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शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएं

मां दुर्गा का प्रत्येक स्वरूप मंगलकारी है और एक-एक स्वरूप एक-एक ग्रह से संबंधित है। इसलिए नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूप की पूजा प्रत्येक ग्रहों की पीड़ा को शांत करती है।देवी माँ या निर्मल चेतना स्वयं को सभी रूपों में प्रत्यक्ष करती है,और सभी नाम ग्रहण करती है। माँ दुर्गा के नौ रूप और हर नाम में एक दैवीय शक्ति को पहचानना ही नवरात्रि मनाना है।असीम आनन्द और हर्षोल्लास के नौ दिनों का उचित समापन बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक पर्व दशहरा मनाने के साथ होता है। नवरात्रि पर्व की नौ रातें देवी माँ के नौ  विभिन्न रूपों को को समर्पित हैं जिसे नव दुर्गा भी कहा जाता है।

। । या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: । ।
जानिए क्यों हैं माँ दुर्गा के नौ रूप---
Sharadiya-Navratri-2019-Worship-Goddess-Durga-Devi-according-to-your-zodiac-sign-food-शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएंइस वर्ष, नवरात्रि 29 सितंबर से शुरू हो रही है. यह नौ दिनों का त्योहार है, जो हिंदू धर्म और संस्कृति में बहुत महत्व रखता है. यह सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक है क्योंकि यह भगवान राम की जीत का जश्न मनाता है, जिन्होंने रावण पर अपनी लड़ाई से पहले देवी दुर्गा की पूजा की थी. शारदा नवरात्रि का त्योहार पूरे भारत मं धूम धाम से मनाया जाता है।नवरात्रि एक ऐसा त्यौहार है जिसे बहुत धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और देवी दुर्गा के नौ अवतारों को समर्पित नौ दिन बहुत शुभ माने जाते हैं. भारत के प्रत्येक भाग में, इसका एक अलग महत्व है. नवरात्रि से जुड़ी कहानी देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुई लड़ाई की है. उसने त्रिलोक (पृथ्वी, स्वर्ग और नरक) पर हमला किया, और देवता उसे हराने में सक्षम नहीं थे।
      अंत में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने मिलकर देवी दुर्गा की रचना की, जिन्होंने अंत में महिषासुर को हराया. देवी दुर्गा ने 15 दिनों तक उसके साथ युद्ध किया, जिसके दौरान दानव अपना रूप बदलता रहा. वह देवी दुर्गा को भ्रमित करने के लिए विभिन्न जानवरों में बदल जाता था. अंत में, जब वह एक भैंस में बदल गया, जब देवी दुर्गा ने उसे अपने त्रिशूल से मार डाला. यह महालया के दिन था कि महिषासुर का वध किया गया था.
       नवरात्रि के प्रत्येक दिन का एक अलग रंग होता है. नवरात्रि शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है नौ रातें- नव (नौ) रत्रि (रात). प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है. उत्तर पूर्व भारत के पूर्व और विभिन्न हिस्सों में, नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहां त्योहार राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। 
पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
वन्दे वांछित कामार्थे चंद्रार्घ्कृत शेखराम, सिंहरुढ़ा अष्टभुजा कुष्मांडा यशस्वनिम.
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी.”
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

यह भौतिक नहीं, बल्कि लोक से परे आलौकिक रूप है, सूक्ष्म तरह से, सूक्ष्म रूप। इसकी अनुभूति के लिये पहला कदम ध्यान में बैठना है। ध्यान में आप ब्रह्मांड को अनुभव करते हैं। इसीलिये बुद्ध ने कहा है, आप बस देवियों के विषय में बात ही करते हैं, जरा बैठिये और ध्यान करिये। ईश्वर के विषय में न सोचिये। शून्यता में जाईये, अपने भीतर। एक बार आप वहां पहुँच गये, तो अगला कदम वो है, जहां आपको विभिन्न मन्त्र, विभिन्न शक्तियाँ दिखाई देंगी, वो सभी जागृत होंगी।
     बौद्ध मत में भी, वे इन सभी देवियों का पूजन करते हैं। इसलिये, यदि आप ध्यान कर रहे हैं, तो सभी यज्ञ, सभी पूजन अधिक प्रभावी हो जायेंगे। नहीं तो उनका इतना प्रभाव नहीं होगा। यह ऐसे ही है, जैसे कि आप नल तो खोलते हैं, परन्तु गिलास कहीं और रखते हैं, नल के नीचे नहीं। पानी तो आता है, पर आपका गिलास खाली ही रह जाता है। या फिर आप अपने गिलास को उलटा पकड़े रहते हैं। 10 मिनट के बाद भी आप इसे हटायेंगे, तो इसमें पानी नहीं होगा। क्योंकि आपने इसे ठीक प्रकार से नहीं पकड़ा है। सभी पूजन ध्यान के साथ शुरू होते हैं और हजारों वर्षों से इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। ऐसा पवित्र आत्मा के सभी विविध तत्वों को जागृत करने के लिये, उनका आह्वाहन करने के लिये किया जाता था। हमारे भीतर एक आत्मा है। उस आत्मा की कई विविधतायें हैं, जिनके कई नाम, कई सूक्ष्म रूप हैं और नवरात्रि इन्हीं सब से जुड़े हैं – इन सब तत्वों का इस धरती पर आवाहन, जागरण और पूजन करना।
    नवरात्रि में देवी को खुश करने में पूजन-अर्चना के आलावा उनके भोग का भी विशेष महत्व होता है। ऐसे में जरूरी है कि नवरात्रि के दिन और उनसे सम्बंधित देवी मां की पसंद के हिसाब से ही भोग अर्पित किए जाएं। ऐसा करने से पूजा के फल में बहुत वृद्धि होती है। 
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की माँ दुर्गा की पूजन और आराधना के लिए पूर्व और दक्षिण अच्छी मानी जाती है। इसमें भी पूर्व की दिशा सर्वोत्तम होती है। इस दिशा को ज्ञान, बुद्धि और विवेक की दिशा माना जाता है। इसलिए जब आप माता की स्थापना करें तो उनकी स्थापना पूर्व दिशा में ही करें। इससे आपको अपनी पूजा का पूरा लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त नवरात्रि में अखण्ड जोत के लिए गाय के देसी घी का इस्तेमाल करना अच्छा माना जाता है। जब आप पूजा करते हैं तो आपका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। साथ ही आप माता की जोत की स्थापना कुछ इस तरह करें कि वह आपके सीधे हाथ पर हो। यह पूजा स्थान का अग्निकोण होता है। वहीं पूजा की अन्य सामग्री किसी भी दिशा में रखी जा सकती है। 
     आमतौर पर वास्तुशास्त्र में यह नियम निर्धारित है कि अग्नि से संबंधित कोई भी सामग्री नार्थ-ईस्ट अर्थात ईशान कोण में नहीं रखनी चाहिए लेकिन माता की जोत के साथ यह नियम लागू नहीं होता क्योंकि माता की ज्योति की सकारात्मकता इतनी अधिक होती है कि अगर आप उसे ईशान कोण में रखते हैं तो उसकी सकारात्मकता न सिर्फ उस दिशा की बल्कि पूरे घर की नकारात्मकता को खत्म कर देती है।  नवरात्रि के दिनों में अगर आपके पास कोई स्फटिक या पीतल का श्रीयंत्र है तो उसे पूजा स्थल में अवश्य रखें। इससे आपके लिए धन लाभ के योग बनते हैं। आप यह श्रीयंत्र नवरात्रि के किसी भी दिन स्थापित कर सकते हैं। ध्यान रखें कि आजकल बाजार में प्लास्टिक के श्रीयंत्र भी मिलते हैं, इन्हें पूजाघर में कभी न रखें। इससे आपको किसी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं होगा। 
    माता की चौकी के लिए लकड़ी या शुद्ध धातु जैसे चांदी या सोने का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन गलती से भी इसके लिए कभी भी प्लास्टिक की चौकी का इस्तेमाल न करें। इसके अतिरिक्त आप अपने पूजा स्थान में शुभ और मंगलदायक रंग जैसे लाल और पीले रंग का ही उपयोग में लेने चाहिए। उदाहरण के लिए माता की चौकी में इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े, पूजा के फल और फूल आदि में लाल और पीले रंग को ही महत्ता प्रदान करें। इस उपाय से घर में सकारात्मकता आती है। पीला रंग जहां ज्ञान, बुद्धि और विवेक के देवता सूर्य का प्रतीक है, वहीं लाल रंग शक्ति और मंगल को दर्शाता है।  वास्तु नियमानुसार आप जहां पर बैठकर पूजा कर रहे हैं उसके नीचे कभी भी लटका हुआ बीम नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो आप वहां से थोड़ा हटकर बैठें। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता।
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शारदीय नवरात्रि 2019 पर बन रहे है ये विशेष योग--
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इस नवरात्रि में बन रहा कलश स्थापना और सुख समृद्धि दायक संयोग--
इस बार कलश स्थापना के दिन ही सुख समृद्धि के कारक ग्रह शुक्र का उदय होना बेहद शुभ फलदायी है। शुक्रवार का संबंध देवी लक्ष्मी से है। नवरात्र के दिनों में देवी के सभी रूपों की पूजा होती है। शुक्र का उदित होना भक्तों के लिए सुख-समृद्धि दायक है। धन की इच्छा रखने वाले भक्त नवरात्र दे दिनों में माता की उपासना करके अपनी आर्थिक परेशानी दूर कर सकते हैं। इस दिन बुध का शुक्र के घर तुला में आना भी शुभ फलदायी है।
इस नवरात्र में 4 सर्वार्थ सिद्धि योग---
इस साल की नवरात्र इसलिए भी खास है क्योंकि इस बार पूरे नवरात्र के दौरान 4 सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहे हैं। ऐसे में साधकों को सिद्धि प्राप्त करने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। इस दौरान सभी शुभ काम शुरू कर सकते हैं। 29 सितंबर 2019, 2,6 और 7 अक्टूबर 2019 को भी यह शुभ योग बन रहा है। 
इस शारदीय नवरात्र में बना अमृत सिद्धि योग--
इस वर्ष नवरात्र में दूसरे पूजा यानी 30 सितंबर, चौथे पूजा यानी 2 अक्टूबर को अमृत सिद्धि नामक शुभ योग बन रहा है।
इस वर्ष 2019 की शारदीय नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में--
इस वर्ष नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में होने जा रहा है। इस नक्षत्र में ही कलश स्थापन जाएगा। हस्त नक्षत्र को 26 नक्षत्रों में 13वां और शुभ माना गया है। इसके स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं। इस नक्षत्र को ज्ञान, मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। इस नक्षत्र में कलश में जल भरकर पूजा का संकल्प लेना शुभ फलदायी माना गया है।
इस शुभ संयोग में होगा कलश स्थापना---
29 सितंबर को नवरात्र आरंभ होगा। इसी दिन भक्त 10 दिनों तक माता की श्रद्धा भाव से पूजा का संकल्प लेकर कलश बैठाएंगे, जिसे घट स्थापना भी कहते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस बार कलश स्थापना के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और द्विपुष्कर नामक शुभ योग बन रहा है। ये सभी घटनाएं नवरात्र का शुभारंभ कर रहे हैं।
इन शारदीय नवरात्र में आ रहे हैं दो सोमवार और रविवार--
इस बार नवरात्र का आरंभ रविवार को हो रहा है और इसका समापन मंगलवार को होगा। ऐसे में नवरात्र में दो सोमवार और दो रविवार आने वाले हैं। पहले सोमवार को देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी और अंतिम सोमवार को महानवमी के दिन सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नवरात्र में दो सोमवार का होना शुभ फलदायी माना गया हैं।
इस नवरात्र में बन रहा रवि योग--
इस वर्ष की शारदीय  नवरात्र में तीन दिन रवियोग बन रहा है। तीसरी पूजा यानी 1 अक्टूबर, छठे पूजा यानी 4 अक्टूबर और 7वीं पूजा यानी 5 अक्टूबर 2019 को यह शुभ योग बना है। 8 अक्टूबर 2019 को इसी योग में विजयादशमी का त्योहार भी मनाया जाएगा। इसी योग में देवी का विसर्जन भी होगा।
यह नवरात्र होगा पूरे 9 दिन का--
नवरात्र 9 दिनों का होता है और दसवें दिन देवी विसर्जन के साथ नवरात्र का समापन होता है लेकिन ऐसा हो पाना दुर्लभ संयोग माना गया है क्योंकि कई बार तिथियों का क्षय हो जाने से नवरात्र के दिन कम हो जाते हैं। लेकिन इस बार पूरे 9 दिनों की पूजा होगी और 10 वें दिन देवी की विदाई होगी। यानी 29 सितंबर 2019 से आरंभ होकर 7 अक्टूबर को नवमी की पूजा होगी और 8 अक्टूबर 2019 को देवी वसर्जन होगा।
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नवरात्रि में यदि आप अपनी राशि के अनुसार देवी का चयन कर साधना विधानपूर्वक करें तो आपको अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी।  इस नवरात्रि ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए आपकी राशि के अनुसार आपको किस देवी की पूजा करनी चाहिए ताकि आपको इच्छित फल मिल सके। 

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शैलपुत्री---
देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप है शैलपुत्री। मां का यह स्वरूप चंद्रमा से संबंधित है। इसलिए प्रथम दिन शैलपुत्री माता का पूजन करने से चंद्र से जुड़े समस्त दोष समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की चंद्र की अनुकूलता होने से मानसिक सुख-शांति प्राप्त होती है। देवी दुर्गा जी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के कपड़ों का रंग लाल होता है।ऐसे में आप भी लाल रंग पहन सकते हैं।  वृश्चिक राशि वाले जातकों को भगवती तारा या माता शैलपुत्री की उपासना करनी चाहिए।
     नवरात्र के पहले दिन देवी शैलपुत्री के स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन माता को गाय के दूध से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है। पिपरमिंट युक्त मीठे मसाला पान, अनार और गुड़ से बने पकवान भी देवी को अर्पण किए जाते हैं। पहले दिन घी नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। शंकरजी की पत्नी एवं नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है। इस दिन मां को घी का भोग लगाने से भक्त निरोगी रहते हैं और उनके सारे दुःख ख़त्म होते हैं।
मेष राशि के जातक को भगवती तारा, नील-सरस्वती या माता शैलपुत्री की साधना करनी से लाभ मिलता हैं।
मां शैलपुत्री का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रि उत्सव के दौरान माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों का सम्मान किया जाता है,एवं पूजा जाता है।जिसे नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है,शैल का मतलब शिखर।शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत (शिखर) की बेटी के नाम से जाना जाता है।आमतौर पर यह समझा जाता है,कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री है।लेकिन यह बहुत ही निम्न स्तर की सोच है।किन्तु इसका योग के मार्ग पर वास्तविक अर्थ है-चेतना का सर्वोच्चतम स्थान।यह बहुत दिलचस्प है,जब ऊर्जा अपने चरम स्तर पर है,तभी आप इसका अनुभव कर सकते है,इससे पहले कि यह अपने चरम स्तर पर न पहुँच जाए,तब तक आप इसे समझ नहीं सकते। क्योंकि चेतना की अवस्था का यह सर्वोत्तम स्थान है,जो ऊर्जा के शिखर से उत्पन्न हुआ है।यहाँ पर शिखर का मतलब है,हमारे गहरे अनुभव या गहन भावनाओं का सर्वोच्चतम स्थान।
           जब आप १००% गुस्से में होते हो तो आप महसूस करोगे कि गुस्सा आपके शरीर को कमजोर कर देता है।दरअसल हम अपने गुस्से को पूरी तरह से व्यक्त नहीं करते,जब आप १००% क्रोध में होते हैं,यदि पूरी तरह से क्रोध को आप व्यक्त करें तो आप इस स्थिति से जल्द ही बाहर निकल सकते है। जब आप १००%(100 प्रतिशत) किसी भी चीज में होते है, तभी उसका उपभोग कर सकते है,ठीक इसी तरह जब क्रोध को आप पूरी तरह से व्यक्त करेंगे तब ऊर्जा की उछाल का अनुभव करेंगे,और साथ ही तुरंत क्रोध से बाहर निकल जाएंगे। क्या आपने देखा है कि बच्चे कैसे व्यवहार करते हैं? जो भी वे करते हैं, वे 100% करते हैं।अगर वे गुस्से में हैं, तो वे उस पल में 100% गुस्से में हैं, और फिर तुरंत कुछ ही मिनटों के बाद वे उस क्रोध को भी छोड़ देते हैं।अगर वे नाराज हो जाते हैं, तो भी वे थक नहीं जाते हैं।लेकिन अगर आप गुस्सा हो जाते हैं,तो आपका गुस्सा आपको थका देता है।ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है,क्योंकि आप अपना क्रोध 100% व्यक्त नहीं करते हैं।अब इसका मतलब यह नहीं है,कि आप हर समय नाराज हो जाएँ।तब आपको उस परेशानी का भी सामना करना पड़ेगा जिसकी वजह से क्रोध आता है। जब आप किसी भी अनुभव या भावनाओँ के शिखर तक पहुंचते हैं,तो आप दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव करते हैं,क्योंकि यह चेतना का सर्वोत्तम शिखर है।शैलपुत्री का यही वास्तविक अर्थ है।
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ब्रह्मचारिणी
देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी। देवी के इस स्वरूप का संबंध मंगल से है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मंगल ग्रह से जुड़ी समस्त पीड़ाएं दूर हो जाती है। इससे रोग दूर होते हैं और आत्मविश्वास, आत्मबल में वृद्धि होती है।नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना में गहरे नीले (रॉयल ब्लू) रंग का उपयोग लाभदायक रहता हैं।
वृषभ एवम तुला राशि वाले जातक को श्री विद्या में माता षोडशी या माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए।नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा की ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा होती है। मातारानी को को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। देवी को इस दिन पान-सुपाड़ी भी चढ़ाएं।
मां ब्रह्मचारिणी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

वह जिसका कोई आदि या अंत न हो,वह जो सर्वव्याप्त,सर्वश्रेष्ठ है और जिसके पार कुछ भी नहीं।जब आप आँखे बंद करके ध्यानमग्न होते हैं,तब आप अनुभव करते हैं,कि ऊर्जा अपनी चरम सीमा,या शिखर पर पहुँच जाती है,वह देवी माँ के साथ एक हो गयी है और उसी में ही लिप्त हो गयी है। दिव्यता, ईश्वर आपके भीतर ही है, कहीं बाहर नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि, ‘मैं इसे जानता हूँ’, क्योंकि यह असीम है; जिस क्षण ‘आप जान जाते हैं’, यह सीमित बन जाता है और अब आप यह नहीं कह सकते कि, “मैं इसे नहीं जानता”, क्योंकि यह वहां है – तो आप कैसे नहीं जानते? क्या आप कह सकते हैं कि “मैं अपने हाथ को नहीं जानता।” आपका हाथ तो वहां है, है न? इसलिये, आप इसे जानते हैं। और साथ ही में यह अनंत है अतः आप इसे नहीं जानते | यह दोनों अभिव्यक्ति एक साथ चलती हैं। क्या आप एकदम हैरान, चकित या द्वन्द में फँस गए!
      अगर कोई आपसे पूछे कि “क्या आप देवी माँ को जानते हैं ?” तब आपको चुप रहना होगा क्योंकि अगर आपका उत्तर है कि “मैं नहीं जानता” तब यह असत्य होगा और अगर आपका उत्तर है कि “हाँ मैं जानता हूँ” तो तब आप अपनी सीमित बुद्धि से, ज्ञान से उस जानने को सीमा में बाँध रहे हैं। यह ( देवी माँ ) असीमित, अनन्त हैं जिसे न तो समझा जा सकता है न ही किसी सीमा में बाँध कर रखा जा सकता है।“जानने” का अर्थ है कि आप उसको सीमा में बाँध रहे हैं। क्या आप अनन्त को किसी सीमा में बांध कर रख सकते हैं? अगर आप ऐसा सकते हैं तो फिर वह अनन्त नहीं।
     ब्रह्मचारिणी का अर्थ है वह जो असीम, अनन्त में विद्यमान, गतिमान है। एक ऊर्जा जो न तो जड़ न ही निष्क्रिय है, किन्तु वह जो अनन्त में विचरण करती है। यह बात समझना अति महत्वपूर्ण है – एक गतिमान होना, दूसरा विद्यमान होना। यही ब्रह्मचर्य का अर्थ है।इसका अर्थ यह भी है की तुच्छता, निम्नता में न रहना अपितु पूर्णता से रहना। कौमार्यावस्था ब्रह्मचर्य का पर्यायवाची है क्योंकि उसमें आप एक सम्पूर्णता के समक्ष हैं न कि कुछ सीमित के समक्ष। वासना हमेशा सीमित बँटी हुई होती है, चेतना का मात्र सीमित क्षेत्र में संचार। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी सर्व-व्यापक चेतना है।
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चंद्रघंटा
देवी का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजन करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। जीवन में आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम में वृद्धि होती है। भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा के दौरान पीले रंग के कपड़े पहनना अच्छा माना जाता है। देवी दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए। 
गुड़ और लाल सेब भी मैय्या को बहुत पसंद है। ऐसा करने से सभी बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं।मिथुन एवम कन्या राशि वाले जातक को माता भुवनेश्वरी या माता चन्द्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। 
मां चंद्रघण्टा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि चन्द्रमा हमारे मन का प्रतीक है। मन का अपना ही उतार चढ़ाव लगा रहता है। प्राय:, हम अपने मन से ही उलझते रहते हैं – सभी नकारात्मक विचार हमारे मन में आते हैं, ईर्ष्या आती है, घृणा आती है और आप उनसे छुटकारा पाने के लिये और अपने मन को साफ़ करने के लिये संघर्ष करते हैं।   जैसे ही हमारे मन में नकरात्मक भाव, विचार आते हैं तो हम निरुत्साहित, अशांत महसूस करते हैं। हम विभिन्न तरीकों से इनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं पर यह मात्र कुछ समय के लिए ही काम करता है। कुछ समय पश्चात वही विचार फिर हमें घेर लेते हैं और वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहाँ से हमने शुरुआत करी थी। अतः इन विचारों से पीछा छुड़ाने के संघर्ष में न फँसे। ‘चंद्र’ हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है (ठीक वैसे ही जैसे चन्द्रमा घटता व बढ़ता रहता है)। ‘घंटा’ का अर्थ है जैसे मंदिर के घण्टे-घड़ियाल (bell)। आप मंदिर के घण्टे-घड़ियाल को किसी भी प्रकार बजाएँ, हमेशा उसमे से एक ही ध्वनि आती है। इसी प्रकार एक अस्त-व्यस्त मन जो विभिन्न विचारों, भावों में उलझा रहता है, जब एकाग्र होकर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तब ऊपर उठती हुई दैवीय शक्ति का उदय होता है - और यही चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा का अर्थ है।
        एक ऐसी स्थिति जिसमे हमारा अस्त-व्यस्त मन एकाग्रचित्त हो जाता है। अपने मन से भागे नहीं - क्योंकि यह मन एक प्रकार से दैवीय रूप का प्रतीक, अभिव्यक्ति है। यही दैवीय रूप दुःख, विपत्ति, भूख और यहाँ तक कि शान्ति में भी मौजूद है। सार यह कि सबको एक साथ लेकर चलें - चाहे ख़ुशी हो या गम - सब विचारों, भावनाओं को एकत्रित करते हुए एक विशाल घण्टे -घड़ियाल के नाद की तरह। देवी के इस नाम ‘चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा’ का यही अर्थ है और तृतीय नवरात्रि के उपलक्ष्य में इसे मनाया जाता है।

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कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी के कुष्मांडा स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप सूर्य से संबंधित है। इनकी पूजा से सूर्य ग्रह से मिल रही पीड़ाएं दूर हो जाती है। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। आर्थिक तरक्की होती है।नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी की उपासन के लिए हरे रंग का उपयोग लाभदायक रहेगा।माता के चौथे स्वरूप की उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी के इस रूप की कृपा से निर्णंय लेने की क्षमता में वृद्धि एवं मानसिक शक्ति अच्छी रहती हैं। इस तिथि को मालपुआ का भोग लगाना अच्छा होता हैं। भोग लगाने के बाद उसे बच्चों में वितरित करने से पुण्य फलों में वृद्धि होती हैं।
कूष्माण्डा का संस्कृत में अर्थ होता है लौकी,कद्दू। अब अगर आप किसी को मज़ाक में लौकी, कद्दू पुकारेंगे तो वह बुरा मान जाएंगे और आपके प्रति क्रोधित होंगे।लौकी, कद्दू गोलाकार है।अतः यहाँ इसका अर्थ प्राणशक्ति से है - वह प्राणशक्ति जो पूर्ण, एक गोलाकार, वृत्त की भांति।
मां कूष्माण्डा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भारतीय परंपरा के अनुसार लौकी, कद्दू का सेवन मात्र ब्राह्मण, महा ज्ञानी ही करते थे। अन्य कोई भी वर्ग इसका सेवन नहीं करता था। लौकी, कद्दू आपकी प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति को बढ़ाते है। लौकी, कद्दू के गुण के बारे में ऐसा कहा गया है, कि यह प्राणों को अपने अंदर सोखती है, और साथ ही प्राणों का प्रसार भी करती है। यह इस धरती पर सबसे अधिक प्राणवान और ऊर्जा प्रदान करने वाली शाक, सब्ज़ी है। जिस प्रकार अश्वथ का वृक्ष २४ घंटे ऑक्सीजन देता है उसी प्रकार लौकी, कद्दू ऊर्जा को ग्रहण या अवशोषित कर उसका प्रसार करते है।
सम्पूर्ण सृष्टि - प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष , अभिव्यक्त व अनभिव्यक्‍त - एक बड़ी गेंद , गोलाकार कद्दू के समान है। इसमें हर प्रकार की विविधता पाई जाता है - छोटे से बड़े तक। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, ‘ष् ’ का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंडा’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला – सृष्टि या ऊर्जा का छोटे से वृहद ब्रह्मांडीय गोला। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का संचार छोटे से बड़े में होता है। यह बड़े से छोटा होता है और छोटे से बड़ा; यह बीज से बढ़ कर फल बनता है और फिर फल से दोबारा बीज हो जाता है। इसी प्रकार, ऊर्जा या चेतना में सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होने की और विशाल से विशालतम होने का विशेष गुण है,जिसकी व्याख्या कूष्मांडा करती हैं,देवी माँ को कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ यह भी है, कि देवी माँ हमारे अंदर प्राणशक्ति के रूप में प्रकट रहती हैं।
       कुछ क्षणों के लिए बैठकर अपने आप को एक कद्दू के समान अनुभव करें। इसका यहाँ पर यह तात्पर्य है कि अपने आप को उन्नत करें और अपनी प्रज्ञा, बुद्धि को सर्वोच्च बुद्धिमत्ता जो देवी माँ का रूप है, उसमें समा जाएँ। एक कद्दू के समान आप भी अपने जीवन में प्रचुरता बहुतायत और पूर्णता अनुभव करें। साथ ही सम्पूर्ण जगत के हर कण में ऊर्जा और प्राणशक्ति का अनुभव करें। इस सर्वव्यापी, जागृत, प्रत्यक्ष बुद्धिमत्ता का सृष्टि में अनुभव करना ही कूष्माण्डा है।

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स्कंदमाता
देवी स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप बुध ग्रह को नियंत्रित करता है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से बुद्धि, ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। कार्य में लाभ प्राप्त होता है।नवरात्रि के पांचवें दिन भूरा (ग्रे) रंग पहनना शुभ माना जाता है।इस बार पांचवें दिन सरस्वती माता की पूजा की जाएगी। इस दिन देवी स्कंदमाता की की गई पूजा से भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। नवरात्र के पांचवे दिन देवी को शारीरिक कष्टों के निवारण के लिए माता का भोग केले का लगाएं फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करें। इस दिन बुद्धि में वृद्धि के लिए माता को मंत्रों के साथ छह इलायची भी चढ़ाएं।
देवी माँ का पाँचवाँ रूप स्कंदमाता के नाम से प्रचलित है। भगवान् कार्तिकेय का एक नाम स्कन्द भी है जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति के एक साथ सूचक है। स्कन्द इन्हीं दोनों के मिश्रण का परिणाम है। स्कन्दमाता वो दैवीय शक्ति है,जो व्यवहारिक ज्ञान को सामने लाती है – वो जो ज्ञान को कर्म में बदलती हैं।
मां स्कंदमाता का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

शिव तत्व आनंदमय, सदैव शांत और किसी भी प्रकार के कर्म से परे का सूचक है। देवी तत्व आदिशक्ति सब प्रकार के कर्म के लिए उत्तरदायी है। ऐसी मान्यता है कि देवी इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का समागम है। जब शिव तत्व का मिलन इन त्रिशक्ति के साथ होता है तो स्कन्द का जन्म होता है। स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत, आरम्भ का प्रतीक है.इसे हम क्रियात्मक ज्ञान अथवा सही ज्ञान से प्रेरित क्रिया, कर्म भी कह सकते हैं।
       प्रायः ऐसा देखा गया की है कि ज्ञान तो है, किंतु उसका कुछ प्रयोजन या क्रियात्मक प्रयोग नहीं होता। किन्तु ज्ञान ऐसा भी है, जिसका ठोस प्रोयोजन, लाभ है, जिसे क्रिया द्वारा अर्जित किया जाता है। आप स्कूल, कॉलेज में भौतिकी, रसायन शास्त्र पड़ते हैं जिसका प्रायः आप दैनिक जीवन में कुछ अधिक प्रयोग करते। और दूसरी ओर चिकित्सा पद्धति, औषधि शास्त्र का ज्ञान दिन प्रतिदिन में अधिक उपयोग में आता है। जब आप टेलीविज़न ठीक करना सीख जाते हैं तो अगर कभी वो खराब हो जाए तो आप उस ज्ञान का प्रयोग कर टेलीविज़न ठीक कर सकते हैं। इसी तरह जब कोई मोटर खराब हो जाती है तो आप उसे यदि ठीक करना जानते हैं तो उस ज्ञान का उपयोग कर उसे ठीक कर सकते हैं। इस प्रकार का ज्ञान अधिक व्यवहारिक ज्ञान है। अतः स्कन्द सही व्यवहारिक ज्ञान और क्रिया के एक साथ होने का प्रतीक है। स्कन्द तत्व मात्र देवी का एक और रूप है।
    हम अक्सर कहते हैं, कि ब्रह्म सर्वत्र, सर्वव्यापी है, किंतु जब आपके सामने अगर कोई चुनौती या मुश्किल स्थिति आती है, तब आप क्या करते हैं? तब आप किस प्रकार कौनसा ज्ञान लागू करेंगे या प्रयोग में लाएँगे? समस्या या मुश्किल स्थिति में आपको क्रियात्मक होना पड़ेगा। अतः जब आपका कर्म सही व्यवहारिक ज्ञान से लिप्त होता है तब स्कन्द तत्व का उदय होता है। और देवी दुर्गा स्कन्द तत्व की माता हैं।
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कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करता है। मां कात्यायनी की पूजा से बृहस्पति के दुष्प्रभाव दूर होते हैं। जीवन में संयम, धैर्य और प्रसिद्धि में वृद्धि में होती है। नवरात्रि के छठे दिन लोगों को नारंगी (ऑरेंज) रंग के कपड़े पहनने चाहिए।देवी माँ कात्यायनी की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन शहद का भोग लगाकर मां कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है। इस दिन देवी को प्रसन्न करने के लिए शहद और मीठे पान का भोग लगाया जाता हैं। सूक्ष्म जगत जो अदृश्य, अव्यक्त है, उसकी सत्ता माँ कात्यायनी चलाती हैं। वह अपने इस रूप में उन सब की सूचक हैं, जो अदृश्य या समझ के परे है। माँ कात्यायनी दिव्यता के अति गुप्त रहस्यों की प्रतीक हैं।
मां कात्यायनी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

क्रोध किस प्रकार से सकारात्मक बल का प्रतीक है और कब यह नकारात्मक आसुरी शक्ति का प्रतीक बन जाता है ? इन दोनों में तो बहुत गहरा भेद है। आप सिर्फ़ ऐसा मत सोचिये कि क्रोध मात्र एक नकारात्मक गुण या शक्ति है। क्रोध का अपना महत्व, एक अपना स्थान है। सकारात्मकता के साथ किया हुआ क्रोध बुद्धिमत्ता से जुड़ा होता है,और वहीं नकारात्मकता से लिप्त क्रोध भावनाओं और स्वार्थ से भरा होता है। सकारात्मक क्रोध एक प्रौढ़ बुद्धि से उत्पन्न होता है। क्रोध अगर अज्ञान, अन्याय के प्रति है तो वह उचित है। अधिकतर जो कोई भी क्रोधित होता है वह सोचता है कि उसका क्रोध किसी अन्याय के प्रति है अतः वह उचित है! किंतु अगर आप गहराई में, सूक्ष्मता से देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ऐसा वास्तव में नहीं है। इन स्थितियों में क्रोध एक बंधन बन जाता है। अतः सकारात्मक क्रोध जो अज्ञान, अन्याय के प्रति है, वह माँ कात्यायनी का प्रतीक है।
       आपने बहुत सारी प्राकृतिक आपदाओं के बारे में सुना होगा। कुछ लोग इसे प्रकृति का प्रकोप भी कहते हैं। उदाहरणतः बहुत से स्थानों पर बड़े - बड़े भूकम्प आ जाते हैं या तीव्र बाढ़ का सामना करना पड़ता है। यह सब घटनाएँ देवी कात्यायनी से सम्बन्धित हैं। सभी प्राकृतिक विपदाओं का सम्बन्ध माँ के दिव्य कात्यायनी रूप से है। वह क्रोध के उस रूप का प्रतीक हैं जो सृष्टि में सृजनता, सत्य और धर्म की स्थापना करती हैं। माँ का दिव्य कात्यायनी रूप अव्यक्त के सूक्ष्म जगत में नकारात्मकता का विनाश कर धर्म की स्थापना करता है। ऐसा कहा जाता है कि ज्ञानी का क्रोध भी हितकर और उपयोगी होता है,जबकि अज्ञानी का प्रेम भी हानिप्रद हो सकता है। इस प्रकार माँ कात्यायनी क्रोध का वो रूप है, जो सब प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
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कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप शनि ग्रह से संबंधित है। इसलिए सप्तम दिन पूजन करने से शनि की पीड़ा शांत होती है। शनि की साढ़ेसाती, ढैया आदि के दुष्प्रभाव कम होते हैं। नवरात्रि के सातवें दिन सफेद रंग कि कपड़े पहनने चाहिए।
मां कालरात्रि  का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण---
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

यह माँ का अति भयावह व उग्र रूप है। सम्पूर्ण सृष्टि में इस रूप से अधिक भयावह और कोई दूसरा नहीं। किन्तु तब भी यह रूप मातृत्व को समर्पित है। देवी माँ का यह रूप ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है।माँ कालरात्रि की पूजा भूत-प्रेतों से मुक्ति दिलवाने वाली होती हैं।देवी कालरात्रि की उपासना करने से सभी दुख दूर होते हैं। इस दिन माता को गुड़ के नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए । नकारात्मक शक्तियों से बचने के लिए आप गुड़ का भोग लगा सकते हैं। इसके अलावा नींबू काटकर भी मां को अर्पित कर सकते हैं।
सिंह राशि वाले जातक को माता पीताम्बरा या माता कालरात्रि की उपासना करनी चाहिए।
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महागौरी
देवी का आठवां स्वरूप महागौरी है। इनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप राहु को नियंत्रित करता है। राहू की पीड़ा होने पर जातक का जीवन अव्यवस्थित हो जाता है। महागौरी की पूजा से राहु शांत होता है। दुर्गा मां की आठवें दिन की पूजा गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए।
मां महागौरी का यह मंत्र करेें आपका कल्याण--
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्र के आंठवें दिन महागौरी के स्वरूप का वंदन किया जाता है। इस दिन नारियल का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि आती है। मां के इस रूप को नारियल का भोग लगाया जाता हैं। इस भोग से संतान सुख की प्राप्ति होती हैं। महागौरी की पूजा करने के बाद पूरी, हलवा और चना कन्याओं को खिलाना शुभ माना जाता है। इनकी पूजा से संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
महागौरी का अर्थ है - वह रूप जो कि सौन्दर्य से भरपूर है, प्रकाशमान है - पूर्ण रूप से सौंदर्य में डूबा हुआ है। प्रकृति के दो छोर या किनारे हैं - एक माँ कालरात्रि जो अति भयावह, प्रलय के समान है, और दूसरा माँ महागौरी जो अति सौन्दर्यवान, देदीप्यमान,शांत है - पूर्णत: करुणामयी, सबको आशीर्वाद देती हुईं। यह वो रूप है, जो सब मनोकामनाओं को पूरा करता है।
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सिद्धिदात्री--
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। 
देवी का नवम स्वरूप सिद्धिदात्री केतु ग्रह को नियंत्रित करता है। इनकी पूजा से केतु ग्रह के दुष्प्रभावों से राहत मिलती है। कर्क,धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि वालों को भी माता कमल/काली या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।इन सभी  राशि वाले जातक को कमला या माता सिद्धिदात्री की उपासना करने से सफलता मिलती हैं। इनकी पूजा आसमानी रंग (हल्के नील रंग) के कपड़े पहनकर करना शुभ माना जाता है।
नवरात्र के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री को जगत को संचालित करने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन माता को हलवा, पूरी, चना, खीर, पुए आदि का भोग लगाएं।कोई भी अनहोनी से बचने के लिए इस दिन मां के भोग में अनार को शामिल किया जाता हैं।
यह मन्त्र करेगा आपका कल्याण--
नवरात्रि का नौवां दिन--
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

हमारी प्रार्थना हैं कि ...
देवी महागौरी आपको भौतिक जगत में प्रगति के लिए आशीर्वाद और मनोकामना पूर्ण करती हैं, ताकि आप संतुष्ट होकर अपने जीवनपथ पर आगे बढ़ें। माँ सिद्धिदात्री आपको जीवन में अद्भुत सिद्धि, क्षमता प्रदान करती हैं ताकि आप सबकुछ पूर्णता के साथ कर सकें। सिद्धि का क्याअर्थ है? सिद्धि, सम्पूर्णता का अर्थ है – विचार आने से पूर्व ही काम का हो जाना। आपके विचारमात्र, से ही, बिना किसी कार्य किये आपकी इच्छा का पूर्ण हो जाना यही सिद्धि है।  आपके वचन सत्य हो जाएँ और सबकी भलाई के लिए हों। आप किसी भी कार्य को करें वो सम्पूर्ण हो जाए - यही सिद्धि है। सिद्धि आपके जीवन के हर स्तर में सम्पूर्णता प्रदान करती है। यही देवी सिद्धिदात्री की महत्ता है।

शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग में

Auspicious-beginning-of-Sharadiya-Navratri-in-Sarvarthasiddhi-Yoga-and-Amritasiddhi-Yoga-2019-शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग मेंइस वर्ष शारदीय नवरात्रि 29 सितंबर 2019 से शुरु होने जा रहे हैं। हिंदू धर्म के लोगों के लिए ये पूजा अर्चना के विशेष दिन होते हैं। इन दिनों मां दुर्गा के विभिन्न  स्वरूपों की उपासना की जाती है। नवरात्रि के इन में 9 दिनों तक माता दुर्गा के 9 स्वरूपों की आराधना करने से जीवन में ऋद्धि-सिद्धि ,सुख- शांति, मान-सम्मान, यश और समृद्धि की प्राप्ति शीघ्र ही होती है। माता दुर्गा हिन्दू धर्म में आद्यशक्ति  के रूप में सुप्रतिष्ठित है तथा माता शीघ्र फल प्रदान करनेवाली देवी के रूप में लोक में प्रसिद्ध है। देवीभागवत पुराण के अनुसार आश्विन मास में माता की पूजा-अर्चना व नवरात्र व्रत करने से मनुष्य पर देवी दुर्गा की कृपा सम्पूर्ण वर्ष बनी रहती है और मनुष्य का कल्याण होता है। 
   हमारे देश में शारदीय (आश्विन) नवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है, इस समय देश के लगभग सभी छोटे-बड़ें शहरो, गांवों में माँ दुर्गा की मृतिका से बनी प्रतिमा का अस्थाई स्थापना करके पूजा आराधना की जाती है। शरद ऋतु की इस आश्विन नवरात्रि को माँ दुर्गा की असुरों पर विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है, इसलिए नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरुपों की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी राज्यों सहित सभी क्षेत्रों में धूम-धाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में देवी दुर्गा के भक्त नौ दिनों उपवास रखते हैं तथा माता की चौकी स्थापित की जाती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों को बहुत पावन माना जाता है। इन दिनों घरों में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि चीज़ों का परहेज़ कर सात्विक भोजन किया जाता है। नौ दिन उपवास के बाद नवमी या दसवीं पूजन किया जाता है जिसमें कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करके नौ दिनों तक देवी दुर्गा की आराधना और व्रत का संकल्प लिया जाता है। नवरात्रि के दिनों में चारों ओर माता की चौकी और जगराते कर भजन कीर्तन किया जाता है।
इस बार की नवरात्रि में किसी बीजो तिथि का क्षय नहीं है।  8 अक्टूबर 2019 को विजयादशमी है इसी दिन नवरात्रि पूजन का समापन होगा। नवरात्र में लोग अपने घरों में कलश की स्थापना करते हैं।  
यह रहेंगी शरद नवरात्रि की तिथियां --
  1. नवरात्रि प्रथम दिन 1 (प्रतिपदा) को देवी की अस्थाई मूर्ति की स्थापना, घटस्थापना (कलश स्थापना) होगी। पहले दिन माँ शैलपुत्री की होगी। 29 सितंबर 2019 (रविवार) को
  2. नवरात्रि दिन 2 (द्वितीया) मां ब्रह्मचारिणी पूजा, 30 सितंबर 2019 (सोमवार)
  3. नवरात्रि दिन 3 (तृतीया) मां चंद्रघंटा पूजा, 1 अक्टूबर 2019, (मंगलवार)
  4. नवरात्रि दिन 4 (चतुर्थी) मां कूष्मांडा पूजा, 2 अक्टूबर 2019 (बुधवार)
  5. नवरात्रि दिन 5 (पंचमी) मां स्कंदमाता पूजा, 3 अक्टूबर 2019 (गुरुवार)
  6. नवरात्रि दिन 6 (षष्ठी‌) मां कात्यायनी पूजा, 4 अक्टूबर 2019 (शुक्रवार)
  7. नवरात्रि दिन 7 (सप्तमी) मां कालरात्रि पूजा, 5 अक्टूबर 2019 (शनिवार)
  8. नवरात्रि दिन 8 (अष्टमी) मां महागौरी, दुर्गा महा अष्टमी पूजा, दुर्गा महा नवमी पूजा 6 अक्टूबर 2019, (रविवार)
  9. नवरात्रि दिन 9 (नवमी) मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारणा 7 अक्टूबर 2019, (सोमवार) को किया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के नवमें दिन माँ सिद्धदात्री की आयुध पूजा, नवमी हवन, नवरात्रि पारण आदि संपन्न होगा। घट विसर्जन भी इसी दिन किया जा सकता है।
  10. नवरात्रि दिन 10 (दशमी) दुर्गा विसर्जन, विजय दशमी (दशहरे का महापर्व) का पर्व 8 अक्टूबर 2019, (मंगलवार) को मनाया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन दशमी तिथि को माँ दुर्गा की विदाई एवं अस्थाई रूप से स्थापित मूर्ति विसर्जन होगा। 

नवरात्रि कलश स्थापना समय और पूजा विधि, सामग्री --
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना से होती है।इस साल कलश स्थापना का मुहूर्त 29 सितंबर 2019 को सुबह 6 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।आप इस1 घंटे 24 मिनट के बीच घटस्थापना या कलश स्थापना कर सकते हैं। इसे शुभ मुहूर्त पर करना अनिवार्य है।अगर आप इस मुहूर्त में कलश स्थापना ना कर पायें तो फिर घटस्थापना अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा उसमें कर सकते हैं। कलश स्थापना के लिए तड़के सुबह उठकर सुबह स्नान कर साफ सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 
‘शारदीय नवरात्र’ के व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए। पूजा करने के उपरान्त इस मंत्र द्वारा माता की प्रार्थना करना चाहिए-

"विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमांश्रियम्| रूपंदेहि जयंदेहि यशोदेहि द्विषोजहि ||"

पंचांग के अनुसार 29 सितंबर 2019 को यानी नवरात्र के पहले दिन रात 10.11 मिनट तक प्रतिपदा है। जिस कारण कलश स्थापना का लंबा समय मिलेगा। यानी कि नवरात्रि के पहले दिन कभी भी कलश की स्थापना की जा सकती है। लेकिन कलश स्थापना के लिए प्रात:काल का समय सबसे उत्तम रहेगा।
दुर्गा पूजन सामग्री-
पंचमेवा पंच​मिठाई रूई कलावा, रोली, सिंदूर, १ नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग,  पान के पत्ते 5 , घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, शर्करा ), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी की गांठ , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, , आरती की थाली. कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, ​तिल, सुवर्ण प्र​तिमा 2, आभूषण व श्रृंगार का सामान, फूल माला . दुर्गा पूजन शुरू करने से पूर्व चौकी को धोकर माता की चौकी सजायें।

पूजन और संकल्प की तैयारी --
आसन बिछाकर गणपति एवं दुर्गा माता की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं. इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें 
 “ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥” 

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें – 
ॐ केशवाय नम: ॐ नारायणाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ गो​विन्दाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-

ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। 
त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ 
शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए. अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें- 
चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्,
आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।

दुर्गा पूजन हेतु संकल्प –
पंचोपचार करने बाद संकल्प करना चाहिए. संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें :
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य  ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2072, तमेऽब्दे कीलक नाम संवत्सरे दक्षिणायने शरद ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे आश्विन मासे शुक्ल पक्षे प्र​तिपदायां तिथौ गुरु वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये। 
गणपति पूजन –
किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है.हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें. 
गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। 
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।
आवाहन: हाथ में अक्षत लेकर
आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र ​विनायक।
तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥

ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर अक्षत गणेश जी पर चढा़ दें। हाथ में फूल लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आसनं समर्पया​मि, अर्घा में जल लेकर बोलें ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पया​मि, आचमनीय-स्नानीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पया​मि वस्त्र लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः वस्त्रं समर्पया​मि, यज्ञोपवीत-ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पया​मि, पुनराचमनीयम्, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः  रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम्  ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः , इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं. इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः, दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं.।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इदं नानाविधि नैवेद्यानि समर्पयामि, मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र- शर्करा खण्ड खाद्या​नि द​धि क्षीर घृता​नि च,
आहारो भक्ष्य भोज्यं गृह्यतां गणनायक। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें. इदं आचमनीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः . इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें- ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः ताम्बूलं 
समर्पया ​मि अब फल लेकर गणपति पर चढ़ाएं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः फलं समर्पया​मि, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः द्रव्य द​क्षिणां समर्पया​मि, अब ​विषम संख्या में दीपक जलाकर ​निराजन करें और भगवान की आरती गायें। हाथ में फूल लेकर गणेश जी को अ​र्पित करें,  ​फिर तीन प्रद​क्षिणा करें। 
इसी प्रकार से अन्य सभी देवताओं की पूजा करें. जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश के स्थान पर उस देवता का नाम लें. 
कलश पूजन – 
घड़े या लोटे पर कलावा बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें, नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें,हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आवाहन करें. ॐ त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानोहर्विभि:। अहेडमानोवरुणेह बोध्युरुशं समानऽआयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि,
ॐ भूर्भुव: स्व: भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।
इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण देवता की पूजा करें.  
दुर्गा पूजन-
सबसे पहले माता दुर्गा का ध्यान करें-
सर्व मंगल मागंल्ये ​शिवे सर्वार्थ सा​धिके ।
शरण्येत्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
आवाहन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहया​मि॥
आसन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आसानार्थे पुष्पाणि समर्पया​मि॥
अर्घ्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हस्तयो: अर्घ्यं समर्पया​मि॥
आचमन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आचमनं समर्पया​मि॥
स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। स्नानार्थं जलं समर्पया​मि॥
स्नानांग आचमन- स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पया​मि।
पंचामृत स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पंचामृतस्नानं समर्पया​मि॥
गन्धोदक-स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। गन्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
शुद्धोदक स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। शुद्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
आचमन- शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि।
वस्त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। वस्त्रं समर्पया​मि ॥ वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि। 
सौभाग्य सू़त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सौभाग्य सूत्रं समर्पया​मि ॥
चन्दन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। चन्दनं समर्पया​मि ॥
ह​रिद्राचूर्ण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ह​रिद्रां समर्पया​मि ॥
कुंकुम- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कुंकुम समर्पया​मि ॥ 
​सिन्दूर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ​सिन्दूरं समर्पया​मि ॥
कज्जल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कज्जलं समर्पया​मि ॥
दूर्वाकुंर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दूर्वाकुंरा​नि समर्पया​मि ॥
आभूषण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आभूषणा​नि समर्पया​मि ॥
पुष्पमाला- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पुष्पमाला समर्पया​मि ॥
धूप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। धूपमाघ्रापया​मि॥ 
दीप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दीपं दर्शया​मि॥ 
नैवेद्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। नैवेद्यं ​निवेदया​मि॥
नैवेद्यान्ते ​त्रिबारं आचमनीय जलं समर्पया​मि।
फल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। फला​नि समर्पया​मि॥
ताम्बूल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ताम्बूलं समर्पया​मि॥
द​क्षिणा- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। द​क्षिणां समर्पया​मि॥
आरती- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आरा​र्तिकं समर्पया​मि॥
क्षमा प्रार्थना--
न मंत्रं नोयंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥1॥                            
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥2॥                         
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥3॥                          
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति ॥4॥                         
परित्यक्तादेवा विविध​विधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदर जननि कं यामि शरण् ॥5॥              
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥6॥    
                    
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥7॥                            
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः ॥8॥                         
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥9॥                                    
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥10॥                                       
जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि ।
अपराधपरंपरावृतं नहि मातासमुपेक्षते सुतम् ॥11॥                                                     
मत्समः पातकी नास्तिपापघ्नी त्वत्समा नहि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवियथायोग्यं तथा कुरु  ॥12॥

इस बार शारदीय नवरात्रि के 9 दिनों में 8 दिन विशेष योग बनेंगे। जिसकी वजह से नवरात्रि की पूजा काफी शुभ और फलदायी होगी। 2 दिन अमृतसिद्धि, 2 दिन सर्वार्थ सिद्धि और 2 दिन रवि योग बनेंगे। नवरात्रि के यह 9  दिन शक्ति की उपासना के लिए बेहद शुभ होते हैं। ये देश में खुशहाली के संकेत हैं। नवरात्रि का प्रारम्भ सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग जैसे बेहद विशेष संयोग में हो रहा है।
जानिए किस तारीख को क्या योग बनेगा--
  • 30 सितंबर 2019 को अमृत सिद्धि योग 
  • 1 अक्टूबर को रवि योग 
  • 2 अक्टूबर को अमृत और  सिद्धि योग
  • 3 अक्टूबर को सर्वार्थ सिद्धि 
  • 4 अक्टूबर को रवि योग
  • 5 अक्टूबर को रवि योग
  • 6 अक्टूबर को सर्वसिद्धि योग रहेगा।
  • इस वर्ष 2019 में  7 अक्टूबर 2019 को महानवमी दोपहर 12.38 तक रहेगी। इसके बाद दशमी यानी दशहरा होगा।
  • दशहरा या विजयदशमी  8 अक्टूबर 2019 को दोपहर 14 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। यह बहुत ही शुभ सयोग है।

जानिए नवरात्रि में दो सोमवार का महत्व--
9 दिन की नवरात्रि में इस वर्ष दो सोमवार  आ रहे हैं। यह अत्यंत शुभ संयोग है क्योंकि सोमवार को दुर्गा पूजा का हजार, लाख गुना नहीं बल्कि करोड़ गुना फल मिलता है। चूंकि सोमवार का स्वामी चन्द्रमा है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को सोम कहा गया है और भगवान शिव को सोमनाथ। अतः सोमवार के दिन शक्ति की अनेक प्रकार के गन्ध, पुष्प,धूप, दीप, नैवेद्यादि उपचारों से पूजन करने से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।
शारदीय नवरात्रि 2019..
अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 29 सितंबर 2019 (रविवार) से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहा है। इस वर्ष किसी तिथि का क्षय नहीं है, इसलिए पहली बार कलश स्थापित कर माता की आराधना करने वाले भक्तों के लिए इस बार का नवरात्र हर तरह से शुभकारी है। 29 सितंबर (रविवार) को विधि विधान से कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा का आवाह्न होगा। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस वर्ष कलश स्थापना के लिए बहुत ही शुभ नक्षत्र ओर याेग का संयाेग बन रहा है। हस्त नक्षत्र से युक्त अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा कलश स्थापना के लिए सर्व मंगलकारी है। 
     28 सितंबर (शनिवार)की रात 11:14 बजे से हस्त नक्षत्र शुरू हाे रहा है, जाे 29 की रात 9:40 बजे तक है। रविवार काे ब्रह्म मुहूर्त से दिन के 2:08 (दोपहर)बजे तक एक साथ ब्रह्म, सर्वार्थ सिद्धि और अमृत याेग है। इसके अलावा कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि पड़ रही है। नक्षत्र, याेग और राशि के हिसाब से सुबह से लेकर दाेपहर 2 बजे तक कलश स्थापन करना अत्यंत शुभ लाभ प्रद है।
     ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि की इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर मां दुर्गा का आगमन हर तरह से शुभ है क्योंकि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर हाे रहा है। हाथी पर माता का आगमन बारिश और उन्नत कृषि के साथ सुख-समृद्धि का प्रतीक है।  मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। इस कारण अधिक बारिश होगी। साथ ही अनाज की पैदावार भी अधिक होगी। किसान खुशहाल होंगे। देश की राजनीति में उथल-फुथल हो सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की शक्ति बढ़ेगी। 
मां दुर्गा का आने-जाने का मिश्रित फल के अनुसार स्थिति सामान्य रहेगा।
उल्लेखनीय हैं कि वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार मां की सवारी दिन के हिसाब से तय होती है– 
  • - सोमवार को मां की सवारी : हाथी।
  • - मंगलवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - बुधवार को मां की सवारी : नाव।
  • - गुरूवार को मां की सवारी : डोली।
  • - शुक्रवार को मां की सवारी : डोली।
  • – शनिवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - रविवार को मां की सवारी : हाथी।

  1. 6 अक्टूबर 2019 काे (रविवार) संधि पूजा हाेगी। 
  2. इस दिन दोपहर के 14.15 बजे तक महाअष्टमी और इसके बाद महानवमी शुरू हाे जाएगी। 
  3. 6 अक्टूबर काे दोपहर में दिन के दाे बजे से संधि पूजा हाेगी। इसी दिन कन्या पूजन भी हाेगी। 
  4. इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर किसी भी तिथि का लाेप नहीं है। 7 अक्टूबर (सोमवार) काे दोपहर में दिन के 15:04 बजे तक महानवमी है। जाे लाेग घराें में कलश स्थापित कर मां की अराधना करेंगे, वे नवमी तिथि समाप्त हाेने से पहले हवन का कार्य संपन्न करेंगे।

जानिए इस वर्ष 2019 में कब करें "हरतालिका तीज व्रत"

हरतालिका तीज व्रत 2 सितंबर 2019 को ही मनाया जाना शास्त्र सम्मत क्यों होगा

सम्पूर्ण भारतवर्ष में "हरतालिका तीज" सुहागिन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले प्रमुख व्रतों में से एक है। यह व्रत पति की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए रखा जाता है। इस दौरान महिलाएं निर्जला व्रत रखकर माता गौरी और भगवान भोले नाथ की आराधना करती हैं। हिन्‍दू पंचांग के अनुसार यह व्रत हर साल भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया को आता है लेकिन इस बार जन्‍माष्‍टमी की ही तरह हरतालिका तीज  की तिथि को लेकरक असमंजस की स्थिति बन गई है। महिलाओं को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर किस दिन हरतालिका तीज का व्रत रखा जाना चाहिए। कुछ लोग कह रहे हैं कि व्रत 1 सितंबर को होगा, जबकि कुछ लोग 2 सितंबर को व्रत रखने की सलाह दे रहे हैं।
*पंचांग भेद* को लेकर एक बार फिर *हरितालिका तीज व्रत* की तिथि 1 सितंबर रविवार और 2 सितंबर सोमवार को पंचांगों में बताई गई है।
नीमच के *निर्णय सागर पंचांग* में हरितालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल द्वितीया रविवार *( 1 सितंबर )* को बताई है।
जबकि *उज्जैन के महाकाल पंचांग* में हरितालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया सोमवार *( 2 सितंबर )* को बताई है।
Know-when-to-do-Hartalika-Teej-Vrat-in-2019-जानिए इस वर्ष 2019 में कब करें "हरतालिका तीज व्रत"सम्पूर्ण भारत वर्ष में "हरतालिका तीज" सुहागिन महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक है. यह व्रत पति की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए रखा जाता है। इस दौरान महिलाएं निर्जला व्रत रखकर माता गौरी और भगवान भोले नाथ की आराधना करती हैं। हिन्‍दू पंचांग के अनुसार यह व्रत हर साल भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया को आता है. लेकिन इस बार जन्‍माष्‍टमी की ही तरह हरतालिका तीज की तिथि को लेकरक असमंजस की स्थिति बन गई है. महिलाओं को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर किस दिन हरतालिका तीज का व्रत रखा जाना चाहिए. कुछ लोग कह रहे हैं कि व्रत 1 सितंबर को होगा, जबकि कुछ लोग 2 सितंबर को व्रत रखने की सलाह दे रहे हैं।  इस तरह की स्थिति करीब 23 वर्षों के बाद उत्पन्न हो गयी है। 
हरतालिका तीज की तिथि को लेकर असमंजस क्‍यों?
हरतालिका तीज का व्रत भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया यानी कि गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले रखा जाता है. अब समस्‍या यह है कि इस साल पंचांग की गणना के अनुसार तृतीया तिथि का क्षय हो गया है यानी कि पंचांग में तृतीया तिथि का मान ही नहीं है. इस हिसाब से 1 सितंबर को जब सूर्योदय होगा तब द्वितीया तिथि होगी, जो कि 08 बजकर 27 मिनट पर खत्‍म हो जाएगी इसके बाद तृतीया तिथि लग जाएगी।  के मुताबिक तृतीया तिथि अगले दिन यानी कि दो सितंबर को सूर्योदय से पहले ही सुबह 04 बजकर 57 मिनट पर समाप्‍त हो जाएगी। ऐसे में असमंजस इस बात का है कि जब तृतीया तिथि को सूर्य उदय ही नहीं हुआ तो व्रत किस आधार पर रखा जाए।शास्त्रों के अनुसार तृतीया और चतुर्थी मिली हुई तिथि में तीज व्रत का पूजा करना उत्तम है। यही कारण है कि 2 सितंबर को तीज व्रत है। उज्जैन (मध्यप्रदेश) के आसपास के अधिकतर महिलाएं दो सितंबर 2019 को ही तीज व्रत करेंगी।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि व्रतधारी सुहागनों को हस्‍त नक्षत्र में तीज का पारण नहीं करना चाहिए। जो महिलाएं 1 सितंबर 2019 को व्रत रखेंगी उन्‍हें 2 सितंबर को तड़के सुबह हस्‍त नक्षत्र में ही व्रत का पारण करना पड़ेगा, जो कि गलत है। वहीं अगर महिलाएं 2 सितंबर 2019 को व्रत करें तो वे 3 सितंबर को चित्रा नक्षत्र में व्रत का पारण करेंगी। 
पुराणों में चित्रा नक्षत्र में व्रत का पारण करना शुभ और सौभाग्‍यवर्द्धक माना गया है।
  • इन तिथि भेद का स्पष्टिकरण  *निर्णय सिंधु के पृष्ठ 169 - 170 पर विस्तार से दिया गया है।*
  • निर्णय सिंधु ने स्पष्ट किया है कि हरतालिका व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया को होता है। उसमें अगली तिथि ग्रहण करना चाहिए। चतुर्थी सहित तीज अधिक फल देती है। यह सौभाग्य को बढ़ाने वाली होती है।* 
  • जबकि
  • द्वितीया से संयुक्त तीज व्रत वैधव्य प्रदान करती है।* 
  • अतः हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया सोमवार 2 सितंबर को ही करना उत्तम है। निर्णय सिंधु के अनुसार 1 सितंबर को तीज व्रत करने की मनाही है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार अगर आप हरतालिका तीज का व्रत रखने की सोच रही हैं तो पहले अपने किसी परिचित विद्वान और अनुभवी पंडित या ज्‍योतिषी से तिथी को लेकर विचार-विमर्श जरूर कर लें। इस व्रत में सुहागन व्रती महिला निर्जला रहकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं ।हरतालिका तीज व्रत उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में रखा जाता है। इस दिन महिलाएं शिव, पार्वती के साथ गणेश जी की पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन निर्जला व्रत करती हैं। कुछ महिलाएं उसी दिन शाम के पूजन के बाद जल ग्रहण कर लेती हैं तो कुछ अगले दिन ही जल ग्रहण करती हैं। कहा जाता है कि अगर एक बार आप इस व्रत को करना शुरू कर देते हैं तो इसे दोबारा छोड़ा नहीं जाता है। इस व्रत को सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं।
     आचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने कहा कि दिनभर निर्जला रहकर महिलाएं शाम में बालू से बने शिव-पार्वती की पूजा करते हैं। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार हरितालिका व्रत से सौभाग्यवती स्त्री जहां दीर्घायु पति पाती हैं वहीं यदि कुमारी व्रत करें तो मनचाहा वर प्राप्त कर सकती हैं। क्षेत्रवाद के अनुसार परंपरा का निर्वहन किया जाता है।

जाने और समझे पर्युषण पर्व के महत्व को,उद्देश्य और कैसे मनाएं

जैन धर्म में सभी पर्वों का राजा है "पर्युषण पर्व"---

प्रिय पाठकों/मित्रों, पर्यूषण पर्व जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर संप्रदाय के जैन अनुयायी इसे दस दिन तक मनाते हैं। इस पर्व में जातक विभिन्न आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ करके जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर अर्हंतों में से ही होते हैं। 
      इस धर्म में चातुर्मास पर्व यानि चार महीने तक चलने वाला पर्व का बहुत महत्व हैं। जैन धर्म में यह चार महीने अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और इन चार महीनों में भी पर्युषण पर्व का समय सबसे अहम् होता हैं. जैन धर्म में पर्युषण महापर्व विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक पर्व हैं, जो हर वर्ष वर्षा ऋतू के समय आता हैं. हिन्दू पंचांग के अनुसार भादो मास में पड़ने वाला यह पर्व, जैन धर्म के अनुयाइयों के लिए आत्मा से परमात्मा तक पहुचने का पर्व होता हैं।
      पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के मतानुसार यह पर्व भाद्रपद कृष्ण १२ से प्रारम्भ हो कर भाद्रपद शुक्ला ४ को पूर्ण होता है। पर्युषण पर्व का अन्तिम दिन संवत्सरी कहलाता है। संवत्सरी पर्व पर्युषण ही नहीं जैन धर्म का प्राण है। इस दिन सांवत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं। सांवत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी ८४ लाख जीव योनी से क्षमा याचना की जाती है। यहाँ क्षमा याचना सभी जीवों से वैर भाव मिटा कर मैत्री करने के लिए होती है। क्षमा याचना शुद्ध ह्रदय से करने से ही फल प्रद होती है। इसे औपचारिकता मात्र नही समझना चाहिए।पर्यूषण पर्व पर क्षमत्क्षमापना या क्षमावाणी का कार्यक्रम ऐसा है जिससे जैनेतर जनता को काफी प्रेरणा मिलती है। इसे सामूहिक रूप से विश्व-मैत्री दिवस के रूप में मनाया जा सकता है। पर्यूषण पर्व के समापन पर इसे मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी या ऋषि पंचमी को संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। उन्हें वे 'दसलक्षण' के नाम से भी संबोधित करते हैं।
जाने और समझे पर्युषण पर्व के महत्व को,उद्देश्य और कैसे मनाएं-Know-and-understand-the-importance-of-Paryushan-festival-purpose-and-how-to-celebrate        उस दिन लोग उपवास रखते हैं और स्वयं के पापों की आलोचना करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसके साथ ही वे चौरासी लाख योनियों में विचरण कर रहे, समस्त जीवों से क्षमा माँगते हुए यह सूचित करते हैं कि उनका किसी से कोई बैर नहीं है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय-व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ- सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं।

इस वर्ष पर्युषण पर्व का शुभारम्भ 27 अगस्त 2019  (मंगलवार) से होगा और समापन भी 03 सितम्बर 2019 (मंगलवार) को ही  होगा |

"खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्तिमे सव्व भुएस्‌ वैरं ममझं न केणई।"

यह वाक्य परंपरागत जरूर है, मगर विशेष आशय रखता है। इसके अनुसार क्षमा माँगने से ज्यादा जरूरी क्षमा करना है। क्षमा देने से आप अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे और सभी जीवों और पदार्थों के प्रति मैत्री भाव रखेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है जब वह अपने सेबाहर हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमा-भाव इसका मूलमंत्र है।
       पर्युषण शब्द का अर्थ है एक स्थान पर निवास करना। द्रव्य से इस समय साधू साध्वी भगवंत एक स्थान पर निवास करते हैं। भाव से अपनी आत्मा में स्थिरवास करना ही वास्तविक पर्युषण है। इस लिए इस समय यथासंभव विषय एवं कषायों से दूर रह कर अपनी आत्मा में लीन होने के लिए आत्म चिंतन करना चाहिए। साथ ही सामायिक, प्रतिक्रमण, देवपूजन, गुरुभक्ति, साधर्मी वात्सल्य आदि भी यथाशक्ति करने योग्य है।
     जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है− आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है− कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण−पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।पर्युषण आत्मशुद्धि का पर्व है, कोई लौकिक त्यौहार नहीं। जैन धर्म पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित हैं. इस धर्म की मान्यताओं के अनुसार किसी भी जीव के साथ किसी भी तरह की हिंसा को पुर्णतः अनुचित कहा गया हैं और अपनी इसी विचारधारा को ध्यान में रखकर जैन धर्म में पर्युषण पर्व की शुरुआत की गयी थी.
      जैन धर्म के संस्थापक भगवान् महावीर के अनुसार अपने आसपास की धरती में बारिश का मौसम ही एक ऐसा समय होता हैं जब सबसे अधिक कीड़े मकोड़े या इसी तरह के कई अन्य जीव वातावरण में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं. इन प्राणियों में कई ऐसे जीव भी होते हैं जो खुली आँखों से हमें दिखाई भी नही देते हैं और ऐसे में यदि मनुष्य जाति अधिक चलना-फिरना करे तो  इस तरह के जीवों को नुकसान पहुचता हैं जो जैन धर्म की विचारधारा के विपरीत एक तरह की हिंसा मानी जाती हैं. अपनी इसी विचार को ध्यान में रख कर भगवान महावीर ने सभी लोगों से यहीं कहाँ कि इन चार महीनो में हम सब को एक ही जगह रह कर धर्म कल्याण के लिय कार्य करना चाहिए. तब से महावीर की इन बातों को जैन साधू सिरोधार्य कर के हर वर्ष किसी एक स्थान का चयन कर ठहर जाते हैं और वही से लोगों को धर्म और कल्याण की बाते समझाते हैं.
       इस पर्युषण पर्व का मुख्य उद्देश्य यह होता हैं कि जैन धर्म में उल्लेखित अहिंसा का विचार पूरी दुनिया में जाए और जितना संभव हो सके मनुष्य जाति दुनिया में व्याप्त बाकि प्राणियों की मृत्यु का कारण न बने। पर्युषण में दान, शील, तप व भाव रूप चार प्रकार के धर्म की आराधना की जाती है। इस में भी भाव धर्म की विशेष महत्ता है। दान, शील व तप रूप धर्म-क्रिया मात्र भाव-धर्म को पुष्ट करने के साधन हैं। पर्युषण में अनुकम्पा दान, सुपात्र दान व अभय दान रूप दान-धर्म, सदाचार, विषय त्याग, ब्रह्मचर्य अदि रूप शील धर्म, उपवास, आयम्बिल, विगय त्याग, रसत्याग आदि रूप बाह्य धर्म व प्रायश्चित्त, विनय, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान व कायोत्सर्ग रूप अभ्यंतर तप की आराधना करनी चाहिए।
     यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय−व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ−सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ−सफाई करते हैं। पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है। 
      पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। 
जैनी आचरण और व्यवहार से जीव मात्र की रक्षा को अपना परम कर्तव्य मानते हैं। विशेषकर चातुर्मास के इन दिनों परिवेश में और अप्रत्यक्ष रूप से भी पशु हिंसा से बचने का यथासंभव प्रयास किया जाता है। सूक्ष्म जीवों के नाश की आशंका को देखते हुए आहार में 'खाद्य-अखाद्य' का विशेष ध्यान रखा जाता है। जैन समुदाय की भावनाओं को देखते हुए पर्युषण पर्व के दौरान मुंबई में नियत दिन कत्लखाने बंद रखे जाते हैं। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक त्योहार है। पर्व शुरू होने के साथ ही ऐसा लगता है मानो किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो। यह पर्व मैत्री और शांति का पर्व है। जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्यूषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। उन्हें वे दसलक्षण के नाम से भी संबोधित करते हैं। यह पर्व अपने आप में ही क्षमा का पर्व है। इसलिए जिस किसी से भी आपका बैरभाव है, उससे शुद्ध हृदय से क्षमा मांग कर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें। 
          भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम हैं। संसार के सारे तीर्थ जिस प्रकार समुद्र में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार दुनिया भर के संयम, सदाचार एवं शील ब्रह्मचर्य में समाहित हो जाते हैं। मानव की सोई हुई अन्तः चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है। जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो।
       दशलक्षण पर्व, जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण पर्व है। दशलक्षण पर्व संयम और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के जातक अपने मुख्य दस लक्षणों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। जैन धर्मानुसार दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य को इस संसार से मुक्ति मिल सकती है। संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र त्यौहार पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत−उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा भगवान महावीर का अभिषेक कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं जैसे बाहर का खाना पूर्णतः वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैन धर्मावलंबी अपने यहां पर क्षमा की विजय पताका फहराते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलकर अपने अगले भव को सुधारने का प्रयत्न करते हैं। आइए! हम सभी अपने राग−द्वेष और कषायों को त्याग कर भगवान महावीर के दिखाए मार्ग पर चलकर विश्व में अहिंसा और शांति का ध्वज फैलाएं। क्षमा करें और कराएं।इस दौरान जैन साधु व साध्वी किसी एक जगह पर स्थिर होकर तप, प्रवचन तथा जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में ध्यान लगाते हैं, जबकि आम धर्मानुयायी त्याग-प्रत्याख्यान, पौषध सामायिक, स्वाध्याय, जप-तप, आगम, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा, संयम और उपवास के साथ जैन मुनियों की सेवा में दिन व्यतीत करते हैं।
पर्यूषण पर्व का उद्देश्य ----
पर्यूषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करके आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है। पर्यूषण पर्व के इस शुभ अवसर पर जैन संत और विद्वान समाज को पर्यूषण पर्व की दशधर्मी शिक्षा को अनुसरण करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
पर्यूषण पर्व समारोह -----
पर्यूषण पर्व के दौरान मंदिर, उपाश्रय, स्थानक तथा समवशरण परिसर में अधिकाधिक समय तक रहना जरूरी माना जाता है। इस दौरान कई जातक निर्जला व्रत भी करते हैं।
पर्यूषण पर्व की शिक्षा ---
मानव की सोई हुई अन्त: चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है।
एकता पर्व----
पर्युषण, जैन अनुयायियों के आध्यात्मिक पर्वों में अग्रगण्य और जैन एकता का प्रतीक पर्व है। इसका अर्थ है परि+उषण यानी आत्मा के उच्चभावों में रमण और आत्मा के सात्विक भावों का चिंतन। श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी या त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी या पंचमी तक अष्टदिवसीय साधना के रूप में तथा दिगम्बर परम्परा में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद चतुर्दशी तक क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, तप, त्याग, अकिचन्य, ब्रह्मचर्य आदि दस लक्षण पर्व धर्म आराधना के रूप में मनाया जाता है।
     चातुर्मास प्रारंभ से एक माह बीस दिन बाद तक का काल 'संवत्सरी पर्व' कहलाता है। पर्युषण पर्व के आखिरी दिन, यानी संवत्सरी पर गुरू के सन्मुख प्राणीमात्र से ज्ञात-अज्ञात, स्वार्थ या प्रमादवश हुई गलतियों के लिए अंतरमन की गहराई से जीव मात्र से क्षमायाचना की जाती है तथा दूसरों को क्षमादान दिया जाता है।
आठ कर्मों के निवारण के लिए साधना----
अपने चारों ओर फैले बाहर के विषय – विकारों से मन को हटा कर अपने घर में आध्यात्मिक भावों में लीन हो जाना। यदि हम हर घड़ी हर समय अपनी आत्मा का शोधन नहीं कर सकते तो कम से कम पर्युषण के इन आठ दिनों में तो अवश्य ही करें। आठ कर्मों के निवारण के लिए साधना के ये आठ दिन जैन परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण बन गए। सारांश में हम यह कह सकते हैं कि इन आठ दिनों में धर्म ही जीवन का रूप ले लेता है। धर्म से समाज में सहयोग और सामाजिकता का समावेश होता है। बगैर इसके समाज का अस्तित्व संभव नहीं है। इसी से समाज , जाति और राष्ट्र में समरसता आती है और उसकी उन्नति होती है। इसी से मनुष्य का जीवन मूल्यवान बनता है। धर्म प्रधान व्यक्ति सभी को समान दृष्टि से देखता है। अमीर – गरीब , ऊंच – नीच सभी उसकी दृष्टि में बराबर हैं। धर्म प्रधान व्यक्ति न किसी से डरता है और न ही उससे कोई डरता है। धर्म तो जीवन की औषधि है। वह जब मनुष्य में आता है तो ईर्ष्या , मद , घृणा जैसे कई रोग व विकार स्वत : दूर हो जाते हैं। पर्युषण महापर्व धर्ममय जीवन जीने का संदेश देता है।
     इन दिनों साधु वर्ग के लिए पांच विशेष कर्तव्य बताए गए हैं -संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, यथाशक्ति तपश्चर्या, आलोचना और क्षमायाचना। इसी तरह गृहस्थों (श्रावकों) के लिए भी कुछ विशेष कर्तव्य बताए गए हैं। इनमें मुख्य हैं -शास्त्रों का श्रवण, यथाशक्ति तप, अभयदान, सुपात्र दान, ब्रह्मचर्य का पालन, आरंभ स्मारक का त्याग, संघ की सेवा और क्षमा याचना।
आराधना-----
धर्म आराधना और उपासना
इसके अलावा आलस्य तथा प्रमाद का परित्याग करके धर्म आराधना और उपासना के लिए तत्पर बने रहना ही पर्युषण पर्व का मुख्य संदेश है। पर्युषण एक क्षमा पर्व भी है। यह हमें क्षमा मांगने और क्षमा करने की सीख देता है। क्षमा मांगना साहस भरा काम है, न कि दुर्बलता का। क्षमा करना वीरता का काम है। पर्युषण का यह पक्ष हमारे सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को नया जीवन देता है।
       संपूर्ण दुनिया में पर्युषण ही ऐसा पर्व है जो हाथ मिलाने और गले लगने का नहीं, पैरों में झुककर माफी माँगने की प्रेरणा देता है। हम सभी मिलकर इस पर्व के दस दिनों में क्षमा, मार्दव (अहंकार), आर्जव (सरल बनना), शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य ( ये ही दसलक्षण धर्म के सर्वोच्च गुण हैं। ) जो पर्युषण पर्व के रूप में आकर हमें पूरे देशव‍ासियों, प‍ारिवारिकजनों और जैन धर्मावलंबियों और प्राणी मात्र के प्रति सुख-शांति का संदेश देते हुए सभी को क्षमा करने और क्षमा माँगने की प्रेरणा देते हैं। जो व्यक्ति गलती या वैर-विरोध हो जाने पर तुरंत क्षमा माँग लेता है उसे पूरे वर्ष में एक बार नहीं, 365 बार क्षमा करने और माँगने का सौभाग्य मिल जाता है। वर्ष भर छोटे बड़ों को प्रणाम करते हैं पर एकमात्र पर्युषण पर्व ऐसा है जिसमें क्षमा पर्व के दिन सास बहू को, पिता-पुत्र को बड़े-छोटों को प्रणाम करने के लिए अंत:प्रेरित हो उठते हैं। आइए,इस क्षमा पर्व का लाभ उठाएँ।  सबसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगे सभी को जैन पयुर्षण के क्षमावाणी पर्व पर दिल से मिच्छामी दुक्कड़म ‘उत्तम क्षमा’।
 अंत में आप सभी को जय जिनेंद्र।।

जानिए 2019 में कब और कैसे मनाएं गणेश चौथ (गणेश चतुर्थी)

भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को दिन मध्याह्र काल में, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था। इसी कारण मध्याह्र काल में ही भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसे बहुत शुभ माना गया है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 2 सितंबर,2019 (सोमवार) को मनाया जाएगा। भारतीय पुराणों में गणेश जी को विद्या-बुद्धि का प्रदाता, विघ्न-विनाशक और मंगलकारी बताया गया है। हर माह के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत किया जाता है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन  पूजन का शुभ मूहर्त दोपहर 11 बजकर 4 मिनट से 1 बजकर 37 मिनट तक है। पूजा का शुभ मूहर्त करीब दो घंटे 32 मिनट की अवधि है। 
        भाद्र प्रद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व बहुत ही विशेष होता है। इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। हर साल भाद्रपद मास में गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन लोग खासतौर पर गणेश भगवान की पूजा करते हैं। महिलाएं इस दिन व्रत रहती हैं। मान्यता है कि इन 10 दिनों में बप्पा अपने भक्तों के घर आते हैं और उनके दुख हरकर ले जाते हैं। यही वजह है कि लोग उन्हें अपने घर में विराजमान करते हैं। 10 दिन बाद उनका विसर्जन किया जाता है। लगभग 10 दिन तक चलने वाला गणेश चतुर्थी उत्सव इस वर्ष 2 सितंबर 2019 से शुरू होकर 13 सितम्बर (अनन्त चतुर्दशी ) पर सम्पन्न होगा। गणेश चतुर्थी पर लोग अपने घरों में गणेश भगवान को विराजमान करते हैं और गणेश चतुर्थी के दिन उनका विसर्जन किया जाता है। लोक 11, 7 दिन के लिए घर में गणपति को विराजमान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बप्पा इन दिनों में अपने भक्तों के सभी दुख दूर करके ले जाते हैं। 
Know-when-and-how-to-celebrate-Ganesh-Chauth-Ganesh-Chaturthi-in-2019-जानिए 2019 में कब और कैसे मनाएं गणेश चौथ (गणेश चतुर्थी)     ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की महाराष्ट्र में यह त्योहार गणेशोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। ये दस तक त्योहार चलता है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होता है। इस दौरान गणेश की भव्य पूजा की जाती है। लोग अपने घरों में भी इस मौके पर गणेश जी की प्रतिमा का स्थापना करते हैं। गणपति ऐसे देव हैं जिनके शरीर के अवयवों पर संपूर्ण ब्रह्माण का वास होता है। चारों वेद और उनकी ऋचाएं होती हैं। इसलिए गणपति की पूजा सदा आगे से करनी चाहिए। उनकी परिक्रमा लें लेकिन पीठ के दर्शन नहीं करें।
जानिए कैसे करें गणपति की प्रतिष्ठापना---
गजानन को लेने जाएं तो नवीन वस्त्र धारण करें। इसके बाद हर्षोल्लास के साथ उनकी सवारी लाएं। घर में लाने के बाद चांदी की थाली में स्वास्तिक बनाकर उसमें गणपति को विराजमान करें। चांदी की थाली संभव न हो पीतल या तांबे का प्रयोग करें।  घर में विराजमान करें तो मंगलगान करें, कीर्तन करें। लड्डू का भोग भी लगाएं। इसके बाद रोज सुबह -शाम उनकी आरती करें और मोदक का भोग लगाएं और अंतिम दिन विसर्जन करें।
जानिए कैसा हो पूजा स्थल--
आज आप इस समय अपने घर गणपति को विराजमान करें। कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। चार हल्दी की बंद लगाएं। एक मुट्ठी अक्षत रखें। इस पर छोटा बाजोट, चौकी या पटरा रखें। लाल, केसरिया या पीले वस्त्र को उस पर बिछाएं। रंगोली, फूल, आम के पत्ते और अन्य सामग्री से स्थान को सजाएं। तांबे का कलश पानी भर कर, आम के पत्ते और नारियल के साथ सजाएं। यह तैयारी गणेश उत्सव के पहले कर लें। 
जानिए क्यों नही करने चाहिए विघ्नहर्ता गणेश जी की पीठ के दर्शन--
देवों के देव गणपति जी की पूजा करते समय ध्यान रखें कि कभी उनकी पीठ का दर्शन ना करें। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं की विघ्नहर्ता गणपति ऐसे देव हैं जिनके शरीर के अवयवों पर संपूर्ण ब्रह्माण का वास होता है।  गणपति की सूंड पर धर्म का वास है। नाभि में जगत वास करता है। उनकी आंखों या नयनों में लक्ष्य, कानों में ऋचाएं और मस्तक पर ब्रह्मलोक का वास है। हाथों में अन्न और धन, पेट में समृद्धि और पीठ पर दरिद्रता का वास है। इसलिए, पीठ के दर्शन कभी नहीं करने चाहिएं।
विघ्नहर्ता विनायक गणेश जी के कुछ सिद्ध ओर प्रभावी (लाभकारी) मन्त्र ये हैं--

नमस्ते योगरूपाय सम्प्रज्ञातशरीरिणे । असम्प्रज्ञातमूर्ध्ने ते तयोर्योगमयाय च ॥
अर्थ
हे गणेश्वर ! सम्प्रज्ञात समाधि आपका शरीर तथा असम्प्रज्ञात समाधि आपका मस्तक है । आप दोनों के योगमय होने के कारण योगस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।

वामाङ्गे भ्रान्तिरूपा ते सिद्धिः सर्वप्रदा प्रभो । भ्रान्तिधारकरूपा वै बुद्धिस्ते दक्षिणाङ्गके ॥
अर्थ:
प्रभो ! आपके वामांग में भ्रान्तिरूपा सिद्धि विराजमान हैं, जो सब कुछ देनेवाली हैं तथा आपके दाहिने अंग में भ्रान्तिधारक रूपवाली बुद्धि देवी स्थित हैं ।

मायासिद्धिस्तथा देवो मायिको बुद्धिसंज्ञितः । तयोर्योगे गणेशान त्वं स्थितोऽसि नमोऽस्तु ते ॥
अर्थ :
भ्रान्ति अथवा माया सिद्धि है और उसे धारण करनेवाले गणेशदेव मायिक हैं । बुद्धि संज्ञा भी उन्ही की है । हे गणेश्वर ! आप सिद्धि और बुद्धि दोनों के योग में स्थित हैं । आपको बारम्बार नमस्कार है ।

जगद्रूपो गकारश्च णकारो ब्रह्मवाचकः । तयोर्योगे गणेशाय नाम तुभ्यं नमो नमः ।।

अर्थ :
गकार जगत्स्वरूप है और णकार ब्रह्मका वाचक है । उन दोनों के योग में विद्यमान आप गणेश-देवता को बारम्बार नमस्कार है ।

चौरवद्भोगकर्ता त्वं तेन ते वाहनं परम् । मूषको मूषकारूढो हेरम्बाय नमो नमः ॥

अर्थ :
आप चौर की भाँति भोगकर्ता हैं, इसलिए आपका उत्कृष्ट वाहन मूषक है । आप मूषक पर आरूढ़ हैं । आप हेरम्ब को बारम्बार नमस्कार है ।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए की आप कैसे अपनी  राशि के अनुसार गणेश जी को भोग लगाकर इस गणेशोत्सव पर उनकी विशेष कृपा पा सकते हैं।
  1. मेष राशि वाले लोग - बप्पा को छुआरा और गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।
  2. वृषभ राशि वाले लोग -- गणपति जी को मिश्री या नारियल से बने लड्डू का भोग लगाएं।
  3. मिथुन राशि वाले -- लोग गणपति को मूंग के लड्डू का भोग लगाएं।
  4. कर्क राशि वाले -- लोग मोदक, मक्खन या खीर का भोग लगाएं। 
  5. सिंह राशि वाले --जातक गु़ड़ से बने मोदक या छुआरे का भोग लगाएं ।    
  6. कन्या राशि वाले-- लोग हरे फल या किशमिश का भोग लगाएं। 
  7. तुला राशि वाले -- जातक मिश्री, लड्डू और केला का भोग लगाएं।
  8. वृश्चिक राशि वाले --लोग गणपति को छुआरा और गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।  
  9. धनु राशि वाले -- लोग भगवान गणेश को लगाएं मोदक व केला का भोग।
  10. मकर राशि वाले -- लोग तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
  11. कुंभ राशि वाले -- लोग गणपति को गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।
  12. मीन राशि वाले -- लोग बेसन के लड्डू, केला व बादाम का भोग लगाएं।

जानिए इस वर्ष गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त आपकी सुविधानुसार--
गणेश चतुर्थी के दिन भी गणपति को वारजमान कराकर विसर्जन कराया जा सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया बहुत लोगों द्वारा नहीं अपनाई जाती और वे कुछ दिन (3 दिन,5 दिन, 7 दिन या 11 दिन) भगवान गणेश को अपने घर पर रखने के बाद ही विदाई देते हैं। इस त्योहार के दौरान भक्त अमूमन 7 से 11 दिन के लिए अपने घर में गणपति को विराजमान कराते हैं। वहीं, कुछ लोग 3, 5, 7 या 10 दिन में भी गणपति का विसर्जन करते हैं। इस तरह से 11 दिन चलने वाला गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त हो जाता है।

ऐसे में पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जाने इस वर्ष 2019 में गणेशोत्सव के दिन के हिसाब से गणपति विसर्जन के शुभ मुहूर्त --
गणेश चतुर्थी (स्थापना) के दिन विसर्जन (2 सितंबर, 2019 को)के शुभ मुहूर्त इस तरह रहेंगें--
  • दोपहर में मुहूर्त: 1.55 AM से 6.38 PM तक 
  • शाम में मुहूर्त: 6.38 PM से 8.04 PM 
  • रात का मुहूर्त: 10.55 PM से 12.21 AM (3 सितंबर)
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 1.47 AM से 6.04 AM (3 सितंबर)

तीन दिन पर गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त  --
  • सुबह का मुहूर्त: 6.04 AM से 9.12 AM तक और फिर 10.46 AM से 12.20 PM तक 
  • दोपहर में मुहूर्त: 3.28 PM से 6.36 PM तक 
  • शाम में मुहूर्त: 8.20 PM से 12.20 AM (5 सितंबर) 
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 3.12 AM से 4.39 AM (5 सितंबर)

सात दिन होने पर गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त--
  • सुबह का मुहूर्त: 7.39 AM से 12.19 PM 
  • दोपहर में मुहूर्त: 1.52 PM से 3.25 PM  
  • शाम में मुहूर्त: 6.31 PM से 10.52 PM 
  • रात का मुहूर्त: 1.46 AM से 03.13 AM (9 सितंबर) 
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 4.40 AM से 6.07 AM (9 सितंबर)

गणेश (अनन्त) चतुर्दशी यानी गणेश महोत्सव के 11वें दिन अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन का शुभ मुहूर्त--
  • सुबह का मुहूर्त: 6.08 AM से 7.40 AM और फिर 10.45 AM से 3.22 PM 
  • दोपहर में मुहूर्त: 4.54 PM से 6.27 PM  
  • शाम में मुहूर्त: 6.27 PM से 9.22 PM 
  • रात का मुहूर्त: 12.18 AM से 1.45 AM (13 सितंबर)
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ज्योतिष

फिटनेस मंत्र

चालीसा / स्त्रोत

तंत्र मंत्र

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