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जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को

इस वर्ष भैरवाष्टमी 19 नवंबर 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। काल भैरव उत्तम तंत्र साधाना के लिए माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में बताया गया है कि भगवान शंकर का ही भैरव बाबा अवतार हैं। भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है। इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन-पूजन शुभ फल देने वाला होता है। हमारे वैदिक ग्रंथों अनुसार श्री काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था, तब से इसे भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इसीलिए काल भैरव की पूजा मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी पर करनी चाहिए।
Learn and understand the importance and impact of Shri Bhairav Ashtami-जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को    पौराणिक कथानुसार एक बार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने भगवान भोलेनाथ की वेशभूषा और उनके गणों का उपहास उड़ाया, तब उस समय भगवान शिव के क्रोध से विशालकाय दंडधारी प्रचंडकाय काया प्रकट हुई और ब्रह्मा जी का वध करने के लिए बढ़ने लगी दौड़ी। पुराणों के अनुसार, इस काया ने ब्रह्मदेव के एक शीश को अपने नाखून से काट भी दिया। तभी भगवान शिव ने बीच बचाव करते हुए उसे शांत किया गया और फिर तब से ही ब्रह्मा जी के चार शीष ही बचे। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह विशाल काया प्रकट हुई थी, वह दिन मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी का दिन था। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न इस काया का नाम भैरव पड़ा। भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए कालभैरव रूप की पूजा करने से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर हो जाता है। शिव पुराण के अनुसार शती काल भैरव भगवान शिव का रौद्र रूप है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेखानुसार कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। कालभैरव रोग, भय, संकट और दुख के स्वामी माने गए हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।
पुराणों में बताए गए हैं 12 भैरव--- 
धर्म ग्रंथों में मिलते है | भक्तजन इनमें से किसी एक रूप की उपासना भैरव उपासक यदि सच्चे मन से कर लेते है | तो उन पर भैरव का प्रभाव पूरा -पूरा रहता है | अपने भक्तों के सारे संकट हरण करने के लिए वे स्वयं आते है |
ऐसे हैं श्री भैरव जी के सभी बारह स्वरुप (नाम)--
  • 1. बाल भैरव 
  • 2. बटुक भैरव 
  • 3. स्वर्णाकर्षण भैरव
  • भैरव जी के ये तीनों रूप सबसे सुंदर और मृदुल माने गए है | जिनमें स्वर्णाकर्षण भैरव को धन-धान्य के स्वामी और सृष्टि के पालन पोषण कर्ता के रूप पूजा जाता है | भैरव जी के ये तीनों स्वरुप पूर्णतः सात्विक माने गये है तथा भगवान विष्णु , राम , कृष्ण आदि के समान जी इन रूपों की पूजा की जाती है |
  • 4. महाकाल भैरव
  • भैरव जी के उपरोक्त तीनों स्वरुप के बिल्कुल विपरीत है –
  •  महाकाल भैरव | महाकाल भैरव को मृत्यु का देवता माना जाता है | यही काल रूप है | इस रूप को लेकर ही तंत्र साधना की जाती है | तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए भैरव जी को महाकाल भैरव के रूप में पूजा जाता है | इसलिए गृहस्थ जीवन में महाकाल भैरव की उपासना न करके बाल भैरव , बटुक भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव इन रूपों में पूजा की जानी चाहिए |
इनके अतिरिक्त भैरव जी के अन्य 8 रूप इस प्रकार से है ---
  • 5. असिताग भैरव
  • 6. रु रु भैरव 
  • 7. चंड भैरव
  • 8. क्रोधोन्मत भैरव
  • 9. भयंकर भैरव
  • 10. कपाली भैरव
  • 11. भीषण भैरव
  • 12. संहार भैरव
भैरव जी के ये सभी रूप सोम्य नहीं है बल्कि प्रचंड रूप है | भैरव जी को भगवान शिव का पाँचवा और रौद्र अवतार माना गया है | भैरव जी के सभी 12 रूपों में 9 रूपों को प्रचंड माना गया है | जिनकी उपासना तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए की जाती है | रविवार, बुधवार या भैरव अष्टमी पर इन 8 नामों का उच्चारण करने से मनचाहा वरदान मिलता है। भैरव देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं और हर तरह की सिद्धि प्रदान करते हैं। क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है। 
  • इस वर्ष कालभैरव अष्टमी (जयन्ती) मंगलवार, नवम्बर 19, 2019 को मनाई जाएगी।
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 19, 2019 को03:35 पी एम बजे से आरम्भ होकर..
  • अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 20, 2019 को01:41 पी एम बजे होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहां शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है। भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि आप जन्मकुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो श्री भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण सरलता से कर सकते है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है। भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं। भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है। इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
   राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार नारद पुराण में बताया गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्‍य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं। कालभैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं। सारे संकट भक्तों के भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं।  कहा जाता है कि बहुत मुश्किल भैरव साधना है। साथ ही सात्विकता और एकाग्रता का ध्यान भैरव बाबा की साधाना में करना होता है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शिव ने मार्गशीर्ष कृष्‍ण पक्ष अष्टमी के दिन अवतार लिया था। इस तिथि पर प्रत और पूजा इस उपलक्ष के तौर पर होती है। 
जानिए भैरव बाबा का महत्व 
हिंदू देवताओं में भैरव बाबा का बहुत महत्व माना गया है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि भैरव बाब दिशाओं के रक्षक और काशी के संरक्षक हैं। भैरव बाबा के कई रूप में और बटुक भैरव और काल भैरव एक ही हैं। 
श्री भैरव जी के विभिन्न स्वरूप
शिवजी के रज, तम और सत्व गुणों के आधार पर श्री भैरव के स्वरूप कौन-कौन से हैं और किस मनोकामना के लिए कौन से स्वरूप की पूजा की जाती है...
  1. बटुक भैरव--यह भैरव का सात्विक और बाल स्वरूप है। जो लोग सभी सुख, लंबी आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा और मुक्ति पाना चाहते हैं, वे बटुक भैरव की पूजा कर सकते हैं।
  2. काल भैरव--यह भैरव का तामसिक स्वरूप है, लेकिन कल्याणकारी है। इस स्वरूप को काल का नियंत्रक माना गया है।इनकी पूजा अज्ञात भय, संकट, दुख और शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।
  3. आनंद भैरव---यह भैरव का राजस यानी रज स्वरूप माना गया है। दस महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव की भी पूजा की जाती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिल सकती हैं।
जानिए भैरव अष्टमी के व्रत का महत्व 
शास्‍त्रों में कहा गया है कि शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश भैरवाष्टमी के दिन व्रत और पूजा-अर्चना करने से होता है। मान्यताओं के अनुसार,सभी तरह के पाप इस दिन भैरव बाबा की विशेष पूजा अर्चना करने से धूल जाते हैं। श्री कालभैरव जी के दर्शन और पूजा इस तिथि पर करने से शुभ फल मिलता है। 
जानिए भैरव जी की पूजा के लाभ
ऐसा कहा जाता है कि पूजा-अर्चना भैरव जी की इस दिन करने से सारी मनोकामना पूर्ण होती है। जो भक्त इस दिन भैरव बाबा की पूजा करते हैं वह निर्भय होते हैं साथ ही उनके सारे कष्ट भी दूर हो जाते हैं। भैरव बाबा की पूजा और व्रत इस दिन करने से सारे विघ्न खत्म हो जाते हैं। भूत, पिशाच एवं काल भी इनके भक्तों से दूर रहते हैं।
लाभदायक होती हरण भैरव की साधना 
ग्रहों के क्रूर प्रभाव भी भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं। इतना ही नहीं हर तरह की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव भी भैरव बाबा की साधना से दूर होते हैं। 
ऐसे करें भैरव पूजन
षोड्षोपचार पूजन के साथ भैरव बाबा की पूजा करनी चाहिए। रात्र में जागरण करना चाहिए। भैरव कथा व आरती रात में भजन कीर्तन करते हुए करनी चाहिए ऐसा करके विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।

जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व

इस कार्तिक महीने में कई धार्मिक अनुष्ठान और कार्यक्रम होंगे। इस महीने में खासतौर पर तुलसी और शालिग्राम की विशेष पूजा और आराधना की जाएगी। यह महीना त्योहारों का महीना भी होगा। इस महीने में व्रत, स्नान और दान करने से तमाम तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कार्तिक माह को सनातन हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है। कार्तिक माह में पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है।
    कार्तिक माह हिंदू पंचांग का आठवां महीना है। चातुर्मास में आने वाले 4 महीनों में ये चौथा महीना है। इस बार इसकी शुरुआत रेवती नक्षत्र और हर्षण योग के साथ हो रही है। इस महीने में कई बड़े त्योहार पड़ेंगे। यह महीना काफी महत्वपूर्ण है और इसकी शुरुआत शरद पूर्णिमा के अगले दिन से होती है। ग्रंथों के अनुसार इस माहीने में तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक इस बार 14 अक्टूबर 2019, सोमवार से शुरू हो रहा है, जो 12 नवंबर 2019, मंगलवार को समाप्त होगा।
Know-when-is-Kartik-Purnima-2019-Importance-of-karthik-month-जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व      हिंदू पंचांगों के अनुसार कार्तिक मास को सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने में दान पुण्य करने से घर-परिवार और कारोबार में सुख शांति आती है। कार्तिक मास में तुलसी विवाह का भी बड़ा महत्व है. इस महीने में तुलसी की श्रद्धा भाव से पूजा करने पर मनवांछित फल मिलते हैं। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे।हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस माह में 8 नवंबर 2019 को जहां देवउठनी एकादशी पर देव जागेंगे, वहीं 12 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा तक कई प्रमुख व्रत व त्योहार भी आएंगे।
    उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि तुलसी में साक्षात् मां लक्ष्मी का निवास माना गया है। इस चलते कार्तिक मास मेंं तुलसी के समीप दीपक जलाना शुभ माना गया है। ऋतु चक्र के आधार पर भी इस माह का महत्व है क्योंकि कार्तिक मास से लोगों का खान-पान और पहनावा बदलेगा। कार्तिक महीने में दान, पूजा-पाठ तथा स्नान का बहुत महत्व होता है तथा इसे कार्तिक स्नान की संज्ञा दी जाती है। यह स्नान सूर्योदय से पूर्व किया जाता है। स्नान कर पूजा-पाठ को खास अहमियत दी जाती है। साथ ही देश की पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व होता है। इस दौरान घर की महिलाएं नदियों में ब्रह्ममूहुर्त में स्नान करती हैं। यह स्नान विवाहित तथा कुंवारी दोनों के लिए फलदायी होता है। इस महीने में दान करना भी लाभकारी होता है। दीपदान का भी खास विधान है। यह दीपदान मंदिरों, नदियों के अलावा आकाश में भी किया जाता है। यही नहीं ब्राह्मण भोज, गाय दान, तुलसी दान, आंवला दान तथा अन्न दान का भी महत्व होता है।
      हिन्दू धर्म में इस महीने में कुछ परहेज बताए गए हैं। कार्तिक स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को इसका पालन करना चाहिए। इस मास में धूम्रपान निषेध होता है। यही नहीं लहुसन, प्याज और मांसाहर का सेवन भी वर्जित होता है। इस महीने में भक्त को बिस्तर पर नहीं सोना चाहिए उसे भूमि शयन करना चाहिए। इस दौरान सूर्य उपासना विशेष फलदायी होती है। साथ ही दाल खाना तथा दोपहर में सोना भी अच्छा नहीं माना जाता है।  पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी जी भगवान विष्णु की प्रिया हैं। तुलसी की पूजा कर भक्त भगवान विष्णु को भी प्रसन्न कर सकते हैं। इसलिए श्रद्धालु गण विशेष रूप से तुलसी की आराधना करते हैं। इस महीने में स्नान के बाद तुलसी तथा सूर्य को जल अर्पित किया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। यही नहीं तुलसी के पत्तों को खाया भी जाता है जिससे शरीर निरोगी रहता है। साथ ही तुलसी के पत्तों को चरणामृत बनाते समय भी डाला जाता है। यही नहीं तुलसी के पौधे का कार्तिक महीने में दान भी दिया जाता है। तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीया भी जलाया जाता है। अगर यह पौधा घर के बाहर होता है तो किसी भी प्रकार का रोग तथा व्याधि घर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। तुलसी अर्चना से न केवल घर के रोग, दुख दूर होते हैं बल्कि अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
      हिन्दू धर्म में पवित्र कार्तिक माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने अति पुष्करिणी कहा है।स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है वह इन्हीं तीन तिथियों की प्रातः स्नान करने से पूर्ण फल का भागी हो जाता है। त्रयोदशी को स्नानोपरांत समस्त वेद प्राणियों समीप जाकर उन्हें पवित्र करते हैं।  चतुर्दशी में समस्त देवता एवं यज्ञ सभी जीवों को पावन बनाते हैं, और पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप, तप, पूजन, कीर्तन दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। इन तीन दिनों में भगवत गीता एवं श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा का श्रवण, गीतापाठ विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने से प्राणी पापमुक्त-कर्ज मुक्त होकर भगवान श्रीविष्णु जी की कृपा पाता है।
    पवित्र कार्तिक महीने में झूठ बोलना, चोरी-ठगी करना, धोखा देना, जीव हत्या करना, गुरु की निंदा करने व मदिरापान करने से बचना चाहिए। एकादशी से पूर्णिमा तक के मध्य भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खुले आसमान में दीप जलाते हुए इस मंत्र -
 दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च ! नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् !!

अर्थात -
मै सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप अर्पित करता हूँ जो भगवान को अतिप्रिय है। साथ ही इसमंत्र का ''नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे ! नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः !! 

उच्चारण करते हुए, 'पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है, धर्म स्वरूप श्रीविष्णु को नमस्कार है, यमदेव को नमस्कार है तथा जीवन यात्रा के दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले भगवान रूद्र को नमस्कार है का उच्चारण करते हुए आकाशदीप जलाएं। 
इस प्रकार करने से कोई भी प्राणी कार्तिक माह में भगवान की कृपा का पात्र बन सकता हैं।
विशेष महत्व है कार्तिक महीने का ---
भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने इसी महीने में तारकासुर राक्षस का वध किया था इस कारण से इस महीने का नाम कार्तिक पड़ा। कार्तिक माह में भगवान कार्तिकेय और तुलसी की भी विशेष पूजा की जाती है। साथ ही इसी महीने तुलसी विवाह भी होता है। कार्तिक महीना महीने में विवाहित महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखेंगी। जिसमें महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखेंगी। वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिक माह बहुत ही पवित्र माना जाता है. भारत के सभी तीर्थों के समान पुण्य फलों की प्राप्ति एक इस माह में मिलती है. इस माह में की पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है इसके अलावा इसी महीने दीपावली, धनतेरस, रमा एकादशी और आंवला नवमी जैसे बड़े त्योहार होंगे।
इस साल कार्तिक अमावस्या 27 अक्टूबर 2019 से शुरू होकर 28 अक्टूबर 2919 यानी दो दिन चलेगी. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस 28 को मनाया जाएगा। 29 अक्टूबर को भाईदूज का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन बहनें अपने भाईयों की पूजा करती हैं।
8 नवंबर 2019 को तुलसी विवाह-
कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी को तुलसी विवाह की परंपरा है. इस साल 8 नवंबर को तुलसी विवाह किया जाएगा. इसके बाद 12 नवंबर को कार्तिक महीने का आखिरी दिन है. इस दिन कार्तिक अमावस्या मनाई जाती है. कार्तिक अमावस्या के दिन व्रत और ईष्टदेव की आराधना करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.
भगवान श्री कृष्ण का प्रिय है कार्तिक मास-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास भगवान श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय महीना है. राधा इस महीने में कृष्ण से रूठ गई थीं और उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बांधकर अपना गुस्सा उतारा था. मगर कृष्ण ने कुछ नहीं किया वे बस मुस्कुराते रहे. जब राधा का गुस्सा शांत हुआ तो उन्होंने कृष्ण से माफी मांगी. मगर कृष्ण ने राधा से कहा कि वे हमेशा उनसे बंधे ही रहना चाहते हैं. इसलिए उन्हें कार्तिक महीना काफी पसंद था.
कार्तिक में महिलाओं के पर्व ज्यादा--
17 अक्टूबर, शनिवार से प्रमुख पर्वों की शुरुआत करवा चौथ के साथ हो रही है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा पर्व है। इसके बाद स्कंद षष्ठी, रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी व्रत के साथ सौंदर्य का पर्व रूप चौदस, सुहाग पड़वा, आंवला नवमी जैसे पर्व भी महिलाओं से जुड़े हैं।
जानिए इस वर्ष 2019 के कार्तिक मास में किस दिन कौन सा पर्व मानेगा--
  1. 17 अक्टूबर - करवा चौथ
  2. 21 अक्टूबर - अहोई अष्टमी
  3. 24 अक्टूबर- रमा एकादशी व्रत
  4. 25 अक्टूबर- गोवत्स द्वादशी
  5. 25 अक्टूबर - धनतेरस
  6. 26 अक्टूबर- रूप चौदस
  7. 27 अक्टूबर- दीपावली
  8. 28 अक्टूबर- गोवर्धन पूजा, अन्नकूट
  9. 29 अक्टूबर - भाई दूज
  10. 2 नवंबर - सूर्य षष्ठी
  11. 4 नवंबर - गोपाष्टमी
  12. 5 नवंबर - आंवला नवमी
  13. 8 नवंबर - देवउठनी ग्यारस
  14. 11 नवंबर - वैकुंठ चतुर्दशी
  15. 12 नवंबर - कार्तिक पूर्णिमा (11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी)

सनातन धर्म में पूर्णिमा  को शुभ , मंगल और फलदायी माना गया है। हिन्दू पंचांग केअनुसार वर्ष में 16 पूर्णिमा होती है और इस 16 पूर्णिमा में  वैसाख, माघ और कार्तिक पूर्णिमा   को स्नान-दान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा (मंगलवार) 12 नवंबर 2019 को मनाई जाएगी।  ऐसा कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने अपना पहला अवतार लिया था. वे मत्स्य यानी मछली के रूप में प्रकट हुए थे. वैष्णव परंपरा में कार्तिक माह को दामोदर माह के रूप में भी जाना जाता है. बता दें कि श्रीकृष्ण के नामों में से एक नाम दामोदर भी है. कार्तिक माह में लोग गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान आदि करते हैं. कार्तिक महीने के दौरान गंगा में स्नान करने की शुरुआत शरद पूर्णिमा के दिन से होती है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होती है. कार्ती पूर्णिमा के दौरान उत्सव मनाने की शुरुआत प्रबोधिनी एकादशी के दिन से होती है. कार्तिक महीने मे पूर्णिमा शुक्ल पक्ष के दौरान एकदशी ग्यारहवें दिन और पूर्णिमा पंद्रहवीं दिन होती है. इसलिए कार्तिक पूर्णिमा उत्सव पांच दिनों तक चलता है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  पूर्णिमा यानी चन्द्रमा की पूर्ण अवस्था। पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा से जो किरणें निकलती हैं वह काफी सकारात्मक होती हैं और सीधे दिमाग पर असर डालती हैं। चूंकि चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक है, इसलिए पृथ्वी पर सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्रमा का ही पड़ता है। भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख, माघ और कार्तिक माह की पूर्णिमा स्नान-दान के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। इस पूर्णिमा में जातक को नदी या अपने स्नान करने वाले जल में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करना चाहिए और इसके बाद भगवान विष्णु का विधिवत पूजन करना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखकर एक समय भोजन करें। गाय का दूध, केला, खजूर, नारियल, अमरूद आदि फलों का दान करना चाहिए। ब्राह्मण, बहन, बुआ आदि को कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। 
      कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन वृषोसर्ग व्रत रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान कार्तिकेय और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान हैं। यह व्रत शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है। इसे नक्त व्रत भी कहा जाता है।इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, उज्जैन,कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। 
कार्तिक पूर्णिमा विधि विधान—-
कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है. अन्न, धन एव वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है इस दिन जो भी आप दान करते हैं उसका आपको कई गुणा लाभ मिलता है. मान्यता यह भी है कि आप जो कुछ आज दान करते हैं वह आपके लिए स्वर्ग में सरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में आपको प्राप्त होता है.
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है. शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें. आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें.
     नारद पुराण के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन स्नान आदि कर उपवास रखते हुए भगवान कार्तिकेय की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसी दिन प्रदोष काल में दीप दान करते हुए संसार के सभी जीवों के सुखदायक माने जाने वाले वृषोसर्ग व्रत का पालन करना चाहिए। इस दिन दीपों का दर्शन करने वाले जंतु जीवन चक्र से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन अगर संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्थान करना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्र उदय के बाद वरुण, अग्नि और खड्गधारी कार्तिकेय की गंध, फूल, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजा कर हवन करना चाहिए।
    इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उन्हें दान देना चाहिए। घर के बाहर दीप जलाना चाहिए और उसके पास एक छोटा सा गड्ढा खोदकर उसे दूध से भरना चाहिए। गड्ढे में मोती से बने नेत्रों वाली सोने की मछली डालकर उसकी पूजा करते हुए “महामत्स्याय नमः” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। पूजा के बाद सोने की मछली को ब्राह्मण को दान कर देनी चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था. सिख सम्प्रदाय को मानने वाले सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सगंध लेते हैं. अतः इस दिन गुरू नानक जयन्ती भी मनाई जाती है ।
दान और पूजा क्यों करें????
इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए। कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में व्रत करके वृष (बैल) दान करने से शिव पद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पत्ति बढ़ती है। इस दिन उपवास करके भगवान का स्मरण, चिंतन करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। इस दिन मेष (भेड़) दान करने से ग्रहयोग के कष्टों का नाश होता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस दिन कन्यादान से ‘संतान व्रत’ पूर्ण होता है। कार्तिकी पूर्णिमा से प्रारम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस दिन कार्तिक के व्रत धारण करने वालों को ब्राह्मण भोजन, हवन तथा दीपक जलाने का भी विधान है। इस दिन यमुना जी पर कार्तिक स्नान की समाप्ति करके राधा-कृष्ण का पूजन, दीपदान, शय्यादि का दान तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। कार्तिक की पूर्णिमा वर्ष की पवित्र पूर्णमासियों में से एक है।
      हिन्दू धर्म के वेदो, महापुराणों और शास्त्रो ने कार्तिक माह को हिंदी वर्ष का पवित्र और पावन महीना बताया है। कार्तिक माह की शुरुवात शरद या आश्विन पूर्णिमा के दिन से होती है जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन खत्म होती है। कार्तिक माह को स्नान माह भी कहा जाता है क्योकि इस दौरान लोग प्रतिदिन सुबह में पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान कर, पूजा अर्चना व् दान करते है। भीष्म पंचक और विष्णु पंचक का व्रत भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है। 
        ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैदिक काल में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 
      इस बार 23 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र दोपहर 16 बजकर 42 मिनिट तक रहेगा तत्पश्चात रोहिणी नक्षत्र लग जायेगा।।जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायरू श्री सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चैराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। कार्तिकी में यह तिथि देव दीपावली-महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। चान्द्रायणव्रत की समाप्ति भी आज के दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी आदि पवित्र नदियों के समीप स्नान के लिए सहस्त्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेले का रूप बन जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक माह को दामोदर माह भी कहा जाता है क्योकि भगवान विष्णु को दामोदर के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।  कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में अवतरित हुए थे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव जी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। त्रिपुरासुर के वध के पश्चात समस्त लोको के देवी देवताओ ने इस प्रसन्नता में गंगा नदी के किनारे असंख्य  दिये जलाये थे जिस कारण कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली भी कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी के किनारे वाराणसी में देव दीपावली मनाया जाता है। 
जानिए वर्ष 2018 में कार्तिक पूर्ण‍िमा पूजन विधि और समय---
कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा-अराधना करनी चाहिए |
वर्ष 2019 में कार्तिक पूर्णिमा की पूर्णिमा तिथि दिनांक 12 नवम्बर 2019  (मंगलवार) को है।  इस वर्ष दिनांक 11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी। यदि संभव हो पाए तो इस दिन गंगा स्नान भी करें. अगर हो सके तो पूरे दिन या एक समय व्रत जरूर रखें. कार्तिक पूर्ण‍िमा के दिन खाने में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. अगर हो सके तो ब्राह्मणों को दान दें. केवल इतना ही नहीं, शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने से पुण्य की प्राप्त‍ि होती है |
      गंध, अक्षत, पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, पीपल के पत्तों से गंगाजल से पूजन करें। पूजा गृह, नदियों, सरोवरों, मन्दिरों में दीपदान करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मिट्टी का दीपक अवश्य जलाएं। इससे हमेशा संतति सही रास्ते पर चलेगी। धन की कभी भी कमी नहीं होगी। सुख, समृद्धि में बढ़ोतरी होगी। जीवन में ऊब, उकताहट, एकरसता दूर करने का अचूक उपाय। व्रत से ऐक्सिडेंट-अकाल मृत्यु कभी नहीं होंगे। बच्चे बात मानने लगेंगे। परिवार में किसी को पानी में डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा नहीं होगा। बुरे वक्त में लिया कर्ज उतर जाएगा। आकस्मिक नेत्र रोग से बचाव होगा। नए मकान, वाहन आदि खरीदने के योग बनेंगे।
कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा ----
एक बार त्रिपुर नामक राक्षस ने कठोर तपस्या की, त्रिपुर की तपस्या का प्रभाव जड़-चेतन, जीव-जन्तु तथा देवता भयभीत होने लगे. उस वक्त देवताओं ने त्रिपुर की तपस्या को भंग करने के लिए खूबसूरत अप्सराएं भेजीं लेकिन इसके बावजूद भी वह त्रिपुर की तपस्या को विफल करने में असफल रहीं. त्रिपुर की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी स्वयं उसके सामने प्रकट हुए और उन्होंने त्रिपुर से वर मांगने के लिए कहा. 
     त्रिपुर ने वर मांगते हुए कहा कि 'न मैं देवताओं के हाथ से मरु, न मनुष्यों के हाथ से. ब्रह्मा जी से वर कती प्राप्ति होने के बाद त्रिपुर निडर होकर लोगों पर अत्याचार करने लगा. लोगों पर अत्याचार करने के बाद भी जब उसका मन नहीं भरा तो उसने कैलाश पर्वत पर ही चढ़ाई कर दी. यही कारण था कि त्रिपुर और भगवान शिव के बीच युद्ध होने लगा. भगवान शिव और त्रिपुर के बीच लंबे समय तक युद्ध चलने के बाद अंत में भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से त्रिपुर का वध कर दिया. इस दिन से ही क्षीरसागर दान का अनंत माहात्म्य माना जाता है. 
कार्तिक पूर्णिमा व्रत,पूजा विधि तथा महत्व ---
कार्तिक पूर्णिमा को स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। पूजा-अर्चना की समाप्ति के बाद अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए ।  दान ब्राह्मणो, बहन, भांजे आदि को देना चाहिए। ऐसी मान्यता है की कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। 
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शाम के समय वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु इस मंत्र का उच्चारण करते हुए चाँद देव को अर्घ्य देना चाहिए। एकादशी व् तुलसी विवाह से चली आ रही पंचक व्रत कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होती है। तो प्रेम से बोलिए भगवान विष्णु जी की जय हो।  आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं। इसीलिए दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा बिना विष्णु, श्रीगणेश के साथ की जाती है। लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह विष्णु स्वरूप शालिग्राम से होता है। इसी खुशी में देवता स्वर्गलोक में दिवाली मनाते हैं इसीलिए इसे देव दिवाली कहा जाता है।

सफलता का मंत्र---
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम…पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय…..पूर्णमेवावशिष्यते

क्यों किया जाता हें कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान ???
कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बड़ी संख्या में देश की सभी प्रमुख नदियों पर श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचते हैं। प्राचीन काल से ही यह प्रथा चली आ रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान का बड़ा ही महत्व है। आरोग्य प्राप्ति तथा उसकी रक्षा के लिए भी प्रतिदिन स्नान लाभदायक होता है। फिर भी माघ वैशाख तथा कार्तिक मास में नित्य दिन के स्नान का खास महत्व है। खासकर गंगा स्नान से।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  यह व्रत शरद पूर्णिमा से आरंभ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को संपन्न किया जाता है। इसमें स्नान कुआं, तालाब तथा नदी आदि में करना ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। कुरुक्षेत्र, अयोध्या तथा काशी आदि तीर्थों पर स्नान का और भी अधिक महत्व है। भारत के बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटी-छोटी बस्तियों में भी अनेक स्त्रीपुरुष, लड़के-लड़कियां कार्तिक स्नान करके भगवान का भजन तथा व्रत करते हैं। सायंकाल के समय मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीप जलाये जाते हैं। लंबे बांस में लालटेन बांधकर किसी ऊंचे स्थान पर कंडीलें प्रकाशित करते हैं। इन व्रतों को स्त्रियां तथा अविवाहित लड़कियां बड़े मनोयोग से करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे कुवांरी लड़कियों को मनपसंद वर मिलता है। तथा विवाहित स्त्रियों के घरों में सुख-समृद्धि आती है। 
जानिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी स्नान क्यों किया जाता है?
इसके कई कारण हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास को बहुत पवित्र और पूजा-अर्चना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। पुण्य प्राप्त करने के कई उपायों में कार्तिक स्नान भी एक है। पुराणों के अनुसार इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में किसी पवित्र नदी में स्नानकर भगवान विष्णु या अपने इष्ट की आराधना करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  ऐसा माना जाता है कलियुग में कार्तिक पूर्णिमा पर विधि-विधान से नदी स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।
       कार्तिक महीने में नदी स्नान का धार्मिक महत्व तो है साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्षा ऋतु के बाद मौसम बदलता है और हमारा शरीर नए वातावरण में एकदम ढल नहीं पाता। ऐसे में कार्तिक मास में सुबह-सुबह नदी स्नान करने से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है जो कि पूरा दिन साथ रहती है। जिससे जल्दी थकावट नहीं होती और हमारा मन कहीं ओर नहीं भटकता। साथ ही जल्दी उठने से हमें ताजी हवा से प्राप्त होती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही फायदेमंद होती है। ऐसे में ताजी और पवित्र नदी स्नान से कई शारीरिक बीमारियां भी समाप्त हो जाती है।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।
कार्तिक पूर्णिमा का क्यों हें इतना महत्व —-
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष पंद्रह पूर्णिमाएं होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर १६ हो जाती है।कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है । इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फाल मिलता है।
      कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। इस दिन किये जाने वाले अन्न, धन एव वस्त्र दान का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी दान किया जाता हैं उसका कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो कुछ दान करता है वह उसके लिए स्वर्ग में संरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में उसे पुनःप्राप्त होता है।
      मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान यानी बछड़ा दान करने से शिवपद की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है. इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी.वैष्णव मत में इस कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है क्योंकि इस दिन ही भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था. इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी (Maha kartiki Purnima) भी कहा गया है. यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है. अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है. इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है. कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा(KartikTripuri Poornima) के नाम से भी जाना जाता है. इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे. ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका नक्षत्र में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है.शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इसमें कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
दीप दान का है महत्व----
मत्स्य पुराण के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप-दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। इसलिए इस दिन ब्राह्मणों को विधिवत आदर भाव से निमंत्रित करके भोजन कराना चाहिए।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुर्नजन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि के वक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवप्रद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पति बढ़ती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरंभ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।
सिख धर्म के लिए भी खास है कार्तिक पूर्णिमा का दिन-----
सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानक। गुरु नानकदेव से मोक्ष तक पहुँचने के एक नए मार्ग का अवतरण होता है। इतना प्यारा और सरल मार्ग कि सहज ही मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है।गुरू नानक जयन्‍ती, 10 सिक्‍ख गुरूओं के गुरू पर्वों या जयन्तियों में सर्वप्रथम है। यह सिक्‍ख पंथ के संस्‍थापक गुरू नानक देव, जिन्‍होंने धर्म में एक नई लहर की घोषणा की, की जयन्‍ती है।गुरू नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) है। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं।
      गुरु नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु माने जाते हैं। इन्हें सिख धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। गुरु नानक जी का जन्मदिन प्रकाश दिवस के रूप में "कार्तिक पूर्णिमा" के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष गुरु नानक जयंती 12 नवंबर, 2019 को मनाई जाएगी। इस दिन जगह-जगह जुलूस निकाले जाते हैं और गुरुद्वारों में "गुरु ग्रंथ साहिब" का अखंड पाठ किया जाता है।
    कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि का विशेष महत्व होता है. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन दान का फल दोगुना या उससे भी ज्यादा मिलता है.शायद आप जानते नहीं होंगे कि कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था|
जन्म - 
  • श्री गुरु नानक देव जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी गांव में कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन 1469 को राएभोए के तलवंडी नामक स्थान में, कल्याणचंद (मेहता कालू) नाम के एक किसान के घर गुरु नानक का जन्म हुआ था। उनकी माता का नाम तृप्ता था। तलवंडी को ही अब नानक के नाम पर ननकाना साहब कहा जाता है, जो पाकिस्तान में है...गुरु नानक देव जी बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। बहुत कम आयु से ही उन्होंने भ्रमण द्वारा अपने उपदेशों और विचारों को जनता के बीच रखा।
  • गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। 
  • संत साहित्य में नानक अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।
  • सिक्‍ख समाज में कई धर्मों के चलन व विभिन्‍न देवताओं को स्‍वीकार करने के प्रति अरुचि ने व्‍यापक यात्रा किए हुए नेता को धार्मिक विविधता के बंधन से मुक्‍त होने, तथा एक प्रभु जो कि शाश्‍वत सत्‍य है के आधार पर धर्म स्‍थापना करने की प्रेरणा दी। 

इस कार्तिक पूर्णिमा पर करें ये उपाय/टोटके---(कार्तिक पूर्णिमा को ये उपाय करने से मां लक्ष्मी होगी प्रसन्न)---
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक मास में शुद्ध घी, तिलों के तेल और सरसों के तेल का दीपक जलाने से अश्वतमेघ यज्ञ जितना पुण्य प्राप्त होता है। इस माह में दीपदान करने से भगवान विष्णुक भी प्रसन्नन होते हैं। 
हिंदू धर्म शास्त्रों में भी कहा गया है कि – मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्यु: कपर्दका:।
अर्थात किसी व्यक्ति के पास धन-संपत्ति का अभाव होने पर उसके मित्र भी उसका साथ छोड़ देते है। प्राचीन मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी को ऐश्वर्य और वैभव की देवी कहा गया है। परंतु व्यक्ति को वैभव, ऐश्वर्य के साथ आनंद और सुख तभी मिलता है जब वह पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ धन कमाता है।

  1. इस महीने में लक्ष्मी जी के समक्ष दीप जलाने का भी अत्यधिक महत्व है। यह दीप जीवन के अंधकार को दूर कर, आशा की रोशनी देने का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक माह में घर के मंदिर, नदी के तट एवं शयन कक्ष में दीप जलाने का महत्व पाया गया है।
  2. यमुना जी पर कार्तिक स्नान का समापन करके भगवान श्री कृष्ण जी का राधा जी सहित पूजन करके दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से श्री कृष्ण जी की भक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा के महापर्व का लाभ उठाएं। इस पुनीत अवसर पर श्रद्धा तथा विश्वास पूर्वक पूजा पाठ और हवन इत्यादि करें।
  3. कार्तिक के पूरे माह में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके तुलसी को जल चढ़ाने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस माह में तुलसी के पौधे को दान करना भी शुभ माना गया है।
  4. माँ लक्ष्मी को गन्ना, अनार व सीताफल चढ़ाएँ। 
  5. सम्भव हो तो इस दिन मंदिर में भंडारा करवाएं। 
  6. दीपदान संध्याकाल में ही करें।
  7. कार्तिक माह में तुलसी का पूजन और सेवन करने से घर में सदा सुख-शांति बनी रहती है। तुलसी की कृपा से आपके घर से नकारात्मसक शक्ति दूर रहती है।
  8. इन दिनों दरिद्रता के नाश के लिए पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें।
  9. शाम के समय ‘वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरू’ मंत्र बोलते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान श्रेष्ठ कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के संबंध में ऋषि अंगिरा ने लिखा है कि इस दिन सबसे पहले हाथ-पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें। 
  10. यदि स्नान में कुश और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फलों से सम्पूर्ण पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  दान देते समय जातक हाथ में जल लेकर ही दान करें। स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है गृहस्थ व्यक्ति को तिल व आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है। 
  11. विधवा तथा सन्यासियों को तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मिट्टी को लगाकर स्नान करना चाहिए। इस दौरान भगवान विष्णु के ऊं अच्युताय नम:, ऊं केशवाय नम:, ऊॅ अनंताय नम: मन्त्रों का जाप करना चाहिए। 
  12. पूर्णिमा मां लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहती है। पूर्णिमा को प्रात: 5 बजे से 10:30 मिनट तक मां लक्ष्मी का पीपल के वृक्ष पर निवास रहता है। इस दिन जो भी जातक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है उस पर मां लक्ष्मीप्रसन्न होती है। 
  13. प्रातः काल उठकर व्रत रहने का संकल्प लें। 
  14. गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कीजिए। 
  15. श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। 
  16. श्री रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें। 
  17. इस पवित्र दिन पर चंद्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, प्रीति, अनुसुइया तथा छमा इन 6 कृतिकाओं का पूजन करें।
  18. कार्तिक पूर्णिमा के गरीबों को चावल दान करने से चन्द्र ग्रह शुभ फल देता है। इस दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिलकार चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते है। 
  19. ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक पूर्णिमा को घर के मुख्यद्वार पर आम के पत्तों से बनाया हुआ तोरण अवश्य बांधे। वैवाहिक व्यक्ति पूर्णिमा के दिन भूलकर भी अपनी पत्नी या अन्य किसी से शारीरिक सम्बन्ध न बनाएं, अन्यथा चन्द्रमा के दुष्प्रभाव आपको व्यथित करेंगे। 
  20. आज के दिन चन्द्रमा के उदय होने के बाद खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें। 

जानिए क्या हैं श्रीयंत्र, श्रीयंत्र का महत्व एवम श्री यंत्र निर्माण एवम सिद्ध करने का तरीका

ऐसा होता हैं श्रीयंत्र का स्वरूप--
श्रीयंत्र अपने आप में रहस्यपूर्ण है। यह सात त्रिकोणों से निर्मित है। मध्य बिन्दु-त्रिकोण के चतुर्दिक् अष्ट कोण हैं। उसके बाद दस कोण तथा सबसे ऊपर चतुर्दश कोण से यह श्रीयंत्र निर्मित होता है। यंत्र ज्ञान में इसके बारे में स्पष्ट किया गया है-
चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चके्र पंचाभिः।
नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः॥

श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो लक्ष्मी का त्रिकोण माना जाता है। इस लक्ष्मी के त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो भगवती का सूचक है। साधक को इस बिन्दु पर स्वर्ण सिंहासनारूढ़ भगवती लक्ष्मी की कल्पना करनी चाहिए।
इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है और श्री यंत्र की पूजा इन सारी शक्तियों की समग्र पूजा है।श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।
अद्भुत त्रिकोण----
चमत्कारी साधनाओं में श्रीयंत्र का स्थान सर्वोपरि है तथा मंत्र और तंत्र इसके साधक तत्व माने गए हैं। श्रीयंत्र सब सिद्धियों का द्वार है तथा लक्ष्मी का आवास है जिसमें अपने-अपने स्थान, दिशा, मंडल, कोण आदि के अधिपति व्यवस्थित रूप से आवाहित होकर विराजमान रहते हैं। मध्य में उच्च सिंहासन पर प्रधान देवता प्राण प्रतिष्ठित होकर पूजा प्राप्त करते हैं। श्रीयंत्र के दर्शन मात्र से साधक मनोरथ को पा लेता है।
    शास्त्रकारों ने इस बात पर बल दिया है कि जिस प्रकार शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं होता है उसी प्रकार श्रीयंत्र और लक्ष्मी में कोई भेद नहीं होता है। भारतीय तंत्र विधा का आधार अध्यात्म है। इस विधा की प्राचीनता ऋग्वेद से पहचानी जा सकती है। वैदिक जीवन चर्या में पूजन, यज्ञ तथा तंत्र में साधना का अपना विशेष स्थान था। पूजन पद्धतियों का उपयोग जीवन को शांत, उन्नातिशील, ऐश्वर्यवान बनाने के लिए होता था। 
   भौतिक जीवन में खुशहाली लाने के निमित्त श्रीयंत्र का निर्माण हुआ। श्रीयंत्र दरिद्रता रूपी स्थितियों को समाप्त करता है। ऋण भार से दबे साधकों के लिए यह रामबाण है। पूर्व जन्म के दुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम योग, काक योग, दरिद्र योग, शकट योग, ऋण योग, दुयोग एवं ऋणग्रस्त योग आदि अशुभ योग मनुष्य को ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन-ऐश्वर्य देने वाले यंत्रराज श्रीयंत्र की बड़ी महत्ता है। जिस प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्र देवता का निवास स्थान माना गया है। यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। श्रीयंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। यह धन की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर-सुंदरी का यंत्र है। इसे षोडशी यंत्र भी कहा जाता है। 
जानिए क्या हैं श्रीयंत्र, श्रीयंत्र का महत्व एवम श्री यंत्र निर्माण एवम सिद्ध करने का तरीकाKnow-what-is-Shriyantra-importance-of-Sriyantra-and-how-to-prove-and-build-Shri-Yantraश्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं। ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं। यह यंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है।  श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं – सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 4 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।
    श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।
प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व---
इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है। फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है। अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।
श्रीयंत्र निर्माण--
श्रीयंत्र कई प्रकार से निर्मित तथा कई रूपों में उपलब्ध होता है। विभिन्न प्रकार से अंकित श्रीयंत्रों का प्रभाव भी अलग-अलग तरह का होता है। सबसे विशेष बात यह है कि ताम्र पत्र पर अंकित और पारद निर्मित प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही सबसे अधिक प्रभावकारी होते हैं।
     श्रीयंत्र का निर्माण और उसकी प्राण प्रतिष्ठा ही श्रीयंत्र के प्रभावशाली होने का सबसे बड़ा स्रोत है। वैसे तो आजकल सभी जगह श्रीयंत्र उपलब्ध है परन्तु उनकी विश्वसनियता नहीं है। श्रीयंत्र निर्माण अपने आप में जटिल प्रक्रिया है, और जब तक सही रूप में यंत्र उत्कीर्ण नहीं होता, तब तक उससे सफलता भी संभव नहीं। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र के स्थापन से साधक शीघ्र लाभ प्राप्ति की स्थिति को प्राप्त करता है। श्रीयंत्र चाहे ताम्र पत्र पर उत्कीर्ण हो, चाहे पारद निर्मित श्रीयंत्र हो उसके प्राण प्रतिष्ठित होने पर ही उसका लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
श्रीयंत्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आप जब भी घर में श्रीयंत्र स्थापित करें तो प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही स्थापित करें।
सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित श्री यंत्र ( भोजपत्र पर,गोल्ड प्लेटेड,चांदी का,पारद का ,स्फटिक का, स्वर्ण का  प्राप्ति हेतु संपर्क करें---
मोब.--09039390067
जानिए कब करें श्रीयंत्र की स्थापना ---
श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अपने घर में किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। ‘ तंत्र समुच्चय’ के अनुसार किसी भी बुधवार को प्रातः श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। इसकी स्थापना का विधान बहुत ही सरल है, शास्त्रों में इसके स्थापन का जो विधान है, वह आगे स्पष्ट किया जा रहा है।
      शास्त्रों के अनुसार मंत्र सिद्ध चैतन्य श्रीयंत्र की नित्य पूजा आवश्यक नहीं है और न ही नित्य जल से स्नान आदि कराने की जरूरत है। यदि संभव हो, तो इस पर पुष्प, इत्र आदि समर्पित किया जा सकता है और नित्य इसके सामने अगरबत्ती व दीपक जला देना चाहिए, परन्तु यह अनिवार्य नहीं है। यदि किसी दिन श्रीयंत्र की पूजा नहीं भी होती या इसके सामने अगरबत्ती व दीपक नहीं भी जलाया जाता, तब भी इसके प्रभाव में कोई न्यूनता नहीं आती। शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। अक्षय तृतीया, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, आंवला नवमी आदि श्रेष्ठ दिवसों पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान है।
सुविख्यात 'श्रीयंत्र' भगवती त्रिपुर सुंदरी का यंत्र है। इसे यंत्रराज के नाम से जाना जाता है। श्रीयंत्र में देवी लक्ष्मी का वास माना जाता है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा विकास का प्रतीक होने के साथ मानव शरीर का भी द्योतक है। श्रीयंत्र में स्वतः कई सिद्धियों का वास है। उचित प्रभाव के लिए मंत्र सिद्ध, प्राण प्रतिष्ठायुक्त श्रीयंत्र स्थापित करना या करवाना चाहिए। बिना प्राण प्रतिष्ठायुक्त श्रीयंत्र को ऐसे समझें जैसे खाली मकान।  श्रीयंत्र के सम्मुख प्रतिदिन सामान्य रूप से धूप/ अगरबत्ती तथा घी का दीपक जलाने से लक्ष्मी की सामान्य पूजा होती है। श्रीयंत्र की पूजा से मनोकामना पूर्ति में कोई शंका नहीं रहती। साधक अपनी श्रद्धानुसार लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करे तो लक्ष्मी उस पर प्रसन्ना होकर अभीष्ट लाभ प्रदान कर उसे संतुष्ट करेगी। 
गले की चेन या लॉकेट में पहने गए यंत्र ज्यादा प्रभावशाली रहते हैं। क्योंकि उनमें पवित्रता स्थायी रूप से बनी रहती है। भोजपत्र पर अष्टगंध से श्रीयंत्र बनाकर यदि बटुए में रखा जाए तो बटुआ रुपयों से भरा रहता है। धन की बरकत होती है। 
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यह हैं श्रीयंत्र स्थापना हेतु पूजन विधान---
इस यंत्र को पूजा स्थान के अलावा अपनी अलमारी में भी रखा जा सकता है, फैक्टरी या कारखाने अथवा किसी महत्वपूर्ण स्थान पर भी स्थापित किया जा सकता है। जिस दिन से यह स्थापित होता है, उसी दिन से साधक को इसका प्रभाव अनुभव होने लगता है। श्रीयंत्र का पूजन विधान बहुत ही सरल और स्पष्ट है। स्नान, ध्यान शुद्ध पीले रंग के वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर पीले या सफेद आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने एक बाजोट स्थापित कर उस पर लाल वस्त्र बिछा लें। गृहस्थ व्यक्तियों को श्रीयंत्र का पूजन पत्नी सहित करना सिद्धि प्रदायक बताया गया है। आप स्वयं अथवा पत्नी सहित जब श्रीयंत्र का पूजन सम्पन्न करें तो पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ ही पूजन सम्पन्न करें।
साधना में सफलता हेतु गुरु पूजन आवश्यक है। अपने सामने स्थापित बाजोट पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और हाथ जोड़कर गुरु का ध्यान करें –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

इसके पश्चात् चावलों की ढेरी बनाकर उस पर एक सुपारी गणपति स्वरूप स्थापित कर लें। गणपति का पंचोपचार पूजन कुंकुम, अक्षत, चावल, पुष्प, इत्यादि से करें। बाजोट या पटिये पर एक ताम्रपात्र में पुष्पों का आसन देकर श्रीयंत्र (ताम्र/पारद या जिस स्वरूप में हो) स्थापित कर लें।इसके बाद एकाग्रता पूर्वक श्री यंत्र का ध्यान करें –
दिव्या परां सुधवलारुण चक्रयातां
मूलादिबिन्दु परिपूर्ण कलात्मकायाम।
स्थित्यात्मिका शरधनुः सुणिपासहस्ता
श्री चक्रतां परिणतां सततां नमामि॥

श्री यंत्र ध्यान के पश्चात् श्रीयंत्र प्रार्थना करनी चाहिए। यदि नित्य इस प्रार्थना का 108 बार उच्चारण किया जाए, तो अपने आप में अत्यन्त लाभप्रद देखा गया है –
धनं धान्यं धरां हर्म्यं कीर्तिर्मायुर्यशः श्रियम्।
तुरगान् दन्तिनः पुत्रान् महालक्ष्मीं प्रयच्छ मे॥

ध्यान-प्रार्थना के पश्चात् श्रीयंत्र पर पुष्प अर्पित करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –
ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्तयै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ शेषाय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ रत्नद्वीपाय नमः। ॐ भैरवे नमः। ॐ नन्दनवनाय नमः। ॐ कल्पवृक्षाय नमः। ॐ विचित्रानन्दभूम्यै नमः। ॐ रत्नमन्दिराय नमः। ॐ रत्नवेदिकायै नमः। ॐ धर्मवारणाय नमः। ॐ रत्न सिंहासनाय नमः।

कमलगट्टे की माला से लक्ष्मी बीज मंत्र की एक माला मंत्र जप करें।
लक्ष्मी बीज मंत्र----

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥

सबसे प्रभावपूर्ण एवं सर्वाधिक लाभप्रद लक्ष्मी बीज मंत्र है, जिसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया है और जिन व्यक्तियों को भी मैंने इस बीज मंत्र के बारे में बताया है, उन्हें भी यह लक्ष्मी बीज मंत्र विशेष अनुकूल रहा है। लक्ष्मी से सम्बन्धित ग्रंथों के अनुसार यदि मंत्रसिद्ध श्रीयंत्र के सामने ‘ कमलगट्टे की माला ’ से नित्य लक्ष्मी बीज मंत्र का एक माला मंत्र जप किया जाए, तो आश्चर्यजनक प्रभाव देखने को मिलता है।
मंत्र जप के पश्चात् साधक लक्ष्मी आरती सम्पन्न कर, अपनी मनोकामना प्रकट करें।
   वस्तुतः आर्थिक उन्नति तथा भौतिक सुख-सम्पदा के लिए तो श्रीयंत्र से बढ़ कर कोई यंत्र संसार में है ही नहीं। वास्तव में वह घर दुर्भाग्यशाली है, जिस घर में श्रीयंत्र स्थापित नहीं है।इसमें कोई दो राय नहीं, कि श्री यंत्र में स्वतः ही कई सिद्धियों का वास है। श्रीयंत्र जिस घर में स्थापित कर इसकी पूजा की जाती है, तो उस घर में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। आर्थिक उन्नति तथा व्यापारिक सफलता के लिए तो यह यंत्र बेजोड़ है।
इसके अतिरिक्त ॠण मुक्ति, रोग निवृत्ति, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक प्रसन्नता और आर्थिक सफलता प्राप्ति के लिए यह यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त प्रामाणिक श्रीयंत्र को घर में स्थापित कर देना ही पर्याप्त है, क्योंकि मात्र स्थापित करने से ही यह असीम सफलता देने में सहायक बन जाता है।
वस्तुतः श्री यंत्र पर जितना भी लिखा जाए, कम है। भौतिक और आर्थिक उन्नति के लिए इससे बढ़ कर कोई अन्य यंत्र या साधन नहीं है।
श्रीयंत्रों में विशेष – पारद श्रीयंत्र
पारद श्रीयंत्र तो अपने आप में ही भव्य और अद्वितीय माना जाता है, इसलिए कि इसका प्रभाव तुरंत और अचूक होता है, इसलिए कि जिस घर में भी पारद श्रीयंत्र होता है, उस घर में गरीबी रह ही नहीं सकती, जिस घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, उसके घर में ॠण की समस्या संभव ही नहीं है, जिस घर में अपनी भव्यता के साथ पारद श्रीयंत्र स्थापित है, उसके घर में आठों लक्ष्मियां अपने सम्पूर्ण वेग के साथ आबद्ध रहती ही हैं।
    पारद भगवान शिव का विग्रह कहलाता है, समस्त देवताओं का पुंजीभूत स्वरूप पारे को माना गया है, और लक्ष्मी ने स्वयं स्वीकार किया है, कि ‘‘पारद ही मैं हूं और मेरा ही दूसरा स्वरूप पारद है। ’’ जब पारद श्रीयंत्र को स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बन सकती है, यदि हम विधि-विधान के साथ पारद श्रीयंत्र को धन त्रयोदशी के दिन अपने घर में, दुकान में, कार्यालय में या व्यापारिक प्रतिष्ठान में स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में श्रेष्ठता, भव्यता और पूर्णता की ही उपलब्धि है।
     लक्ष्मी सूक्त के अनुसार इस पारद श्रीयंत्र को अपने घर में स्थापित कर इसके दर्शन करें, और श्रद्धा के साथ इसको अपने घर में स्थापित करें, तो निश्चय ही यह आपके लिए इस वर्ष की महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी। श्रीयंत्र, विशेषकर पारद श्रीयंत्र के माध्यम से तो आठों प्रकार की लक्ष्मियां पूर्ण रूप से आबद्ध होकर, उसे स्थापित करने वाले व्यक्ति के घर अपना प्रभाव देती ही हैं, संतान लक्ष्मी, व्यापार लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, स्वास्थ्य लक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी और आयु लक्ष्मी के साथ-साथ जीवन के अभाव, जीवन की दरिद्रता और जीवन के कष्ट दूर करने में इस प्रकार का श्रीयंत्र अपने आप में ही अनुकूलता और भव्यता प्रदान करता है।
‘ श्रीसूक्त ’ के अनुसार जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, स्वतः ही वहां पर लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र होता है, अपने आप में वह व्यक्ति रोग-रहित एवं ॠण-मुक्त होकर जीवन में आनन्द एवं पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है।
श्रीयंत्र कई प्रकारों में मिलता है, चन्दन पर अंकित श्रीयंत्र सफेद आक पर अंकित श्रीयंत्र, ताम्र पत्र पर अंकित श्रीयंत्र, पारद निर्मित श्रीयंत्र और यदि गणना की जाए तो लगभग 108 तरीकों से श्रीयंत्र अंकित किए जाते हैं, सबका अलग-अलग महत्व है, अलग-अलग विधान है।
सामान्य तय यंत्रों को यद्यपि मंत्रों से अलग माना जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि यंत्र यदि शिवरूप हैं तो मंत्र उनकी अंतर्निहित शक्ति है जो डन्हें संचालित करती है और जीवन के सभी साध्यों की प्राप्ति का साधन बनती है। इस लेख में यंत्र में अंकित विभिन्न रूपाकारों की दार्शनिकता एवं रहस्यों के वैज्ञानिक आधार का निरूपण और रहस्योद्घाटन किया गया है।
     यंत्र एक प्रकार से सुरक्षा कवच है और यह सही नक्षत्र और तिथि में कागज पर, भोजपत्र पर या तांबे पर बनाया जाता है जो ग्रह मारक या बाधक हो उस ग्रह की पूजा यंत्र द्वारा करें। युद्ध दशा-अंतर्दशा प्रत्यंतर्दशा में यंत्र लाभदायक होते हैं। यंत्र को मंत्र का रूप माना जाता है। यंत्र-रचना मात्र रेखांकन नहीं है बल्कि उसमें वैज्ञानिक तथ्य भी है। कुछ यंत्र रेखा प्रधान होते हैं, कुछ आकृति प्रधान और कुछ संख्या प्रधान होते है। कुछ यंत्रों में बीजाक्षरों का प्रयोग होता है। बीजाक्षर एक संपूर्ण यंत्र होता है। हर ग्रह का यंत्र अलग होता है। यह यंत्र केवल दीपावली, होली या ग्रहणकाल में ही बनाकर सिद्ध किया जा सकता है यदि स्वयं निर्माण कर सकते हैं तो ठीक, नहीं तो किसी विद्वान से इन्हें बनवा सकते हैं।
जानिए की यंत्र किस सिद्धांत पर कार्य करते हैं?
तंत्र के अनुसार यंत्र मे चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है लेकिन श्री यंत्र बिना सिद्ध किए नहीं रखना चाहिए। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। 
      यंत्र देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए यंत्र-साधना को सबसे सरल विधि माना जाता है। तंत्र के अनुसार यंत्र मंे चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। यंत्र मुख्यतः तीन सिद्धांतों का संयुक्त रूप हैं- आकृति रूप, क्रिया रूप, शक्ति रूप ऐसी मान्यता है कि वे ब्रह्मांड के आंतरिक धरातल पर उपस्थित आकार व आकृति का प्रतिरूप हैं। जैसा कि सभी पदार्थों का बाहरी स्वरूप कैसा भी हो, उसका मूल अणुओं का परस्पर संयुक्त रूप ही हैं। इस प्रकार यंत्र में, विश्व की समस्त रचनाएं समाहित हैं। यंत्र को विश्व-विशेष को दर्शाने वाली आकृति कहा जा सता हैं। ये सामान्य आकृतियां ब्रह्ममांड से नक्षत्र का अपनी एक विशेष आकृति रूप-यंत्र होता हैं। यंत्रों की प्रारंभिक आकृतियां मनोवैज्ञानिक चिन्ह हैं जो मानव की आंतरिक स्थिति के अनुरूप उसे अच्छे बुरे का ज्ञान, उसमें वृद्धि या नियंत्रण को संभव बनाती हैं। इसी कारण यंत्र क्रिया रूप हैं। ‘‘यंत्र’’ की निरंतर निष्ठापूर्वक पूजा करने से ‘आंतरिक सुषुप्तावस्था समाप्त होकर आत्मशक्ति जाग्रत होती हैं और आकृति और क्रिया से आगे जाकर ‘‘शक्ति रूप उत्पन्न होता हैं। जिससे स्वतः उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन का मानसिक अनुभव होने लगता हैं। इस स्थिति पर आकर सभी रहस्य खुल जाते हैं।
    यंत्र विविध प्रकार में उपलब्ध होते हैं कूर्मपृष्ठीय यंत्र, धरापृष्ठीय यंत्र, मेरुपृष्ठीय यंत्र, मत्स्ययंत्र, मातंगी यंत्र, नवनिधि यंत्र, वाराह यंत्र इत्यादि यह यंत्र स्वर्ण, चांदी तथा तांबे के अतिरिक्त स्फटिक एवं पारे के भी होते हैं. सबसे अच्छा यंत्र स्फटिक का कहा जाता है यह मणि के समान होता है. भक्त, संत, तांत्रिक संन्यासी सभी इस यंत्र की प्रमुखता को दर्शाते हें तथा इन्हें पूजनीय मानते हैं.
    यंत्रों में मंत्रों के साथ दिव्य अलौकिक शक्तियां समाहित होती हैं. इन यंत्रों को उनके स्थान अनुरूप पूजा स्थान, कार्यालय, दुकान, शिक्षास्थल इत्यादि में रखा जा सकता है. यंत्र को रखने एवं उसकी पूजा करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है और सफलता प्राप्त होती है. श्रीयंत्र विभिन्न आकार के बनाए जाते हैं जैसे अंगूठी, सिक्के, लॉकेट या ताबीज रुप इत्यादि में देखे जा सकते हैं.
    यंत्र शास्त्र के अतंर्गत कई ऐसे दुर्लभ यंत्रों का वर्णन है जिनका विधि-विधान से पूजन करने से अभिष्ट फल की सिद्धि होती है, यंत्र की चल या अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा की जा सकती है यह यंत्र धन प्राप्ति, शत्रु बाधा निवारण, मृत्यंजय जैसे कार्यों लिए रामबाण प्रयोग होते हैं. अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध, ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ यह यंत्र जीवन को सुख व सौम्यता से भर देता है.
  यद्यपि यंत्र का स्थूल अर्थ समझना सरल हैं। परंतु इसका आंतरिक अर्थ समझना सरल नहीं, क्योंकि मूलतः श्रद्धापूर्वक किये गए प्रयासों के आत्मिक अनुभव से ही इसे जाना जा सकता हैं। यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा पंचगव्य, पंचामृत एवं गंगाजल से पवित्र करके संबंधित मंत्र से की जाती हैं। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर नहीं रखा जाता। ऐसा करने से नकारात्मक किरणों के प्रभाव से हानि होने की संभावना रहती हैं। पूजा हेतु मार्गदर्शन, अनेक प्रकार के यंत्रों को एक बार प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात् नियमित पूजा की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवन पर्यंत रखे जा सकते हैं। यंत्रों पर आधारित कुछ विशेष मंदिर यंत्रों की अदभुत महिमा को देखते हुए, यहां प्राचीन काल से ही यंत्रों पर आधारित मंदिरों का निर्माण किया जाता रहा हैं।  यह भी मान्यता रही है कि जो मंदिर यंत्र आधारित होते हैं, वे अपना विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं। 
ऐसे ही कुछ मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास--
  1. श्री यंत्र मंदिर:—- यह श्री यंत्र मंदिर हरिद्वार के कनखल नामक स्थान का विशेष मंदिर हैं। यह मंदिर अपने आप में अदभुत कला का आदर्श नमूना हैं। इस मंदिर में विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी की पूजा की जाती हैं। इसकी इस्थापना मेरे दीक्षा गुरु परम पूजनीय ब्रह्मलीन स्वामी विशदेवनंद जी द्वारा कुम्भ 2010  में संपन्न हुयी थी | इस मंदिर में माँ त्रिपुरा सुंदरी की बहुत दिव्य प्रतिमा विराजित हैं |
  2. आयल का मेंढक मंदिर भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर हैं। यह मंदिर उत्तरप्रदेश में लखनऊ के आॅयल कस्बे में हैं। मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर हैं। इसका निर्माण राज्य को सूखे व बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाने के उद्देश्य से किया गया था। मंडूक यंत्र पर आधारित यह मंदिर ग्यारहवीं शती के शासकों के द्वारा किया गया था। इसकी रचना तंत्रवाद पर आधारित हैं। इसकी परिकल्पना एक प्रसिद्ध तांत्रिक ने की थी।

यंत्रों की उपयोगिता यंत्र देवशक्तियों के प्रतिक हैं। जो व्यक्ति मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकते, उनके लिए पूजा में यंत्र रखने से ही मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक यंत्र का अपना अलग महत्व है। कई यंत्र हमें सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। प्राचीन काल से ही, भारतीय संस्कृति में सुख-समृद्धि, दीर्घजीवन, एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए, यंत्र, तंत्र-मंत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं। विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक महत्व की आकृतियों यंत्र के रूप में, सोने, चांदी, तांबा, अष्टधातु अथवा भोज पत्र पर विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करने के लिए बनाई जाती हैं।
     मनुष्य अपनी जिज्ञासु प्रवृति के कारण प्रकृति एवं ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में जानने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। यह भी सर्वमान्य एवं सर्वविदित है कि ब्रह्मांड में स्थित समस्त चर अचर जगत में आपसी संबंध है तथा समस्त ब्रह्मांड एक लयबद्ध तरीके से निश्चित नियमों के आधार पर कार्य करता है। भारतीय वैदिक शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड की समस्त क्रियायें ब्रह्ममांड में स्थित विभिन्न शक्तियों द्वारा संचालित की जाती है। चूंकि मनुष्य भी इसी ब्रह्मांड का एक प्रमुख भाग है अतः मानव जीवन भी बहुत हद तक इन्ही शक्तियों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है। ये शक्तियां मनुष्यों के जीवन को उनके कर्मों के अनुसार नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। अतः मानव जीवन के संचालन में इन शक्तियों की अहम भूमिका होती है। भारतीय वैदिक साहित्य में ऐसी अनेक विधियों का वर्णन मिलता है जिसके माध्यम से इन शक्तियों का आवाहन किया जा सकता है तथा इनकी कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
यह हैं यंत्रों के संक्षिप्त शब्द व अंक—-
यंत्रों के संक्षिप्त शब्द एवं अंक वास्तव में देवी और देवता होते हैं जैसे कि विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि भ्2व् का अर्थ है अर्थात पानी जबकि सामान्यजन नहीं जान पाते हैं इसी प्रकार यंत्रों में उल्लिखित शब्द ह्रीं, क्रीं, श्रीं और क्लीं का क्या अर्थ है एक ज्योतिषी या तांत्रिक ही जान सकता है यह सब देवी के संक्षिप्त नाम हैं जैसे ह्रीं का अर्थ बगलामुखी देवी, क्रीं का अर्थ महाकाली से, श्रीं का अर्थ महालक्ष्मी से, क्लीं का अर्थ भगवती दुर्गा से है।
इसी प्रकार से यंत्रों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले चिह्न बिंदु का अर्थ ब्रह्म से, त्रिकोण का अर्थ है शिव एवं भूपूर का अर्थ भगवती से होता है।
यंत्रों में श्रद्धा एवं विश्वास का प्रभाव :—-
यंत्र तभी अपना कार्य करते हैं जब इनको निर्माण करने वाला साधक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ पूर्ण मनोयोग एवं पवित्रता के साथ तथा नियमों की जानकारी प्राप्त करके करता है। यदि यंत्र के निर्माण में संदेह होगा तो यंत्र मृत हो जायेगा। इसी के साथ यंत्रों के निर्माण में उपरोक्त बातों एवं अन्य नियमों का ध्यान रखना चाहिए अन्यथा यंत्र निर्माण करने वाले को हानि भी पहुंचा देते हैं। यंत्र ऊर्जा विज्ञान का एक शक्तिशाली माध्यम है। यंत्र विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए निर्मित किये जाते हैं।
    इनका वर्गीकरण होता है परंतु उनका शास्त्रानुसार प्रयोग, कोई विषम स्थिति न हो तो, अच्छे कार्यों में ही करना चाहिए जिनका विवरण निम्न प्रकार है- शांतिकर्म यंत्र: यह वह यंत्र होते हैं जिनका उद्देश्य कल्याणकारी और शक्तिप्रद कार्यों के लिए किया जाता है। इससे किसी का अहित नहीं किया जा सकता है। इनका मूल प्रयोग रोग निवारण, ग्रह-पीड़ा से मुक्ति, दुःख, गरीबी के नाश हेतु, रोजगार आदि प्राप्त करने में किया जाता है जैसे श्रीयंत्र।

  • स्तंभन यंत्र:—– आग, हवा, पानी, वाहन, व्यक्ति, पशुओं आदि से होने वाली हानि को रोकने के लिए इस प्रकार के यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग करने से उपरोक्त कारणों से आई हुई विपदाओं का स्तंभन किया जाता है अर्थात उन पर रोक लगाई जाती है।
  • सम्मोहन यंत्र:—ये यंत्र वह होते हैं जिनसे किसी वस्तु या मनुष्य को सम्मोहित किया जाता है। उच्चाटन यंत्र: ये यंत्र वह होते हैं जिनसे प्राणी में मानसिक अस्थिरता, भय, भ्रम, शंका और कार्य से विरत रहने का कार्य लिया जाता है। इन यंत्रों का प्रयोग वर्जित माना जाता है।
  • वशीकरण हेतु यंत्र:—-इन यंत्रों के द्वारा प्राणियों, प्रकृति में उपस्थित तत्वों का वशीकरण किया जाता है। इनके प्रयोग से संबंधित व्यक्ति धारण करने वाले के निर्देशों, आदेशों का पालन करते हुए उसके अनुसार आचरण करने लगता है।
  • आकर्षण हेतु यंत्र:—–सम्मोहन, वशीकरण, इस यंत्र में बहुत मामूली-सा अंतर है। सामान्यतः ये तीनों एक ही यंत्र हैं पर आकर्षण यंत्र के प्रयोग से दूरस्थ प्राणी को आकर्षित कर अपने पास बुलाया जाता है।
  • जुम्मन हेतु यंत्र:—-इस यंत्र के प्रयोग से इच्छित कार्य हेतु संबंधित व्यक्ति को आज्ञानुसार कार्य करने के लिए विवश किया जाता है। इसके प्रभाव में आने से व्यक्ति अपना अस्तित्व भूलकर साधक की आज्ञानुसार कार्य करने लगता है। वास्तव में इसके द्वारा प्राणी में दासत्व की भावना पैदा करके उससे कार्य लिया जाता है।
  • विद्वेषण यंत्र:—-इन यंत्रों के माध्यम से प्राणियों में फूट पैदा करना, अलगाव कराना, शत्रुता आदि कराना होता है। इससे प्राणी की एकता, सुख, शक्ति, भक्ति को नष्ट करना होता है।
  • मारणकर्म हेतु यंत्र:—–इन यंत्रों के द्वारा अभीष्ट प्राणी, पशु-पक्षी आदि की मृत्यु का कार्य लिया जाता है। इसके प्रयोग से संबंधित मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में यह हत्याकर्म है। इन यंत्रों का प्रयोग सपने में भी नहीं करना चाहिए। यह सबसे घृणित यंत्र है।
  • पौष्टिक कर्म हेतु यंत्र:—-किसी का भी अहित किये बिना साधक अपने सिद्ध यंत्रों से अन्य व्यक्तियों के लिए धन-धान्य, सुख सौभाग्य, यश, कीर्ति और मान-सम्मान की वृद्धि हेतु प्रयोग करता है, उन्हें पौष्टिक कर्म यंत्र कहते हैं।

प्रत्येक यंत्र हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उसका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए जातक की जन्मकुंडली में निर्बल योग कारक ग्रह की खोज करके यदि संबंधित यंत्र का प्रयोग करें तो अवश्य ही यथेष्ट लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस लेख में सभी ग्रहों से संबंधित पृथक-पृथक यंत्र और रोग निवारक तेल बनाने की विधि के बारे में बताया गया है। कुंडली में लग्न और चंद्रमा की स्थिति से उपायों की जानकारी मिलती है। ग्रह यदि अग्नि तत्व राशि में है तो यज्ञ, व्रत आदि से लाभ मिलता है।
      हिंदु संस्कृति में मंदिर जो कि देवी-देवताओं के पूजा स्थल होते हैं, इनका निर्माण वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। मंदिरों के स्थान का चयन, मूर्ति स्थापना मंदिरों के उपर स्थित गुंबद एवं ध्वजा आदि सभी का निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार किया जाता है जिससे वहां पर अधिक से अधिक आध्यात्मिक एवं दैवीय कृपा आ सके। हिंदु संस्कृति में देवी देवताओं को आवाहन करने के अनेक तरीके बताए गये हैं। पूजा करते समय बैठने का ढंग ईश्वर के सामने दंडवत, नतमस्तक होना एक स्थान पर ध्यान केंद्रित करना श्वास प्रक्रिया आत्म नियंत्रण आदि ईश्वर की आराधना के मूलभूत तरीके हैं। इनके माध्यम से मनुष्य ईश्वर के समक्ष स्वयं के शरीर एवं मन को पूर्ण रूप से समर्पित करता है। यह कहना अत्यंत सरल है। परंतु इसका पालन करना कठिन होता है। सही अर्थो में देखा जाए तो शरीर एवं मन का ईश्वर को पूर्णतः समर्पण सबसे बड़ा साधन कहा जा सकता है। यदि हम इसमें सफल हो जाते हैं तो दैवीय शक्तियों की कृपा पात्र अवश्य बनते हैं इसमें कोई संशय नहीं है। इस प्रकार कोई भी पूजा एवं अर्चना तब तक पूरा फल नहीं देती है जब तक कि आराधक या याचक इसे पूर्ण शुद्धि एवं गहनता से नही करे तथा अपने आप को ईश्वर के चरणों में पूर्णतः समर्पित न करे। क्योंकि जरा भी अहंकार साधक की संपूर्ण शक्ति का क्षय कर देता है। यह समस्त ब्रह्मांड शिव एवं शक्ति के सहयोग से संचालित होता है।
      शिव का अर्थ संक्षेप में ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा से है जिसका कोई स्वरूप नही है। जबकि प्रकृति साक्षात शक्ति है तथा ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा को स्वरूप प्रकृति में स्थित पांच तत्वों के सहयोग से ही मिल पाता है। इन दोनों में से एक भी अभाव में साकार संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शिव के बिना शक्ति बलहीन है तथा शक्ति के बिना निर्गुण, निराकार शिव स्वरूप हीन व आकार हीन है। अतः यह संसार शिव एवं शक्ति दोनों के सहयोग से ही संचालित होता है। मानव शरीर इसी ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप कहा जा सकता है तथा यह भी शिव (आत्मा) एवं शक्ति के संयोग से ही संचालित होता है। इस प्रकार मानव शरीर में स्थित आत्मा शिव द्वारा नियंत्रित होती है जबकि मानव शरीर एवं मष्तिष्क प्रकृति जिसको कि महामाया भी कहा जाता है द्वारा संचालित होते है। इस प्रक्रिया में शिव रूप अनेक बार गौण हो जाता है तथा मस्तिष्क एवं शरीर का वर्चस्व हो जाता है जिससे आत्मा को कर्म बंधन में बंधकर जन्म-मरण की प्रक्रिया से बार-बार गुजरना पड़ता है तथा अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। अतः मानव जीवन के संतुलित रूप से संचालन हेतु शिव एवं शक्ति में संतुलन होना आवश्यक होता है। 
        मानव जीवन में स्थित इस असंतुलन को दूर करने के लिये तथा इनमें आपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिये भारतीय वेदों एवं पुराणों में अनेक विधियों का उल्लेख किया है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र उनमें से प्रमुख है। मंत्र: भारतीय वैदिक साहित्य में हिंदी वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर को एक मंत्र की संज्ञा दी गई है। वही नाद ब्रह्म है। प्रत्येक मंत्र में कितने अक्षर होंगे। इसका चयन मंत्र के फल के अनुसार किया गया है। मंत्र में स्थित अक्षरों की संख्या क े अनसु ार मत्रं क े फल म ंे परिवतर्न हाते ा है। उदाहरणार्थ ऊँ नमः शिवाय में 6 अक्षर ह ंै इसलिय े इस े षडाक्षरी मत्रं कहते हैं। इसमें यदि ऊँ न प्रयुक्त किया जाये एवं केवल नमः शिवाय उच्चारित किया जाये तो यह पंचाक्षरी मंत्र बन जाता है। इसी प्रकार ऊँ नमो नारायणाय अष्टाक्षरी मंत्र कहलाता है तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय द्वादशाक्षरी मंत्र कहलाता है। इस प्रकार मंत्रों का उचित चयन करके विभिन्न दैविय शक्तितयों का आवाहन किया जाता है तथा विभिनन उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र इन माध्यमों को अपनाकर दैवीय शक्तियों का आवाहन किया जाता है एवं उनसे प्रार्थना, याचना की जाती है जिससे कि वे मनुष्य के भौतिक, आध्यात्मिक विकास में संतुलन स्थापित कर सकें तथा मानव जीवन को सुखी बना सकें।
         यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र को एक पूर्ण विकसित आध्यात्मिक विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। जिसका उद्ेश्य शरीर, मन एवं आत्मा के विकास में एक संतुलन स्थापित करना तथा मनुष्य का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है। यदि मंत्रों को वैदिक रीति से पूर्ण शुद्धता एवं श्रद्धा के साथ उच्चारित किया जाता है तो इनके उच्चारण से निकलने वाली तरंगे उस दैवीय शक्ति के तरंगों से संपर्क स्थापित कर सकती है जिसको प्रसन्न करने के लिये ये मंत्र उच्चारित किये जाते हैं। हमारे ऋषियों को इन तरंगों की जानकारी थी तथा उन्होंने मंत्रों के माध्यम से इन तरंगों का उपयोग मनुष्य की आध्यात्मिक विकास एवं मानसिक शान्ति के लिये किया। मंत्रों का यदि विधिवत रूप से उच्चारण किया जाए तो इनसे निकलने वाली तरंगे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है और मानव शरीर से निकलने वाली तरंगे संबंधित दैवीय तरंगों के संपर्क में आकर मानव मस्तिष्क एवं शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। तथा शब्दों के क्रम का विपर्याय होने पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। यंत्रों को सक्रिय एव शक्तिपूर्ण बनाने की क्षमता भी मंत्रों में ही हैं। उसके बिना यंत्र आकार मात्र रह जाऐंगे।
 यंत्र: -- 
मंत्रों की एक रेखाचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति को यंत्र कहते हैं। जिस प्रकार मानव शरीर विशालकाय ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है। उसी प्रकार विशालकाय ब्रह्मांड को सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्त करने के लिये ये यंत्र बनाये जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि मंत्रों एवं यंत्रों का आविष्कार किसने किया है यह कहना बहुत कठिन है क्योंकि इसका कहीं पर भी उल्लेख नहीं मिलता है। चूंकि इन यंत्रो का उल्लेख वेदों एवं पुराणों में मिलता है और वेदों के बारे में कहा जाता हैं कि वे अपौरूपेय है इसलिए उनमें मंत्रों के रचयिताओं का इतिहास और जीवनवृत न होकर जीवन दर्शन और रहस्य सूत्र रूप में ही निरूपित हुआ है। जो कि भाषा और शब्दों की श्लेष शक्ति का पूर्ण समावेश है। अतः यंत्र एवं मंत्रों का रचना भी दैविय शक्तियों द्वारा ही की गई है। इन मंत्रों का रहस्योदघाटन हमारे ऋषि एवं मुनियों ने किया है। जिससे आम आदमी इनका लाभ उठा सके।
     यंत्र विशिष्ट देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी आकृतियां होती हैं जो आकृति, क्रिया तथा शक्ति नामक तीन सिद्धांतों के आधार पर संयुक्त रूप से कार्य करती है। परंतु इन यंत्रों की आकृति निष्ठापूर्वक और विधि-विधान से की गई पूजा एवं प्राण प्रतिष्ठा से ही जागृत होती है। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर भी नहीं रखा जाता है क्योंकि ऐसा करने से सकारात्मक प्रभाव के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव होने लगते हैं। शास्त्रों में यंत्रों को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है।
     जब यंत्रों का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रोक्त विधि द्वारा की गई हो और साधक पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करता हो तो यंत्र-साधना करने वालों को सुख-ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यंत्र क्या है? इसमें कितनी दिव्य शक्ति विद्यमान है? भिन्न प्रकार के यंत्रों की रेखाएं, बीजाक्षर और बीजांक दिव्य शक्तियों से प्रभावित होते हैं। रेखाओं की आकृति, क्रम व अंकों और अक्षरों के आधार पर ही यंत्र को कोई विशिष्ट नाम दिया जाता है। इसमें अंकित अंक और अक्षर देवता से संबंधित बीजांक शक्ति का प्रतीक होते हैं। यंत्र व मंत्र एक दूसरे के पूरक है

जानिए दशहरा / विजयदशमी क्यों और कैसे मनाएं

हिन्दू धर्मे में नवरात्री का त्यौहार बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है नवरात्रि का त्यौहार साल में दो बार आता है पहला नवरात्रि त्यौहार चैत्र मास में और दूसरा नवरात्रि अश्विन मास में आता है, अश्विन मास में जो नवरात्री का त्यौहार आता है उसे हिन्दू धर्म के लोग बड़ी ही धूम धाम से मानाते है इस त्यौहार में पूरे नौ दिन तक माता के अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है| भक्त लोग माता का पंडाल बनाकर उसमे माता की मूर्ति स्थापित करते है और नौ दिनों तक उनकी पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते है| कुछ भक्त गण माताओं के दर्शन के लिए धार्मिक स्थल पर भी जाते है | 
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा (विजयदशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।
Know-why-and-how-to-celebrate-Dussehra-Vijayadashami-जानिए दशहरा / विजयदशमी क्यों और कैसे मनाएं       दशहरा का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था। राम-रावण युद्ध नवरात्रों में हुआ था। रावण की मृत्यु अष्टमी-नवमी के संधिकाल में हुई थी और उसका दाह संस्कार दशमी तिथि को हुआ। जिसका उत्सव दशमी दिन मनाया, इसीलिये इस त्यौहार को विजयदशमी के नाम भी से जाना जाता है।
सम्पूर्ण भारत में यह त्यौहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को बड़े ही उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस वर्ष दशहरा 08 अक्टूबर 2019 (मंगलवारवार) को मनाया जाएगा। इस विजयदशमी पर विजय मुहूर्त- 14:04 से 14:50 दोपहर तक रहेगा।
  • अपराह्न पूजा समय- 13:17 से 15:36
  • दशमी तिथि आरंभ- 12:37 (7 अक्तूबर 2019)
  • दशमी तिथि समाप्त- 14:50 (8 अक्तूबर 2019)

इस वर्ष दशहरा पर्व तिथि व मुहूर्त 2019 --8 अक्टूबर (मंगलवार) को विजय मुहूर्त में खरीदी और रावण दहन मुहूर्त 
  • दोपहर 14:04 से 14:50 तक..
  • अपराह्न पूजा एवं खरीदी समय- 13:17 से 15:36 तक...
दशहरा / विजयदशमी पूजन के  दौरान अपराजिता पूजा करना शुभ माना जाता है। दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरे अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव का उत्सव आवश्यक भी है।
      भारत के सभी स्थानों में इसे अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। कहीं यह दुर्गा विजय का प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है, तो कहीं नवरात्रों के रूप में। बंगाल में दुर्गा पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। यह त्योहार हर्ष और उल्लास का प्रतीक है। इस दिन मनुष्य को अपने अंदर व्याप्त पाप, लोभ, मद, क्रोध, आलस्य, चोरी, अंहकार, काम, हिंसा, मोह आदि भावनाओं को समाप्त करने की प्रेरणा मिलती है। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंहकार के मद में डूबा हुआ एक दिन अवश्य मुंह की खाता है। रावण बहुत बड़ा विद्वान और वीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसके विनाश कारण बना। यह त्योहार जीवन को हर्ष और उल्लास से भर देता है, साथ यह जीवन में कभी अंहकार न करने की प्रेरणा भी देता है।
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर बड़े-बड़े मेलों का आयोजन भी किया जाता है। जगह-जगह रामकथा को नाटक रूप में दिखाया जाता है। माता या दुर्गा के भक्त नौ दिनों तक नवरात्रि के व्रत रखते हैं। मां दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा करने के पश्चात् दशमी के दिन यह त्यौहार मनाया जाता हैं। दसवें दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पूतले का दहन किया जाता है। इस अवसर पर विद्यालयों में बच्चों के लिए दस  दिन का अवकाश भी घोषित कर दिया जाता है। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.
दशहरा पूजा विधि---- 
दशहरे के दिन कई जगह अस्त्र पूजन भी किया जाता है। वैदिक हिन्दू रीति के अनुसार इस दिन श्रीराम के साथ ही लक्ष्मण जी, भरत जी और शत्रुघ्न जी का पूजन करना चाहिए। इस दिन सुबह घर के आंगन में गोबर के चार पिण्ड मण्डलाकर (गोल बर्तन जैसे) बनाएं। इन्हें श्रीराम समेत उनके अनुजों की छवि मानना चाहिए। गोबर से बने हुए चार बर्तनों में भीगा हुआ धान और चांदी रखकर उसे वस्त्र से ढक दें। फिर उनकी गंध, पुष्प और द्रव्य आदि से पूजा करनी चाहिए। पूजा के पश्चात् ब्राह्मïणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य वर्ष भर सुखी रहता है।
     दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो शुभ तिथयां हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। मां दुर्गा की विशेष आराधनाएं देखने को मिलती हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।
यह हैं दशहरा / विजयदशमी का धार्मिक महत्त्व --- 
पुराणों और शास्त्रों में दशहरे से जुड़ी कई अन्य कथाओं का वर्णन भी मिलता है। लेकिन सबका सार यही है कि यह त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।मान्यता है कि इस दिन श्री राम जी ने रावण को मारकर असत्य पर सत्य की जीत प्राप्त की थी, तभी से यह दिन विजयदशमी या दशहरे के रूप में प्रसिद्ध हो गया। दशहरे के दिन जगह-जगह रावण,कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। देवी भागवत के अनुसार इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस को परास्त कर देवताओं को मुक्ति दिलाई थी, इसलिए दशमी के दिन जगह-जगह देवी दुर्गा की मूर्तियों की विशेष पूजा की जाती है। कहते हैं, रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था। भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कुछ लोग व्रत एवं उपवास करते हैं। दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा करने वाले भक्त मूर्ति-विसर्जन का कार्यक्रम भी गाजे-बाजे के साथ करते हैं।
        भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
क्या आपको पता है की नवरात्रि का त्यौहार और दशवें दिन, विजयादशमी क्यों मनायी जाती है और इसे मनाने का कारण क्या है?
भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्रीने बताया की ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।
जानिए दशहरा / विजयदशमी  मनाये की प्रचलित कथाएं---
पहली कथा इस प्रकार है- प्राचीन काल में जब महिषासुर नामक राक्षस तपस्या कर रहा था तो उसकी तपस्या से खुश होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दिया था, वरदान प्राप्त करने के बाद महिषा सुर और ज्यादा हिंसक हो गया था उसने अपना आतंक इतना ज्यादा फैला रखा था की सारे देवतागण उसके भय के कारण देवीदुर्गा की आराधना करने लगे, ऐसा माना जाता है की देवी दुर्गा के निर्माण होने में देवताओं का सहयोग था महिषा सुर के आतंक से बचने के लिए देवताओं ने अपने अस्त्र शस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे तब जाकर देवी दुर्गा और शक्तिशाली हो गयी थी, इसके बाद महिषा सुर को समाप्त करने के लिए देवी दुर्गा ने  महिषा सुर के साथ पूरे 9 दिन युद्ध की थी और महिषा सुर का वध करने के बाद देवी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाई. तभी से नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है.
दूसरी कथा- विजयादशमी की पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम को जब आयोद्धा छोड़कर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था और उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का हरण कर लिया था तब भगवान राम सीता माता को वापस लाने के लिए नौ देवियों की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने श्री राम भगवान को वरदान दिया था और कई शक्तियां भी प्रदान की थी वरदान प्राप्त करने के बाद दशमे दिन भगवान श्री राम और रावण का युद्ध हुआ और इसी युद्ध में रावण का वद्ध हुआ था और तभी से राम नवमी और विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है.
विजयदशमी पर्व क्यों - 
इसलिए है की इस दिन से हमें अच्छे कर्म करने की शिक्षा मिलती है गर हम भी बेकार कर्म करेंगे तो हमें भी नरक जाना होगा !  ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विजयदशमी पर्व जो की "बुराई पर अच्छाई की जीत" का प्रतिक है, गुण ग्रहण का भाव रहे नित, द्रष्टि न दोषों पर जावे !!
आइये ...विजयदशमी पर अच्छाई पर बुराई की विजय मनाये !
रावण के पुतले को नहीं..रावण की बुराई को मिटाए !
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