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वास्तु का मतलब केवल तोड़फोड़ ही नहीं होता।, यह एक सम्पूर्ण विज्ञानं हैं..

          वास्तु का मतलब भवन में तोड़फोड़ नहीं होता।।। यह एक विज्ञानं हैं जो वेदिक कल से प्रचलन में किन्तु पिछले कुछ समय मिडिया के कारण वास्तु शास्त्र काफी चर्चा में है। इसे लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां फैलायी जा रही है। कुछ धंधेबाजों ने इसे पूजा पाठ और कर्मकांड से जो़ड़कर अपने यजमानों को डराना-धमकाना नियम सा बना लिया है। वास्तु दोष का भय दिखाकर वह दोहन तो करते हैं ही भवन में तरह-तरह की तोड़फोड़ भी कराते रहते हैं। वास्तु की चर्चा के दौरान ऐसे लोगों का ध्यान वास्तु शास्त्र की जटिलता पर कम, सामने वाली की जेब पर ज्यादा होता है। उन्हें सही मायने में यह भी पता नहीं होता कि वास्तु शास्त्र धर्म है, कला है अथवा विज्ञान। इस सवाल पर वे बगलें झांकने लगते है। 
 Sabotage-is-not-only-the-architectural-means-Its-a-whole-science-वास्तु का मतलब केवल तोड़फोड़ ही नहीं होता।, यह एक सम्पूर्ण विज्ञानं हैं..            वास्तु के बारे में उनकी अधकचरी जानकारी ने इस एक सार्वभौम और सार्वकालिक वैज्ञानिक पद्यति को लेकर जनमानस में तरह-तरह का भ्रम पैदा कर दिया है। वास्तुशास्त्र को लेकर मे मन में भी तमाम तरह की जिज्ञासा थी। इस दिशा मैं अपने को वास्तुविद् बताने वाले तथा वास्तु समाधान की दुकान खोलकर बैठे कई महानुभावों से मिला लेकिन सबने पण्डे-पुजारियों जैसी बातें की। इसी दौरान मेरी मुलाकात पंडित दयानन्द शास्त्री हुई । दयानन्द शास्त्री जी ने ज्योतिषीय अनुभव लेने के बाद वास्तु शास्त्र में रुचि ली, तो गहरे उतरते गये। उन्होंने वड़ोदरा में 2004 में जितेन भट्ट से पायरा वास्तु का प्रशिक्षण प्राप्त किया।। मेरठ में डॉक्टर संजीव अग्रवाल से विधिवत अनुभव और प्रशिक्षण प्राप्त किया।। उन्होंने इस दिशा में गहन शोध किया। 
           देश के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण कर वहां वास्तु शास्त्र से संबंधित विषय वस्तु का अध्ययन किया तथा स्वदेशी मूल के आर्किटेक्चरल इंजीनियर भिलाई से आनंद वर्मा जी, मुम्बई से अशोक सचदेवा जी,उज्जैन से कुलदीप सलूजा जी, उदयपुर से निरंजन भट्ट जी, डॉक्टर श्री कृष्ण जुगनू जी, जयपुर से सतीश शर्मा जी, श्री प्रह्लाद राय काबरा जी, गाजियाबाद से कर्नल त्यागी, पंडित शिव कुमार शर्मा जी, दिल्ली से आइफास संस्थान, सूरतगढ़ से एस.के.सचदेवा जी, दिल्ली से श्री अरुण वंसल जी, पंडित गोपाल शर्मा,डॉक्टर आनन्द भारद्वाज, इंदौर से पंकजअग्रवाल, मुम्बई से नितिन गोठी जी, पुणे से दिलीप नाहर जी और डॉक्टर पाठक, औरंगाबाद से मग्गिरवार सर और लखनऊ से श्री गणेश ताम्रकार जी के साथ साथ अन्य अनेक वास्तु विद्वानों का सानिध्य मिला जिनका वास्तु पर भी बेहतर काम है , के सम्पर्क में रहे तथा उनसे काफी कुछ सीखा। 
वास्तु को लेकर पंडित दयानन्द शास्त्री ने कई प्रयोग किये जो समय की कसौटी पर खरे उतरे। यहां प्रस्तुत है वास्तु के विविध पहलुओं पर उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश- 
  1.  -वास्तु शास्त्र क्या है? यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि वास्तु विज्ञान है अथवा कला लेकिन मेरी दष्टि पूर्ण विज्ञान भी है और कला भी। यह हमारी उस वैदिक अवधारणा पर आधारित है जिसमें भारतीय मनीषियों ने समाज में "सर्वे भवंतु सुखिन, सर्वे संतु निरामया" की कल्पना की है। यह एक ऐसा विज्ञान है जिसका उपयोग व्यक्ति के सुखी और स्वास्थ्य जीवन के लिए किया जाता है। यह उर्जा का विज्ञान है जिसमें भवन, उसमें निवास करने वालों तथा उसके परिवेश की उर्जाओं में संतुलन बैठाने की कोशिश की जाती है। वास्तु अंतरिक्ष, भूमि व क्वांटम ऊर्जा में संतुलन बनाने की प्रक्रिया का नाम है। यह संतुलन ही व्यक्ति को सुखी और सम्पन्न बनाता है।
  2.  - वास्तु जैसा कोई प्रयोग या विद्या भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में है? पूरी दुनिया की सभी विकसित परम्पराओं में वास्तु उर्जा विज्ञान का प्रयोग भिन्न-भिन्न रूपों में हो रहा है। जर्मन, फ्रांस सहित कई देशों में वास्तु शास्त्र को ‘विल्डिंग बायोलॉजी’ के नाम से जाना जाता है। वहां इस दिशा में निरंतर शोध हो रहे हैं। यूरोपीय देशों में इसे ‘जिओमेंसी’ चीन में इसे ‘फेंगशुई’ तथा रूस ब्रिटेन में इसे ‘सेक्रेड ज्यामेट्री’ के नाम से पुकारते हैं। प्राय: सभी देशों में इस विद्या का मूल उद्देश्य है भूमि, प्रकृति व अंतरिक्ष की उर्जा के साथ भवन का इस प्रकार संतुलन बनाना कि वह अपने निवासियों के अनुकूल हो। इस भवन में रह रहे लोग सुखी तथा भौतिक व आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हों। दरअसल दिशा वास्तु, उर्जा वास्तु, वनस्पति वास्तु, भूमि वास्तु, तथा मानव वास्तु मिलकर वास्तुशास्त्र का निर्माण करते हैं। इन सभी के संतुलन में ही मानव कल्याण निहित है।
  3.  -आप व्यक्ति, भवन अथवा वातावरण की ऊर्जा को कैसे मापते हैं? प्रत्येक आदमी का अपना एक आभामंडल होता है। यह अंगूठे के निशान की भांति नीजी होता है। इसे व्यक्ति की इलेक्ट्रो डायेनेमिक फिल्ड भी कहते हैं। यह फिल्ड या आभामंडल आसपास की ऊर्जा को प्रभावित करता है अथवा प्रभावित होता है। इस आभामंडल को घर अथवा कार्यालय जहां व्यक्ति रहता है वहां की ऊर्जा उद्वेलित करती है। यह उद्वेलन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकता है। इस तरह की ऊर्जा को मापने के यंत्र भी हैं। जर्मनी वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत लेकर एंटीना एक ऐसा ही यंत्र है जो मानव शरीर की विभिन्न प्रकार की उर्जाओं की प्रकृति तथा उनकी माप को निर्धारित करता है। वास्तु व्यक्ति, भवन तथा वातावरण की उर्जाओं में समन्वय स्थापित करने का विज्ञान है ताकि व्यक्ति सुखी हो।। 
  4.   - वास्तु दोष निवारण के नाम पर मकान में प्राय: तोडफ़ोड़ की बात सामने आती है। क्या यह उचित है? वास्तु शास्त्र को लेकर लोगों में बहुत भ्रांतियां हैं। दरअसल वैज्ञानिक रूप से भवन में सकारात्मक उर्जा का संतुलन तथा नकारात्मक उर्जा का रोध ही वास्तु दोष निवारण है। जो वास्तु को सही ढंग से नहीं समझते वह वास्तु दोष निवारण के लिए तोडफ़ोड़ कराते हैं। सच तो यह है कि ऐसा करके वे एक नया वास्तु दोष पैदा कर देते हैं। गहन जानकारी के बिना तोडफ़ोड़ करके वास्तु सुधार ठीक वैसे ही है जैसे किसी सामान्य आदमी से कोई जटिल ऑपरेशन कराना। वास्तु में उर्जा की शुद्धि अथवा सकारात्मक उर्जा की आपूर्ति के लिए किसी तरह के तोडफ़ोड़ की जरूरत नहीं पड़ती। सच तो यह है कि मकान में तोडफ़ोड़ करने से लाभ की जगह अधिकांश मामलों में हानि होती है। सामान्यतया कास्मिक, ग्लोबल तथा टेल्युरिक उर्जाओं का संतुलन गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक है। इसके लिए किसी प्रकार की तोडफ़ोड़ की जरूरत नहीं होती।। 
  5.  -वास्तु सुधार को लेकर इतना आग्रह क्यों? दरअसल वास्तु शास्त्र व्यक्ति की प्रगति और समृद्धि का विज्ञान है। यह अनुकूल है तो जीवन में सब शुभ-शुभ वरना तरह-तरह की परेशानियां पैदा होती रहती हैं। इसका समय रहते इलाज भी हो जाना चाहिए वरना बढ़ते घाव की तरह उपेक्षा करने पर यह भी नासूर बन जाता है। भवन के आकार , उसकी भौगोलिक तथा देशिक स्थिति, उसका उपयोग करने वालों के कारण उर्जा विशेष प्रकार का रूप तथा गुण धारण कर लेती है। यह भवन का उपयोग करने वालों के अनुकूल या प्रतिकूल हो सकती है। अनुकूलता तो सुखद होती है, लेकिन प्रतिकूलता जीवन के समस्त कारोबार को प्रभावित करती है।
  6.  - प्रतिकूल या अनुकूल उर्जा का आंकलन कैसे करेंगे? विदेशों खासकर जर्मनी में इस दिशा में निरंतर शोध हो रहा है। ऐसे-ऐसे यंत्र विकसित हो गये हैं जो भवन की नकारात्मक व सकारात्मक उर्जा के मापन में सक्षम हैं। यह उर्जा सर्वत्र विद्यमान है। इन्हें आकर्षित करने का गुण हमारे अंदर है। हम सकारात्मक उर्जा का आह्वान कर अपने घर का वास्तु दोष दूर कर सकते हैं.

आइये जाने वास्तु में रंगों का महत्व

Let-look-at-the-architectural-significance-of-colors-आइये जाने वास्तु में रंगों का महत्व          किसी भवन की ऊर्जा को संतुलित करना वास्तुं का मूल ध्येय है। ऊर्जा विज्ञान की एक उप शाखा है कम्पन विज्ञान। यदि कम्पन विज्ञान पर नजर डालें तो ज्ञात होता है कि ब्रहमाण्‍ड तो कम्पन का अथाह महासागर है। वस्तुओं की प्रकृतियां उनके कम्पनों के मुताबिक होती हैं। इस सत्य को अगर हम वास्तु के संदर्भ में अध्ययन करें और गंभीरता से देखें तो विदित होता है कि हम अपने चारों तरफ व्याप्त कम्पनों से प्रभावित हो रहे हैं। विभिन्न‍ प्रकार के ये कम्पन विद्युत चुम्‍बकीय क्वां टम अथवा एस्ट्रषल स्तर पर हो सकते हैं। रंग और ध्‍वनि के स्तर से ये हमको प्रभावित करते हैं। 
        कहने की जरूरत नहीं है कि रंग और ध्वनि इस प्रकार की ऊर्जाएं हैं जिन्होंने प्रकृति एवं वातावरण के माध्यम से हमें अपने वर्तुल में घेर रखा है। यही कारण है कि वास्तु् विज्ञान में ध्वनियों तथा रंगों का स्‍थान अत्यंधिक महत्वपूर्ण है। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शुभ रंग भाग्योदय कारक होते हैं और अशुभ रंग भाग्य में कमी करते हैं। विभिन्न रंगों को वास्तु के विभिन्न तत्वों का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग जल का, भूरा पृथ्वी का और लाल अग्नि का प्रतीक है। 
          वास्तु और फेंगशुई में भी रंगों को पांच तत्वों जल, अग्नि, धातु, पृथ्वी और काष्ठ से जोड़ा गया है। इन पांचों तत्वों को अलग-अलग शाखाओं के रूप में जाना जाता है। इन शाखाओं को मुख्यतः दो प्रकारों में में बाँटा जाता है, ‘दिशा आधारित शाखाएं’ और ‘प्रवेश आधारित शाखाएं’। दिशा आधारित शाखाओं में उत्तर दिशा हेतु जल तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले रंग नीले और काले माने गए हैं। दक्षिण दिशा हेतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधि काष्ठ तत्व है जिसका रंग हरा और बैंगनी है। प्रवेश आधारित शाखा में प्रवेश सदा उत्तर से ही माना जाता है, भले ही वास्तविक प्रवेश कहीं से भी हो। इसलिए लोग दुविधा में पड़ जाते हैं कि रंगों का चयन वास्तु के आधार पर करें या वास्तु और फेंगशुई के अनुसार। 
          यदि फेंगशुई का पालन करना हो, तो दुविधा पैदा होती है कि रंग का दिशा के अनुसार चयन करें या प्रवेश द्वार के आधार पर। दुविधा से बचने के लिए वास्तु और रंग-चिकित्सा की विधि के आधार पर रंगों का चयन करना चाहिए। रंग चिकित्सा पद्दति का उपयोग किसी कक्ष के विशेष उद्देश्य और कक्ष की दिशा पर निर्भर करती है। रंग चिकित्सा पद्दति का आधार सूर्य के प्रकाश के सात रंग हैं। इन रंगों में बहुत सी बीमारियों को दूर करने की शक्ति होती है। इस दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी कक्ष, जिसे घर का सबसे पवित्र कक्ष माना जाता है, में सफेद या बैंगनी रंग का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अन्य गाढे़ रंगों का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए। दक्षिण-पूर्वी कक्ष में पीले या नारंगी रंग का प्रयोग करना चाहिए, जबकि दक्षिण-पश्चिम कक्ष में भूरे, ऑफ व्हाइट या भूरा या पीला मिश्रित रंग प्रयोग करना चाहिए। यदि बिस्तर दक्षिण-पूर्वी दिशा में हो, तो कमरे में हरे रंग का प्रयोग करना चाहिए। उत्तर पश्चिम कक्ष के लिए सफेद रंग को छोड़कर कोई भी रंग चुन सकते हैं। रंगों का महत्व हमारे जीवन पर बहुत गहरा होता है। रंग हमारे विचारों को प्रभावित करते हैं तथा हमारी सफलता व असफलता के कारक भी बनते हैं। 
आइए वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री से जानते हैं कि किस रंग का वास्तु में क्या महत्व है— 
  1. पीला रंग:- यह रंग हमें गर्माहट का अहसास देता है। इस रंग से कमरे का आकार पहले से थोड़ा बड़ा लगता है तथा कमरे में रोशनी की भी जरूरत कम पड़ती है। अत: जिस कमरे में सूर्य की रोशनी कम आती हो, वहाँ दीवारों पर हमें पीले रंग का प्रयोग करना चाहिए। पीला रंग सुकून व रोशनी देने वाला रंग होता है। घर के ड्राइंग रूम, ऑफिस आदि की दीवारों पर यदि आप पीला रंग करवाते हैं तो वास्तु के अनुसार यह शुभ होता है।
  2.  गुलाबी रंग:- यह रंग हमें सुकून देता है तथा परिवारजनों में आत्मीयता बढ़ाता है। बेडरूम के लिए यह रंग बहुत ही अच्छा है। 
  3. नीला रंग:- यह रंग शांति और सुकून का परिचायक है। यह रंग घर में आरामदायक माहौल पैदा करता है। यह रंग डिप्रेशन को दूर करने में भी मदद करता है। 
  4. जामुनी रंग:- यह रंग धर्म और अध्यात्म का प्रतीक है। इसका हल्का शेड मन में ताजगी और अद्‍भुत अहसास जगाता है। बेहतर होगा यदि हम इसके हल्के शेड का ही दीवारों पर प्रयोग करें। 
  5. नारंगी रंग:--- यह रंग लाल और पीले रंग के समन्वय से बनता है। यह रंग हमारे मन में भावनाओं और ऊर्जा का संचार करता है। इस रंग के प्रभाव से जगह थोड़ी सँकरी लगती है परंतु यह रंग हमारे घर को एक पांरपरिक लुक देता है। 
  6. अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए आपको अपने कमरे की उत्तरी दीवार पर हरा रंग करना चाहिए। 
  7. आसमानी रंग जल तत्व को इंगित करता है। घर की उत्तरी दीवार को इस रंग से रंगवाना चाहिए।
  8.  घर के खिड़की दरवाजे हमेशा गहरे रंगों से रंगवाएँ। बेहतर होगा कि आप इन्हें डार्क ब्राउन रंग से रंगवाएँ। 
  9. जहाँ तक संभव हो सके घर को रंगवाने हेतु हमेशा हल्के रंगों का प्रयोग करें। 

          वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी भवन में गृहस्वामी का शयनकक्ष तथा तमाम कारखानों, कार्यालयों या अन्य भवनों में दक्षिणी-पश्चिम भाग में जी भी कक्ष हो, वहां की दीवारों व फर्नीचर आदि का रंग हल्का गुलाबों अथवा नींबू जैसा पीला हो, तो श्रेयस्कर रहता है। पिंक या गुलाबी रंग को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह आपसी सामंजस्य तथा सौहार्द में वृद्धि करता है। इस रंग के क्षेत्र में वास करने वाले जातकों की मनोभावनाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि होली जैसे, पवित्र त्यौहार पर गुलाबी रंग का प्रयोग सबसे ज्यादा किया जाता है। इस भाग में गहरे लाल तथा गहरे हरे रंगों का प्रयोग करने से जातक की मनोवृत्तियों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसी प्रकार उत्तर-पश्चिम के भवन में हल्के स्लेटी रंग का प्रयोग करना उचित रहता है। 
            वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यह भाग घर की अविवाहित कन्याओं के रहने या अतिथियों के ठहरने हेतु उचित माना जाता हैं। इस स्थान का प्रयोग मनोरंजन कक्ष, के रूप में भी किया जा सकता है। किसी कार्यालय के उत्तर-पश्चिम भाग में भी स्लेटी रंग का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। इस स्थान का उपयोग कर्मचारियों के मनोरंजन कक्ष के रूप में किया जा सकता है। वास्तु या भवन के दक्षिण में बना हुआ कक्ष छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त माना जाता है। चूंकि चंचलता बच्चों का स्वभाव है, इसलिए इस भाग में नारंगी रंग का प्रयोग करना उचित माना जाता है। इस रंग के प्रयोग से बच्चों के मन में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता है। इसके ठीक विपरीत इस भाग में यदि हल्के रंगों का प्रयोग किया जाता है, तो बच्चों में सुस्ती एवं आलस्य की वृद्धि होती है। 
           वास्तु या भवन में पूरब की ओर बने हुए कक्ष का उपयोग यदि अध्ययन कक्ष के रूप में किया जाए, तो उत्तम परिणाम पाया जा सकता है।। वास्तुशास्त्री पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सामान्यतः सफेद रंग सुख समृद्धि तथा शांति का प्रतीक है यह मानसिक शांन्ति प्रदान करता है। लाल रंग उत्तेजना तथा शक्ति का प्रतीक होता है। यदि पति-पत्नि में परस्पर झगड़ा होता हो तथा झगडे की पहल पति की ओर से होती हो तब पति-पत्नि अपने शयनकक्ष में लाल, नारंगी, ताम्रवर्ण का अधिपत्य रखें इससे दोनों में सुलह तथा प्रेम रहेगा। काला, ग्रे, बादली, कोकाकोला, गहरा हरा आदि रंग नकारात्मक प्रभाव छोडते हैं। अतः भवन में दिवारों पर इनका प्रयोग यथा संभव कम करना चाहिये। 
         गुलाबी रंग स्त्री सूचक होता है। अतः रसोईघर में, ड्राईंग रूम में, डायनिंग रूम तथा मेकअप रूम में गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग करना चाहिये। शयन कक्ष में नीला रंग करवायें या नीले रंग का बल्व लगवायें नीला रंग अधिक शांतिमय निद्रा प्रदान करता है। विशेष कर अनिद्रा के रोगी के लिये तो यह वरदान स्वरूप है। अध्ययन कक्ष में सदा हरा या तोतिया रंग का उपयोग करें। रंग चिकित्सा पद्दति का उपयोग किसी कक्ष के विशेष उद्देश्य और कक्ष की दिशा पर निर्भर करती है। रंग चिकित्सा पद्दति का आधार सूर्य के प्रकाश के सात रंग हैं। इन रंगों में बहुत सी बीमारियों को दूर करने की शक्ति होती है। इस दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी कक्ष, जिसे घर का सबसे पवित्र कक्ष माना जाता है, में सफेद या बैंगनी रंग का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अन्य गाढे़ रंगों का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए। 
          दक्षिण-पूर्वी कक्ष में पीले या नारंगी रंग का प्रयोग करना चाहिए, जबकि दक्षिण-पश्चिम कक्ष में भूरे, ऑफ व्हाइट या भूरा या पीला मिश्रित रंग प्रयोग करना चाहिए। यदि बिस्तर दक्षिण-पूर्वी दिशा में हो, तो कमरे में हरे रंग का प्रयोग करना चाहिए। उत्तर पश्चिम कक्ष के लिए सफेद रंग को छोड़कर कोई भी रंग चुन सकते हैं। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सभी रंगों के अपने सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव हैं। इस प्रकार रंगों का हमारे जीवन व स्वास्थ्य पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
          घर की दीवारों पर रंगों का उचित संयोजन करके अपने जीवन को इसी प्रकार वास्तु या भवन में उत्तर का भाग जल तत्व का माना जाता है। इसे धन यानी लक्ष्मी का स्थान भी कहा जाता है। अतः इस स्थान को अत्यंत पवित्र व स्वच्छ रखना चाहिए और इसकी साज-सज्जा में हरे रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए। 
          वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सभी जानते हे कि रंग नेत्रों के माध्यम से हमारे मानस में प्रविष्ट होते हैं एवं हमारे स्वास्थ्य, चिंतन, आचार-विचार आदि पर इनका गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः उचित रंगों का प्रयोग सही स्थान पर करके हम वांछित लाभ पा सकते हैं।

जानिए घर-परिवार के झगड़े खत्म करने के 8 आसान वास्तु उपाय

Here-are-8-easy-home-building-measures-to-eliminate-family-fights-जानिए घर-परिवार के झगड़े खत्म करने के 8 आसान वास्तु उपायघर में कई अलग-अलग स्वभाव वाले लोग रहते हैं। ऐसे में कई बार एक-दूसरे से आदतें और विचार मेल नहीं खाते हैं। जिससे अक्सर घर के लोगों में मन-मुटाव और झगड़े होने लगते हैं। इन झगड़ों की वजह से घर में हमेशा ही अशांति और क्लेश का माहौल बना रहता है। वास्तु के कुछ छोटे-छोटे उपायों को अपना कर इन झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है---- 




  1. यदि घर में अक्सर तनाव की स्थिति बनी रहती है तो सफेद चंदन की बनी कोई भी मूर्ति ऐसे स्थान पर रखें, जहां से सभी सदस्यों की नजर उस पर पड़े। इससे पारिवारिक तनाव खत्म होगा और सदस्यों में आपसी विश्वास बढ़ेगा। 
  2. यदि घर के पुरुष सदस्यों के बीच तनाव और विवाद की स्थिति रहती हो तो ऐसे घर में कदम्ब के पेड़ की डाली रखनी चाहिए। इससे शांति का वातावरण बनता है|
  3. घर के अन्य स्थानों की बजाए रसोई घर में बैठकर खाना खाने से घर में राहु का प्रभाव कम होता है और सुख-शांति बनी रहती है। 
  4. यदि परिवार की महिलाओं में अक्सर अशांति, तनाव और मनमुटाव रहता है तो ऐसे परिवार में सभी महिलाओं को एक साथ लाल रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। 
  5. यदि किसी महिला की वजह से घर में अशांति रहती हो तो शुक्ल पक्ष के सोमवार को चन्द्रमणि की चांदी की अंगूठी बनवाकर उस महिला को दाहिने हाथ की अनामिका उंगली (छोटी उंगली के पास वाली उंगली) में पहनानी चाहिए। 
  6. जिस घर में बिना कारण के तनाव और अशांति का वातावरण बनता हो, उस घर के लोगों को गुरुवार को बाल और दाढ़ी-मूंछ नहीं कटवाना चाहिए। 
  7.  हर महीने में घर के सदस्यों की संख्या और घर में आए सभी अतिथियों की संख्या के बराबर मीठी रोटियां बनाकर जानवरों को खिलाना चाहिए। इससे घर में बीमारी, झगड़े और फिजूल खर्च से छुटकारा मिलेगा। 
  8.  पूर्णिमा को पूरे घर में गंगाजल छिड़कने से शांति और प्रेम बना रहता है।

आपके जीवनसाथी/ लाइफ पार्टनर से अनबन का कारण कहीं आपके घर का वास्तुदोष तो नहीं

क्या आपकी अपने जीवनसाथी/लाइफ पार्टनर से आपकी नहीं बनती है? यदि आपका जीवनसाथी आपके रिश्ते को लेकर उदासीन है। जरा जरा सी बात आपसी अनबन का कारण बन जाती हैं। तो--- कहीं इसका कारण आपके घर का वास्तु तो नहीं है।
       घर का खराब वास्तु पति--पत्नी के सीधा संबंधो को प्रभावित करता है। यदि आपके जीवनसाथी या लाइफ पार्टनर से आपकी नहीं बनती तो इसका अर्थ यह हैं की आपके घर या मकान में वास्तुदोष हें।। वास्तुशास्त्री पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वास्तु में न सिर्फ सुख-समृद्धि के अपितु सुखद दाम्पत्य के सूत्र भी छिपे हैं। किसी के भी दाम्पत्य जीवन में बेडरूम काफी खास होता है। यदि बेडरूम में नीचे लिखे वास्तु नियमों का पालन किया जाए तो दाम्पत्य जीवन कहीं अधिक सुखमय हो सकता है।।
Your-spouse-life-partner-because-of-the-conflict-not-so-much-your-home-Architectural-flaw-आपके जीवनसाथी/ लाइफ पार्टनर से अनबन का कारण कहीं आपके घर का वास्तुदोष तो नहीं
         किसी भी घर की आंतरिक रूपरेखा एवं आंतरिक-सज्जा में फर्क होता है। आंतरिक रूप रेखा यूं तो कुछ सामान्य वास्तु नियमों पर आधारित होती है। किन्तु आन्तरिक सज्जा में यह देखना आवश्यक होता है कि घर में कौन-कौन एवं कितने लोग हैं? उस घर के निवासियों की रूचियां एवं जरूरतें क्या-क्या हैं? तथा इसके लिए आपके पास बजट कितना है? कोई भी वस्तु अपने गुण, प्रभाव एवं संरचना के आधार पर सात्विक, तामसिक तथा रजोगुणी होते हैं। इसके साथ ही सभी वस्तुओं पर भी ग्रहों का अलग-अलग प्रभाव रहता है। इसी आधार पर किस वस्तु को किस स्थान पर रखा जाए ताकि उस वस्तु की सकारात्मक ऊर्जा हमारे लिए कल्याणकारी हो, इसी से संबंधित वस्तुओं का विवेचन इस लेख के माध्यम से प्रयास किया जा रहा है।। 
  1.  **** वास्तुविद पण्डित दयानंद शास्त्री सेे जानते हैं कुछ ऐसे ही वास्तुदोष जिनके होने पर पति-पत्नी के सबंधों को बुरी प्रभावित करते हैं। इसलिए घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि ऋणात्मक शक्तियां कम तथा सकारात्मक शक्तियां अधिक क्रियाशील हों। यह सब वास्तु के द्वारा ही संभव हो सकता है। 
  2.  **** पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी घर या भवन के ईशान कोण का वास्तुशास्त्रानुसार बहुत ही महत्व है। यदि पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें तो उनका आपस का अहंकार खत्म होकर संबंधों में मधुरता बढ़ेगी। उस घर की गृहलक्ष्मी द्वारा संध्या के समय तुलसी में दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों को कम किया जा सकता है। घर के हर कमरे के ईशान कोण को साफ रखें, विशेषकर शयनकक्ष के। सामान्यतया पति-पत्नी में आपस में वैमनस्यता का एक कारण वास्तु नियमानुसार सही दिशा में उनका शयनकक्ष का न होना भी है। 
  3.  **** यदि आपके घर के दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित कोने में बने कमरों में आपकी आवास व्यवस्था नहीं है तो प्रेम संबंध अच्छे के बजाए, कटुता भरे हो जाते हैं।शयनकक्ष के लिए दक्षिण दिशा निर्धारित करने का कारण यह है कि इस दिशा का स्वामी यम, शक्ति एवं विश्रामदायक है। घर में आराम से सोने के लिए दक्षिण एवं नैऋत्य कोण उपयुक्त है। शयनकक्ष में पति-पत्नी का सामान्य फोटो होने के बजाए हंसता हुआ हो, तो वास्तु के अनुसार उचित रहता है। 
  4.  **** यदि आपके घर के अंदर उत्तर-पूर्व दिशाओं के कोने के कक्ष में अगर शौचालय है तो पति-पत्नी का जीवन बड़ा अशांत रहता है। आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। इसलिए शौचालय हटा देना ही उचित है। अगर हटाना संभव न हो तो शीशे के एक बर्तन में समुद्री नमक रखें। यह अगर सील जाए तो बदल दें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी के एक बर्तन में सेंधा नमक डालकर रखें। 
  5.  **** यदि आपके घर के अंदर रसोई सही दिशा में नहीं है तो ऐसी अवस्था में पति-पत्नी के विचार कभी नहीं मिलेंगे। रिश्तों में कड़वाहट दिनों-दिन बढ़ेगी। कारण अग्नि का कहीं ओर जलना। रसोई घर की सही दिशा है आग्नेय कोण। अगर आग्नेय दिशा में संभव नहीं है तो अन्य वैकल्पिक दिशाएं हैं। आग्नेय एवं दक्षिण के बीच, आग्नेय एवं पूर्व के बीच, वायव्य एवं उत्तर के बीच।यदि आप अपने वैवाहिक जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें तो रखें इन सामान्य वास्तु सिद्धांतों का ध्यान--- यदि आप निम्न वास्तु नियमों का पालन करेंगें तो आप और आपका जीवन साथी/ लाइफ पार्टनर सुखी रह सकते हैं।। 

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आपके शयनकक्ष से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण वास्तु नियम या तथ्य निम्न हैं - 
  1. **** गृहस्वामी का शयनकक्ष दक्षिण-पश्चिम दिशा अर्थात् नैऋत्य कोण में होना चाहिए। इस दिशा में अच्छी नींद आती है। इस दिशा में शयनकक्ष होने पर मनोबल, धन एवं यश की वृद्घि होती है। 
  2. **** शयनकक्ष में स्वर्गवासी पूर्वज, महाभारत-रामायण आदि से संबंधित चित्र तथा देवताओं की तस्वीरें भूलकर भी नहीं लगाई जानी चाहिए। 
  3. **** शयनकक्ष में बेड इस तरह रखना चाहिए कि सोने वाले सिर दक्षिण दिशा में पडे। यूं तो पूर्व एवं पश्चिम दिशा में भी सिर रखा जा सकता है, लेकिन सर्वाधिक फायदा दक्षिण दिशा या पूर्व-पश्चिम दिशा में सिर रखकर सोने से होता है। 
  4. **** शयनकक्ष में अगर आईना रखने की आवश्यकता हो तो उसे इस प्रकार लगाना चाहिए कि सोते समय शरीर का प्रतिबिंब उसमें दिखाई न दे। अगर ऐसा होता है तो पति-पत्नी के सामंजस्य में बाधा पहुंचती है। 
  5. **** शयनकक्ष में खिडकी के ठीक सामने ड्रेसिंग टेबल नहीं लगाना चाहिए। अगर कोई अलमारी शयनकक्ष में रखनी हो तो उसे नैत्रदत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में ही रखना चाहिए। इससे लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। 
  6. ***** टेलीफोन के निकट किसी भी प्रकार का जलपात्र नहीं रखना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश घर में होता है तथा गृहस्वामी के ऊपर कोई न कोई चिन्ता बनी ही रहती है। 
  7. ****पति की उम्र अगर पत्नी की उम्र से लगभग पांच साल बडी हो तो बिस्तर की चादर हरी, छह से दस साल बडी हो तो चादर पीली तथा बीस साल बडी हो तो चादर का रंग सफेद होना चाहिए। इससे पति-पत्नी के प्रेम के बीच कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती है। 
  8. **** कमरे में कोई महत्त्वपूर्ण कागजात रखने हो तो उसे उत्तर-पूर्व कोण (ईशान कोण) में ही रखना चाहिए। इससे जरूरत के समय कागजात बहुत जल्दी मिल जाते हैं। बिस्तर के गद्दे के नीचे किसी भी प्रकार का कागज नहीं रखना चाहिए। इससे यौन रोग होनेे की सभावना बनी रहती है। 
  9. ****शयनकक्ष में जूते-चप्पल का प्रवेश एकदम वर्जित किया जाना चाहिए। जूते-चप्पल के प्रवेश से शयनकक्ष की सार्थक ऊर्जा दूर हो जाती है तथा अनिद्रा एवं तनाव में वृद्घि होने लगती है। पंखे के ठीक नीचे कभी भी बिस्तर नहीं लगाना चाहिए। इससे हमेशा मन में बुरी भावनाओं का प्रवेश होता रहता है। 
  10.  ****यदि आप दाम्पत्य जीवन में खुशी चाहते हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बेडरूम शांत, ठंड़ा, हवादार व बिना दबाव वाला होना चाहिए। बेडरू्म में बेकार का सामान नहीं होना चाहिए। 
  11. ****बेडरूम में निजता कायम रहे। इसके लिए ध्यान रखें कि बेडरूम की खिड़की दूसरे कमरे में न खुले। शयन कक्ष की आवाज बाहर नहीं आना चाहिए। इससे दाम्पत्य जीवन में मिठास बढ़ती है। 
  12. ****शयन कक्ष में पेंट हल्का व अच्छा हो। दीवारों पर चित्र कम हों, चित्र मोहक होना चाहिए। 
  13. ****बेडरूम में पलंग आवाज करने वाला न हो तथा सही दिशा में रखा हो। सोते समय सिर दक्षिण की ओर होना चाहिए। आरामदायक व भरपूर नींद से दाम्पत्य जीवन अधिक सुखद बनता है। 
  14. **** बाथरूम, बेडरूम से लगा हुआ होना चाहिए। बाथरूम का दरवाजा बेडरूम में खुलता हो तो उसे बंद रखना चाहिए। उस पर परदा भी डाल सकते हैं। 
  15. ****बेडरूम में पेयजल की सुविधा होना चाहिए ताकि रात को उठकर बाहर न जाना पड़े। 
  16. **** बेडरूम में प्रकाश की उचित व्यवस्था होना चाहिए। सोते समय जीरो वॉट का बल्ब जलाना चाहिए और उसकी रोशनी सीधी पलंग पर नहीं पडऩी चाहिए।

जानिए की किस मन्त्र के जाप से किस दिशा का होगा वास्तु दोष ( प्रभाव ) दूर या कम

what-will-be-the-direction-in-which-the-mantra-chanting-architectural-defects-effect-or-less-away-जानिए की किस मन्त्र के जाप से किस दिशा का होगा वास्तु दोष ( प्रभाव ) दूर या कम   आजकल शायद ही कोई ऐसा घर हो जो वास्तु दोष से मुक्त हो। वास्तु दोष का प्रभाव कई बार देर से होता है तो कई बार इसका प्रभाव शीघ्र असर दिखने लगता है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इसका कारण यह है कि सभी दिशाएं किसी न किसी ग्रह और देवताओं के प्रभाव में होते हैं। जब किसी मकान मालिक ( जिसके नाम पर मकान हो) पर ग्रह विशेष की दशा चलती है तब जिस दिशा में वास्तु दोष होता है उस दिशा का अशुभ प्रभाव घर में रहने वाले व्यक्तियों पर दिखने लगता है। 
     इन मंत्र जप के प्रभाव स्वरूप (फलस्वरूप) आप काफी हद तक अपने वस्तुदोषो से मुक्ति प्राप्त कर पायेंगें ।। ऐसा मेरा विश्वास हें।। ध्यान रखें मन्त्र जाप में में आस्था और विश्वास अति आवश्य हैं। यदि आप सम्पूर्ण भक्ति भाव और एकाग्रचित्त होकर इन मंत्रो को जपेंगें तो निश्चित ही लाभ होगा।। देश- काल और मन्त्र सधाक की साधना(इच्छा शक्ति) अनुसार परिणाम भिन्न भिन्न हो सकते हैं।। तर्क कुतर्क वाले इनसे दूर रहें।। इनके प्रभाव को नगण्य मानें।। 
  1.  ***** ईशान दिशा----- इस दिशा के स्वामी बृहस्पति हैं। और देवता हैं भगवान शिव। इस दिशा के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नियमित गुरू मंत्र 'ओम बृं बृहस्पतये नमः' मंत्र का जप करें। शिव पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का 108 बार जप करना भी लाभप्रद होता है।
  2.  ***** पूर्व दिशा--- घर का पूर्व दिशा वास्तु दोष से पीड़ित है तो इसे दोष मुक्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्य मंत्र 'ओम ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' का जप करें। सूर्य इस दिशा के स्वामी हैं। इस मंत्र के जप से सूर्य के शुभ प्रभावों में वृद्घि होती है। व्यक्ति मान-सम्मान एवं यश प्राप्त करता है। इन्द्र पूर्व दिशा के देवता हैं। प्रतिदिन 108 बार इंद्र मंत्र 'ओम इन्द्राय नमः' का जप करना भी इस दिशा के दोष को दूर कर देता है। 
  3.  **** आग्नेय दिशा--- इस दिशा के स्वामी ग्रह शुक्र और देवता अग्नि हैं। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शुक्र अथवा अग्नि के मंत्र का जप लाभप्रद होता है। शुक्र का मंत्र है 'ओम शुं शुक्राय नमः'। अग्नि का मंत्र है 'ओम अग्नेय नमः'। इस दिशा को दोष से मुक्त रखने के लिए इस दिशा में पानी का टैंक, नल, शौचालय अथवा अध्ययन कक्ष नहीं होना चाहिए। 
  4.  **** दक्षिण दिशा--- इस दिशा के स्वामी ग्रह मंगल और देवता यम हैं। दक्षिण दिशा से वास्तु दोष दूर करने के लिए नियमित 'ओम अं अंगारकाय नमः' मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। यह मंत्र मंगल के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है। 'ओम यमाय नमः' मंत्र से भी इस दिशा का दोष समाप्त हो जाता है।
  5.  **** नैऋत्य दिशा---- इस दिशा के स्वामी राहु ग्रह हैं। घर में यह दिशा दोषपूर्ण हो और कुण्डली में राहु अशुभ बैठा हो तो राहु की दशा व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी हो जाती है। इस दोष को दूर करने के लिए राहु मंत्र 'ओम रां राहवे नमः' मंत्र का जप करें। इससे वास्तु दोष एवं राहु का उपचार भी उपचार हो जाता है। 
  6.  **** पश्चिम दिशा---- यह शनि की दिशा है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं। इस दिशा में किचन कभी भी नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शनि मंत्र 'ओम शं शनैश्चराय नमः' का नियमित जप करें। यह मंत्र शनि के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है। 
  7.  **** वायव्य दिशा----- चन्द्रा इस दिशा के स्वामी ग्रह हैं। यह दिशा दोषपूर्ण होने पर मन चंचल रहता है। घर में रहने वाले लोग सर्दी जुकाम एवं छाती से संबंधित रोग से परेशान होते हैं। इस दिशा के दोष को दूर करने के लिए चन्द्र मंत्र 'ओम चन्द्रमसे नमः' का जप लाभकारी होता है।
  8.  ***** उत्तर दिशा---- यह दिशा के देवता धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा बुध ग्रह के प्रभाव में आता है। इस दिशा के दूषित होने पर माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है।। माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है। आर्थिक कठिनाईयों का भी सामना करना होता है। इस दिशा को वास्तु दोष से मुक्त करने के लिए 'ओम बुधाय नमः या 'ओम कुबेराय नमः' मंत्र का जप करें। आर्थिक समस्याओं में कुबेर मंत्र का जप अधिक लाभकारी होता है।।।
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