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जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण)

 Learn-Astrology-and-abdominal-disease-abdominal-pain-concerned-astrological-reasons-जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण)ज्योतिष शास्त्र ग्रहों के चलन, उनके समागम या वियोग से सामान्य जन जीवन, पृथ्वी व मनुष्य जाति पर होने वाले शुभाशुभ प्रभावों का निर्धारण तथा उससे होने वाले परिवर्तनों (सुख-दुख) का ज्ञान कराता है। आकाशीय पिंडों, ग्रहों के परिचालन द्वारा उत्पन्न होने वाले योगों की गणना एवं उनसे होने वाले दुष्प्रभावों को गणना द्वारा प्रतिपादित करना इस शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य है जिनमें दुखरूपी व्याधि, अनिष्ट कृत्य, किसी कार्य में विलंब तथा संखरूपी व्याधि परिहार, मांगलिक कार्य इत्यादि का संपादन करता है। ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। षड्यन वेदांगों में ज्योतिष शास्त्र जिसे वैदिक वांङमय के मतानुसार वेदों के नेत्र रूप में निर्देशित किया गया है। अर्थात बिना इस शास्त्र के ज्ञान के हमें काल ज्ञान नहीं हो सकता। यजुर्वेद के इस मंत्र द्वारा यह कामना की गयी है -
भद्रं कर्मेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्य जत्राः। 
स्थिरैरजै तुष्टवा सस्तनूभित्र्यशेयहि देवहितं यदायुः।। 
            ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। मनुष्य स्वस्थ व दीर्घ जीवनयापन करता है। इसके लिए आवश्यक है कि समय से पूर्व उचित निदान, यह तभी संभव हैं जब कारण के मूल का ज्ञान बहुत से रोगों के कारण ज्ञात हो जाते हैं पर बहुतों के कारण अंत तक नहीं ज्ञात होते। रोगों का संबंध पूर्व जन्म से भी होता है। आचार्य चरक लिखते हैंः कर्मजा व्याध्यः केचित दोषजा सन्ति चापरे। 
 त्रिषठाचार्य ने भी लिखा है- जन्मांतरम् कृतं पापं व्यधिरुपेण जायते। अर्थात कुछ व्याधियां पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से होती हैं तथा कुछ व्याधियां शरीरस्थ दोषों (त्रिदोष-वात, पित्त, कफ) के प्रभाव से होती हैं। आचार्य कौटिल्य का कथन है कि सभी वस्तुओं का परित्याग करके सर्वप्रथम शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर नष्ट होने पर सबका नाश हो जाता है। महर्षि चरक ने भी उपनिषदों में वर्णित तीन ऐषणाओं के अतिरिक्त एक चैथी प्राणेप्रणा की बात कही है जिसका अर्थ है कि प्राण की रक्षा सर्वोपरि है। 
जैसा कि महाभारत के उद्योग पर्व में कहा गया है- मृतकल्पा हि रोगिणः। रोगस्तु दोष वैषम्यं दोष साम्यम रोगत। (अष्टांग हृदय 1/20) शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इन तीन दोषों को संतुलित रखना पड़ता है क्योंकि सब रोगों का कारण त्रिदोष वैषम्य ही है। सभी रोगों के साक्षात कारण प्रकुपित दोष ही हैं । हमारे आचार्यों ने मनुष्य के प्रत्येक अंगों की स्थिति ज्ञात करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में काल पुरुष की कल्पना की है, काल पुरुष के अंगों में मेषादि राशियों का समावेश किया गया हैः काल पुरुष के अंग सिर मेष मुख वृष बांह मिथुन हृदय कर्क उदर सिंह कटि कन्या वस्ति तुला गर्दन वृश्चिक उरु धनु जानु मकर जंघा कुंभ चरण मीन जातक स्कंध में मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को लग्नादि बारह भावों में विभक्त कर द्वादश भाव तनु, धन, सहज, सुहृत, सतु, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय व व्यय के नाम से जाने जाते हैं। इन बारह भावों में छठा भाव रिपु भाव है। इसे रोग भाव भी कहा जाता है। 
          छठे भाव से रोग व शत्रु दोनों का विचार किया जाता है। आठवें व बारहवें भाव तथा भावेश का भी संबंध रोग से होता है। पेट दर्द (उदर रोग विकार) उत्पत्र करने में भी शनि एक महत्वपुर्ण भुमिका निभाता हैं। सूर्य एवं चन्द्र को बदहजमी का कारक मानते हैं, जब सूर्य या चंद्र पर शनि का प्रभाव हो, चंद्र व बृहस्पति को यकृत का कारक भी माना जाता है। इस पर शनि का प्रभाव यकृत को कमजोर एवं निष्क्रिय प्रभावी बनाता हैं। पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार बुध पर शनि के दुष्प्रभाव से आंतों में खराबी उत्पत्र होती हैं। वर्तमान में एक कष्ट कारक रोग एपेण्डीसाइटिस भी बृहस्पति पर शनि के अशुभ प्रभाव से देखा गया है। शुक्र को धातु एवं गुप्तांगों का प्रतिनिधि माना जाता हैं। जब शुक्र शनि द्वारा पीडि़त हो तो जातक को धातु सम्बंधी कष्ट होता है। जब शुक्र पेट का कारक होकर स्थित होगा तो पेट की धातुओं का क्षय शनि के प्रभाव से होगा।बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! 
          आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है | ज्योतिष शास्त्र में उदर का स्थान कालपुरुष की कुंडली में उदर का स्थान पंचम भाव है जिसकी राशि सिंह है। सिंह राशि जो पंचम भाव का कारक हैः उससे प्रभावित अंग उदर है जिसमें मन्दाग्नि, गुल्म, पथरी, पाण्डुरोग, यकृत इत्यादि के रोग उत्पन्न होते हैं। अतिसार संग्रहणी, प्लीहा, उदरशूल, अरुचि या मुंह का स्वाद बिगड़ना, अजीर्ण इत्यादि। चिकित्सकों का विचार है कि वीर्य का देह में विशेष महत्व है, वीर्य के क्षीण होने पर वायु विकृत हो जाती है जिससे पाचन तंत्र बिगड़ जाता है तथा मन्दाग्नि, गैस या गुल्म सरीखे रोग पैदा होते हैं। उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय कारण पराशर आचार्यों ने उदर रोग को निम्न प्रकार से रेखांकित किया है। षष्ठ भाव फलाध्याय में लिखते हैं कि षष्ठेश अपने घर, लग्न या अष्टम भाव में हो तो शरीर में व्रण (घाव) होता है। षष्ठ राशि में जो राशि हो उस राशि के आश्रित अंगों में रोग उत्पन्न होता है।
          राहु या केतु हो तो पेट में घाव होता है। जातकालंकार में लिखते हैं कि षष्ठेशे पापयुक्ते तनु निधन गते तनु निधनगते नु शरीरे व्रणास्युः जातक के जन्मांग चक्र में रोग का विचार मुख्यतः षष्ठ भाव, षष्ठेश, षष्ठ भावस्थ ग्रह, अष्टम भाव, अष्टमेश, अष्टम भावस्थ ग्रह, द्वादश भाव, द्वादशेश, द्वादशस्थ ग्रह, षष्ठेश से युक्त एवं दृष्ट ग्रहों द्वारा एवं मंगल ग्रह द्वारा किया जाता है। इसमें हमें ग्रह राशियों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ये निर्बल, दोष युक्त या पुष्ट दोषयुक्त होकर रोगकारक, मारक या रोग निवारक बन जाते हैं। उदररोग के ज्योतिषीय कारण जो प्रमुख रूप से उदर रोग को निर्देशित करने में सहायक होते हैंः ƒ सूर्य, मंगल, शनि, राहु-केतु में से तीन ग्रहों का एक स्थान पर युति करना पेट में विकार देता है। ƒ नीच राशि का चंद्रमा लग्नस्थ होकर मंगल, शनि या राहु से दृष्ट हो तो उदर रोग देता है। ƒपंचम भाव का संबंध पाचन तंत्र, पाचन क्रिया से है। सूर्य को पाचन तंत्र का नियंत्रक माना जाता है। हमारे प्राचीन विद्वानों का मत है कि पाचन क्रिया में रश्मियों का महत्वपूर्ण योगदान है। जब भी सूर्य आभाहीन होता है उदर में गड़बड़ी देता है। ज्योतिष का नियम है- औषधि, मणि, मंत्राणां, ग्रह नक्षत्र तारिका। भाग्य काले भवेत्सिहि अभाग्यं निष्फलं भवेत्।। सत्य ही कहा गया है कि जहां भौतिक विज्ञान की सीमाएं समाप्त होती हैं वहीं से अध्यात्म विज्ञान की सीमाएं प्रारंभ होती हैं। 
 शनिकृत कुछ विशेष उदर रोग योगः- 
  •  1 कर्क, वृश्चिक, कुंभ नवांश में शनिचंद्र से योग करें तो यकृत विकार के कारण पेट में गुल्म रोग होता है। 
  • 2 द्वितीय भाव में शनि होने पर संग्रहणी रोग होता हैं। इस रोग में उदरस्थ वायु के अनियंत्रित होने से भोजन बिना पचे ही शरीर से बाहर मल के रुप में निकल जाता हैं। 
  • 3 सप्तम में शनि मंगल से युति करे एवं लग्रस्थ राहू बुध पर दृष्टि करे तब अतिसार रोग होता है। 
  • 4 मीन या मेष लग्र में शनि तृतीय स्थान में उदर मंे दर्द होता है। 
  • 5 सिंह राशि में शनि चंद्र की यूति या षष्ठ या द्वादश स्थान में शनि मंगल से युति करे या अष्टम में शनि व लग्र में चंद्र हो या मकर या कुंभ लग्रस्थ शनि पर पापग्रहों की दृष्टि उदर रोग कारक है। 
  • 6 कुंभ लग्र में शनि चंद्र के साथ युति करे या षष्ठेश एवं चंद्र लग्रेश पर शनि का प्रभाव या पंचम स्थान में शनि की चंद्र से युति प्लीहा रोग कारक है। 

 बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है ! पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार कुंडली में लगन में राहू और सप्तम स्थान में केतु हो तो व्यक्ति को लिवर में इन्फेक्शन होता है ! आठवे भाव में बुध सूर्य के साथ मकर राशि के हो के बैठा है तो निश्चित तोर पर उस व्यक्ति को पेशाब से सम्बंधित समस्या होती है जैसे किडनी में स्टोन या इन्फेक्शन होता है ! कुम्भ लगन में सूर्य हो तो वह व्यक्ति हमेशा एसिडिटी ,बदहजमी तथा पेट में तनाव रहता है ,लगन कुंडली के बारहवे भाव में सिंह राशि का केतु शनि हो तो बवासीर की समस्या तथा गुदा रोग होता है ,अगर बृहस्पति सप्तम या अष्टम भाव में हो तो पीठ तथा पैरो में दर्द देते है !
               कुंडली देख के तमाम उन समसयाओं का समधान हो सकता है जो देखने में तो कम लगता है लेकिन असधारण होता है !क्यो की हर ग्रह का प्रभाव का एक हिस्सा होता है ! और उस आधार पर किस ग्रह का प्रभाव किस अंग पर पड़ रहा है तथा उसका दुस्प्रभाव क्या होगा इसका अध्यन कर इनके रोगों से बचा जा सकता है ! उपचार कई तरीके से होता है जैसे ग्रहों की शान्ति , रत्न धारण कर ,दान तथा उपवास द्वारा हर रोग का उपचार संभव है ! उदर योग ज्योतिषीय दृष्टिकोण भी रोगों का कारण उदर रोग को माना जाता है। जब तक पाचन शक्ति अच्छी रहती है तब तक जातक का शरीर भी हृष्ट पुष्ट रहता है। पाचन शक्ति की प्रबलता में कंद मूल या प्याज से रोटी खाने वाला भी तरोताजा एवं हृष्ट पुष्ट दिखता है। वहीं पाचन शक्ति कमजोर हो, तो पंचमेवा का सेवन करने वाला भी अति दुर्बल हो जाता है। वास्तव में पाचन क्रिया का समाप्त होना ही मृत्यु समझा जाता है। पाचक रसों में विकृति आने पर शरीर पर रोगों का आक्रमण आसानी से होता है। 
         रोग दो प्रकार के माने जाते हैं- निज रोग जिसे शारीरिक एवं मानसिक में विभक्त किया गया है और आगंतुक रोग जिसमें दृष्टि निर्मित व अदृष्ट निर्मित रोग आते हंै। शारीरिक रोग शरीर में वात पित्त व कफ की कमी या अधिकता से होते हैं और मानसिक रोग भय, शोक तथा क्रोध के कारण। ये रोग अष्टम भाव में स्थित राशि व उसके स्वामी अष्टमस्थ ग्रह व अष्टम भाव पर दृष्टि कारक ग्रह से युति दृष्टि किसी ग्रह या भाव कारक से होने पर होते हैं। आगंतुक रोग में दृष्टि रोग घात के कारण होते हैं तो अदृष्ट रोग देवी देवताओं के प्रकोप के कारण। इन रोगों का विचार छठे भाव, भावेश, षष्ठस्थ ग्रह व षष्ठ भाव पर दृष्टि कारक ग्रहों के अनुसार किया जाता है। पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार यदि जन्मांग में पंचम भाव, भावेश या कारक ग्रह का छठे भाव से सबंध हो, तो दोष विकृति के कारण रोग होता है। आगंतुक रोग होने पर जातक के लिए तंत्र मंत्र यंत्र का उपचार ही प्रभावी होगा। 
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ज्योतिष के अनुसार रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समय में किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष पर पापग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप दृष्टि,पापग्रहों की राशि एवं नक्षत्र में उपस्थित होना, पापग्रह अधिष्ठित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है। इन रोगकारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर रहने पर रोग की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं भाव मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो का प्रतिनिधित्व करते है। चिकित्सकीय उपचार से राहत की बजाय परेशानी होती रहती है। उदर के कारक भाव के विषय में उत्तर कालमृत में कहा गया है। गम्भीर्यघनता रहस्यविनया वृतान्तसंलेखनं। क्षेमस्नेह प्रबन्ध काव्यरचना कार्यप्रवेशोदराः। 
           अर्थात् गंभीरता, दृढ़ता, रहस्य, विनय, वृत्तांत लेख, क्षेम, स्नेह, प्रबंध, काव्य रचना, कार्य प्रारंभ एवं उदर पंचम भाव के कारक हैं। प्रत्येक ग्रह उदर रोग देने में सक्षम है। लेकिन उदर व उदर व्याधि हेतु चंद्र ‘‘मुखकान्तिश्वेतवर्णोंदरा’’ एवं वृह ‘’पुत्र पौत्र जठर व्याधि द्विपात्सम्पदो’’ प्रमुख माने गए हैं। चंद्र एवं गुरु को यकृत का कारक भी मानते हैं। हमारे शरीर में यकृत एक महत्वपूर्ण अंग है। यकृ त से उत्पन्न पित्त से ही भोजन का पाचन होता है। यदि चंद्र व गुरु शुभ होकर कमजोर हों एवं पाप पीड़ित हो तो पित्त की कमी के कारण भोजन का पाचन सही नहीं रहेगा। किंतु उक्त दोनों ग्रह अशुभ होकर बली हों तो पित्त की अधिकता के कारण पाचन तंत्र विकृत हो जाएगा। फलतः उदर रोग दोनो स्थितियों में जटिल हो जाता है। जन्मांग में चंद्र व गुरु शुभ होकर बलवान हों तो जातक को शुभफल की प्राप्ति होती है। दूसरी तरफ इनकी शुभता से पाचन शक्ति व्यवस्थित रहती है। फलतः जातक का सर्वांगीण विकास होता है। उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय योग- यदि लग्नेश, षष्ठेश व बुध एकत्र हों, तो जातक पित्त जनित रोग से और यदि लग्नेश, षष्ठेश व शनि एकत्र हो तो गैस व्याधि से पीड़ित रहता है। लग्नेश, षष्ठेश, बुध व शनि का चतुर्विध कोई संबंध बन रहा हो, तो पित्ताधिक्य व गैस व्याधि होती है अर्थात जातक एसिडिटी से ग्रस्त होता है जो आजकल आम है। मंगल लग्न में हो व षष्ठेश निर्बल हो, तो अजीर्ण और लग्न में पाप ग्रह व अष्टम में शनि हो तो कुक्षि में पीड़ा होती है।
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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 –मध्य प्रदेश) एवं 09024390067 –राजस्थान) के अनुसार
  1.  लग्न में पाप ग्रह राहु व केतु हों, तो इनकी दृष्टि पंचम पर होगी व अष्टमस्थ शनि की दृष्टि भी पंचम पर होगी। यदि इस स्थिति में गुरु भी पीड़ित हो, तो जातक एपेंण्डिसाइटिस से ग्रस्त होता है। 
  2. लग्नेश यदि शत्रु राशि या नीच राशि में हो, मंगल चैथे भाव में व शनि पापग्रह से दृष्ट हो, तो जातक उदर शूल से ग्रस्त होता है। 
  3. सूर्य व चंद्र छठे भाव में हो, तो वायु विकार से पाण्डु रोग और इनके साथ मंगल की युति हो, तो उदर शूल होता है। यदि सप्तम भाव में शुक्र पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो जातक संग्रहणी रोग का शिकार होता है। 
  4. द्वितीय स्थान में शनि या राहु हो या कारकांश कुंडली में पंचम स्थान में केतु हो तो भी संग्रहणी रोग होता है। 
  5. लग्न में राहु व बुध एवं सप्तम स्थान में शनि व मंगल हों या लग्नेश व गुरु त्रिक भाव में हों, तो जातक अतिसार से ग्रस्त होता है। 
  6. लग्नेश व बुध या गुरु की युति त्रिक भाव में हो या पंचम भाव में नीच राशि में बुध या गुरु स्थित हो, तो जातक पित्त का रोगी होता है। 
  7.  षष्ठेश चंद्र पाप ग्रह के साथ हो या पंचम स्थान में शनि व चंद्र हों या लग्नेश व सप्तमेश चंद्र पर केवल पाप ग्रहों की दृष्टि हो या जन्मराशि व षष्ठेश केवल पापग्रहों से दृष्ट हों या सूर्य व मंगल के मध्य चंद्र हो व सूर्य मकर में हो, तो जातक प्लीहा रोग से ग्रस्त होता है। 
  8. छठे या बारहवें भाव में शनि व मंगल हों या सिंहस्थ चंद्र पाप पीड़ित हो या लाभेश तृतीय स्थान में हो या केंद्र त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जातक शूल रोग से ग्रस्त होता है। 
  9. सप्तम में राहु व केतु का होना या लग्न में चंद्रमा व अष्टम में शनि का होना भी उदर रोग का कारक है। 
  10.  जन्मांग में यदि पंचम भाव में शुभ ग्रह बली होकर स्थित हो, पंचमेश व पंचम कारक भी बली हो, तो जातक को उदर रोग सामान्यतः नहीं होता है। लेकिन पंचम भाव में पाप ग्रहों का होना पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि होना, पंचम भाव व पंचमेश का पाप कर्तरी प्रभाव में होना आदि उदर रोग के कारक हैं। 
  11. पाप ग्रहों का प्रभाव जैसे-जैसे पंचम भाव, पंचमेश व पंचम कारक पर बढ़ता जाएगा उदर रोग उतना ही जटिल होता जाएगा। अर्थात उदर रोगों के होने या उनसे मुक्ति में ग्रहों की भूमिका गोचर व दशाकाल के आधार पर निर्भर होती है। 

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भाव मंजरी के अनुसार- मेष राशि सिर में, वृष मुंह में , मिथुन छाती में, कर्क ह्नदय में, सिंह पेट में, कन्या कमर में, तुला बस्ति में अर्थात पेडू में, वृश्च्कि लिंग में , धनु जांघो में, मकर घुटनों में, कुम्भ पिंण्डली में तथा मीन राशि को पैरो में स्थान दिया गया है। राशियों के अनुसार ही नक्षत्रों को उन अंगो में स्थापित करने से कल्पिम मानव शरीराकृति बनती है।इन नक्षत्रों व राशियों को आधार मानकर ही शरीर के किसी अंग विशेष में रोग या कष्ट का पूर्वानुभान किया जा सकता है। शनि तमोगुणी ग्रह क्रुर एवं दयाहीन, लम्बे नाखुन एवं रूखे-सूखे बालों वाला, अधोमुखी, मंद गति वाला एवं आलसी ग्रह है। इसका आकार दुर्बल एवं आंखे अंदर की ओर धंसी हुई है। जहां सुख का कारण बृहस्पति को मानते है। तो दुःख का कारण शनि है। शनि एक पृथकत्ता कारक ग्रह है पृथकत्ता कारक ग्रह होने के नाते इसकी जन्मांग में जिस राशि एवं नक्षत्र से सम्बन्ध हो, उस अंग विशेष में कार्य से पृथकत्ता अर्थात बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैंै। 
            शनि को स्नायु एवं वात कारक ग्रह माना जाता है । नसों वा नाडियों में वात का संचरण शनि के द्वारा ही संचालित है। आयुर्वेद में भी तीन प्रकार के दोषों से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। ये तीन दोष वात, कफ व पित्त है। हमारे शरीर की समस्त आन्तरिक गतिविधियां वात अर्थात शनि के द्वारा ही संचालित होती है। आयुर्वेद शास्त्रों में भी कहा गया हैः- पित्त पंगु कफः पंगु पंगवो मल धातवः। वायुना यत्र नीयते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।। अर्थात पित्त, कफ और मल व धातु सभी निष्क्रिय हैं। स्वयं ये गति नहीं कर सकते । शरीर में विद्यमान वायु ही इन्हें इधर से उधर ले जा सकती है। जिस प्रकार बादलों को वायु ले जाती है। यदि आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो वात ही सभी कार्य समपन्न करता है। इसी वात पर ज्योतिष शास्त्र शनि का नियंत्रण मानता है। शनि के अशुभ होने पर शरीरगत वायु का क्रम टूट जाता है। अशुभ शनि जिस राशि, नक्षत्र को पीडीत करेगा उसी अंग में वायु का संचार अनियंत्रित हो जायेगा, जिससे परिस्थिति अनुसार अनेक रोग जन्म ले सकते है। इसका आभास स्पष्ट है कि जीव-जन्तु जल के बिना तो कुछ काल तक जीवित रह सकते है, लेकिन बीना वायु के कुछ मिनट भी नहीं रहा जा सकता है। नैसर्गिक कुण्डली में शनि को दशम व एकादश भावों का प्रतिनिधि माना गया है। 
            इन भावो का पीडित होना घुटने के रोग , समस्त जोडों के रोग , हड्डी , मांसपेशियों के रोग, चर्च रोग, श्वेत कुष्ठ, अपस्मार, पिंडली में दर्द, दाये पैर, बाये कान व हाथ में रोग, स्नायु निर्बलता, हृदय रोग व पागलपन देता है। रोगनिवृति भी एकादश के प्रभाव में है उदरस्थ वायु में समायोजन से शनि पेट मज्जा को जहां शुभ होकर मजबुत बनाता है वहीं अशुभ होने पर इसमें निर्बलता लाता है। फलस्वरूप जातक की पाचन शक्ति में अनियमितता के कारण भोजन का सहीं पाचन नहीं है जो रस, धातु, मांस, अस्थि को कमजोर करता है। समस्त रोगों की जड पेट है। पाचन शक्ति मजबुत होकर प्याज-रोटी खाने वालो भी सुडौल दिखता है वहीं पंचमेवा खाने वाला बिना पाचन शक्ति के थका-हारा हुआ मरीज लगता है। मुख्य तौर पर शनि को वायु विकार का कारक मानते है जिससे अंग वक्रता, पक्षाघात, सांस लेने में परेशानी होती है। शनि का लौह धातु पर अधिकार है। शरीर में लौह तत्व की कमी होने पर एनीमिया, पीलिया रोग भी हो जाता है। अपने पृथकत्ता कारक प्रभाव से शनि अंग विशेष को घात-प्रतिघात द्वारा पृथक् कर देता है। इस प्रकार अचानक दुर्घटना से फे्रकच्र होना भी शनि का कार्य हो सकता है। 
            यदि इसे अन्य ग्रहो का भी थोडा प्रत्यक्ष सहयोग मिल जाये तो यह शरीर में कई रोगों को जन्म दे सकता है। जहां सभी ग्रह बलवान होने पर शुभ फलदायक माने जाते है, वहीं शनि दुःख का कारक होने से इसके विपरित फल माना है कि- आत्मादयो गगनगैं बलिभिर्बलक्तराः। दुर्बलैर्दुर्बलाः ज्ञेया विपरीत शनैः फलम्।। अर्थात कुण्डली में शनि की स्थिति अधिक विचारणीय है। इसका अशुभ होकर किसी भाव में उपस्थित होने उस भाव एवं राशि सम्बधित अंग में दुःख अर्थात रोग उत्पन्न करेगा। गोचर में भी शनि एक राशि में सर्वाधिक समय तक रहता है जिससे उस अंग-विशेष की कार्यशीलता में परिवर्तन आना रोग को न्यौता देना है। कुछ विशेष योगों में शनि भिन्न-भिन्न रोग देता है। 
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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि को सन्तुलन और न्याय का ग्रह माना गया है.जो लोग अनुचित बातों के द्वारा अपनी चलाने की कोशिश करते हैं,जो बात समाज के हित में नही होती है और उसको मान्यता देने की कोशिश करते है,अहम के कारण अपनी ही बात को सबसे आगे रखते हैं,अनुचित विषमता,अथवा अस्वभाविक समता को आश्रय देते हैं… शनि उनको ही पीडित करता है.शनि हमसे कुपित न हो,उससे पहले ही हमे समझ लेना चाहिये,कि हम कहीं अन्याय तो नही कर रहे हैं,या अनावश्यक विषमता का साथ तो नही दे रहे हैं.यह तपकारक ग्रह है,अर्थात तप करने से शरीर परिपक्व होता है,शनि का रंग गहरा नीला होता है,शनि ग्रह से निरंतर गहरे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर गिरती रहती हैं.शरी में इस ग्रह का स्थान उदर और जंघाओं में है.सूर्य पुत्र शनि दुख दायक,शूद्र वर्ण,तामस प्रकृति,वात प्रकृति प्रधान तथा भाग्य हीन नीरस वस्तुओं पर अधिकार रखता है. पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि सीमा ग्रह कहलाता है,क्योंकि जहां पर सूर्य की सीमा समाप्त होती है,वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है.जगत में सच्चे और झूठे का भेद समझना,शनि का विशेष गुण है.यह ग्रह कष्टकारक तथा दुर्दैव लाने वाला है.विपत्ति,कष्ट,निर्धनता,देने के साथ साथ बहुत बडा गुरु तथा शिक्षक भी है,जब तक शनि की सीमा से प्राणी बाहर नही होता है,संसार में उन्नति सम्भव नही है.शनि जब तक जातक को पीडित करता है,तो चारों तरफ़ तबाही मचा देता है.जातक को कोई भी रास्ता चलने के लिये नही मिलता है.करोडपति को भी खाकपति बना देना इसकी सिफ़्त है. अच्छे और शुभ कर्मों बाले जातकों का उच्च होकर उनके भाग्य को बढाता है,जो भी धन या संपत्ति जातक कमाता है,उसे सदुपयोग मे लगाता है. 
               पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार शरीर में वात रोग हो जाने के कारण शरीर फ़ूल जाता है,और हाथ पैर काम नही करते हैं,गुदा में मल के जमने से और जो खाया जाता है उसके सही रूप से नही पचने के कारण कडा मल बन जाने से गुदा मार्ग में मुलायम भाग में जख्म हो जाते हैं,और भगन्दर जैसे रोग पैदा हो जाते हैं.एकान्त वास रहने के कारण से सीलन और नमी के कारण गठिया जैसे रोग हो जाते हैं,हाथ पैर के जोडों मे वात की ठण्डक भर जाने से गांठों के रोग पैदा हो जाते हैं,शरीर के जोडों में सूजन आने से दर्द के मारे जातक को पग पग पर कठिनाई होती है. दिमागी सोचों के कारण लगातार नशों के खिंचाव के कारण स्नायु में दुर्बलता आजाती है.अधिक सोचने के कारण और घर परिवार के अन्दर क्लेश होने से विभिन्न प्रकार से नशे और मादक पदार्थ लेने की आदत पड जाती है,अधिकतर बीडी सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से क्षय रोग हो जाता है… अधिकतर अधिक तामसी पदार्थ लेने से कैंसर जैसे रोग भी हो जाते हैं.पेट के अन्दर मल जमा रहने के कारण आंतों के अन्दर मल चिपक जाता है,और आंतो मे छाले होने से अल्सर जैसे रोग हो जाते हैं.शनि ऐसे रोगों को देकर जो दुष्ट कर्म जातक के द्वारा किये गये होते हैं,उन कर्मों का भुगतान करता है.जैसा जातक ने कर्म किया है उसका पूरा पूरा भुगतान करना ही शनिदेव का कार्य है. =============================================== 
इन उपायों-मंत्रो से होगा रोग निवारण– 
 शनि ग्रह की पीडा से निवारण के लिये पाठ,पूजा,स्तोत्र,मंत्र, और गायत्री आदि को लिख रहा हूँ,जो काफ़ी लाभकारी सिद्ध होंगे.नित्य १०८ पाथ करने से चमत्कारी लाभ प्राप्त होगा. 
 विनियोग:-
शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:,आपो देवता,शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:. नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें. अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर),देवी: ललाटे (माथा).अभिषटय मुखे (मुख),आपो कण्ठे (कण्ठ),भवन्तु ह्रदये (ह्रदय),पीतये नाभौ (नाभि),शं कट्याम (कमर),यो: ऊर्वो: (छाती),अभि जान्वो: (घुटने),स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़),न: पादयो: (पैर). अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:.अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:.आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:.पीतये अनामिकाभ्याम नम:.शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:.स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:. 
अथ ह्रदयादिन्यास:-शन्नो देवी ह्रदयाय नम:.अभिष्टये शिरसे स्वाहा.आपो भवन्तु शिखायै वषट.पीतये कवचाय हुँ.(दोनो कन्धे).शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट.स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट. 
ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान.चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी.. शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात. 
वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:.औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:. जप मंत्र :- ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: । नित्य २३००० जाप प्रतिदिन.
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इन रोगों-बिमारियों का कारण भी शनि देव/गृह ही होते हैं—–
  1.  ===उन्माद नाम का रोग शनि की देन है,जब दिमाग में सोचने विचारने की शक्ति का नाश हो जाता है,जो व्यक्ति करता जा रहा है,उसे ही करता चला जाता है,उसे यह पता नही है कि वह जो कर रहा है,उससे उसके साथ परिवार वालों के प्रति बुरा हो रहा है,या भला हो रहा है,संसार के लोगों के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं,उसे पता नही होता,सभी को एक लकडी से हांकने वाली बात उसके जीवन में मिलती है,वह क्या खा रहा है,उसका उसे पता नही है कि खाने के बाद क्या होगा,जानवरों को मारना,मानव वध करने में नही हिचकना,शराब और मांस का लगातार प्रयोग करना,जहां भी रहना आतंक मचाये रहना,जो भी सगे सम्बन्धी हैं,उनके प्रति हमेशा चिन्ता देते रहना आदि उन्माद नाम के रोग के लक्षण है.
  2.  ====वात रोग का अर्थ है वायु वाले रोग,जो लोग बिना कुछ अच्छा खाये पिये फ़ूलते चले जाते है,शरीर में वायु कुपित हो जाती है,उठना बैठना दूभर हो जाता है,शनि यह रोग देकर जातक को एक जगह पटक देता है,यह रोग लगातार सट्टा,जुआ,लाटरी,घुडदौड और अन्य तुरत पैसा बनाने वाले कामों को करने वाले लोगों मे अधिक देखा जाता है.किसी भी इस तरह के काम करते वक्त व्यक्ति लम्बी सांस खींचता है,उस लम्बी सांस के अन्दर जो हारने या जीतने की चाहत रखने पर ठंडी वायु होती है वह शरीर के अन्दर ही रुक जाती है,और अंगों के अन्दर भरती रहती है.अनितिक काम करने वालों और अनाचार काम करने वालों के प्रति भी इस तरह के लक्षण देखे गये है. 
  3.  ====भगन्दर रोग गुदा मे घाव या न जाने वाले फ़ोडे के रूप में होता है.अधिक चिन्ता करने से यह रोग अधिक मात्रा में होता देखा गया है.चिन्ता करने से जो भी खाया जाता है,वह आंतों में जमा होता रहता है,पचता नही है,और चिन्ता करने से उवासी लगातार छोडने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है,मल गांठों के रूप मे आमाशय से बाहर कडा होकर गुदा मार्ग से जब बाहर निकलता है तो लौह पिण्ड की भांति गुदा के छेद की मुलायम दीवाल को फ़ाडता हुआ निकलता है,लगातार मल का इसी तरह से निकलने पर पहले से पैदा हुए घाव ठीक नही हो पाते हैं,और इतना अधिक संक्रमण हो जाता है,कि किसी प्रकार की एन्टीबायटिक काम नही कर पाती है. 
  4.  ====गठिया रोग शनि की ही देन है.शीलन भरे स्थानों का निवास,चोरी और डकैती आदि करने वाले लोग अधिकतर इसी तरह का स्थान चुनते है,चिन्ताओं के कारण एकान्त बन्द जगह पर पडे रहना,अनैतिक रूप से संभोग करना,कृत्रिम रूप से हवा में अपने वीर्य को स्खलित करना,हस्त मैथुन,गुदा मैथुन,कृत्रिम साधनो से उंगली और लकडी,प्लास्टिक,आदि से यौनि को लगातार खुजलाते रहना,शरीर में जितने भी जोड हैं,रज या वीर्य स्खलित होने के समय वे भयंकर रूप से उत्तेजित हो जाते हैं.और हवा को अपने अन्दर सोख कर जोडों के अन्दर मैद नामक तत्व को खत्म कर देते हैं,हड्डी के अन्दर जो सबल तत्व होता है,जिसे शरीर का तेज भी कहते हैं,धीरे धीरे खत्म हो जाता है,और जातक के जोडों के अन्दर सूजन पैदा होने के बाद जातक को उठने बैठने और रोज के कामों को करने में भयंकर परेशानी उठानी पडती है,इस रोग को देकर शनि जातक को अपने द्वारा किये गये अधिक वासना के दुष्परिणामों की सजा को भुगतवाता है. 
  5.  =====स्नायु रोग के कारण शरीर की नशें पूरी तरह से अपना काम नही कर पाती हैं,गले के पीछे से दाहिनी तरफ़ से दिमाग को लगातार धोने के लिये शरीर पानी भेजता है,और बायीं तरफ़ से वह गन्दा पानी शरीर के अन्दर साफ़ होने के लिये जाता है,इस दिमागी सफ़ाई वाले पानी के अन्दर अवरोध होने के कारण दिमाग की गन्दगी साफ़ नही हो पाती है,और व्यक्ति जैसा दिमागी पानी है,उसी तरह से अपने मन को सोचने मे लगा लेता है,इस कारण से जातक में दिमागी दुर्बलता आ जाती है,वह आंखों के अन्दर कमजोरी महसूस करता है,सिर की पीडा,किसी भी बात का विचार करते ही मूर्छा आजाना मिर्गी,हिस्टीरिया,उत्तेजना,भूत का खेलने लग जाना आदि इसी कारण से ही पैदा होता है.इस रोग का कारक भी शनि है, 
  6.  ===पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार अगर लगातार शनि के बीज मंत्र का जाप जातक से करवाया जाय,और उडद जो शनि का अनाज है,की दाल का प्रयोग करवाया जाय,रोटी मे चने का प्रयोग किया जाय,लोहे के बर्तन में खाना खाया जाये,तो इस रोग से मुक्ति मिल जाती है. 
  7. ===इन रोगों के अलावा पेट के रोग,जंघाओं के रोग,टीबी,कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है. ———————————————————————————-

 उदर रोग का एक महत्व पूर्ण प्रयोग — 
 इस साधना को करने से से पेट की तमाम बिमारिओ से निज़ात पाई जा सकती है | बद हज्मी, पेट गैस ,दर्द और आव का पूर्ण इलाज हो जाता है | इसे ग्रहन काल ,दीपावली और होली आदि शुभ महूरतों में कभी भी सिद्ध किया जा सकता है | आप दिन या रात में कभी भी कर सकते है | इस मंत्र को १०८ वार जप कर सिद्ध कर ले प्रयोग के वक़्त ७ वार पानी पे मन्त्र पढ़ फुक मारे और रोगी को पिला दे जल्द ही फ़ायदा होगा | 
 साबर मन्त्र — || ॐ नमो अदेस गुरु को शियाम बरत शियाम गुरु पर्वत में बड़ बड़ में कुआ कुआ में तीन सुआ कोन कोन सुआ वाई सुआ छर सुआ पीड़ सुआ भाज भाज रे झरावे यती हनुमत मार करेगा भसमंत फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा || 
 आधा सिर दर्द — आधा सिर दर्द और माई ग्रेन एक बहुत बड़ी समस्या है | उस के लिए एक महत्व पूर्ण मन्त्र दे रहा हू | इसे भी ग्रहन काल दीपावली आदि पे उपर वाले तरीके से सिद्ध कर ले | प्रयोग के वक़्त एक छोटी नमक की डली ले कर उस पर ७ वार मन्त्र पढ़े और पानी में घोल कर माथे पे लगादे आधे सिर की दर्द फोरन बंद हो जाएगी | 
 साबर मन्त्र :- को करता कुडू करता बाट का घाट का हांक देता पवन बंदना योगीराज अचल सचल || 
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शनि की जडी बूटियां—– 
बिच्छू बूटी की जड या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है.
 शनि सम्बन्धी दान पुण्य—– 
पुष्य,अनुराधा,और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समय में शनि पीडा के निमित्त स्वयं के वजन के बराबर के चने,काले कपडे,जामुन के फ़ल,काले उडद,काली गाय,गोमेद,काले जूते,तिल,भैंस,लोहा,तेल,नीलम,कुलथी,काले फ़ूल,कस्तूरी सोना आदि दान की वस्तुओं शनि के निमित्त दान की जाती हैं. 
शनि सम्बन्धी वस्तुओं की दानोपचार विधि—— 
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067के अनुसार जो जातक शनि से सम्बन्धित दान करना चाहता हो वह उपरोक्त लिखे नक्षत्रों को भली भांति देख कर,और समझ कर अथवा किसी समझदार ज्योतिषी से पूंछ कर ही दान को करे.शनि वाले नक्शत्र के दिन किसी योग्य ब्राहमण को अपने घर पर बुलाये.चरण पखारकर आसन दे,और सुरुचि पूर्ण भोजन करावे,और भोजन के बाद जैसी भी श्रद्धा हो दक्षिणा दे.फ़िर ब्राहमण के दाहिने हाथ में मौली (कलावा) बांधे,तिलक लगावे.जिसे दान देना है,वह अपने हाथ में दान देने वाली वस्तुयें लेवे,जैसे अनाज का दान करना है,तो कुछ दाने उस अनाज के हाथ में लेकर कुछ चावल,फ़ूल,मुद्रा लेकर ब्राहमण से संकल्प पढावे,और कहे कि शनि ग्रह की पीडा के निवार्णार्थ ग्रह कृपा पूर्ण रूपेण प्राप्तयर्थम अहम तुला दानम ब्राहमण का नाम ले और गोत्र का नाम बुलवाये,अनाज या दान सामग्री के ऊपर अपना हाथ तीन बार घुमाकर अथवा अपने ऊपर तीन बार घुमाकर ब्राहमण का हाथ दान सामग्री के ऊपर रखवाकर ब्राहमण के हाथ में समस्त सामग्री छोड देनी चाहिये.इसके बाद ब्राहमण को दक्षिणा सादर विदा करे.जब ग्रह चारों तरफ़ से जातक को घेर ले,कोई उपाय न सूझे,कोई मदद करने के लिये सामने न आये,मंत्र जाप करने की इच्छायें भी समाप्त हो गयीं हों,तो उस समय दान करने से राहत मिलनी आरम्भ हो जाती है.सबसे बडा लाभ यह होता है,कि जातक के अन्दर भगवान भक्ति की भावना का उदय होना चालू हो जाता है और वह मंत्र आदि का जाप चालू कर देता है.जो भी ग्रह प्रतिकूल होते हैं वे अनुकूल होने लगते हैं.जातक की स्थिति में सुधार चालू हो जाता है.और फ़िर से नया जीवन जीने की चाहत पनपने लगती है.और जो शक्तियां चली गयीं होती हैं वे वापस आकर सहायता करने लगती है | 
क्या करें उपाय-- किसी अनुभवी ज्योतिषीे या हस्तरेखा विशेषज्ञ से सलाह लेकर विधिपूर्वक मूंगा रत्न धारण करने से भी पेट के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। 
 इसके अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ घरेलू उपाय इस प्रकार हैं-- रात को दूध में आधा चम्मच हल्दी डालकर पीना चाहिए। एक चुटकी छोटी हर्र गर्म पानी में मिलाकर पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है। जीरा तथा सेंधा नमक पीसकर गर्म पानी के साथ खाने से भूख में कमी, पेट फूलने, दस्त, कब्ज और खट्टी डकारों से मुक्ति मिलती है। 
 एक गिलास गर्म पानी में दो चम्मच शहद और एक नींबू का रस डालकर पीने से अधिक चर्बी व मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है। एक गिलास पानी में पांच ग्राम फिटकरी घोलकर पीने से हैजे में लाभ होता है। रात को सोने के पहले दूध में मुनक्का उबालकर पीने से कब्ज से छुटकारा मिलता है। यदि समय रहते किसी योग्य हस्त रेखा विशेषज्ञ अथवा अनुभवी विद्वान् ज्योतिषी से सलाह लेकर उक्त उपाय किए जाएं, तो पेट के रोगों से रक्षा हो सकती है।

जानिए आपकी राशि अनुसार केसा हो आपका भोजन ..

How-was-your-meal-food-according-to-your-amount-Know-जानिए आपकी राशि अनुसार केसा हो आपका भोजन ..जीवन में ज्‍योतिष का प्रभाव सिर्फ भविष्‍य के पूर्वानुमान तक ही सीमित नहीं है, यह आपके व्‍यक्तित्‍व, शारीरिक रचना या यूं कहें कि कुल मिलाकर इसका असर आपके संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है। यहीं कारण है कि ज्‍योतिष राशि के आधार पर ही सेहत का अंदाजा लगा सकते हैं। स्वास्थ्य और आहार का बहुत गहरा संबंध है, ज्योतिष इस तथ्य को स्वीकार करते हैं और विभिन्न राशियों के हिसाब से विभिन्न प्रकार के आहार की सिफारिश करते हैं। हमारी सेहत पर हमारे राशी का असर पड़ता है। शरीर में ग्रहों से संबंधित सभी तत्व मौजूद रहते हैं। ये ग्रह और नक्षत्र उन्हीं तत्वों को प्रभावित करते हैं। जैसे धरती पर स्थित जल को चन्द्रमा प्रभावित करता है उसी तरह वह शरीर में मौजूद जल को भी प्रभावित कर हमारे मन को चंचल या स्थित बनाता है। इसी तरह सभी ग्रह अपने-अपने तत्वों पर अच्छे या बुरे प्रभाव को डालते हैं। ग्रह और नक्षत्रों का प्रभाव हमारे जीवन में सबसे पहले हमारे शरीर और फिर मन पर ही पड़ता है। आपकी ज्योतिष राशी के अनुसार कैसा भोजन आपके राशी के लिए लाभकारी होगा ?? 
           आपकी ज्योतिष राशी के अनुसार कोन सा भोजन आपके स्वाथ्य के लिए योग्य है और कोनसा अयोग्य।सभी खाद्य पदार्थ चाहे वे किसी भी रूप-स्वरूप में हों जैसे तरल खाद्य पदार्थ, अनाज, दाले, फल, सब्जियाँ, मेवे इत्यादि भी अपने-अपने गुणों व स्वादों के अनुसार किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं। आप ग्रह-नक्षत्रों के अशुभ फल को कुछ खाकर शुभ फल में बदल सकते हैं। क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? कहते हैं कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। जैसा बनेगा मन, वैसा होगा आपका वर्तमान और भविष्य। अन्न ही जहर है और अन्न ही अमृत है। देश काल और परिस्थिति अनुसार भोजन और भोज्य पदार्थों की अनगिनत विधियाँ पाई जाती हैं जिनकी गणना लगभग अंसभव है। 
          भोजन के अतिरिक्त भोज्य पदार्थों से संबंधित कुछ रोचक ज्ञानवर्धक, आश्चर्यजनक, नवीन तथ्यों से आपका परिचय कराना चाहता हूँ जो आपको भोजन और भोज्य पदार्थों से संबंधित ऐसी नवीन जानकारी उपलब्ध कराएगा जिसका तात्पर्य मात्र भोजन करने से ही नहीं अपितु भोजन से प्राप्त होने वाली उर्जा, स्वाद और भोजन की आपके लिए अनुकूलता से है ताकि आप मात्र पेट भरने हेतु ही भोजन न करें बल्कि अपने शरीरिक, चारित्रिक मानसिक और बौद्धिक विकास हेतु भोजन का चयन करें। भोजन और भोज्य पदार्थों द्वारा ग्रहों को भी अपने अनुकूल किया जा सकता है। इसी नवीन विषय पर आधारित है यह पुस्तक जिसमें आप अपनी ग्रह दशाओं के अनुसार भोजन का चयन कर सकते हैं और अपनी जन्मपत्री की दशाओं-महादशाओँ का उपचार भी कर सकते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार रसोईघर में नवग्रहों अर्थात 9 ग्रहों का वास होता है जिसका मुख्य आधार हैं मसाले जिनमें मुख्य रूप से 9 प्रकार के मसालों को मान्यता दी गई है जो अपने गुणों, स्वाद व रंगों के आधार पर भिन्न-भिन्न ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिये इन मामलों को रसोईघर में एक साथ इकट्ठा अथवा पास-पास रखने का प्रावधान है चाहे वह मसालदानी के रूप में हो अथवा अलग-अलग प्रकार से डिब्बों आदि में एक साथ एक स्थान पर रखे जाएं। 
 आइए जानें कि ये 9 मसाले कौन से है और ये किस प्रकार ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं व इनके पीछे छिपी वैज्ञानिकता क्या है ? 
  •  1. नमक (पिसा हुआ) सूर्य 
  •  2. लाल मिर्च (पिसी हुई) मंगल 
  •  3. हल्दी (पिसी हुई ) वृहस्पति 
  •  4. जीरा (साबुत या पिसा हुआ) राहु-केतु 
  •  5. धनिया (पिसा हुआ) बुध
  •  6. काली मिर्च (साबुत या पाउडर) शनि 
  •  7. अमचूर (पिसा हुआ) केतु 8. गर्म मसाला (पिसा हुआ) राहु 
  •  9. मेथी (मंगल) 

 ध्यान दे--- दीर्घायु और निरोगी रहने के लिये रसोई घर में बैठकर भोजन करना अत्यन्त लाभदायक होता है क्योंकि भोजन सामग्री पकाते समय उठने वाली सुगंध स्वयं में ऐसी दवाई है जो रामबाण का कार्य करती है। जिसे ग्रहण करने मात्र से छोटे-छोटे रोग स्वयं ही दूर भाग जाते है और यही कारण है कि स्त्रियों की आयु पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है। रसोई घर में भोजन करने के अनेकानेक लाभ है। जैसेः- भोजन ताजा रूप में ग्रहण किया जाता है जो पोषक तो होता ही है शीघ्र हजम भी हो जाता है। रसोईघर में भोजन करने से काया निरोगी रहती है। रसोई घर में भोजन करने से आयु में वृद्ध होती है। रसोईघर में भोजन करने से याददाश्त बढ़ाई जा सकती है। रसोईघर में इकट्ठा बैठकर भोजन करने से पारिवारिक सदस्यों में प्यार और सौहार्द बढ़ता है व घर का वातावरण सुखी व समृद्ध होता है।
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  1. मेष राशि--- मेष राशि में जन्मे लोग बिना सोचे-समझे कुछ भी खाने-पीने लगते हैं. इस राशि के लोगों को जब भी भूख लगती है, वो बिना कुछ समझे, जो मिल जाए वो खाना शुरू कर देते हैं. ऐसे में मेष राशि वाले मोटापे का शिकार आसानी से हो जाते हैं. इस राशि के लोगों को कार्बोहाइड्रेट से ज्यादा प्रोटीन को अपने आहार में शामिल करना चाहिए. मेष राशि के लोगों के लिए मस्तिष्क उनका सबसे जरुरी अंग माना जाता है इसलिए उसे पोषित करने के लिए उन्हें एमिनो एसिड लेना चाहिए जो प्रोटीन से लिया जा सकता है. मेष राशि के ज्‍यादातर लोगों को सिरदर्द और साइनस की समस्‍या रहती है। शरीर में नमक का स्‍तर कम होने के कारण यह कमजोरी और तनाव महसूस करते है। डायट प्‍लान :--- सूखे खुबानी, केला, अंजीर, ब्रोकली, बीन्स, ब्रसेल्स स्प्राउट्स, पालक, गोभी, खीरा, कद्दू, बाउन राइस, दाल, स्वोर्डफ़िश और अखरोट को अपने आहार में शामिल करें! 
  2.  वृषभ राशि--- इस राशि के लोग टेस्टी खाना, खाने के शौकीन होते हैं. लेकिन हेल्थी डाइट से उतना ही दूर रहते हैं. इस राशि के लोग अपनी भूख से भी ज्यादा खा लेते हैं क्योंकि इनका मन स्वादिष्ट खाने में ही अटका रहता है. पेट भर जाने पर भी वृषभ राशि वाले खाते जाते हैं और फिर अक्सर ओवरईटिंग की वजह से परेशान होते हैं. इस राशि के लोगों को नीचे बैठ कर भोजन करना चाहिए, साथ ही सब्जियों और सलाद को अपनी डाइट में अधिक शामिल करना चाहिए. यही नहीं वृषभ राशि वालों को मीठे खाद्य पदार्थों और रिच फूड से बचना चाहिए अन्यथा डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर, मोटापा और अन्य इनसे जुड़ी बीमारियां होने का खतरा हो सकता है. वृषभ राशि के लोग स्‍ट्रेस ज्‍यादा लेते हैं, जिसका बुरा असर उनके शारीरिक और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है। डायट प्‍लान :--- नट्स, अंडे, समुद्री भोजन, पालक, हरी सलाद, क्रेनबेरीज और बींस अधिक मात्रा में खाएं।
  3.  मिथुन राशि--- इस राशि के लोग एक्सरसाइज और फिजिकल एक्टिविटी पर अधिक ध्यान देते हैं और उसी के अनुसार अपना डाइट प्लान बनाते हैं. इस राशि के लोगों का शरीर जितनी जल्दी मोटा होता है उतनी ही जल्दी पतला भी हो जाता है लेकिन यदि फिजिकल एक्टिविटी बनी रहें तो! यह राशि मेहतन करने वाले लोगों की राशि है इसलिए इन लोगों में फिट रहने की आदत होती है. मिथुन राशि वाले लोगों को फ़ास्ट-फूड से बचना चाहिए क्योंकि इस राशि के जातकों का नर्वस सिस्टम कमज़ोर होता है. अक्सर ये लोग भाग कर ही खाते-पीते हैं जिसकी वजह से भी इनका पाचन तंत्र गड़बड़ी में रहता है. इस राशि के लोग छोटी-छोटी बातों पर बहुत चिंता करते हैं और हमेशा तनाव में नजर आते हैं। इन्‍हें कैफीन और बहुत ज्‍यादा शराब से दूर रहना चाहिए। डायट प्‍लान :--- ऐसे लोगों को अपने आहार में शतावरी, अंगूर, बादाम, शैलफिश, सेब, संतरा, आड़ू, प्लम, दूध, छाछ और पनीर अधिक मात्रा में शामिल करना चाहिए। 
  4.  कर्क राशि--- इस राशि के लोग मूडी होते हैं और खाने-पीने में भी अपने मूड के हिसाब से डाइट लेते हैं. कर्क राशि के लोग आरामदायक तरीके से खाते हैं और ख़ुशी में होने पर या दुखी होने पर अपने आहार को ज्यादा या कम कर देते हैं. कई बार इस राशि के लोग जरूरत से ज्यादा और कई बार बिलकुल नहीं खाते हैं | इस राशि के लोगों को बचपन से ही अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना चाहिए. चूंकि इस राशि के लोगों को स्तन और पेट से सम्बंधित बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं इसलिए इन्हें अपने खान-पान का खास ख्याल रखना चाहिए | इस राशि के लोग ओवरईटिंग का शिकार होते हैं। विशेष रूप से जब यह किसी बात को लेकर परेशान होते हैं तो ये अपनी भूख से कुछ ज्‍यादा ही खाते हैं। डायट प्‍लान :--- अंगूर, संतरा, तरबूज, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, सलाद पत्ता, अजवायन, लेमनग्रास, मछली और शैलफिश से फायदा मिलता है। 
  5.  सिंह राशि--- इस राशि के लोगों को अपने आपको खुश रखने के लिए, आहार का सहारा लेना चाहिए. आपके द्वारा लिया गया आहार आपके मन, सोच और व्यवहार को आपके व्यक्तित्व के अनुसार बदलने में सहायक होता है. आप अपने सकारात्मक आचरण को बनाए रखने के लिए सब्जियों का सहारा ले सकते हैं. ऐसे लोगों को आप अवॉयड करें जो आपके प्रयासों की आलोचना करते हैं | इस राशि के जातकों को अपने आहार से कार्बोहाइड्रेट को दूर रखना चाहिए और सब्जियों को ज्यादा स्थान देना चाहिए | ये लोग बहुत ही जल्‍दी और आसानी से मोटापे का शिकार हो जाते हैं। इसलिए लो-फैट लेवल आपको स्‍वस्‍थ रखने के लिए आवश्‍यक है। डायट प्‍लान :--- सिंह राशि के लोगों को बादाम, होल वीट, खजूर, अखरोट, किशमिश, चुकंदर, नारियल, नींबू, आड़ू, नाशपाती, अंजीर, मीट, समुद्री भोजन और शतावरी को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। 
  6.  कन्या राशि--- इस राशि के लोगों का हर रिजल्ट तुरंत चाहिए होता है, जल्दी खाना और जल्दी ही उसका असर हो जाना! ऐसे लोग मोटे हो जाएं तो पतले होने के लिए कई डाइट प्लान अपनाते हैं और चाहते हैं कि उसका असर जल्द हो जाए और जब ऐसा नही होता है तो, वो लोग फिर दूसरा प्लान बनाने लगते हैं. बड़े ही चंचल मन के होते हैं कन्या राशि के जातक | ऐसे लोगों को एलर्जी ज्यादा होती है और उनसे बचने के लिए इन्हें जैविक आहार लेने चाहिए. कन्या राशि के जातकों को त्वचा से सम्बंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता है इसलिए इन्हें खाने पीने का खास ख्याल रखना चाहिए | कन्‍या राशि के लोग बहुत जल्‍दी चिंताग्रस्‍त हो जाते हैं, इससे उनका पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। साथ ही इस राशि के जातकों को अपनी परतदार, थकान भरी और ड्राई स्किन का ध्‍यान रखना चाहिए। डायट प्‍लान :--- ओट्स, होल वीट अनाज ब्रेड, तरबूज, पपीता, संतरा, केला, पनीर और अंडे को अपने आहार में शामिल करें। 
  7.  तुला राशि--- इस राशि के लोग खाने में बड़े चूज़ी किस्म के होते हैं. ये लोग आसानी से अपने आहार को बदलते रहते हैं या ये कहें की इन्हें नये-नये व्यंजन खाना बेहद पसंद होता है लेकिन ये पोषण को अपने खाने से दूर ही रखते हैं. इस राशि के लोगों को गुर्दे और डायबिटीज जैसी बीमारियां होती है इसलिए इन्हें अपने आहार में पोटेशियम से भरपूर आहार लेना चाहिए, जैसे- केला, पत्तेदार सब्जियां, मछली और दही अधिक खाएं | इस राशि के लोगों को लिवर से जुड़ी समस्‍याएं होती है। इसलिए इन्‍हें बहुत ज्‍यादा अल्‍कोहल लेने और प्रोसेस्‍ड फूड से बचना चाहिए। डायट प्‍लान :--- तुला राशि वालों को अपनी डायट में स्ट्रॉबेरी, चुकंदर, कोर्न, गाजर, सेब, किशमिश, अंडा, समुद्री भोजन, कम वसा वाले पनीर और दही को शामिल करना चाहिए। 
  8.  वृश्चिक राशि--- इस राशि के लोग मजबूत इच्छा शक्ति के मालिक होते हैं. ये लोग अपनी भावनाओं को कंट्रोल करने में माहिर होते है जिसके कारण ये कुछ भी सोच लें उसे पूरा करके छोड़ते हैं. ऐसे लोग अपनी तकलीफों को छिपा कर दूसरों को खुश करने की कोशिश करते हैं और इसी के चलते कई बार दूसरों के द्वारा परोसा गया भोजन खा लेते हैं. ऐसे लोगों को आंत और कब्ज की शिकायत होने की संभावनाएं रहती हैं इसलिए इस राशि के जातकों को हाई फाइबर, सलाद और हरी सब्जियों को शामिल करना चाहिए | इस राशि के लोग बहुत ज्‍यादा भावनात्‍मक होने के कारण अक्‍सर भावनात्‍मक तनाव से ग्रस्‍त रहते है। इन्‍हे संक्रमण का खतरा भी ज्‍यादा रहता है। डायट प्‍लान :--- चीज, दूध, दही, अखरोट, बादाम, अनानास, कमल ककड़ी, खट्टे फल और सी -फूड ज्‍यादा खायें। 
  9.  धनु राशि--- धनु राशि के लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए जम के मेहनत करते हैं और जल्द ही उसका परिणाम चाहते हैं. ऐसे लोग जिम आदि ज्वाइन कर अपनी सेहत बनाने के लिए खून पसीना बहाते हैं. इस राशि के जातकों का लीवर कमज़ोर होता है इसलिए इन्हें अधिक वसा और फैट वाले आहार नहीं लेने चाहिए. ऐसे लोगों को क्रीम, नमक और चीनी का सेवन नियंत्रण में रह कर करना चाहिए और लीवर को स्वस्थ रखने के लिए पानी अधिक पीना चाहिए | इस राशि के लोगों का वजन जल्‍दी बढ़ने लगता है, विशेष तौर पर इनके जांघों और कूल्‍हों पर बहुत जल्‍दी फैट बढ़ने लगता है। इसलिए इन्‍हें शराब और फैट वाले आहार का सेवन कम करना चाहिए। डायट प्‍लान :--- संतरे, प्लम, स्ट्रॉबेरी, अंजीर, ब्रसेल्स स्प्राउट्स, चेरी, शतावरी, हरी मिर्च, आलू और टमाटर, ओट्स, अंडे, होल वीट, स्किम्ड मिल्‍क, मछली और दही का सेवन करें। 
  10.  मकर राशि--- मकर राशि के लोग अपनी मंजिल को पाने के लिए आतुर रहते हैं. ऐसे लोग रातोंरात सफलता पाना चाहते हैं. अपनी बातों से आसानी से लोगों को लुभाने वाले मकर राशि के जातक अदरक खाना और पीना अधिक पसंद करते हैं. एल्कोहल में बीयर, वो भी अदरक बीयर, इन्हें बेहद पसंद होती है | ये लोग एरोबिक्स और वजन कंट्रोल करने के लिए डिसिप्लिन रहते हैं. इस राशि के लोगों को कैल्शियम की कमी हो सकती है इसलिए इन्हें दूध, अंडा आदि कैल्शियम से भरपूर डाइट लेनी चाहिए | मकर राशि के ज्‍यादातर लोगों को कम उम्र में ही कमजोर हड्डियों और जोड़ो के दर्द की समस्‍या हो सकती है। इसलिए इनके आहार में कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थ होने चाहिए। डायट प्‍लान : ---इस राशि के जातकों को ब्रोकली, अंजीर, संतरा, नींबू, गोभी, मटर, आलू और पालक, भूरे रंग के चावल, ओट्स, बादाम, अखरोट, अंडे, मछली, पनीर, छाछ और दही लेना चाहिए। 
  11.  कुंभ राशि--- असामान्य तरीकों से लोगों को प्रभावित करने में माहिर होते हिं कुंभ राशि वाले. यह मूल आहार को अपनी डाइट का मुख्य हिस्सा मानते है. यह लोग बोर होने पर अपना खाना भी छोड़ देते हैं. हर बार कुछ नया अपनाना और करना ही इनका मूड होता है, जिसे यह लोग आसानी से अडॉप्ट कर लेते हैं और छोड़ भी देते हैं. कुंभ राशि वाले शराब की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं और उसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है इससे बचने के लिए इन्हें अदरक बीयर लेनी चाहिए. कुंभ राशि के ज्‍यादातर लोगों में हाई बीपी की समस्‍या देखी जाती है। डायट प्‍लान : --- आड़ू, नाशपाती, अंजीर, नींबू, खजूर, अनार, गोभी, स्ट्रॉबेरी, कॉर्न, अजवाइन, मिर्च, मूली, टमाटर, दाल, ब्राउन राइस, बादाम, चिकन, वील, क्लेम, झींगा और ट्यूना शामिल करें। 
  12.  मीन राशि--- इन्हें परफेक्शन चाहिए होता है हर चीज़ में, फिर वो रोज की डाइट ही क्यों न हो. इसके लिए यह भोजन को अधिक सजा कर खाना और पेश करना पसंद करते हैं. लेकिन अक्सर ओवर-इटिंग की वजह से यह परेशान हो जाते हैं | मीन राशि वालों को डांस, योगा और मैडिटेशन करना चाहिए ताकि यह अपने भावों को ठीक से व्यक्त कर सकें. इन लोगों को अधिक पानी पीने या तरल पदार्थों को अधिक लेना चाहिए. इन्हें पिट्यूटरी ग्रंथि की समस्या होने की सम्भवना होती हैं इसलिए इससे बचने के लिए तरल चीज़े अधिक लेनी चाहिए. इस रा‍शि से संबंधित लोग जुकाम, फ्लू और संक्रमण से ग्रस्त होते हैं। डायट प्‍लान :-- मीन राशि वालों को अपने आहार में चिकन, कस्तूरी, बींस, होल वीट, संतरे, चुकंदर, सलाद, प्याज, सेब को शामिल करना चाहिए। 

      रविवार को चना, सोमवार को खीर अथवा दूध, मंगलवार को चूरमा तथा हलवा, बुधवार को हरी सब्जी, गुरुवार को चने की दाल अथवा बेसन का प्रयोग, शुक्रवार को मीठा दही और शनिवार को उड़द का सेवन करने से सभी ग्रह प्रसन्न रहते हैं। तो अब आप समझ गए ना की की आपको अपनी राशि के अनुसार क्या खाना और पीना हैं तो बस अपना डाइट चार्ट बनाकर खाएं-पिएं और स्वस्थ रहें |

क्या हैं योग ??? जानिए योग को योग - एक जीवन शैली हैं

जब भी आप योग के बारे में सुनते हैं तो आप इसके बारे में अपने दिमाग में एक खाका तैयार करते हैं कि आखिर यह आपके लिए क्या है। योग का नाम आते ही कुछ के दिमाग में कांटों के बिस्तर पर बैठा फकीर याद आता होगा, जो ध्यान में लीन है और उन्हें लगता होगा कि यही योग है।
             कुछ लोग किसी पहाड़ की गुफा में बैठे किसी साधु के बारे में सोचते हैं और योग को उससे जोड़ कर देखते हैं। कुछ लोगों ने रीढ़ की हड्डी पर कुंडलिनी की ऊपर की ओर जाती हुई पिक्टोरल रिप्रजेंटेशन देखी होगी और उनकी योग में रुचि जग गई। जबकि कोई अन्य व्यक्ति योग स्टूडियो में जाकर शीशे के सामने योग एरोबिक्स करता है। वह अपने शरीर को देखता है, अपने आसन को ध्यान से देखता है और उन्हें लगता है कि योग शारीरिक होता है और यह उनके शरीर के आकार को बनाकर रखता है। 
             आजकल अनेक चैनलों और सचर पत्रों में हिन्दू बनाम मुस्लिम के दायरे में योग को लेकर बहस हो रही है क्योंकि इससे राजनीति सधती है। मुझे कभी कहीं नहीं लगा कि कोई स्वामी, कोई महात्मा ऐसी दावेदारी कर रहे हैं, आज क्यों ऐसा लग रहा है। वे योग को धर्मविशेष के चश्मे से भी नहीं देखते। योग डरपोक नहीं बनाता है। योग आपको किसी दल के अधीन नहीं करता है। 
         योग के नाम पर किसी धार्मिक राजनीतिक विचारधारा का प्रोपेगैंडा नहीं किया जाना चाहिए। योग की उत्पत्ति धर्म की आधुनिक समझ पर छपी किताबों के किसी भी पन्ने से नहीं होती है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून विश्व योग दिवस के रूप में स्वीकार होने पर आज इस विषय पर सम्पूर्ण विश्व का ध्यान गया हैं.. 'योगी सर्प, मेढक आदि जन्तुओं से आसन, मुद्रा, प्रणायाम आदि योगांकों को सीखकर अपने स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि करने में समर्थ हुए थे। प्राचीन ऋषियों की, ईसा आदि महात्माओं की योगबल से रोगियों के रोग दूर करने की बात प्रसिद्ध ही है। 
            योगबल के साधक ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुख, शत्रु-मित्र से दूर होकर शान्तचित्त होकर किस प्रकार पृथ्‍वी पर शांति राज्य स्थापित करने में सहायक हुए थे इसके ज्वलंत उदाहरण हैं- शंकर, ईसामसीह, बुद्ध इत्यादि। हर व्यक्ति योग के बारे में अपना अलग विचार रखता है या उसके दिमाग में इसको लेकर अलग तस्वीर बनती है और इसी तरह से योग की पहचान बनी है। आप अपने दिमाग में योग को लेकर कई विचार, कई तस्वीरें बनाते हैं, जो ये तय करता है कि आपके लिए योग क्या है। हालांकि इनमें से कुछ भी योग नहीं है। ...तो फिर आखिर योग है क्या? योग आपके शरीर, व्यवहार, मन और भावनाओं को नियंत्रित करने वाली एक जीवनशैली है। यह दिल, दिमाग और हाथों के संबंधों या विशेषताओं को बढ़ाने वाली एक जीवनशैली है।
            मेरे विचार से यही योग की परिभाषा है।मैं योग को एक जीवनशैली के रूप में देखता हूं। जैसे-जैसे आप योग के छोटे-छोटे नियमों का अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में पालन करने लगते हैं आपका दैनिक जीवन अच्छा होने लगता है। आप योग के छोटे-छोटे नियमों को अपने व्यवहार में लाते हैं तो आपका व्यवहार अच्छा होने लगता है। आप थोड़ा-बहुत विश्राम और ध्यान करने लगते हैं तो आप अपनी जिंदगी में तनाव व चिंताओं से बेहतर तरीके से निपटने लगते हैं। 
          जैसे ही आप योग घटकों को अपने दिनचर्या में लाना शुरू करते हैं तो योग आपकी जीवनशैली का हिस्सा बन जाता है। अगर आपको लगता है कि योग क्लास में शारीरिक क्रियाओं, सांसों पर नियंत्रण, विश्राम और ध्यान के जरिए ही योग किया जा सकता है तो फिर यह आपकी जिंदगी का हिस्सा कभी नहीं बन पाएगा। योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है. हालाँकि इसका इतिहास दफन हो गया है अफगानिस्तान और हिमालय की गुफाओं में और तमिलनाडु तथा असम सहित बर्मा के जंगलों की कंदराओं में. जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है. बस जरूरत है भारत के उस स्वर्णिम इतिहास को खोज निकालने की जिस पर हमें गर्व है.
           माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ मगर दुखद यह रहा की आधुनिक कहे वाले समय में अपनी दौड़ती-भागती जिंदगी से लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या से हटा लिया| जिसका असर लोगों के स्वाथ्य पर हुआ| मगर आज भारत में ही नहीं विश्व भर में योग का बोलबाला है और निसंदेह उसका श्रेय भारत के ही योग गुरूओं को जाता है जिन्होंने योग को फिर से पुनर्जीवित किया| योग संस्कृत धातु 'युज' से उत्‍पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्तिगत चेतना या आत्मा का सार्वभौमिक चेतना या रूह से मिलन। योग 5000 वर्ष प्राचीन भारतीय ज्ञान का समुदाय है। यद्यपि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं जहाँ लोग शरीर को तोड़ते -मरोड़ते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं | 
             वास्तव में देखा जाए तो ये क्रियाएँ मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमताओं की तमाम परतों को खोलने वाले ग़ूढ विज्ञान के बहुत ही सतही पहलू से संबंधित हैं| योग विज्ञान में जीवन शैली का पूर्ण सार आत्मसात किया गया है , जिसमें ज्ञान योग या तत्व ज्ञान,भक्ति योग या परमानन्द भक्ति मार्ग,कर्म योग या आनंदित कार्य मार्ग और राज योग या मानसिक नियंत्रण मार्ग समाहित हैं । राजयोग आगे और ८ भागों में विभाजित है। राजयोग प्रणाली के मुख्य केंद्र में उक्त विभिन्न पद्धतियों को संतुलित करना एवं उन्हे समीकृत करना ही योग के आसनों का अभ्यास है... 
              आज योग को भारतीयता की पहचान बताते हुए हिन्दुत्व से जोड़ने का प्रयास हो रहा है। पहले हिन्दुत्व और भारतीयता को एक कहा गया अब योग के बहाने भारतीयता की बात हो रही है। जबकि योग का कभी दावा नहीं रहा कि वो किसी की सत्ता को बनाए या बचाए रखने के लिए साधन बनेगा। हमें पूछना चाहिए कि क्या हम योग के स्वरूप को जानते हैं। ट्विटर पर हैशटैग चला देने या हठयोग के एक दो आसनों का प्रदर्शन कर सबको चौंका देना योग नहीं है। योग को लेकर कितनी सार्थक दार्शनिक बहस हो सकती थी लेकिन इसे आसनों के पैकेज में बदल दिया गया है। योगी वही चमत्कार करता हुआ दिख रहा है जिसकी चेतावनी योग पर विचार करने वाले महात्माओं ने समय-समय पर जारी की है। क्या योग को तमाम परंपराओं से अलग किया जा रहा है? 
 प्राचीन और आधुनिक योग - सभी के लिए---
 योग के दैहिक अभ्यास की सुंदरता यह है कि योग आसन आपको संभाले रखते हैं आप वृद्ध हो या जवान ,हृष्ट पुष्ट हों या कमज़ोर। उम्र के बढ़ने के साथ आपकी समझ आसनो के प्रति प्रगतिशील हो जाती है। आप आसनों के बाहरी संरेक्षण एवं प्रक्रिया से आगे बढ़कर आंतरिक शुद्धिकरण और अंततः केवल आसान में ही बने रहने तक पहुँच जाते है। योग हमारे लिए कभी भी पराया नहीं रहा है। हम योग तबसे कर रहे हैं जब से हम शिशु थे चाहे वह 'बिल्ली खिचाव' आसन हो जो मेरुदंड बनता हो या 'पवन मुक्त' आसन जो पाचन को बढ़ावा देता है। आप देखेंगे कि शिशु दिन भर में कोई न कोई आसन कर रहा होता है। विभिन्न लोगों के लिए योग के विभिन्न रूप हो सकते हैं । हम दृढ़ संकल्पित हैं कि हम आपको अपनी योग - 
जीवन की राह को खोजने में सहायक होंगे | योग हैं आयुर्वेद -जीवन का विज्ञान---
 आयुर्वेद विश्व की सबसे प्रगतिशील एवं शक्तिशाली मानसिक-शारीरिक स्वास्थ व्यवस्था है। यह प्रणाली केवल बिमारियों के इलाज तक ही सीमित नहीं है,बल्कि आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। इस बौद्धिक ज्ञान का स्वरूप सब लोगों को जीवंत एवं स्वस्थ रहने में मदद करता है साथ ही उनको अपनी पूर्ण मानवीय क्षमताओं का भी एहसास कराता है। वह प्रकृति के सिद्धांतों का उपयोग करके मनुष्य के व्यक्तिगत शरीर ,मन एवं मनोवृत्ति का सही संतुलन कराकर उसे अच्छा स्वास्थय प्रदान करता है। आयुर्वेद का अभ्यास आपके योग अभ्यास को भी बेहतर बनता है,जो एक सतत्त लाभकारी स्थिति है। 
          यह भाग बेहतर जीवन के लिए बहुत से आयुर्वेदिक नुक्ते और सुझाव लेकर आया है 
 योग में हैं प्राणायाम एवं ध्यान का महत्त्व --- 
प्राणायाम अपने श्वास की वृद्धि एवं नियंत्रण है। श्वास लेने की सही तकनीक का अभ्यास करने से रक्त एवं दिमाग में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है , अंततः इससे प्राण या महत्त्वपूर्ण जीवन ऊर्जा के नियंत्रण में मदत मिलती है। प्राणायाम आसानी से योग आसन के साथ किया जा सकता है। इन दो योग सिद्धांतों का मिलन मन एवं शरीर का उच्चतम शुद्धिकरण एवं आत्मानुशासन माना गया है। प्राणायाम की तकनीक हमारे ध्यान के अनुभव को भी गहरा बनाती है।
         इन वर्गों में आप अनेक प्रकार के प्राणायाम तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।योग साधना के आठ अंग हैं, जिनमें प्राणायाम चौथा सोपान है. अब तक हमने यम, नियम तथा योगासन के विषय में चर्चा की है, जो हमारे शरीर को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है.प्राणायाम के बाद प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि मानसिक साधन हैं. प्राणायाम दोनों प्रकार की साधनाओं के बीच का साधन है, अर्थात्‌ यह शारीरिक भी है और मानसिक भी. प्राणायाम से शरीर और मन दोनों स्वस्थ एवं पवित्र हो जाते हैं तथा मन का निग्रह होता है. 
 जानिए योगासनों के गुण और लाभ---- 
 (1) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं. योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है. 
(2) योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं. 
(3) आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है. शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है.
 (4) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है. 
(5) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं. पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं. 
(6) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं. 
(7) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं. इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है. 
(8) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं. वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं. 
(9) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है. ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्मा-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं. 
(10) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, अत: मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है.
 (11) योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं. 
(12) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं.
 (13) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं.
 (14) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है. आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है. 
(15) योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है. आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता. शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है. 
         अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं.

आस्था (लकवे का सहारा) का केंद्र बुटाटी धाम (नागौर,राजस्थान)

भारत वर्ष में एक मंदिर ऐसा भी है जहा पर पैरालायसिस(लकवे ) का इलाज होता है ! यहाँ पर हर साल हजारो लोग पैरालायसिस(लकवे ) के रोग से मुक्त होकर जाते है यह धाम नागोर जिले के कुचेरा क़स्बे के पास है, अजमेर- नागोर रोड पर यह गावं है !
         
आस्था (लकवे का सहारा) का केंद्र बुटाटी धाम (नागौर,राजस्थान)

आस्था (लकवे का सहारा) का केंद्र बुटाटी धाम (नागौर,राजस्थान)

 लगभग 500 साल पहले एक संत होए थे चतुरदास जी वो सिद्ध योगी थे, वो अपनी तपस्या से लोगो को रोग मुक्त करते थे ! आज भी इनकी समाधी पर सात फेरी लगाने से लकवा जड़ से ख़त्म हो जाता है ! नागोर जिले के अलावा पूरे देश से लोग आते है और रोग मुक्त होकर जाते है हर साल वैसाख, भादवा और माघ महीने मे पूरे महीने मेला लगता है ! 
          ये एक महान संत और सिद्ध पुरुष चतुरदास जी का मंदिर है .... ...जय चतुर दास जी ..आस्था को नमन (यह विचार साभार लिए हैं--गूगल से)---- संत चतुरदास जी का इतिहास उस वक्त मुझे बुटाटी धाम के विषय में कोई जानकारी नहीं थी घर पर तेल मालिश करते रहे फिजियोथेरापी का लाभ लेते रहे। स्वास्थ्य में कोई खास बदलाव नहीं था। उस वक्त मेरे एक पड़ोसी मनोज तंवर ने मुझे बुटाटी धाम के विषय में जानकारी दी। बीकानेर रहवासी उनकी मौसीजी, जोकि लकवा से पीड़ित थी। उन्होंने बाबा की ७-७ फेरी लगायी और उन्हें बहुत ज्यादा फायदा हुआ। मुझे इन बातों पर विश्वास नहीं था परन्तु मेरी धर्मपत्नी ने जिद की आप मुझे एक बार बुटाटी धाम ले चलो आखिर अपने मन से मैंने स्वीकृति दी।
           हम दीवाली के पश्चात् कार्तिक सुदी ११ को अहमदाबाद से रवाना होकर नागौर होते हुए कार्तिक सुदी १२ को बुटाटी पहुंचे धाम में काफी भीड़ थी। पता लगा कि कल मेला था। हमें वहां पर एक कमरा दे दिया गया। मेरे साथ में मेरी लड़की आरती थी। हम लोग ७ दिन तक बुटाटी में रहे एक दिन की एक फेरी मानी जाती है। इस तरह हमने ७ दिनों में ७ फेरी लगायी परन्तु इन सात दिनों में मैने अपनी धर्मपत्नी में अभूतपूर्व परिवर्तन देखा। जिससे चला नहीं जा रहा था।
           अब बिना सहारे ही चलने में समर्थ थी। कोई भी दवा नहीं की थी। केवल एक विश्वास बाबा का विश्वास, दो समय आरती प्रसाद आरती के समय आ रही ज्योति को दिखलाकर सरसों को तेल और इस तेल में मिलाने के लिए बाबा की भभुती। भभुति मिले हुए तेल से मरीज के हाथ, पावं एवं शरीर की मालिश। यही तो किया था। अद्भुत था चमत्कार। कमाल हो गया। सच पूछो तो मैं निहाल हो गया। सात दिन में ५० प्रतिशत से भी ज्यादा फायदा हमें नजर आया। जब वहां से रवाना होने लगे तो मेरी धर्मपत्नी ने बाबा से अरदास भी की कि यदि मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊंगी। तो बाबा तेरी रात जगाउंगी एवं सवामणी का भोग चढ़ाउंगी। अद्भुत था बाबा का चमत्कार आज मेरी धर्मपत्नी ८० प्रतिशत ठीक है। 
          आज दिनांक ६-११-२००८ वार गुरुवारमें बुटाटी धाम पहुंचा हूं मेरे साथ मेरी धर्मपत्नी है जो बिना किसी सहारे के चलती है। खाना पकाती है। कपड़े धोती है। घर का सभी कार्य करने में आज सक्षम है। मैं तो कहता हूं कि यह सब बाबा की कृपा होगी। उनका ही चमत्कार है। दिनांक ७-११-२००८ को बाबा का जागरण किया। ८-११-२००८ को सवामणी का भोग लगाया। उस वक्त बाबा के दरबार में मन में यह विचार आया कि बाबा की करूणा पर एक पुस्तक लिखूं। जिसका वितरण पूरे भारत वर्ष में नहीं बल्कि पूरी धरा पर हो और जो लोग इस कष्टप्रद एवं असाध्य बीमारी से पीड़ित है और जिन्होंने लाखों रूपये अपने इलाज पर खर्चा किये है। फिर भी उन्हें कोई फायदा नहीं है, तो भी बाबा के चमत्कार एवं बुटाटी धाम के विषय में जाने यहां आये और इस असाध्य रोग से छुटकारा पायें। 
          इसी भावना से फलस्वयप मैं यहां पर आये हुए लकवा पीड़ित लोगों से मिला उनको क्या फायदा हुआ, इसका वर्णन में नीचे कर रहा हूं। साथ में उन मरीजों के नाम व फोन नम्बर भी लिख रहा हूं। यदि कोई पाठक चाहें, तो लिखे हुए फोन नम्बर पर फोन करके और विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। सर्वप्रथम मैं चतुरदासजी मंदिर के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री रतनसिंह सुपुत्र श्री आनंदसिंह राजपुत गांव बुटाटी धाम (फोन नं. ०१५८७-२४८०३६) के बारे में बताता हूं ये १४ जनवरी १९९७ के दिन प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष बने। इसके पहले प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष श्री अमरसिंह राजपुत थे। 
             मैं बात कर रहा हूं कि श्री रतनसिंह के विषय में कि उनके साथ क्या घटना घटित हुई और क्या रहा बाबा का चमत्कार उनसे मैं मिला और उनके द्वारा बतलायी हुई जानकारी मैं आपको दे रहा हूं। श्री रतनसिंह जी सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। निवृतिकाल में अभी एक साल की देरी थी। परंतु चमडी अथवा अन्य किसी बीमारी के कारण उनके हाथ एवं पांव से पानी झरने लगा, जिसके कारण वे स्वेच्छा से नौकरी से इस्तीफा देकर अपने गांव बुटाटी आ गये। बाबू के पद से निवृत हुए थे। आपको प्रबन्धन का ज्ञान था। गांव वालों के विशेष आग्रह के कारण आपने कुछ समय के लिए यह कार्य संभाल लिया। अपनी कुशाग्र बुद्धि एवं कड़ी मेहनत के कारण तथा बाबा चतुरदासजी के आशीर्वाद फलस्वरूप आपने मंदिर की व्यवस्था को एक नया आयाम दिया। मई १९९८ में आपको अचानक सर्दी के उपरांत बुखार हो गया। 
           बुटाटी के नजदीक जो की एक कस्बा है। आपको वहां ले जाया गया डॉक्टर को दिखलाया। डॉक्टर ने पांच पेनीसिलिन के इंजेक्शन लिखे। तीन दिन में तीन इंजेक्शन लग चुके थे। कोई दवा शरीर में रीऐक्ट नहीं हुई। चौथे दिन जो इंजेक्शन लगा वह रीऐक्ट कर गया। श्रीरतनसिंह मृत प्रायः हो गये। उनकी याददाश्त कभी आये कभी चली जाये। उनकी धर्मपत्नि उनकी हालत देखकर बहुत ज्यादा घबरा गयी। परिवार में सभी सदस्य एकत्रित हो गये। निर्णय लिया गया कि उनको जयपुर ले जाया जाए। 
       श्रीरतनसिंह जी ने उसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि मुझे यहीं रहने दो। मौत आए तो आ जाए उनकी जिद के आगे परिवार झुक गया। १८ घंटे की बेहोशी के बाद जब होश आया, आपने आंखे खोली ओर पास में कोई भी न था। आप उठकर बैठ गये अकेल ही आप नंगे पांव, बाबा चतुरदासजी के मंदिर पहुंच गये आप डायबिटिज के मरीज भी थे। आपने दरबार में जाकर बाबा से कहा कि गांव के लोग क्या कहेंगे कि कोई मंदिर में घपलेबाजी की होगी। जिसका यह परिणाम है। मेरे मुह पर कालीख पुत जायेगी। 
        जिसका यह परिणाम है यदि मैं सच्चा हूं तो मेरीरक्षा कर। उन्होंने पूजारी कर से कहा कि मुझे बाबा का प्रसाद दों आपने तीन दफा प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाया पुजारी ने तीनों दफा आपका हाथ (खोबा) प्रसाद से भर दिया। आपने यह प्रसाद जेब में रख लिया। प्रसाद खाते-खाते आप घर के लिए रवाना हो गये।

आइये जाने गाय के दूध का महत्व

भारतीय संस्कृति में गाय का बेहद उच्च स्थान है। इसे कामधेनु कहा गया है। इसका दूध बच्चों के लिए बेहद पौष्टिक माना गया है और बुद्धि के विकास में कारगर भी।सभी जानवरों में गाय का दूध सबसे ज्यादा फायदेमंद माना गया है। उसमें भी देसी नस्ल की गाय का दूध ही सबसे ज्यादा महत्चपूर्ण है। आखिर देसी नस्ल की गाय में क्या खूबियां होती हैं जो उसके दूध का इतना महत्व होता है।

गाय के दूध का महत्व
         
         गाय के दूध का महत्व उसमें मौजूद तत्व बढ़ाते हैं।सेहत के लिहाज से गाय का दूध फायदेमंद तो है ही, अब एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि हिमाचल प्रदेश में पली-बढ़ी गाय के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन हृदय की बीमारी, मधुमेह से लड़ने में कारगर और मानसिक विकास में सहायक होता है।गाय और गाय के दूध के बारे जितना कहा जाए उतना ही कम होगा। गाय और उसके दूध के महान गुणों को देखकर ही तो गाय को मां कहकर भगवान के समान सम्मान दिया गया है। 
           भारत और खासकर हिन्दू धर्म में तो गाय के महान और अनमोल गुणों को देखते हुए उसे मां, देवी और भगवान का दर्जा दिया गया है, जो कि उचित भी है। भारतीय गायों की एक खाशियत ऐसी है जो दुनिया की अन्य प्रजातियों की गायों में नहीं होती। भारतीय नश्ल की गायों के शरीर में एक सूर्य ग्रंथि यानी सन ग्लैंड्स पाई जाती है। इस सूर्य ग्रंथि की ही यह खाशियत है कि यह उसके दूध को बेहद गुणकारी और अमूल्य औषधी के रूप में बदल देती है। 
             दूध एक अपारदर्शी सफेद द्रव है जो मादाओं के दुग्ध ग्रन्थियों द्वारा बनाया जता है। नवजात शिशु तब तक दूध पर निर्भर रहता है जब तक वह अन्य पदार्थों का सेवन करने में अक्षम होता है। साधारणतया दूध में ८५ प्रतिशत जल होता है और शेष भाग में ठोस तत्व यानी खनिज व वसा होता है। गाय-भैंस के अलावा बाजार में विभिन्न कंपनियों का पैक्ड दूध भी उपलब्ध होता है। दूध प्रोटीन, कैल्शियम और राइबोफ्लेविन ( विटामिन बी -२) युक्त होता है, इनके अलावा इसमें विटामिन ए, डी, के और ई सहित फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयोडीन व कई खनिज और वसा तथा ऊर्जा भी होती है। इसके अलावा इसमें कई एंजाइम और कुछ जीवित रक्त कोशिकाएं भी हो सकती हैं।
            [2] चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में पशुचिकित्सा सूक्ष्मजैविकी विभाग के शोधार्थियों ने बताया, ‘पहाड़ी’ गाय की नस्ल की दूध में ए-2 बीटा प्रोटीन ज्यादा मात्रा में पाया जाता है और यह सेहत के लिए काफी अच्छा है।’ उन्होंने बताया कि विभाग द्वारा 43 पहाड़ी गायों पर किए जा रहे अध्ययन में यह बात सामने आई है। लगभग 97 फीसदी मामलों में यह पाया गया कि इन गायों के दूध में ए-2 बीटा प्रोटीन मिलता है जो हृदय की बीमारी, मधुमेह और मानसिक रोग के खिलाफ सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हॉलस्टीन और जर्सी नस्ल की गायों में यह प्रोटीन नहीं पाया जाता।गाय के दूध में प्रति ग्राम ३.१४ मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। 
            आयुर्वेद के अनुसार गाय के ताजा दूध को ही उत्तम माना जाता है। बत्रा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर के आयुर्वेद के विभागाध्यक्ष डॉ . मेहर सिंह के अनुसार गाय का दूध भैंस की तुलना में मस्तिष्क के लिए बेहतर होता है। इन गायों में ए-1 जीन पाया जाता है जो इन बीमारियों को मदद पहुंचाता है। ए-1 जीन स्थानीय गायों के दूध में हमेशा मौजूद नहीं होता लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता। गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होता है जो शरीर के लिए काफी शक्तिदायक और आसानी से पचने वाला होता है। गाय की गर्दन के पास एक कूबड़ होती है जो ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। गाय की इसी कूबड़ के कारण उसका दूध फायदेमंद होता है।
              वास्तव में इस कूबड़ में एक सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती रहती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता रहता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है।इसलिए गाय का दूध भी हल्का पीला रंग लिए होता है। यह स्वर्ण शरीर को मजबूत करता है, आंतों की रक्षा करता है और दिमाग भी तेज करता है। इसलिए गाय का दूध सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है। गाय का दूध शिशुओं को एलर्जी से बचाता है—— शर्मा ने बताया कि विभाग द्वारा 43 पहाड़ी गायों पर किए जा रहे अध्ययन में यह बात सामने आई है।शर्मा ने कहा कि 97 फीसदी मामलों में यह पाया गया कि इन गायों के दूध में ए2 बीटा प्रोटीन मिलता है जो हृदय की बीमारी, मधुमेह और मानसिक रोग के खिलाफ सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
           उन्होंने कहा कि हॉलस्टीन और जर्सी नस्ल की गायों में यह प्रोटीन नहीं पाया जाता। इन गायों में ए1 जीन पाया जाता है जो इन बीमारियों को मदद पहुंचाता है। आइये जाने देसी गायों के बारे में—- क्या हें ए1ए2 दूध विज्ञान :— आधुनिक विज्ञान का यह मानना है कि सृष्टि के आदि काल में, भूमध्य रेखा के दोनो ओर प्रथम एक गर्म भूखंड उत्पन्न हुवा था ..इसे भारतीय परम्परा मे जम्बुद्वीप नाम दिया जाता है. सभी स्तन धारी भूमी पर पैरों से चलने वाले प्राणी दोपाए, चौपाए जिन्हें वैज्ञानिक भाशा मे अॅसग्युलेट मेमल ungulate mammal के नाम से जाना जाता है, वे इसी जम्बू द्वीप पर उत्पन्न हुवे थे.इस प्रकार सृष्टि में सब से प्रथम मनुष्य और गौ का इसी जम्बुद्वीप भूखंड पर उत्पन्न होना माना जाता है. 
              इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है कि भारतीय गाय ही विश्व की मूल गाय है. इसी मूल भारतीय गाय का लगभग 8000 साल पहले, भारत जैसे गर्म क्षेत्रों से योरुप के ठंडे क्षेत्रों के लिए पलायन हुवा माना जाता है. जीव विज्ञान के अनुसार भारतीय गायों के 209 तत्व के डीएनए DNA में 67 पद पर स्थित एमिनो एसिड प्रोलीन Proline पाया जाता है. इन गौओं के ठंडे यूरोपीय देशों को पलायन में भारतीय गाय के डीएनए में प्रोलीन Proline एमीनोएसिड हिस्टीडीन Histidine के साथ उत्परिवर्तित हो गया. इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में म्युटेशन Mutation कहते हैं. (Ref Ng-Kwai-Hang KF,Grosclaude F.2002.:Genetic polymorphism of milk proteins . In:PF Fox and McSweeney PLH (eds),Advanced Dairy Chemistry,737-814, Kluwer Academic/Plenum Publishers, New York) (देखें-Kwai-रुको KF, Grosclaude F.2002:. दूध प्रोटीन की जेनेटिक बहुरूपता. में: पीएफ फॉक्स और McSweeney PLH सम्पादित लेख “ उन्नत डेयरी रसायन विज्ञान ,737-814, Kluwer शैक्षणिक / सर्वागीण सभा प्रकाशक, न्यूयॉर्क) 
          1. मूल गाय के दूध में Proline अपने स्थान 67 पर बहुत दृढता से आग्रह पूर्वक अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्यूसीन Isoleucine से जुडा रहता है. परन्तु जब प्रोलीन के स्थान पर हिस्टिडीन आ जाता है तब इस हिस्टिडीन में अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीन से जुडे रहने की प्रबल इच्छा नही पाई जाती. इस स्थिति में यह एमिनो एसिड Histidine, मानव शरीर की पाचन कृया में आसानी से टूट कर बिखर जाता है. इस प्रक्रिया से एक 7 एमीनोएसिड का छोटा प्रोटीन स्वच्छ्न्द रूप से मानव शरीर में अपना अलग आस्तित्व बना लेता है. इस 7 एमीनोएसिड के प्रोटीन को बीसीएम 7 BCM7 (बीटा Caso Morphine7) नाम दिया जाता है. 
        2. BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम परिवार का मादक तत्व है. जो बहुत शक्तिशाली Oxidant ऑक्सीकरण एजेंट के रूप में मानव स्वास्थ्य पर अपनी श्रेणी के दूसरे अफीम जैसे ही मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोडता है. जिस दूध में यह विषैला मादक तत्व बीसीएम 7 पाया जाता है, उस दूध को वैज्ञानिको ने ए1 दूध का नाम दिया है. यह दूध उन विदेशी गौओं में पाया गया है जिन के डीएन मे 67 स्थान पर प्रोलीन न हो कर हिस्टिडीन होता है. आरम्भ में जब दूध को बीसीएम7 के कारण बडे स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूज़ीलेंड के सारे डेरी उद्योग के दूध का परीक्षण आरम्भ हुवा. सारे डेरी दूध पर करे जाने वाले प्रथम अनुसंधान मे जो दूध मिला वह बीसीएम7 से दूषित पाया गया. इसी लिए यह सारा दूध ए1 कह्लाया तदुपरांत ऐसे दूध की खोज आरम्भ हुई जिस मे यह बीसीएम7 विषैला तत्व न हो. इस दूसरे अनुसंधान अभियान में जो बीसीएम7 रहित दूध पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया. सुखद बात यह है कि विश्व की मूल गाय की प्रजाति के दूध मे, यह विष तत्व बीसीएम7 नहीं मिला, इसी लिए देसी गाय का दूध ए2 प्रकार का दूध पाया जाता है. देसी गाय के दूध मे यह स्वास्थ्य नाशक मादक विष तत्व बीसीएम7 नही होता. आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देसी गाय के दूध और दूध के बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते. भारतीय परम्परा में इसी लिए देसी गाय के दूध को अमृत कहा जाता है. आज यदि भारतवर्ष का डेरी उद्योग हमारी देसी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत सारे विश्व डेरी दूध व्यापार में सब से बडा दूध निर्यातक देश बन सकता है.
 देसी गाय की पहचान—– 
 आज के वैज्ञानिक युग में , यह भी महत्व का विषय है कि देसी गाय की पहचान प्रामाणिक तौर पर हो सके.साधारण बोल चाल मे जिन गौओं में कुकुभ , गल कम्बल छोटा होता है उन्हे देसी नही माना जात, और सब को जर्सी कह दिया जाता है. प्रामाणिक रूप से यह जानने के लिए कि कौन सी गाय मूल देसी गाय की प्रजाति की हैं गौ का डीएनए जांचा जाता है. इस परीक्षण के लिए गाय की पूंछ के बाल के एक टुकडे से ही यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह गाय देसी गाय मानी जा सकती है या नहीं . यह अत्याधुनिक विज्ञान के अनुसन्धान का विषय है. 
            पाठकों की जान कारी के लिए भारत सरकार से इस अनुसंधान के लिए आर्थिक सहयोग के प्रोत्साहन से भारतवर्ष के वैज्ञानिक इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं और निकट भविष्य में वैज्ञानिक रूप से देसी गाय की पहचान सम्भव हो सकेगी. इस महत्वपूर्ण अनुसंधान का कार्य दिल्ली स्थित महाऋषि दयानंद गोसम्वर्द्धन केंद्र की पहल और भागीदारी पर और कुछ भारतीय वैज्ञानिकों के निजी उत्साह से आरम्भ हो सका है. 
 ए1 दूध का मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव—- 
 जन्म के समय बालक के शरीर मे blood brain barrier नही होता . माता के स्तन पान कराने के बाद तीन चार वर्ष की आयु तक शरीर में यह ब्लडब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है .इसी लिए जन्मोपरांत माता के पोषन और स्तन पान द्वारा शिषु को मिलने वाले पोषण का, बचपन ही मे नही, बडे हो जाने पर भविष्य मे मस्तिष्क के रोग और शरीर की रोग निरोधक क्षमता ,स्वास्थ्य, और व्यक्तित्व के निर्माण में अत्यधिक महत्व बताया जाता है . 
 बाल्य काल के रोग—– 
 आजकल भारत वर्ष ही में नही सारे विश्व मे , जन्मोपरान्त बच्चों में जो Autism बोध अक्षमता और Diabetes type1 मधुमेह जैसे रोग बढ रहे हैं उन का स्पष्ट कारण ए1 दूध का बीसीएम7 पाया गया है. वयस्क समाज के रोग –— मानव शरीर के सभी metabolic degenerative disease शरीर के स्वजन्य रोग जैसे उच्च रक्त चाप high blood pressure हृदय रोग Ischemic Heart Disease तथा मधुमेह Diabetes का प्रत्यक्ष सम्बंध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है.यही नही बुढापे के मांसिक रोग भी बचपन में ए1 दूध का प्रभाव के रूप मे भी देखे जा रहे हैं. दुनिया भर में डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में ” अच्छा दूध अर्थात् BCM7 मुक्त ए2 दूध “ के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रही हैं. वैज्ञानिक शोध इस विषय पर भी किया जा रहा है कि किस प्रकार अधिक ए2 दूध देने वाली गौओं की प्रजातियां विकसित की जा सकें. 
 डेरी उद्योग की भूमिका—– 
 मुख्य रूप से यह हानिकारक ए1 दूध होल्स्टिन फ्रीज़ियन प्रजाति की गाय मे ही मिलता है, यह भैंस जैसी दीखने वाली, अधिक दूध देने के कारण सारे डेरी उद्योग की पसन्दीदा गाय है. होल्स्टीन फ्रीज़ियन दूध के ही कारण लगभग सारे विश्व मे डेरी का दूध ए1 पाया गया . विश्व के सारे डेरी उद्योग और राजनेताओं की आज यही कठिनाइ है कि अपने सारे ए1 दूध को एक दम कैसे अच्छे ए2 दूध मे परिवर्तित करें. आज विश्व का सारा डेरी उद्योग भविष्य मे केवल ए2 दूध के उत्पादन के लिए अपनी गौओं की प्रजाति मे नस्ल सुधार के नये कार्य क्रम चला रहा है. 
             विश्व बाज़ार मे भारतीय नस्ल के गीर वृषभों की इसी लिए बहुत मांग भी हो गयी है. साहीवाल नस्ल के अच्छे वृषभ की भी बहुत मांग बढ गयी है. सब से पहले यह अनुसंधान न्यूज़ीलेंड के वैज्ञानिकों ने किया था.परन्तु वहां के डेरी उद्योग और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपाने के प्रयत्नों से उद्विग्न होने पर, 2007 मे Devil in the Milk-illness, health and politics A1 and A2 Milk” नाम की पुस्तक Keith Woodford कीथ वुड्फोर्ड द्वारा न्यूज़ीलेंड मे प्रकाशित हुई. उपरुल्लेखित पुस्तक में विस्तार से लगभग 30 वर्षों के विश्व भर के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसंधान के आंकडो के आधार पर यह सिद्ध किया जा सका है कि बीसीएम7 युक्त ए1 दूध मानव समाज के लिए विष तुल्य है. इन पंक्तियों के लेखक ने भारतवर्ष मे 2007 में ही इस पुस्तक को न्युज़ीलेंड से मंगा कर भारत सरकार और डेरी उद्योग के शीर्षस्थ अधिकारियों का इस विषय पर ध्यान आकर्षित कर के देसी गाय के महत्व की ओर वैज्ञानिक आधार पर प्रचार और ध्यानाकर्षण का एक अभियान चला रखा है.
          परन्तु अभी भारत सरकार ने इस विषय को गम्भीरता से नही लिया है. डेरी उद्योग और भारत सरकार के गोपशु पालन विभाग के अधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर तो इस विषय को समझने लगे हैं परंतु भारतवर्ष की और डेरी उद्योग की नीतियों में बदलाव के लिए जिस नेतृत्व की आवश्यकता होती है उस के लिए तथ्यों के अतिरिक्त सशक्त जनजागरण भी आवश्यक होता है. इस के लिए जन साधारण को इन तथ्यों के बारे मे अवगत कराना भारत वर्ष के हर देश प्रेमी गोभक्त का दायित्व बन जाता है. विश्व मंगल गो ग्रामयात्रा इसी जन चेतना जागृति का शुभारम्भ है
. देसी गाय से विश्वोद्धार—- भारत वर्ष में यह विषय डेरी उद्योग के गले आसानी से नही उतर रहा, हमारा समस्त डेरी उद्योग तो हर प्रकार के दूध को एक जैसा ही समझता आया है. उन के लिए देसी गाय के ए2 दूध और विदेशी ए1 दूध देने वाली गाय के दूध में कोई अंतर नही होता था. गाय और भैंस के दूध में भी कोई अंतर नहीं माना जाता. सारा ध्यान अधिक मात्रा में दूध और वसा देने वाले पशु पर ही होता है. किस दूध मे क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस विषय पर डेरी उद्योग कभी सचेत नहीं रहा है. सरकार की स्वास्थ्य सम्बंदि नीतियां भी इस विषय पर केंद्रित नहीं हैं. भारत में किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने वाली गौओं की सन्ख्या 15% से अधिक नहीं है. 
         भरत्वर्ष में देसी गायों के संसर्ग की संकर नस्ल ज्यादातर डेयरी क्षेत्र के साथ ही हैं . आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था मे बच्चों को केवल ए2 दूध ही देना चाहिये. विश्व बाज़ार में न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ, जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेरी दूध के दाम से कही अधिक हैं .ए2 से देने वाली गाय विश्व में सब से अधिक भारतवर्ष में पाई जाती हैं. यदि हमारी देसी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन का प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है. यह एक बडे आर्थिक महत्व का विषय है. छोटे ग़रीब किसनों की कम दूध देने वाली देसी गाय के दूध का विश्व में जो आर्थिक महत्व हो सकता है उस की ओर हम ने कई बार भारत सरकार का ध्यान दिलाने के प्रयास किये हैं. परन्तु दुख इस बात का है कि गाय की कोई भी बात कहो तो उस मे सम्प्रदायिकता दिखाई देती है, चाहे कितना भी देश के लिए आर्थिक और समाजिक स्वास्थ्य के महत्व का विषय हो. 
 गाय का पहला दूध हमें स्वाइन फ्लू से बचाएगा—- 
 अब हमें स्वाइन फ्लू से बचाने ‘गौ माता’ आ रही हैं। जी हां, एक तरफ दुनिया एच1एन1 वायरस से जूझ रही है तो दूसरी तरफ देश की मिल्क कैपिटल के तौर पर मशहूर आणंद में गाय का दूध अपनी तमाम खूबियों की बदौलत इसका मुकाबला करने को तैयार हो रहा है। अमूल लगभग 50 दशकों से देश को ‘अटर्री, बटर्ली, डिलिशस’ मिल्क प्रॉडक्ट बेच रहा है। पर अब अमूल ने अब इस घातक वायरस के खिलाफ मोर्चाबंदी करने के लिए मुंबई की एक कंपनी से हाथ मिलाया है। यह कंपनी हाल ही में बच्चों को जन्म देने वाली गायों का पहला दूध इकट्ठा कर रही है। गौरतलब है कि यह दूध नवजात बछड़ों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। अमूल का विचार एक ऐसा ओरल स्प्रे बनाने का है जो इंसानों के इम्यून सिस्टम को एचआईवी और एच1एन1 वायरसों से बचा सके। यह दूध अमूल के मिल्क कोऑपरेटिव से इकट्ठा किया जा रहा है। 
           इसे नाम दिया गया है रिसेप्टर। इसकी मार्किटिंग गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्किटिंग फेडरेशन करेगी। रिसेप्टर को मुंबई के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर स्थित आठ काउंटरों से बेचा जा रहा है। ओरल स्पे पर रिसर्च करने वाली बायोमिक्स नेटवर्क लिमिटेड के चेयरमैन डॉ. पवन सहारन का कहना है कि जन्म देने के बाद दिए गए पहले दूध को कोलस्ट्रम कहते हैं। हम पहले नैनो फिल्टरेशन से इसमें से फैट अलग कर लेते हैं। इसके बाद मिले नैनो पार्टिकल्स को हमने राधा-108 नाम दिया है।  
           भारत और अमेरिका में इसका पेटेंट करा लिया गया है। इसे मुंह में स्प्रे किया जाएगा जहां से यह सीधे दिल के रास्ते पूरे शरीर में पंप हो जाएगा। इसके क्लिनिकल ट्रायल यूएस, नाइजीरिया और भारत में किया गया है। एड्स के मरीजों में भी इससे काफी सुधार हुआ है, फ्लू के मरीजों को भी इससे फायदा पहुंचा है। गाय के दूध से नवजातों में नहीं होती है एलर्जी— एक अध्ययन से पता चला है कि जिन शिशुओं को जन्म के बाद से 15 दिन तक उनकी मां गाय का दूध पिलाती हैं उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। गाय का दूध बच्चों को भविष्य में होने वाली गंभीर एलर्जी से सुरक्षित करता है।तेल अवीव विश्वविद्यालय में हुए इस अध्ययन ने पहले की सभी धारणाओं को बदल दिया है। 
           पहले माना जाता था कि कि जन्म के तुरंत बाद शिशुओं को कुछ महीने तक गाय का दूध नहीं देना चाहिए।अध्ययनकर्ता यित्झाक काट्ज का कहना है, जो महिलाएं अपने शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद गाय का दूध देना शुरू कर देती हैं वे अपने बच्चों को एलर्जी से पूरी तरह बचा लेती हैं।इस अध्ययन के लिए अध्ययनकर्ताओं ने 13,019 शिशुओं के खाने-पीने की आदतों के इतिहास का अध्ययन किया।जिन शिशुओं को जन्म के 15 दिन के अंदर ही गाय के दूध में मिलने वाला प्रोटीन दिया जाने लगा था वे गायों के दूध के प्रोटीन से होने वाली एलर्जी (सीएमए) से पूरी तरह सुरक्षित थे।ये बच्चे उन शिशुओं से ज्यादा सुरक्षित थे जिन्हें जन्म के 15 दिन बाद से गाय का दूध देना शुरू किया गया। गाय के दूध में मौजूद प्रोटीन से होने वाली एलर्जी (सीएमए) बच्चों के लिए बहुत खतरनाक होती है। इससे उनकी त्वचा पर चकत्ते हो सकते हैं, उन्हें श्वसन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं और यहां तक कि उनकी मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए यदि जन्म के शुरुआती दिनों में गाय का दूध देना शुरू कर दिया जाए तो वह टीकाकरण जैसा काम करता है। 
 दूध और विटामिन डी————– 
 विटामिन क्या होता है ? विटामिन वे तत्व हैं जिन के अभाव मे दैनिक जीवन मे हम शरीर द्वारा सब काम ठीक से नही कर पाएंगे. इस लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दैनिक आहार से हमे संतुलित मात्रा मे ये सब पदार्थ उपलब्ध हों.विटामिनो को घुलनशीलता के आधार पर, दो श्रेणी में बांटा जाता पानी में घुलनशील जैसे विटामिन बी सी इत्यादि और वसा में घुलनशील जैसे ए, डी, ई, के होर्मोन क्या होता है ? होर्मोन वे जैविक रसायनिक संदेश वाहक तत्व हैं जिन का निर्माण शरीर के अंदर ही विभिन्न ग्रन्थियों और कोशिकाओं में होता है . 
            होर्मोन रक्त द्वारा उन गंतव्य कोशिकाओं पर पहुंचाए जाते हैं जहां से उस होर्मोन की मांग आई थी. अपने गंतव्य स्थान पर आगमन के बाद होर्मोन तुरंत शरीर की संरचना के कार्य मे युक्त हो जाते हैं. विटामिन डी क्या है????` रसायनिक दृष्टि विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं डी2 Ergocalciferol एर्गोकेल्सीफिरोल और डी3 Cholecalciferol कोलेकेसिफिरोल प्राकृतिक रूप से शरीर मे विटामिन डी3 होता है. जो कोलेस्ट्रोल अथवा 7 डिहाइड्रोकोलेस्ट्रोल से मानव अथवा उच्च जाति के पशुओं के शरीर मे ही सूर्य की किरणों के प्रभाव से बनता है. जो लोग घरों के अंदर अधिक रहते हैं उन के लिए अपेक्षित मात्रा मे विटामिन डी सुसंस्कृत् आहार आवश्यक हो जाता है . 
          अमेरिका जैसे ठण्डे देश में लोग सूर्य का सेवन कम कर पाते हैं.इस के परिणाम स्वरूप वहां बच्चों में रिकेट (एक पोलिओ जैसा रोग) बहुत पाया जाता था. वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि यह रोग सूर्य की किरणो से कम सम्पर्क के कारण होता है. इसी लिए पिछली शताब्दी के आरम्भ मे शरीरिक पौष्टिकता और जनता के स्वास्थ्य के हित में अधिकारित तौर पर डी3 को विटामिन का दर्जा दिया गया है. और 1940 से ही अमेरिका मे गाय के डेरी दूध मे अतिरिक्त विटामिन डी को मिलाने के लिए कानून् बनाया गया . जिस के परिणाम स्वरूप अमेरिका मे बच्चों मे Rickets सुखंडीग्रस्त (रिकेट ग्रस्त) बच्चो की सन्ख्या मे 85% तक की कमी देखी गई.
 विटामिन डी का महत्व—- 
 बिना विटामिन डी के कैल्शियम जैसे खमनिज पदार्थ मानव शरीर कू पाचन द्वारा अह्हर से उपलब्ध नही होते. कैल्शियम मानव शरीर मे पाए जाने वाले खनिज पदार्थो मं 70% होता है, क्योंकि सारा अस्थि पंजर कैल्शियम से बना होता है. मानव शरीर की हड्डियां, मुख्य रूप से विटामिन डी के ही द्वारा कैल्शियम के सुपाचन से स्वस्थ और मज़बूत बनती हैं. इसी से लिए कैल्शियम की गोली के साथ विटामिन डी अवश्य मिला कर देते हैं. हड्डियों के कमज़ोरी से रजनिवृक्त postmenopausal महिलाओं को अस्थि रोग अधिक होते हैं. 1980 के दशक के बाद केंसर, डायाबिटीज़ , थयरायड और त्वचा के रोग जैसे सोरिअसिस भी विटामिन डी से जोड कर देखे जा रहे हैं.भैंस के दूध मे यद्यपि कैल्शियम तो बहुत होत है परंतु विटामिन डी बहुत कम होता है. इस लिए भैंस के दूध से विटामिन डी की कमी के सारे रोग बढते हैं.. यही गाय के दूध का स्वास्थ्य के लिए महत्व है. 
 विटामिन डी की व्यक्तिगत आवश्यकता—
– मानव सभ्यता के विकास के साथ घरों में अंदर रहने के साथ कपडे पहन कर रहना मानव की त्वचा पर सूर्य की किरणों के सीधे सम्पर्क को कम करते हैं. इस प्रकार साधारण रूप से प्राकृतिक विटामिन डी की कमी मानव शरीर मे आहार के द्वारा पूरी करने की आवश्यकता बनती है. अमेरिका मे ऐसा बताया जाता है कि साधारण रूप से संतुलित आहार के साथ साथ. हाथ मुख इत्यादि शरीर के नंगे भाग को मात्र 10 मिनट प्रति दिन सूर्य के दर्शन शरीर भी विटामिन डी द्वारा शरीर की आवश्यकता के लिए पर्याप्त है. ( भारतीय परम्परा मे दैनिक सूर्य नमस्कार का यही महत्व देखा जा सकता है )       मानव शरीर के लिए विटामिन डी के मुख्य स्रोत—- सूर्य के दर्शन के अतिरिक्त, समुद्र की मछलियों मे विटामिन डी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. परंतु शाकाहारियों के लिए, गाय का दूध और उस के बने पदार्थ ही विटामिन डी का एक मात्र स्रोत हैं. कृत्रिम विटामिन का उत्पादन दूध मे विटामिन डी बढाने के लिए कृत्रिम विटामिन डी बनाने की आवश्यकता हुई. विदेशों में गाय के आहार और दूध दोनों मे अतिरिक्त विटामिन डी मिलाया जाता है. 
 एथलीटों का प्रदर्शन होगा गाय के दूध से बेहतर —- अब वैज्ञानिक इससे एथलीटों के प्रदर्शन में सुधार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।वैज्ञानिकों के अनुसार यह एथलीटों में ‘लीकी गट सिंड्रोम’ जैसी बीमारी को दूर कर सकता है, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित नहीं होगा। बछड़े को जन्म देने के कुछ दिन बाद गाय जो दूध देती है, उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कीटाणुओं से लड़ने में सक्षम प्रोटीन के विकास की प्रचुर संभावना होती है।’लीकी गट’ की शिकायत एथलीटों में अधिक पाई है। इसमें आंतों से वे तत्व निकल जाते हैं, जो खून में विषैले पदार्थो को जाने से रोकते हैं। 
         ऐसे में डायरिया की शिकायत भी हो सकती है। अमेरिकन जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी-गैस्ट्रोएंटेस्टिनल एंड लिवर फिजियोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह सब अंतत: शरीर के अंदरूनी हिस्सों को क्षतिग्रस्त कर सकता है।बार्ट्स एंड द लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड डेंटिसरी के प्रोफेसर रे प्लेफोर्ड के अनुसार, “लीकी गट के कारण एथलीटों द्वारा अधिक शारीरिक श्रम की स्थिति में उनका प्रदर्शन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।” प्लेफोर्ड की टीम ने एथलीटों से 20 मिनट तक सामान्य कसरत से 80 प्रतिशत अधिक शारीरिक श्रम करने को कहा। कसरत के बाद वैज्ञानिकों ने मूत्र और उनके शारीरिक तापमान के जरिये उनमें ‘लीकी गट’ की शिकायत का अध्ययन किया। उनमें ‘लीकी गट’ 250 प्रतिशत तक बढ़ा पाया गया। लेकिन जिन लोगों को अभ्यास से दो सप्ताह पहले जल्द ही बछड़े को जन्म देने वाली गाय का दूध दिया गया, उनमें ‘लीकी गट’ 80 प्रतिशत तक कम पाया गया।
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