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जानिए नौकरी में प्रमोशन/तरक्की/उन्नति के लिए कुछ ज्योतिषीय उपाय

आज के समय की सबसे बड़ी समस्या है अच्छी नौकरी, अगर किसी के पास अच्छी नौकरी है तो उसे समय पर अच्छा प्रमोशन या वेतन वृद्धि नहीं मिलती। हर व्यक्ति अपनी नौकरी में प्रमोशन या पदोन्नति चाहता हैं। अगर आप नौकरी में उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं और बात नहीं बन रही है तो यहां ज्योतिष अनुसार सरल उपाय बताये जा रहे हैं। ऐसी समस्याओं को दूर करने के लिए आपको मेहनत तो करनी ही है पर साथ-साथ अगर यह उपाय भी करेंगे तो आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की बहुत बार ऐसा होता है की जन्मकुण्डली में किसी भी प्रकार के ग्रह दोष के चलते हमें बहुत सी परेशानियां अकारण घेरे रहती हैं। हम चाह कर भी उन परेशानियों से निजात नहीं पा पाते। एक परेशानी खत्म होते ही दूसरी सिर उठा कर खड़ी रहती है। नौकरी में प्रमोशन और इंक्रीमेंट चाहते हैं तो एक आसान और प्रभावशाली उपाय अपनाने से निश्चित ही लाभ होगा। इसके अतिरिक्त ऑफिस में अन्य लोगों के कारण आपको समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो या बॉस बेवजह आप पर भड़कता रहता हो और प्रमोशन के योग बनते बनते रह जाते हों। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वैदिक ज्योतिष में दशम भाव कर्म का भाव होता है। इस भाव से हमें नौकरी और व्यवसाय का बोध होता है। इसके अलावा दशम भाव और दशम भाव का स्वामी सांसारिक जीवन में हमारे प्रदर्शन के बारे में सूचित करता है। 
Know-some-astrological-measures-for-promotions-in-the-job-जानिए नौकरी में प्रमोशन/तरक्की/उन्नति के लिए कुछ ज्योतिषीय उपाय       वैदिक ज्योतिष के अनुसार कई ग्रह दशम भाव के लिए लाभकारी होते हैं और शुभ फल देते हैं। इनमें सूर्य कार्य क्षेत्र में हमारे लक्ष्य और महत्वाकांक्षा का कारक होता है। मंगल ग्रह हमारी व्यावसायिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए ऊर्जा प्रदान करता है और बेहतर प्रयासों के लिए प्रेरित करता है। वहीं बुध ग्रह बुद्धि और ज्ञान का कारक होता है इसलिए बुध के प्रभाव से कार्य क्षेत्र में उन्नति मिलती है। बृहस्पति यानि गुरु की कृपा से नौकरी और व्यवसाय में कई अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं, साथ ही करियर के क्षेत्र में बढ़ोत्तरी होती है। इसके अलावा शनि देव जिन्हें कर्म अधिकारी कहा जाता है। वे हर मनुष्य को उसके कर्म के आधार पर शुभ फल और दंड देते हैं। काल पुरुष राशि चक्र में शनि स्वयं दशम भाव के स्वामी हैं। इस वजह से शनि देव कर्म और कार्य क्षेत्र में मनुष्य को अनुशासन, समर्पण और प्रतिबद्धता के लिए प्रेरित करते हैं। 
     पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कुंडली में दशम भाव के स्वामी और दशम भाव के पीड़ित रहने से हमारी प्रोफेशनल लाइफ में परेशानियां आती हैं। जब कोई क्रूर ग्रह दशम भाव में स्थित रहकर अशुभ फल देता है तो इसके परिणामस्वरुप नौकरी और व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जॉब मिलने में देरी, नौकरी से निकाला जाना, पदोन्नति नहीं होना, जॉब को लेकर असंतुष्ट रहना और करियर में तमाम तरह की परेशानी देखनी पड़ती है। जन्म कुंडली के अध्ययन से इस बात का पता लगाया जा सकता है। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नौकरी में प्रमोशन के उपाय जानने वाले जातकों के लिए यह लेख वरदान साबित होगा। इस लेख में हम आपको नौकरी में तरक्की पाने के सरल उपाय दे रहे हैं। नौकरी पेशा से जुड़े लोगों को हर साल पदोन्नति और वेतन वृद्धि का इंतज़ार रहता है। सालभर बेहतर प्रदर्शन और मेहनत करने पर प्रमोशन और सैलरी इंक्रीमेंट मिलने से नौकरी करने वाला हर व्यक्ति खुश होता है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि जॉब कर रहे जातकों को उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता है। उनके प्रमोशन में किसी न किसी प्रकार की रुकावट या बाधा देखने को मिलती है। ऐसे लोगों के लिए वैदिक ज्योतिष में नौकरी में तरक्की के उपाय बताए गए हैं। इन उपायों के माध्यम से नौकरी कर रहे जातक आसानी से अपनी मेहनत का फल प्रमोशन और इंक्रीमेंट के रूप में प्राप्त कर सकते हैं। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के मतानुसार इन सभी मुश्किलों के समाधान के लिए केवल एक अचूक उपाय आपकी मदद कर सकता है। आपके द्वारा की गई मेहनत रंग लाएगी और आप दिन दुगुनि रात चौगुनी तरक्की करेंगे। यदि आप अपनी नौकरी में प्रमोशन या पदोन्नति चाहते हैं तो यहां ज्योतिष अनुसार कुछ उपाय बता रहे हैं। इनमें से कोई भी एक उपाय आजमा सकते हैं। बस किसी भी एक उपाय ही लगातार करने से आपकी मनोकामनापूर्ण हो जाएगी।
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 इन ज्योतिषीय उपाय से होगा नौकरी में प्रमोशन -- 
 कुंडली में दशम भाव के स्वामी से संबंधित मंत्रों का जप करना चाहिए। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि जातक विभिन्न ग्रहों के दुष्प्रभाव से पीड़ित रहता है तो भी नौकरी में परेशानी आती है। इसके निराकरण लिए घर पर नवग्रह हवन या मंदिर में नवग्रह अभिषेक करवाना चाहिए। इसके प्रभाव से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवग्रह हवन व अभिषेक से राहु-केतु के दोषों से भी मुक्ति मिलती है।       सूर्योदय के समय सूर्य देव को जल चढ़ाएं और गायत्री मंत्र या सूर्य मंत्र का जप करें। ऐसा करने से व्यावसायिक जीवन में उन्नति होती है। सूर्य के प्रभाव से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को जीवन में आने वाली कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। इसके प्रभाव से आपको कार्य स्थल पर अपने वरिष्ठ सहकर्मियों और अधिकारियों के साथ तालमेल बनाकर चलने में मदद मिलेगी। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनिवार के दिन शनि मंदिर में तेल का दीया जलाने से भी नौकरी में आ रही परेशानियां दूर होती है। शनि मंत्र का जप करने से शनि से संबंधित दुष्प्रभाव कम होते हैं। शनि देव की कृपा से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा से हमारी प्रोफेशनल लाइफ में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वे लोग जो व्यवसाय करते हैं उनके लिए व्यापार वृद्धि यंत्र एक वरदान है। इस यंत्र को अपने कार्य स्थल या ऑफिस में स्थापित करें। इस यंत्र के सकारात्मक प्रभाव से धन लाभ, संतुष्टि व आर्थिक हानि का संकट दूर होता है। साथ ही बिजनेस में पार्टनरशिप और व्यवसाय के विस्तार में मदद मिलती है।
       हनुमानजी का आकाश में उड़ता हुआ एक चित्र लगाएं और प्रतिदिन उसके समक्ष बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। प्रति मंगलवार या शनिवार को बढ़ के पत्ते पर आटे का दीया जलाकर उसे हनुमानजी के मंदिर में रख आएं। ऐसा कम से कम 11 मंगलवार या शनिवार करें। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनिवार की सुबह जल्दी उठें और सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं। इसके बाद घर में किसी पवित्र स्थान पर पूजन का विशेष प्रबंध करें या किसी मंदिर में जाएं। शनिवार शनि की पूजा का विशेष दिन माना जाता है। शनि हमारे कर्मों का फल देने वाले देवता हैं। अत: इसी दिन शनि देव का विधिवत पूजन करनी चाहिए। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नौकरी या प्रमोशन की इच्छा रखने वाले लोगों को प्रतिदिन पक्षियों को मिश्रित अनाज खिलाना चाहिए। आप सात प्रकार के अनाजों को एकसाथ मिलाकर पक्षियों को खिलाएं। इसमें गेहूं, ज्वार, मक्का, बाजरा, चावल, दालें शामिल की जा सकती हैं। प्रतिदिन सुबह-सुबह यह उपाय करें, जल्दी ही नौकरी से जुड़ी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी।उनके लिए जल की व्यवस्था भी करें। यह उपाय कम से कम 43 दिन तक करें। जब पक्षी आपके घर की छत पर चहकेंगे तो घर के ईर्द गिर्द फैली नकारत्मकता का नाश होगा और सकारात्मकता का संचार होगा। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की प्रमोशन/ तरक्की के लिए सूर्य देवता को मनाना काफी शुभ बताया जाता है। जो लोग आसानी से तरक्की करते हैं उनका सूर्य काफी स्ट्रोंग होता है। आप प्रतिदिन सुबह सूर्य को पानी अर्पित करें और सूर्य नमस्कार किया करें। सूर्य देवता को जल अर्पित करने वाला बर्तन तांबे का हो और उसके अन्दर कुछ बूंदे गंगाजल की डाल लें। जल अर्पित करने के बाद आप सूर्य देवता से अपनी इच्छा रोज जाहिर किया करें। अगर लाख मेहनत करने पर भी मनचाहा वेतन या प्रमोशन नहीं मिल रहा है तो आज से ही रोज रात में एक हरे कपड़े में एक इलायची को बांधकर तकिए के नीचे रखकर सो जाएं और प्रात: उसे घर के किसी बाहरी व्यक्ति को दे दीजिए। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि नौकरी-पेशा करने वाले जातकों को जॉब में प्रमोशन नहीं मिल रहा है अथवा उनकी तनख़्वाह में वृद्धि नहीं हो रही है तो उन्हें मंगलवार के दिन हनुमान जी की आराधना करना चाहिए। हर रविवार को गाय को किसी बर्तन में गुड़ व गेहूं रखकर स्नेहपूर्वक खिलाएं। इसके साथ ही मंदिर में पीली वस्तुएं दान करें। शुक्ल पक्ष के सोमवार को तीन गोमती चक्र चांदी के तार से बांध कर हमेशा अपने पास रखें। 
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 नौकरी में तरक़्क़ी पाने, नई नौकरी पाने, सैलरी में वृद्धि के लिए एवं मनपसंद स्थानातंरण के अलावा नौकरी में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए अन्य ज़रुरी उपाय-- 
 1. किसी ग़रीब को काले कंबल का दान करें 
 2. पिसी हुई हल्दी को बहते पाने में डालें 
 3. घर से निकलने से पूर्व पहले दाहिना पैर निकालें 
 4. सोमवार को कनिष्ठिका अँगुली में चाँदी की अंगूठी में मोती धारण करें 
 5.सुबह पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएँ एवं पदोन्नति की कामना करें 
 6. रविवार या मंगलवार के दिन मन में पदोन्नति की कामना करते हुए लाल कपड़े में जटा वाला नारियल बांधें और उसे पूर्व दिशा की ओर बहते हुए जल में प्रवाहित करें 
 7. शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले सोमवार के दिन सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र को चाँदी के तार में बाँधकर अपने पास रखें 
 8. घर से निकलते समय एक नींबू को अपने सिर के ऊपर से 7 बार घुमाएँ और चार लौंग इसके अन्दर डालें। अब इस नींबू को अपनी जेब या बैग में रखें और शाम को किसी बहते पानी में या किसी सुनसान जगह रख दें 
 9. यदि मनचाहा स्थानांतरण चाहते हैं तो अपने तकिये के नीचे अनंतमूल की जड़ को रखकर सोएँ 
 10. प्रत्येक शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे सरसो के तेल का दीपक जलाकर 7 परिक्रमा करें। 
 11. प्रत्येक गुरुवार को पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाएँ लेकिन वृक्ष को स्पर्श न करें 
 12. पिता की सेवा करें और उन्हें यथासंभव कुछ उपहार दें 
 13. पीपल के 11 साबुत पत्ते लेकर उन पर लाल सिन्दूर से राम-राम लिखकर प्रत्येक पत्ते को माथे से लगाकर साइड रखते जाएं। जब सभी पत्तों पर राम-राम लिख जाये तो मौली माला बनाकर हनुमान जी से अपनी नौकरी की प्रार्थना करते हुए उन्हें ये माला पहना दें। ऐसा लगातार 7 शनिवार तक करें 
 14. नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय एक नींबू में 4 लौंग गाढ़कर ॐ हं हनुमंते नमः मंत्र का 21 बार जाप करके नींबू को जेब या पर्स में रखकर जाएं और वापिस आकर ,किसी पीपल के पेड़ के नीचे रख दें 15. किसी अच्छे से ज्योतिषी को अपनी जन्म पत्रिका दिखाकर दशम भाव तथा दशमेश को मज़बूती प्रदान करें

जानिए क्या होता है मारकेश....मारकेश के प्रभाव....मारकेश का कारण

कैसे करें कुण्डली में मारकेश का अध्ययन ?? 
प्रिय पाठकों/मित्रों, भारतीय ज्योतिष में ऐसे अनेक तरीके हैं जिनके द्वारा मृत्यु का पता लगाया जा सकता है | फिर भी मृत्यु के बारे में जानते हुए भी नहीं बताना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में यह वर्जित है | किसी व्यक्ति को इस बारे में जानने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए परन्तु फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उत्सुकतावश जानने के लिए अक्सर पूछते हैं की मेरी मृत्यु कब होगी, मेरी मृत्यु कैसे होगी, मेरी मृत्यु कहाँ होगी अस्तु | मारकेश अर्थात-मरणतुल्य कष्ट या मृत्यु देने वाला वह ग्रह जिसे आपकी जन्मकुंडली में 'मारक' होने का अधिकार प्राप्त हैं। अलग-अलग लग्न के 'मारक' अधिपति भी अलग-अलग होते हैं।
             मारकेश की दशा जातक को अनेक प्रकार की बीमारी, मानसिक परेशानी, वाहन दुर्घटना, दिल का दौरा, नई बीमारी का जन्म लेना, व्यापार में हानि, मित्रों और संबंध‌ियों से धोखा तथा अपयश जैसी परेशानियां आती हैं। जन्मकुण्डली का सामयिक विशलेषण करने के पश्चात ही यह ज्ञात हो सकता है कि व्यक्ति विशेष की जीवन अवधि अल्प, मध्यम अथवा दीर्घ है। जन्मांग में अष्टम भाव, जीवन-अवधि के साथ-साथ जीवन के अन्त के कारण को भी प्रदर्शित करता है। अष्टम भाव एंव लग्न का बली होना अथवा लग्न या अष्टम भाव में प्रबल ग्रहों की स्थिति अथवा शुभ या योगकारक ग्रहों की दृष्टि अथवा लग्नेश का लग्नगत होना या अष्टमेश का अष्टम भावगत होना दीर्घायु का द्योतक है। 
Know-what-happens-Marrakesh-Effects-of-Marrakesh-Marrakesh-reason-Marrakesh-to-study-the-sun-जानिए क्या होता है मारकेश ?? मारकेश के प्रभाव ?? मारकेश का कारण ?? कैसे करें कुण्डली में मारकेश का अध्ययन ??          मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए|| मारकेश-निर्णय के प्रसंग में यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि पापी शनि का मारक ग्रहों के साथ संबंध हो तो वह सभी मारक ग्रहों का अतिक्रमण कर स्वयं मारक हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है। (1) पापी या पापकृत का अर्थ है पापफलदायक।
        कोई भी ग्रह तृतीय, षष्ठ, एकादश या अष्टम का स्वामी हो तो वह पापफलदायक होता है। ऐसे ग्रह को लघुपाराशरी में पापी कहा जाता है। मिथुन एवं कर्क लग्न में शनि अष्टमेश, मीन एवं मेष लग्न में वह एकादशेश, सिंह एवं कन्या लग्न में वह षष्ठेश तथा वृश्चिक एवं धनु लग्न में शनि तृतीयेश होता है। इस प्रकार मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मीन इन आठ लग्नों में उत्पन्न व्यक्ति की कुंडली में शनि पापी होता है। इस पापी शनि का अनुच्छेद 45 में बतलाये गये मारक ग्रहों से संबंध हो तो वह मुख्य मारक बन जाता है। तात्पर्य यह है कि शनि मुख्य मारक बन कर अन्य मारक ग्रहों को अमारक बना देता है और अपनी दशा में मृत्यु देता है। 
        मारकेश ग्रह का निर्णय करने से पूर्व योगों के द्वारा अल्पायु, मध्यायु या दीर्घायु है, यह निश्चित कर लेना चाहिए। क्योंकि योगों द्वारा निर्णीत आयु का समय ही मृत्यु का संभावना-काल है और इसी संभावना काल में पूर्ववर्णित मारक ग्रहों की दशा में मनुष्य की मृत्यु होती है। इसलिए संभावना-काल में जिस मारक ग्रह की दशा आती है वह मारकेश कहलाता है। इस ग्रंथ में आयु निर्णय के लिए ग्रहों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है- 
  1.  मारक लक्षण 
  2. मारक एवं 
  3. मारकेश

      जो ग्रह कभी-कभी मृत्युदायक होता है उसे मारक लक्षण कहते हैं। जिन ग्रहों में से कोई एक परिस्थितिवश मारकेश बन जाता है वह मारक ग्रह कहलाता है और योगों के द्वारा निर्णीत आयु के सम्भावना काल में जिस मारक ग्रह की दशा-अंतर्दशा में जातक की मृत्यु हो सकती है वह मारकेश कहलाता है।
किस ग्रह को आपकी जन्मकुंडली में 'मारक' होने का अधिकार प्राप्त हैं ?? 
 मेष लग्न के लिए मारकेश शुक्र, वृषभ लग्न के लिये मंगल, मिथुन लगन वाले जातकों के लिए गुरु, कर्क और सिंह राशि वाले जातकों के लिए शनि मारकेश हैं कन्या लग्न के लिए गुरु, तुला के लिए मंगल, और वृश्चिक लग्न के लिए शुक्र मारकेश होते हैं, जबकि धनु लग्न के लिए बुध, मकर के लिए चंद्र, कुंभ के लिए सूर्य, और मीन लग्न के लिए बुध मारकेश नियुक्त किये गये हैं।सूर्य जगत की आत्मा तथा चंद्रमा अमृत और मन हैं इसलिए इन्हें मारकेश होने का दोष नहीं लगता इसलिए ये दोनों अपनी दशा-अंतर्दशा में अशुभता में कमी लाते हैं। 
           मारकेश का विचार करते समय कुण्डली के सातवें भाव के अतिरिक्त, दूसरे, आठवें, और बारहवें भाव के स्वामियों और उनकी शुभता-अशुभता का भी विचार करना आवश्यक रहता है, सातवें भाव से आठवां द्वितीय भाव होता है जो धन-कुटुंब का भी होता हैं, इसलिए सूक्ष्म विवेचन करके ही फलादेश क‌िया जाता है। शास्त्र में शनि को मृत्यु एवं यम का सूचक माना गया है। उसके त्रिषडायाधीय या अष्टमेश होने से उसमें पापत्व तथा मारक ग्रहों से संबंध होने से उसकी मारक शक्ति चरम बिंदु पर पहुंच जाती है। 
             तात्पर्य यह है कि शनि स्वभावतः मृत्यु का सूचक है। फिर उसका पापी होना और मारक ग्रहों से संबंध होना- वह परिस्थिति है जो उसके मारक प्रभाव को अधिकतम कर देती है। इसीलिए मारक ग्रहों के संबंध से पापी शनि अन्य मारक ग्रहों को हटाकर स्वयं मुख्य मारक हो जाता है। इस स्थिति में उसकी दशा-अंतर्दशा मारक ग्रहों से पहले आती हो तो पहले और बाद में आती हो तो बाद में मृत्यु होती है। इस प्रकार पापी शनि अन्य मारक ग्रहों से संबंध होने पर उन मारक ग्रहों को अपना मारकफल देने का अवसर नहीं देता और जब भी उन मारक ग्रहों से आगे या पहले उसकी दशा आती है उस समय में जातक को काल के गाल में पहुंचा देता है। 
 बृहद्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार आयु के तीन प्रमुख योग होते हैं- 
  1.  अल्पायु, 13 वर्ष से 32 वर्ष तक अल्पायु
  2. मध्यमायु 33 से 64 वर्ष तक मध्यमायु 
  3.  दीर्घायु 65 से 100 वर्ष तक दीर्घायु


  •  सौ वर्ष से अधिक की आयु को उत्तमायु भी कह सकते हैं।
  •  महर्षि पराशर का मत है कि बीस वर्ष तक आयु विचार नहीं करना चाहिए 
  • क्योंकि इस समय में कुछ बालक पिता के, कुछ बालक माता के और कुछ अपने अनुचित कर्मों के प्रभाववश मर जाते हैं। 
  •  अपने अनुचित कर्मों का विचार करने के लिए अरिष्ट योगों का प्रतिपादन किया गया है। 

       यद्यपि माता-पिता के अनुचित कर्मों का विचार भी अरिष्ट योगों द्वारा किया जा सकता है किंतु यह विचार बहुधा आनुमानिक होता है, पूर्ण प्रामाणिक नहीं। अतः बीस वर्ष की उम्र तक आयु का विचार नहीं करना चाहिए। बीस वर्ष की आयु हो जाने के बाद आयु का विचार किया जाता है जो इस प्रकार है- सर्वप्रथम अल्पायु, मध्यायु या दीर्घायु योगों के द्वारा जातक की आयु अल्प, मध्य या दीर्घ होगी, यह निर्धारित कर लेना चाहिए। 
           बृहस्पति, शुक्र, पक्षबली चंद्रमा और शुभ प्रभावी बुध शुभ ग्रह माने गये हैं और शनि, मंगल, राहु व केतु अशुभ माने गये हैं। सूर्य ग्रहों का राजा है और उसे क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है। बुध, चंद्रमा, शुक्र और बृहस्पति क्रमशः उत्तरोत्तर शुभकारी हैं, जबकि सूर्य, मंगल, शनि और राहु अधिकाधिक अशुभ फलदायी हैं। कुंडली के द्वादश भावों में षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव अशुभ (त्रिक) भाव हैं, जिनमें अष्टम भाव सबसे अशुभ है। षष्ठ से षष्ठ - एकादश भाव, तथा अष्टम से अष्टम तृतीय भाव, कुछ कम अशुभ माने गये हैं। अष्टम से द्वादश सप्तम भाव और तृतीय से द्वादश - द्वितीय भाव को मारक भाव और भावेशों को मारकेश कहे हैं। केंद्र के स्वामी निष्फल होते हैं परंतु त्रिकोणेश सदैव शुभ होते हैं। 
           नैसर्गिक शुभ ग्रह केंद्र के साथ ही 3, 6 या 11 भाव का स्वामी होकर अशुभ फलदायी होते हैं। ऐसी स्थिति में अशुभ ग्रह सामान्य फल देते हैं। अधिकांश शुभ बलवान ग्रहों की 1, 2, 4, 5, 7, 9 और 10 भाव में स्थिति जातक को भाग्यशाली बनाते हैं। 2 और 12 भाव में स्थित ग्रह अपनी दूसरी राशि का फल देते हैं। शुभ ग्रह वक्री होकर अधिक शुभ और अशुभ ग्रह अधिक बुरा फल देते हैं राहु व केतु यदि किसी भाव में अकेले हों तो उस भावेश का फल देते हैं। परंतु वह केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित होकर त्रिकोण या केंद्र के स्वामी से युति करें तो योगकारक जैसा शुभ फल देते हैं।
           लग्न कुंडली में उच्च ग्रह शुभ फल देते हैं, और नवांश कुंडली में भी उसी राशि में होने पर ‘वर्गोत्तम’ होकर उत्तम फल देते हैं। बली ग्रह शुभ भाव में स्थित होकर अधिक शुभ फल देते हैं। पक्षबलहीन चंद्रमा मंगल की राशियों, विशेषकर वृश्चिक राशि में (नीच होकर) अधिक पापी हो जाता है। चंद्रमा के पक्षबली होने पर उसकी अशुभता में कमी आती है। स्थानबल हीन ग्रह और पक्षबल हीन चंद्रमा अच्छा फल नहीं देते। विभिन्न लग्नों के भिन्न भिन्न मारकेश होते हैं यहां एक बात और समझने की है कि सूर्य व चंद्रमा को मारकेश का दोष नहीं लगता है. मेष लग्न के लिये शुक्र मारकेश होकर भी मारकेश का कार्य नहीं करता किंतु शनि और शुक्र मिलकर उसके साथ घातक हो जाते हैं. वृष लगन के लिये गुरु , मिथुन लगन वाले जातकों के लिये मंगल और गुरु अशुभ है, कर्क लगन के लिये शुक्र, सिंह लगन के लिये शनि और बुध, कन्या लगन के लिये मंगल, तुला लगन के लिए मंगल, गुरु और सूर्य, वृश्चिक लगन के लिए बुध, धनु लग्न का मारक शनि, शुक्र, मकर लगन के लिये मंगल, कुंभ लगन के लिये गुरु, मंगल, मीन लगन के लिये मंगल, शनि मारकेश का काम करता है.
               छठे आठवें बारहवें भाव मे स्थित राहु केतु भी मारक ग्रह का काम करते है. यह आवश्यक नहीं की मारकेश ही मृत्यु का कारण बनेगा अपितु वह मृत्यु तुल्य कष्ट देने वाला हो सकता है अन्यथ और इसके साथ स्थित ग्रह जातक की मृत्यु का कारण बन सकता है. मारकेश ग्रह के बलाबल का भी विचार कर लेना चाहिए. कभी-कभी मारकेश न होने पर भी अन्य ग्रहों की दशाएं भी मारक हो जाती हैं. इसी प्रकार से मारकेश के संदर्भ चंद्र लग्न से भी विचार करना आवश्यक होता है. यह विचार राशि अर्थात जहां चंद्रमा स्थित हो उस भाव को भी लग्न मानकर किया जाता है. उपर्युक्त मारक स्थानों के स्वामी अर्थात उन स्थानों में पड़े हुए क्रमांक वाली राशियों के अधिपति ग्रह मारकेश कहे जाते हैं || 
             सामान्य मान्यता के विपरीत यहां आपने देखा कि नैसर्गिक शुभ ग्रह तो प्रबल मारकेश की स्थिति पैदा करने में सक्षम हैं, जबकि वहीं क्रूर व पापी ग्रहों में मारकेशत्व की क्षमता कम होती है। जबकि कथित ज्योतिर्विदों ने राहु, केतु, मंगल तथा शनि को प्रबल मारकेश बताते हुए जनता को हमेशा ही ठगने का काम किया है। 
 उपरोक्त सिद्धांत अनुसार मारक की स्थिति :--- 
  1. २,७,१२ मारक स्थान हे (बहुत से ज्योतिषी 12वें भाव को मारक नहीं मानते, पर कई अन्य मानते हैं) 
  2. मारक स्थान के अधिपति मारक बनते हे || 
  3. मारक स्थान स्थित ग्रह मारक बनते हे || 
  4. द्वितीयेश ,सप्तमेश युक्त ग्रह मारक बनते हे || 
  5. पाप ग्रह मारक ग्रह से द्रष्ट या युक्त हो तो मारक बनते हे || 
  6. द्वितीयेश /सप्तमेश चन्द्र या सूर्य हो तो मारक नही बनते..|| 

स्‍त्री पुरूष मारकेश की दशा में क्‍या करें := 
इसके अशुभ प्रभाव से बचने के लिए सरल और आसान तरीका है कि कुंडली के सप्तम भाव में यदि पुरुष राशि हो तो शिव की तथा स्त्री हों तो शक्ति की आराधना करें। संबंधित ग्रह का चार गुना मंत्र, महामृत्युंजय जाप, एवं रुद्राभिषेक करना इस दशा शांति के सरल उपाय हैं। 
 आयु निर्णय का एक महत्वपूर्ण सूत्र---- 
 महर्षि पाराशन ने प्रत्येक ग्रह को निश्चित आयु पिंड दिये है,सूर्य को १८ चन्द्रमा को २५ मंगल को १५ बुध को १२ गुरु को १५ शुक्र को २१ शनि को २० पिंड दिये गये है उन्होने राहु केतु को स्थान नही दिया है। जन्म कुंडली मे जो ग्रह उच्च व स्वग्रही हो तो उनके उपरोक्त वर्ष सीमा से गणना की जाती है। जो ग्रह नीच के होते है तो उन्हे आधी संख्या दी जाती है,सूर्य के पास जो भी ग्रह जाता है अस्त हो जाता है उस ग्रह की जो आयु होती है वह आधी रह जाती है,परन्तु शुक्र शनि की पिंडायु का ह्रास नही होता है,शत्रु राशि में ग्रह हो तो उसके तृतीयांश का ह्रास हो जाता है। 
             इस प्रकार आयु ग्रहों को आयु संख्या देनी चाहिये। पिंडायु वारायु एवं अल्पायु आदि योगों के मिश्रण से आनुपातिक आयु वर्ष का निर्णय करके दशा क्रम को भी देखना चाहिये। मारकेश ग्रह की दशा अन्तर्दशा प्रत्यंतर दशा में जातक का निश्चित मरण होता है। उस समय यदि मारकेश ग्रह की दशा न हो तो मारकेश ग्रह के साथ जो पापी ग्रह उसकी दशा में जातक की मृत्यु होगी। ध्यान रहे अष्टमेश की दशा स्वत: उसकी ही अन्तर्द्शा मारक होती है। व्ययेश की दशा में धनेश मारक होता है,तथा धनेश की दशा में व्ययेश मारक होता है। इसी प्रकार छठे भाव के मालिक की दशा में अष्टम भाव के ग्रह की अन्तर्दशा मारक होती है। मारकेश के बारे अलग अलग लगनो के सर्वमान्य मानक इस प्रकार से है।  
ज्योतिष शास्त्र में आयु के विभिन्न मानदंड---- 
 आयुष्य निर्णय पर ज्योतिष शास्त्र के सर्वमान्य सूत्रों के संकलन उदाहरण जैमिनी सूत्र की तत्वादर्शन नामक टीका में मिलता है। महर्षि मैत्रेय ने ऋषि पाराशर से जिज्ञासा वश प्रश्न किया कि हे मुन्हे आयुर्दाय के बहुत भेद शास्त्र में बतलाये गये है कृपाकर यह बतलायें कि आयु कितने प्रकार की होती है और उसे कैसे जाना जाता है,इस ज्योतिष के मूर्तिमंत स्वरूप ऋषि पराशन बोले – 
 बालारिष्ट योगारिष्ट्मल्पमध्यंच दीर्घकम।
 दिव्यं चैवामितं चैवं सत्पाधायु: प्रकीर्तितम॥ 
       हे विप्र आयुर्दाय का वस्तुत: ज्ञान होना तो देवों के लिये भी दुर्लभ है फ़िर भी बालारिष्ट योगारिष्ट अल्प मध्य दीर्घ दिव्य और अस्मित ये सात प्रकार की आयु संसार में प्रसिद्ध है। 
  1. बालारिष्ट---- ज्योतिष शास्त्र में जन्म से आठ वर्ष की आयुपर्यंत होने वाली मृत्यु को बालारिष्ट कहा गया है। यथा लग्न से ६ ८ १२ में स्थान में चन्द्रमा यदि पाप ग्रहों से द्र्ष्ट हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण का समय हो सूर्य चन्द्रमा राहु एक ही राशि में हों तथा लग्न पर शनि मंगल की द्रिष्टि हो तो जातक पन्द्रह दिन से अधिक जीवित नही रहता है,यदि दसवें स्थान में शनि चन्द्रमा छठे एवं सातवें स्थान में मंगल हो तो जातक माता सहित मर जाता है। उच्च का का या नीच का सूर्य सातवें स्थान में हो चन्द्रमा पापपीडित हो तो उस जातक को माता का दूध नही मिलता है वह बकरी के दूध से जीता है या कृत्रिम दूध पर ही जिन्दा रहत है।    इसी प्रकार लग्न से छठे भाव में चन्द्रमा लग्न में शनि और सप्तम में मंगल हो तो सद्य जात बालक के पिता की मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार अनेक बालारिष्ट योगिं का वर्णन शास्त्र में मिलता है। गुणीजन बालारिष्ट से बचने का उपाय चांदी का चन्द्रमा मोती डालकर प्राण प्रतिष्ठा करके बालक के गले में पहनाते है क्योंकि चन्द्रमा सभी चराचर जीव की माता माना गया है। जिस प्रकार मां सभी अरिष्टों से अपनी संतान की रक्षा करती है उसी प्रकार से चन्द्रमा बालारिष्ट के कुयोगों से जातक की रक्षा करता है। पित्रोर्दोषैर्मृता: केचित्केचिद बालग्रहैरपि। अपरे रिष्ट योगाच्च त्रिविधा बालमृत्यव:॥ शास्त्रकारों ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि जन्म से चार वर्षों के भीतर जो बालक मरता है उसकी मृत्यु माता के कुकर्मों व पापों के कारण होती है। चार से आठ वर्ष के भीतर की मौत पिता के कुकर्मों व पाप के कारण होती है,नौ से बारह वर्ष के भीतर की मृत्यु जातक के स्वंय के पूर्वजन्म कृत पाप के कारण होती है,और आठ वर्ष बाद जातक का स्वतंत्र भाग्योदय माना जाता है। इसलिये कई सज्जन बालक की सांगोपांग जन्म पत्रिका आठ वर्ष बाद ही बनाते है। 
  2. योगारिष्ट----- आठ के बाद बीस वर्ष के पहले की मृत्यु को योगारिष्ट कहा जाता है चूंकि विशेष योग के कारण अरिष्ट होती है अत: इसे योगारिष्ट कहा जाता है। 
  3.  अल्पायु योग--- बीस से बत्तिस साल की आयु को अल्पायु कहा है। मोटे तौर पर वृष तुला मकर व कुंभ लगन वाले जातक यदि अन्य शुभ योग न हो तो अल्पायु होते है। यदि लग्नेश चर मेष कर्क तुला मकर राशि में हो तो अष्टमेश द्विस्वभाव मिथुन कन्या धनु मीन राशि में हो तो अल्पायु समझना चाहिये। लगनेश पापग्रह के साथ यदि ६ ८ १२ भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि लगनेश व अष्टमेश दोनो नीच राशिगत अस्त निर्बल यो तो अल्पायु योग होता है। दूसरे और बारहवे भाव में पापग्रह हो केन्द्र में पापग्रह हो लगनेश निर्बल हो उन पर शुभ ग्रहों की द्रिष्टि नही हो तो जातक को अल्पायु समझना चाहिये। इसी प्रकार यदि जन्म लगनेश सूर्य का शत्रु हो जातक अल्पायु माना जाता है।  यदि लग्नेश तथा अष्टमेश दोनो ही स्थिर राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है। इसी प्रकार शनि और चन्द्रमा दोनो स्थिर राशि में हो अथवा एक चर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि जन्म लगन तथा होरा लगन दोनो ही स्थिर राशि की हों अथवा एक चर व दूसरे द्विस्वभाव राशि की हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि चन्द्रमा लग्न द्रिष्काण दोनो ही स्थिर राशि हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि चन्द्रमा लगन द्रिषकाण में एक की चर और दूसरे की द्विस्वभाव राशि तो भी जातक अल्पायु होता है। शुभ ग्रह तथा लग्नेश यदि आपोक्लिम ३ ६ ८ १२ में हो तो जातक अल्पायु होता है। जिस जातक की अल्पायु हो वह विपत तारा में मृत्यु को पाता है। 
  4.  मध्यायु योग--- बत्तिस वर्ष के बाद एवं ६४ वर्ष की आयु सीमा को मध्यायु के भीतर लिया गया है। यदि लग्नेश सूर्य का सम ग्रह बुध हो अर्थात मिथुन व कन्या लग्न वालों की प्राय: मध्यम आयु होती है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक चर मेष कर्क तुला मकर तथा दोसोअरा स्थिर यानी वृष सिंह वृश्चिक कुंभ राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि लगनेश व अष्टमेश दोनो ही द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक की मध्यम आयु होती है। यदि चन्द्रमा तथा द्रेषकाण में एक की चर राशि तथा दूसरे की स्थिर राशि हो तो जातक मध्यामायु होता है। यदि शुभ ग्रह पणफ़र यानी २ ५ ८ ११ में हो तो जातक की मध्यमायु होती है। मध्यायु प्रमाण वाले जातक की मृत्यु प्रत्यरि तारा में होती है।
  5.  दीर्घायु योग---- ६४ से १२० साल के मध्य को दीर्घायु कहा जाता है। यदि जन्म लगनेश सूर्य का मित्र होता है तो जातक की दीर्घायु मानी जाती है। लगनेश और अष्टमेश दोनो ही चर राशि में हो तो दीर्घायु योग माआ जाता है।यदि लगनेश और अष्टमेश दोनो में एक स्थिर और एक द्विस्वभाव राशि में हो तो भी दीर्घायु योग का होना माना जाता है। यदि शनि और चन्द्रमा दोनो ही चर राशि में हो अथवा एक चर राशि में और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो दीर्घायु होग होता है। यदि जन्म लगन तथा होरा लग्न दोनो ही चर राशि की हो अथवा एक स्थिर व दूसरी द्वस्वभाव राशि की हो तो जातक दीर्घायु होता है। यदि चन्द्रमा तथा द्रेषकाण दोनो की चर राशि हो तो जातक दीर्घायु होता है यदि शुभ ग्रह तथा लगनेश केंद्र में हो तो जातक दीर्घायु होता है। लगनेश केन्द्र में गुरु शुक्र से युत या द्र्ष्ट हो तो भी पूर्णायु कारक योग होता है,लगनेश अष्टमेश सहित तीन ग्रह उच्च स्थान में हो तथा आठवां भाव पापग्रह रहित हो तो जातक का पूर्णायु का योग होता है। लगनेश पूर्ण बली हो तथा कोई भी तीन ग्रह उच्च स्वग्रही तथा मित्र राशिस्थ होकर आठवें में हो तो जातक की पूर्णायु होती है।
  6.  दिव्यायु--- सब शुभ ग्रह केन्द्र और त्रिकोण में हो और पाप ग्रह ३ ६ ११ में हो तथा अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि हो तो दिव्य आयु का योग होता है। ऐसा जातक यज्ञ अनुष्ठान योग और कायाकल्प क्रिया से हजार वर्ष तक जी सकता है। 
  7.  अमित आयु योग--- यदि गुरु गोपुरांश यानी अपने चतुर्वर्ग में होकर केन्द्र में हो शुक्र पारावतांश यानी अपने षडवर्ग में एवं कर्क लगन हो तो ऐसा जातक मानव नही होकर देवता होता है,उसकी आयु की कोई सीमा नही होती है वह इच्छा मृत्यु का कवच पहिने होता है। 

वार से आयु की गणना करना--- 
                   मानसागरी व अन्य प्राचीन जातक ग्रंथो मे वारायु की गणना दी गयी है। उनके अनुसार रविवार का जन्म हो तो जातक ६० साल जियेगा परन्तु जन्म से पहला छठा और बाइसवां महिने में घात होगा,सोमवार का जन्म हो तो जातक ८४ साल जिन्दा रहेगा लेकिन ग्यारहवे सोलहवे और सत्ताइसवे साल में पीडा होगी मंगलवार को जन्म लेने वाला जातक चौहत्तर साल जियेगा,लेकिन जन्म से दूसरे व बाइसवें वर्ष में पीडा होगी,बुधवार को जन्म लेने वाला जातक चौसठ साल जियेगा,लेकिन आठवें महिने और साल में घात होगी,गुरुवार को जन्म लेने वाले जातक की उम्र चौरासी साल होती है लेकिन सात तेरह और सोलह साल में कष्ट होता है,शुक्रवार को जन्म लेकर जातक ६० साल जिन्दा रहता है,शनिवार का जन्म हो तो तेरहवे साल में कष्ट पाकर सौ साल के लिये उसकी उम्र मानी जाती है 
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              जन्मकुंडली में जन्म लग्न आपके शरीर का परिचायक है और अष्टम भाव से मृत्यु के बारे में जाना जा सकता है | अष्टम से अष्टम भाव यानी तीसरा भाव मारकेश का होता है | यदि व्यक्ति की मृत्यु अस्वाभाविक होती है तो मारकेश का योगदान निश्चित है | मारकेश का पता दुसरे भाव से भी लगाया जा सकता है क्योंकि दूसरा घर भी मारकेश का होता है और साथ ही सातवां भाव भी मारकेश की स्थिति दर्शाता है | सूर्य और चन्द्र लग्न से भी देखना चाहिए कि अष्टम भाव कैसा है | उसकी क्या दशा है | दूसरा, तीसरा, सातवाँ और ग्यारहवां भाव भी ध्यान से देखना चाहिए | केवल जन्म लग्न से की गई गणना गलत साबित हो सकती है | जन्म लग्न, चन्द्र लग्न और सूर्य लग्न तीनों कमजोर हों तो व्यक्ति अल्पायु होता है | इसके अतिरिक्त यदि अष्टमेश भी कमजोर हो तो निस्संदेह व्यक्ति अल्पायु होता है | 
         यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि लग्न और लग्नेश पर हो तो आयु में कुछ इजाफा तो होता है परन्तु व्यक्ति अल्पायु ही रहता है | अब यह सब व्यक्ति के ग्रहों के बलाबल पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की आयु क्या होगी | हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार भी आयुनिर्णय किया जा सकता है | मेरे विचार में मणिबंध इसमें विशेष भूमिका निभाता है | यदि जीवनरेखा कमजोर हो छोटी हो तो भी व्यक्ति ७० वर्ष की उम्र को पार कर सकता है यदि मंगल रेखा बलवान हो | मेरे विचार में जीवन रेखा से अधिक महत्वपूर्ण मंगल रेखा होती है जो आपको जीवन में कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है | स्वास्थ्य में गिरावट नहीं आने देती और व्यक्ति बीमार कम पढता है | यदि बीमार होता भी है तो कुछ समय के बाद ठीक हो जाता है | 
            मंगल रेखा बलवान हो तो व्यक्ति जीवनपर्यंत निरोगी रहता है और जब मरता है तब मृत्यु स्वाभाविक होती है | सब मणिबंध और मंगल रेखा पर निर्भर है | हाँ यदि हार्ट अटैक की बात करें तो हृदय रेखा का आंकलन अनिवार्य है | मृत्यु तो एक सच्चाई है जो एक शाश्वत सत्य है | मरने से डरने वाले लोग अक्सर मरने की तारीख जानकार जल्दी न मर जाएँ इसलिए इस तरह के सवालों के जवाब नहीं दिए जाते | कम से कम पाठक मुझसे यह अपेक्षा मत करें कि पूछने पर मैं आयु बता दूंगा | इस सन्दर्भ में और अधिक जानकारी के लिए यदि पाठकों के पत्र या ईमेल आयेंगे तो और संक्षेप में बताने की चेष्टा करूंगा | फिलहाल इस लेख के द्वारा मेरा पाठकों से निवेदन है कि यदि किसी बंधू को लगता हो की वह अल्पायु है तो उपायों द्वारा समाधान करके एक प्रयास किया जा सकता है | मृत्यु को नहीं हराया जा सकता परन्तु अकाल मृत्यु से बचा अवश्य जा सकता है | 
मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा में उपाय :--- 
  • शिव आराधना से लाभ मिलना है. 
  • मारक ग्रहों की दशा मे उनके उपाय करना चाहिए. 
  • महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। 

महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार है:-- 
ॐ हौं ॐ जूं ॐ स: भूर्भुव: स्वःत्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्। 
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतातॐ भूर्भुव: स्वः ॐ जूं स: हौं ॐ।। 

----इस विषय में राम रक्षा स्त्रोत, महामृत्युंजय मन्त्र, लग्नेश और राशीश के मन्त्रों का अनुष्ठान और गायत्री मन्त्रों द्वारा आयु में कुछ वृद्धि की जा सकती है ऐसा मेरा मानना है | 
              किसी किसी की पत्रिका में षष्ठ भाव व अष्टमेश का स्वामी भी अशुभ ग्रहों के साथ हो तो ऐसे योग बनते हैं। वाहन से दुर्घटना के योग के लिए शुक्र जिम्मेदार होगा। लोहा या मशीनरी से दुर्घटना के योग का जिम्मेदार शनि होगा। आग या विस्फोटक सामग्री से दुर्घटना के योग के लिए मंगल जिम्मेदार होगा। चौपायों से दुर्घटनाग्रस्त होने पर शनि प्रभावी होगा। वहीं अकस्मात दुर्घटना के लिए राहु जिम्मेदार होगा। अब दुर्घटना कहाँ होगी? इसके लिए ग्रहों के तत्व व उनका संबंध देखना होगा। 
  •  · षष्ठ भाव में शनि शत्रु राशि या नीच का होकर केतु के साथ हो तो पशु द्वारा चोट लगती है। 
  • · षष्ठ भाव में मंगल हो व शनि की दृष्टि पड़े तो मशीनरी से चोट लग सकती है। 
  • · अष्टम भाव में मंगल शनि के साथ हो या शत्रु राशि का होकर सूर्य के साथ हो तो आग से खतरा हो सकता है।
  •  · चंद्रमा नीच का हो व मंगल भी साथ हो तो जल से सावधानी बरतना चाहिए। 
  • · केतु नीच का हो या शत्रु राशि का होकर गुरु मंगल के साथ हो तो हार्ट से संबंधित ऑपरेशन हो सकता है।
  •  · ‍शनि-मंगल-केतु अष्टम भाव में हों तो वाहनादि से दुर्घटना के कारण चोट लगती है। 
  • · वायु तत्व की राशि में चंद्र राहु हो व मंगल देखता हो तो हवा में जलने से मृत्यु भय रहता है।
  •  · अष्टमेश के साथ द्वादश भाव में राहु होकर लग्नेश के साथ हो तो हवाई दुर्घटना की आशंका रहती है। 
  • · द्वादशेश चंद्र लग्न के साथ हो व द्वादश में कर्क का राहु हो तो अकस्मात मृत्यु योग देता है। 
  • · मंगल-शनि-केतु सप्तम भाव में हों तो उस जातक का जीवनसाथी ऑपरेशन के कारण या आत्महत्या के कारण या किसी घातक हथियार से मृत्यु हो सकती है। 
  • · अष्टम में मंगल-शनि वायु तत्व में हों तो जलने से मृत्यु संभव है। 
  • · सप्तमेश के साथ मंगल-शनि हों तो दुर्घटना के योग बनते हैं। इस प्रकार हम अपनी पत्रिका देखकर दुर्घटना के योग को जान सकते हैं। 

यह घटना द्वितीयेश मारकेश की महादशा में सप्तमेश की अंतरदशा में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में घट सकती है। उसी प्रकार सप्तमेश की दशा में द्वितीयेश के अंतर में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में हो सकती है। जिस ग्रह की मारक दशा में प्रत्यंतर हो उससे संबंधित वस्तुओं को अपने ऊपर से नौ बार विधिपूर्वक उतारकर जमीन में गाड़ दें यानी पानी में बहा दें तो दुर्घटना योग टल सकता है। 
लग्नों के मारकेश :--- 
  1. मेष लग्न मारकेश :शनि और शुक्र। 
  2.  वृष लग्न :गुरु। 
  3.  मिथुन लग्न :मंगल और गुरु। 
  4.  कर्क लग्न : शुक्र। 
  5.  सिंह लग्न : शनि और बुध. 
  6. कन्या लग्न :मंगल। 
  7. तुला लग्न : मंगल। 
  8.  वृश्चिक लग्न : बुध. धनु लग्न: शनि, शुक्र। 
  9. मकर लगन :मंगल। 
  10. कुंभ लग्न :गुरु, मंगल। 
  11. मीन लगन : मंगल, शनि। 
  12.  मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा में : मानसिक, शारीरिक , दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी परेशानी आ सकती हैं. मृत्यु तुल्य कष्ट हो सकता है 

मारकेश विचार---- 
मनुष्य का जन्मांग चक्र बारह खानों में विभाजित है, जिन्हें स्थान कहते हैं। जन्मांग चक्र के अष्टम स्थान से आयु का विचार किया जाता है और उस अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान भी आयु स्थान होता है। इस प्रकार प्रत्येक कुंडली में लग्न से अष्टम स्थान और तृतीय स्थान आयु के स्थान होते हैं। इन स्थानों के व्यय स्थान अर्थात सप्तम और द्वितीय स्थान मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहलाता है। यह विचार राशि अर्थात जहां चंद्रमा स्थित हो उस भाव को भी लग्न मानकर किया जाना चाहिए। उपर्युक्त मारक स्थानों के स्वामी अर्थात उन स्थानों में पड़े हुए क्रमांक वाली राशियों के अधिपति ग्रह मारकेश कहे जाते हैं। लग्न स्थान शरीर का विचार करता है। 
             इस दृष्टि से लग्न के भी व्यय स्थान अर्थात बारहवें भाव को भी मारक कहा गया है। जातक के जन्म समय में पूर्वी क्षितिज में स्थित राशि के आधार पर लग्न का तथा उस समय उपस्थित नक्षत्र के आधार पर जन्म राशि का निर्धारण किया जाता है। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन राशियों के स्वामी क्रमश: मंगल, शुक्र, बुध, चंद्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु होते हैं, जिनमें सूर्य, मंगल, शनि पाप ग्रह और गुरु तथा शुक्र शुभ माने जाते हैं, जबकि बुध पाप ग्रहों का सहचारी होने से या पापयुक्त होने से पापग्रह और बिना पापग्रहों के साथ-साथ के शुभ ग्रह होता है। इसी प्रकार चंद्रमा भी क्षीण होने पर पाप ग्रह और बलवान या पूर्व होने पर शुभ ग्रह है। दशा विचार की दृष्टि से बिना पापयुक्त शुभ ग्रह और पूर्ण चंद्र केंद्राधिपति (कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों के स्वामी) होने पर पापप्रद हो जाते हैं। इसी प्रकार पापग्रह केंद्राधिपति होने पर शुभ हो जाते हैं।
            त्रिकोण स्थानों पंचम, नवम स्थानों के स्वामी सदैव शुभ ग्रह तीन, छह, ग्यारह स्थानों के स्वामी पाप ग्रह होते हैं। सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर अष्टमेश पाप ग्रह होता है, किंतु यदि वह लग्नेश भी हो तो पाप ग्रह नहीं होता है। त्रिकोणेशों में पंचमेश विशेष बलवान होता है और केंद्रेशों में लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम के स्वामी क्रमश: बलवान होते हैं। इस प्रकार मंगल और शुक्र अष्टमेश होने पर भी पाप ग्रह नहीं होते, सप्तम स्थान मारक, केंद्र स्थान है। अत: गुरु या शुक्र आदि सप्तम स्थान के स्वामी हों तो वह प्रबल मारक हो जाते हैं। इनसे कम बुध और चंद्र सबसे कम मारक होता है। शनि के मारक से संबद्ध मात्र होने से ही मारकत्व में प्रबलता आ जाती है। तीनों मारक स्थानों में द्वितीयेश के साथ वाला पाप ग्रह सप्तमेशके साथ वाले पाप ग्रह से अधिक द्वितीय भाव में स्थित पाप ग्रह सप्तम भाव में स्थित पाप ग्रह से अधिक, किंतु सप्तमेश के साथ रहने वाले पाप ग्रह से कम इसी प्रकार द्वितीयेश सप्तमेश से अधिक किंतु सप्तमस्थ पाप ग्रह से कम होता है। इसके अतिरिक्त द्वादशेश और उसके साथ वाले पापग्रह षष्ठेश एवं एकादशेश भी कभी-कभी मारकेश होते हैं। 
           इस प्रकार पाप ग्रह का मारकत्व सबसे कम तदनंतर षष्ठेश एवं एकदाशेश, तृतीयेश, अष्टमेश द्वादशस्य पाप ग्रह द्वादशेश, सप्तमेश द्वितीयेश सप्तमस्थ पाप ग्रह और द्वितीयस्थ पाप ग्रह फिर सप्तमेश के साथी पाप ग्रह तथा अंत में द्वितीयेश के साथ वाले पाप ग्रह क्रमश: बलवान होते हैं। मारकेश के द्वितीय भाव सप्तम भाव की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली हैं और इसके स्वामी से भी ज्यादा उसके साथ रहने वाला पापग्रह। स्वामी तो महत्वपूर्ण है ही, किंतु उसके साथी पाप ग्रहों का भी निर्णय विचार पूर्वक करना चाहिए। सामान्यतया यह समझा जाता है कि मारकेश जातक की मृत्यु के कारण होते हैं, किंतु मारकेश द्वारा सूचित मृत्यु यदि जातक की आयु हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट के भी परिचायक होते हैं। चाहें तो शारीरिक या भयानक अपमान आदि के द्वारा मानसिक ही क्यों न हों। 
           इसलिए मारकेश विचार के साथ-साथ जातक की आयु के संबंध में भी विचार कर लेना चाहिए। जैमिनीय मतानुसार चक्र का प्रयोग किया जा सकता है। यदि आयु विचार से आयु है तो मारकेश मारक नहीं होगा साथ ही जातक से संबद्ध पुत्र- पत्नी पिता आदि के जन्मांगों से भी जातक के संबंधानुसार उसकी आयु का विचार कर लेना चाहिए। इतना ही नहीं मारकेश ग्रह के बलाबल का भी विचार कर लेना चाहिए कि कौन सा ग्रह मारकेश के दोष का शमन कर सकता है जैसा कि कहा गया है कि राहु के दोष को बुध इन दोनों के दोष को शनि तथा राहु, बुध, शनि तीनों के दोषों का मंगल, मंगल समेत चारों के दोष को शुक्र, पांचों के दोष को गुरू, गुरू समेत छहों के दोष को चंद्रमा और सभी के दोष को उत्तरायण का सूर्य दूर करने में सहायक होता है। इस संदर्भ में ग्रहों की विफलता भी विचारणीय है। 
          सूर्य के सहित चंद्र चतुर्थ भाव में बुध, पंचम में बृहस्पति, षष्ठ में शुक्र और द्वितीय में मंगल, सप्तम भाव में स्थित चंद्रमा विफल होता है। कभी-कभी मारकेश न रहने पर भी अन्य ग्रहों की दशाएं भी मारक हो जाती हैं जैसे - केतु, शुक्र, मंगल, बुध की महादशा में जन्म लेने वालों के लिए क्रमश: मंगल,वृहस्पति और राहु की दशाएं मृत्यु कारक होती हैं। मारकेश के निवारण हेतु मारक ग्रह का दान, जप एवं आयुष्य कारक ग्रह के रत्न धारण महामृत्युंजय एवं चंडी के प्रयोग बताए गए हैं। ज्योतिष शास्त्र में कथितु आयु औसत आयु होती है जो सत्कर्म से बढ़ती है और दुष्कर्म से ह्रास को प्राप्त होती है। कृपा चाहे वह गुरु की हो या इष्ट की, ज्योतिषी और जातक दोनों को ही प्रभावित करने वाली होती है, इसलिए वह शास्त्रीय विचार से भी सर्वोपरि है। 
मारकेश की दशा आने से पहले बरतें सावधानी---- 
 फलित ज्योतिष के अनुसार किसी भी जातक के जीवन में 'मारकेश' ग्रह की दशा के मध्य घटने वाली घटनाओं की सर्वाधिक सटीक एवं सत्य भविष्यवाणी की जा सकती है, क्योंकि मारकेश वह ग्रह होता है जिसका प्रभाव मनुष्य के जीवन में शत-प्रतिशत घटित होता है | यह दशा जीवन में कभी भी आये चाहे जीतनी बार आये, व्यक्ति के जीवन में अपनी घटनाओं से अमिट छाप छोड़ ही जाती हैं | मैंने ऐसे हज़ारों जातकों की जन्मकुंडलिओं का विवेचन किया है, और पाया कि जिन-जिन लोंगों को मारकेश की दशा लगी वै कहीं न कहीं अधिक परेशानी में दिखें | मारकेश अर्थात- मरणतुल्य कष्ट देने वाला वह ग्रह जिसे आपकी जन्मकुंडली में 'मारक' होने का अधिकार प्राप्त है, आपको सन्मार्ग से भटकने से रोकने के लिए सत्य एवं निष्पक्ष कार्य करवाने और न करने पर प्रताड़ित करने का अधिकार प्राप्त है | 
           कुंडली में अलग-अलग लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के 'मारक' अधिपति भी अलग-अलग होते हैं ! इनमे मेष लग्न के लिये मारकेश शुक्र, वृषभ लग्न के लिये मंगल, मिथुन लगन वाले जातकों के लिए गुरु, कर्क और सिंह राशि वाले जातकों के लिए शनि मारकेश हैं, कन्या लग्न के लिए गुरु, तुला के लिए मंगल, और बृश्चिक लग्न के लिए शुक्र मारकेश होते हैं, जबकि धनु लग्न के लिए बुध, मकर के लिए चंद्र, कुंभ के लिए सूर्य, और मीन लग्न के लिए बुध मारकेश नियुक्त किये गये हैं | सूर्य जगत की आत्मा तथा चंद्रमा अमृत और मन हैं इसलिए इन्हें मारकेश होने का दोष लगता इसलिए ये दोनों अपनी दशा-अंतर्दशा में अशुभता में कमी लाते हैं | 
             मारकेश का विचार करते समय कुण्डली के सातवें भाव के अतिरिक्त, दूसरे, आठवें, और बारहवें भाव के स्वामियों और उनकी शुभता-अशुभता का भी विचार करना आवश्यक रहता है, सातवें भाव से आठवाँ द्वितीय भाव होता है जो धन-कुटुंब का भी होता है इसलिए सूक्ष्म विवेचन करके ही फलादेश कहना चाहिए | मारकेश की दशा जातक को अनेक प्रकार की बीमारी, मानसिक परेशानी, वाहन दुर्घटना, दिल का दौरा, नई बीमारी का जन्म लेना, व्यापार में हानि, मित्रों और सम्बन्धियों से धोखा तथा अपयश जैसी परेशानियाँ आती हैं | इसके के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए सरल और आसान तरीका है, कि कुंडली के सप्तम भाव में यदि पुरुष राशि हो तो शिव की तथा स्त्री हों तो शक्ति की आराधना करें | सम्बंधित ग्रह का चौगुना मंत्र, महामृत्युंजय जाप, एवं रुद्राभिषेक करना इस दशा शांति के सरल उपाय हैं ! इसके अतिरिक्त जो भी ग्रह मारकेश हो उसी का 'कवच' पाठ करें, ध्यान रहे दशा आने से एक माह पहले ही आचरण में सुधार लायें और अपनी सुबिधा अनुसार स्वयं उपाय करें | 

जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)

रूद्राक्ष (रूद्र मतलब शिव, अक्ष मतलब आंसु इसलिए रूद्र अधिक अक्ष मतलब शिव के आंसु) विज्ञान में उसे म्संमवबंतचने ळंदपजतें त्वगइ के नाम से जाना जाता हैं, जो एक तरह का (फल) बीज हैं । जो कि एशिया खंड के कुछ भागों में जैसे की इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, भारत, नेपाल, श्रीलंका और अंदमान-निकोबार में पाये जाते हैं । कई वैज्ञानिको ने अपने लंबे प्रयोगात्मक अभ्यास के बाद कबूल किया हैं कि इस चमत्कारी बीज के कई फायदे हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिव, अध्यात्मिक और कई वैद्यकीय खूबीयां हैं जो इसके पहनने वाले को जीवन के कई कार्यक्षेत्र (जैसे की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) में मदद रूप होता हैं । कई पुराण, शास्त्रों और आयुर्वेदिय शास्त्रों में रूद्राक्ष के फायदे और महत्ता का तलस्पर्शीय वर्णन किया गया हैं । आज कई हजार सालो से राजा, साधु-संत और ऋषिमुनि रूद्राक्ष की पूजा करते आ रहे हैं और उसे पहनते आये हैं । 
जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)-Learn-how-to-use-Rudraksh-to-remove-his-disease-Rudraksh-treatment-of-various-diseases--       कहते हैं रूद्राक्ष पहनने वाले को अध्यात्मिक रूप में कई फायदे होते हैं, उससे संपत्ति और ख्याति भी बढ़ती हें ओर कई भौतिक सुख भी प्राप्त होते हैं । रूद्राक्ष या रूद्राक्षमाला पहनने से पहले जरूरी हैं कि किसी रूद्राक्ष थेयायिस्ट, ज्योतिषि, वैदिक अभ्यासु, आयुर्वेदिक डॉक्टर या फिर किसी ऐसे व्यक्ति जिसने रूद्राक्ष धारण किया हो । उनसे उनके अनुभवों को जान लेना जरूरी हैं ताकि रूद्राक्ष से होने वाले फायदों ाक रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति पूरी तरह लाभ उठा सके । रूद्राक्ष के दर्शन से लक्ष पुण्य, स्पर्श से कोटि-प्रमाण पुण्य, धारण करने से दशकोटि-प्रमाण पुण्य एवं इससे जप करने से लक्ष कोटि सहस्त्र तथा लक्ष कोटि शत-प्रमाण पुण्य की प्राप्ति होती हैं। श्री मद्देवीभागवत के अनुसार जिस प्रकार पुरूषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, मुनियों में कश्यप, अश्व समूहों में उच्चैः श्रवा, देवों में शिव देवियों में गौरी (पार्वती) सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह रूद्राक्ष सभी में श्रेष्ठ हैं।  
रूद्राक्ष उत्पत्ति की कथा :- 
 स्कन्ध पुराण के अनुसार प्राचीन समय में पाताल लोक का राजा मय बड़ा ही बलशाली, शुरवीर, महापराक्रमी और अजय राजा था । एक बार उसके मन में लौभ आया और पाताल से निकलकर अन्य लोको पर विजय प्राप्त की जाए एैसा मन में विचार किया । विचार के अनुसार पाताल लोक के दानवों ने अन्य लोकों के ऊपर आक्रमण कर दिया और अपने बल के मद में चुर मय ने हिमालय पर्वत के तीनों श्रृंगों पर तीन पूल बनाए । जिनमें से एक सोने का, एक चॉदी का और एक लोहे का था । इस प्रकार सभी देवताओं के स्थान पर पाताल लोक के लोगों का वहां राज्य हो गया । 
       सभी देवतागण इधन-उधर गुफा आदि में छुपकर अपना जीवन व्यतित करने लगे । अन्त में सभी देवतागण ब्रह्माजी के पास गये और उनसे प्रार्थना की कि पाताल लोक के महापराक्रमी त्रिपुरासुरों से हमारी रक्षा करें । तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि त्रिपुरासुर इस समय महापराक्रमी हैं । समय और भाग्य उसका साथ दे रहा हैं । अतः हम सभी को त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु की शरण में चलना चाहिए । हमारा मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा । इस प्रकार ब्रह्माजी सहित समस्त देवगण विष्णु लोक पहुॅचकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगें । देवगणों ने अपनी करूण कथा भगवान विष्णु को सुनाई और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की । भगवान विष्णु ने भी ब्रह्माजी की तरह भगवान शिव की शरण में जाने को कहा । तत्प्श्चात सभी देवगण भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुॅचे वहां उन्होने प्रभु से शरण मांगी और अपने जीवन की रक्षा हेतु प्रार्थना की । 
     तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा आदि सहित सभी देवतागण व स्वयं भगवान शिव पृथ्वी मंडल पर रथ को लेकर, तथा अपना धनुष बाण लेकर और स्वयं भगवान विष्णु दिव्य बाण बनकर भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए । इस प्रकार भगवान शिव ने सागर स्वरूप तूणिर को बांध युद्ध के लिए रवाना हुए । त्रिपुरासुरों के नगर में पहुॅचकर भगवान शिव ने शुलमणी भगवान नारायण स्वरूप धारण कर अमोघ बाण को धनुष में चढ़ाकर निशाना साधते हुए त्रिपुरासुर पर प्रहार किया जिससे त्रिपुरासुरों के तीनों त्रिपुर के जलते ही हाहाकार मच गई । त्रिपुर के दाह के समय भगवान शिव ने अपने रोद्र शरीर को धारण कर लिया और अपनी युद्ध की थकान मिटाने हेतु सुन्दर शिखर पर विश्राम करने हेतु पहुॅचे । विश्राम के बाद भगवान शिव जोर-जोर से हंसने लगे । भगवान रूद्र के नेत्रों से चार ऑसु टपक पड़े। उन्हीं चार बूंद अश्रुओं के उस शेल शिखर पर गिर जाने से चार अंकुर पैदा हुए । समयानुसार अंकुर बड़े होने से कोई पत्र, पुष्प व फल आदि से हरे-भरे हो गये और रूद्र के अश्रुकणों से उत्पन्न ये वृक्ष रूद्राक्ष नाम से विख्यात हुए । 
 जानिए रूद्राक्ष और रूद्राक्ष माला पहनने के फायदे--- 
 1 रूद्राक्ष अथवा रूद्राक्षमाला मनकी चंचलता दूर करता हैं, शांति देता हैं, बेचैनी दूर करता हैं, आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बढ़ाता हैं । 
 2 रूद्राक्ष में कई प्रकार के विटामिन हेते हैं जैसे कि विटामिन सी, जो रोगो से लड़ने वाली हमारे शरीर की प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाता हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिक तरंगे होती हैं, जो हमारे रूधिराभिसरण और रक्तचाप को काबू में रखता हैं । 
 3 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला की पूजा करने वाले और धारण करने वाले को रूद्राक्ष कालाजादू, मारण तंत्र, और बुरी आत्माओं से सुरक्षा प्रदान करता हैं । 
 4 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला पहननेवाले को रूद्राक्ष अकस्मात और अकुदरती मौत से बचाता हैं । 
 5 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला हमारे अंदर की विषयवासना, लालच, क्रोध और अहंकार को दूर करता हैं, और हृदय को शुद्ध करता हैं । 
 6 मंत्र सिद्धि में रूद्राक्षमाला इन्सान की अंतरज्ञान शक्ति तथा अति इंद्रिय शक्ति को बढ़ाता हैं। सही नियमों का पालन करके किसी खास हेतु से पहना गया रूद्राक्ष इच्छित वस्तु या लक्ष्य पाने में काफी मदद करता हैं । 
===================================================================== आइये जाने विभिन्न रुद्राक्ष और उनके औषधीय गुण--- 
 एकमुखी रूद्राक्ष :- एकमुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव-स्वरूप हैं, इसके धारण करने से बड़े से बड़े पापों का नाश होता हैं, मनुष्य चिंतामुक्त और निर्भय हो जाता हैं, उसे किसी भी प्रकार की अन्य शक्ति और शत्रु से कोई कष्ट भय नहीं होता जो एकमुखी रूद्राक्ष को धारण और पूजन करता हैं, उसके यहॉ लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, स्थिर हो जाती हैं । रूद्राक्षों में एकमुखी रूद्राक्ष सर्वश्रेष्ठ, शिव स्वरूप सर्वकामना सिद्धि-फलदायक और मोक्षदाता हैं। एकमुखी रूद्राक्ष से संसार के सभी सुख सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं । अपने प्रभाव से यह रूद्राक्ष कंगाल को राजा बना सकता हैं ।
       सच्चा एकमुखी रूद्राक्ष किसी भी असम्भव कार्य को सम्भव कर सकता हैं किन्तु यह बात आमतौर पर बाजार में मिलने वाले एक मुखी काजु दाना (भद्राक्ष) पर लागु नहीं होती हैं । सूर्य दक्षिण-नेत्र, हृदय, मस्तिष्क, अस्थि इत्यादि का कारक हैं। यह ग्रह भगन्दर, स्नायु रोग, अतिसार, अग्निमंदता इत्यादि रोगों का भी कारक बनता हैं, जब यह प्रतिकूल बन जाता हैं, तब यह विटामिन ए और विटामिन डी को भी संचालित करता है, जिसकी कमी से निशान्धता (रात में न दिखाई देना), हड्डीयों की कमजोरी जैसे रोग उत्पन्न हाते हैं । इन सब के निवारण के लिए एकमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए क्योकिं सूर्यजनित दोषों के निवारण हेतु ज्योतिषी माणिक्य रत्न धारण करने का परामर्श देते हैं । सूर्य प्रतिकूल-स्थानीय होकर विभिन्न रोगों को जन्म देते हैं । नेत्र सम्बन्धी रोग, सिरदर्द, हृदयरोग, हड्डी के रोग, त्वचा रोग, उदर सम्बन्धी रोग, तेज बुखार, जैसे सभी रोगो के निवारण हेतु रूद्राक्ष माला के मध्य में एकमुखी रूद्राक्ष को पिरोकर धारण करना चाहिए। 
 दोमुखी रूद्राक्ष :-  दोमुखी रूद्राक्ष हर गौरी (अर्धनारीश्वर) स्वरूप हैं, इसे शिव-शिवा-रूप भी कहते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित (धारण) होता हैं, उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि ईधन को जला डालती हैं । इस रूद्राक्ष का संचालन ग्रह चन्द्रमा (सोम) हैं । यह रूद्राक्ष हर प्रकार के रिश्तों में एकता बढ़ाता हैं, वशीकरण मानसिक शांति व ध्यान में एकग्रता बढ़ाता हैं । इच्छाशक्ति पर काबू, कुण्डली को जागृत करने में सहायता करता हैं । 
      स्त्री रोग जैसे गर्भाशय संबंधीत रोग शरीर के सभी प्रवाही और रक्त संबंधी बीमारियां, अनिद्रा, दिमाग, बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जलसम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग होते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मस्तिष्क विकार भी होते हैं । गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं। यह ग्रह हृदय, फेफडा, मस्तिष्क, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन-नली, शरीरस्थ इत्यादि का कारक हैं। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ो की बीमारी होती हैं। 
तीनमुखी रूद्राक्ष : - तीनमुखी रूद्राक्ष ब्रह्मस्वरूप हैं। इसमें ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनों शक्तियों का समावेश है। इसका प्रधान ग्रह मंगल हैं। मंगल को ज्योतिषशास्त्र में सेनापति का दर्जा दिया गया हैं। यह अग्निरूप हैं। इसको धारण करने से आत्मविश्वास, निर्भयता, द्वेश, उच्चज्ञान, वास्तुदोष आदि में फायदा होता हैं । मंगल यदि किसी भी दुष्प्रभाव में होता हैं तो उसे रक्त रोग, हैजा, प्लेग, चेचक, रक्तचाप, शक्ति क्षीणता, नारी अंगरोग, अस्थिभ्रंश, बवासीर, मासिक धर्म रोग, अल्सर, अतिसार, चोट लगना और घाव आदि रोग होते है। मंगल ग्रह की प्रतिकूलता से उत्पन्न इन सभी रोगों के निदान और निवारण के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष आवश्यक रूप से धारण करना चाहिए। वृश्चिक और मेष राशि वालो के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त ही भाग्योदयकारी हैं।
 चारमुखी रूद्राक्ष : - चारमुखी रूद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप माना गया हैं। यह चार वेदों का रूप भी माना गया हैं। चारमुखी रूद्राक्ष के धारणकर्ता की आँखों में तेजस्विता , वाणी में मधुरता तथा शरीर में स्वास्थ्य एवं अरोग्यजनित कान्ति उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, उनके चतुर्दिक सम्मोहन का प्रभाव मण्डल निर्मित हो जाता है। यह रूद्राक्ष मन की एकाग्रता को बढाता हैं जो लेखक, कलाकार, विज्ञानी, विद्यार्थी और व्यापारियों को लाभकारी हैं । इसके प्रभाव से चपलता, चातुर्य और ग्रहण शक्ति में लाभ होता हैं । इस रूद्राक्ष पर बुध ग्रह का नियंत्रण होता हैं। 
     ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को युवराज कहा जाता है। यह नपुंसक तथा सौम्य ग्रह हैं। बुध ग्रह विद्या , गणित , ज्ञान, गाल ब्लाडर , नाड़ी संस्थान आदि का कारक हैं। इसकी प्रतिकुलता से अपस्मार , नाक, कान तथा गले के रोग, नपुंसकता, हकलाना, सफेद दाग, मानसिक रोग , मन की अस्थिरता, त्वचारोग, कोढ़, पक्षाघात पीतज्वर , नासिका रोग , दमा आदि रोग होते हैं। इन सभी के निदान के लिए चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभप्रद हैं। व्यापारियों और मिथुन तथा कन्या राशि वालो को चारमुखी रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। पन्ने की जगह चारमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पन्ने से कई गुना लाभ प्राप्त हो सकता हैं 
 पाँचमुखी रूद्राक्ष : - पाँचमुखी रूद्राक्ष स्वयं रूद्र स्वरूप हैं इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। यह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी माना जाता हैं। इससे यशोवृद्धि और वैभव सम्पन्नता आती हैं। इसका संचालन ग्रह बृहस्पति है। इसके उपयोग से मानसिक शांति, बुरी आदतों से छुटकारा, मंत्र सिद्धी, पवित्र विचार, व अधिक कामेच्छा पर काबू पाया जा सकता हैं । यह ग्रह धन , वैभव , ज्ञान , गौरव , मज्जा , यकृत , चरण , नितंब का कारक है। 
     बृहस्पति बुरे प्रभाव में हो तो व्यक्ति को अनेक तरह के कष्ट होते है। बृहस्पति स्त्री के लिए पति तथा पुरूष के लिए पत्नि का कारक हैं। अतः इसकी प्रतिकुलता से निर्धनता और दाम्पत्य सुख में विध्न उत्पन्न होता है तथा चर्बी की बिमारी , गुर्दा , जाँघ , शुगर और कान सम्बन्धी बीमारिया पैदा होती हैं। मोटापा, उदर गांठ, अत्यधिक शराब सेवन, एनिमिया, पिलीया, चक्कर आना, व मांस पेशियों के हठीले दर्द आदि के निदान के लिए पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। धनु और मीन राशि वाले तथा व्यापारियों को पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। पुखराज से यह कहीं अधिक गुणकारी और सस्ता हैं।
 छः मुखी रूद्राक्ष : - यह रूद्राक्ष शिव पुत्र गणेश और कार्तिकेय स्वरूप है। इसके धारण से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं। इसमें गणेश और कार्तिकेय स्वरूप होने के कारण इसके धारणकर्ता के लिए गौरी विशेष रूप से वरदायिनी और माता की भाँती सदैव सुलभ होती है। इस रूद्राक्ष का नियत्रंक और संचालक ग्रह शुक्र हैं जो भोग विलास और सुख सुविधा का प्रतिनिधि हैं।
      इसके प्रयोग द्वारा प्रेम, कामसुख, संगीत, कविता, सृजनात्मक और कलात्मक कुशलता, समझदारी, ज्ञान और वाक्य चातुर्य में लाभ होता हैं । यह ग्रह गुप्तेन्द्रिय, पूरूषार्थ, काम वासना , उत्तम भोग्य वस्तु , प्रेम संगीत आदि का कारक हैं। इस ग्रह के दुष्प्रभाव से नेत्र, यौन, मुख, मूत्र, ग्रीवा रोग और जलशोध आदि रोग होते हैं । कोढ़, नपुंसकता और मंद कामेच्छा, पथरी और किडनी सम्बन्धि रोग, मुत्र रोग, शुक्राणु की कमी व गर्भावस्था के रोग आदि में छः मुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। वृष और तुला राशि वाले के लिए विशेष लाभकारी है।
 सातमुखी रूद्राक्ष : - सातमुखी रूद्राक्ष के देवता सात माताएँ और हनुमानजी हैं। पद्मपुराण के अनुसार सातमुखी रूद्राक्ष के सातो मुख में सात महाबलशाली नाग निवास करते हैं। सात मुखी रूद्राक्ष सप्त ऋषियों का स्वरूप हैं। यह रूद्राक्ष सम्पत्ति , कीर्ति और विजय श्री प्रदान करने वाला होता हैं। सात मुखी रूद्राक्ष साक्षात् अनंग स्वरूप है। अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होता हैं। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती हैं। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं।इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इसके प्रयोग से तंदुरूस्ती, सौभाग्य और सम्पत्ति, रूके हुए कार्य, निराशापन को दूर किया जाता हैं।
       वशीकरण, आत्मविश्वास में वृद्धि, कामसुख व स्थिर विकास के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए । इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि हैं यह रोग तथा मृत्यु का कारक हैं। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक हैं। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह हैं। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चितां, अस्थि रोग, क्षय, केंसर, मानसिक रोग, जोड़ो का दर्द, अस्थमा, बहरापन, थकान, आदि रोग हो सकते है। शनि ग्रह भाग्य का कारक भी हैं। कुपित होने पर यह हताशा , कार्य विलम्बन आदि उत्पन्न करता हैं। जन्म कुण्डली में यदि नवें घर तथा नवें घर के स्वामी से किसी भी तरह संबद्ध हो जाता हैं तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय कठिनाई से व देरी से होता हैं। शनि और शनि की ढैया और साड़ेसाती से पीड़ित लोगों को शनि ग्रह को शान्त करने के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभदायी हैं। 
आठमुखी रूद्राक्ष : - आठमुखी रूद्राक्ष में कार्तिकेय , गणेश ,अष्टमातृगण ,अष्टवसुकगण और गंगा का अधिवास माना गया है। इसके प्रयोग से शुत्रओं, विपत्तियों पर विजय प्राप्त होती हैं । दीर्घायु, ज्ञान, रिद्धी-सिद्धी के लिए व मन की एकाग्रता बढ़ाने हेतु भी यह रूद्राक्ष धारण किया जाता हैं । यह रूद्राक्ष मिथ्या भाषण से उत्पन्न पापों को नष्ट करता है। यह सम्पूर्ण विध्नों को नष्ट करता हैं। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है। जो छाया ग्रह हैं। इसमें शनि ग्रह की भांति शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाशहीनता का दोष हैं। यह शनि की तरह लम्बा ,पीड़ादायक ,अभाव ,योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात भी घटित कर देता हैं। चर्मरोग , फेफड़े की बीमारी , पैरों का कष्ट, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले व मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह हैं। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती हैं। 
 नौमुखी रूद्राक्ष : - नौमुखी रूद्राक्ष भैरव स्वरूप हैं। इसमें नौ शक्तियों का निवास हैं इसके धारण करने से सभी नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं। इसके धारण करने से यमराज का भय नहीं रहता हैं। इसके उपयोग से सफलता, सम्मान, सम्पत्ति, सुरक्षा, चतुराई, निर्भयता, शक्ति, कार्यनिपुणता, वास्तुदोष में लाभ लिया जा सकता हैं । नौमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह केतु हैं जो राहु की तरह ही छाया ग्रह हैं। जिस प्रकार राहु शनि के सदृश हैं , उसी प्रकार केतु मंगल के सदृश हैं। मंगल की तरह केतू भी अपने सहचर्य और दृष्टि के प्रभाव में आने वाले पदार्थो को हानि पहुँचाता हैं। केतू के कुपित होने पर फेफड़े का कष्ट , ज्वर , नेत्र पीड़ा, बहरापन, अनिद्रा, संतानप्राप्ति, उदर कष्ट, शरीर में दर्द दुर्घटना एवं अज्ञात कारणों से उत्पन्न रोग परेशान करते हैं। केतू को मोक्ष का कारक भी माना गया हैं। केतू ग्रह की शांति के लिए लहसुनिया रत्न का प्रयोग किया जाता हैं किन्तू नौमुखी रूद्राक्ष लहसुनियां रत्न से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं।
दसमुखी रूद्राक्ष : - दशमुखी रूद्राक्ष पर यमदेव , भगवान विष्णु , महासेन दस दिक्पाल और दशमहाविद्याआओं का निवास होता हैं। इसका इष्टदेव विष्णु हैं। यह सभी ग्रहों को शांत करता हैं । इसके उपयोग से पारिवारिक शांति, सभी प्रकार की सफलता, दिव्यता एवं एकता प्राप्त होती हैं । इसके धारण से सभी प्रतिकूल ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। इसके धारण से सभी नवग्रह शांत और प्रसन्न होते हैं। इस रूद्राक्ष का प्रभाव ग्रहातंरों तक जाता हैं और ग्रहातंरों से आता हैं। यह समस्त सुखों को देने वाला शक्तिशाली और चमत्कारी रूद्राक्ष हैं। इसके उपयेग से कफ, फैफड़े सम्बन्धि रोग, चिंता, अशक्ति, हृदय रोग आदि में लाभ होता हैं। 
 ग्यारहमुखी रूद्राक्ष : - ग्यारहमुखी रूद्राक्ष एकादश रूद्र स्वरूप हैं। यह अत्यन्त ही सौभाग्यदायक रूद्राक्ष हैं। एक सौ सहस्त्र गायों के सम्यक दान से जो फल प्राप्त होता हैं वह फल ग्यारहमुखी रूद्राक्ष के धारण करने से तत्काल प्राप्त होता है। इस रूद्राक्ष पर इन्द्र का स्वामित्व हैं इन्द्र की प्रसन्नता से ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती हैं। इसके धारण करने से समस्त इन्द्रिया और मन नियंत्रित होता हैं। इसके प्रयोग से कुण्डली जागरण, योग सम्बंधी एकाग्रता, वैद्यकिय कार्य, निर्भयता, निर्णय क्षमता एवं सभी प्रकार से अकस्मात सुरक्षा में लाभ होता हैं । यह रूद्राक्ष योग साधना में प्रवृत व्यक्तियों के लिए बहुत अनुकूल हैं। यह शरीर , स्वास्थ्य , यम नियम , आसन , षटकर्म या अन्य यौगिक क्रियाओं में आने वाली बाधाओं को नष्ट करता हैं। स्वास्थ्य को सुद्रण बनाने वाले साधकों के लिए यह भगवान शिव का अनमोल उपहार हैं। इसके प्रयोग से स्त्रीरोग, स्नायुरोग, पुराने हठीले रोगों से छुटकारा, शुक्राणु की कमी व संतानप्राप्ति में लाभ होता हैं ।  
बारहमुखी रूद्राक्ष : - बारहमुखी रूद्राक्ष आदित्य अर्थात सूर्य स्वरूप हैं। सभी शास्त्र और पुराणों में इस रूद्राक्ष पर सूर्य की प्रतिष्ठा मानी गई हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाला निरोगी और अर्थलाभ करके सुख भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता हैं दरिद्रता कभी उसे छू भी नहीं पाती। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार की दुर्घटनाओं से बचाकर शक्ति प्रदान करता हैं। जो मनुष्य सर्वाधिकार सम्पन्न बनकर सम्राट की तरह शासन करना चाहता हो उसे यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। क्योंकि सूर्य स्वयं बारहमुखी रूद्राक्ष पर प्रतिष्ठित होकर धारणकर्ता को सूर्यवत् तेजस्विता , प्रखरता और सम्राट स्वरूपता प्रदान करता हैं। 
      नेतृत्व के गुण, बड़े सम्मान, ताकत, आत्मसम्मान, आत्म विश्वास, प्रेरणा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, एवं ताकत आदि इसके प्रयोग से प्राप्त होते हैं। विश्व के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य इस रूद्राक्ष के माध्यम से धारणकर्ता के मन के भीतर के दुःख , निराशा , कुंठा , पीड़ा और दुर्भाग्य के अंधकार को दूर कर देता है। सूर्य तेजोपुंज हैं , अतः बारहमुखी रूद्राक्ष रूद्राक्ष भी धारणकर्ता को तेजस्वी और यशस्वी बना देता हैं। गुणों में यह माणिक्य से अधिक प्रभावी तथा मूल्य में अधिक सस्ता हैं। इसके प्रयोग द्वारा सरदर्द , गंजापन, बुखार, ऑखों के रोग, हृदय रोग, दर्द और बुखार, मुत्राशय एवं पित्ताशय की जलन जैसे रोगों में लाभ होता हैं। 
 तेरहमुखी रूद्राक्ष - तेरहमुखी रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव स्वरूप हैं। यह सभी कामनाओं और सिद्धियों को देने वाला हैं। इसे धारण करने से कामदेव प्रसन्न होते है। इसे धारण करने से वशीकरण और आकर्षण होता हैं । जीवन के सभी ऐशो-आराम, सुन्दरता, रिद्धी-सिद्धी और प्रसिद्धी, वशीकरण एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इसका उपयोग लाभकारी होता हैं। जो व्यक्ति सुधा-रसायन का प्रयोग करना चाहते हैं, जो धातुओं के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हैं जिसका स्वभाव रसिक हैं उन्हे इस रूद्राक्ष के धारण से सिद्धि प्राप्त होती हैं, सभी कामनाओं की पूर्ति अर्थ-लाभ, रस-रसायन की सिद्धियॉ और सम्पूर्ण सुख-भोग मिलता हैं । 
     इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास हैं इसीकारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियां प्रदान कराने में सक्षम हैं। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं। इसके उपयोग से किडनी, नपुंसकता, मुत्राशय के रोग, कोढ़, गर्भावस्था के रोग, शुक्राणु की कमी आदि में आश्चर्यजनक लाभ होता हैं ।
 चौदहमुखी रूद्राक्ष - चौदहमुखी रूद्राक्ष श्री कंठ स्वरूप हैं । यह रूद्रदेव की ऑखों से विशेष रूप से उत्पन्न हुआ हैं। जो व्यक्ति इस परमदिव्य रूद्राक्ष को धारण करता है, वह सदैव ही देवताओं का प्रिय रहता हैं । यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक हैं । यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला हैं । इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती हैं । इसके उपयोग द्वारा जातक की सभी तरह के बुरे तत्वों से रक्षा होती हैं । यह जातक को गरीबी से दूर रखता हैं । छटी इन्द्रीय व अर्न्तज्ञान तथा अतिंद्रिय शक्ति का मालिक बनाता हैं। चौदहमुखी रूद्राक्ष में हनुमान जी का भी अधिवास माना गया हैं यह रूद्राक्ष भूत, पिशाच, डाकिनी, शकिनी से भी रक्षा करता हैं । इससे बल और उत्साह का वर्धन होता हें । 
     इससे निभ्रयता प्राप्त होती हैं और संकटकाल में सरंक्षण प्राप्त होता हैं । विपत्ति और दुर्घटना से बचने के लिए हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले चौदहमुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिए । यह रूद्राक्ष चमत्कारी हैं । इससे अनंतगुण विद्यमान हैं । शास्त्र प्रमाण के अनुसार मानव-वाणी से इनके गुणों का व्याख्यान संभव नहीं हैं इसका धारणकर्ता स्वर्ग को प्राप्त करता हैं । वह चौदहों भुवनों का रक्षक और स्वामी बन जाता हैं। जिसने चौदहमुखी रूद्राक्ष धारणकर लिया शनि जैसा क्रोधी ग्रह भी लाख चाहकर उसका बुरा नहीं कर सकता । यह शास्त्रोक्त सत्य हैं । साधन सम्पन्न लोगों को आवश्यक रूप से इस दिव्य रूद्राक्ष का उपयोग अवश्य करना चाहिए। इसके प्रयोग द्वारा निराशापन, मानसिक रोग, अस्थमा, पक्षाघात, वायु के रोग, बहरापन, केंसर, चित्तभ्रम, थकान और पैरों के रोगों में लाभ होता हैं। 
 गौरी शंकर रूद्राक्ष :- मुख वाले रूद्राक्षों में गौरीशंकर रूद्राक्ष सर्वोपरि हैं, जिस प्रकार लक्ष्मी का पूजन उनके पति नारायण (विष्णुजी) के साथ करने लक्ष्मी-नारायण की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं ठीक इसी प्रकार गौरी (माँ पार्वती) के साथ देवाधिदेव भगवान शिव का पूजन करने से गौरी-शंकर की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष धारण पूजन से तो गौरीशंकर की कृपा निश्चित रूप से प्रापत होती ही हैं इससे किंचित मात्र भी संदेह नहीं हैं ।
      इसके उपयोग से पारिवारिक एकता, आत्मिक ज्ञान, मन और इंद्रियों पर काबू, कुण्डलिनी जागरण एवं पति-पत्नि की एकता में वृद्धि होती हैं। बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष के धारण करने से समूल नष्ट होता हैं जन्म के पाप इस रूद्राक्ष के धारण मात्र से काफूर हो जाते हैं गौरीशंकर रूद्राक्ष में गौरी स्वरूप भगवती पार्वती का निवास होने के कारण इस रूद्राक्ष पर भगवान शिव की विशेष कृपा हैं मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित मनुष्यों/स्त्रियों के लिए ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की भांति काम करता हैं । जन्म पत्री में यदि दुखदायी ‘‘कालसर्प योग‘‘ पूर्णरूप से अथवा आंसिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी + 9 मुखी + गौरीशंकर रूद्राक्ष अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योकिं कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं । 
 गणेश रूद्राक्ष :- सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक अडचनें और विलम्ब होने पर ‘‘गणेश रूद्राक्ष‘‘ का धारण चमत्कार दिखाता हैं । विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य हैं परम दुर्लभ हैं। इसके प्रयोग से विद्या व ज्ञान प्राप्ति, मानसिक असंतोष एवं सभी तरह के अवरोध दूर होते हैं । विशेष रूप से संतान बाधा एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता हैं । त्वचा रोग, हिचकी, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश, केंसर एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले दुष्परिणामों में उत्तम लाभ देता हैं। 
 पथरी रूद्राक्ष :- यह रूद्राक्ष उत्कृष्ट गुणवन्त रूद्राक्ष हैं । आमतौर पर पाए जाने वाले रूद्राक्ष से इसकी गुणवत्ता काफी उच्च होती हैं । इसमें विटामिन और इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो की मात्रा अधिक होती हैं । पथरी रूद्राक्ष कुदरती तौर पर मजबूत होने के कारण इसकी आयु कई सौ साल की होती हैं। उच्च परिणाम के लिए पथरी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए ।


जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत

सौरमंडल में मौजूद ग्रहों का हमारे जीवन पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह वही समझ सकता है जिसने इन बदलावों को कभी महसूस किया हो। यकीन मानिए, जिस नक्षत्र में हम जन्म लेते हैं, उस समय मौजूद ग्रह सारे जीवन हमें प्रभावित करते हैं। अब यह प्रभाव सकारात्मक होने के साथ नकारात्मक भी हो सकता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक ग्रह किसी एक राशि में कुछ समय तक रहता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक राशि में प्रवेश करने पर ये ग्रह ना केवल उस राशि, वरन् अन्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं। आज हम सूर्य राशि के वृष राशि में प्रवेश करने की घटना पर चर्चा करने जा रहे हैं। 14 मई, 2017 सूर्य ग्रह, वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य देव यहां पूरे एक महीने के लिए रहेंगे, और इसके बाद 15 जून को वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। 
Know-the-fate-of-people-who-will-change-the-Sun-in-Taurus-जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत         वैदिक ज्योतिष में सूर्य को नवग्रहों के राजा की उपाधि दी गई है। प्राणी जगत के लिए यह ऊर्जा का केन्द्र है, इसलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। प्रत्येक जातक की कुंडली में सूर्य उनके पिता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए यह पितृ कारक भी होता है। 14 मई 2017 रविवार को रात्रि 11:11 बजे सूर्य मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश करेगा और 15 जून 2017 गुरुवार को सुबह 05:47 पर वृषभ राशि से मिथुन राशि में गोचर करेगा। निश्चित ही सूर्य के इस गोचर का प्रभाव सभी 12 राशियों पर होगा। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार मेष का सूर्य लोगों को अप्रैल से ही सुख-सुविधाओं का जमकर आभास करा रहा है। 13 अप्रैल से शुरू हुई मेष संक्रांति ब्राह्मणों और धर्म-कर्म करने वालों सहित अन्य वर्ग के लोगों के लिए लाभप्रद है। 
        ज्योतिर्विद राजकुमार चतुर्वेदी के अनुसार सूर्य की यह युक्ति हालांकि सितंबर माह तक रहेगी,लेकिन 14 मई को सूर्य के वृष राशि में प्रवेश के करने के साथ ही कुछ दिनों के लिए यह लोगों को परेशान भी करेगा। वर्तमान में शनि धुन राशि में गोचर कर रहा है। मेष का सूर्य, शनि का धनु राशि में गोचर लोगों के लिए अच्छे दिन लेके आए हैं। ग्रहों इन युक्तियों से उद्योगों एवं निवेशों के लाभ में अप्रत्याशित वृद्धि होगी तो रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। स्वास्थ्य सेवाओं नवीन तकनीक का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगा। रियल और इन्फ्रा सेक्टर में गिरावट का दौर रहेगा। भूमि-मकानों की कीमतों में कमी के साथ-साथ किराये में भी कमी आएगी। 

वर्तमान में ऐसी है ग्रहों की चाल--- 
 उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार सूर्य वर्तमान में मेष राशि में चल रहा है। यह 14 मई को रात 10.55 बजे वृष राशि में प्रवेश करेगा। वर्तमान वृष राशि विचरण कर रहा मंगल 26 मई को मिथुन राशि में प्रवेश करेगा। मेष का बुध तीन जून को वृष में जाएगा। वर्तमान में कन्या राशि में विचरण कर रहा वक्र गति का गुरु 9 जून को कन्या राशि में मार्ग गति पकड़ लेगा तथा 12 सितंबर को कन्या राशि को छोड़कर तुला राशि में प्रवेश करेगा। मीन का शुक्र 31 मई को मेष राशि में प्रवेश करेगा। धनु राशि में वक्री हुआ शनि 25 अगस्त तक रहेगा। 

 जानिए क्या और केसा रहेगा यह रहेगा इस परिवर्तन का राशिगत प्रभाव--- (यह एक महीना वृषभ राशि के जातकों के साथ अन्य ग्यारह राशि के लिए कैसा रहेगा)-- 
  1. मेष: कुछ कठिनाइयां, छोटे भाई बहनों से विवाद। 
  2. वृष : पिता की सेहत में गिरावट, 21 जून के बाद समय अच्छा। 
  3. मिथुन : नाम एवं प्रसिद्धि मिलेगी, कानून से जुड़े मामलों में सफलता।  
  4. कर्क : परिवार को लेकर परेशानी, वाद-विवाद बढ़ सकता है। 
  5. सिंह : आय में वृद्धि की संभावना, प्रसिद्धि बढ़ेगी। 
  6. कन्या : मां की सेहत में गिरावट सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। 
  7. तुला : बड़ी उपलब्धि मिल सकती है, प्रोपर्टी से लाभ होगा। 
  8. वृश्चिक-: मानसिक तनाव, स्वास्थ्य में गिरावट।  
  9. धनु :- स्वास्थ्य में गिरावट, भाई-बहन के जीवन में समृद्धि। 
  10. मकर :- जून में उन्नति के दरवाजे खुलेंगे, लंबी यात्रा के योग। 
  11. कुंभ:- सपने सच होंगे, जून के बाद कार्य में अधिक मन लगेगा। 
  12. मीन :- खर्चे होंगे, मां की सेहत में गिरावट आएगी।

जानिए ज्योतिष अनुसार किसी कुंडली में आयु निर्णय कैसे करे

किसी भी मानवीय जीवन की छह घटनाओं के बारे में कहा जाता है कि इनके बारे में केवल ईश्वर ही जानता है, कोई साधारण मनुष्य इसकी पूर्ण गणना नहीं कर सकता। इन छह घटनाओं में से पहली दो घटनाएं न केवल किसी भी आत्‍मा के पृथ्‍वी पर प्रवास का समय निर्धारित करती है, बल्कि ज्योतिषी के समक्ष हमेशा प्रथम चुनौती के रूप में खड़ी रहती है। ज्योतिष में जीवन अवधि का विचार सामान्यतः अष्टम भाव से किया जाता है। इसके साथ ही अष्टमेश, कारक शनि, लग्न-लग्नेश, राशि-राशीश, चंद्रमा, कर्मभाव व कर्मेश, व्यय भाव व व्ययेश तथा इसके अलावा प्रत्येक लग्न के लिए मारक अर्थात् शत्रु ग्रह, द्वितीय, सप्तम, तृतीय एवं अष्टम भाव तथा इनके स्वामियों तथा शुभ एवं अशुभ पाप ग्रहों द्वारा डाले जाने वाले प्रभाव पर भी विचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
Here-how-to-decide-the-age-of-astrology-horoscopes-according-जानिए ज्योतिष अनुसार किसी कुंडली में आयु निर्णय कैसे करे
         सामान्यतः आयु में कमी करके मृत्यु का योग ‘मारक’ ग्रह देते हैं। इस तरह से शब्ध "मारक’" या "मारकेश" का अर्थ होता है मारने वाला या मृत्यु देने वाले ग्रह। जो आयु में कमी कर मृत्यु देता है। सामान्यतः मारकेश ग्रह वह होता है जो लग्नेश से शत्रुता रखता है। मंगल व बुध एक दूसरे के लिए मारकेश हैं। सूर्य व शनि एक दूसरे के लिए मारकेश हैं। शनि व चंद्र एक दूसरे के लिए मारकेश हैं। शुक्र व मंगल एक दूसरे के लिए मारकेश हैं। गुरु व बुध एक दूसरे के लिए मारकेश हैं। राहू व केतू छाया गृह सूर्य, चंद्र, मंगल व बृहस्पति के लिए मारकेश हैं। 
        एक ज्योतिषी  के लिए किसी जातक के जन्‍म समय का निर्धारण ज्योतिषीय कोण से भी बहुत मुश्किल रीति है। सामान्य तौर पर बच्चे के जन्म का समय वही माना जाता है, जो अस्पताल के कार्ड में लिखा होता है। संस्थागत प्रसव से पूर्व तो इतनी शुद्धता भी नहीं थी, केवल अनुमान से ही सुबह, दोपहर, शाम या रात का समय बताया जाता था, गोधूली बेला होने या सूर्य उदय के बाद का समय होने जैसी संभावनाओं के साथ कुण्‍डली बनाने का प्रयास किया जाता था। हाल के वर्षों में आम लोगों में ज्‍योतिष के प्रति रुचि बढ़ने के साथ अस्‍पतालों पर भी बच्‍चे के जन्‍म समय को शुद्ध रखने का दबाव आने लगा है।
         सामान्य तौर पर किसी जातक की मृत्यु का समय देखने के लिए मारक ग्रहों और बाधकस्थानाधिपति की स्थिति की गणना की जाती है। लग्न कुण्डली में आठवां भाव आयु स्थान कहा गया है और आठवें से आठवां यानी तीसरा स्थान आयु की अवधि के लिए माना गया है। किसी भी भाव से बारहवां स्थान उस भाव का क्षरण करता है। ऐसे में आठवें का बारहवां यानी सातवां तथा तीसरे का बारहवां यानी दूसरा भाव जातक कुण्‍डली में मारक बताए गए हैं। इन भावों में स्थित राशियों के अधिपति की दशा, अंतरदशा, सूक्ष्‍म आदि जातक के जीवन के लिए कठिन साबित होते हैं। 
        इसी प्रकार बाधकस्थानाधिपति की गणना की जाती है। चर लग्नों यानी मेष, कर्क, तुला और मकर राशि के लिए ग्‍यारहवें भाव का अधिपति बाधकस्‍थानाधिपति होता है। द्विस्वभाव लग्नों यानी मिथुन, कन्या, धनु और मीन के लिए सातवां घर बाधक होता है। स्थिर लग्नों यानी वृष, सिंह, वृश्चिक और कुंभ के लिए नौंवा स्थान बाधक होता है। मारक भाव के अधिपति और बाधक स्थान के अधिपति की दशा में जातक को शारीरिक नुकसान होता है। अब मृत्यु का समय ज्ञात करने के लिए इन दोनों स्‍थानों की तीव्रता को देखना होता है। सामान्य परिस्थितियों में इन स्‍थानों पर गौर करने पर जातक के शरीर पर आए नुकसान की गणना की जा सकती है।
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किसी भी जातक की आयु 1-3-8 भावों से देखे--- 
  • 1- जातक स्वंय 
  • 8- आयु/मृत्यु 
  • 3- 8 आंठवें से आंठवां शनी कारक आयु का


  •  चर राशि मेष-कर्क-तुला-मकर है। 
  • चर राशियां चलायमान रहती है। 
  • इनके बाधक भाव 11 है। 
  • इनके मारक भाव 2-7 है। 
  • इनके नेगेटिव भाव 6-8-12 है।
  • इनके पाज़िटिव भाव 1-5-9-10-3 है। 


 स्थिर राशि वृष-सिंह-वृश्चिक-कुंभ है। 
  • ये स्थिर/अडिग रहने वाली राशियां होती है। जैसे बैल, शेर, बिच्छू एक जगह पर टिक कर रहते है। सामना करने की हिम्मत रखते है भागते नहीं। 
  • इनके बाधक भाव 9 है। 
  • इनके मारक भाव 2-7 है।
  •  इनके नेगेटिव भाव 6-8-12 है। 
  • इनके पाज़िटिव भाव 1-5-10-11-3 है।


 द्विस्वभाव राशि मिथुन-कन्या-धनु-मीन---
  •  इनका दोहरा स्वभाव होता है। कहते कुछ करते कुछ। डरपोक भी होते है।
  •  इनके बाधक भाव 7 है। 
  • इनके मारक भाव 2-7 है। 
  • इनके नेगेटिव भाव 6-8-12 है। 
  • इनके पाज़िटिव भाव 1-5-9-10-11-3 है। 


ये तीन सेहत (1) के लिए घातक होते है। 
  • 6- बीमारी 
  • 8-खतरा
  • 12-नुक्सान 

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विशेष: ---- 
  1. जन्मांग से अष्टम में जो दोष या रोग वर्णित हैं उनसे, अष्टम भाव से अष्टम अर्थात् तृतीय भाव व तृतीयेश सभी आ जाते हैं। 
  2.   अष्टमेश जिस नवांश में बैठा हो उस नवांश राशि से संबंधित दोष से भी मृत्यु का कारण बनता है। 

अष्टम भावस्थ राशियों के अधो अंकित दोष के कारण जातक मृत्यु का वरण करता है। 
  1.  . मेष : पित्त प्रकोप, ज्वर, उष्णता, लू लगना जठराग्नि संबंधी रोग। 
  2.  . वृष: त्रिदोष, फेफड़े में कफ रुकने/सड़ने से उत्पन्न विकार, दुष्टों से लड़ाई या चैपायों की सींग से घायल होकर मृत्यु संभव है। 
  3.  . मिथुन: प्रमेह, गुर्दा रोग, दमा, पित्ताशय के रोग, आपसी वैमनस्य/शत्रुओं से जीवन बचाना मुमकिन नहीं। 
  4.  . कर्क: जल में डूबने, उन्माद, पागलपन, वात जनित रोगं 
  5.  . सिंह: जंगली जानवरो, शत्रुओं के हमले, फोड़ा, ज्वर, सर्पदंश। 
  6.  . कन्या: सुजाक रोग, एड्स, गुप्त रोग, मूत्र व जननेन्द्रिय रोग, स्त्री की हत्या, बिषपान। 
  7.  . तुला: उपवास, क्रोध अधिक करने, युद्ध भूमि में, मस्तिष्क ज्वर, सन्निपात। 
  8.  . वृश्चिक: प्लीहा, संग्रहणी, लीवर रोग, बवासीर, चर्म रोग, रुधिर विकार, विषपान से या विष के गलत प्रयोग से मृत्यु संभव है। 
  9.  . धनु: हृदय रोग, गुदा रोग, जलाघात, ऊंचाई से गिरना, शस्त्राघात से। 
  10. . मकर: ऐपेन्डिसाइटिस, अल्सर, नर्वस सिस्टम के फेल हो जाने के कारण गंभीर स्थिति, विषैला फोड़ा। 
  11. . कुंभ: कफ, ज्वर, घाव के सड़ने, कैंसर, वायु विकार, अग्नि सदृश या उससे संबंधित कारण से मृत्यु। 
  12.  . मीन: पानी में डूबने, वृद्धावस्था में अतिसार, पित्त ज्वर, रक्त संबंधित बीमारियों से मृत्यु संभावी है। 


       वैदिक ज्योतिष में जीवन अवधि के कठिन विषय पर व्यापक चिंतन किया गया है। बृहत पाराशर होरा शस्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं "बालारिष्ट योगारिष्टमल्पध्यंच दिर्घकम। दिव्यं चैवामितं चैवं सत्पाधायुः प्रकीतितम"॥ अर्थात आयु का सटीक ज्ञान तो देवों के लिए भी दुर्लभ है फिर भी बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य व अस्मित ये सात प्रकार की आयु होती हैं। इसके अलावा लग्नेश, राशीश, अष्टमेश व चंद्र नीच, शत्रु राशि के हों व 6, 8, 12 भाव आदि में चले जाएं। चंद्र नीच के अलावा अमावस्या युक्त हो तथा इन पर राहु, केतु का प्रभाव हो तो भी मारक योग बन जाता है, जो कि मृत्यु का कारण बनते हैं। 
  •  - बालारिष्ट योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 8 वर्ष तक की हो सकती है। 
  •  - योगारिष्ट योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 20 वर्ष तक की हो सकती है। 
  •  - अल्पायु योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 32 वर्ष तक की हो सकती है। - मध्यमायु योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 64 वर्ष तक की हो सकती है। 
  •  - दीर्घायु योग में व्यक्ति की आयु अधिकतम 120 वर्ष तक की हो सकती है। 
  •  - दिव्य योग में व्यक्ति की आयु अधिकतम 1000 वर्ष तक की हो सकती है। - अस्मित योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु की कोई सीमा नहीं होती है। 

       प्रिय पाठकों/मित्रों,  यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक हैं की वर्तमान समय में सामान्य डिलीवरी हो तो बच्चे के जन्म की चार सामान्य अवस्थाएं हो सकती हैं। पहली कि बच्चा गर्भ से बाहर आए, दूसरी बच्चा सांस लेना शुरू करे, तीसरी बच्‍चा रोए और चौथी जब नवजात के गर्भनाल को माता से अलग किया जाए। इन चार अवस्थाओं में भी सामान्य तौर पर पांच से दस मिनट का अंतर आ जाता है। अगर कुछ जटिलताएं हों तो इस समय की अवधि कहीं अधिक बढ़ जाती है। 
       वहीँ दूसरी ओर सिजेरियन डिलीवरी होने की सूरत में भी माता के गर्भ से बाहर आने और गर्भनाल के काटे जाने, पहली सांस लेने और रोने के समय में अंतर तो रहेगा ही, यहां बस संतान के बाहर आने की विधि में ही फर्क आएगा। जहां ज्योतिष में चार मिनट की अवधि से पैदा हुए जुड़वां बच्चों के सटीक भविष्य कथन का आग्रह रहता है, वहां जन्म समय का यह अंतर कुण्डली को पूरी तरह बदल भी सकता है। कई बार संधि लग्‍नों की स्थिति में कुण्डलियां गलत भी बन जाती है। ऐसे में जन्म समय को लेकर हमेशा ही शंका बनी रहती है। मेरे पास आई हर कुण्डली का मैं अपने स्तर पर बर्थ टाइम रेक्टीफिकेशन करने का प्रयास करता हूं। अगर छोटा मोटा अंतर हो तो तुरंत पकड़ में आ जाता है। वरना केवल लग्न के आधार पर फौरी विश्लेषण ही जातक को मिल पाता है। 
          फलादेश में समय की सर्वांग शुद्धि का आग्रह नहीं किया जा सकता। हिंदुओं कि मान्यता के अनुसार बालक की आयु का निर्धारण माता के गर्भ में ही हो जाता है। यह बड़े गौरव कि बात है कि ज्योतिष शास्त्र में आयु निर्धारण विषय पर व्यापक चिंतन किया गया है। यह एक कठिन विषय है। ज्योतिष शास्त्र में अविरल शोध, अध्ययन व अनुसंधान कार्य में जी जान से जुड़े हजारों, लाखों ज्योतिषी इस दिव्य विज्ञान के आलोक से जगत को आलौकिक कर पाएं है। महर्षि पराशर के अनुसार ‘बालारिष्ट योगारिष्टमल्पध्यंच दिर्घकम। दिव्यं चैवामितं चैवं सत्पाधायुः प्रकीतितम’।। हे विप्र आयुर्दाय का वस्तुतः ज्ञान होना तो देवों के लिए भी दुर्लभ है फिर भी बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य और अस्मित ये सात प्रकार की आयु होती हैं। 
       अगर जातक अपने प्रारब्ध का हिस्सा पूरा नहीं कर पाता है और क्रियमाण कर्मों के चलते अपना शरीर शीघ्र छोड़ देता है तो उसे मानव जीवन के इतर योनियों में उस समय को पूरा करते हुए अपने हिस्‍से का प्रारब्‍ध जीना होता है। जब तक हमारे सामनेचिकित्सकीय कोण से जीवित शरीर दिखाई देता है, हम यह मानकर चलते हैं कि जातक जीवित है, लेकिन ज्योतिषीय कोण यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता है। ऐसे में ज्योतिषीय योग यह तो बताते हैं कि जातक के साथ चोट कब होगी अथवा मृत्यु तुल्य कष्ट कब होगा, लेकिन स्पष्ट तौर पर मृत्यु की तारीख तय करना गणित की दृष्टि से दुष्कर कार्य है। 
         सटीक परिणाम प्रापित के लिए लग्न व चन्द्रकुंडली तथा लग्न व होरा कुंडली में तुलना करनी चाहिए। यदि अश्टम भाव में चर राषि हो तो जातक की मृत्यु चलते-फिरते होती है। यदि स्थिर राशि  में हो तों जातक पंलग या अस्पताल में हफतों महीनों पड़ा रहने के बाद मरता है। द्विस्वभाव राषि में मृत्यु से दो एक दिन पूर्व या कुछ ही घटें पूर्व पंलग पर लेटता है। यदि अश्टमेष भी चर,स्थिर  या द्विस्वभाव राषि में हो तो फल षत-प्रतिषत निश्चित हो जाता है। ( अश्टमेष व अश्टम दानों चर राषि में हो तो डाक्टर तक पहुंचन की नौबत तक नही आती। जातक कामबात करते-करते तुंरत मर जाता है।) इसी प्रकार छठे भाव में चर राषि हो तो रोग आते जाते रहते है। (जातक कम बिमार पड़ता है परन्तु षीघ्र ठीक हो जाता है।) सिथर राषि हो तो रोग आने के बाद जाता नही (गुरू की दृशिट न हो तो आजीवन रहता है), द्विस्वभाव राषि में कश्टयाध्य या कठिनार्इ से ठीक होता है।
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ये बनते हैं मृत्यु का कारण:-- 
  1.  अन्य ज्योतिषीय योग -- यदि अष्टम भाव में कोई ग्रह नही है, उस दशा में जिस बली ग्रह द्वारा अष्टम भाव दृष्ट होता है, उस ग्रह के धातु (कफ, पित्त, वायु) के प्रकोप से जातक का मरण होता है। ऐसा प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के पुरोधा का मत है। 
  2. ---- सूर्य का पित्त से, चंद्रमा का वात से, मंगल का पित्त से, बुध का फल-वायु से, गुरु का कफ से, शुक्र का कफ-वात से तथा शनि का वात से। 
  3.  --- अष्टम स्थान की राशि कालपुरुष के जिस अंग में रहना शास्त्रोक्त है, इस अंग में ही उस धातु के प्रकोप से मृत्यु होती है। 
  4.  ----यदि अष्टम भाव पर कई एक बली ग्रहों की दृष्टि हो तो उन सभी ग्रहों के धातु दोष से जातक का मरण होता है। -
  5. --- मृत्यु के कारणों का विवेचन करते समय यदि अष्टम भावस्थ ग्रह/ग्रहों की प्रकृति व प्रभाव तथा उसमें स्थित राशि, प्रकृति व राशियों के प्रभाव को संज्ञान में लेना परमावश्यक है। 
  6.  ---- सूर्य: सूर्य से अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त विकार, शस्त्राघात, मस्तिष्क की दुर्बलता, मेरूदंड व हृदय रोग। 
  7. ---चंद्रमा: जलोदर, हैजा, मुख के रोग, प्यरिसी, यक्ष्मा, पागलपन, जल के जानवर, शराब के दुष्प्रभाव।
  8.  --- मंगल: अग्नि प्रकोप, विद्युत करेंट, अग्नेय अस्त्र, मंगल आघात पहुंचाता है। रक्त विकार, हड्डी के टूटने, एक्सीडेंट, रक्त, हड्डी में मज्जा की कमी। क्षरण, कुष्ठ रोग, कैंसर रोग।
  9.  --- बुध: पीलिया, ऐनीमिया, स्नायु रोग, रक्त में हिमोग्लोबिन की कमी, प्लेटलेट्स कम होना, आंख, नाक, गला संबंधी रोग, यकृत की खराबी, स्नायु विकार, मानसिक रोग ।
  10.  --- गुरु: पाचन क्रिया में गड़बड़ी, कफ जनित रोग, टाइफाईड, मूर्छा, अदालती कार्यवाई, दैवी प्रकोप, वायु रोग मानसिक रोग।
  11.  --- शुक्र: मूत्र व जननेन्द्रिय रोग, गुर्दा रोग, रक्त/वीर्य/ रज दोष, गला, फेफड़ा, मादक पदार्थों के सेवन का कुफल प्रोस्ट्रेट ग्लैंड, सूखा रोग।
  12.  --- शनि: लकवा, सन्निपात, पिशाच पीड़ा, हृदय तनाव, दीर्घ कालीन रोग, कैंसर, पक्षाघात, दुर्घटना, दांत, कान, हड्डी टूटना, वात, दमा। 
  13.  --- राहु: कैंसर, चर्म रोग, मानसिक विकार, आत्म हत्या की प्रवृत्ति, विषाक्त भोजन करने से उत्पन्न रोग, सर्प दंश, कुष्ठ रोग विषैले जंतुओं के काटने, सेप्टिक, हृदय रोग, दीर्घकालिक रोग | 
  14. --- केतु: अपूर्व कल्पित दुर्घटना, दुर्भरण, हत्या, शस्त्राघात, सेप्टिक, भोजनादि में विषाक्त पदार्थ या कीटाणुओं का प्रवेश, जहरीली शराब पीने का कुफल, रक्त, चर्म, वात रोग चेहरे पर दाग, एग्जिमा।

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इसी प्रकार ऋषि जैमिनी लिखित शास्त्र "जैमिनी होरा" अनुसार तीन जोड़ों के आधार पर जीवन अवधि का निर्णय लिया जाता है। 
  1.  लग्नेश - अष्टमेश: अगर दोनों चर राशि में हो या एक स्थिर राशि में व दूसरा द्वि-स्वभाव राशि में हो तो अधिकतम 120 वर्ष की तक की दीर्घायु हो सकती है। 
  2.  लग्न - होरा लग्न: अगर एक चर व दूसरा स्थिर में अथवा दोनों द्वि-स्वभाव राशि में हो तो अधिकतम 80 वर्ष की तक की मध्यमायु हो सकती है। 
  3.  शनि - चंद्र: एक चर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो अथवा दोनों स्थिर राशि में हो तो अधिकतम 40 वर्ष की तक की अल्पायु हो सकती है। 

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मारक दशा मोक्ष दशा नहीं है मारक दशा देह मुक्ति करा सकती है परंतु जीव मुक्ति नहीं हो सकती। यह भी संभव है कि प्रदत्त आयु 80 वर्ष में से देह मुक्ति 60 वर्षो में ही हो गई हो और शेष अभुक्त 20 वर्ष वह 2 या 3 जन्मों में पूरा करें। यह भी संभव है कि वह शेष 20 वर्ष प्रेत योनि में ही बिता दे। 
 देह मुक्ति और जीव मुक्ति मोक्ष नहीं है-- 
वर्तमान जीवन में देह मुक्ति और जीव मुक्ति होने के बाद स्वर्ग या मोक्ष मिल जाए ऎसी कोई गांरटी नहीं है। एक देह का जन्म कर्मो के एक निश्चित भाग को भोगने के लिए होता है। कर्मो का इतना ही भाग एक देह को मिलता है जितना कि वह भोग सके। संभवत: ईश्वर नहीं चाहते थे कि जीव को लाखों वर्ष की आयु प्रदान की जाए। तर्क के आधार पर माना जा सकता है कि यदि मनुष्य को 500 वर्ष की आयु यदि दे दी जाती तो वह 450 वर्ष तो अपने आप को ईश्वर मानता रहता और शेष 50 वर्ष  अपने पापों को धोकर या गलाकर स्वर्ग प्राçप्त की कामना करता। मनुष्य धन या देह के अहंकार में सबसे पहली चुनौती ईश्वर को ही देता है और धनी होने पर उसके मंदिर जाने या पूजा-पाठ के समय में ही कटौती करता है। उसके इस कृत्य पर ईश्वर तो मुस्कुराता रहता है और अन्य समस्त प्राणी उससे ईष्र्या करते रहते हैं और उसके पतन की कामना करते रहते हैं।
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यंहा मृत्यु के सम्बन्ध में आयु निर्णय के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख फलित सूत्र दे रहे है)- 
  • • लग्नेष व अश्टमेष का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, दोनों पर पापग्रहों का प्रभाव हो तथा चन्द्र, सूर्य व षनि छठे भाव में हो तो जातक का अतिषीघ्र मरण होता है।
  •  • वृषिचक लग्न में सूर्य लग्नस्थ हो, गुरू विभाजित हो, अश्टमेष केन्द्र में हो और चन्द्र व राहू 7 या 8 भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है। • अश्टमेष मंगल के साथ लग्नस्थ हा अथवा अश्टमेष सिथर राषि के साथ लग्नआठवेंबारहवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु युवावस्था में ही हो जाती है। 
  •  • अश्टमेष नीच राषि में हो, पापग्रह अश्टमस्थ हो, लग्नेष निर्बल हो तो भी अल्पायु योग बनता है। 
  •  • बुध या गुरू लग्नेष हो, लग्न में षनि हो तथा द्वादषेष तथा अश्टमेष निर्बल हो तो जातक अल्पायु होता है। ( बुध या गुरू लग्नेष का अर्थ है लग्न-मिथुन, कन्या, धनु, या मीन का हो तो)। 
  •  • अश्टमेष अश्टम भाव तथा लग्नेष तीनों ही पापाक्रांत हों तथा 12 वां भाव भी पापग्रह से युक्त हो तो जातक की मृत्यु जन्म के उपरांत ही हो जाती है।
  •  • अश्टमेष अश्टम भाव मेंस्वग्रही हो, चन्द्रमा पापग्रह से युत और षुभ दृशिट से हीन हो तो जातक की आयु एक महीना ही होती है।
  •  • राहू या केतु के साथ सूर्य सातवें, षुक्र आठवें व पापग्रह लग्न में हो तो जातक की मृत्यु जेल में होती है। 
  •  • सिंह राषि का षनि पंचमस्थ हो, मंगल अश्टमस्थ हो और चन्द्रमा नवमस्थ हो तो जातक की मृत्यु बिजली के झटके से या मकान के मलबे के नीचे दबकर अथवा पेड़ से गिरकरऊंचार्इ से गिरकर होती है। 
  •  • सूर्य व चन्द्र कन्या राषि में अश्टमस्थ हों तो जातक की मृत्यु विश के कारण होती है। 
  •  • सूर्य व मंगल चतुर्थस्थ, षनि दषमस्थ तथा अश्टम भाव पापाक्रांत हो तो जातक की मौत फांसी से होती है।
  •  • राहू दृश्ट चन्द्र व मंगल अश्टमस्थ हों तो बाल्यावस्था में ही जातक को माता सहित मर जाना पड़ता है। 
  •  • अश्टमस्थ षनि यदि क्षीण चन्द्र व उच्च के मंगल से दृश्ट हो तो भंगदर, पथरी या कैंसर जैसे रोग तथा आपरेषन के कारण जातक की मृत्यु होती है। 
  •  • षनि व चन्द्र छठे या 8वें भाव में पाप मध्य होंपाप दृश्ट हों तथा अश्टमेष स्वग्रही होकर पापमध्य या पाप दृश्ट हो तो जातक की मृत्यु समुह में होती है। 
  •  • लग्नेष व अश्टमेष पापग्रह से युत या दृश्ट होकर 6ठें भाव में हो तो जातक की मौत लड़ार्इ-झगड़े में होती है।  
  • • मंगल व षनि छठे भाव में हो और लग्नेष सूर्य व राहू से दृश्ट होकर 8वें भाव में हो तो क्षय रोग से मृत्यु होती है। 
  •  • मंगल व चन्द्र 6ठें व 8वें भाव में हो तो जातक षस्त्र, रोग, अगिन, कंरट या गोली से मरता है। 
  •  • षनि व चन्द्रमा 6ठें व 8वें भाव में होतो जातक वायुविकार या पत्थर की चोट से मरता है। 
  •  • सिंह लग्न में निबल चन्द्र अश्टमस्थ हो तथा षनि की युति हो तो प्रेत-बाधा, षत्रुकृत अभिचार से पीड़ा तथा अकाल मृत्यु का परिणाम जातक भोगता है। 
  •  • सिंह लग्न हो, सूर्य व षनि का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, षुभग्रहों की दृशिट न हो तो 12 वर्श की आयु में मृत्यु होती है।
  •  • लग्न में सिंह राषि का सूर्य हो, पापग्रहों के मध्य सूर्य हो (12वें व दूसरे भाव में पापग्रह हों) तथा लग्न में षत्रु ग्रह (राहू, षनि, षुक्र) की युति हो तो जातक अस्त्र-षस्त्र या विस्फोटक सामग्री से प्राय: 47 वर्श में मरता है।
  •  • लग्नेष सूर्य तथा लग्न पापग्रहों के बीच हों 7वें भाव में कुम्भ राषि का षनि हो और चन्द्र निर्बल हो तो जातक आत्महत्या करता है। 
  • • भाग्य स्थान में मेश का गुरू तथा अश्टम भाव में मीन का मंगल हो यानी म्ग्ब्भ्।छळम् हो तो भी जातक की मृत्यु 12 वर्श की अवस्था में ही होती है। 
  •  • द्वितिय व द्वादष भाव पापग्रहो से युत हो, सूर्य लग्नेष होकर निर्बल हो 1, 2 व 12 भाव षुभ ग्रहों से दृश्ट न हों तो जातक 32वें वर्श में मर जाता है। 
  •  • दुसरे भाव में कन्या राषि का राहू हो तथा षुक्र व सूर्य से युति करे, किन्तु षुभ ग्रहों से दृश्ट न हो तो जातक युवा होतर पिता को मारे, व खुद मरे। 
  •  • चन्द्रमा 5,7,9,8 तथा लग्न में पापग्रह से युत हो तो 'बालारिश्ट रोग' बनाता है। जिसमें जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। (यदि किसी अन्य योग से उसका निराकरण न हो रहा हो तो)
  •  • लग्नेष केन्द्र में दो पापग्रहों के साथ हो तथा अश्टम भाव खाली न हो तो âदय गति रूकने से मौत हो जाती है।  • कर्क लग्न में निर्बल चन्द्र अश्टमस्थ होकर षनि से युत करे तो प्रेतबाधा या षत्रुओं से पीडि़त होकर जातक अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।
  •  • लग्नेष व चन्द्र लग्न दोनों पाप प्रभावपाप मध्य में हो, सप्तम में भी पापग्रह हों और सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराष होकर आत्महत्या करता है। 
  •  • तुला का सूर्य चौथे, कुम्भ का गुरू आठवें, मिथुन का चन्द्र 12वें हो तथा चन्द्र पर षुभ दृशिट न हो तो जातक जन्म लेते ही मर जाता है। 
  •  • द्वितिय द्वादष भाव में पापग्रह हों (लग्न पापमध्य हो), चन्द्रमा लग्नेष होकर निर्बल हो तथा 1, 2, 12 भावों पर षुभ दृशिट न हों तो भी 32 वें वर्श में मृत्यु होती है। 
  •  • कर्क लग्न हों तथा दु:स्थानों में चन्द्र, षनि षुक्र की युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है। 
  •  • सूर्य पांचवे भाव में वृषिचक राषि का हो तथा दो पाप ग्रहों के मध्य हो और चन्द्र निर्बल हो तो हार्ट अटैक के कारण जातक की मृत्यु होती है। 
  •  • चन्द्र, मंगल षनि तीनों दु:स्थानो में एकसाथ हो और लग्न मेश में हो तो वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है। 
  •  • वृश लग्न में सूर्य, गुरू, षुक्र की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है। 
  •  • कन्या लग्न हों, चन्द्र अश्टमस्थ हो तथा बुध, सूर्य, मंगल आदि किसी भी भाव में इकÎे हो जाएं तो जातक की मृृत्यु ब्लडप्रेषर से होती है। 
  •  • कन्या लग्न में बुध, गुरू व मंगल की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है। 
  •  • धनु लग्न हो चन्द्र सप्तमस्थ मंगल, राहू के साथ और षुभ ग्रहदृशिट न हो तो जातक जन्मते ही मर जाता है। • गुरू लग्नेष होकर वृषिचक राषि में हो और मंगल धनु राषि में हो तो जातक की मृत्यु 12 वर्श में होती है। 
  •  • वृषिचक राषि में चन्द्र, षुक्र की युति दु:स्थानों में हो और लग्न हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है। 
  •  • लग्नेष व चतुर्थेष होकर गुरू मकर राषि में हो तथा निर्बल या अस्त हो तो हार्ट अटैक से मृत्यु होती है। या सूर्य वृषिचक का दो पाप ग्रहों के मध्य 12 वें भाव में हो तो हार्ट अटैक के कारण जातक की मृत्यु होती है। 
  •  • मीन लग्न में अश्टमस्थ षनि के साथ निर्बल चन्द्र हो तो प्रेतबाधा सेअकाल मृत्यु होती है। • लग्नेष गुरू व लग्न दोनों पाप ग्रहों के बीच हो, 7वे भाव मेंं कन्या राषि में भी पापग्रह हो और सूर्य निर्बल हो तो जातक आत्महत्या का विवष होता है। 
  •  • 7 वें भाव में कन्या राषि का चन्द्र मंगल व राहु से युति करता हो और षुभ ग्रह की दृशिट न हो तो जातक की मृत्यु एक वर्श में होती है। 
  •  • 7वें भाव में कन्या राषि का षनि हो तथा 12वें भाव में मेश राषि का षुक्र व राहु लग्नेष के साथ हो तो भी जातक की मृत्यु एक वर्श में हो जाती है।
  •  • मीन लग्न में बुध, गुरू, षुक्र की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है। 
  •  • तुला लग्न में निर्बल चन्द्र 8वें भाव में षनि के साथ हो तो षत्रु के अभिचार या प्रेतबाधा के कारण जातक की मृत्यु होती है। अथवा षुक्र व लग्न दोनों पापग्रहों के साथ व षनि 7वें हो तो षत्रु के अभिचार या देवषाप से मृत्यु होती है। 
  •  • तुला लग्न में गुरू, षुक्र व षनि की दु:स्थानों में युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
  •  • मकर लग्न में लग्नेष व लग्न पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम भाव में भी पाप ग्रह हो तो जातक जीवन से निराष होकर आत्महत्या करता है। 
  •  • मकर लग्नस्थ सूर्य, मंगल, गुरू, राहू व चन्द्र एकसाथ हों तो भी षीघ्र मृत्यु होती है। 
  •  • चतुर्थेष मंगल 12वें हो, सप्तम भाव में कर्क का षनि हो, सप्तेष चन्द्र अश्टमस्थ हो तो 14वें वर्श में विमान दुर्घटना में मृत्यु सम्भावित होती है। 
  •  • मकर लग्न हा सूर्य, मंगल, व षनि दु:स्थानों में एकसाथ युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
  •  • कुंभ लग्न में लग्नेष व लग्न दोनों पापग्रहों के बीच हों, सूर्य निर्बल व सप्तम भाव में भी पापग्रह हो तो जातक आत्महत्या करता है। 
  •  • कुंभ लग्न में बुध, षुक्र, षनि की युति दु:स्थानों में एकसाथ हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।  
  • • निर्बल चन्द्र षनि के साथ मेश राषि में अश्टमस्थ हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है। 
  •  • बुंध व लग्न पापग्रहों के बीच तथा सातवें भाव में मीन राषि में पापग्रह और सूर्य निर्बल हो तो जातक आत्महत्या करता है।
  •  • सूर्य, मंगल, षनि अश्टम भाव में मेश राषि में हो, षुभ ग्रहों से दृश्ट न हों तो जातक की एक वर्श में मृत्यु हो जाती है। 

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उपाय 
  1.   आकस्मिक मृत्यु के बचाव के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। जप रुद्राक्ष माला से पूर्वी मुख होकर करें।
  2.   वाहन चलाते समय मादक वस्तुओं का सेवन न करें तथा अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन न करें अन्यथा पिशाची बाधा हावी होगी वैदिक गायत्री मंत्र कैसेट चालू रखें। 
  3. . गोचर कनिष्ठ ग्रहों की दशा में वाहन तेजी से न चलायें। 
  4. . मंगल का वाहन दुर्घटना यंत्र वाहन में लगायें, उसकी विधिवत पूजा करें। 
  5. . नवग्रह यंत्र का विधिविधान पूर्वक प्रतिष्ठा कर देव स्थान में पूजा करें। 
  6.  सूर्य कलाक्षीण हो तो आदित्य हृदय स्तोत्र, चन्द्र की कला क्षीण हो तो चन्द्रशेखर स्तोत्र, मंगल की कला क्षीण हो तो हनुमान स्तोत्र, शनि कला क्षीण हो तो दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।
  7.  राहु की कला क्षीण हो तो भैरवाष्टक व गणेश स्तोत्र का पाठ करें। गणित पद्धति से अरिष्ट दिन मृत्यु समय के लग्न, अरिष्ट मास का ज्ञान 

अरिष्ट मास: 
  1.   लग्न स्फूट और मांदी स्फुट को जोड़कर जो राशि एवं नवांश हो उस राशि के उसी नवांश पर जब गोचर में सूर्य आता है तब जातक की मृत्यु होती है। 
  2.  लग्नेश के साथ जितने ग्रह हां उन ग्रहों की महादशा वर्ष जोड़कर 12 का भाग दें। जो शेष बचे उसी संख्यानुसार सौर मास में अरिष्ट होगा। 

 अरिष्ट दिन: 
  1.  मांदी स्फुट और चन्द्र स्फुट को जोड़कर 18 से गुणन करें उसमें शनि स्फुट को जोड़कर 9 से गुणन कर जोड़ दें। जब गोचर चन्द्र उस राशि के नवांश में जाता है तो उस दिन अरिष्ट दिन होगा। मृत्यु समय लग्न का ज्ञान: 
  2. लग्न स्फुट मांदी स्फुट और चन्द्र स्फुट को जोड़ देने से जो राशि आये उसी राशि के उदय होने पर जातक की मृत्यु होती है। अकस्मात मृत्यु से बचाव हेतु उपाय: सर्व प्रथम जातक की कुण्डली का सूक्ष्म अवलोकन करने के पश्चात निर्णय लें कि किस ग्रह के कारण अकस्मात मृत्यु का योग निर्मित हो रहा है। उस ग्रह का पूर्ण विधि-विधान से जप, अनुष्ठान, यज्ञ, दानादि करके इस योग से बचा जा सकता है। बृहत पराशर होरा शास्त्रम् के अनुसार: ‘‘सूर्यादि ग्रहों के अधीन ही इस संसार के प्राणियों का समस्त सुख व दुःख है।

       इसलिए शांति, लक्ष्मी, शोभा, वृष्टि, आयु, पुष्टि आदि शुभफलों की कामना हेतु सदैव नव ग्रहों का यज्ञादि करना चाहिए।’’ मूर्ति हेतु धातु: ग्रहों की पूजा हेतु सूर्य की प्रतिमा ताँबें से, चन्द्र की स्फटिक से, मंगल की लाल चन्दन से, बुध व गुरु की स्वर्ण से, शुक्र चांदी से, शनि की लोहे से , राहु की सीसे से व केतु की कांसे से प्रतिमा बनानी चाहिए। अथवा पूर्वोक्त ग्रहों के रंग वाले रेशमी वस्त्र पर उनकी प्रतिमा बनानी चाहिए। यदि इसमें भी सामथ्र्य न हो तो जिस ग्रह की जो दिशा है उसी दिशा में गन्ध से मण्डल लिखना चहिए। 
        विधान पूर्वक उस ग्रह की पूजा करनी चाहिए, मंत्र जप करना चाहिए। ग्रहों के रंग के अनुसार पुष्प, वस्त्र इत्यादि लेना चाहिए। जिस ग्रह का जो अन्न व वस्तु हो उसे दानादि करना चाहिए। ग्रहों के अनुसार समिधाएं लेकर ही हवनादि करना चाहिए। ग्रहों के अनुसार ही भक्ष्य पदार्थ सेवन करने व कराने चाहिए। जिस जातक की कुण्डली में ग्रह अशुभ फल देते हों, खराब हों, निर्बल हों, अनिष्ट स्थान में हों, नीचादिगत हो उस ग्रह की पूजा विधि-विधान से करना चाहिए। इन ग्रहों को ब्रह्माजी ने वरदान दिया है कि इन्हें जो पूजेगा ये उसे पूजित व सम्मानित बनाएंगे। 
ग्रह-पीड़ा निवारण प्रयोग (दत्तात्रेय तंत्र के अनुसार): एक मिट्टी के बर्तन में मदार की जड़ (आक की जड़), धतूरा, चिर-चिरा, दूब, बट, पीपल की जड़, शमीर, शीशम, आम, गूलर के पत्ते, गो-घृत, गो दुग्ध, चावल, चना, गेहँ, तिल, शहद और छाछ भर कर शनिवार के दिन सन्ध्याकाल में पीपल वृक्ष की जड़ में गाड़ देने से समस्त ग्रहों की पीड़ा व अरिष्टों का नाश होता है। 
 मंत्र: ऊँ नमो भास्कराय अमुकस्य अमुकस्य मम सर्व ग्रहाणां पीड़ानाशनं कुरु कुरु स्वाहा। इस मंत्र का घट गाड़ते समय 21 बार उच्चारण करें व नित्य 11 बार प्रातः शाम जप करें । इसके अतिरिक्त महामृत्युंजय का जाप व अनुष्ठान की अकस्मात मृत्यु योग को टालने में सार्थक है। इसके भी विभिन्न मंत्र इस प्रकार हैं 
        एकाक्षरी ‘‘हौं’’ त्राक्षरी ‘‘ऊँ जूँ सः’’ चतुरक्षरी ‘‘ऊँ वं जूं सः’’ नवाक्षरी ‘‘ऊँ जं सः पालय पालय’’ दशाक्षरी ‘‘ऊँ जूं सः मां पालय पालय’’ पंचदशाक्षरी ‘‘ऊँ जं सः मां पालय पालय सः जं ऊँ’’ वैदिक-त्रम्बक मृत्युंजय मंत्र ‘‘त्रम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।’’ मृत्युंजय मंत्र ‘‘ऊँ भूः ऊँ स्वः ऊँ त्रम्बकं यजामहे.................माऽमृतात् ऊँ स्वः ऊँ भुवः ऊँ भूः ऊँ।’’ मृत संजीवनी मंत्र ‘‘ऊँ हौं जूं सः ऊँ भूर्भुव स्वः ऊँ त्रम्बकं यजामहे....... माऽमृतात् ऊँ स्वः ऊँ भुवः भूः ऊँ सः जूं हौं ऊँ।। 
उपरोक्त उपायों को बुद्धिमत्ता पूर्वक विधि-विधान से किए जायें तो यह उपाय अकस्मात मृत्यु को टालने में सार्थक हो सकते हैं। 
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 दरअसल आधुनिक समाज में धर्म एवं धार्मिक भावना कम हो रही है। ऐसे में आत्महत्या जैसी बुराई के निवारण के लिए आवश्यक है कि ईश्वर भक्ति, योगा, चिंतन, मनन जैसे क्रियाकलाप रोज किए जाएं। ऐसा करने से आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और आत्महत्या जैसे बुरे विचार आपके मस्तिष्क को छू भी नहीं पाएंगे। 
        वर्तमान दौर में किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। किंतु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो वह नकारात्मक सोच में डूब जाता है और इस तरह की परिस्थिति उसे कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है। 
ज्योतिष की नजर से... उज्जैन (मध्यप्रदेश) के विद्वान् ज्योतिषी पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मनु का कारक माना गया है। अष्टम चंद्रमा नीच राशि में अथवा राहु को शनि के साथ विष योग और केतु के साथ ग्रहण योग उत्पन्न करता है। ऐसे समय में मनुष्य की सोचने समझने में शक्ति कम कर देता है। उसकी वजह से वो अपनी निर्णय शक्ति खो देता है। अगर 12वें भाव में ऐसी युति होने पर फांसी या आत्महत्या का योग बनता है। इसी तरह अनन्य भाव में अलग- अलग परिणाम उत्पन करता है।
 बचने के ये उपाय भी हैं कारगर--- 
शास्त्रों में इससे बचने के लिए शिव स्तुति, महामृत्युंजय मंत्र, शिवकवच, देवीकवच और शिवाभिषेक सबसे सहज सरल और प्रभावी उपाय हैं। किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए शुभ ग्रह की स्तुति और नीच ग्रह का दान श्रेष्ठ रहता है। जिन्हें आत्महत्या के विचार आते हों, ऐसे व्यक्तियों को मोती एवं स्फटिक धारण करना चाहिए, और नियमित भगवान शिव का जलाभिषेक करना लाभप्रद रहते हैं। इसके अलावा पांच अन्न(गेहूं, ज्वार, चावल, मूंग,जवा और बाजरा) दान करना चाहिए। इसके साथ ही पक्षियों को इन अन्न के दाने भी खिलाना चाहिए। 
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अकालमृत्यु कारण और निवारण :- 
कई बार लोग प्रश्न करते है कि हम लोग रोज मंदिर जाते है खूब तीरथ व्रत भी करते है लेकिन शांति नहीं मिलती है उल्टा परेशानिया आ जाती है कई बार देखा गया है तीर्थों में गए लेकिन वापस घर नहीं आये या रस्ते में ही अकालमृत्यु को प्राप्त हो गए | 
       अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का,काल उसका क्या बिगाड़े जो भक्त हो महाकाल का - ये इसलिए कहा गया है कि सभी भूत -प्रेत के अधिपति शिव जी है जो भक्त शिव कि पूजा करता है उसे काल कुछ नहीं करेगा ऐसा नहीं है जब जन्म हुआ है तो मृत्यु तो नियश्चित है परन्तु आकाल मृत्यु न हो उसके लिए शुद्ध मन से शिव जी कि पूजा करे। 
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ज्योतिष में अकाल मृत्यु के योग---- 
मानव शरीर में आत्मबल, बुद्धिबल, मनोबल, शारीरिक बल कार्य करते हैं। चन्द्र के क्षीण होने से मनुष्य का मनोबल कमजोर हो जाता है, विवेक काम नहीं करता और अनुचित अपघात पाप कर्म कर बैठता है। ग्रहों के दूषित प्रभाव से अल्पायु, दुर्घटना, आत्महत्या, आकस्मिक घटनाओं का जन्म होता है। 
  1. . आकस्मिक मृत्यु के बचाव के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। जप रुद्राक्ष माला से पूर्वी मुख होकर करें।
  2. . वाहन चलाते समय मादक वस्तुओं का सेवन न करें तथा अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन न करें अन्यथा पिशाची बाधा हावी होगी वैदिक गायत्री मंत्र कैसेट चालू रखें। 
  3. . गोचर कनिष्ठ ग्रहों की दशा में वाहन तेजी से न चलायें।

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अकस्मात मृत्यु से बचाव हेतु उपाय: 
सर्व प्रथम जातक की कुण्डली का सूक्ष्म अवलोकन करने के पश्चात निर्णय लें कि किस ग्रह के कारण अकस्मात मृत्यु का योग निर्मित हो रहा है। उस ग्रह का पूर्ण विधि-विधान से जप, अनुष्ठान, यज्ञ, दानादि करके इस योग से बचा जा सकता है। 
      बृहत पराशर होरा शास्त्रम् के अनुसार: ‘‘सूर्यादि ग्रहों के अधीन ही इस संसार के प्राणियों का समस्त सुख व दुःख है। इसलिए शांति, लक्ष्मी, शोभा, वृष्टि, आयु, पुष्टि आदि शुभफलों की कामना हेतु सदैव नव ग्रहों का यज्ञादि करना चाहिए।’’ कई बार अनजाने में कई प्रकार कि गलतिया कर बैठते है जिसका परिणाम ठीक नहीं होता है 
कृपया इन बातों का ध्यान दीजिये — 
  • 1. किसी निर्जन एकांत या जंगल आदि में मलमूत्र त्याग करने से पूर्व उस स्थान को भलीभांति देख लेना चाहिए कि वहां कोई ऐसा वृक्ष तो नहीं है जिस पर प्रेत आदि निवास करते हैं अथवा उस स्थान पर कोई मजार या कब्रिस्तान तो नहीं है। 
  • 2. किसी नदी तालाब कुआं या जलीय स्थान में थूकना या मल-मूत्र त्याग करना किसी अपराध से कम नहीं है क्योंकि जल ही जीवन है। जल को प्रदूषित करने स जल के देवता वरुण रूष्ट हो सकते हैं। 
  • 3. घर के आसपास पीपल का वृक्ष नहीं होना चाहिए क्योंकि पीपल पर प्रेतों का वास होता है। 
  • 4. सूर्य की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। 
  • 5. गूलर , शीशम, मेहंदी, बबूल , कीकर आदि के वृक्षों पर भी प्रेतों का वास होता है। रात के अंधेरे में इन वृक्षों के नीचे नहीं जाना चाहिए और न ही खुशबुदार पौधों के पास जाना चाहिए। 
  • 6. महिलाये माहवारी के दिनों में चौराहे के वीच रस्ते में न जाये उन्हें अपने से दाहिने रखे 
  • 7. कहीं भी झरना, तालाब, नदी अथवा तीर्थों में पूर्णतया निर्वस्त्र होकर या नग्न होकर नहीं नहाना चाहिए।
  •  8. हाथ से छूटा हुआ या जमीन पर गिरा हुआ भोजन या खाने की कोई भी वस्तु स्वयं ग्रहण न करें। 
  • 9. अग्नि व जल का अपमान न करें। अग्नि को लांघें नहीं व जल को दूषित न करें।

 उपाय :- 
  • 1 :- जब भी घर से बहार निकले इनके नमो का सुमिरन कर के घर से निकले। अश्व्त्थामा बलिर्व्यासो हनुमान्श्च विभीषणः कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः l सप्तैतान्सस्मरे नित्यं मार्कण्डेययथाष्टकं जीवेद् वर्षशतं साग्रमं अप मृत्युविनिष्यति ll ये सात नाम है जो अजर अमर है और आज भी पृथ्वी पर विराजमान है 
  • 2 . अकाल मृत्यु निवारण के लिये “नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।” 
  • 3 . राहु काल के समय यात्रा पर न जाये
  •  4 . दिशाशूल के दिन यात्रा न करे
  • 5 – शराब पीकर या तामसिक भोजन कर के धर्म क्षेत्र में न जाये 

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अकाल मृत्यु का भय नाश करतें हैं महामृत्युञ्जय—– 
ग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ती आसानी से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।
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