • * अगर भाई आपसे उम्र में बड़ा हो तो भाई के चरण स्पर्श करें और अगर बहन उम्र में बड़ी हो तो भाई राखी बंधने के पश्चात बहन के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें। 
  •  * इसके पश्चात घर की प्रमुख वस्तुओं को भी राखी बांधें। जैसे- कलम, झूला, दरवाजा आदि। 
प्रसंग वश--- 
 आजकल राखी प्रमुख रूप से भाई-बहन का पर्व माना जाता है । बहिनों को महीने पूर्व से ही इस पर्व की प्रतीक्षा रहती है । इस अवसर पर विवाहित बहिनें ससुराल से मायके जाती हैं और भाइयों की कलाई पर राखी बाँधने का आयोजन करती हैं । वे भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं तथा राखी बाँधकर उनका मुँह मीठा कराती हैं । भाई प्रसन्न होकर बहन को कुछ उपहार देता है । प्रेमवश नया वस्त्र और धन देता है । परिवार में खुशी का दृश्य होता है । बड़े बच्चों के हाथों में रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं । रक्षाबंधन के अवसर पर बाजार में विशेष चहल-पहल होती है । रंग-बिरंगी राखियों से दुकानों की रौनक बढ़ जाती है । लोग तरह-तरह की राखी खरीदते हैं । हलवाई की दुकान पर बहुत भीड़ होती है । लोग उपहार देने तथा घर में प्रयोग के लिए मिठाइयों के पैकेट खरीदकर ले जाते हैं । 
          श्रावण पूर्णिमा के दिन मंदिरों में विशेष पूजा- अर्चना की जाती है । लोग गंगाजल लेकर मीलों चलते हुए शिवजी को जल चढ़ाने आते हैं । काँधे पर काँवर लेकर चलने का दृश्य बड़ा ही अनुपम होता है । इस यात्रा में बहुत आनंद आता है । कई तीर्थस्थलों पर श्रावणी मेला लगता है । घर में पूजा-पाठ और हवन के कार्यक्रम होते हैं । रक्षाबंधन के दिन दान का विशेष महत्त्व माना गया है । इससे प्रभूत पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता है । लोग कंगलों को खाना खिलाते हैं तथा उन्हें नए वस्त्र देते हैं । पंडित पुराहितों को भोजन कराया जाता है तथा दान-दक्षिणा दी जाती है । रक्षाबंधन पारिवारिक समागम और मेल-मिलाप बढ़ाने वाला त्योहार है । इस अवसर पर परिवार के सभी सदस्य इकट्‌ठे होते हैं । विवाहित बहनें मायके वालों से मिल-जुल आती हैं । उनके मन में बचपन की यादें सजीव हो जाती हैं । बालक-बालिकाएँ नए वस्त्र पहने घर-आँगन में खेल-कूद करते हैं । बहन भाई की कलाई में राखी बाँधकर उससे अपनी रक्षा का वचन लेती है । भाई इस वचन का पालन करता है । इस तरह पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आती है । लोग पिछली कडुवाहटों को भूलकर आपसी प्रेम को महत्त्व देने लगते हैं । इस तरह रक्षाबंधन का त्योहार समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ाने का कार्य करता है । संसार भर में यह अनूठा पर्व है । इसमें हमें देश की प्राचीन संस्कृति की झलक देखने को मिलती है ।
जानिए रक्षाबंधन का इतिहास एवं महत्व --- 
 राखी के पर्व की शुरुआत कब से हुई इसकी कोई निश्चित जानकारी तो नहीं है पर पुराणों में इस पर्व से सम्बंधित कुछ कथाएं है जो हम आज आपको बातएंगे। इसके अलावा हम आपको इतिहास की वो अमर कहानी भी बातएंगे जब मेवाड़ की राजपूत रानी कर्णावती द्वारा भेजी गई राखी का मान रखते हुए मुग़ल शासक हुमायूँ ने कर्णावती की और उसके राज्य की रक्षा की थी। रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि राजा के अभिमान को इसी दिन चकानाचूर किया था। इसलिए यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र राज्य में नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से यह त्योहार विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। 
       रक्षाबंधन के संबंध में एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। हिंदू पुराण कथाओं के अनुसार, महाभारत में, पांडवों की पत्‍नी द्रौपदी ने भगवान कृष्‍ण की कलाई से बहते खून को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी। दूसरा उदाहरण अलेक्जेंडर व पुरू के बीच का माना जाता है। कहा जाता है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। 
      इससे अलेक्जेंडर की पत्नी काफी तनाव में आ गईं थीं। उसने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था। सो, उन्होंने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी। तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को प्यार से राखी बाँधती है और उसके लिए अनेक शुभकामनाएँ करती है। भाई अपनी बहन को यथाशक्ति उपहार देता है। बीते हुए बचपन की झूमती हुई याद भाई-बहन की आँखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच, रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है। आजकल तो बहन भाई को राखी बाँध देती है और भाई बहन को कुछ उपहार देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेता है। लोग इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं। यह जीवन की प्रगति और मैत्री की ओर ले जाने वाला एकता का एक बड़ा पवित्र पर्व है।

इस वर्ष मोहिनी एकादशी 17 मई 2016 (मंगलवार) को मनाई जायेगी

इस वर्ष वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि 17 मई 2016 ( मंगलवार) को है। इस एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार यह तिथि सब पापों को हरनेवाली और उत्तम है । इस दिन जो व्रत रहता है उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल तथा पापों से छुटकारा पा जाते हैं। हिन्दू धार्मिक मान्यता अनुसार वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस धार्मिक ग्रंथो के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय अमृत को लेकर देवताओ और दानवो में विवाद छिड़ गया। इस विवाद को समाप्त करने एवम दानवो को अमृत से दूर रखने के लिए भगवान विष्णु अति सुन्दर नारी रूप धारण कर देवताओ और दानवो के बीच पहुंच गए। भगवान विष्णु के नारी रूप को देख दानव लोग उनपर मोहित हो गया। तब भगवान विष्णु जी ने दिग्भ्रमित दानवों से अमृत कलश छीनकर देवताओं को सौंप दिया। तत्पश्चात सभी देवताओं ने अमृत पान किया, जिससे समस्त देवता गण अमर हो गए। जिस दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप को धारण किया था उस दिन एकादशी तिथि थी। अतः इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। 
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            जिस प्रकार कार्तिक के समान वैशाख मास उत्तम माना गया है उसी प्रकार वैशाख मास की यह एकादशी भी उत्तम कही गयी है। इसका कारण यह है कि संसार में सभी प्रकार के पापों का कारण मोह माना गया है। विधि विधान पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखने से मोह का बंधन ढ़ीला होता जाता है और मनुष्य ईश्वर का सानिध्य प्राप्त कर लेता है। इससे मृत्यु के बाद नर्क की कठिन यातनाओं का दर्द नहीं सहना पड़ता है। मोहिनी एकादशी के विषय में शास्त्र कहता है कि, त्रेता युग में जब भगवान विष्णु रामावतार लेकर पृथ्वी पर आये तब इन्होंने भी गुरू वशिष्ठ मुनि से इस एकादशी के विषय में ज्ञान प्राप्त किया। 
         संसार को इस एकादशी का महत्व समझाने के लिए भगवान राम ने स्वयं भी यह एकादशी व्रत किया। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर को इस व्रत को करने की सलाह दी थी। जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट हुए थे उस दिन एकादशी तिथि थी। भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के दिन की जाती है। इस एकादशी को संबंधों में आये दरार को दूर करने वाला भी माना गया है। 
 ***** जानिए की कब और कैसे करें वर्ष 2016 में मोहिनी एकादशी का पारणा--- 
 एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है। एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। 
        जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए। 
  •  18th मई 2016 को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय = ०5:32 से ०8:14 
  • पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय = 19:52 
  • एकादशी तिथि प्रारम्भ = 16/मई/2016 को 14:50 बजे
  •  एकादशी तिथि समाप्त = 17/मई/2016 को 17:17 बजे।। 

 **** जानिए मोहिनी एकादशी व्रत की कथाः--- 
भद्रावती नाम की सुन्दर नगरी थी। वहां के राजा धृतिमान थे। इनके नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। इसके पाँच पुत्र थे इनमें सबसे छोटा धृष्टबुद्धि था। यह पाप कर्मों में अपने पिता का धन लुटा रहा था। एक दिन वह नगर वधू के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बन्धु बान्धवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। अब वह दिन रात दु:ख और शोक डूबकर इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। कौण्डिल्य गंगा में स्नान करके आये थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला: ‘ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’ कौण्डिल्य बोले: वैशाख मास के शुक्लपक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्घि ने ऋषि के बताये विधि के अनुसार व्रत किया जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर श्रीविष्णुधाम को चला गया। 
 **** जानिए मोहिनी एकादशी व्रत की विधिः---- 
 हिन्दू धार्मिक ग्रंथो के अनुसार एकादशी के दिन रात्रि जागरण करने का उल्लेख मिलता है। अतः एकादशी की रात्रि में ना सोए। बल्कि भगवान विष्णु जी का भजन-कीर्तन करे। अगले दिन अर्थात द्वादशी के दिन पूजा-दान एवम ब्राह्मणो को भोजन कराने के पश्चात व्रत खोलें। जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करे,उसे एकदिन पूर्व अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। व्रत के दिन एकादशी तिथि में व्रती को सुबह सूर्योदय से पहले उठना चाहिए और नित्य कर्म कर शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान के लिये किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है। अगर यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान करना चाहिए। स्नान करने के लिये कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना चाहिए। स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।
            इस दिन भगवान श्रीविष्णु के साथ-साथ भगवान श्रीराम की पूजा भी की जाती है। व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरु किया जाता है। संकल्प लेने के लिये इन दोनों देवों के समक्ष संकल्प लिया जाता है। देवों का पूजन करने के लिये कलश स्थापना कर,उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कलश का पूजन किया जाता है। इसके बाद इसके ऊपर भगवान कि तस्वीर या प्रतिमा रखें तत्पश्चात भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कर उत्तम वस्त्र पहनाना चाहिए। फिर धूप,दीप से आरती उतारनी चाहिए और मीठे फलों का भोग लगाना चाहिए। इसके बाद प्रसाद वितरीत कर ब्राह्मणों को भोजन तथा दान दक्षिणा देनी चाहिए। रात्रि में भगवान का कीर्तन करते हुए मूर्ति के समीप ही शयन करना चाहिए। इस एकादशी का व्रत रखने वाले को अपना मन साफ रखना चाहिए। 
           प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करे इसके बाद शुद्घ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के मूर्ति अथवा तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं और तुलसी, फल, तिल सहित भगवान की पूजा करें। व्रत रखने वाले को स्वयं तुलसी पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। किसी के प्रति मन में द्वेष की भावना नहीं लाएं और न किसी की निंदा करें। व्रत रखने वाले को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए। शाम में पूजा के बाद चाहें तो फलाहार कर सकते हैं। एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। संभव हो तो रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करें। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों

Holika-Dahan-in-2016-on-how-and-when-the-day-is-done-and-why-इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों       हमारी भारतीय सनातन संस्कृति में प्रमुख त्यौहारों को कब और कैसे मनाना चाहिए उसके बारे में भारतीय धर्म ग्रंथों में निर्णय सिंधु , धर्म सिंधु, पुरुषार्थ चिंतामणि, समय प्रकाश, तिथि निर्णय और व्रत पर्व विवेक आदि में उसके नियम स्पष्ट लिखे हुए है । कुछ अल्प ज्ञानी लोग जिनको इन नियमो की जानकारी तो होती नही है वे लोग अपनी अल्प जानकारी के कारण लोगों को भ्रमित करते और त्योहारों को एक दिन की जगह दो दिन करवा देते है इस कारण लोगों की आस्था कम होती हैं ।
         उसी क्रम में इस साल 2016 में "होलिका दहन" को लेकर भ्रम की स्थिति बन रही है उसमे कुछ अल्प ज्ञानी उसको मनाने की दिनांक को सवेरे और सायं काल को मनाने की परिस्थिति उत्पन्न कर रहे हैं ऐसे लोगों और धर्म प्रेमी लोगों के लिए कुछ नियम लिख रहे है । वैसे होलिका दहन के बारे में विभिन्न ग्रंथो में " फाल्गुन पूर्णिमा में प्रदोष के समय होलिका दहन किया जाता है और भद्रा में होलिका दहन पूर्ण रूप से वर्जित हैं विशेष परिस्थिति में भद्रा मुख को छोड़ कर भद्रा के पुच्छ में करने का विधान है और इसके कई नियम और भी है जिनको आप को बताना जरुरी है ।

  1. --- यदि पूर्णिमा दो दिन प्रदोष को व्याप्त कर रही हो तो दूसरे दिन ही प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है । क्योंकि प्रथम दिन प्रदोष भद्रा के कारण दूषित रहता है । 
  2.  -- यदि दूसरे दिन प्रदोष के समय पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तब दूसरे दिन पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या उससे ज्यादा हो और अगले दिन प्रतिपदा वृद्धिगामिनि हो तब दूसरे दिन ही प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होता है । यहाँ प्रतिपदा का ह्रास हो तो पहले दिन भद्रा के पुच्छ या भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा में ही होलिका दहन किया जाता है ।
  3. --- दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन निशा काल से पहले भद्रा समाप्त हो जाये तो वहाँ भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए । इस स्थिति में वेद व्यास जी के "भविष्योत्तर पुराण " में लिखे वाक्य को बताना जरुरी है :- 

सार्धयाम प्रयम् वा स्यात् द्वितीये दिवसे यदा । 
प्रतिपद् वर्धमाना तू तदा सा होलिका स्मृता ।। 

       इसका अर्थ यह है की यदि पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या इससे अधिक समय को व्याप्त करे और उसके साथ प्रतिपदा वृद्धिगामिनी हो तो वहाँ होलिका दहन सायं व्यापिनी पूर्णिमा के कल में करनी चाहिए । यहाँ ध्यान रहे की कोई भी तिथि यदि सार्ध त्रियाम व्यापिनी है तो वह अनिवार्यतः सायं व्यापिनी व्यापिनी अवश्य होती है और सार्ध त्रियाम पूर्णिमा सयम व्यापिनी होने से प्रदोष व्यापिनी ही मणि जाती है अतः वहाँ होलिका दहन शास्त्र सम्मत है । यही बात "पुरुषार्थ चिंतामणि " ग्रन्थ में इस प्रकार स्पष्ट लिखी हूई है ---

 "यदा तु द्वितीय दिने सार्धयाम त्रयं पूर्णिमा प्रतिपदश्च वृद्धि: । 
तदा पूर्णिमान्त्यभागे सायाह्न काल एव दीपनीया होलिका " 

        यानि उपरोक्त लिखित विस्तृत विवेचन का सारांश यह है की क्या इस वर्ष 2016 में ( 22-23 मार्च को) होलिका दहन में भद्रा बनेगी बाधा ???
         होलिका दहन में इस बार भद्रा बाधक बन रहा है। 22 मार्च 2016 दिन मंगलवार को भद्रा कुल 11 घंटे 10 मिनट का होगा जो शाम 2/29बजे से रात 3/19 बजे तक रहेगा। फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र गण्ड योग . दिन मंगलवार होलिका दहन भद्रा के पुच्छ समय रात 03/19 बजे से 05/05बजे तक हो सकेगा। रात 03/19 बजे के बाद होली जलाई जा सकती है। अगले दिन 23 मार्च 2016 को धुलेंडी मनेगी।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रतिवर्ष धुलेंडी चैत्र प्रतिपदा को होती है लेकिन इस बार 9 वर्ष बाद फाल्गुन में ही धुलेंडी मनेगी। उन्होंने बताया कि भद्रा में होलिका दहन नहीं करना चाहिए। भद्रा में होली जलाने से राष्ट्र, नगर एवं ग्राम को हानि होती है। धर्म सिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा मुख की रात्रि 02/29 से 03/19 बजे तक रहेगी। उस समय को त्याग करके भद्रा का पुच्छ समय 03/19 बजे से 05/05 बजे तक होलिका दहन करें या फिर प्रातः 05/05 बजे से सूर्योदय तक होलिका दहन श्रेष्ठ होगा।

15 जनवरी को मनाया जाएगा मकर संक्रांति एवम् पोंगल का पर्व

January-15-will-be-celebrated-Pongal-festival-of-Makar-Sankranti-holders-2016-15 जनवरी को मनाया जाएगा मकर संक्रांति एवम् पोंगल का पर्व   इस वर्ष मकर संक्रांति एवम् पोंगल का पर्व पहली बार पूर्ण रूप से 15 जनवरी 2016 ,शुक्रवार को मनाया जाएगा । तिथि में बदलाव के बाद यह पर्व पिछले वर्ष14 व 15 जनवरी 2015 को मनाया गया था । उल्लेखनीय हैं की यह पर्व आने अगले 82 सालों तक 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाई जाएगी। इस वर्ष सूर्यदेव मकर राशि में 14 जनवरी की रात 1.25 बजे प्रवेश करेंगे ।। 
      मकर राशि में प्रवेश के साथ ही दान पूण्य का महत्त्व भी एक दिन आगे बढ़ जाएगा। इससे 15 जनवरी 2016, शुक्रवार को दान-पुण्य के साथ ही संक्रांति की धूम रहेगी। हम सभी जानते हैं की भारतवर्ष में मकर संक्रांति / पोंगल आमतौर पर 14 जनवरी को मनाई जाती है। वहीं पिछले साल 2015 से यह 15 जनवरी से मनाया जा रहा है । हालांकि पिछले साल यह पूर्ण रूप से 15 जनवरी को नहीं पड़ा था। लिहाजा 14 जनवरी को भी संक्रांति मनाई गई थी । इसके साथ ही इस तिथि से दिन भी बड़े होने लगेंगे । सूर्य की वजह से संक्रांति एक दिन आगे चली जाती है । इसके साथ 2017 सहित बीच के कुछ वर्षों में सूर्य की गति प्रभावित होगी । इससे 14 जनवरी को संक्रांति का रहेगा ।इसके बाद से 15 जनवरी को पूरी तरह से संक्रांति रहेगी। 
       पण्डित दयानंद शास्त्री ने बताया कि संक्रांति का दान आदि पुण्य फल देने वाला होता है । इसी दिन पवित्र गंगा मय्या ने कपिल मुनि के आश्रम में प्रवेश कर राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाई थी ।। प्रचलित दंत कथानुसार महाभारत युद्ध के दौरान ही भीष्म पितामह ने भी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही अपने प्राणों का परित्याग किया था। 
*****पवित्र नदियों और सरोवरों में होगा पवित्र स्नान----
 सूर्य के धनु राशि से मकर में प्रवेश करते ही सरोवरों में स्नान दान का भी महत्व है । मान्यता है कि संक्रांति के दिन पवित्र सरोवर में स्नान करने से पुण्य फल की वृद्घि होती है। पुष्कर का ब्रह्म सरोवर हो या कुरुक्षेत्र का कुण्ड अथवा कोई अन्य पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा या शिप्रा अथवा चम्बल-- चंद्रभागा आदि में ।। इसी धारणा की वजह से संक्रांति के समय में बड़ी संख्या में श्रद्घालु आस्था के साथ विभिन्न सरोवर और पवित्र जलाशयों में डूबकी लगाएंगे। 
****दान-पुण्य का है महत्व---- 
मकर संक्रांति में दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है । इसमें खिचड़ी, वस्त्र व तिल गुड़ का दान किया जाता है । इसके साथ ही तिल गुड़ का सेवन करने का भी विधान है।।

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