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शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग में

Auspicious-beginning-of-Sharadiya-Navratri-in-Sarvarthasiddhi-Yoga-and-Amritasiddhi-Yoga-2019-शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग मेंइस वर्ष शारदीय नवरात्रि 29 सितंबर 2019 से शुरु होने जा रहे हैं। हिंदू धर्म के लोगों के लिए ये पूजा अर्चना के विशेष दिन होते हैं। इन दिनों मां दुर्गा के विभिन्न  स्वरूपों की उपासना की जाती है। नवरात्रि के इन में 9 दिनों तक माता दुर्गा के 9 स्वरूपों की आराधना करने से जीवन में ऋद्धि-सिद्धि ,सुख- शांति, मान-सम्मान, यश और समृद्धि की प्राप्ति शीघ्र ही होती है। माता दुर्गा हिन्दू धर्म में आद्यशक्ति  के रूप में सुप्रतिष्ठित है तथा माता शीघ्र फल प्रदान करनेवाली देवी के रूप में लोक में प्रसिद्ध है। देवीभागवत पुराण के अनुसार आश्विन मास में माता की पूजा-अर्चना व नवरात्र व्रत करने से मनुष्य पर देवी दुर्गा की कृपा सम्पूर्ण वर्ष बनी रहती है और मनुष्य का कल्याण होता है। 
   हमारे देश में शारदीय (आश्विन) नवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है, इस समय देश के लगभग सभी छोटे-बड़ें शहरो, गांवों में माँ दुर्गा की मृतिका से बनी प्रतिमा का अस्थाई स्थापना करके पूजा आराधना की जाती है। शरद ऋतु की इस आश्विन नवरात्रि को माँ दुर्गा की असुरों पर विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है, इसलिए नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरुपों की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी राज्यों सहित सभी क्षेत्रों में धूम-धाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में देवी दुर्गा के भक्त नौ दिनों उपवास रखते हैं तथा माता की चौकी स्थापित की जाती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों को बहुत पावन माना जाता है। इन दिनों घरों में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि चीज़ों का परहेज़ कर सात्विक भोजन किया जाता है। नौ दिन उपवास के बाद नवमी या दसवीं पूजन किया जाता है जिसमें कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करके नौ दिनों तक देवी दुर्गा की आराधना और व्रत का संकल्प लिया जाता है। नवरात्रि के दिनों में चारों ओर माता की चौकी और जगराते कर भजन कीर्तन किया जाता है।
इस बार की नवरात्रि में किसी बीजो तिथि का क्षय नहीं है।  8 अक्टूबर 2019 को विजयादशमी है इसी दिन नवरात्रि पूजन का समापन होगा। नवरात्र में लोग अपने घरों में कलश की स्थापना करते हैं।  
यह रहेंगी शरद नवरात्रि की तिथियां --
  1. नवरात्रि प्रथम दिन 1 (प्रतिपदा) को देवी की अस्थाई मूर्ति की स्थापना, घटस्थापना (कलश स्थापना) होगी। पहले दिन माँ शैलपुत्री की होगी। 29 सितंबर 2019 (रविवार) को
  2. नवरात्रि दिन 2 (द्वितीया) मां ब्रह्मचारिणी पूजा, 30 सितंबर 2019 (सोमवार)
  3. नवरात्रि दिन 3 (तृतीया) मां चंद्रघंटा पूजा, 1 अक्टूबर 2019, (मंगलवार)
  4. नवरात्रि दिन 4 (चतुर्थी) मां कूष्मांडा पूजा, 2 अक्टूबर 2019 (बुधवार)
  5. नवरात्रि दिन 5 (पंचमी) मां स्कंदमाता पूजा, 3 अक्टूबर 2019 (गुरुवार)
  6. नवरात्रि दिन 6 (षष्ठी‌) मां कात्यायनी पूजा, 4 अक्टूबर 2019 (शुक्रवार)
  7. नवरात्रि दिन 7 (सप्तमी) मां कालरात्रि पूजा, 5 अक्टूबर 2019 (शनिवार)
  8. नवरात्रि दिन 8 (अष्टमी) मां महागौरी, दुर्गा महा अष्टमी पूजा, दुर्गा महा नवमी पूजा 6 अक्टूबर 2019, (रविवार)
  9. नवरात्रि दिन 9 (नवमी) मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारणा 7 अक्टूबर 2019, (सोमवार) को किया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के नवमें दिन माँ सिद्धदात्री की आयुध पूजा, नवमी हवन, नवरात्रि पारण आदि संपन्न होगा। घट विसर्जन भी इसी दिन किया जा सकता है।
  10. नवरात्रि दिन 10 (दशमी) दुर्गा विसर्जन, विजय दशमी (दशहरे का महापर्व) का पर्व 8 अक्टूबर 2019, (मंगलवार) को मनाया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन दशमी तिथि को माँ दुर्गा की विदाई एवं अस्थाई रूप से स्थापित मूर्ति विसर्जन होगा। 

नवरात्रि कलश स्थापना समय और पूजा विधि, सामग्री --
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना से होती है।इस साल कलश स्थापना का मुहूर्त 29 सितंबर 2019 को सुबह 6 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।आप इस1 घंटे 24 मिनट के बीच घटस्थापना या कलश स्थापना कर सकते हैं। इसे शुभ मुहूर्त पर करना अनिवार्य है।अगर आप इस मुहूर्त में कलश स्थापना ना कर पायें तो फिर घटस्थापना अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा उसमें कर सकते हैं। कलश स्थापना के लिए तड़के सुबह उठकर सुबह स्नान कर साफ सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 
‘शारदीय नवरात्र’ के व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए। पूजा करने के उपरान्त इस मंत्र द्वारा माता की प्रार्थना करना चाहिए-

"विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमांश्रियम्| रूपंदेहि जयंदेहि यशोदेहि द्विषोजहि ||"

पंचांग के अनुसार 29 सितंबर 2019 को यानी नवरात्र के पहले दिन रात 10.11 मिनट तक प्रतिपदा है। जिस कारण कलश स्थापना का लंबा समय मिलेगा। यानी कि नवरात्रि के पहले दिन कभी भी कलश की स्थापना की जा सकती है। लेकिन कलश स्थापना के लिए प्रात:काल का समय सबसे उत्तम रहेगा।
दुर्गा पूजन सामग्री-
पंचमेवा पंच​मिठाई रूई कलावा, रोली, सिंदूर, १ नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग,  पान के पत्ते 5 , घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, शर्करा ), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी की गांठ , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, , आरती की थाली. कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, ​तिल, सुवर्ण प्र​तिमा 2, आभूषण व श्रृंगार का सामान, फूल माला . दुर्गा पूजन शुरू करने से पूर्व चौकी को धोकर माता की चौकी सजायें।

पूजन और संकल्प की तैयारी --
आसन बिछाकर गणपति एवं दुर्गा माता की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं. इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें 
 “ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥” 

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें – 
ॐ केशवाय नम: ॐ नारायणाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ गो​विन्दाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-

ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। 
त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ 
शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए. अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें- 
चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्,
आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।

दुर्गा पूजन हेतु संकल्प –
पंचोपचार करने बाद संकल्प करना चाहिए. संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें :
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य  ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2072, तमेऽब्दे कीलक नाम संवत्सरे दक्षिणायने शरद ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे आश्विन मासे शुक्ल पक्षे प्र​तिपदायां तिथौ गुरु वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये। 
गणपति पूजन –
किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है.हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें. 
गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। 
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।
आवाहन: हाथ में अक्षत लेकर
आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र ​विनायक।
तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥

ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर अक्षत गणेश जी पर चढा़ दें। हाथ में फूल लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आसनं समर्पया​मि, अर्घा में जल लेकर बोलें ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पया​मि, आचमनीय-स्नानीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पया​मि वस्त्र लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः वस्त्रं समर्पया​मि, यज्ञोपवीत-ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पया​मि, पुनराचमनीयम्, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः  रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम्  ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः , इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं. इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः, दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं.।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इदं नानाविधि नैवेद्यानि समर्पयामि, मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र- शर्करा खण्ड खाद्या​नि द​धि क्षीर घृता​नि च,
आहारो भक्ष्य भोज्यं गृह्यतां गणनायक। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें. इदं आचमनीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः . इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें- ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः ताम्बूलं 
समर्पया ​मि अब फल लेकर गणपति पर चढ़ाएं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः फलं समर्पया​मि, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः द्रव्य द​क्षिणां समर्पया​मि, अब ​विषम संख्या में दीपक जलाकर ​निराजन करें और भगवान की आरती गायें। हाथ में फूल लेकर गणेश जी को अ​र्पित करें,  ​फिर तीन प्रद​क्षिणा करें। 
इसी प्रकार से अन्य सभी देवताओं की पूजा करें. जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश के स्थान पर उस देवता का नाम लें. 
कलश पूजन – 
घड़े या लोटे पर कलावा बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें, नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें,हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आवाहन करें. ॐ त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानोहर्विभि:। अहेडमानोवरुणेह बोध्युरुशं समानऽआयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि,
ॐ भूर्भुव: स्व: भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।
इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण देवता की पूजा करें.  
दुर्गा पूजन-
सबसे पहले माता दुर्गा का ध्यान करें-
सर्व मंगल मागंल्ये ​शिवे सर्वार्थ सा​धिके ।
शरण्येत्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
आवाहन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहया​मि॥
आसन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आसानार्थे पुष्पाणि समर्पया​मि॥
अर्घ्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हस्तयो: अर्घ्यं समर्पया​मि॥
आचमन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आचमनं समर्पया​मि॥
स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। स्नानार्थं जलं समर्पया​मि॥
स्नानांग आचमन- स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पया​मि।
पंचामृत स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पंचामृतस्नानं समर्पया​मि॥
गन्धोदक-स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। गन्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
शुद्धोदक स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। शुद्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
आचमन- शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि।
वस्त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। वस्त्रं समर्पया​मि ॥ वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि। 
सौभाग्य सू़त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सौभाग्य सूत्रं समर्पया​मि ॥
चन्दन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। चन्दनं समर्पया​मि ॥
ह​रिद्राचूर्ण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ह​रिद्रां समर्पया​मि ॥
कुंकुम- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कुंकुम समर्पया​मि ॥ 
​सिन्दूर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ​सिन्दूरं समर्पया​मि ॥
कज्जल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कज्जलं समर्पया​मि ॥
दूर्वाकुंर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दूर्वाकुंरा​नि समर्पया​मि ॥
आभूषण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आभूषणा​नि समर्पया​मि ॥
पुष्पमाला- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पुष्पमाला समर्पया​मि ॥
धूप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। धूपमाघ्रापया​मि॥ 
दीप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दीपं दर्शया​मि॥ 
नैवेद्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। नैवेद्यं ​निवेदया​मि॥
नैवेद्यान्ते ​त्रिबारं आचमनीय जलं समर्पया​मि।
फल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। फला​नि समर्पया​मि॥
ताम्बूल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ताम्बूलं समर्पया​मि॥
द​क्षिणा- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। द​क्षिणां समर्पया​मि॥
आरती- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आरा​र्तिकं समर्पया​मि॥
क्षमा प्रार्थना--
न मंत्रं नोयंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥1॥                            
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥2॥                         
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥3॥                          
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति ॥4॥                         
परित्यक्तादेवा विविध​विधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदर जननि कं यामि शरण् ॥5॥              
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥6॥    
                    
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥7॥                            
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः ॥8॥                         
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥9॥                                    
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥10॥                                       
जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि ।
अपराधपरंपरावृतं नहि मातासमुपेक्षते सुतम् ॥11॥                                                     
मत्समः पातकी नास्तिपापघ्नी त्वत्समा नहि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवियथायोग्यं तथा कुरु  ॥12॥

इस बार शारदीय नवरात्रि के 9 दिनों में 8 दिन विशेष योग बनेंगे। जिसकी वजह से नवरात्रि की पूजा काफी शुभ और फलदायी होगी। 2 दिन अमृतसिद्धि, 2 दिन सर्वार्थ सिद्धि और 2 दिन रवि योग बनेंगे। नवरात्रि के यह 9  दिन शक्ति की उपासना के लिए बेहद शुभ होते हैं। ये देश में खुशहाली के संकेत हैं। नवरात्रि का प्रारम्भ सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग जैसे बेहद विशेष संयोग में हो रहा है।
जानिए किस तारीख को क्या योग बनेगा--
  • 30 सितंबर 2019 को अमृत सिद्धि योग 
  • 1 अक्टूबर को रवि योग 
  • 2 अक्टूबर को अमृत और  सिद्धि योग
  • 3 अक्टूबर को सर्वार्थ सिद्धि 
  • 4 अक्टूबर को रवि योग
  • 5 अक्टूबर को रवि योग
  • 6 अक्टूबर को सर्वसिद्धि योग रहेगा।
  • इस वर्ष 2019 में  7 अक्टूबर 2019 को महानवमी दोपहर 12.38 तक रहेगी। इसके बाद दशमी यानी दशहरा होगा।
  • दशहरा या विजयदशमी  8 अक्टूबर 2019 को दोपहर 14 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। यह बहुत ही शुभ सयोग है।

जानिए नवरात्रि में दो सोमवार का महत्व--
9 दिन की नवरात्रि में इस वर्ष दो सोमवार  आ रहे हैं। यह अत्यंत शुभ संयोग है क्योंकि सोमवार को दुर्गा पूजा का हजार, लाख गुना नहीं बल्कि करोड़ गुना फल मिलता है। चूंकि सोमवार का स्वामी चन्द्रमा है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को सोम कहा गया है और भगवान शिव को सोमनाथ। अतः सोमवार के दिन शक्ति की अनेक प्रकार के गन्ध, पुष्प,धूप, दीप, नैवेद्यादि उपचारों से पूजन करने से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।
शारदीय नवरात्रि 2019..
अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 29 सितंबर 2019 (रविवार) से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहा है। इस वर्ष किसी तिथि का क्षय नहीं है, इसलिए पहली बार कलश स्थापित कर माता की आराधना करने वाले भक्तों के लिए इस बार का नवरात्र हर तरह से शुभकारी है। 29 सितंबर (रविवार) को विधि विधान से कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा का आवाह्न होगा। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस वर्ष कलश स्थापना के लिए बहुत ही शुभ नक्षत्र ओर याेग का संयाेग बन रहा है। हस्त नक्षत्र से युक्त अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा कलश स्थापना के लिए सर्व मंगलकारी है। 
     28 सितंबर (शनिवार)की रात 11:14 बजे से हस्त नक्षत्र शुरू हाे रहा है, जाे 29 की रात 9:40 बजे तक है। रविवार काे ब्रह्म मुहूर्त से दिन के 2:08 (दोपहर)बजे तक एक साथ ब्रह्म, सर्वार्थ सिद्धि और अमृत याेग है। इसके अलावा कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि पड़ रही है। नक्षत्र, याेग और राशि के हिसाब से सुबह से लेकर दाेपहर 2 बजे तक कलश स्थापन करना अत्यंत शुभ लाभ प्रद है।
     ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि की इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर मां दुर्गा का आगमन हर तरह से शुभ है क्योंकि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर हाे रहा है। हाथी पर माता का आगमन बारिश और उन्नत कृषि के साथ सुख-समृद्धि का प्रतीक है।  मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। इस कारण अधिक बारिश होगी। साथ ही अनाज की पैदावार भी अधिक होगी। किसान खुशहाल होंगे। देश की राजनीति में उथल-फुथल हो सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की शक्ति बढ़ेगी। 
मां दुर्गा का आने-जाने का मिश्रित फल के अनुसार स्थिति सामान्य रहेगा।
उल्लेखनीय हैं कि वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार मां की सवारी दिन के हिसाब से तय होती है– 
  • - सोमवार को मां की सवारी : हाथी।
  • - मंगलवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - बुधवार को मां की सवारी : नाव।
  • - गुरूवार को मां की सवारी : डोली।
  • - शुक्रवार को मां की सवारी : डोली।
  • – शनिवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - रविवार को मां की सवारी : हाथी।

  1. 6 अक्टूबर 2019 काे (रविवार) संधि पूजा हाेगी। 
  2. इस दिन दोपहर के 14.15 बजे तक महाअष्टमी और इसके बाद महानवमी शुरू हाे जाएगी। 
  3. 6 अक्टूबर काे दोपहर में दिन के दाे बजे से संधि पूजा हाेगी। इसी दिन कन्या पूजन भी हाेगी। 
  4. इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर किसी भी तिथि का लाेप नहीं है। 7 अक्टूबर (सोमवार) काे दोपहर में दिन के 15:04 बजे तक महानवमी है। जाे लाेग घराें में कलश स्थापित कर मां की अराधना करेंगे, वे नवमी तिथि समाप्त हाेने से पहले हवन का कार्य संपन्न करेंगे।

जानिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि कब और क्यों मनाये

आजकल सोशल मीडिया में चैत्र नवरात्रि 2017 पर्व को लेकर बहुत चर्चा हो रही हैं कि इस वर्ष 28 मार्च को मनाएं या 29 मार्च 2017 को


आइये शास्त्रोक्त सत्य जानने का प्रयास करें ---
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की भारतीय सनातन संस्कृति में संवत् यानि नए साल का शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है और इसी दिन हम लोग चैत्र नवरात्री का शुभारंभ भी करते है । संवत् 2074 में 28 मार्च 2017 मंगलवार के दिन नवरात्री में घट स्थापन किया जायेगा । क्योंकि भारतीय सनातन शास्त्रो में से धर्मसिन्धु और निर्णय सिंधु में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया हुआ है कि “नवरात्र आरम्भ प्रतिपदा के दिन किया जाता है अगर सूर्योदय के समय एक मुहूर्त से कम यही लगभग 48 मिन्ट से कम अगर प्रतिपदा हो तो जिस दिन अमावस्या हो उसी दिन घट स्थापना करना शात्रोक्त सही होता है“ और 29 मार्च 2017 को प्रतिपदा सवेरे 5 बज कर 45 मिन्ट पर समाप्त हो जायेगी और सूर्योदय 5 बज कर 36 मिन्ट पर होगा तो प्रतिपदा मात्र 9 मिन्ट ही रहेगी इसलिए नवरात्री का आरम्भ 28 मार्च 2017 को ही किया जायेगा ।


                   
          अतः आप सभी से मेरा (ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री) विनम्र निवेदन हैं की किसी भी भ्रम में रह कर 28 मार्च 2017 को ही नवरात्रि का आरम्भ करते हुए माँ जगदम्बा की स्थापना करे जो एकदम सही और शास्त्रोक्त है । क्योंकि कई लोग 29 मार्च को करवा रहे है वो एकदम गलत है ।निर्णय सागर पंचांग में स्पष्ट लिखा है कि धर्म-निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार 28 मार्च मंगलवार सुबह 8.26 के बाद प्रतिपदा तिथि शुरू होने से चैत्र नवरात्रि विधान और नूतन चैत्र नव वर्ष की मान्यता शास्त्र संवत रहेगी। लेकिन वर्ष के पहले सूर्योदय से सूर्य पूजा और नव वर्ष 29 को मनाया जाएगा।  
ऐसे लोगो से बचे और शास्त्रोक्त निर्णय के अनुसार काम करे जिससे आपको लाभ और आशीर्वाद मिले ।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार 28 मार्च 2017 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष की शुरूआत होगी। ज्योतिष शास्त्र में इस दिन सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही गुड़ी पूजन का विशेष विधान बताया गया है। सूर्योदय के समय ही सूर्य को अर्घ्य देना चाहिये और फिर नीम मिश्री का सेवन किया जाये। ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य को अर्घ्य प्रदान कर बारह नामों से सूर्य नमस्कार करें तथा वेद में दिये गये संवत्सर सूक्त का पाठ करने से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
         वर्ष 2017 में चैत्र (वासंती) नवरात्र व्रत 28 मार्च से शुरु होकर 5 अप्रैल तक रहेगें। व्रत का संकल्प लेने के बाद, मिट्टी की वेदी बनाकर ‘जौ बौया’ जाता है। इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है। घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है। इस दिन “दुर्गा सप्तशती“ का पाठ किया जाता है। पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिएद्य
            ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नवरात्री की पहली तिथि पर सभी भक्त अपने घर के मंदिर में कलश स्थापना करते हैं। इस कलश स्थापना की भी अपनी एक पूजा विधि, एक मुहूर्त होता है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। घट स्थापना का मुहूर्त प्रतिपदा तिथि (28 मार्च ) को प्रातः 08:26 बजे से 10:24 बजे तक है। इस समय के बीच ही घट स्थापना हो सकेगी।
    इसी अवसर पर सृष्टि रचियता ब्रह्माजी के साथ ही शिव विष्णु सहित आह्वान पूजन, ध्वज पूजन, कलश पूजन करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हे।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन विक्रम संवत 2074 शुरू होगा तथा इस अवसर पर तीर्थ की पूजन के साथ ही सुबह 6 बजकर 27 मिनट पर सूर्य को अर्घ्य देने का विधान ज्योतिषियों द्वारा बताया गया है।

  1. 28 मार्चः नवरात्र का पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना होती हैं। इस दिन घटस्थापना का मुहूर्त सुबहर 8:26 से लेकर 10:24 तक का हैं। पूजा में इन्हें चमेली का फूल अर्पित करना शुभ होता हैं।
  2. 29 मार्च : नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इनकी पूजा में भी चमेली का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता हैं।
  3. 30 मार्च : नवरात्र के तीसरे दिन देवी चन्द्रघंटा की पूजा होती हैं। इन्हें भी चमेली का फूल पसंद हैं।
  4. 31 मार्चः नवऱात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे रूप देवी कूष्मांडा की पूजा होती हैं, जिन्हें लाल रंग के फूल पसंद हैं। 
  5. 1 अप्रैलः नवरात्र के पांचवा दिन माता स्कंदमाता की पूजा की जाती है। जिन्हें मां पार्वती के नाम से भी जाना जाता हैं। इन्हें पूजा में लाल रंग के फूल अर्पित करने चाहिए।
  6. 2 अप्रैलः चैत्र नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का होती हैं। जिन्हें लाल रंग के फूल खासकर गुलाब का फूल अर्पित करें। 
  7. 3 अप्रैल : सातवें दिन यानि सप्तमी को मां कालरात्रि की पूजा होती हैं। जिन्हें रात की रानी का फूल पसंद हैं। 
  8. 4 अप्रैलः नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन कई लोग कन्या पूजन भी करते हैं। 
  9. 5 अप्रैलः नववरात्र के अंतिम दिन राम नवमीं होती हैं। पूजा का मुहूर्त सुबह 11ः 09 ​से 1ः 38 तक का हैं।

           दो वर्ष बाद चैत्र नवरात्र नौ दिन 28 मार्च 2017 ( गुड़ी पड़वा) से 5 अप्रैल 2017 नवमी तक होंगे। वर्ष 2015 और 2016 में आठ दिन के थे। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार नवमी को पुष्य नक्षत्र का शुभ योग भी रहेगा, क्योंकि भगवान राम का जन्म नवमी तिथि के दिन पुष्य नक्षत्र में ही हुआ था। 
        नवरात्र के पहले दिन प्रतिपदा मंगवार 28 मार्च सुबह 8.29 बजे शुरू होगी।  सुबह 9.31 बजे चर, लाभ और अमृत के चौघडिय़ा में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त है। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12.9 से 12.57 तक रहेगा। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की धूम रहेगी। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विक्रम नवसंवत्सर 2074 का प्रवेश सुबह 8.28 बजे से ही मेष लग्न में होगा। 

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जानिए कैसा रहेगा विक्रम नवसंवत्सर 2074 ???
    इस नवसंवत्सर का नाम साधारण है। इस वर्ष का राजा मंगल और मंत्री बृहस्पति हैं। हालांकि नव वर्ष का पहला सूर्योदय 29 मार्च को होगा। ऐसे में सूर्य पूजा और नव वर्ष 29 मार्च को ही मनाया जाएगा। 
मंत्री पद गुरु बृहस्पति के पास होने सामाजिक समरसता होगी बढ़ोतरी :--- 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार राजा मंगल, मंत्री बृहस्पति, शस्य सूर्य, धान्येश शुक्र, मेघेश-बुध, फलेश-बुध, धनेश-शनि, दुर्गेश-बुध होंगे। मंत्री पद गुरु बृहस्पति के पास होने से सामाजिक समरसता में बढ़ोतरी होगी। इस वर्ष देश-दुनिया में कृषि, विज्ञान, तकनीकी, अध्यात्म और पर्यटन में अच्छी उन्नति के आसार हैं। 
            चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष श्री संवत 2074 का शुभारंभ इस बार “28 मार्च 2017” प्रातः8ः27 “मेष लग्न” व वृश्चिक नवांश से हो रहा हैं जिसमे लग्न मे मंगल बुध,पंचम भाव मे राहू,छठे भाव मे वक्री गुरु,नवम भाव मे शनि,एकादश भाव मे केतू तथा द्वादश भाव मे सूर्य,चन्द्र व वक्री शुक्र स्थित हैं द्य
              लग्नेश मंगल का लग्न मे होना देश के लिए बहुत शुभता दर्शा रहा हैं जो देशवासियो के साहस व पुरुषार्थ द्वारा देश को आगे ले जाने के लिए प्रेरित कर रहा हैं संभव हैं की इस वर्ष भारत सरकार देश की रक्षा से संबन्धित कई बड़े सौदे व फैसले कठोरता से लागू करे द्य इस मंगल की दृस्टी चतुर्थ भाव व सप्तम भाव पर पड़ रही हैं जो देश के सुख व विदेश व्यापार भाव बनते हैं चूंकि इन दोनों भावो के स्वामी चन्द्र व शुक्र द्वादश भाव मे हैं जो स्पष्ट रूप से देश को विदेशो से बहुत लाभ होना बता रहे हैं द्य शुक्र चन्द्र दोनों चूंकि,कला,ग्लेमर,संगीत व   मनोरंजन के कारक भी होते हैं जो भारतीय फिल्मों व संगीत का पूरे विश्व मे इस वर्ष डंका बजना तय कर रहे हैं संभव हैं की भारतीय कला जगत के किसी व्यक्ति को कोई बड़ा पुरस्कार इस वर्ष विश्वस्तर पर मिल जाए जिससे भारत की कला व फिल्मजगत की ख्याति और बढे द्य
               इस वर्ष का लग्न भारत की वृष लग्न की पत्रिका का द्वादश भाव भी हैं जो इस वर्ष अर्थात 2017-2018 मे भारत को विदेशो से अच्छे समाचार,व्यापार,संधिया,लाभ व धन की प्राप्ति बता रहा हैं द्वादश भाव का स्वामी गुरु अपने भाव द्वादश के अतिरिक्त दसम भाव व धन भाव को भी दृस्ट कर स्पष्ट संकेत दे रहा हैं की सरकार द्वारा इस वर्ष विदेश नीति मे कोई बड़ा बदलाव किया जाएगा जिससे विदेशो से बहुत सा लाभ किसी ना किसी रूप मे देश को मिलेगा जो बड़े पैमाने मे धन के निवेश के रूप मे हो सकता हैं ( विदेश व्यापार का स्वामी व धन भाव का स्वामी शुक्र ऊंच अवस्था मे द्वादश भाव मे हैं )
          28/3/2017 को सूर्योदय के समय तिथि अमावस्या पड़ रही हैं और दिन मंगल वार पड़ रहा हैं क्यूंकी नववर्ष प्रातः 8ः27 पर आरंभ होगा जिससे शुक्ल प्रतिपदा तिथि अगले दिन सूर्योदय के समय मानी जाएगी जो बुधवार का दिन बनेगा इस कारण इस वर्ष का राजा बुध बनेगा द्य बुध नव वर्ष कुंडली मे तीसरे व छठे भाव का स्वामी होकर लग्न मे लग्नेश मंगल संग ही स्थित हैं और सप्तम भाव को देख रहा हैं जिसका स्वामी द्वादश भाव मे ऊंच का होकर बैठा हैं तथा नवांश मे भी यह बुध छठे भाव से द्वादश भाव को देख रहा हैं जो विदेशो से लाभ,विदेशो से कर्ज़ के अतिरिक्त कर्जमाफ़ी के साथ साथ पड़ोसियो विशेषकर चीन व पाकिस्तान से विवाद,घुसपैठ,अनावश्यक तनाव अथवा युद्ध आदि की पुष्टि भी करा रहा हैं ऐसा विशेषकर 15 मई से 15 अक्तूबर के बीच होना संभव जान पड़ता हैं
             पंचमेश सूर्य का द्वादश भाव मे होना देश की जनता का रुझान विदेशो के प्रति बढ़ने की तरफ इशारा कर रहा हैं वही द्वादश तथा नवम भाव के स्वामी गुरु के छठे भाव मे वक्री अवस्था मे होना विदेशी पर्यटको से संबन्धित कोई बड़ा विवाद होने के साथ साथ विदेशो मे रह रहे भारतीयो से संबन्धित कोई ना कोई परेशानी भी बता रहा हैं 
          दसम व एकादश भाव का स्वामी शनि नवम भाव मे होने से देश के राजा की विदेशी दौरो की पुष्टि कर रहा हैं स्पष्ट हैं की प्रधानमंत्री मोदी इस वर्ष भी कई बड़े देशो के अतिरिक्त पड़ोसी मुल्को की यात्रा भी करेंगे जिनसे देश को अवश्य ही बड़े पैमाने मे लाभ होगा 
               सूर्य के मेष राशि मे प्रवेश वाले दिन के स्वामी को वर्ष का मंत्री माना जाता हैं इस वर्ष सूर्य 14/4/2017 को रात्रि 2ः04 बजे मेष राशि मे प्रवेश करेगा क्यूंकी हिन्दू तिथि सूर्योदय से बदलती हैं इसलिए इस वर्ष का मंत्री गुरु बनेगा द्य गुरु नवमेश व द्वादशेश होकर वक्री अवस्था मे छठे भाव मे बैठा हैं जो दसम भाव व द्वादश भाव के अतिरिक्त दूसरे भाव को व उसके स्वामी शुक्र को भी देख रहा हैं जिससे सरकार द्वारा फाइनेंस व बैंकिंग सेक्टर मे किसी बड़े बदलाव का होना निश्चित होता दिख रहा हैं संभव हैं की वर्ष 2017-2018 मे सरकार टैक्स दरो मे बड़ी राहत प्रदान करने के साथ साथ कुछ नए बैंक भी खोले अथवा कुछ का राष्ट्रीयकरण करे जिससे बैंकिंग क्षेत्र मे उछाल आने से विस्तार होगा तथा नई नौकरिया पैदा होंगी जो बैंको को ब्याजदारों मे कमी करने पर मजबूर करेगा जिससे देश के आम आदमी को बहुत राहत प्राप्त होगी तथा निर्माण क्षेत्र मे भी विस्तार होगा 
               गुरु मंत्री के रूप मे नवमेश व द्वादशेश होकर इस वर्ष दसम भाव व द्वादश भाव को दृस्टी दे रहा हैं दसम भाव जो की देश के राजा का होता हैं उसका स्वामी शनि नवम भाव से राजयोग निर्मित कर गुरु को दृस्टी देकर देश के राजा अर्थात प्रधानमंत्री मोदी को किसी बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार की प्राप्ति बता रहा हैं ऐसा जून-जुलाई अथवा सितंबरदृअक्तूबर मे हो सकता हैं वही नवांश मे भी यह गुरु दसम भाव मे ही स्थित हैं जो सरकार का न्याय व्यवस्था अथवा सर्वोच्च न्यायालय से धर्म अथवा तीर्थ आदि से संबन्धित किसी प्रकार का विरोध व तनाव करवाना निश्चित कर रहा हैं 
             स्वतंत्र भारत की कुंडली से देखे तो इस पूरे वर्ष भारत चन्द्र मे राहू की अंतर्दशा मे रहेगा चन्द्र भारत की पत्रिका मे तीसरे भाव मे स्वराशी का होकर संचार व खेल जगत मे भारत के लिए सुखद भविष्य बता रहा हैं वही राहू लग्न मे स्थित होकर राजनीतिक व संचार जगत मे भारत का लोहा पूरे विश्व मे मनवाने की पुष्टि कर रहा हैं राहू क्यूंकी शुक्र की राशि मे हैं तथा शुक्र देश का लग्नेश होने के साथ साथ महिलाओ का प्रतिनिधित्व भी करता हैं स्पष्ट हैं की देश की आधी आबादी अर्थात महिलाओ के लिए यह वर्ष कुछ खास उपलब्धियों वाला रहेगा द्य चन्द्र व राहू मे 3/11 का संबंध हैं जो ज्योतिषीय दृस्टी शुभ संबंध कहा जाता हैं 
             संक्षेप मे कहें तो क्यूं की इस वर्ष के राजा बुध व मंत्री गुरु बन रहे हैं जो की ज्योतिषीय दृस्टी से शुभ ग्रह माने व समझे जाते हैं अतः यह वर्ष भारत के लिए अच्छी वर्षा व फसलों की भारी पैदावार होने से विशेषकर लाभदायक साबित होगा तथा देश इस वर्ष कई मामलो मे तेजी से तरक्की की और अग्रसर होगा 

जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें

Here-on-this-Navratri-Durga-A-few-things-to-note-in-the-text-जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें
  1. दुर्गा सप्तशती के किसी भी चरित्र -का कभी भी आधा पाठ ना करें एवं न कोई वाक्य छोड़े। 
  2.  पाठ को मन ही मन में करना निषेध माना गयाहै। अतः मंद स्वर में समान रूप से पाठ करें। 
  3. पाठ केवल पुस्तक से करें यदि कंठस्थ हो तो बिना पुस्तक के भी कर सकते हैं। 
  4.  पुस्तक को चौकी पर रख कर पाठ करें। हाथ में लेकर पाठ करने से आधा फल प्राप्त होता है। 
  5. पाठ के समाप्त होने पर बालाओं व ब्राह्मण को भोजन करवाएं। 
 जानिए कि अभिचार कर्म में किन नर्वाण मंत्र का प्रयोगहोता हैं।। जैसे--- 
  1. मारण के लिए : ---ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै देवदत्त रं रंखे खे मारय मारय रं रं शीघ्र भस्मी कुरू कुरू स्वाहा। 
  2. मोहन के लिए :---- क्लीं क्लीं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैविच्चे देवदत्तं क्लीं क्लीं मोहन कुरू कुरूक्लीं क्लींस्वाहा॥ 
  3. स्तम्भन के लिए : ----ऊँ ठं ठं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेदेवदत्तं ह्रीं वाचं मुखं पदं स्तम्भय ह्रींजिहवांकीलय कीलय ह्रीं बुद्धि विनाशय -विनाशय ह्रीं।ठं ठं स्वाहा॥ 
  4. आकर्षण के लिए :---- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदतं यंयं शीघ्रमार्कषय आकर्षय स्वाहा॥ 
  5.  उच्चाटन के लिए:----ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तफट् उच्चाटन कुरू स्वाहा। 
  6. वशीकरण के लिए :-- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तंवषट् में वश्य कुरू स्वाहा। 
  7. सर्व सुख समृद्धि के लिए--- 
 ।।सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।। 
 ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। 
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 जय जय श्री अम्बे माँ दुर्गा माँ .... ॐ एम् ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ।। 
 नोट : मंत्र में जहां "देवदत्त" शब्द आया है वहां संबंधित व्यक्ति का नाम लेना चाहिये।। 
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ऐसे करें " माँ" की आराधना(एक भावांजलि--कविता)---- 
माँ तुम आओ सिंह की सवार बन कर ।। 
माँ तुम आओ रंगो की फुहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ पुष्पों की बहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सुहागन का श्रृंगार बनकर ।। 
माँ तुम आओ खुशीयाँ अपार बनकर ।। 
माँ तुम आओ रसोई में प्रसाद बनकर ।। 
माँ तुम आओ रिश्तो में प्यार बनकर ।। 
माँ तुम आओ बच्चो का दुलार बनकर ।। 
माँ तुम आओ व्यापार में लाभ बनकर ।। 
माँ तुम आओ समाज में संस्कार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सिर्फ तुम आओ, क्योंकि तुम्हारे आने से ये सारे।। 
सुख खुद ही चले आयेगें। तुम्हारे दास बनकार ।। 
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इस नवरात्रि पर इन उपायों द्वारा करें कार्य बाधा का शमन
  1. नित्य प्रात: काल स्नानदि से निवृत होकर गीता के ग्यारवे अध्याय का पाठ करने से कार्यो मे आने वाली बाधायें नष्ट हो जाती है । 
  2. गीता के ग्यारवे अध्याय के 36 वे श्लोक को लाल स्याही से लिखकर घर मे टांग दे । सभी प्रकार की बाधायें दूर हो जायेगी ।
  3. अपने दिन का आरंभ करते समय जब आप बाहर निकले तो पहले दाया पांव बाहर निकालें । आपके वांछित कार्यो मे कोई बाधा नही आयेगी । 
  4. घर से निकलते समय कोई मीठा पदार्थ -गुड़, शक्कर, मिठाई या शक्कर मिला दही खा ले ।कार्यों की बाधा दूर हो जायेगी ।
  5. तुलसी के तीन चार पत्तो को ग्रहण करके घर से बाहर जाने पर भी कार्यों की सभी बाधाए दूर हो जाती है । 
  6. अगर बार-बार कार्यों मे बाधा आ रही हो तो अपने घर मे श्यामा तुलसी का पौधा लगाऐ । समध्याकाल शुध्द घी का दीपक जलाऐं ।
  7. 5 बत्ती का दीपक हनुमानजी के मंन्दिर मे जला आयें । इससे सभी प्रकार की बाधाएं और परेशानियां दूर हो जायेगी । 
  8. प्रात:काल भगवती दूर्गा को पॉच पुष्प चढाएं । आपके कार्यों की सभी बाधाऐ दूर हो जायेगी । 
  9. घर से बाहर निकलते समय जिधर का स्वर चल रहा हो , उसी तरफ का पैर पहले बाहर निकाले । इससे कार्यों मे बाधा नही आयेगी ।

जानिए शारदीय नवरात्र घट स्थापना (2015 ) करने के लिए शुभ मुहूर्त और स्थापना विधि

navratri-2015-india-auspicious-and-predicable-method-जानिए शारदीय नवरात्र घट स्थापना (2015 ) करने के लिए शुभ मुहूर्त और स्थापना विधि    पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार नवरात्रि में दुर्गा पूजा घटस्थापना के बाद की जाती है, परंतु इस वर्ष 8 साल बाद चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग होने के कारण शास्त्रानुसार अभिजीत मुहूर्त में स्थापना करनी चाहिए। परंतु किसी कारणवश इस समय स्थापना नहीं कर सकें तो चर, लाभ, शुभ या राहुकाल छोड़कर स्थिर लग्न में भी स्थापना की जा सकतीहै। इस वर्ष शारदीय नवरात्र इस बार मंगलवार 13 अक्टूबर 2015 से शुरू हो रहे हैं, जो माता के भक्तों के लिए सुख-समृद्धि लेकर आएंगे। इस श्राद्ध पक्ष की तिथि क्षय होना एवं नवरात्र की तिथि में वृद्धि होना सुख-समृद्धि का संकेत है। 

 सूर्योदय के अनुसार मंगल मुहूर्त इस प्रकार हैं : -
 चौघड़िया मुहूर्त : --- 
  1. प्रात: 9.19-10.46 तक चर।
  2. प्रात: 10.46-12.13 तक रात्रि 7.33 -9.06 तक लाभ। 
  3. दोपहर 12.13-1.40 तक रात्रि 12.13-1.46 तक अमृत।
  4. रात्रि 10.40-12.13 तक शुभ। 

अभिजीत मुहूर्त- 
11.49-12.35 तक। 
 लग्न मुहूर्त : 
  1. प्रात : 6.22-6.45 तक कन्या (पत्रिका अनुसार शुभ)। 
  2. प्रात : 8.59-11.15 तक वृश्चिक। 
  3. दोपहर : 3.07-4.41 तक कुंभ*। 
  4. रात्रि : 7.52-9.50 तक वृषभ। 

 विशेष ध्यान रखें-- 
दोपहर 3.06-4.33 तक राहुकाल रहेगा पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार नवरात्र मंगलवार को चित्रा नक्षत्र एवं वैदृती योग में शुरू हो रहे हैं। इसके कारण इस बार प्रात: में घट स्थापना का मुहूर्त नहीं हैं। इस बार घट स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त प्रात: 11.51 से 12.37 बजे तक रहेगा। चित्रा नक्षत्र शाम 4.38 बजे तक एवं वैदृती योग रात्रि 11.17 बजे तक रहेगा। इस बार दो प्रतिपदा होने 13-14 अक्टूबर को प्रतिपदा तिथि रहेगी, वहीं दुर्गाष्टमी 21 को मनाई जाएगी तथा अगले दिन रामनवमी एवं दशहरा एक ही दिन मनाया जाएगा। 
      पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार इस बार महानवमी श्रवण नक्षत्रयुक्त होने से विजयदशमी पर्व भी इसी दिन मनाया जाएगा। श्रवण नक्षत्र में मनाया जाता है और इस बार यह नक्षत्र नवमी के दिन पड़ रहा है। जिसके कारण विजयदशमी 22 अक्टूबर को ही मनाई जाएगी। नवरात्र में 19 अक्टूबर को सूर्य संक्रांति का पुण्यकाल पड़ रहा है। इस दिन सूर्य अपनी नीच राशि तुला में प्रवेश कर रहा है।
 जानिए की कैसे करें घट स्‍थापना..??? 
 पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार घट स्‍थापना के स्‍थान को शुद्ध जल से साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें। फिर अष्टदल बनाएं। उसके ऊपर एक लकड़ी का पाटा रखें और उस पर लाल रंग का वस्‍त्र बिछाएं। लाल वस्‍त्र के ऊपर अंकित चित्र की तरह पांच स्‍थान पर थोड़े-थोड़े चावल रखें। जिन पर क्रमशः गणेशजी, मातृका, लोकपाल, नवग्रह तथा वरुण देव को स्‍थान दें। 
   सर्वप्रथम थोड़े चावल रखकर श्रीगणेजी का स्मरण करते हुए स्‍थान ग्रहण करने का आग्रह करें। इसके बाद मातृका, लोकपाल, नवग्रह और वरुण देव को स्‍थापित करें और स्‍थान लेने का आह्वान करें। फिर गंगाजल से सभी को स्नान कराएं। स्नान के बाद तीन बार कलावा लपेटकर प्रत्येक देव को वस्‍त्र के रूप में अर्पित करें। अब हाथ जोड़कर देवों का आह्वान करें। देवों को स्‍थान देने के बाद अब आप अपने कलश के अनुसार जौ मिली मिट्टी बिछाएं। कलश में जल भरें। 
    अब कलश में थोड़ा और जल-गंगाजल डालते हुए 'ॐ वरुणाय नमः' मंत्र पढ़ें और कलश को पूर्ण रूप से भर दें। इसके बाद आम की टहनी (पल्लव) डालें। जौ या कच्चा चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर रखें। फिर लाल कपड़े से लिपटा हुआ कच्‍चा नारियल कलश पर रख कलश को माथे के समीप लाएं और वरुण देवता को प्रणाम करते हुए रेत पर कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर रोली से ॐ या स्वास्तिक लिखें। मां भगवती का ध्यान करते हुए अब आप मां भगवती की तस्वीर या मूर्ति को स्‍थान दें। एक नंबर पर थोड़े से चावल डालें। दुर्गा मां की षोडशोपचार विधि से पूजा करें। अब यदि सामान्य द्वीप अर्पित करना चाहते हैं, तो दीपक प्रज्‍ज्वलित करें। 
      पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि आप अखंड दीप अर्पित करना चाहते हैं, तो सूर्य देव का ध्यान करते हुए उन्हें अखंड ज्योति का गवाह रहने का निवेदन करते हुए जोत को प्रज्‍ज्वलित करें। यह ज्योति पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए। इसके बाद पुष्प लेकर मन में ही संकल्प लें कि मां मैं आज नवरात्र की प्रतिपदा से आपकी आराधना अमुक कार्य के लिए कर रहा/रही हूं, मेरी पूजा स्वीकार करके इष्ट कार्य को सिद्ध करो। 
 पूजा के समय यदि आप को कोई भी मंत्र नहीं आता हो, तो केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' से सभी पूजन सामग्री चढ़ाएं। मां शक्ति का यह मंत्र अमोघ है। आपके पास जो भी यथा संभव सामग्री हो, उसी से आराधना करें। संभव हो तो श्रृंगार का सामान और नारियल-चुन्नी जरूर चढ़ाएं। 
ऐसे करें दुर्गा सप्तशती का पाठ---
 पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि आप दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं, तो संकल्प लेकर पाठ आरंभ करें। सिर्फ कवच आदि का पाठ कर व्रत रखना चाहते हैं, तो माता के नौ रूपों का ध्यान करके कवच और स्तोत्र का पाठ करें। इसके बाद आरती करें। दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ एक दिन में नहीं करना चाहते हैं, तो दुर्गा सप्तशती में दिए श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी का 11 बार पाठ करके अंतिम दिन 108 आहुति देकर नवरात्र में श्री नवचंडी जपकर माता का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
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