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जानिए करवा चौथ 08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को क्यों और कैसे मनाएं (करवा चौथ 2017 का मुहूर्त)

प्रिय पाठकों /मित्रों , हमारे देश में हिन्दू पंचांगानुसार कार्तिक महीना में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत मनाया जाता है। इस वर्ष करवा चौथ का व्रत 08 अक्टूबर 2017 (रविवार) को मनाया जाएगा। करवा चौथ और संकष्टी चतुर्थी ये दोनों व्रत एक ही दिन मनाया जाता है। संकष्टी चतुर्थी गणेश जी को खुश करने के लिए किया जाता है। भारतीय हिन्दू पंचांगानुसार यह पर्व कार्तिक महीना की कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है। करवा चौथ को “करक चतुर्थी” भी कहा जाता है। करवा चौथ का व्रत विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु तथा प्रेम सम्बन्ध के स्थायित्व करने के लिए करती है। छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। 
जानिए करवा चौथ 08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को क्यों और कैसे मनाएं (करवा चौथ 2017 का मुहूर्त)-Know-why-Karwa-Chauth-is-celebrated-on-October-08-Sunday-2017         ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन विवाहित स्त्रियां भगवान शिव जी, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं। अपने व्रत को चन्द्रमा को देखकर और अर्घ अर्पण करने के बाद अपने पति को जल पिलाती है तत्पश्चात अपना व्रत तोड़ती हैं।इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। करवा चौथ के व्रत का पूर्ण विवरण वामन पुराण में किया गया है।चाँद देखे बिना, यह माना जाता है कि व्रत अधूरा है और कोई महिला न कुछ भी खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं। करवा चौथ व्रत तभी पूरा माना जाता है जब महिला उगते हुये पूरे चाँद को छलनी में घी का दिया रखकर देखती है और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथों से पानी पीती है। 
         करवा चौथ का व्रत कार्तिक हिन्दु माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। अमांत पञ्चाङ्ग जिसका अनुसरण गुजरात, महाराष्ट्र, और दक्षिणी भारत में किया जाता है, के अनुसार करवा चौथ अश्विन माह में पड़ता है। हालाँकि यह केवल माह का नाम है जो इसे अलग-अलग करता है और सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन मनाया जाता है। करवा चौथ व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश में मनाया जाता है। ‘करवा चौथ’ अब केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में रहने वाली भारतीय मूल की स्त्रियों द्वारा भी पूर्ण श्रद्धा से किया जाता है। करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी, जो कि भगवान गणेश के लिए उपवास करने का दिन होता है, एक ही समय होते हैं। विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घ आयु के लिए करवा चौथ का व्रत और इसकी रस्मों को पूरी निष्ठा से करती हैं। विवाहित महिलाएँ भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं और अपने व्रत को चन्द्रमा के दर्शन और उनको अर्घ अर्पण करने के बाद ही तोड़ती हैं। 
       करवा चौथ का व्रत कठोर होता है और इसे अन्न और जल ग्रहण किये बिना ही सूर्योदय से रात में चन्द्रमा के दर्शन तक किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार करवा चौथ के दिन करवा वा करक का विशेष महत्त्व होता है। करवा अथवा करक का अर्थ होता है मिट्टी से बना हुआ पात्र। इस व्रत में चन्द्रमा को अर्घ्य (जल अर्पण) मिट्टी से बने हुए पात्र से ही देने का विधान है। इसी कारण इस पूजा में “करवा” का विशेष महत्त्व हो जाता है पूजा के बाद इस करवा को या तो अपने ही घर में संभालकर रखना चाहिए या किसी ब्राह्मण अथवा योग्य स्त्री को दान में दे देना चाहिए। दरअसल करवा चौथ मन के मिलन का पर्व है. इस पर्व पर महिलाएं दिनभर निर्जल उपवास रखती हैं और चंद्रोदय में गणेश जी की पूजा-अर्चना के बाद अर्घ्य देकर व्रत तोड़ती हैं। व्रत तोड़ने से पूर्व चलनी में दीपक रखकर, उसकी ओट से पति की छवि को निहारने की परंपरा भी करवा चौथ पर्व की है। । इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी के करवे, साड़ी व श्रृंगार सामग्री प्रदान करती हैं। पति की ओर से पत्‍‌नी को तोहफा देने का चलन भी इस त्यौहार में है।
         कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जो उपवास किया जाता है उसका सुहागिन स्त्रियों के लिये बहुत अधिक महत्व होता है। दरअसल इस दिन को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन यदि सुहागिन स्त्रियां उपवास रखें तो उनके पति की उम्र लंबी होती है और उनका गृहस्थ जीवन सुखद होने लगता है। हालांकि पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोग बड़ी धूम-धाम से इस त्यौहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि में तो इस दिन अलग ही नजारा होता है। करवाचौथ व्रत के दिन एक और जहां दिन में कथाओं का दौर चलता है तो दूसरी और दिन ढलते ही विवाहिताओं की नज़रें चांद के दिदार के लिये बेताब हो जाती हैं। चांद निकलने पर घरों की छतों का नजारा भी देखने लायक होता है।
      दरअसल सारा दिन पति की लंबी उम्र के लिये उपवास रखने के बाद आसमान के चमकते चांद का दिदार कर अपने चांद के हाथों से निवाला खाकर अपना उपवास खोलती हैं। करवाचौथ का व्रत सुबह सूर्योदय से पहले ही 4 बजे के बाद शुरु हो जाता है और रात को चंद्रदर्शन के बाद ही व्रत को खोला जाता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है और करवाचौथ व्रत की कथा सुनी जाती है। सामान्यत: विवाहोपरांत 12 या 16 साल तक लगातार इस उपवास को किया जाता है लेकिन इच्छानुसार जीवनभर भी विवाहिताएं इस व्रत को रख सकती हैं। माना जाता है कि अपने पति की लंबी उम्र के लिये इससे श्रेष्ठ कोई उपवास अतवा व्रतादि नहीं है। 
करवा चौथ व्रत की पूजन सामग्री---- 
 कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें। व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। 
       इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। 
शिव-पार्वती की पूजा का विधान---
 ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की करवा चौथ व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनकर श्रृंगार कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। 
          व्रत के दिन प्रातरू स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- 'मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।' पूरे दिन निर्जला रहें। दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा मांडें। इसे 'वर' कहते हैं। चित्रित करने की कला को 'करवा धरना' कहा जाता है। 8 पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं। पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं। गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें। जल से भरा हुआ लोटा रखें। वायना (भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूं और ढक्कन में शकर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवे पर स्वस्तिक बनाएं। गौरी-गणेश और चित्रित करवे की परंपरानुसार पूजा करें।  पति की दीर्घायु की कामना कर पढ़ें यह मंत्र : - 
 'नमस्त्यै शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभा। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे।'
 करवे पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें। कथा सुनने के बाद करवे पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें। 13 दाने गेहूं के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें। पूजन के पश्चात आस-पड़ोस की महिलाओं को करवा चौथ की बधाई देकर पर्व को संपन्न करें।
जानिए क्या रखें करवा चौथ व्रत में सावधानियां --
  1. केवल सुहागिनें या जिनका रिश्ता तय हो गया हो वही स्त्रियां ये व्रत रख सकती हैं।
  2. व्रत रखने वाली स्त्री को काले और सफेद कपड़े कतई नहीं पहनने चाहिए। 
  3. करवा चौथ के दिन लाल और पीले कपड़े पहनना विशेष फलदायी होता है। 
  4. करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है। 
  5. ये व्रत निर्जल या केवल जल ग्रहण करके ही रखना चाहिए। 
  6. इस दिन पूर्ण श्रृंगार और अच्छा भोजन करना चाहिए।
  7. पत्नी के अस्वस्थ होने की स्थिति में पति भी ये व्रत रख सकते हैं।

 यह हैं करवा चौथ पूजन विधि---- 
 नारद पुराण के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। करवा चौथ की पूजा करने के लिए बालू या सफेद मिट्टी की एक वेदी बनाकर भगवान शिव- देवी पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, चंद्रमा एवं गणेशजी को स्थापित कर उनकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। 
पूजन के समय निम्न मन्त्र- 
’’मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये। 
सांयकाल के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए। मां पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें। भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और करवे में पानी भरकर पूजा करें। सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन र्निजला व्रत रखकर कथा का श्रवण करें। तत्पश्चात चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें। 
करवा चौथ पूजन विधि--- 
प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें। व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है- 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।' घर के मंदिर की दीवार पर गेरू से फलक बनाकर चावलों को पीसे। फिर इस घोल से करवा चित्रित करें। इस रीती को करवा धरना कहा जाता है। शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए।
     माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें। भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें। पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें। पूजा के बाद करवा चौथ की कथा सुननी चाहिए तथा चंद्रमा को अर्घ्य देकर छलनी से अपने पति को देखना चाहिए। पति के हाथों से ही पानी पीकर व्रत खोलना चाहिए। इस प्रकार व्रत को सोलह या बारह वर्षों तक करके उद्यापन कर देना चाहिए। पूजा की कुछ अन्य रस्मों में सास को बायना देना, मां गौरी को श्रृंगार का सामान अर्पित करना आदि शामिल है।
करवा चौथ का महत्त्व -- 
 करवा चौथ की अन्य कई कहानियां भी प्रचलित हैं किन्तु इस कथा का जिक्र शास्त्रों में होने के कारण इसका आज भी महत्त्व बना हुआ है। द्रोपदी द्वारा शुरू किए गए करवा चौथ व्रत की आज भी वही मान्यता है। द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखा था और निर्जल रहीं थीं। यह माना जाता है कि पांडवों की विजय में द्रौपदी के इस व्रत का भी महत्व था। महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। 
     वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।
जानिए करवा चौथ की प्रचलित व्रत कथा--- 
 एक समय की बात है, सात भाइयों की एक बहन का विवाह एक राजा से हुआ। विवाहोपरांत जब पहला करवा चौथ आया, तो रानी अपने मायके आ गयी। रीति-रिवाज अनुसार उसने करवा चौथ का व्रत तो रखा किन्तु अधिक समय तक व भूख-प्यास सहन नहीं कर पर रही थी और चाँद दिखने की प्रतीक्षा में बैठी रही। उसका यह हाल उन सातों भाइयों से ना देखा गया, अतः उन्होंने बहन की पीड़ा कम करने हेतु एक पीपल के पेड़ के पीछे एक दर्पण से नकली चाँद की छाया दिखा दी। बहन को लगा कि असली चाँद दिखाई दे गया और उसने अपना व्रत समाप्त कर लिया। 
      इधर रानी ने व्रत समाप्त किया उधर उसके पति का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। यह समाचार सुनते ही वह तुरंत अपने ससुराल को रवाना हो गयी। रास्ते में रानी की भेंट शिव-पार्वती से हुईं। माँ पार्वती ने उसे बताया कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और इसका कारण वह खुद है। रानी को पहले तो कुछ भी समझ ना आया किन्तु जब उसे पूरी बात का पता चला तो उसने माँ पार्वती से अपने भाइयों की भूल के लिए क्षमा याचना की। यह देख माँ पार्वती ने रानी से कहा कि उसका पति पुनः जीवित हो सकता है यदि वह सम्पूर्ण विधि-विधान से पुनः करवा चौथ का व्रत करें। तत्पश्चात देवी माँ ने रानी को व्रत की पूरी विधि बताई। माँ की बताई विधि का पालन कर रानी ने करवा चौथ का व्रत संपन्न किया और अपने पति की पुनः प्राप्ति की। 
           पौराणिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ के दिन शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। इस दिन बिना चन्द्रमा को अर्घ्य दिए व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। करवा चौथ मूर्हूत पंचांग आधारित वह सटीक समय होता है जिसकेअंदर/उसी समयावधि में ही पूजा करनी होती है। 
वर्ष 2017 में पूजा और चन्द्रमा निकलने का समय निम्न है: --- 
  •  08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को करवा चौथ चंद्र दर्शन समय – 20:14 मिनट रात्रि पर 
  •  करवा चौथ पूजा महूर्त – 17:55 से 19: 09 तक, (दिल्ली का समय) 
  • करवा चौथ तिथि : 08 अक्टूबर 2017, रविवार 
  • करवा चौथ पूजा शुभ मुहूर्त : 17:55 से 19:09 
  • चंद्रोदय समय : रात्रि 20:14 बजे 
  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ : 16:58 (8 अक्तूबर 2017) 
  • चतुर्थी तिथि समाप्त : 14:16 (9 अक्तूबर 2017)

उज्जैन (मध्यप्रदेश ) में करवा चौथ पूजन का शुभ मुहूर्त-- 
  • करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय होगा 
  • करवा चौथ पूजा मुहूर्त = १८:२४ से १९:४१ अवधि = १ घण्टा १७ मिनट्स 
  • करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय = २०:४७ 
  • चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = ८/अक्टूबर/२०१७ को ०७:२८ बजे 
  • चतुर्थी तिथि समाप्त = ९/अक्टूबर/२०१७ को ०४:४६ बजे

जानिए करवा चौथ 2015 का शुभ मुहूर्त, करवा चौथ का महत्त्व एवं पूजन विधान

Learn-marital-auspicious-for-2015-the-value-of-marital-and-worship-legislation-जानिए करवा चौथ 2015 का शुभ मुहूर्त, करवा चौथ का महत्त्व एवं पूजन विधानहमारे देश में दांपत्य जीवन से जुड़ी परंपराएं व त्योहार आपसी प्रेम तथा सामंजस्य को बल देते हैं। हमारे भारत देश में शादी सिर्फ दो इंसानों के बीच का संबंध नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है. जिस शादी से दो इंसानों और परिवारों की डोर बंधी हो उसे निभाने के लिए कई तरह के रीति-रिवाज होते ही हैं. उन्हीं में से एक है करवाचौथ। करवा चौथ के दिन भारत की हर महिला दिनभर उपवास के बाद शाम को 18 साल की लड़की से लेकर 75 साल की महिला नई दुल्हन की तरह सजती-संवरती है। करवाचौथ के दिन एक खूबसूरत रिश्ता साल-दर-साल मजबूत होता है। कुंवारी लड़कियां (कुछ संप्रदायों में सगाई के बाद) शिव की तरह के पति की चाहत में, तो शादीशुदा स्त्रियां अपनी पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं। 
 करवा चौथ 2015 ---- 
 करवा चौथ महिलाओं द्वारा पूरे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी इस वर्ष 30अक्टूबर 2015 ( शुक्रवार) को मनाया जाएगा। दरअसल करवा चौथ मन के मिलन का पर्व है. इस पर्व पर महिलाएं दिनभर निर्जल उपवास रखती हैं और चंद्रोदय में गणेश जी की पूजा-अर्चना के बाद अर्घ्य देकर व्रत तोड़ती हैं। व्रत तोड़ने से पूर्व चलनी में दीपक रखकर, उसकी ओट से पति की छवि को निहारने की परंपरा भी करवा चौथ पर्व की है। । इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी के करवे, साड़ी व श्रृंगार सामग्री प्रदान करती हैं। पति की ओर से पत्‍‌नी को तोहफा देने का चलन भी इस त्यौहार में है। 
 जानिए वर्ष 2015 में करवा चौथ पूजा मूर्हूत---- 
 करवा चौथ मूर्हूत पंचांग आधारित वह सटीक समय होता है जिसके भीतर ही पूजा करनी होती है। अक्टूबर 30 को करवा चौथ पूजा के लिए पूरी अवधि एक घंटे और 18 मिनट है। 
 इस वर्ष करवा चौथ के दिन उज्जैन में चन्द्रोदय का समय--- 
  1. करवा चौथ पूजा मुहूर्त = १७:३९ से १८:५६ 
  2. अवधि = १ घण्टा १६ मिनट्स 
  3. करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय = २०:३४ 
  4. चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = ३०/अक्टूबर/२०१५ को ०८:२४ बजे 
  5. चतुर्थी तिथि समाप्त = ३१/अक्टूबर/२०१५ को ०६:२५ बजे 

 करवा चौथ 2015 को चंद्रोदय का समय--- 
 करवा चौथ के दिन उज्जैन में चन्द्रोदय का समय शाम 08:24 होगा। करवा चौथ के दिन चंद्रमा उदय होने का समय के सभी महिलाओं के लिए बहुत महत्व का है क्योंकि वे अपने पति की लम्बी उम्र के लिये पूरे दिन (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। वे केवल उगते हुये पूरे चाँद को देखने के बाद ही पानी पी सकती हैं। चाँद देखे बिना, यह माना जाता है कि व्रत अधूरा है और कोई महिला न कुछ भी खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं। 
      करवा चौथ व्रत तभी पूरा माना जाता है जब महिला उगते हुये पूरे चाँद को छलनी में घी का दिया रखकर देखती है और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथों से पानी पीती है। सभी विवाहित (सुहागिन) महिलाओं के लिये करवा चौथ बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार हैं। यह एक दिन का त्यौहार प्रत्येक वर्ष मुख्यतः उत्तरी भारत की विवाहित (सुहागिन) महिलाओं द्वारा मनाया जाता हैँ। 
       इस दिन विवाहित (सुहागिन) महिलाऍ पूरे दिन का उपवास रखती हैं जो जल्दी सुबह सूर्योदय के साथ शुरु होता है और देर शाम या कभी कभी देर रात को चन्द्रोदय के बाद खत्म होता हैं। वे अपने पति की सुरक्षित और लम्बी उम्र के लिये बिना पानी और बिना भोजन के पूरे दिन बहुत कठिन व्रत रखती हैं। पहले यह एक पारंपरिक त्यौहार था जो विशेष रूप से भारतीय राज्यों राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ भागों, हरियाणा और पंजाब में मनाया जाता था हालांकि, आज कल यह भारत के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सब महिलाओं द्वारा मनाया जाता था। हिन्दू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ का त्यौहार पूर्णिमा के दिन से 4 दिन बाद (अक्टूबर या नवंबर में) कार्तिक महीने में होता है। 
       करवा चौथ का त्यौहार या व्रत पूरे उत्साह से और ज्यादा धूमधाम से मनाया जाता है। जिन लोगों को इस व्रत पर्व के बारे में मालूम नहीं था। वे शादी की सालगिरह के प्रति कम ही जागरुक होते थे। कुछ संपन्न शिक्षित और कुलीन परिवारों में दांपत्य के पचास साल पूरे हो जाने पर समारोह मनाया जाता था। आज भी मनाया जाता है। उस समारोह में दंपत्ति के नाती-पोते भी शामिल होते हैं। दंपत्ति के निजी संबध या जीवन की अहमियत सिर्फ इतनी है कि वह खुद के लिए नहीं हैं। मर्यादा में रहते हुए उनके रुझान, पूरे परिवार पर ही केंद्रित होते थे। करवा चौथ का व्रत कुछ अविवाहित महिलाओं द्वारा भी उनकी रीति और परंपरा के अनुसार उनके मंगेतरो की लंबी उम्र या भविष्य में वांछित पति पाने के लिए रखा जाता है। 
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 करवा चौथ का व्रत कार्तिक हिन्दू माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। अमांत पञ्चाङ्ग जिसका अनुसरण गुजरात, महाराष्ट्र, और दक्षिणी भारत में किया जाता है, के अनुसार करवा चौथ अश्विन माह में पड़ता है। हालाँकि यह केवल माह का नाम है जो इसे अलग-अलग करता है और सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन मनाया जाता है। करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी, जो कि भगवान गणेश के लिए उपवास करने का दिन होता है, एक ही समय होते हैं। विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घ आयु के लिए करवा चौथ का व्रत और इसकी रस्मों को पूरी निष्ठा से करती हैं।
         विवाहित महिलाएँ भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं और अपने व्रत को चन्द्रमा के दर्शन और उनको अर्घ अर्पण करने के बाद ही तोड़ती हैं। करवा चौथ का व्रत कठोर होता है और इसे अन्न और जल ग्रहण किये बिना ही सूर्योदय से रात में चन्द्रमा के दर्शन तक किया जाता है। करवा चौथ का पर्व भारत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में मनाया जाता है। करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है। करवा चौथ स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय व्रत है। यों तो प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी और चंद्रमा का व्रत किया जाता है। परंतु इनमें करवा चौथ का सर्वाधिक महत्व है। 
       इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु, स्वास्थ्य एवं मंगलकामना के लिए यह व्रत करती हैं। वामन पुराण मे करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है। करवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को प्रात:काल स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करने का विधान है। स्त्रियां चंद्रोदय के बाद चंद्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देकर ही जल-भोजन ग्रहण करती हैं। पूजा के बाद तांबे या मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री जैसे- कंघी, शीशा, सिंदूर, चूड़ियां, रिबन व रुपया रखकर दान करना चाहिए तथा सास के पांव छूकर फल, मेवा व सुहाग की सारी सामग्री उन्हें देनी चाहिए। करवा चौथ के दिन को करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। करवा या करक मिट्टी के पात्र को कहते हैं जिससे चन्द्रमा को जल अर्पण, जो कि अर्घ कहलाता है, किया जाता है। पूजा के दौरान करवा बहुत महत्वपूर्ण होता है और इसे ब्राह्मण या किसी योग्य महिला को दान में भी दिया जाता है। करवा चौथ दक्षिण भारत की तुलना में उत्तरी भारत में ज्यादा प्रसिद्ध है। करवा चौथ के चार दिन बाद पुत्रों की दीर्घ आयु और समृद्धि के लिए अहोई अष्टमी व्रत किया जाता है।
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करवा चौथ व्रत से विवाह में आ रही बाधाएं होती हैं दूर---- 
 सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए भी करवा चौथ का व्रत सबसे अच्छा उपाय है। सभी सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन के लिए कामना करती हैं, वहीं कुंवारी लड़कियां भी सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए यह व्रत कर सकती हैं। किसी भी अविवाहित कन्या की इच्छा होती है कि उसका विवाह किसी सुयोग्य वर के साथ ही हो। इसी बात की चिंता अधिकांश कुंवारी कन्याओं को सदैव सताती रहती है। इसके लिए कई कन्याएं हमेशा भगवान से प्रार्थना भी करती हैं। हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि इस खास दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो कुंवारी कन्याओं की सुयोग्य वर संबंधी परेशानियां दूर हो सकती हैं। 
     इसके साथ ही जो स्त्रियां विवाहित हैं उनके लिए यह दिन वैवाहिक जीवन को सुखद और समृद्ध बनाने वाला है। जिन कन्याओं के विवाह में बाधाएं आ रही हैं, अच्छा वर प्राप्त नहीं हो रहा हो तो वे कन्याएं भी करवा चौथ का व्रत कर सकती हैं। इस दिन निराहार रहकर व्रत करके चद्रंमा का दर्शन करें और शिव-पार्वती का पूजन करें। इस प्रकार व्रत और पूजन करने के बाद निश्चित रूप से शुभ लक्षणों वाला वर मिलने के योग बनते हैं। यह व्रत नियमित रूप से हर साल किया जाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से कन्याओं की सुयोग्य वर से संबंधित चिंताएं समाप्त हो जाती है। 
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जानिए करवा चौथ वृत का महत्व और प्रचलित किंवदंतियॉ----
 महिलाओं द्वारा हर साल करवा चौथ का जश्न मनाने के पीछे कई किंवदंतियॉ, पारंपरिक कथाऍ और कहानियाँ जुड़ी है। । उनमें से कुछ के नीचे उल्लेख कर रहे हैं: एक बार, वीरवती नामक एक सुंदर राजकुमारी थी। वह अपने सात भाइयों की इकलोती प्यार बहन थी। । उसकी शादी हो गयी और अपने पहले करवा चौथ व्रत के दौरान अपने माता पिता के घर पर ही थी। उसने सुबह सूर्योदय से ही उपवास शुरू कर दिया था। उसने बहुत सफलतापूर्वक उसका पूरा दिन बिताया हालांकि शाम को उसने बेसब्री से चंद्रोदय के लिए इंतज़ार करना शुरू कर दिया क्योंकि वह गंभीर रूप से भूख और प्यास पीड़ित थी। 
         क्योंकि यह उसका पहला करवा चौथ व्रत था,उसकी यह दयनीय दशा उसके भाईयों के लिये असहनीय थी क्योंकि वे सब उससे बहुत प्यार करते थे। उन्होंने उसे समझाने का बहुत कोशिश की कि वह बिना चॉद देखे खाना खा ले हालांकि उसने मना कर दिया। तब उन्होंने पीपल के पेड़ के शीर्ष पर एक दर्पण से चाँद की झूठी समानता बनायी और अपनी बहन से कहा कि चंद्रमा निकल आया। वह बहुत मासूम थी और उसने अपने भाइयों का अनुकरण किया। गलती से उसने झूठे चाँद को देखा, अर्घ्य देकर उसने अपना व्रत तोङ लिया। उसे अपने पति की मौत का संदेश मिला। उसने जोर जोर से रोना शुरु कर दिया उसकी भाभी ने उसे बताया कि उसने झूठे चांद को देखकर व्रत तोड़ दिया जो उसके भाईयों ने उसे दिखाया था, क्योकि उसके भाई उसे भूख और प्यास की हालत को देखकर बहुत संकट में थे। 
       उसका दिल टूट गया और वह बहुत ज्यादा रोई। जल्द ही देवी शक्ति उसके सामने प्रकट हुई और उससे पूछा कि आप क्यों रो रहे हो? । उसने पूरी प्रक्रिया के बारे में बताया और फिर देवी द्वारा निर्देश दिया गया कि उसे पूरी भक्ति के उसकी करवा चौथ का व्रत दोहराना चाहिए। जल्द ही व्रत पूरा होने के बाद, यमराज को उसके पति के जीवन वापस करने के लिए मजबूर किया गया। कहीं कहीं यह माना जाता है, पीपल के पेड़ के शीर्ष पर एक दर्पण रखकर एक झूठे चाँद बनाने के बजाय रानी वीरवती के भाईयों ने(अपनी बहन को झूठा चन्द्रमा दिखाने के लिये) पर्वत के पीछे बहुत बडी आग लगायी। उस झूठी चाँद चमक के बारे में (पहाड़ के पीछे एक बड़ी आग) उन्होंने अपनी बहन को बहन राजी कर लिया। 
     उसके बाद उसने बड़ी आग के झूठे चंद्रमा को देखकर अपना उपवास तोड़ दिया और उसे संदेश मिला कि उसने अपने पति को खो दिया। वह अपने पति के घर की ओर भागी हालांकि मध्य रास्ते में, शिव-पार्वती उसे दिखाई दिये और उसे उसके भाइयों के सभी प्रवंचनाके बारे में बताया। उसे तब देवी द्वारा बहुत ही ध्यान से उसे फिर से उपवास पूरा करने के लिए निर्देश दिये गये। उसने वैसा ही किया और उसे उसका पति वापस मिल गया। इस त्योहार का जश्न मनाने के पीछे एक और कहानी सत्यवान और सावित्री का इतिहास है। एक बार, यम सत्यवान के पास उसकी जिंदगी हमेशा के लिए लाने के लिये पहुंच गये। सावित्री उस के बारे में पता चला, तो उसने अपने पति का जीवन देने के लिए यम से विनती की लेकिन यम से इनकार कर दिया। तो उसने अपने पति का जीवन पाने के लिये बिना कुछ खाये पीये यम का पीछा करना शुरु कर दिया। यम ने उसे अपने पति के जीवन के बदले कुछ और वरदान माँगने को कहा। वह बहुत चालाक थी उसने यमराज से कहा कि वह एक पतिव्रता स्त्री है और अपने पति के बच्चों की माँ बनना चाहती है।
       यम को उसके बयान ने सहमत होने के लिए मजबूर कर दिया और उसे उसके पति के साथ लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया। एक बार करवा नामक एक औरत थी, जो अपने पति के लिए पूर्ण रुप से समर्पित थी जिसके कारण उसे महान आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की गयी। एक बार, करवा का पति नदी में स्नान कर रहा था और तभी अचानक एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया। उसने मगरमच्छ बॉधने के लिए एक सूती धागे का इस्तेमाल किया और यम को मगरमच्छ को नरक में फेंकने के लिए कहा। यम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया,हांलाकि उन्हें ऐसा करना पडा क्योंकि उन्हें पतिव्रता स्त्री करवा के शाप लगने का भय था। उसे उसके पति के साथ लम्बी आयु का वरदान दिया। उस दिन से, करवा चौथ का त्यौहार भगवान से अपने पति की लंबी उम्र पाने के लिए आस्था और विश्वास के साथ महिलाओं द्वारा मनाना शुरू किया गया। महाभारत की कथा इस करवा चौथ उत्सव मनाने के पीछे एक और कहानी है। 
      बहुत पहले, महाभारत के समय में, अर्जुन की अनुपस्थिति में जब वह नीलगिरी पर तपस्या के लिए दूर गया हुआ था तब पांडवो को द्रौपदी सहित कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से मदद के लिये प्रार्थना कि तब उसे भगवान द्वारा देवी पार्वती और भगवान शिव की एक पूर्व कथा का स्मरण कराया गया। उसे भी उसी तरह करवा चौथ का व्रत पूर्ण करने की सलाह दी गयी। उसने सभी रस्मों और र्निदेशों का पालन करते हुये व्रत को पूर्ण किया। जैसे ही उसका व्रत पूरा हुआ, पांडवो को सभी समस्याओं से आजाद हो गये। पहला करवा चौथ करवा चौथ का त्यौहार नव विवाहित हिन्दू महिलाओं के लिये बहुत महत्व रखता है।यह उसकी शादी के बाद पति के घर पर बहुत बङा अवसर होता है। 
          करवा चौथ के अवसर के कुछ दिन पहले से ही वह और उसके ससुराल वाले बहुत सारी तैयारियॉ करते है। वह सभी नयी वस्तुओं से इस प्रकार तैयार होती है जैसे उसकी उसी पति से दुबारा शादी हो रही हो। सभी ( मित्र, परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और पङोसी) एक साथ इकट्ठे होकर इसे त्यौहार की तरह मनाते है। उसे उसके विवाहित जीवन में समृद्धि के लिये अपने पति, मित्रों, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पङोसियों से बहुत सारे आशीर्वाद और उपहार मिलते है। उसे अपनी पहली करवा चौथ पर अपनी सास से पहली सरगी मिलती है। पहली सरगी में साज सज्जा का सामान, करवा चौथ से एक दिन पहले का खाना और अन्य बहुत सारी वस्तुऍ ढेर सारे प्यार और खुशहाल जीवन के लिये आशीर्वाद शामिल होता है।वह आशीर्वाद पाने के लिये घऱ के बङों और रिश्तेदारों के पैर छूती है। पहला बाया देने की भी प्रथा है। 
      यह सूखे मेवे, उपहार, मीठी और नमकीन मठरी, मिठाई, कपङे, बर्तन आदि का समूह होता है, लङकी की माँ द्वारा लङकी की सास और परिवार के अन्य सदस्यों के लिये भेजा जाता है। यह एक बेटी के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है जो पहली करवा चौथ पर इसका बेसब्री से इंतजार करती है। करवा चौथ की पूजा के बाद पहला बाया सभी परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पङोसियों के बीच बॉटा जाता है। अंत में, नविवाहित दुल्हन को अपने पति से रात्री भोजन के समय चन्द्रोदय के समारोह के बाद बहुत ही खास उपहार मिलता है। इस दिन उनके बीच प्यार का बंधन मजबूती के साथ बढता है, पति अपनी प्रिय पत्नी के लिये बहुत गर्व महसूस करते है क्योंकि वे उनके लिये बहुत कठिन व्रत रखती है। वे अपनी पत्नी को बहुत सारा प्यार और सम्मान देते है और बहुत सारी देखभाल औऱ करवा चौथ के उपहार द्वारा उन्हें खुश रखते है। इस दिन वे अपनी पत्नी को पूर्ण आनन्द करने और स्वादिष्ट भोजन करने कराने के लिये किसी अच्छी दिलचस्प जगह लेकर जाते है जिस से कि कम से कम साल में उन्हें एक दिन के लिये घर की जिम्मेदारियों से आराम मिलें। 
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 यह हैं करवा चौथ व्रत विधि---- 
 करवा चौथ व्रत को करक चतुर्थी व्रत के नाम से भी जाना जाता है जोकि विवाहित महिलाओं के लिये बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है विशेष रुप से पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और यू0 पी0 में। यह कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष के चौथे दिन पपडता है। इस व्रत के दौरान, महिलाऍ देवी पार्वती, भगवान गणेश और चन्द्रमा की पूजा करती है। यह व्रत बिना पानी के अर्थात् “ र्निजला व्रत” है हालाकिं, कुछ औरतें (गर्भवती और अस्वस्थ महिलाऍ) इसे दूध, फल, मेवा, खोया आदि लेकर भी व्रत रखती है।
       इस व्रत में पूरी पूजा प्रक्रिया के दौरान भगवान के लिये दिल से समर्पण, आस्था और विश्वास की आवश्यकता है। देवी देवताओं को समर्पित करने के लिये खीर, पूआ, दहीवडा, दने की दाल की पूङी, गुङ का हलवा आदि बनाया जाता है। पूजा पूर्व की ओर चेहरा करके की जानी चाहिये, और देवा देवताओं की मूर्ति का चेहरा पश्चिम की ओऱ होना चाहिये। ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान दक्षिणा देने से बहुत सारी शान्ति, सुरक्षा, पति के लिये लंबे जीवन, धन और घर के लिये बेटा के साथ साथ पूजा करने वाले की अन्य इच्छाओं की पूर्ति होती है। यह माना जाता है कि पूजा का उद्देश्य करक का दान और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही पूरा होता है। ======================================================== 
जानिए करवा चौथ पूजा की प्रक्रिया (कैसे करें करवा चौथ की पूजन)---- 
 करवा चौथ से एक दिन पहले विवाहित महिलाऍ बहुत सारी तैयारियॉ करती है क्योंकि अगले दिन उसे बिना भोजन और पानी के पूरे दिन व्रत रखना होता है। वह बहुत सुबह सूरज निकलने से पहले ही कुछ खा लेती है और पानी पी लेती है क्योंकि उन्हें अपना पूरा दिन बिना कुछ खाये बिताना होता है। सुबह से दोपहर तक वह त्यौहार की बहुत सी गतिविधियों में व्यस्त रहती है जैसे हाथों और पैरों पर मेंहदी लगाना, खुद सजना, पूजा की थाली तैयार करना( सिन्दूर, फूल, कुमकुम, चावल के दानें, घी का दिया, धूपबत्ती और अन्य पूजा सामग्री के साथ) और अपने सगे सम्बधिंयों से मिलना आदि।
       पूजा शुरु होने से पहले, निम्नलिखित पूजा की सामग्री एकत्र करने जरुरत होती है,गणेश जी, अम्बिका गौरी माँ, श्री नन्दीश्वर, माँ पार्वती, भगवान शिव जी और श्री कार्तिकेय की मूर्ति। पूजा का सामान (जैसे करवा या धातु के बर्तन, धूप, दीप, कपूर, सिंदूर, घी दीया, रोली, चंदन, काजल, फल, मेवा, मिठाई, फूल और माचिस) को इकट्ठा करने का जरुरत होती है। शाम को नहाकर, तैयार होकर, वे अपने पङोसियों और मित्रों के यहॉं करवा चौथ की कहानी सुनने के लिये जाती है।समुदाय या समाज की विवाहित महिलाऍ एक साथ होकर जैसे बगीचे, मंदिर या किसी के घर आदि एक आम जगह पर पूजा की व्यवस्था करती है। बड़ी महिलाओं में से एक करवा चौथ की कहानी सुनाना शुरू करती है। 
     केंद्र में एक विशेष मिट्टी का गेहूं अनाज से भरा बर्तन(भगवान गणेश के प्रतीक के रूप में माना जाता है), पानी से भरा एक धातु का बर्तन , कुछ फूल, माता पार्वती की मूर्ति के साथ में रखने के लिए, अंबिका गौर माता, मिठाई, मठ्ठी, फल और खाद्य अनाज। देवी के लिये अर्पित सभी वस्तुओं का छोटा सा भाग कथावाचक के लिये रखा जाता है। पहले मिट्टी और गाय के गोबर का प्रयोग करके गौर माता की मूर्ति बनाने की रिवाज थी, हालाकिं इन दिनों, महिलाऍ देवी पार्वती की धातु या कागज मूर्ति रखती है। सभी महिलाएं कथा या कहानी सुनने से पहले थाली में मिट्टी का दीपक जलाती है। महिलाऍ रंगीन साड़ी पहनती हैं और खुद को उनकी शादी की लाल या गुलाबी चुनरी के साथ ढकती है। वे पूजा गीत गाती हैं और आशीर्वाद के लिए भगवान और देवी से प्रार्थना करती हैं। वे सात बार एक घेरे में एक दूसरे को अपनी पूजा थाली को स्थानांतरित करती है और गीत गाती हैं। पूजा पूरी हो जाने के बाद, हर कोई अपनी पूजा थाली के साथ अपने घर के लिए चली जाती है और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए परिवार में बड़ें, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के पैर छूती है। 
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कैसे मनाये करवा चौथ पर चंद्रोदय समारोह---- 
 महिलाऍ चंद्रोदय समारोह की रस्म के लिए अपनी पूजा थाली को तैयार करती है। पूजा थाली में घी का दीया, चावल के दाने, पानी भरे बर्तन, माचिस, मिठाई, पानी का एक गिलास और एक छलनी शामिल है। एक बार आकाश में चंद्रमा उगने के बाद, महिलाऍ चाँद देखने के लिए अपने घरों से बाहर आती है। सब से पहले वे चन्द्रमा को अर्घ्य देती है, चाँद की ओर चावल के दाने डालती है, छलनी के अन्दर घी का दिया रखकर चॉद को देखती है। वे अपने पतियों की समृद्धि, सुरक्षा और लंबे जीवन के लिए चंद्रमा से प्रार्थना करती हैं। चाँद की रस्म पूरी करने के बाद, वे अपने पति,सासु मॉ और परिवार अन्य बडों के पैर छू कर सदा सुहागन और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद लेती हैं। कहीं कहीं चाँद को सीधे देखने के स्थान पर उसकी परछाई को पानी में देखने का रिवाज है। पैर छूने के बाद, पति अपने हाथों से अपनी पत्नी को मिठाई खिलाकर पानी पिलाता है। 
 इस वर्ष करवा चौथ के दिन उज्जैन में चन्द्रोदय का समय--- 
  1. करवा चौथ पूजा मुहूर्त = १७:३९ से १८:५६ 
  2. अवधि = १ घण्टा १६ मिनट्स 
  3. करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय = २०:३४ 
  4. चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = ३०/अक्टूबर/२०१५ को ०८:२४ बजे 
  5. चतुर्थी तिथि समाप्त = ३१/अक्टूबर/२०१५ को ०६:२५ बजे 

 क्या और कैसे देवें करवा चौथ पर उपहार--- 
 करवा चौथ के बहुत सारे उपहार पति, माँ, सासु माँ और परिवार के अन्य सदस्यों और मित्रों द्वारा उन महिलाओं को विशेष रुप से दिये जाते है जो अपना पहला करवा चौथ का व्रत रखती है। यह माना जाता है कि करवा चौथ का व्रत बहुत कठिन है,बिना कुछ खाये पीये पूरा दिन व्यतीत करना पडता है। यह हर विवाहित महिला के लिए अपने पति के लिए उपवास रखकर उनसे कुछ खूबसूरत और महंगे तोहफे पाने जैसे आभूषण, चूड़ियाँ, साड़ी, लहंगे, फ्रॉक सूट, नए कपड़े, और मिठाई और अन्य पारंपरिक उपहार पाने का सुनहरा मौका होता है। महिलाऍ बहुत सारे प्यार और स्नेह के साथ अविस्मरणीय उपहार प्राप्त करती है जो खुशी के साथ साथ उनके पति के साथ उनके रिश्ते को मजबूती प्रदान करता है। 
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आधुनिक संस्कृति में करवा चौथ की परंपरा--- 
 वर्तमान में उत्तर भारतीय समाज में करवा चौथ की संस्कृति और परंपरा को बदल दिया है और एक रोमांटिक त्यौहार के रूप में मना रहा शुरू कर दिया गया है। यह जोड़ी के बीच प्यार और स्नेह का प्रतीक का त्यौहार बन गया है। यह हर जगह फिल्मों के माध्यम से प्रेरित होकर बॉलीवुड शैली में मनाया जा रहा है जैसे दिलवाले रही द्वारा दुल्हनिया ले जाएंगे, कभी खुशी कभी गम आदि। कहीं कहीं, यह अविवाहित महिलाओ द्वारा भी अपने मंगेतर और अपने भविष्य में होने वाले पति के लिये अपना प्यार और स्नेह दिखाने के लिये रखा जाता है। प्रचलित परंपरा के अनुसार पतियों का व्रत रखना जरूरी नहीं है लेकिन इस तरह की परंपरा विकसित हो रही है जहां पत्नी के साथ-साथ पति भी व्रत रख रहे हैं. 
       इसीलिए करवाचौथ अब भारत में केवल लोक-परंपरा नहीं रह गई है. पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश हो चुका है और अब यह त्यौहार भावनाओं पर केंद्रित हो गया है. आज पति-पत्नी न केवल एक दूसरे के लिए भूखे रहते हैं बल्कि उपहारों का भी आदान-प्रदान होता है. लिहाजा दोनों ही एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए उपहार खरीदते हैं. आजकल यह भावनात्मक और रोमांटिक लगाव के माध्यम से दंपती के रिश्ते की अच्छी अवस्था में लाने का त्यौहार बन गया है। त्यौहार की तारीख के पास आते ही, बाजार में अपना कारोबार बढ़ाने के लिए बहुत सारे विज्ञापन अभियान टीवी, रेडियो, आदि पर दिखाना शुरू हो जाता है। करवा चौथ पर, सभी जैसे बच्चें और पति विशेष रूप से उपवास वाली महिलाओं सहित अच्छी तरह से नए कपड़े पहनते है और एक साथ में त्यौहार मनाते है। 
     वर्तमान में यह प्रसिद्ध परिवारिक समारोह बन गया है और प्रत्येक चंद्रोदय तक आनंद मनाते है। चंद्रोदय समारोह के बाद अपनी व्यस्त दैनिक दिनचर्या में कुछ परिवर्तन लाने के लिए अपने बच्चों के साथ कुछ जोड़े बजाय घर पर खाने के स्वादिष्ट खाना खाने के लिए रेस्तरां और होटल में जाते है। कुछ लोगों द्वारा इसकी आलोचाना भी की गयी है, हालांकि कुछ लोग महिला सशक्ति करण त्यौहार के रुप में भी कहते है क्योकिं आम तौर पर करवा चौथ पर औरत पूरे दिन के लिए और व्यस्त दैनिक जीवन से दूर जीवन जीने के लिए पूरी तरह से उनके घर के कामकाज छोड़ देती है। वे राहत महसूस करती हैं और अपने पति से उपहार प्राप्त करती है जो उन्हें शारीरिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से खुश करती है। ऐसा माना जाता है कि घर के काम करता है और परिवार के सभी सदस्य की जिम्मेदारियॉ महिला सशक्तीकरण के लिए सबसे बड़ी बाधा हैं।
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