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जब नया फ्लैट लेना हो तो ध्यान रखें इन वास्तु सिद्धांतों को

    जिस भूमि पर अधिक सुरक्षा व सुविधा प्राप्त हो सके, इस प्रकार के मकान को भवन व महल आदि जिसमें मनुष्य रहते हैं या काम करते हैं उसे वास्तु कहते है। इस ब्रह्मण्ड में सबसे शाक्तिशाली प्राकृति है क्योंकि यही सृष्टि का विकास करती है। यही ह्रास प्रलय, नाशा करती है। वास्तु शास्त्र इन्हीं प्राकृतिक शाक्तियों का अधिक प्रयोग कर अधिकतम सुरक्षा व सुविधा प्रदान करता है।। 
             वास्तुविद पंडित " दयानन्द शास्त्री के अनुसार कुछ वास्तु दोष ऐसे होते हैं जो वास्तु का ज्ञान ना होने पर भी दिखाई दे जाते हैं जैसे गलत स्थान पर रसोई, टैंक, जल की निकासी, पूजाघर, शयनकक्ष बच्चों का कमरा यदि गलत जगह बना हो तो उस घर में रहने वालों को मानसिक अशांति का सामना करना पड़ता है। इसलिए अगर आप कोई नया घर या फ्लैट खरीदने जा रहे हैं तो नीचे लिखी वास्तु सम्मत बातों का ध्यान अवश्य रखें ताकि नये घर में भी आपका जीवन
खुशियों से भरा रहे—
If-you-want-to-enjoy-the-new-flat-note-these-architectural-principles-जब नया फ्लैट लेना हो तो ध्यान रखें इन वास्तु सिद्धांतों को           बढ़ती हुई आबादी और कम पड़ती हुई जमीन के कारण आजकल महानगरों में आँगन या चौक वाले मकान बनना असंभव हो गए हैं। पुराने जमाने में हमारे बड़े – बूढ़े कहा करते थे, कि जिस मकान में चौक नहीं होते थे उन्हें शुभ फलदायक नहीं माना जाता था। आज कल महानगरों में इतनी जमीन ही नहीं मिल पाती है ।। ऐसे में यह कोशिश करनी चाहिये की फ्लेट, घर का ब्रम्ह स्थान खाली रहे। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार भवन के अन्दर के मध्य भाग को ब्रम्हास्थान कहा गया है जिसका बड़ा महत्व हैं। पुराने जमाने में जितने भी घर बनते थे उन सब में ब्रम्हस्थान खुला छोड़ा जाता था। जिसे चौक कहा जाता था। 
                पहले के समय निर्माण में कोई स्तंभ या कोई साजो सामान नहीं रखा जाता था। वास्तु के अनुसार घर के ब्रम्ह स्थान हमेशा खाली छोडऩा चाहिये। यह स्थान एकदम खाली (पिल्लर या बीम) रहित होना चाहिये। इस स्थल पर किसी भी तरह का निर्माण करवाना घर में रहने वालों के लिए बहुत अशुभ माना गया है। इस जगह को खाली ना छोडऩे पर गृहस्वामी को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। यदि इस जगह को मकान बनाते समय खाली ना छोड़ पाएं तो इस बात का ध्यान रखें की घर में उस जगह पर अधिक वजनदार सामान ना रखे। इसका वैज्ञानिक औचित्य भी है।
  1. ब्रम्हस्थान के खुला रहने पर सूर्य के प्रकाश की किरणे सीधे घर में पड़ती है। वायुमंडल की पूरी उर्जा इस स्थान से होकर पूरे घर में फैलती है। जिससे घर में सुख व समृद्धि आती है। 
  2. रसोईघर कभी घर के मुख्य दरवाजे के सामने ना हो।
  3. शौचालय का स्थान उत्तर-पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए। 
  4. रसोई, पूजा स्थल और शौचालय एक-दूसरे के अगल-बगल में ना हो।
  5. ईशान कोण या उत्तर-पूर्व नीचा और दक्षिण-पश्चिम ऊंचा रहना चाहिए। 
  6. उत्तर-पूर्व कोने में शौचालय या रसोई घर नहीं होना चाहिए। 
  7. उत्तर-पूर्व में कोई बोरिंग भूमिगत पानी या टंकी या किसी प्रकार का गढ्ढा ना हो।। 
 **** कैसे करे आपके नए फ्लेट या घर में ऊर्जा का समन्वय--- 
 वास्तु शास्त्र इन्हीं प्राकृतिक शाक्तियों का अधिक प्रयोग कर अधिकतम सुरक्षा व सुविधा प्रदान करता है। ये प्राकृतिक शाक्तियां अनवरत चक्र से लगातार चलती रही है। 
  1. गुरूत्व बल, 
  2. चुम्बकीय शाक्ति, 
  3. सौर ऊर्जा पृथ्वी में दो प्रकार की प्रावृति शक्तियां हैं।

 (1) गुरूत्व बल, (2) चुम्बकीय शक्ति 

  1. गुरूत्व :- गुरूत्व का अर्थ है पृथ्वी की वह आकर्षण शक्ति जिससे वह अपने ऊपर आकाश में स्थित वजनदार वस्तुओं को अपनी ओर खींच लेती है। उदाहरण के लिए थर्मोकोल व पत्थर का टुकडा। ऊपर से गिराने पर थर्मोकोल देरी से धरती पर आता है जबकि ठोस पत्थर जल्दी आकर्षित करती है। इसी आधार पर मकान के लिए ठोस भूमि प्रशांत मानी गई है। 
  2.  चुम्बकीय शक्ति :- यह प्राकृति शक्ति भी निरन्तर पुरे ब्राह्मण्ड में संचालन करती है। सौर परिवार के अन्य ग्रहों के समान पृथ्वी अपनी कक्षा और अपने पर घुमने से अपनी चुम्बकीय शक्ति को अन्त विकसित करती है। हमारा पुरा ब्रह्मण्ड एक चुम्बकीय क्षेत्र है। इसके दो ध्रुव है। एक उत्तर, दूसरा दक्षिण ध्रुव। यह शक्ति उत्तरसे दक्षिण की ओर चलती है। 
  3.  सौर ऊर्जा :- पृथ्वी को मिलने वाली ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत सूर्य है। यह एक बडी ऊर्जा का केन्द्र है। सौर ऊर्जा पूर्व से पश्चिम कार्य करती है। पंच महाभूतों का महत्व दर्शन, विज्ञान एवं कला से संबंधित प्राय सभी शास्त्र यह मानते है कि मानव सहित सभी प्राणी पंचमहाभूतों से बने हैं। अत: मानव का तन, मन एवं जीवन इन महाभूतों के स्वत: स्फूर्त और इनके असन्तुलन से निश्क्रिय सा हो जाता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं की वास्तु शास्त्र में इन्हीं पॉंच महाभूतों का अनुपात में तालमेल बैठाकर प्रयोग कर जीवन में चेतना का विकास संभव है। (1) क्षिति (2) जल (3) पावक (4) गगन (5) समीरा अर्थात् , पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश।
  4. धरती :- धरती के बिना जीवन एवं जीवन की गतिविधियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। 
  5. जल :- जीवन के लिए जल की आवश्यकता होती है। जल ही जीवन है। इस सृष्टि से यह शास्त्र भवन निर्माण हेतु कुआं, नलकूप, बोरिंग, नल, भूमिगत टंकी, भवन के ऊपर पानी की टंकी आदि का विचार करना। 
  6. अग्नि :- जीवन में पृथ्वी, जल के बाद अग्नि का क्रम आता है। जिस प्रकार मानव जीवन में जब तक ताप है, गर्मी है तब तक जीवन है इसके ठण्डा पडते ही जीवन समाप्त हो जाता है। अग्नि तत्व प्रकाश के रूप में ऊर्जा का संचार कारता है।
  7.  वायु :- वायु की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, वायु के बिना जीवन संभव नहीं है। तब तक वायु सक्रिय व शुद्ध है ? तब तक जीवन है। 
  8. आकाश :- पंचमहाभूतों में आकाश का महत्व कम नहीं है। यह चारों तत्वों में सब से बड़ा और व्यापक है। इसका विस्तार अनन्त है। आकाश ही न होता तो जीवन ही नहीं होता। वास्तु और विज्ञान सूर्य की ऊर्जा को अधिक समय तक भवन में प्रभाव बनाए रखने के लिए ही दक्षिण और पश्चिम भाग की अपेक्षा पूर्व एवं उत्तर के भवन निर्माण तथा उसकी सतह को नीचा रखे जाने का प्रयास किया जाता है। प्रात : कालीन सूर्य रशिमयों में अल्ट्रा वॉयलेट रशिमयों से ज्यादा विटामिन ”डी” तथा विटामिन ”एफ” रहता है।। 

        वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वास्तु शास्त्र में भवन का पूर्वी एवं उत्तरी क्षेत्र खुला रखने का मुख्य कारण यही है कि प्रात:कालीन सूर्य रश्मियाँ आसानी से फ्लेट या भवन में प्रविष्ट हो सकें। इसी प्रकार दक्षिण और पश्चिम के भवन क्षेत्र को ऊचां रखने या मोटी दीवार बनाने के पीछे भी वास्तु शास्त्र का एक वैज्ञानिक तथ्य है। क्योकि जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिण दिशा में करती है तो उस समय पृथ्वी विशेष कोणीय स्थिति लिए होती है। अतएव इस भाग में अधिक भार होने से सन्तुलन बना रहता है और सूर्य के अति ताप से बचा जा सकता है। इस प्रकार इस भाग में गर्मियों में ठण्डक और सर्दियों में गरमाहट बनी रहती है। खिड़कियों और दरवाजें के बारे में भी वास्तु शास्त्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है। 
        इसलिए भवन के दक्षिण या पश्चिम भाग में पूर्व या उत्तर की अपेक्षा छोटे एवे कम दरवाजे खिड़कियाँ रखने के लिए कहा जाता है, ताकि गर्मियों में इस क्षेत्र में कमरों में ठण्डक तथा सर्दियों में गरमाहट महसूसकी जा सके। वास्तु शास्त्र के अनुसार रसोईघर को आगनेय यानी दक्षिण-पूर्व दिशा में रखा जाना चाहिए। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि इस क्षेत्र में पूर्व से विटामिन युक्त प्रात:कालीन सूर्य की रशिमयों तथा दक्षिण से शुद्ध वायु का प्रवेश होता है, क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिणायन की ओर करती है। अत: इस कोण की स्थिति के कारण भवन के इस भाग को विटामिन ”डी” एवं विटामिन ”एफ” से युक्त अल्ट्रा वॉयलेट किरणें अधिक समय तक मिलती हैं। इससे रसोईघर में रखी खाद्य सामग्री लम्बे समय तक शुद्ध रहती है। 
          वास्तु शास्त्र पूजाघर या आराधना स्थल को उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में बनाने के लिए भी वैज्ञानिक तथ्य देता है। पूजा के समय हमारे शरीर पर अपेक्षाकृत कम वस्त्र या पतले वस्त्र होते हैं, ताकि प्रात:कालीन सूर्य रशिमयों के माध्यम से विटामिन ‘डी` हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से प्रविष्ट हो सके। उत्तरी क्षेत्र में हमें पृथ्वी की चुम्बकीय ऊर्जा का अनुकूल प्रभाव प्राप्त होता है। इस क्षेत्र को सबसे अधिक पवित्र माना गया है, क्योंकि इसके द्धारा अंतरिक्ष से अलौकिक शक्ति प्राप्त होती है। 
        यही मुख्य कारण है कि मंदिरों एवं साधना स्थलों के प्रवेश द्वार इन्हीं दिशाओं में बनाए जाते हैं। हमारे वायुमण्डल में 20 प्रकार के मैग्नेटिक फील्ड पाए जाते हैं वैज्ञानिकों के मतानुसार, इनमें से चार प्रकार के मैग्नेटिक फील्ड हमारी शारीरिक गतिविधियों को ऊर्जा प्रदान करने में अत्यंत सहायक होते हैं। वास्तु शास्त्र ने भी अपने क्रिया-कलापों में इनकी व्यापक सहायता ली है। बिना तोड़-फोड़ के वास्तु सुधार आजकल पूर्व निर्मित गृह को वास्तु अनुसार करने हेतु तरह-तरह की सलाह दी जाती है जो ठीक जो है लेकिन उसको कार्य रूप देना हर परिवार या इंसान के लिए एक कठिन कार्य हो गया है। 
      वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विज्ञान ने आज बहुत ज्यादा उन्नति कर ली है उसी तरह वास्तु विज्ञान में भी आज बिना किसी तोड़-फोड़ किए उसमें सुधार करने के नए-नए तरीके सुझाये जा सकते हैं। उपरोक्त वास्तु दोषों के मूल निवारक इस प्रकार हैं :-
  1. वास्तु शांति यज्ञ।।
  2. वास्तु दोष निवारक यन्त्र। 
  3. सिद्ध गणपति स्थापना।
  4. पिरामिड यन्त्र। 
  5. हरे पौधे। 
  6. दर्पण। 
  7. प्रकाश। 
  8. शुभ चिन्ह। 
  9. जल। 
  10. क्रिस्टल बाल। 
  11. रंग। 
  12. घंटी। 
  13. बांसुरी । 
  14. स्वास्तिक यन्त्र।
  15. फिश एक्वएरियम्। 
  16. शंख। 

दैनिक अग्निहोत्र। पहले हमें वास्तु दोषों को समझना होगा ।।। ये निम्न प्रकार के होते हैं :- 
  1. भूमि दोष :- भूमि का आकार, ढ़लान उचित न होगा। भूखण्डकी स्थिति व शल्य दोष इत्यादि।।
  2. भवन निर्माण दोष :- पूजा घर, नलकूप, (जल स्त्रोत), रसोई घर, शयनकक्ष, स्नानघर, शौचालय इत्यादि का उचित स्थान पर न होना। 
  3. भवन साज-सज्जा दोष :- साज-सज्जा का सामान व उचित चित्र सही स्थान पर न रखना। 
  4. आगुन्तक दोष :- यह नितांत सत्य है कि आगुन्तक दोष भी कभी-कभी आदमी की प्रगति में बाघा उत्पन्न करता है वह उसको हर तरह से असहाय कर देता है। इस दोष से बचने हेतु मुख्य द्वार पर सिद्ध गणपति की स्थापना की जा सकती है। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार उपरोक्त दोषों को किसी अनुभवी वास्तु शास्त्री से सम्पर्क कर आसानी से वास्तु दोषों का हल जाना जा सकता है।

जानिए की वास्तु द्वारा केसे सुधारें/ संवारें सास बहू के रिश्ते.

अकसर परिवारों में सास-बहू, भाई-बहन, भाभी, माता-पिता के टकरावों के बारें में हम सुनते है. किसी परिचित परिवार में यदि ऐसा अलगाव दिखता है तो मन में बहुत दुःख होता है.किसी का वश नहीं चलता हम अपने ही सामने अपने मित्र या सम्बन्धी व रिश्तेदार का परिवार जो कुछ समय पहले शांत तथा मिलजुल के रहने वाला था किन्तु आज पल भर में ही बिखर गया.इसमें किस की गलती है या किस की नहीं यह तो सोचने से बाहर की बात हो गयी चाहे कुछ हो एक घर जो बड़ी मुश्किलों से बनता है आज उसे हम बिखरता हुआ देख रहे है.--- 
 ——-क्या कारण है कि पल भर में ही ऐसा हो रहा है. इसका उत्तर केवल वास्तु शास्त्र में ही वर्णित है यदि हम इस वास्तु के नियम अनुसार चलते है तो यह स्थिति पुनः नहीं दिखाई देगी. और सास-बहू के रिश्तों को मधुर बनाया जा सकता है. जन्मकुंडली के मिलान के समय हम केवल युवक एवं युवती की राशि,नक्षत्र व गण भकूट और नाडी का ही मिलान करते है किन्तु परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलान की व्यवस्था हमारे पास उपलब्ध नही है. इसी कारण से हम विपरीत परिणाम देखते है.
           नये मकान के निर्माण की जानकारी देने के लिए, प्लॉट की दिशाओं का सही निर्धारण करने के साथ, प्लॉट के आस-पास की भौगोलिक वास्तु स्थिति, निर्माण करवाते समय आप जिस मकान में रह रहे हैं, उस मकान की वास्तु स्थिति तथा आपकी आर्थिक सामर्थ्य एवं आवश्यक्ताओं का भी ध्यान रखना पड़ता है। मकान का निर्माण अगर वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत हो गया तो, उस नव-निर्मित मकान में पैदा होने वाले वास्तु-दोषों के दुष्परिणाम, उस मकान में निवास करने वालों के जीवन को समस्याग्रस्त स्थिति में परिवर्तित कर देंगे, क्योंकि आपका वर्तमान और भविष्य, आपके मकान की वास्तु के आधार पर ही प्रभावित होगा। 
               मकान जीवन में बार-बार नहीं बनाए जाते हैं, अत: इतना चिंतन अवश्य करें कि मकान के निर्माण में एक कुशल व अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ का मार्गदर्शन आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सक्षम होगा। आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। किंतु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए हमें वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा। 
 —-वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार घर / भवन में पारिवारिक सदस्यों को कहां कहां रहना व सोना चाहिए जिससे उनके आपस में सम्बन्ध मधुर हो. वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार परिवार का मुखिया दक्षिण-पश्चिम कोण में सोना चाहिए.इस कोण में होने से आत्म विशवास बड़ता है. तथा वह निर्णय लेने में समर्थ होता है दक्षिण में सिर करके होने से व्यक्ति में नेतृत्व कि क्षमता बडती है.यदि दक्षिण में सिर करने की सुविधा न हो तो पूर्व दिशा में सिर करके तथा पश्चिम में पैर करके भी शयन किया जा सकता है.
 —-परिवार का जो भी सदस्य यदि दक्षिण-पश्चिम में निवास करता है तो वह घर में प्रभावशाली हो जाता है अत: स्पष्ट है कि घर के मुखिया उसकी स्त्री को घर के दक्षिण-पश्चिम में निवास करना चाहिये. तथा कनिष्ठ स्त्री-पुरुष, देवरानिया या बहू को शयन नहीं करना चाहिये.
 —–जो स्त्रियां घर के वायव्य उत्तर-पश्चिम कोण में शयन / निवास करती है उनके मन में उच्चाटन का भाव आने लगता है वह अपने अलग से घर बसाने के सपने देखने लगती है. इस लिए इस कोण में अविवाहित कन्याओं को निवास करना शुभ होता है जिससे उनका विवाह शीघ्र हो. 
 —वायव्य कोण में नई दुल्हन को तो बिलकुल मत रखे इससे उसका परिवार के साथ अलगाव रहेगा.
 —-वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार दक्षिण-पश्चिम कोण दिशा घर की सबसे शक्तिशाली होती है इसमें सास को सोना चाहिए अगर सास ना हो तो घर की बड़ी बहू को सोना चाहिए उससे छोटी को पश्चिम दिशा में रहना चाहिए उससे भी छोटी तीसरे नम्बर की बहु को पूर्व दिशा में शयन करना चाहिए यदि और भी चोटों बहू हो तो उसे ईशान कोण में निवास रखना चाहिए. 
 —–अगर आपका पूजा घर सीढियों के निचे बना हुआ है तो बहुत गलत है,इसके क्या दुषप्रभाव है जानिये —- —-बहु और सास में झगडे होते हैं 
—आपके पड़ोसियों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहेंगे 
—आपके घर में शादी विवाह में रुकावट आएगी 
—आपके घर में अशांति रहेगी,इस लिए सीढियों के निचे अपने घर में पूजा घर ना बनाइये
 —दक्षिण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के बायीं और शयन करना चाहिए अग्नि कोण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के दायी और शयन करना चाहिए 
—-ग्रहस्थ सांसारिक मामलों में पत्नी को हमेशा पति के बायीं और ही शयन करना चाहिए . 
—परिवार की मुखिया सास या बड़ी बहू को कभी भी ईशान कोण में नहीं सोना चाहिए इससे परिवार में प्रभाव कम हो कर हास्यास्पद स्थिति रहती है वृद्धावस्था में अग्नि कोण में रह सकती है 
—हमेशा इस बात का ध्यान रखे कि उत्तराभिमुख घर में उत्तर दिशा से ईशान कोण तक, पूर्वाभिमुख घर में पूर्व दिशा मध्य से अग्नि कोण पर्यन्त, दक्षिणाभिमुख मकान में दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम कोण तक तथा 
—-पश्चिम मुख मकानों में पश्चिम दिशा से वायव्य कोण तक यदि बाह्य द्वार न रखा जाय तो घर की सभी स्त्रियां आपस में समन्वय व प्रेम की और अग्रसर हो कर सुख की अनुभूति करती है तथा परिवार में सुख समृधी बडती है. 
—यही कारण हें कि आज के युग में यदि हम प्रक्टिकल वास्तु अपनाते है तो जीवन में किसी भी प्रकार के कष्ट से बिना यंत्र-मन्त्र-तंत्र से छुटकारा पा कर उन्नति के मार्ग में चल सकते है. 
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सास-बहु के बीच कलेश दूर करने के उपाय—— 
 —आपस में शांति/सुलह हेतु उपाय—— 
 ------गाय के गोबर का दीपक बनाकर उसमें गुड़ तथा मीठा तेल डालकर जलाएं। फिर इसे घर के मुख्य द्वार के मध्य में रखें। इस उपाय से भी घर में शांति बनी रहेगी तथा समृद्धि में वृद्धि होगी।
 —— एक नारियल लेकर उस पर काला धागा लपेट दें फिर इसे पूजा स्थान पर रख दें। शाम को उस नारियल को धागे सहित जला दें। यह टोटका 9 दिनों तक करें। 
—- घर में तुलसी का पौधा लगाएं तथा प्रतिदिन इसका पूजन करें। सुबह-शाम दीपक लगाएं। इस उपाय को करने से घर में सदैव शांति का वातावरण बना रहेगा। 
—– अगर घर में सदैव अशांति रहती हो तो घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर श्वेतार्क (सफेद आक के गणेश) लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहेगी। 
—- यदि किसी बुरी शक्ति के कारण घर में झगड़े होते हों तो प्रतिदिन सुबह घर में गोमूत्र अथवा गाय के दूध में गंगाजल मिलाकर छिड़कने से घर की शुद्धि होती है तथा बुरी शक्ति का प्रभाव कम होता है। 
—-घर के बर्तन के गिरने टकराने की आवाज न आने दें। 
—-घर सजाकर सुन्दर रखें।
 —-बहू को चाहिए की सूर्योदय से पहले घर में झाडू लगाकर कचड़े को घर के बाहर फेंके।
 —-पितरों का पूजन करें। 
—-प्रतिदिन पहली रोटी गाय को एवं आखरी रोटी कुत्ते को खिलाऐं। 
—-ओम् शांति मन्त्र का जाप सास-बहू दोनों 21 दिन तक लगातर 11-11 माला करें।
 —-रोटी बनाते समय तवा गर्म होने पर पहले उस पर ठंडे पानी के छींटे डाले और फिर रोटी बनाएं।
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वास्तुदेवता सभी देवशक्तियों का स्वरूप होने से ही नियमित देव पूजा में विशेष मंत्र से वास्तुदेव का ध्यान वास्तु दोष को दूर करने के लिए आसान उपाय माना गया है, जो घर में बिना किसी तोड़-फोड़ किए भी कारगर हो सकता है। 
जिसे इस तरह अपनाएं – हर रोज इष्ट देव की पूजा के दौरान हाथों में सफेद चन्दन लगे सफेद फूल व अक्षत लेकर वास्तुदेव का नीचे लिखे वेद मंत्र से ध्यान कर घर-परिवार से सारे कलह, संकट व दोष दूर करने की कामना करें व फूल, अक्षत इष्टदेव को चढ़ाकर धूप, दीप आरती करें – वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो: भवान्। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।। ऋग्वेद के इस मंत्र का सरल शब्दों में अर्थ है – हे वास्तु देवता, हम आपकी सच्चे हृदय से उपासना करते हैं। हमारी प्रार्थना को सुन आप हमें रोग-पीड़ा और दरिद्रता से मुक्त करें। हमारी धन-वैभव की इच्छा भी पूरी करें। वास्तु क्षेत्र या घर में रहने वाले सभी परिजनों, पशुओं व वाहनादि का भी शुभ व मंगल करें। 
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        यदि आप अपने जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं.. ===यदि आप भी परेशान हैं तो एक बार अपने घर के वास्तु दोषों पर ध्यान देकर जरुर विचार करें।

क्या वास्तु दोष के कारण होते हैं महिलाओं एवं पुरुषों के रोग.

आइये जाने की किन वास्तु दोष के कारण होते हैं महिलाओं एवं पुरुषों के रोग--- वास्तु शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ: समरांगण सूत्रधार, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश, नारद संहिता, बृहतसंहिता, वास्तु रत्नावली, भारतीय वास्तु शास्त्र, मुहूत्र्त मार्तंड आदि वास्तुज्ञान के भंडार हैं। अमरकोष हलायुध कोष के अनुसार वास्तुगृह निर्माण की वह कला है, जो ईशान आदि कोण से आरंभ होती है और घर को विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों और उपद्रवों से बचाती है। 
           ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा जी को संसार निर्माण के लिए नियुक्त किया था। इसका उद्देश्य था कि गृह स्वामी को भवन शुभफल दे, पुत्र, पौत्रादि, सुख, लक्ष्मी, धन और वैभव को बढ़ाने वाला हो। वास्तु दोष से मुक्ति के लिए पंचतत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश चारों दिशाएं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा चारों कोण नैत्य, ईशान, वायव्य, अग्नि एवं ब्रह्म स्थान (केंद्र) को संतुलित करना आवश्यक है। देखने में आ रहा है कि आजकल पुरूषों को पहले की तुलना में ज्यादा शारीरिक एवं मानसिक रोग हो रहे है। यह तय कि विज्ञान ने बहुत उन्नति की है।
            मेडिकल सांईस के कई अविष्कार मनुष्य के जटिल रोगों को दूर करने में सहायक हो रहे है। किंतु विज्ञान आधुनिक चिकित्सा की इतनी तरक्की के बाद भी मनुष्य के रोग घटने की बजाए, बढ़ते ही जा रहे है। आज नई-नई और असाध्य बीमारियां जन्म ले रही है प्रायः हर व्यक्ति किसी ना किसी रोग से पीडि़त है। आधुनिक तकनीकों के कारण आजकल छोटे या बड़े भवनों की बनावट पहले के भवनों की तुलना में सुंदर व भव्य तो जरूर हो गई हैं, परंतु अब भवन आयताकार या चैकर न होकर अनियमित आकार के बनने लगे है। घरों की अनियमित आकार की बनावट के कारण ही उनमें वास्तुदोष उत्पन्न होते है। जो वहां रहने वालों को शारीरिक व मानसिक रोगी बनाने में अहम भूमिका निभाते है। 
       यह एक अटल सत्य हे की वास्तु का रोगों से अभिन्न संबंध है। किसी भी भवन में उत्तर पूर्वी भाग का संबंध जल तत्व से होता है अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से किसी भी मानव के शरीर में जल तत्व के असंतुलित होने से अनेक व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। अतः उत्तर पूर्व को जितना खुला एवं हल्का रखेंगे उतना ही अच्छा है इस दिशा में रसोई का निर्माण अशुभ है रसोई निर्माण करने पर उदर जनित रोगों का सामना करना पड़ता है परिवार के सदस्यों में तनाव बना रहता है इस दिशा में यदि भूमिगत जल भण्डारण की व्यवस्था हो तो घर में आने वाली जलापूर्ति की पाइप भी इसी दिशा में होना शुभ है। 
           भवन में ईशान कोण कटा हुआ नहीं होना चाहिए। कोण कटा होने से भवन में निवास करने वाले व्यक्ति रक्त विकार से ग्रस्त हो सकते है यौन रोगों में वृद्धि होती है प्रजनन क्षमता दुष्प्रभावित होती है। ईशान कोण में यदि उत्तर का स्थान अधिक ऊंचा है तो उस स्थान पर रहने वाली स्त्रियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ईशान के पूर्व का स्थान ऊंचा होने पर पुरुष दुष्प्रभावित होते हैं परिवार का कोई सदस्य बीमार हो तो उसे ईशान कोण में मुंह करके दवा का सेवन कराने से जल्दी स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
          भवन के दक्षिण-पूर्व दिशा का संबंध अग्नि तत्व से होता है जिसे अग्नि कोण माना गया है। इस दिशा में रसोई का निर्माण करने से निवास करने वाले लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहता है अगर इस दिशा मंे जल भण्डारण या जल स्त्रोत की व्यवस्था की जाती है तो उदर रोग, आंत संबंधी रोग एवं पित्त विकार आदि बीमारियों की संभावना रहती है। 
 दक्षिण-पूर्वी दिशा में दक्षिण का स्थान अधिक बढ़ा हो तो परिवार की स्त्रियों को शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं। 
पूर्वी दिशा में दक्षिण का स्थान अधिक बढ़ा हो तो परिवार की स्त्रियों को शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं। पूर्व का स्थान बढ़ा हुआ होने से पुरुषों को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 
 दक्षिण-पश्चिम भाग का संबंध पृथ्वी तत्व से होता है अतः इसे ज्यादा खुला नहीं रखना चाहिए इस स्थान को हल्का व खुला रखने से अनेक प्रकार की शारीरिक बीमारियों एवं मानसिक व्याधियों का शिकार होना पड़ता है। निवास करने वाले सदस्यों में निराशा तनाव एवं क्रोध उत्पन्न रहता है अतः इस स्थान को सबसे भारी रखना श्रेष्ठकर है यह भाग भवन के अन्य भागों से कटा हुआ नहीं होना चाहिए वरना मधुमेय की बीमारी, ज्यादा सोचना अतिचेष्टा तथा अति जागरुकता जैसी व्याधियां उत्पन्न होती हैं। दक्षिण-पश्चिम में दक्षिण का भाग अधिक बढ़ा हुआ अथवा नीचा हो तो उसमें निवास करने वाली स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है पश्चिमी भाग अगर अधिक बढ़ा हुआ और अधिक नीचा हो तो पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। 
         अतः दक्षिण-पश्चिम के कोण को न तो बढ़ायें और न छोटा करें। इस स्थान को भवन में सबसे ज्यादा भारी रखना शुभ है। भवन के उत्तर-पश्चिम भाग वायव्य कोण का संबंध वायु तत्व से होता है मानव के प्राणों का वायु से सीधा संबंध है अतः इस स्थान को खुला रखना शुभ है इस स्थान में भारी सामान नहीं रखना चाहिए एवं भारी निर्माण भी नहीं करवाना चाहिए। भारी निर्माण करवाने से वायु विकार तथा मानसिक रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इसके धरातल का उत्तर -पूर्व के अपेक्षा थोड़ा ऊंचा किंतु दक्षिण-पूर्व एवं दक्षिण-पश्चिम से कुछ नीचा होना शुभ है। भवन के इस भाग में ऊपर का स्थान अधिक बड़ा होने से परिवार की स्त्रियों को त्वचा संबंधी रोग जैसे एग्जिमा, एलर्जी आदि बीमारियों की संभावना रहती है। यदि उत्तर की अपेक्षा यदि पश्चिम का स्थान अधिक बढ़ा हुआ हो तो पुरुषों को शारीरिक व्याधियां होने की संभावना रहती है। वास्तु शास्त्र में भवन के मध्य या केंद्र ब्रह्म स्थान को अति महत्वपूर्ण माना गया है। 
          वास्तु में इसका वही महत्व है जो मानव शरीर में नाभि का होता है। आकाश तत्व से संबंधित होने के कारण इस स्थान को खुला छोड़ना श्रेयस्कर होता है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार की गंदगी होने से निवास करने वाले प्राणियों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं इस स्थान पर विशेषकर शौचालय सीढ़ियां अथवा गटर, सैप्टिक टैंक आदि का निर्माण नहीं कराना चाहिए अन्यथा श्रवण दोष पैदा होते हैं एवं विकास कार्य प्रभावित होते हैं ब्रह्म स्थान खुला रखने से अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
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इन मुख्य वास्तु दोषी के कारन होते हैं पुरुषों एवं महिलाओं में रोग (बीमारियां)---- 
 आइये जानते हे (देखते है) कि वह कौन से ऐसे महत्वपूर्ण वास्तुदोष है जिसके कारण पुरूषों में विभिन्न प्रकार के रोग पैदा होते है जो कभी-कभी उनका जीवन भी लील लेते है। 
 ------- यदि घर का नैऋत्य कोण (SW), विशेषतौर पर पश्चिम नैऋत्य (West of the South West) किसी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का टैंक, कुआ, बोरवेल, सैप्टिक टैंक इत्यादि हो तो वहां रहने वाले पुरूष सदस्य अक्सर रोगों से पीडि़त रहेगें और उन्हें मृत्यु-भय बना रहेगा। 
 ------ अगर नैऋत्य कोण पर ऊँचाई पर हो, और दक्षिण और नैऋत्य के बीच में या नैऋत्य और पश्चिम के बीच में कुएं, गड्ढे या चैम्बर खोदे जायें या मोरी बनायी जाय तो उस घर का मालिक ऐसी बीमारी से पीडि़त हो जाएगा जिसका इलाज नहीं हो। 
 --------पूर्व दिशा में खाली जगह न हो और पश्चिम दिशा की ओर बरामदे को ढलाऊ बनाकर घर बना हो तो वहां रहने वालो को आंखों की बीमारी, लकवा आदि बीमारियां होती है।
 ------- दक्षिण दिशा की ओर घर का द्वार हो और पूर्व-उत्तर की हद तक निर्माण किया गया हो तथा पश्चिम में खाली जगह हो और प्लाट में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर ढलान हो, पश्चिम में भूमिगत पानी का स्रोत हो तो ऐसे घर का मालिक अल्पायु में ही भयंकर रोगों का शिकार होगा। 
 -------- नैऋत्य (SW) या पश्चिम-नैऋत्य (West of the South West) में कम्पाऊण्ड वाल या घर का द्वार हो तो घर के लोग बदनामी, जेल, एक्सीडेंट या खुदकुशी के शिकार होंगे। हार्ट अटैक, आपरेशन, एक्सिडेन्ट, हत्या, लकवा अर्थात किसी भी प्रकार की असामयिक मृत्यु का शिकार होगें। 
 -------- पूर्व, आग्नेय कोण, दक्षिण, पश्चिम, नैऋत्य कोण और वायव्य कोण, उत्तर और ईशान कोण से किसी भी प्रकार से नीचे हो तो घर के स्वामी की पत्नी का निधन हो जाएगा। उसे आर्थिक समस्याएं आएगी और अंत में उसकी जीवन यात्रा भी समाप्त हो जाएगी। वह लाईलाज बीमारी से पीडि़त होगा। 
 ------- घर के पश्चिम नैऋत्य (West of the South West) मार्ग प्रहार हो तो घर के पुरूष उन्माद जैसे रोगों की शिकार होंगे। कहीं कहीं वे खुदकुशी भी कर सकते है। 
 ------- जिस घर का पश्चिम नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ हो उस घर के पुरूषों को लम्बी बीमारियों या उनकी दर्दनाक मौत की संभावना बनती है। 
 ----- बड़े आकार के वह बंगले जिसके पश्चिम भाग में कम्पाऊण्ड वाल के अंदर झोपडि़यां, कमरे, चबूतरे इत्यादि के फर्श गृहगर्भ के स्तर से नीचे हो तो बीमारी, बदनामी और धनहानि होती है।
 ------- पूर्व, आग्नेय और दक्षिण नीचे हो नैऋत्य, पश्चिम और वायव्य कोण उत्तर और ईशान से ऊँचे हों तो घर के मालिक की मृत्यु होगी, पुत्रों का नाश होगा। 
 ------- दक्षिण के साथ मिलकर अगर नैऋत्य में बढ़ाव होता तो मालिक रोगों, प्राण-भय और अकाल मृत्यु के भय से परेशान रहेगा। 
 ------किसी घर के आंगन से पानी नैऋत्य की ओर से बाहर बहकर जाता है तो उस घर में अनहोनी की संभावना रहती है। 
 --------- ऊपर बताए गए वास्तु दोषों के साथ सभी या कुछ दोषों के होने के बाद भी कुछ खुशहाल परिवार देखने में आते है। इसका कारण यह है कि जब घर का ईशान कोण कट जाता है या पूर्व व उत्तर की सड़कों के कारण उस स्थल का ईशान कोण कट गया हो, तो ऐसे में नैऋत्य में रहने वाले की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। परंतु ऐसे घरों में रहने वाले केवल पैसे को महत्व देते हुए अभिमान के कारण दूसरो की इज्जत करना, प्रेमपूर्वक व्यवहार रखना भूल जाते है। 
       निश्चित ही हत्या करने वाले, हत्या और आत्महत्या के शिकार हुए लोग, दुर्घटनाओं में मरने वालों दीर्घव्याधिग्रस्तों के घरों की बनावट में यह दोष अवश्य होता है। उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर कर पुरूषों को होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। वास्तुदोष होने पर उनका निराकरण केवल वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए और उसका एकमात्र तरीका घर की बनावट में वास्तुनुकुल परिवर्तन कर वास्तुदोषों को दूर किया जाए।
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इन वास्तुदोषों का प्रभाव होता हैं महिलाओं के स्वास्थ्य पर ---- 
आजकल की महिलाओं का स्वास्थ्य चार-पांच दशक पहले की महिलाओं की तुलना में ज्यादा खराब रहने लगा है। रहन-सहन, खान-पान इत्यादि हर प्रकार की सावधानियां बरतने के बाद भी महिलाओं में रोग बढ़ते ही जा रहे है। वास्तु का रोगों से अभिन्न संबंध है। आजकल बनने वाले घरों की बनावट में बहुत ज्यादा वास्तुदोष होते है। पिछले कुछ दशकों से आर्किटेक्ट मकानों को सुंदरता प्रदान करने के लिए अनियमित आकार के मकानों को महत्त्व देने लगे है। जिस कारण मकान बनाते समय जाने-अनजाने वास्तु सिद्धांतों की अवहेलना होती रहती है। चाहे महिला हो या पुरूष उनकी हर प्रकार की बीमारी में वास्तुदोष की भी अपनी एक महत्त्व भूमिका अवश्य रहती है। वास्तुदोष के कारण घर में सकारात्क और नकारात्क ऊर्जा के बीच असंतुलन पैदा हो जाता है। जो महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके जीवन पर भी प्रभाव डालता है। देखते है ऐसे कौन से वास्तु दोष है जो घर में ऊर्जा के असंतुलन का कारण बनते है। 
 ---------जिस घर का आगे का भाग टूटा हुआ, प्लास्टर उखड़ा हुआ या सामने की दीवार में दरार, टूटी फूटी या किसी प्रकार से भी खराब हो रही हो उस घर की मालकिन का स्वास्थ्य खराब रहता है उसे मानसिक अशान्ति रहती है और हमेशा अप्रसन्न उदास रहती हैं। 
 --------- किसी घर का नैऋत्य कोण (SW), विशेषतौर पर दक्षिण नैऋत्य (South of the South West) किसी भी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का टैंक, कुआ, बोरवेल, सैप्टिक टैंक इत्यादि हो तो वहां रहने वाली महिलाएं सदस्य अक्सर रोगों से पीडि़त रहेगी और उन्हें मृत्यु-भय बना रहेगा। ---------उत्तर (North) और ईशान (North east) ऊँचा हो और बाकी सभी दिशाए व कोण पूर्व (East), आग्नेय (South east), दक्षिण (South), पश्चिम (West), नैऋत्य (South west) और वायव्य (North west) नीचे हो तो घर की स्त्री को लाईलाज बीमारी होती है और असामयिक मृत्यु की संभावना प्रबल हो जाती है। 
 -------अगर उत्तर, ईशान और पूर्व से नैऋत्य और पश्चिम निचले हो तथा आग्नेय, दक्षिण और वायव्य ऊँचे हो तो जबरदस्त आर्थिक हानि होगी उस घर का मालिक कर्ज से परेशान होगा। उसकी पुत्री व पत्नी लम्बी बीमारियों से पीडि़त होगी। 
 --------उत्तर, ईशान और पूर्व से नैऋत्य, पश्चिम और वायव्य निचले, आग्नेय और दक्षिण ऊँचे होने पर उस घर के मालिक की पत्नी की या तो असामयिक मृत्यु हो जाएगी या वह लम्बी बीमारी से परेशान रहेगी। ऐसे बने घर में हमेशा बीमारी, कलह, शत्रुता बनी रहती है। 
 -------घर का आग्नेय नीचा हो, और आग्नेय और पूर्व के बीच में या आग्नेय और दक्षिण के बीच में कुओं, पानी का टैंक, सैप्टिक टैंक, बोरवेल या मोरियां बनायी जाएं तो घर के सदस्यों को दीर्घकालिन व्याधियां होंगी विशेषतौर पर घर के मालिक की पत्नी दीर्घ व्याधि से पीडि़त होगी। 
 ------ ईशान कोण स्थित घर की उत्तर ईशान दिशा की लम्बाई घटे और उत्तरी हद तक निर्माण किया गया हो तो घर की मालकिन रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी अथवा आर्थिक कठिनाईयों से परेशान होकर कठिन जीवन व्यतीत करेगी। 
 -------घर के दक्षिण नैऋत्य (South of the South West) मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां उन्माद जैसे रोगों की शिकार होंगी। कहीं कहीं वे खुदकुशी भी कर सकती है। 
 ------- दक्षिण नैऋत्य मार्गप्रहार से उस घर की नारियां भयंकर रोगों से पीडि़त होंगी। इसके साथ नैऋत्य में कुआं, बोरवेल, भूमिगत पानी की टंकी अर्थात् किसी भी प्रकार से नीचा हो तो वे आत्महत्या कर सकती है या लम्बी बीमारी से उनकी मृत्यु हो सकती है। 
 -------- जिस घर का दक्षिण नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ हो उस घर की स्त्रियों को लम्बी बीमारियों या उनकी दर्दनाक मौत की संभावना बनती है। 
 ---उत्तर वायव्य में मार्ग प्रहार हो तो उस घर की स्त्रियां बीमार रहेगी। उत्तर वायव्य मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां न केवल बीमार होंगी, बल्कि घर वाले अनेक प्रकार के व्यसनों के शिकार होंगे। 
 --पूर्व दिशा में मुखद्वार हो और उत्तर दिशा की हद तक निर्माण किया हो, दक्षिण में खाली स्थल हो तथा नैऋत्य अगे्रत हो, तो उस घर की स्त्रियां दुर्घटनाग्रस्त होंगी। 
 ----दक्षिण में घर का मुख्यद्वार हो और ईशान कोण तक भवन निर्माण किया गया हो दक्षिण दिशा खुली हो और वहां ढलाऊ बरामदा बनाया जाये तो ऐसे घर की मालकिन लाइलाज बीमारी से परेशान रहेगी। उस घर के बच्चे भी गलत रास्तों पर चलेंगे। 
 ------घर के दक्षिण दिशा में अहाते का होना या खुला होना या सभी कमरों व बरामदों में दक्षिण का भाग नीचा हो तो उस घर की स्त्रियां सदैव रोगी रहती है, ऐसे घरों में अकाल मृत्यु की संभावना रहती है। परिवार में आर्थिक कष्ट रहता है। 
 ------किसी घर के आंगन से पानी दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण की ओर से बाहर बह जाता तो उस घर की स्त्रियों के स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं होता है। उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर कर महिलाओं को होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। वास्तुदोष होने पर उनका निराकरण केवल वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए और उसका एकमात्र तरीका घर की बनावट में वास्तुनुकुल परिवर्तन कर वास्तुदोषों को दूर किया जाए।
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 ध्यान दीजिये ,वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन न करने से निम्न लिखित रोग हो सकते हैं--- 
 पूर्व दिशा में दोष: यदि पूर्व दिशा का स्थान ऊंचा हो, तो गृह स्वामी गरीब होगा और उसकी संतान अस्वस्थ, मंदबुद्धि, पेट और यकृत की रोगी रहेगी।
 - यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढाल पश्चिम दिशा की ओर हो, तो जातक आंखों की बीमारी से ग्रस्त और लकवे का शिकार होगा। 
- घर के पूर्वी भाग में कूड़ा-कचरा, पत्थर और मिट्टी के ढेर हांे, तो संतान हानि हो सकती है। 
- घर के पश्चिम में नीचा, या रिक्त स्थान हो, तो गृह स्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर की बीमारी से अल्प काल में मृत्यु को प्राप्त होगा। 
- यदि पूर्व की दीवार पश्चिम की दीवार से ऊंची हो, तो संतान की हानि होगी। 
- यदि पूर्व में शौचालय हो, तो घर की बहू-बेटियां अस्वस्थ रहेंगी। 
बचने के उपाय: - 
पूर्व में पानी, पानी की टंकी, टोंटी और कुआं लगाना शुभ है। 
- पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है। यह काल पुरुष का मुख है। पूर्वी फाटक पर ‘सूर्य यंत्र’ स्थापित करें और वास्तु मंगलकारी तोरण लगाएं। 
- पूर्वी भाग नीचा और खाली होने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगे। धन और वंश की वृद्धि होगी तथा यश और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। पश्चिम दिशा में दोष: पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है। यह काल पुरुष का पेट, गुप्तांग एवं प्रजनन अंग है। 
- यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो फेफड़े, मुख, छाती और चमड़ी के रोग होने की संभावना होगी। 
- यदि पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो पुरुष संतान अस्वस्थ होगी। यदि पश्चिमी भाग का जल, या वर्षा का जल पश्चिम से हो कर, बाहर जाए तो पुरुष लंबी बीमारियों के शिकार होंगे।
 - यदि मुख्य द्वार पश्चिम दिशा वाला हो, तो घर के लोग बीमार रहेंगे। 
- यदि पश्चिम दिशा में दरारें हों, तो गृह स्वामी के गुप्तांग में बीमारी होगी
। - यदि पश्चिम में अग्नि स्थान हो, तो गर्मी, पित्त और मस्से की शिकायतें हांगी। बचने के उपाय: घर में ‘वरुण यंत्र’, स्थापित करें। शनिवार को व्रत रखें और काले दान करें। पश्चिम की चारदीवारी ऊंची रखें। भारी वृक्ष लगाएं। पश्चिम में ढाल न रखें। 
उत्तर दिशा में दोष: - 
यदि उत्तर दिशा ऊंची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बीमारियां, थकावट, घुटने की बीमारियां बनी रहेंगी। 
- उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है। यह काल पुरुष का हृदय है। कुंडली का चतुर्थ भाव इसका कारक स्थान है। 
- यदि उत्तर दिशा उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियां रुग्ण हो जाएंगी। बचने के उपाय: यदि उत्तर में बरामदे की ढाल हो, तो स्वास्थ्य लाभ होगा और आयु में वृद्धि होगी।, पूजा घर में ‘बुध यंत्र’ स्थापित करें। बुधवार का व्रत रखें।, घर के प्रवेश द्वार पर संगीतमय घंटियां लगाएं। घर की दीवारों को हरे रंग का बनाएं। घर में तोता पालना शुभ है।
 - दक्षिण दिशा के दोष: -
 दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है। यह काल पुरुष का बायां सीना, बायां फेफड़ा और गुर्दा होता है। जन्मकुंडली का दशम भाव इसका कारक स्थान है। 
- यदि घर के दक्षिण में कुआं, दरार, कचरा, कूड़ादान, पुराना कबाड़ हों, तो गृहस्वामी को हृदय रोग, जोड़ों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आंखों की बीमारी और हाजमे की खराबी आदि हो सकते हैं। 
- दक्षिण में उत्तर से कम ऊंचा चबूतरा हो, तो जातक हृदय और आंखों के रोगों से पीड़ित होगा। 
- यदि दक्षिण द्वार नैर्ऋत्याभिमुख हो, तो दीर्घ व्याधियां, एवं अचानक मृत्यु देने वाला हो। 
- यदि दक्षिण भाग नीचा हो ओर उत्तर से अधिक खाली स्थान हो, तो घर की महिलाएं सदा अस्वस्थ रहेंगी। वे उच्च रक्तचाप, चोट, पाचन क्रिया की गड़बड़ी मासिक-धर्म में दोष, खून की कमी, अचानक मृत्यु, या दुर्घटना की शिकार होंगी। दक्षिण पिशाच का निवास है। इसलिए थोड़ी जगह खाली रख कर घर का निर्माण करवाएं। 
- यदि दक्षिण में कुआं, या जल हो, तो अचानक दुर्घटना से मृत्यु होगी। बचने के उपाय: यदि दक्षिण भाग ऊंचा हो, तो घर के लोग स्वस्थ एवं संपन्न होंगे। वास्तु मंगलकारी तोरण लगावें। हनुमान जी की उपासना करें। दक्षिणमुखी घर का जल उत्तर-पूर्व दिशा से हो कर बाहर निकले, तो स्वास्थ्य लाभ होगा। दक्षिण द्वार पर ‘मंगल यंत्र’ लगावें। दक्षिण में कमरे ऊंचे बनवाएं। घर के मुख्य फाटक के अंदर-बाहर दक्षिणावर्ती सूंड वाले गणपति लगावें।
        रसोई के गलत स्थान पर होने से रोग: रक्तचाप, अफारा, अपच, अम्लता, मंदाग्नि, बदहज़मी, नाड़ी अवरुद्धता, लकवा और, मानसिक तनाव हांेगे। उत्तर-पूर्व में रसोई होना : यह जल का स्थान है। यदि यहां रसोई होगी, तो हृदय रोग, खांसी, अम्लता, मंदाग्नि, बदहज़मी, पेट में गड़बड़ी और आतों के रोग आदि होंगे। पूर्व में दोष होना: यदि पूर्व में रसोई हो, तो मधुमेह, मोटापा, कान के रोग और गुप्तांग में रोग उत्पन्न हो सकते हैं। उत्तर-पश्चिम में दोष होना: यदि रसोई पश्चिम में हो, तो पेट में गैस, चर्म के रोग, छाती में जलन, दिमाग के रोग आदि होंगे और स्वभाव में क्रोध रहेगा। 
        रसोई दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य कोण) में होना: नैर्ऋत्य कोण का संबंध पृथ्वी तत्व (मंगल) से है। दक्षिण पश्चिम का संबंध राहु से है। मंगल और राहु की युति होने से कई प्रकार के रोग उत्पन्न होंगे। रोग: कोलेस्ट्राॅल बढ़ने का रोग, नाड़ी विकार, रक्तचाप, सिर दर्द, लकवा, जोड़ों का दर्द, यकृत-गर्दन के रोग, चर्म रोग, आंखों और हृदय के रोग, पागलपन, कैंसर, टाइफायड जैसे रोग हो सकते हैं। दक्षिण-पूर्व में दोष होना: दक्षिण पूर्व में दोष होने से बहरापन, गूंगापन, तिल्ली के रोग, पीलिया, लीवर और छाती के रोग होने की संभावना रहती है।

कहीं वास्तु दोष तो नहीं हें कारण आपकी संतान के विवाह में देरी/बाधा का

विवाह या शादी को जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। सामान्यत: हर इंसान का विवाह अवश्य होता है। विवाह के बाद वर-वधु के साथ दोनों के परिवारों का जीवन बदलता है। इसी वजह से शादी किस से की जाए, इस संबंध में सावधानी अवश्य रखी जाती है। घर में वास्तुदोष होने पर वहां रहने वालों को कई तरह की विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वास्तुदोष के कारण कार्यों में भी बाधाएं आती हैं। 
           यदि परिवार मेंकिसी का विवाह नहीं हो रहा हो अथवा होने में देरी हो रही है, तो इसका कारण भी वास्तु दोष हो सकता है। आजकल अनेक अभिभावक अपने बच्चों की शादी./ विवाह को लेकर बहुत परेशान/चिंतित रहते हें और पंडितों तथा ज्योतिर्विदों के पास जाकर परामर्श/सलाह लेते रहते हें...किन्तु क्या कभी आपने सोचा की विवाह में विलंब के कई कारण हो सकते हैं.??? इनमे से एक मुख्य कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। आपने महसूस भी किया होगा कि जब आप किसी मित्र या रिश्तेदार के घर गये होंगे और रात में ठहरने का मौका लगा होगा। आपके लिए अच्छी व्यवस्था होने के बाद भी आपको उतना आराम नहीं मिला होगा जितना आप अपने बिछावन पर करते हैं। 
          इसके विपरीत किसी के घर में आपको अपने घर से भी ज्यादा आराम मिला होगा। यह सब वास्तु का प्रभाव होता है। वास्तु विज्ञान के अनुसार सोने के तरीके और बिस्तर का प्रभाव भी हमारे ऊपर होता है। आपका बिछावन और सोने का अंदाज सही नहीं है तो कैरियर और धन संबंधी समस्याओं को लेकर भी परेशानी बनी रहती है। बिस्तर का प्रभाव दांपत्य जीवन और विवाह पर भी होता है। इससे विवाह में बाधा भी आती है। इस तरह की समस्याओं से बचने के लिए वास्तु विज्ञान में कुछ उपाय बताए गये हैं।
        कैसी लड़की से विवाह करना चाहिए और कैसी लड़की से नहीं, इस संबंध में आचार्य चाणक्य बताया है कि : - वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम्। रूपशीलां न नीचस्य विवाह: सदृशे कुले।। 
            चाणक्य कहते हैं समझदार मनुष्य वही है जो विवाह के लिए नारी की बाहरी सुंदरता न देखते हुए मन की सुंदरता देखे। यदि कोई उच्च कुल की कुरूप कन्या सुंस्कारी हो तो उससे विवाह कर लेना चाहिए। जबकि कोई सुंदर कन्या यदि संस्कारी न हो, अधार्मिक हो, नीच कुल की हो, जिसका चरित्र ठीक न हो तो उससे किसी भी परिस्थिति में विवाह नहीं करना चाहिए। विवाह हमेशा समान कुल में शुभ रहता है। 
           समझदार और श्रेष्ठ मनुष्य वही है जो उच्चकुल में जन्म लेने वाली सुसंस्कारी कुरूप कन्या से विवाह कर लेता है। विवाह के बाद कन्या के गुण ही परिवार को आगे बढ़ाते हैं। जबकि सुंदर नीच कुल में पैदा होने वाली कन्या विवाह के बाद परिवार को तोड़ देती है। ऐसे लड़कियों का स्वभाव व आचरण निम्न ही रहता है। जबकि धार्मिक और ईश्वर में आस्था रखने वाली संस्कारी कन्या के आचार-विचार भी शुद्ध होंगे जो एक श्रेष्ठ परिवार का निर्माण करने में सक्षम रहती है। 
          अब हम बात करते है, कि घर में हम ऐसा क्या करें या ऐसी क्या व्यवस्था रखें कि हमारे बच्चों चाहे वो लड़का हो या लड़की कि शादी में विलम्ब न हो। वैसे विवाह विलंब के कई कारण हो सकते हैं। वास्तु दोष भी इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है। यदि आप भी अपनी संतान के विवाह विलंब से चिंतित हैं, तो यहां वास्तु संबंधी कुछ उपाय दीये जा रहें हूँ, जिनका प्रयोग करने पर आपकी संतान के शीघ्र विवाह के योग बन सकते हैं----
 ऐसे लगाएं बेड----- 
वास्तु विज्ञान के अनुसार लड़के और लड़कियों के लिए बेड लगाने की दिशा अलग अलग है। लड़कियों के लिए वायव्य कोण यानी उत्तर पश्चिम दिशा शुभ होती है जबकि लड़कों के लिए पूर्व और पूर्वोत्तर दिशा शुभ रहती है। बेड लगाते समय यह भी ध्यान रखें कि बेड किसी भी दीवार से सटा हुआ नहीं हो। 
 बेड के नीचे कुछ न रखें---- 
बेड की साफ सफाई जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है बेड के नीचे की सफाई। इसलिए अगर बेड के नीचे सामान रखने की आदत है तो इसे बदल दीजिए। बेड के नीचे रखे हुए सामनों से नकारात्मक उर्जा का संचार होता है जो विवाह में बाधक होता है। अगर बॉक्स वाले पलंग पर सोते हैं तो निश्चित ही बॉक्स में काफी सामान रखते होंगे।इससे भी नकारात्मक उर्जा का संचार होता है। इस नकरात्मक उर्जा को दूर करने के लिए पलंग के चारों पायों के नीचे तांबे का एक स्प्रिंग अथवा एक बाउल में नमक भर कर रखें। 
 बेड के बाईं ओर सोएं---- 
बेड पर हमेशा बायीं ओर सोएं। यह सिर्फ वास्तुशास्त्र ही नहीं बल्कि लंदन के एक होटल प्रीमियर इन द्वारा किये गये एक सर्वे रिपोर्ट में भी कहा गया है कि बांयी ओर सोने वाले व्यक्ति का मूड अधिक अच्छा रहता है। उनके अंदर सकारात्मक सोच रहती है और वह अधिक एक्टिव रहते हैं। 
 इनका भी रखें विशेष ध्यान---- 
विवाह सम्बंधित व्यवधान में गृह वास्तु की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. ऐसा देखने में आया है की वास्तु दोष भी योग्य कन्या / युवक के विवाह में अड़चन पैदा करता है. अतः यदि आपकी भी समस्या भी कुछ ऐसी है तो यह उचित होगा की आप भी निम्नलिखित छोटे-छोटे वास्तु उपाय को अपना कर देखे. बहुत मुमकिन है की आपकी समस्या का हल हो जायेगा.यदि आप भी अपनी संतान के विवाह बाधा / देरी की वजह से चिंतित हैं तो इन वास्तु दोषों पर विचार करें- 
 ------जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें उनको उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। इससे विवाह के लिए रिश्ते आने लगते हैं।उस कमरे में उन्हें सोते समय अपना सर हमेशा पूर्व दिशा में रखना चाहिए... 
------- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें को ऐसे कक्ष में नहीं रहना चाहिए जो अधूरा बना हुआ हो अथवा जिस कक्ष में बीम लटका हुआ दिखाई देता हो। 
------- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उनके शयन कक्ष/ कमरे एवं दरवाजा का रंग गुलाबी, हल्का पीला, सफेद(चमकीला) होना चाहिए। 
------ जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उन्हें विवाह के लिए अपने कमरे में पूर्वोत्तर दिशा में पानी का फव्वारा रखना चाहिए। 
----- कई बार ऐसा भी होता की कोई युवक या युवती विवाह के लिए तैयार/राजी नहीं होते हें हो तो उसके कक्ष के उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए। 
-----विवाह योग्य युवाओं का कमरा उत्तर दिशा या उत्तर-पूर्व दिशा या उत्तर पश्चिम दिशा में रखें। ----सोते समय पैर उत्तर की ओर तथा सिर दक्षिण की ओर रखना चाहिए। 
------अविवाहितों के कमरे का रंग गुलाबी ( दिशा देख कर ) , पीला या सफेद होना चाहिए।
 ----युवाओं के कमरे में एक से अधिक दरवाजे हो तो श्रेष्ठ है। 
-----विवाह योग्य लड़के-लड़कियां अधूरे ( तीन या पांच कोने वाले ) बने कमरे में बिलकुल ना रहें। 
----लड़के-लड़कियों के कमरे में काले रंग की कोई वस्तु ना रखें तो अच्छा है।
 ----कमरे में बीम दिखाई नहीं देना चाहिए। 
----कमरे की पूर्व-उत्तर दिशा में पानी का फव्वारा या जल से सम्बंधित कोई चित्र रखें। 
---कक्ष की उत्तर दिशा में क्रिस्टल बॉल, कांच की प्लेट रखें। 
----विवाह योग्य व्यक्ति का कमरा दक्षिण या दक्षिण पश्चिम दिशा में नहीं होना चाहिए। 
---कमरे में कोई भी खाली बर्तन ना रखे। -
----अविवाहित व्यक्ति के पलंग के नीचे कोई भी भारी वस्तु या लोहे की वस्तु कतई ना रखें। ऐसा होने से उनके विवाह योग में बाधा उत्पन्न होती है।
 -----यदि विवाह प्रस्ताव में व्यवधान आ रहे हों तो विवाह वार्ता के लिए घर आए अतिथियों को इस प्रकार बैठाएं कि उनका मुख घर में अंदर की ओर हो और उन्हें घर का दरवाजा दिखाई न दे। ऐसा करने से बात पक्की होने की संभावना बढ़ जाती है। 
----यदि विवाह के पूर्व लड़का-लड़की घर वालों की रजामंदी से मिलना चाहें तो बैठक व्यवस्था इस प्रकार करें कि उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर न हो।
 ----नैरित्य कोण उपस्तिथ दोष विवाह में अवरोध और वैवाहिक जीवन में बाधा उत्पन्न करता है. यदि नैरित्य कोण में रसोई या शौच का कार्य हो, नैरित्य कोण दूषित हो जता है. इसके अलावा यदि इस कोण में सेप्टिक टेंक हो, अंडर ग्राउंड पानी की टंकी हो, .कुआं हो, बोर हो, मुख्य प्रवेश द्वार हो तो भी वास्तु दोष उत्त्पन्न होता है. अतः विवाह सम्बन्धी बातों की नियमितता के लिए यह आवश्यक है की इन तथ्यों की ओरे भी ध्यान दिया जाय. 
       ===यदि आप भी अपनी संतान के विवाह में हो रही देरी से परेशान हैं तो एक बार अपने घर के वास्तु दोषों पर ध्यान देकर जरुर विचार करें।अत: यदि हम अपने जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं।

आइये जाने की वास्तु में सूर्य का महत्त्व हैं...?? वास्तु सम्मत निर्माण में सूर्य का योगदान

सूर्य, वास्तु शास्त्र को प्रभावित करता है इसलिए जरूरी है कि सूर्य के अनुसार ही हम भवन निर्माण करें तथा अपनी दिनचर्या भी सूर्य के अनुसार ही निर्धारित करें।किसी भी मकान में रहने वाले प्राणी के लिए सूर्य का ताप व वायु दोनों महत्वपूर्ण हैं।
            जिस घर में सूर्य की किरणें और हवा का प्रवेश न हो, वह घर शुभ नहीं होता है इसलिए यह आवश्यक है कि घर का निर्माण इस प्रकार कराया जाए ताकि जीवन व स्वास्थ्य के ये दोनों मूलभूत तत्व आपको आसानी से मिलते रहें। जिन घरों में सूर्य के प्रकाश के स्थान पर विद्युत का प्रकाश और प्राकृतिक हवा के स्थान पर पंखे व कूलर का प्रयोग
किया जाता है, उन घरों में रहने वाले प्राणी अक्सर बीमार रहते हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ अक्सर दिखती हैं, जैसे दमा, एलर्जी, नेत्र रोग आदि। अतः स्वास्थ्य एवं भवन की सुरक्षा के लिए सूर्य प्रकाश तथा वायु संचरण की पर्याप्त मौजूदगी आवश्यक है। सूर्य-किरणों के सेवन से अनेक रोगों से छुटकारा मिलता है। 
          जिस भूखंड की लंबाई अधिक तथा चौड़ाई कम हो, समकोण वाली उस भूमि को आयताकार भू-खंड (प्लॉट) कहते हैं। इस प्रकार की भूमि सर्वसिद्धि दायक होती है। 'स्तिाराद् द्विगुणं गेहं गृहस्वामिविनाशनम्' (विश्वकर्मा प्रकाश 2/109)- चौड़ाई से दुगनी या उससे अधिक लंबाई की आयताकार लंबा मकान 'सूर्यवेधी' और उत्तर से दक्षिण की ओर लंबा मकान 'चंद्रवेधी' होता है। 
         चंद्रवेधी मकान धन-समृद्धिदायक है, किंतु जल-संग्रह की दृष्टि से सूर्यवेधी शुभ होता है, चंद्रवेधी मकान में पानी की समस्या रहती है। ब्रह्ममुहूर्त काल में सूर्य उत्तर पूर्वी भाग में रहता है। यह समय योग-ध्यान, भजन-पूजन और चिंतन-मनन का है। ये क्रियाएं सफलता पूर्वक सम्पन्न हों, इस हेतु मकान के उत्तर पूर्व की दिशा में खिड़की या दरवाजा अवश्य होना चाहिए। जिससे हमें अरुणोदय का लाभ मिल सके। प्रातः 6 से 9 बजे तक सूर्य पूर्व दिशा में रहता है, इसलिए घर का पूर्वी भाग अधिक खुला रखना चाहिए। जिससे सूर्य की रोशनी अधिक कमरे में आ सके। तभी हम सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा का लाभ उठा पाऐंगे। 
           गृहनिर्माण आरंभ और गृह प्रवेश के समय विभिन्न देवताओं के रूप में सूर्यदेव का ही पूजन होता है ताकि प्राण ऊर्जा देने वाले आरोग्य के देवता सूर्य का सर्वाधिक लाभ मिल सके। सूर्य रश्मियों की जीवनदायिनी प्राणऊर्जा का भरपूर लाभ उठाने के लिए वास्तु शास्त्र में पूर्व दिशा की प्रधानता को स्वीकार किया गया है। गृहारंभ मुहूर्त से गृह प्रवेश तक सूर्य का प्रधानता से विचार किया जाता है। 
     गृहारंभ और सौरमास :------ गृहारंभ के मुहूर्त में चंद्रमासों की अपेक्षा सौरमास अधिक महत्वपूर्ण, विशेषतः नींव खोदते समय सूर्य संक्रांति विचारणीय है। पूर्व कालामृत का कथन है- गृहारंभ में स्थिर व चर राशियों में सूर्य रहे तो गृहस्वामी के लिए धनवर्द्धक होता है। जबकि द्विस्वभाव (3, 6, 9, 12) राशि गत सूर्य मरणप्रद होता है। अतः मेष, वृष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशियों के सूर्य में गृहारंभ करना शुभ रहता है। मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि के सूर्य में गृह निर्माण प्रारंभ नहीं करना चाहिए। 
विभिन्न सौरमासों में गृहारंभ का फल देवऋषि नारद ने इस प्रकार बताया है----- 
 मेष मास---शुभ, वृष मास----धन वृद्धि? मिथुन मास----मृत्यु कर्क मास----शुभ, सिंह मास---सेवक वृद्धि, कन्या मास----रोग, तुला मास----सुख, वृश्चिक मास----धनवृद्धि, धनु मास---बहुत हानि, मकर----धन आगम, कुंभ----लाभ, मीनमास में गृहारंभ करने से गृहस्वामी को रोग तथा भय उत्पन्न होता है। 
           सौरमासों और चंद्रमासों में जहां फल का विरोध दिखाई दे वहां सौरमास का ग्रहण और चंद्रमास का त्याग करना चाहिए क्योंकि चंद्रमास गौण है। मकान की नीवं खोदने के लिए सूर्य जिस राशि में हो उसके अनुसार राहु या सर्प के मुख, मध्य और पुच्छ का ज्ञान करते हैं। सूर्य की राशि जिस दिशा में हो उसी दिशा में, उस सौरमास राहु रहता है। 
          जैसा कि कहा गया है- ''यद्राशिगोऽर्कः खलु तद्दिशायां, राहुः सदा तिष्ठति मासि मासि।'' यदि सिंह, कन्या, तुला राशि में सूर्य हो तो राहु का मुख ईशान कोण में और पुच्छ नैत्य कोण में होगी और आग्नेय कोण खाली रहेगा। अतः उक्त राशियों के सूर्य में इस खाली दिशा (राहु पृष्ठीय कोण) से खातारंभ या नींव खनन प्रारंभ करना चाहिए। वृश्चिक, धनु, मकर राशि के सूर्य में राहु मुख वायव्य कोण में होने से ईशान कोण खाली रहता है। कुंभ, मीन, मेष राशि के सूर्य में राहु मुख नैत्य कोण में होने से वायव्य कोण खाली रहेगा। वृष, मिथुन, कर्क राशि के सूर्य में राहु का मुख आग्नेय कोण में होने से नैत्य दिशा खाली रहेगी। उक्त सौर मासों में इस खाली दिशा (कोण) से ही नींव खोदना शुरु करना चाहिए। 
                 अब एक प्रश्न उठता है कि हम किसी खाली कोण में गड्ढ़ा या नींव खनन प्रारंभ करने के बाद किस दिशा में खोदते हुए आगे बढ़ें? वास्तु पुरुष या सर्प का भ्रमण वामावर्त्त होता है। इसके विपरीत क्रम से- बाएं से दाएं/दक्षिणावर्त्त/क्लोक वाइज नीवं की खुदाई करनी चाहिए। यथा आग्नेय कोण से खुदाई प्रारंभ करें तो दक्षिण दिशा से जाते हुए नैत्य कोण की ओर आगे बढ़ें। विश्वकर्मा प्रकाश में बताया गया है- 'ईशानतः सर्पति कालसर्पो विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु। शेषस्य वास्तोर्मुखमध्य -पुछंत्रयं परित्यज्यखनेच्चतुर्थम्॥' वास्तु रूपी सर्प का मुख, मध्य और पुच्छ जिस दिशा में स्थित हो उन तीनों दिशाओं को छोड़कर चौथी में नींव खनन आरंभ करना चाहिए। इसे हम निम्न तालिका के मध्य से आसानी से समझ सकते हैं। 
         शिलान्यास :---- गृहारंभ हेतु नींव खात चक्रम और वास्तुकालसर्प दिशा चक्र में प्रदर्शित की गई सूर्य की राशियां और राहु पृष्ठीय कोण नींव खनन के साथ-साथ शिलान्यास करने, बुनियाद भरने हेतु, प्रथम चौकार अखण्ड पत्थर रखने हेतु, खम्भे (स्तंभ) पिलर बनाने हेतु इन्ही राशियों व कोणों का विचार करना चाहिए। जो क्रम नींव खोदने का लिखा गया था वही प्रदक्षिण क्रम नींव भरने का है। आजकल मकान आदि बनाने हेतु आर.सी.सी. के पिलर प्लॉट के विभिन्न भागों में बना दिये जाते हैं। ध्यान रखें, यदि कोई पिलर राहु मुख की दिशा में पड़ रहा हो तो फिलहाल उसे छोड़ दें। सूर्य के राशि परिवर्तन के बाद ही उसे बनाएं तो उत्तम रहेगा। कतिपय वास्तु विदों का मानना है कि सर्व प्रथम शिलान्यास आग्नेय दिशा में करना चाहिए।
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  • 1- सूर्योदय से पहले रात्रि 3 से सुबह 6 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त होता है। इस समय सूर्य घर के उत्तर-पूर्वी भाग में होता है। यह समय चिंतन-मनन व अध्ययन के लिए बेहतर होता है। 
  •  2- सुबह 6 से 9 बजे तक सूर्य घर के पूर्वी हिस्से में रहता है इसीलिए घर ऐसा बनाएं कि सूर्य की पर्याप्त रौशनी घर में आ सके। 
  •  3- प्रात: 9 से दोपहर 12 बजे तक सूर्य घर के दक्षिण-पूर्व में होता है। यह समय भोजन पकाने के लिए उत्तम है। रसोई घर व स्नानघर गीले होते हैं। ये ऐसी जगह होने चाहिए, जहां सूर्य की रोशनी मिले, तभी वे सुखे और स्वास्थ्यकर हो सकते हैं। 
  •  4- दोपहर 12 से 3 बजे तक विश्रांति काल(आराम का समय) होता है। सूर्य अब दक्षिण में होता है, अत: शयन कक्ष इसी दिशा में बनाना चाहिए। 
  •  5- दोपहर 3 से सायं 6 बजे तक अध्ययन और कार्य का समय होता है और सूर्य दक्षिण-पश्चिम भाग में होता है। अत: यह स्थान अध्ययन कक्ष या पुस्तकालय के लिए उत्तम है। 
  •  6- सायं 6 से रात 9 तक का समय खाने, बैठने और पढऩे का होता है इसलिए घर का पश्चिमी कोना भोजन या बैठक कक्ष के लिए उत्तम होता है। 
  •  7- सायं 9 से मध्य रात्रि के समय सूर्य घर के उत्तर-पश्चिम में होता है। यह स्थान शयन कक्ष के लिए भी उपयोगी है। 
  •  8- मध्य रात्रि से तड़के 3 बजे तक सूर्य घर के उत्तरी भाग में होता है। यह समय अत्यंत गोपनीय होता है यह दिशा व समय की।ती वस्तुओं या जेवरात आदि को रखने के लिए उत्तम है।

आइये जाने वास्तु शास्त्र की उपयोगिता

वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। आज भी जितने भवन और बिल्डिंग आदि बन रही है अधिकांश में वास्तु के हिसाब से बनाया जा रहा है , आइये जानते है 
वास्तु के कुछ नियम :-वास्तु तीन प्रकार के होते हैं- त्र आवासीय - मकान एवं फ्लैट त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर
लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। 
         अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए। यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। 
         जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। 
            सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है। किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी। किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है जैसे :- पूजा कक्ष - ईशान कोण, स्नान घर- पूर्व रसोई घर-आग्नेय, मुखिया का शयन कक्ष- दक्षिण, युवा दम्पति का शयन कक्ष वायव्य कोण एवं उत्तर के बीच, बच्चों का कक्ष वायव्य एवं पश्चिम, अतिरिक्त कक्ष- वायव्य, भोजन कक्ष-पश्चिम अध्ययन कक्ष- पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच, कोषागार- उत्तर एवं स्टोर- र्नैत्य कोण जल कूप या बोरिंग-उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर - र्नैत्य कोण, जल कूप या बोरिंग - उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर- नै र्त्य कोण, शौचालय- पश्चिम या उत्तर पश्चिम (वायव्य) अविवाहित कन्याओं के लिये शयन कक्ष-वायव्य।
           भवन में सबसे आवश्यक कक्ष पूजा घर है। ईशान कोण पूर्व एवं उत्तर से प्राप्त होने वाली उर्जा का क्षेत्र है। इस कोण के अधिपति शिव हैं, जो व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं। प्रातः कालीन सूर्य की किरणें सर्वप्रथम ईशान कोण पर पड़ती है। इन किरणों में निहित अल्ट्रॉवायलेट किरणों में इतनी शक्ति होती है कि वे स्थान को कीटाणुमुक्त कर पवित्र बनाते हैं। पवित्र स्थान पर पूजा करने से व्यक्ति का ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित होता है जिससे शरीर में स्फूर्ति, शक्ति का संचार होता है साथ ही भाग्य बली होता है। आग्नेय कोण में अग्नि के देवता के स्थित होने से भोजन को तैयार करने में सहायता मिलती है एवं भोजन स्वादिष्ट होता है। भोजन बनाते समय गृहणी का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिये इसका कारण यह है कि पूर्व दिशा से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा गृहणी को शक्ति प्रदान करती है। 
           ईशान कोण में रसोई नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह जल के क्षेत्र हैं। जल तथा अग्नि में परस्पर शत्रुता है। र्नैत्य कोण में रसोई बनाने से परस्पर शत्रुता पारिवारिक कष्ट एवं अग्नि से दुर्घटनाओं का भय तथा जन-धन की हानि होती है। दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं तथा ग्रह मंगल हैं। यम का स्वभाव आलस्य एवं निद्रा को उत्तन्न करता है। सोने से पहले मनुष्य के शरीर से आलस्य एवं निद्रा की उत्पत्ति होने से मनुष्य को अच्छी नींद आती है। भरपूर नींद के बाद शरीर फिर से तरोताजा हो जाता है।
             इसीलिए परिवार के मुखिया का शयन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए। अतिथि गृह का वायव्य कोण में होना लाभप्रद है। इस दिशा के स्वामी वायु होते हैं तथा ग्रह चंद्रमा। वायु एक जगह नहीं रह सकते तथा चंद्रमा का प्रभाव मन पर पड़ता है। अतः वायव्य कोण में अतिथि गृह होने पर अतिथि कुछ ही समय तक रहता है तथा पूर्व आदर-सत्कार पाकर लौट जाता है, जिससे परिवारिक मतभेद पैदा नहीं होते। वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं। इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए। वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला। दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है। उसमें आलस्य नहीं होती है। 
            अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है। पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है।चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है। अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है। टोडरमल ने अपने 'वास्तु सौखयम्' नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है।
              राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया-'पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप'। पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं। विश्वकर्मा भगवान ने कहा है कि र्नैत्य, दक्षिण, अग्नि और वायव्य कोण को छोड़कर शेष सभी दिशाओं में जलाशय बनाना चाहिये। तिजोरी हमेशा उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आग्नेय दक्षिणा, र्नैत्य पश्चिम एवं वायव्य कोण में धन का तिजोरी रखने से हानि होता है। 
            ड्राईंग रूम को हमेशा भवन के उत्तर दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी ग्रह बुध एवं देवता कुबेर हैं। वाणी को प्रिय, मधुर एवं संतुलित बनाने में बुध हमारी सहायता करता है। वाणी यदि मीठी और संतुलित हो तो वह व्यक्ति पर प्रभाव डालती है और दो व्यक्तियों के बीच जुड़ाव पैदा करती है। र्नैत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं। अतः इस दिशा में भारी निर्माण कर भवन को मजबूती प्रदान किया जा सकता है, जिससे भवन को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से बचाकर सकारात्मक शक्तियों का प्रवेश कराया जा सकता है। अतः गोदाम (स्टोर) एवं गैरेज का निर्माण र्नैत्य कोण में करते हैं। जिस भूखंड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो वैसे भूखंड में कार्यालय बनाना शुभ होता है। 
           वर्गाकार, आयताकार, सिंह मुखी, षट्कोणीय भूखंड पर कार्यालय बनाना शुभ होता है। कार्यालय का द्वार उत्तर दिशा में होने पर अति उत्तम होता है। पूर्वोत्तर दिशा में अस्पताल बनाना शुभ होता है। रोगियों का प्रतीक्षालय दक्षिण दिशा में होना चाहिए। रोगियों को देखने के लिए डॉक्टर का कमरा उत्तर दिशा में होना चाहिए। डॉक्टर मरीजों की जांच पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर करना चाहिए। आपातकाल कक्ष की व्यवस्था वायव्य कोण में होना चाहिए। यदि कोई भूखंड आयताकार या वर्गाकार न हो तो भवन का निर्माण आयताकार या वर्गाकार जमीन में करके बाकी जमीन को खाली छोड़ दें या फिर उसमें पार्क आदि बना दें। 
          भवन को वास्तु के नियम से बनाने के साथ-साथ भाग्यवृद्धि एवं सफलता के लिए व्यक्ति को ज्योतिषीय उपचार भी करना चाहिए। सर्वप्रथम किसी भी घर में श्री यंत्र एवं वास्तु यंत्र का होना अति आवश्यक है। श्री यंत्र के पूजन से लक्ष्मी का आगमन होता रहता है तथा वास्तु यंत्र के दर्शन एवं पूजन से घर में वास्तु दोष का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त गणपति यंत्र के दर्शन एवं पूजन से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं। ज्योतिष एवं वास्तु एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना प्रारंभिक ज्योतिषीय ज्ञान के वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता और बिना 'कर्म' के इन दोनों के आत्मसात ही नहीं किया जा सकता। इन दोनों के ज्ञान के बिना भाग्य वृद्धि हेतु किसी भी प्रकार के कोई भी उपाय नहीं किए जा सकते।

जानिए की वास्तु अनुसार केसा हो आपके घर की दीवारों और पर्दों का रंग

शहरों में बढ़ती हुई आबादी और जगह की कमी की वजह से वास्तुशास्त्रोक्त भूमि तथा भवन का प्राप्त होना लगभग असंभव-सा होता जा रहा है। शहरों में विकास प्राधिकरणों द्वारा दिए जा रहे प्लॉट या फ्लैट पूरी तरह से वास्तु के अनुसार नहीं होते हैं। इन प्लॉटों या फ्लैटों में वास्तुशास्त्रोक्त सभी कक्षों का निर्माण भी सम्भव नहीं होता है। अतः न्यूनतम कक्षों में भी वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से लाभ प्राप्त करने के लिए गृह की आंतरिक सज्जा में किस कक्ष में क्या व्यवस्था होनी चाहिए...
         वास्तु से पहले वातावरण के हिसाब से घर की प्लॅनिंग होनी चाहिये. किचन और टाय्लेट को हमेशा एक बाहरी दीवार मिलनी चाहिये ताकि प्रॉपर वेंटिलेशन होती रहे. डोन को अक्छी धूप म्लनी चाहिये ताकि कीटाणु का नाश होत रहे, इत्यादि. इसके बाद वास्तु प्रिन्सिपल्स लगाये. घर की सजावट और इंटीरियर में दीवारों के रंग और पर्दों की अहम भूमिका है। अलग-अलग रंग के पर्दे घर को खूबसूरत तो बनाते ही हैं, घर में पॉजिटिव एनर्जी बनाए रखने में भी मदद करते हैं। उसी तरह घर के हर कमरे का उद्देश्य अलग-अलग होता है इसलिए घर के सभी कमरों में एक ही रंग की पुताई नहीं करवानी चाहिए। 
किस रंग के पर्दे और किस कमरे के लिए उपयुक्त है कौन सा रंग- 
---सबसे पहले ध्यान रखें-पर्दे हमेशा दो परतों वाले लगाने चाहिए। 
--कमरों में रंगों की बात करें तो बेडरूम में मानसिक शांति और रिश्तों में मधुरता बनी रहे इसके लिए गुलाबी, आसमानी या हल्के हरा रंग की पुताई करवा सकते हैं। 
 --पूर्व दिशा का कमरा हो तो हरे रंग के पर्दे बेहतर रहते हैं।
 ---यदि पर्दे पश्चिम दिशा में लगाने हों तो सफेद रंग के पर्दे लगाना ठीक रहता है।
 ---उत्तर दिशा के कमरे में नीले रंग के पर्दे लगाने चाहिए.. 
----शौचालय और स्नान गृह के लिए सफेद या हल्का नीला रंग अनुकूल है। 
---बैठक कक्ष या ड्राइंग रूम में क्रीम, सफेद या भूरा रंग प्रयोग किया जा सकता है।इस कक्ष की दीवारों का हल्का नीला, आसमानी, पीला, क्रीम या हरे रंग का होना उत्तम होता है।घर का यह कमरा अत्यंत महत्वपर्ण है। इस कक्ष में फर्नीचर, शो केस तथा अन्य भारी वस्तुएं दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य में रखनी चाहिए। 
         फर्नीचर रखते समय इस बात का ध्यान रखे कि घर का मालिक बैठते समय पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे। इस कक्ष में यदि कृत्रिम पानी का फव्वारा या अक्वेरियम रखना हो तो उसे उत्तर-पूर्व कोण में रखना चाहिए। टीवी दक्षिण-पश्चिम या अग्नि कोण में रखा जा सकता है। बैठक में ही मृत पूर्वजों के चित्र दक्षिण या पश्चिमी दीवार पर लगाना चाहिए।
 ---दक्षिण दिशा के कोने का कमरा हो तो लाल रंग के पर्दे उपयुक्त रहते हैं। 
---रसोई घर के लिए लाल और नारंगी शुभ रंग माना जाता है। 
--शयन कक्ष : शयन कक्ष में कभी भी देवी-देवताओं या पूर्वजों के चित्र नहीं लगाने चाहिए। इस कक्ष में पलंग दक्षिणी दीवारों से सटा होना चाहिए। सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व दिशा में होना चाहिए। ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर तथा धन प्राप्ति के लिए दक्षिण की ओर सिर करके सोना प्रशस्त है। शयन कक्ष में सोते समय पैर दरवाजे की तरफ नहीं होना चाहिए। सोते समय जातक को कभी भी वास्तु पद में तिर्यक् रेखा में नहीं सोना चाहिए। ऐसा करने से जातक को गम्भीर बीमारियां हो जाती हैं। शयन कक्ष में दर्पण नहीं होना चाहिए, इससे परस्पर कलह होता है। इस कक्ष की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए। 
 रसोईघर : रसोई गृह में भोजन बनाते समय गृहिणी का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए। बरतन, मसाले, राशन इत्यादि पश्चिम दिशा में रखने चाहिए। बिजली के उपकरण दक्षिण-पूर्व में रखने चाहिए। जूठे बरतन तथा चूल्हे की स्लैब अलग होनी चाहिए। रसोईघर में दवाइयां नहीं रखनी चाहिए। रसोईघर में काले रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह हरा, पीला,क्रीम या गुलाबी रंग का हो सकता है।
 पूजाघर : घर में पूजा घर या पूजा का स्थान ईशान कोण में होना चाहिए। पूजा घर में मूर्तियां या फोटो इस तरह से रखनी चाहिए कि वे आमने-सामने न हों। घर में सार्वजनिक मंदिर की तरह पूजा कक्ष में गुम्बद, ध्वजा, कलश, त्रिशूल या शिवलिंग इत्यादि नहीं रखने चाहिए। मूर्तियां बार अंगुल से अधिक ऊंची नहीं रखना चाहिए। पूजा गृह शयन कक्ष में नहीं होना चाहिए। यदि शयनकक्ष में पूजा का स्थान बनाना मजबूरी हो तो वहां पर्दे की व्यवस्था करनी चाहिए। पूजा गृह हेतु सफेद, हल्का पीला अथवा हल्का गुलाबी रंग शुभ होता है।
 स्नानगृह तथा शौचालय : स्नानगृह की आंतरिक व्यवस्था में नल को पूर्व या उत्तर की दीवार पर लगाना चाहिए जिससे स्नान के समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में हो। स्नान घर में वॉश बेसिन ईशान या पूर्व में रखना चाहिए। गीजर, स्विच बोर्ड आदि अग्नि कोण में होना चाहिए। इन्हें स्नानगृह में दक्षिण पूर्व या उत्तर की दिवार में लगाना चाहिए। बाथटब इस प्रकार हो कि नहाते समय पैर दक्षिण दिशा में न हों। बाथरूम की दिवारों या टाइल्स का रंग हल्का नीला, आसमानी, सफेद या गुलाबी होना चाहिए। शौचालय में व्यवस्था इस प्रकार हो कि शौच में बैठते समय मुख दक्षिण या पश्चिम में हो। अन्य व्यवस्थाएं बाथरूम के समान रखनी चाहिए।
 अध्ययन कक्ष : घर में अध्ययन का स्थान ईशान या पश्चिम मध्य में होना चाहिए। टेबल तथा कुर्सी इस प्रकार से रखने चाहिए कि पढ़ते समय मुख उत्तर या पूर्व दिशा में हो। पीठ के पीछे दीवार हो किन्तु खिड़की या दरवाजा न हो तथा बीम के नीचे न हो। अध्ययन कक्ष में किताब रखने की आलमारी दक्षिणी दीवार पर या पश्चिम दीवार पर होनी चाहिए। आलमारी कभी भी नैऋत्य या वायव्य कोण में नहीं होनी चाहिए। अध्ययन कक्ष का रंग जानिए की वास्तु अनुसार केसा हो आपके घर की दीवारों और पर्दों का रंग- आजकल सभी शहरों में बढ़ती हुई आबादी और जगह की कमी की वजह से वास्तुशास्त्रोक्त भूमि तथा भवन का प्राप्त होना लगभग असंभव-सा होता है।अनेक शहरों में विकास प्राधिकरणों द्वारा दिए जा रहे प्लॉट या फ्लैट पूरी तरह से वास्तु के अनुसार नहीं होते हैं। 
         इन प्लॉटों या फ्लैटों में वास्तुशास्त्रोक्त सभी कक्षों का निर्माण भी सम्भव नहीं होता है। अतः न्यूनतम कक्षों में भी वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से लाभ प्राप्त करने के लिए गृह की आंतरिक सज्जा में किस कक्ष में क्या व्यवस्था होनी चाहिए...आइए जानें कि वास्तु के अनुसार हमारे घर की कौन सी दीवार किस रंग की होनी चाहिए, जिससे हमें समृद्धि और सकारात्मक उर्जी मिलती रहे। घर केवल ईंट, चूने और पत्थर की आकृति वाले घरौंदे का नाम ही नहीं है। 'घर' का अर्थ उस स्थान से है जहाँ परिवार चैन-सुकून की तलाश करता है। यदि वास्तु को ध्यान में रखकर घर का निर्माण किया जाए तो वास्तुदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। घर की साज-सज्जा में वास्तुशास्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। 
       घर का इंटीरियर डेकोरेशन करते समय घर के भीतरी दीवारो के रंग-संयोजन, पर्दो के डिजाइन, फर्नीचर, कलाकृतियां, पेंटिंग, इनडोर प्लांट्स, वॉल टाइल्स, सीलिंग का पीओपी, अलमारियां और फैंसी लाइट आदि को वास्तु के अनुरूप ही बना सकें तो यह एक पूर्ण वास्तु की स्थिति होगी। वर्तमान के बदलते दौर में वास्तु का महत्व दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। आजकल कई बड़े-बड़े बिल्डर व इंटीरियर डेकोरेटर भी घर बनाते व सजाते समय वास्तु का विशेष ध्यान रखते हैं। 
        वास्तु के अनुसार ही वे कमरे की बनावट, उनमें सामानों की साज-सज्जा करते हैं। इससे घर की खूबसूरती बढ़ने के साथ-साथ सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रवाह होता है।एक सामान्य से घर को वास्तु के इतने जटिल नियमों में बाँध दिया जाता है कि जिन्हें पढ़कर मनुष्य न केवल भ्रमित हो जाता है वरन जिनके घर पूर्णत: वास्तु अनुसार नहीं होते, वे शंकाओं के घेरे में आ जाते हैं। ऐसे मनुष्य या तो अपना घर बदलना चाहते हैं या शंकित मन से घर में निवास करते हैं। वास्तु विज्ञान का स्पष्ट अर्थ है चारों दिशाओं से मिलने वाली ऊर्जा तरंगों का संतुलन। यदि ये तरंगें संतुलित रूप से आपको प्राप्त हो रही हैं, तो घर में स्वास्थ्य व शांति बनी रहेगी। अत: ढेरों वर्जनाओं में बँधने की बजाय दिशाओं को संत‍ुलित करें तो लाभ मिल सकता है। ध्यान रखें की वास्तु से पहले वातावरण के हिसाब से घर की प्लॅनिंग होनी चाहिये. किचन और टाय्लेट को हमेशा एक बाहरी दीवार मिलनी चाहिये ताकि प्रॉपर वेंटिलेशन होती रहे. आपके घर को धूप प्रॉपर मिलनी चाहिये ताकि कीटाणु का नाश होता रहे, इत्यादि. इसके बाद वास्तु नियमो को लागु करें. हर व्यक्ति अपने घर को खूबसूरत रखना चाहता है। करीने से सजा हुआ घर के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देता है, सुंदर घर सभ्य और सुशिक्षित होने का सबूत है। 
           आज के युवा ड्राइंग रूम और लिविंग रूम को सजाने में काफी दिलचस्पी लेने लगे हैं। घर को सजाना कोई फैशन नहीं है, बल्कि एक जरूरत है।घर की सजावट और इंटीरियर में दीवारों के रंग और पर्दों की अहम भूमिका है। अलग-अलग रंग के पर्दे घर को खूबसूरत तो बनाते ही हैं, घर में पॉजिटिव एनर्जी बनाए रखने में भी मदद करते हैं। उसी तरह घर के हर कमरे का उद्देश्य अलग-अलग होता है इसलिए घर के सभी कमरों में एक ही रंग की पुताई नहीं करवानी चाहिए।
          बिना सोचे-विचारे मकान बनवाने पर उसमें भूल या परिस्थितिवश कुछ वास्तुदोष रह जाते हैं। जिनका असर हमारे जीवन पर पड़ता है। वास्तु शास्त्रियों के अनुसार कुछ मामूली परिवर्तन कर इन वास्तु दोषों को समाप्त किया जा सकता है। इन दोषों के निवारण के लिए यदि आप उपाय कर लें, तो बिना तोड़-फोड़ के ही वास्तुजनित दोषों से निजात पा सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए यहाँ पर वास्तुदोष का निवारण के उपाय दिये जा रहें है इसे अपना कर के, आप अपने घर के वास्तु दोषों को दूर कर के अपने यहाँ मंगलमय वातावरण कर सकते हैं...
          घर में वास्तुदोष होने पर, उचित यही होता है कि उसे वास्तुशास्त्र के अनुसार ठीक कर ले, यथासंभव घर के अंदर तोड़-फोड ना करे; इससे वास्तुभंग का दोष होता है। यदि हम घर की सजावट, रंग-रोगन आदि ज्योतिष एवं वास्तु के नियमों के अनुसार करें तो घर की सुंदरता तो बढ़ेगी ही, हमारे घर-आंगन में खुशियां भर जाएंगी। 
---सबसे पहले ध्यान रखें-पर्दे हमेशा दो परतों वाले लगाने चाहिए। 
--कमरों में रंगों की बात करें तो बेडरूम में मानसिक शांति और रिश्तों में मधुरता बनी रहे इसके लिए गुलाबी, आसमानी या हल्के हरा रंग की पुताई करवा सकते हैं। 
 --पूर्व दिशा का कमरा हो तो हरे रंग के पर्दे बेहतर रहते हैं। 
---यदि पर्दे पश्चिम दिशा में लगाने हों तो सफेद रंग के पर्दे लगाना ठीक रहता है।
---उत्तर दिशा के कमरे में नीले रंग के पर्दे लगाने चाहिए.. 
----शौचालय और स्नान गृह के लिए सफेद या हल्का नीला रंग अनुकूल है। 
---कैसा होबैठक कक्ष या ड्राइंग रूम ---
इस रम में क्रीम, सफेद या भूरा रंग प्रयोग किया जा सकता है।इस कक्ष की दीवारों का हल्का नीला, आसमानी, पीला, क्रीम या हरे रंग का होना उत्तम होता है।घर का यह कमरा अत्यंत महत्वपर्ण है। इस कक्ष में फर्नीचर, शो केस तथा अन्य भारी वस्तुएं दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य में रखनी चाहिए। फर्नीचर रखते समय इस बात का ध्यान रखे कि घर का मालिक बैठते समय पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे। इस कक्ष में यदि कृत्रिम पानी का फव्वारा या अक्वेरियम रखना हो तो उसे उत्तर-पूर्व कोण में रखना चाहिए। टीवी दक्षिण-पश्चिम या अग्नि कोण में रखा जा सकता है।
          बैठक में ही मृत पूर्वजों के चित्र दक्षिण या पश्चिमी दीवार पर लगाना चाहिए।ड्राइंग रूम में सभी फर्नीचर लकड़ी के बने होने चाहिए। लकड़ी से बने हुए ऐसे फर्नीचर जिनके कोने तीखे न होकर चौड़ी गोलाई लिए हुए हों वास्तु सम्मत होंगे। वायव्य दिशा में बने ड्राइंग रूम में हलका हरा, हलका स्लेटी, सफेद या क्रीम रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि ड्राइंग रूम में उत्तर दिशा में खिड़कियां-दरवाजे हों तो उन पर हरे आधार पर बने नीले डिजाइन जिसमें कि जल की लहरों जैसी डिजाइन के पर्दे होने चाहिए। ऐसे हलके और बिना लाइनिंग वाले पर्दो का प्रयोग सर्वोत्तम होता है। ड्राइंग रूम में गृहस्वामी की कुर्सी या बैठने का स्थान कुछ इस प्रकार होना चाहिए कि बैठने पर उसका मुख सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर हो।
 ---दक्षिण दिशा के कोने का कमरा हो तो लाल रंग के पर्दे उपयुक्त रहते हैं। 
---रसोई घर के लिए लाल और नारंगी शुभ रंग माना जाता है। 
---कैसा हो छत:----
कुछ लोग अपने घर की छत को गुलाबी, पीला, नीला आदि रंगों से रंगना पसंद करते हैं, लेकिन यदि आप अपने घर की छत को कोई ऐसा वैसा रंग देने जा रहे हैं तो रुक जाएं, क्योंकि वास्तु के अनुसार छतों का रंग सफेद ही सर्वोत्तम माना गया है। कहते हैं यह स्थान ब्रह्मस्थान की भूमिका निभाती है और इससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है। 
--कैसा हो शयन कक्ष :---- 
शयन कक्ष में कभी भी देवी-देवताओं या पूर्वजों के चित्र नहीं लगाने चाहिए। इस कक्ष में पलंग दक्षिणी दीवारों से सटा होना चाहिए। सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व दिशा में होना चाहिए। ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर तथा धन प्राप्ति के लिए दक्षिण की ओर सिर करके सोना प्रशस्त है। शयन कक्ष में सोते समय पैर दरवाजे की तरफ नहीं होना चाहिए। सोते समय जातक को कभी भी वास्तु पद में तिर्यक् रेखा में नहीं सोना चाहिए। ऐसा करने से जातक को गम्भीर बीमारियां हो जाती हैं। शयन कक्ष में दर्पण नहीं होना चाहिए, इससे परस्पर कलह होता है। बेडरूम की दीवार पर हमेशा हल्के रंगों का प्रयोग करें, वर्ना गहरे या चुभने वाले रंग आपकी लाइफ की उलझनें बढ़ा सकते हैं।इस कक्ष की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए।यहां की दीवारों पर पेस्टल या बहुत हलके रंगों का प्रयोग करना चाहिए। सफेद, क्रीम, ऑफ व्हाइट, आइवरी, क्रीम आदि रंग सभी दिशाओं में बने बेडरूम के लिए ठीक रहते है। 
          नव-विवाहित दंपती के बेडरूम में हलका गुलाबी और बच्चों के कमरे में हलका बैगनी या हलके हरे रंग का भी प्रयोग कर सकती हैं। यहां पर सजावट के लिए प्रयोग किए जाने वाले इनडोर प्लांट बिलकुल नहीं होने चाहिए क्योंकि इन पौधों से रात को कार्बन-डाईआक्साइड निकालता है जो कि आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसी को वास्तु में नकारात्मक ऊर्जा का नाम दिया गया है। पति-पत्नी के कमरे में सुंदर शो-पीस या सौम्य पक्षियों की आकृति जैसे-लव-बर्ड को सदा जोड़े में ही रखना चाहिए। बेडरूम में कारपेट न हो तो अच्छा है। यदि कोई नया शादीशुदा कपल हो तो वह बेडरूम के लिए दक्षिण-पश्चिम में मौजूद कमरे का इस्तेमाल करें। वैसे शादी के तुरंत बाद नॉर्थ-वेस्ट दिशा के कमरे उनके लिए बेहतर बताए गए हैं, लेकिन ज्यादा लंबे समय तक इस कमरे का इस्तेमाल उनके लिए सही नहीं। उनके कमरे की दीवार गुलाबी, हल्का बैंगनी आदि हो सकता है। इससे पॉज़िटिव एनर्जी का संचार होता है।
 कैसा हो रसोईघर :------ 
रसोई गृह में भोजन बनाते समय गृहिणी का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए। बरतन, मसाले, राशन इत्यादि पश्चिम दिशा में रखने चाहिए। बिजली के उपकरण दक्षिण-पूर्व में रखने चाहिए। जूठे बरतन तथा चूल्हे की स्लैब अलग होनी चाहिए। रसोईघर में दवाइयां नहीं रखनी चाहिए। रसोईघर में काले रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह हरा, पीला,क्रीम या गुलाबी रंग का हो सकता है।रसोईघर की स्लैब पर काले रंग के पत्थर प्रयोग न करे क्योंकि काला रंग शनि एवं अग्नि तत्व का द्योतक है और वास्तु में यह एक सुखद स्थिति नहीं है। किचन के दक्षिण पूर्व की स्लैब पर किसी कोने में हरे-भरे पौधे यहां पर ताजगी का एहसास कराते है एवं काष्ठ तत्व की उपस्थिति द्वारा इस क्षेत्र को सदैव कल्याणकारी बनाए रखते है। किचन की दीवारों पर गुलाबी या हलका रंग सर्वोत्तम है। किचेन में भगवान, परिवार सदस्यों, पूर्वजों आदि के चित्र न लगा कर सुंदर प्राकृतिक दृश्यों वाले लैंडस्केप का प्रयोग करना चाहिए। 
 कैसा हो पूजाघर :-----
घर में पूजा घर या पूजा का स्थान ईशान कोण में होना चाहिए। माना जाता है कि इस कक्ष की दीवारों को हल्का नीला रंग से रंगना चाहिए, क्योंकि यह शांति, एकाग्रता का प्रतीक है।पूजा घर में मूर्तियां या फोटो इस तरह से रखनी चाहिए कि वे आमने-सामने न हों। घर में सार्वजनिक मंदिर की तरह पूजा कक्ष में गुम्बद, ध्वजा, कलश, त्रिशूल या शिवलिंग इत्यादि नहीं रखने चाहिए। मूर्तियां बार अंगुल से अधिक ऊंची नहीं रखना चाहिए। पूजा गृह शयन कक्ष में नहीं होना चाहिए। यदि शयनकक्ष में पूजा का स्थान बनाना मजबूरी हो तो वहां पर्दे की व्यवस्था करनी चाहिए। पूजा गृह हेतु सफेद, हल्का पीला अथवा हल्का गुलाबी रंग शुभ होता है।प्राय: पूजा के स्थान में लोग सजावट के लिए लाला रंग के बल्बों का प्रयोग करते है, जो सर्वथा अनुचित है। यहां नेचुरल सफेद, पीले या नीले रंग का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही पूजा के कमरे की दीवारों को भी हलके नीले या पीले रंग से पेंट करवाना चाहिए। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि घर के पूजास्थल में भड़कीले रंगों के बजाय सौम्य रंगों का इस्तेमाल हो। 
 कैसा हो स्नानगृह तथा शौचालय :----- 
स्नानगृह की आंतरिक व्यवस्था में नल को पूर्व या उत्तर की दीवार पर लगाना चाहिए जिससे स्नान के समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में हो। स्नान घर में वॉश बेसिन ईशान या पूर्व में रखना चाहिए। गीजर, स्विच बोर्ड आदि अग्नि कोण में होना चाहिए। इन्हें स्नानगृह में दक्षिण पूर्व या उत्तर की दिवार में लगाना चाहिए। बाथटब इस प्रकार हो कि नहाते समय पैर दक्षिण दिशा में न हों। बाथरूम की दिवारों या टाइल्स का रंग हल्का नीला, आसमानी, सफेद या गुलाबी होना चाहिए। शौचालय में व्यवस्था इस प्रकार हो कि शौच में बैठते समय मुख दक्षिण या पश्चिम में हो। अन्य व्यवस्थाएं बाथरूम के समान रखनी चाहिए। 
 कैसा हो अध्ययन कक्ष :----- 
घर में अध्ययन का स्थान ईशान या पश्चिम मध्य में होना चाहिए। टेबल तथा कुर्सी इस प्रकार से रखने चाहिए कि पढ़ते समय मुख उत्तर या पूर्व दिशा में हो। पीठ के पीछे दीवार हो किन्तु खिड़की या दरवाजा न हो तथा बीम के नीचे न हो। बच्चों का कमरा (स्टडी रूम) हल्का बैंगनी, हल्का हरा या गुलाबी रखें। गहरे रंग का इस्तेमाल यहां सही नहीं होता। इससे बच्चों की एकाग्रत और मनन में बाधा आती है। अध्ययन कक्ष में किताब रखने की आलमारी दक्षिणी दीवार पर या पश्चिम दीवार पर होनी चाहिए। आलमारी कभी भी नैऋत्य या वायव्य कोण में नहीं होनी चाहिए। अध्ययन कक्ष का रंग हल्का हरा, बादामी, हल्का आसमानी या सफेद रखना अच्छा होता है। इसी प्रकार से जातक के राशि के रंगों के अनुसार गृह में रंगों का प्रयोग पर्दे,चादर इत्यादि में कभी किया जा सकता है। पढ़ने के क्षेत्र के आसपास टूटी-फूटी चीजें, गंदगी, जूते आदि नहीं होने चाहिए। किताबों की अलमारी कमरे की दक्षिण या पश्चिम की दीवार पर होनी चाहिए। बच्चों को सोते समय पूर्व अथवा दक्षिण में सिर रखकर सोना चाहिए। 
 यह रखें सावधानी--- 
घर को खूबसूरत बनाने में परदों और दीवारों के कलर्स का विशेष महत्व है। यदि आप एलआईजी और एमआईजी टाइप घरों में रहते हैं तो ज्यादा प्रयोग करने से बचें। एलआईजी और एमआईजी टाइप घरों के लिए यह जरूरी है कि आप दीवारों का रंग सफेद रखें, ताकि आप जिस भी रंग के परदे लगाएं वह उससे मेल खा सकें। यदि सफेद रंग पसंद नहीं है तो हल्के रंगों का उपयोग करें। लिविंग रूम में आप स्ट्राइप्स या चेक वाले परदे लगाएं, यह ज्यादा महंगे भी नहीं है। ड्राइंग रूम में एक ही रंग के परदे लगाएं, यह बेहतर लुक देंगे।
          यहां गहरे रंग का कालीन बिछा दें, साथ ही सोफे पर कुशन सजा दें। इस बजट में फर्नीचर और बहुत ज्यादा एसेसरीज बदल पाना संभव नहीं होगा। दीवारों के रंगों के लिए भी महंगे पेंट्स के बजाए डिस्टेंपर यूज में लाएं। एचआईजी टाइप घरों के लिए परदों के साथ ही दीवारों के कलर्स में भी प्रयोग किए जा सकते हैं। इसमें आप दो लेयर वाले परदे से लेकर जूट और सिल्क के परदे तक चयन कर सकते हैं यह बड़े कमरों में अलग ही लुक देंगे। वहीं, फेब्रिक में कॉटन, सिल्क और लेदर ट्रेंडी लगेंगे। फर्नीचर के लिए गहरे रंगों में सिल्क फैब्रिक को प्राथमिकता दें। वहीं, दीवारों को आकर्षक बनाने के लिए पेंटिंग से हटकर सुंदर और आकर्षक वालपेपर्स का उपयोग करें। फर्श को रॉयल लुक देने के लिए प्लास्टिक बेस फ्लोरिंग उपयोग में लाएं। इस बजट में प्लास्टिक पेंट भी बेहतर ऑप्शन हैं। 
 डिजाइनदार कुशन देंगे नया लुक----- 
 कमरे में यदि फर्नीचर की संख्या कम है और वह खाली-खाली लग रहें हो तो अलग-अलग डिजाइन के कुशन उपयोग में लाए जा सकते हैं। एलआईजी व एमआईजी टाइप कमरों में छोटे-ब़ड़े आकार के मिले-जुले कुशन एथनिक लुक देंगे। ये कुशन आजकल मिरर वर्क, क़ढ़ाई, बीड वर्क, एप्लिक वर्क, डोरी वर्क आदि में आते हैं। घर की सुंदरता के लिए आप जमीन में रखने वाले कुशन भी ले सकते हैं। घर की सजावट में आप पेंटिंग भी शामिल कर सकते हैं। यह बहुत ज्यादा महंगे नहीं होते। वहीं, एचआईजी मकानों के लिए ट्रेंडी कारपेट, रग्स और कालीन उपयोग में लाए जा सकते हैं। लिविंग रूम बड़ा है तो इसमें स्टैचू रखे जा सकते हैं। वाटर फाउंटेन डेकोरेटिव पीस भी ट्राई कर सकते हैं। 
 किचन को दें मॉड्यूलर अंदाज------ 
 मॉडयूलर किचन की चाहत तो आपकी भी होगी। चूंकि इस बजट में किचन को मॉड्यूलर नहीं बनाया जा सकता, इसलिए डिश रैक्स, हुक्स, वायरिंग केसेस व बॉक्स आदि ऐसेसरीज बाजार से खरीद लाएं जो किचन को मॉडयूलर लुक देंगे। आप इन्हें ट्राई कर सकते हैं। 
 सजावटी समान---- इंटीरियर में सजावटी वस्तुओं का भी विशेष महत्व है। खासकर ग्लास और ब्रास की बनी चीजें इंटीरियर पर चार चांद लगा देती हैं। इसमें भी महंगे स्पेशल पीस को हाइलाइट करने के लिए उसमें लाइटिंग इफेक्ट दिया जा सकता है। घर की सजावट में एंटीक और आर्ट पीसेज को शामिल करें। लक़ड़ी और मेटल से बनी वस्तुएं भी शामिल की जा सकती हैं। रोशनी के लिए डेकोरेटिव टेबल लैंप और स्टैंडिंग लैंप लगाएं। सिल्क प्लांट भी लगा सकते हैं, यह देखने में खूबसूरत, सस्ते और टिकाऊ होते हैं। घर के अंदर यदि सीढ़‍ियां है तो हैंगिंग गार्डन या गमला रखा जा सकता है।
 लाइटिंग---- होम डेकोरेशन में लाइटिंग काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह क्लासी होने के साथ-साथ हैवी न हो। घर कैसा भी क्यों न हो इसमें बेडरूम यह घर का मुख्य भाग होता है। इसलिए, बेडरूम के लिए सॉफ्ट शूदिंग रोशनी ही चुनें। इससे आप रिलेक्स महसूस करेंगे और आपका मन प्रसन्नता का अनुभव करेगा। बेड, कबर्ड और आइने के लिए अलग-अलग लाइट रखें। लिविंग रूम में फोकल लाइटिंग का इस्तेमाल करें। घर के किसी कोने को उभारने के लिए ट्रेक लाइट उपयोग में लाएं। स्टाइलिश लुक के लिए फेयरी लाइट्स बेहतर है। 
         यदि आप झूमर लगा रहे हैं तो इसके साथ दूसरे लाइट उपयोग न करें। किचन में हमेशा व्हाइट लाइट का ही उपयोग करें, ताकि देखने में आसानी हो। डायनिंग रूम में कभी भी ब्राइट कलर की लाइट न लगाएं वास्तुशास्त्र के इन सामान्य सूत्रों के प्रयोगकर आप अपने जीवन में अधिक वैभव,सुख एवं लाभ प्राप्त कर सकतें हैं।

वास्तु अनुसार कैसा होना चाहिए बच्चों का कमरा और उनका स्डडी रूम

 किसी भी भवन का जब निर्माण किया जाए तब उसमें वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों का भलीभांति पालन करना चाहिए चाहे वह निवास स्थान हो या व्यवसायिक परिसर है। इस युग में शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हो गया हैं और बदलते हुए जीवन-मूल्यों के साथ-साथ शिक्षा के उद्धेश्य भी बदल गये हैं। शिक्षा व्यवसाय से जुड़ गई हैं और छात्र-छात्राएं व्यवसाय की तैयारी के रूप में ही इसे ग्रहण करते है। अधिकांश अभिभावकों एवं विद्यार्थियों की चिंता यह रहती हें कि क्या पढा जाएं ताकि अच्छा केरियर निर्मित हो आज के युग को देखते हुए ज्योतिष के माध्यम से शिक्षा का चयन उपयोगी हो सकता हैं ।

वास्तु अनुसार कैसा होना चाहिए बच्चों का कमरा और उनका स्डडी रूम

        आज का भवन तो आलीशान होता है, सभी सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होता है फिर भी उसके अनुशासन व पढाई के स्तर में निरंतर गिरावट आती चली जाती है बच्चे भी अध्ययन के प्रति रूचि नहीं दिखाते हैं। भवन का निर्माण करते समय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से सफलता प्राप्त की जा सकती है। प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य उद्धेश्य ज्ञान प्राप्ति होता था । विद्यार्थी किसी योग्य विद्वान के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण करते थे । 
        इसके अतिरिक्त उसे शस्त्र संचालन एवं विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण भी दिया जाता था । किन्तु वर्तमान समय मंे यह सभी प्रशिक्षण लगभग गौण हो गये । शिक्षा की महत्ता बढ़ने व प्रतिस्पर्धात्मक युग में सजग रहते हुए बालक के बोलने व समझने लगते ही माता-पिता शिक्षा के बारे में चिंतित हो जाते हैं । 
       प्रतियोगिता के इस युग में लगभग सभी परिवार अपने बच्चों के कैरियर को लेकर काफी परेशान नजर आते हैं।बच्चों का न तो पढ़ने में मन लगता है और बड़ी मुश्किल से ही पास हो पाते हैं, स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। इस कारण पढ़ने में काफी पिछड़ता जा रहा है।हम देखते हैं कि कई बच्चे खेलते-कूदते व मस्ती करते रहते हंै ज्यादा अध्ययन भी करते हुए नहीं पाए जाते हैं पर जब उनका परीक्षा परिणाम आता है तो वह बच्चे अच्छे नम्बरों से पास होते हंै। 
         इसके विपरीत कई बच्चे अपना अत्यधिक समय अध्ययन में लगाते हैं। उन्हें परिवार के लोग भी काफी सहयोग करते हैं पर परीक्षा में या तो अनुत्तीर्ण हो जाते हैं या कम नंबरांे से पास होते हैं। जहां भी वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत अध्ययन कक्ष की बनावट हो तो उस कमरे मे पढ़ने वाले विद्यार्थी विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करते हैं और पढ़ाई में पिछड़ते जाते हैं। बच्चों का कैरियर उनकी अच्छी पढ़ाई लिखाई पर ही निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में यदि माता-पिता एवं विद्यार्थी थोड़ी सी सतर्कता बरतें एवं वास्तु के कुछ साधारण से नियमों का पालन करें तो कम मेहनत कर अच्छे नंबरों से पास होंगे। उनका भविष्य भी उज्जवल होगा।वास्तु शास्त्र के अनुसार पूर्व , उत्तर एवं ईशान ;छण्म्ण्द्ध दिशाएँ ज्ञानवर्धक दिशाएँ कहलाती हैं अतः पढ़ते समय हमें उत्तर , पूर्व एवं ईशान दिशा की ओर मुँह करके पढ़ना चाहिए।
          परिस्थिती वश यदि हमारा अध्ययन कक्ष पश्चिम दिशा में भी हो तो पढते समय हमारा मुँह उपरोक्त दिशाओं की ओर ही होना चाहिए। विज्ञान के अनुसार इंफ्रा रेड किरणें हमें उत्तरी पर्वी कोण अर्थात ईशान कोण से ही मिलती हैं, ये किरणें मानव शरीर तथा वातावरण के लिए अत्यन्त लाभदायक हैं जो शरीर की कोशिकाओं को शक्ति प्रदान करती हैं , और शरीर में एकाग्रता प्रदान करती हैं। आजकल अधिकांश स्थानो पर स्कुल में एक्जाम/ परीक्षाएं चल रही हैं ..कुछ जगहों पर स्कुल खुल चुके हैं एवं उन सभी में पढ़ाई आरम्भ हो चुकी हैं.. 
आइये जाने की वास्तु अनुसार कैसा होना चाहिए बच्चों का कमरा और उनका स्डडी रूम / अध्ययन कक्ष/ पढाई का कमरा कहाँ और केसा होना चाहिए ताकी उनका मन पढ़ाई में लगा रहे और वे सभी अच्छे नंबरों से उत्त्तीर्ण हो जाएँ... 
 -- अध्ययन कक्ष हो सके तो भवन के पश्चिम या ईशान कोण मे ही बनाना चाहिये। पर भवन के नैत्रत्य व आग्नेय मे कभी भी अध्ययन कक्ष नही बनाना चाहिए। 
 -- विद्यार्थियों को पढ़ते समय मूॅह पूर्व या उत्तर की ओर रख कर ही अध्ययन करना चाहिए। 
--- विद्यार्थियों को दरवाजे की तरफ पीठ करके कभी भी अध्ययन नही करना चाहिये।
 --- विद्यार्थियों को किसी बीम या परछत्ती के नीचे बैठकर पढ़ना या सोना नहीं चाहिए इससे मानसिक तनाव उत्पन्न होता है।
 --- विद्यार्थी चाहे तो अपने अध्ययन कक्ष मे सो भी सकते है। अर्थात् कमरे को स्टडी कम बेडरुम बनाया जा सकता है। 
 ---- स्टडी रुम का दरवाजा ईशान, पूर्व, दक्षिण आग्नेय, पश्चिम वायव्य व उत्तर मे होना चाहिये। अर्थात् पूर्व आग्नेय, दक्षिण पश्चिम नैऋत्य, एवं उत्तर वायव्य मे नही होना चाहिये। स्टडी रुम मे यदि खिड़की हो तो पूर्व, पश्चिम या उत्तर की दीवार मे ही होना चाहिए। दक्षिण मे नही। 
 ---- विद्यार्थियों को सदैव दक्षिण या पश्चिम की ओर सिर करके सोना चाहिए। दक्षिण में सिर करके सोने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है, और पश्चिम में सिर करके सोने से पढ़ने की ललक बनी रहती है। 
---- अध्ययन कक्ष के ईशान कोण मे अपने आराध्य देव की फोटो व पीने के पानी की व्यवस्था भी रख सकते है। 
---- किताबों का रॅक्स दक्षिण, पश्चिम मे रखे जा सकते है। पर नैत्रत्य व वायव्य मे नही रखना चाहिये। क्योकि नैऋत्य के रॅक्स कि किताबे बच्चे निकाल कर कम पढ़ते है व वायव्य मे किताबे चोरी होने का भय रहता है। 
---- किताबे स्टडी रुम मे खुले रॅक्स मे ना रखें। खुली किताबे नकारात्मक उर्जा उत्पन्न करती है इससे स्वास्थ्य भी खराब होता है अतः रॅक्स के उपर दरवाजा अवश्य लगाये। 
-----यदि आप अच्छा केरियर बनाना चाहते हेै तो स्टडी रुम मे अनावश्यक पुरानी किताबे व कपड़े न रखें। अर्थात् किसी भी किस्म का कबाड़ा कमरे मे नही होना चाहिए। 
---अध्ययन कक्ष की दीवार व परदे का कलर हल्का आसमानी, हल्का हरा, हल्का बदामी हो तो बेहतर है। सफेद कलर करने पर विद्यार्थियों पर सुस्ती छाई रहती है। 
----अध्ययन कक्ष के साथ यदि टायलेट हो तो उसका दरवाजा हमेशा बन्द रखे। टायलेट को ज्यादा ना सजाये। साफ सफाई का पूरा ध्यान रखें। ---- यदि कमरे मे एक से अधिक बच्चे पढ़ते है तो उनके हँसते मुस्काते हुए सामूहिक फोटो स्टडी रुम मे अवश्य लगाये इससे उनमे मिल जुलकर रहने कि भावना विकसित होगी। 
---- यदि विद्यार्थी अपने अध्ययन में यथोचित सफलता नहीं पा रहे हैं तो अध्ययन कक्ष के द्वार के बाहर अधिक प्रकाश देने वाला बल्ब लगाएं जो 24 घंटे जलता रहे। 
----यदि विद्यार्थी वास्तु के उपरोक्त सामान्य नियमों का पालन करते है तो उन्हे बहुत ज्यादा समय स्टडी रुम मे बिताने की जरुरत नही रहेगी। उन्हे अन्य गतिविधियों जैसे खेलना कूदना इत्यादि के लिये समय भी मिलेगा साथ ही विद्यार्थी अच्छे नम्बरो से पास होकर अपने केरियर और अपना भविष्य उज्वल कर सकेंगे। 
---- यदि विद्यार्थी कम्प्यूटर का प्रयोग करते है तो कम्प्यूटर आग्नेय से लेकर दक्षिण व पश्चिम के मध्य कही भी रख सकते है। ध्यान रहै ईषान कोण में कम्प्युटर कभी न रखें। ईषान कोण में रखा कम्प्युटर बहुत ही कम उपयोग में आता है। 
----यदि सूर्य की सुबह की किरणे कमरे मे आती हो तो खिड़की दरवाजे सुबह के वक्त खोलकर रखना चाहिये। ताकि सुबह की लाभदायक सूर्य की उर्जा का लाभ ले सके। पर यदि सूर्य की शाम की किरणें आती है तो बिलकुल न खोले। ताकि दोपहर के वक्त के बाद की नकारात्मक उर्जा से बचा जा सके। 
---- बच्चों का फेस पढ़ते समय उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए। एक छोटा सा पूजा स्थल अथवा मंदिर बच्चों के कमरे की ईशान दिशा में बनाना उत्तम है। इस स्थान में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की मूर्ति अथवा तस्वीर लगाना शुभ है। 
-----कमरे का ईशान कोण का क्षेत्र सदैव स्वच्छ रहना चाहिए और वहां पर किसी भी प्रकार का व्यर्थ का सामान, कूड़ा, कबाड़ा नहीं होना चाहिए। अलमारी, कपबोर्ड, पढ़ने का डेस्क और बुक शेल्फ व्यवस्थित ढंग से रखा जाना चाहिए। सोने का बिस्तर नैऋत्य कोण में होना चाहिए। सोते समय सिर दक्षिण दिशा में हो, तो बेहतर है। परंतु, बच्चे अपना सिर पूर्व दिशा में भी रख कर सो सकते हैं।
 ==कमरे के मध्य में भारी सामान न रखें।कमरे में हरे रंग के हल्के शेड्स करवाना उत्तम है। इससे बच्चों में बुद्धिमता की वृद्धि होती है। कमरे के मध्य का स्थान बच्चों के खेलने के लिए खाली रखें। बच्चों के कमरे का द्वार कभी भी सीढ़ियों अथवा शौचालय से सटा न हो, अन्यथा ऐसे परिवार के बच्चे मां-बाप के नियमानुसार अनुसरण नहीं करेंगे। बच्चों के कक्ष के ईशान कोण और ब्रह्म स्थान की ओर भी विशेष ध्यान दें कि वहां पर बेवजह का सामान एकत्रित न हो। यह क्षेत्र सदैव स्वच्छ और बेकार के सामान से मुक्त होना चाहिए। क्या आपके बच्चे का पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता? 
=== हो सकता है आपके बच्चों के स्डडी रूम में कहीं न कहीं से नकारात्मक ऊर्जा आ रही हो। पढ़ाई में कॉनसन्ट्रेशन बढ़ाने, याददाश्त बढ़ाने के लिए इन साधारण वास्तु टिप्स को फॉलो करें। शायद आपकी चिंता दूर हो जाए...
 ==स्टडी रूम यानी जीवन का अहम् हिस्सा जहाँ यूथ अपना अधिक से अधिक समय बिताते हैं। यदि यह आपको सूट न करे तो बड़ी गड़बड़ हो सकती है और आपका ध्यान पढाई से हट भी सकता है। 
==स्डडी रूम व्यवस्थित रखें :-- आपके बच्चों से कहें पुरानी किताबें, नोट्स, मेल्स, स्टेशनरी सभी स्टडी रूम से बाहर करें। रोज़ाना आपके बच्चों को स्टडी रूम को साफ करने की आदत डाल लें। 
== टेबल के सामने अपने इष्ट देवता, माता-पिता या किसी महान व्यक्ति की तस्वीर लगा सकते हैं, मगर फिल्म स्टार या बेहूदी फोटो न लगाएँ। 
==कलर : आपके बच्चों के स्डडी रूम में लेमन यलो और वॉयलेट कलर मेमरी और कॉनसन्ट्रेशन बढ़ाने में मददगार होते हैं। आपके बच्चों के स्डडी रूम की दीवारों और टेबल-कुर्सी के लिए इन रंगों का इस्तेमाल अच्छा रहेगा।
 ==कमरे का और स्टडी टेबल का रंग राशि के अनुसार हो। मेष और वृश्चिक सफेद व पिंक का प्रयोग करें। वृषभ और तुला सफेद-ग्रीन का इस्तेमाल करें। मिथुन और कन्या ग्रीन, सिंह ब्ल्यू, कर्क रेड एवं व्हाइट, धनु-मीन पीले-सुनहरे और मकर-कुंभ ब्ल्यू के सारे शेड्स का प्रयोग करें। इन साधारण किंतु चमत्कारिक वास्तुशास्त्र सिद्धांतों के आधार पर यदि अध्ययन कक्ष का निर्माण किया जाऐ तो उत्तरोतर प्रगति संभव है।
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