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‘देवशयनी एकादशी' (बुधवार, 01 जुलाई 2020 ) पर कैसे करें व्रत का पारण

हमारे शास्त्रानुसार प्रत्येक मास के दो पक्षों में 2-2 एकादशियां यानि साल भर के 12 महीनों में 24 एकादशियां आती हैं परंतु जो मनुष्य इस पुण्यमयी देवशयनी एकादशी का व्रत करता है अथवा इसी दिन से शुरू होने वाले चातुर्मास के नियम अथवा किसी और पुण्यकर्म करने का संकल्प करके उसका पालन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयनी के नाम से जानी जाती है। देवशयनी एकादशी प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के तुरन्त बाद आती है।
इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल की एकादशी तिथि 1 जुलाई 2020 (बुधवार) को पड़ रही है। इसलिए देवशयनी एकादशी का व्रत 1 जुलाई को रखा जाएगा। 

यह रहेगा देवशयनी एकादशी का शुभ मुहूर्त---
एकादशी तिथि प्रारंभ: 30 जून, शाम 07:49 बजे से .
एकादशी तिथि समाप्त: 1 जुलाई, शाम 5:30 बजे

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जिस कामना से कोई इस व्रत को करता है वह अवश्य पूरी होती है। इसी कारण इसे मनोकामना पूरी करने वाला व्रत भी कहा जाता है। पुराणों में ऎसा उल्लेख है, कि इस दिन से भगवान श्री विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्री विष्णु उस लोक के लिये गमन करते है. आषाढ मास से कार्तिक मास के मध्य के समय को चातुर्मास कहते है. इन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है. इसलिये इन माह अवधियों में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है. अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में आता है। चतुर्मास जो कि हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार चार महीने का आत्मसंयम काल है, देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ हो जाता हैं।
How-to-fast-on-Devshayani-Ekadashi-July-2020-‘देवशयनी एकादशी' (बुधवार, 01 जुलाई 2020 ) पर कैसे करें व्रत का पारण     इस दिन से भगवान श्रीविष्णु का एक स्वरूप चार मास के लिये पातल लोक में निवास करता है और दूसरा स्वरूप क्षीरसागर में शयन करता है। अत: इन चार मासों में किसी भी प्रकार का धार्मिक कार्य नहीं किया जाता। न हीं कोई वैवाहिक अनुष्ठान होता है और न किसी प्रकार का शुभ कार्य। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस देवशयनी एकादशी को पद्मनाभा, हरिशयनी, प्रबोधिनी आदि नामों से भी जाना जाता है। कई स्थानों में इस एकादशी (देवशयनी एकादशी) को पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इन चार मासों में केवल ब्रज की यात्रा का विधान है। ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास में सभी देवता ब्रज में एकत्रित हो निवास करते हैं।

देवशयनी एकादशी बुधवार, जुलाई 1, 2020 को मनेगी ।
एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
  • 2 जुलाई 2020 को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 05:24 सुबह से 08:13 तक 
  • पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - 03:16 शाम 
  • एकादशी तिथि प्रारम्भ - जून 30, 2020 को शाम 07:49 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त - जुलाई 01, 2020 को शाम 05:29 बजे

जानिए देवशयनी एकादशी का महत्व----
पुराणों में कथा है कि शंखचूर नामक असुर से भगवान विष्णु का लंबे समय तक युद्ध चला। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान ने शंखचूर का वध कर दिया और क्षीर सागर में सोने चले गये। शंखचूर से मुक्ति दिलाने के कारण देवताओं ने भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना की। एक अन्य कथा के अनुसार वामन बनकर भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग में तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। राजा बलि को पाताल वापस जाना पड़ा। लेकिन बलि की भक्ति और उदारता से भगवान वामन मुग्ध थे। भगवान ने बलि से जब वरदान मांगने के लिए कहा तो बलि ने भगवान से कहा कि आप सदैव पाताल में निवास करें। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान पाताल में रहने लगे। इससे लक्ष्मी मां दुःखी हो गयी। भगवान विष्णु को वापस बैकुंठ लाने के लिए लक्ष्मी मां गरीब स्त्री का वेष बनाकर पाताल लोक पहुंची। लक्ष्मी मां के दीन हीन अवस्था को देखकर बलि ने उन्हें अपनी बहन बना लिया। लक्ष्मी मां ने बलि से कहा कि अगर तुम अपनी बहन को खुश देखना चाहते हो तो मेरे पति भगवान विष्णु को मेरे साथ बैकुंठ विदा कर दो। बलि ने भगवान विष्णु को बैकुंठ विदा कर दिया लेकिन वचन दिया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तक वह हर साल पाताल में निवास करेंगे। इसलिए इन चार महीनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है।
जानिए क्यों वर्जित हैं देवशयन में मांगलिक कार्य ..
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बलि से तीन पग भूमि मांगी। दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग को नापा और जब तीसरा पग रखने लगे तब बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। तब भगवान ने बलि को पाताल भेज दिया तथा उसकी दानभक्ति को देखते हुए आशीर्वाद मांगने को कहा। बलि ने कहा कि प्रभु आप सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे लोक पाताल में निवास करें। इस कारण भगवान विष्णु को सभी देवी-देवताओं के साथ पाताल जाना पड़ा। यह दिन था विष्णुशयनी (देवशयनी) एकादशी का। इस दिन से सभी मांगलिक कार्यों के दाता भगवान विष्णु का पृथ्वी से लोप होना माना जाता है। यही कारण है कि इन चार महीनों में हिंदू धर्म में कोई भी मांगलिक कार्य करना वर्जित है। इस अवधि में कृ्षि और विवाहादि सभी शुभ कार्यो करने बन्द कर दिये जाते है. इस काल को भगवान श्री विष्णु का निद्राकाल माना जाता है. इन दिनों में तपस्वी एक स्थान पर रहकर ही तप करते है. धार्मिक यात्राओं में भी केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है. ब्रज के विषय में यह मान्यता है, कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर तीर्थ ब्रज में निवास करते है. बेवतीपुराण में भी इस एकादशी का वर्णन किया गया है. यह एकादशी उपवासक की सभी कामनाएं पूरी करती है |ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की देवशयनी एकादशी से चार माह के लिए विवाह संस्कार बंद हो जाते हैं। अर्थात इस एकादशी से देव सो जाएंगे। आगामी  देवोत्थान एकादशी के दिन विवाह संस्कार पुन: प्रारंभ हो जाएंगे। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की देवशयनी एकादशी के बाद विवाह, नव निर्माण, मुंडन, जनेऊ संस्कार जैसे शुभ मांगलिक कार्य नहीं होंगे।
भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का मंत्र:---
‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।’

भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपके शयन करने पर यह जगत सुप्त हो जाता है और आपके जाग जाने पर सम्पूर्ण चराचर जगत प्रबुद्ध हो जाता है। पीताम्बर, शंख, चक्र और गदा धारी भगवान् विष्णु के शयन करने और जाग्रत होने का प्रभाव प्रदर्शित करने वाला यह मंत्र शुभ फलदायक है जिसे भगवान विष्णु की उपासना के समय उच्चारित किया जाता है।
जानिए व्रत में क्या करें---
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर अपनी दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर कमल नेत्र भगवान विष्णु जी को पीत वस्त्र ओढ़ाकर धूप, दीप, नेवैद्य, फल और मौसम के फलों से विधिवत पूजन करना चाहिए तथा विशेष रूप से पान और सुपारी अर्पित करनी चाहिएं। शास्त्रानुसार जो भक्त कमल पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं उन्हें तीनों लोकों और तीनों सनातन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पूजन एक साथ ही करने का फल प्राप्त होता है।    इस व्रत में ब्राह्मणों को दान आदि देने का अत्यधिक महत्व है। स्वर्ण अथवा पीले रंग की वस्तुओं का दान करने से अत्यधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। जब तक भगवान विष्णु शयन करते हैं तब तक के चार महीनों में सभी को धर्म का पूरी तरह से आचरण करना चाहिए। रात्रि में भगवान विष्णु जी की महिमा का गुणगान करते हुए जागरण करना, मंदिर में दीपदान करना अति उत्तम कर्म है।  
क्या ग्रहण करें? 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की देह शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण के पंचगव्य का। वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का। सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।
किसका त्याग करें ? 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मधुर स्वर के लिए गुड़ का। दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।
क्या कहते हैं संत महात्मा?
एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस वर्ष देवशयनी एकादशी व्रत का पारण (गुरुवार)  2 जुलाई को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - सुबह 05:24 सुबह से सुबह 08:13 तक के बीच के समय में किया जाना चाहिए तथा दान सदा सुपात्र को देना चाहिए क्योंकि कुपात्र को दान देने वाला भी नरकगामी बनता है। दान देते समय मन में किसी प्रकार के अभिमान, अहंकार यानि कर्ता का भाव नहीं रखना चाहिए बल्कि विनम्र भाव से अथवा गुप्त दान का अधिक फल है। इस एकादशी के करने से मनुष्य की सभी कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। यह व्रत मनुष्य के सभी पापों को नष्ट करता है। इस व्रत को करनेवाला व्यक्ति परम गति को प्राप्त होता है। 
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस एकादशी के व्रत से मनुष्य को तीनों लोकों के देवता तथा तीनों सनातन देवताओं की पूजन के समान फल प्राप्त होता है। यह व्रत परम कल्याणमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। यह व्रत अधिक गुणों वाला होता है। अग्निहोत्र, भक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, सत्यभाषण, हृदय में दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्र में अनुराग, वेदपाठ, चोरी का त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन एवं इन्द्रियों का संयम, लोभ, क्रोध और मोह का अभाव, वैदिक कर्मों का उत्तम ज्ञान तथा भगवान को अपने चित्त का समर्पण – इन नियमों को मनुष्य अंगीकार करे और व्रत का यत्नपूर्वक पालन करे।
देवशयनी एकादशी की सुबह जल्दी उठें। पहले घर की साफ-सफाई करें, उसके बाद स्नान आदि कर शुद्ध हो जाएं। घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की सोने, चांदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति स्थापित करें। इसके उसका षोडशोपचार (16 सामग्रियों से) पूजा करें। भगवान विष्णु को पीतांबर (पीला कपड़ा) अर्पित करें।
व्रत की कथा सुनें। आरती कर प्रसाद वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दक्षिणा देकर विदा करें। अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्रीविष्णु को शयन कराएं तथा स्वयं धरती पर सोएं। धर्म शास्त्रों के अनुसार, यदि व्रती (व्रत रखने वाला) चातुर्मास नियमों का पूर्ण रूप से पालन करे तो उसे देवशयनी एकादशी व्रत का संपूर्ण फल मिलता है। 
  • सागार: इस दिन दाख का सागार लेना चाहिए |
  • फल:  इस मास की एकादशी का व्रत सब मनुष्यों को करना चाहिए। यह व्रत इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति को देने वाला है।

देवशयनी एकादशी व्रत पूजन सामग्री:- 
  • ∗ श्री विष्णु जी की मूर्ति 
  • ∗ वस्त्र(लाल एवं पीला)
  • ∗ पुष्प
  • ∗ पुष्पमाला
  • ∗ नारियल 
  • ∗ सुपारी
  • ∗ अन्य ऋतुफल
  • ∗ धूप
  • ∗ दीप
  • ∗ घी
  • ∗ पंचामृत (दूध(कच्चा दूध),दही,घी,शहद और शक्कर का मिश्रण)
  • ∗ अक्षत
  • ∗ तुलसी दल
  • ∗ चंदन
  • ∗ कलश

देवशयनी एकादशी कथा :-
युधिष्ठिर ने पूछा : भगवन् ! आषाढ़ के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसका नाम और विधि क्या है? यह बतलाने की कृपा करें । भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘शयनी’ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ । वह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, सब पापों को हरनेवाली तथा उत्तम व्रत है । आषाढ़ शुक्लपक्ष में ‘शयनी एकादशी’ के दिन जिन्होंने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान विष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया । 
      ‘हरिशयनी एकादशी’ के दिन मेरा एक स्वरुप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भलीभाँति धर्म का आचरण करना चाहिए । जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए । ऐसा करनेवाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं । राजन् ! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वपापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय रहनेवाला है । जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते हैं, वे मेरे प्रिय हैं । चौमासे में भगवान विष्णु सोये रहते हैं, इसलिए मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए । 
सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए । जो चौमसे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है । राजन् ! एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, अत: सदा इसका व्रत करना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए । ‘शयनी’ और ‘बोधिनी’ के बीच में जो कृष्णपक्ष की एकादशीयाँ होती हैं, गृहस्थ के लिए वे ही व्रत रखने योग्य हैं 
– अन्य मासों की कृष्णपक्षीय एकादशी गृहस्थ के रखने योग्य नहीं होती । शुक्लपक्ष की सभी एकादशी करनी चाहिए ।

जाने और समझें चातुर्मास क्या है, क्यों होते हैं चातुर्मास में विवाह निषेध

हमारी सनातन संस्कृति में व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के 4 महीने को'चातुर्मास' कहा गया है। ध्यान और साधना करने वाले लोगों के लिए ये 4 माह महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान शारीरिक और मानसिक स्थिति तो सही होती ही है, साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता है। चातुर्मास 4 महीने की अवधि है, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है। चातुर्मास्य और विवाह निषेध की परम्परा आषाढ़ मास के एकादशी के दिन को हरिशयनी एकादशी कहा जाता है । ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस वर्ष जप-तप और साधना-सिद्धि का पवित्र चातुर्मास 1 जुलाई 2020 से प्रारंभ हो रहा है। भगवान श्रीहरि विष्णु के योगनिद्रा में चले जाने के कारण चातुर्मास में मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध लग जाता है। इस बार चातुर्मास में अधिकमास होने से चातुर्मास की अवधि बढ़कर 148 दिन हो गई है। इस वर्ष आश्विन माह का अधिकमास है। चातुर्मास 1 जुलाई देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर 25 नवंबर 2020 देवोत्थान एकादशी तक रहेगा। इस दौरान एक ओर जहां विवाह आदि मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं, वहीं तीज-त्योहारों का उल्लास भी छाएगा। अधिकमास के कारण आश्विन मास से लेकर आगे के महीनों में आने वाले तीज-त्योहार भी 20 से 25 दिन तक आगे बढ़ जाएंगे।
Learn-and-understand-what-Chaturmas-is-why-there-are-prohibitions-in-Chaturmas-जाने और समझें चातुर्मास क्या है, क्यों होते हैं चातुर्मास में विवाह निषेध     ऐसी पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री महाविष्णु चार महीने की अखण्ड निद्रा में चले जाते हैं।वर्षा के इन चार महीनों को विष्णु शयन के कारण विवाहादि शुभ कार्यों का निषेध किया गया है ।यह धारणा उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है ।इस विषय पर विचार करना अप्रासंगिक नही होगा । हमारे भारत के सनातनी पंचागों के अनुसार वर्ष के ये चार माह जिन्हें वर्षाकाल के चार माह भी कहा जाता है देवताओं के शयन के रूप में न जाने कब से निर्धारित हो गये है। जिसका परिणाम यह हुआ कि इन चार महीनों में न तो विवाहादि शुभ कार्य होते हैं,न गृहप्रवेशादि ।कार्तिक मास में जब देवोत्थानी एकादशी होती है,तब देवताओं की नींद टूटती है।आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी से देव उठनी एकादशी तक का काल ब्लैक लिस्ट में जब से आया ,तबसे विवाहादि के मुहूर्त शेष आठ महीनों में सीमित होकर रह गये । इनमें से कभी शुक्रास्त,कभी गुर्वस्त अर्थात तारा डूबने के कारण विवाह के मुहूर्त नही मिलते हैं । इन सबके कारण विवाह मुहूर्त इतने सीमित होकर रह गये हैं कि एक दिन हजारों की संख्या में विवाह होने के कारण मैरेज हाल ,घोड़े-बाजा वाले,टेन्ट हाउस वालों पर उस दिन जो दबाव रहता है तथा समाज में जो असुविधा होती है ,उससे हम सब सुपरिचित हैं ।चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य चन्द्रमा का तेज क्षीण हो जाना उनके शयन का ही द्योतक होता है।
           इस समय में पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण हो जाती है।
आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि वर्षा ऋतु में विविध प्रकार के रोगाणु उत्पन्न हो जाते हैं। साथ ही इन दिनों ही कई बड़े त्यौहार आते हैं। त्यौहार व शादी दोनों क उल्लास और हर्श समय समय पर बना रहे। इसीलिए चार माह तक शादी ब्याह नहीं किए जाते हैं। विवाह मुहूर्त जैसी धार्मिक और ज्योतिषीय घटना का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव दूरगामी होता है ।एक और बात यह भी है कि उत्तर भारत में विवाह के साथ यह परम्परा न जाने कब से आ जुड़ी है कि विवाह रात में ही हों दिन में नही । विवाह मुहूर्त के अवसर पर बिजली के उपभोग पर पड़े भारी दबाव के कारण टांसफार्मरों के जलने से लेकर रात्रि को सड़कों पर ट्रैफिक जाम और वृद्धों और विद्यार्थियों की शान्ति में व्यवधान आदि समस्याएँ भी होती है ।रात्रि में या गोधूलि में विवाह मुहूर्त निकालने की घटना का शास्त्रीय आधार नही है । यह केवल मुगल काल में अनेक सामाजिक कारणों से हुई थी ।उस समय भी दिवा लग्न दक्षिण भारत में,महाराष्ट्र आदि में उत्कृष्ट माने जाते थे और आज भी माने जाते हैं ।उत्तर भारत मे भी विवाह दिन में विवाह का निषेध कभी नही रहा ।आजकल पंचागों मे दिवा लग्न उद्धृत किये जा रहे हैं।
-चातुर्मास्य में विवाह नही होने की स्थितियाॅ आज भी उत्तर भारत में देखी जा रहीं हैं,जिसका कारण देवों का शयन बताया जाता है ।कई बार विद्वानों द्वारा स्पष्ट भी किया गया है कि देवता इतने आलसी नही हैं कि चार महीने तक सोते रहें और भगवान विष्णु तो विश्व के प्रतिपालक हैं,सदा सजग रहते हैं । वे यदि एक दिन भी अधिक सो जायें तो विश्व की क्या स्थिति होगी? इसकी कल्पना की जा सकती है ।
इस बार चातुर्मास पांच महीने का होगा???
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं की इस वर्ष अधिमास पड़ेगा जिस कारण से आश्विन माह दो होंगे। अधिमास होने के कारण चातुर्मास चार महीने के बजाय पांच महीने का होगा। ऐसे में इसके बाद सभी तरह के त्योहार आम वर्षो के मुकाबले देरी से आएंगे। जहां श्राद्ध के खत्म होने पर तुरंत अगले दिन से नवरात्रि आरंभ हो जाते लेकिन अधिमास के होने से ऐसा नहीं हो पाएगा। इस बार जैसे ही श्राद्ध पक्ष खत्म होगा फिर अगले दिन से आश्विन मास का अधिमास आरंभ हो जाएगा।
क्या होता है अधिमास???
हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर तीन वर्ष में एक बार एक अतिरिक्त माह आता है। इसे ही अधिमास, मलमास और पुरुषोत्तम माह के नाम से जाना जाता है।
क्यों आता है हर तीन साल में अधिमास???
पंडित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार वैदिक हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के आधार पर चलता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है। वहीं एक चंद्र वर्ष  में 354 दिन होते हैं। इन दोनों का अंतर लगभग 11 दिनों का होता है। धीरे-धीरे तीन साल में यह एक माह के बराबर हो जाता है। इस बढ़े हुए एक महीने के अतंर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना आ जाता है। इसे ही अधिमास कहा जाता है। अधिमास का महीना आने से ही सभी त्योहार सही समय पर मनाए जाते हैं। वेदकाल या वेदोत्तरकाल में विष्णु शयन जैसी कल्पना का तो प्रश्न ही नही उठता है ।पुराण काल में ब्रह्म पुराण,स्कन्दपुराण आदि में विष्णु भगवान के शयन और जागृत होने की परिकल्पना है ।वह रूपात्मक प्रतीक है ।त्रिविक्रम विष्णु भगवान सूर्य के ही स्वरूप हैं ।मेघाच्छन कालखण्ड में सूर्य के दर्शन नही हो पाते हैं। रात में भी बादलों के कारण ग्रह,नक्षत्र प्रकाश नही दे पाते हैं,अतः सूर्य (विष्णु)के शयन और देवों के सोने की परिकल्पना की गई ।इस कारण पौराणिक रूपक कल्पना के कारण चार महीनों के लिए विवाहादि कार्यों पर रोक लग गयी।

निर्णय सिन्धु,धर्म सिन्धु आदि ग्रन्थों में या किसी भी शास्त्र में चार महीनों तक विवाह के निषेध की बात नही मिलती है ।गुरु आदि ग्रहों के प्रतिकूल होने पर विवाह निषेध का उल्लेख है,किन्तु आषाढ़ से कार्तिक तक विवाह का निषेध नहीं पाया जाता है ।बौधायन सूत्र मे स्पष्ट कहा गया है -

“सर्वे मासा विवाहस्य शुचि तपस्तपस्यवर्जम् । 
–आपस्तम्ब सूत्र भी कहता है -“सर्व ॠतवो विवाहस्य ।शैशिरौ मासौ परिहाय्य,उत्तमं न नैदाद्यम्। 

–अर्थात तीव्र शिशिर ॠतु होने पर विवाह न किया जाय,गर्मी में विवाह उत्तम होता है,बाकी सभी मासो में विवाह किया जा सकता है ।

निर्णय सिन्धु स्वयं स्पष्ट करता है कि आचार्य चूड़ामणि ग्रन्थ में,ज्योतिष के सन्दर्भ से गर्ग और राजमार्तण्ड आदि के प्रमाण से कहा गया है कि–

“मांगल्येषु विवाहेषु कन्यासंवरणेषु च ।दशमासाः प्रशस्यन्ते चैत्र पौष विवर्जिताः 
“-अर्थात चैत्र और पौष के अलावा हर महीने में विवाह किया जा सकता है ।

मध्यकाल में गत कुछ सदियों के बीच जब वर्षा ॠतु में यात्रा आदि अत्यन्त असुविधाजनक होने लगी और वर्षा ॠतु में सबको यात्रा निषेध का अनुरोध किया जाने लगा,तो वर यात्रा का भी निषेध कर दिया गया।,यही इसका कारण प्रतीत होता है ।इसी तरह शीत ॠतु मे शीत प्रधान अंचलों में विवाह वर्जित कर दिये गये ।उत्तर भारत में ॠतु की असुविधा का यह कारण किसी समय में शास्त्रीय और ज्योतिषीय निषेध भी बन गया होगा । धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में जिस प्रकार के विधि-निषेध हैं,उससे हम अनुमान कर सकते हैं कि उनकी दृष्टि शुभाशुभ पर उतनी नही हैं जितना कि सुविधा-असुविधा पर है ।आचार्य शौनक का कथन है कि वर्षा के दिनों में,अधिक मास में,ग्रहों की प्रतिकूलता में,विवाह,यात्रा,मकान बनाने का कार्य आदि जहाँ तक हो सके नही करना चाहिए । यह कहकर उन्होंने सुविधा-असुविधा को परिलक्षित किया है ।पूरे चार महीने विवाह के लिए निषिद्ध हैं।,यह स्पष्ट नही कहा गया है ।एक स्थान पर इतना संकेत है कि कुछ लोग आषाढ़ से लेकर कार्तिक तक विवाह को वर्जित मानते हैं ।कालादर्श में तो कहा गया है कि यदि रात्रि में विवाह करना है तो बारह माह में विवाह कभी भी किये जा सकते हैं ।विवरण का आशय यह है कि विवाह के लिए जोर चार महीने निषेध किये गये हैं वह परम्परा का अनुसरण अधिक लगता है,धर्मशास्त्र,खगोलीय वास्तविकता और तर्कदृष्टि का अनुसरण कम ।
          उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि इन चार महीनों में तमाम तरह के शुभ कार्य करना निषेध रहेगा जबकि धार्मिक आयोजन पुण्यदायक माने जाएंगे। इस समयावधि में विभिन्न स्थानों पर श्रीमद् भागवत, रामायण एवं अन्य धार्मिक आयोजन बड़ी संख्या में होंगे।इन चार महीनों में विशेष देव आराधना की जाती है। इस दौरान कई हिन्दू तीज त्यौहार भी आते हैं। इस दौरान विवाह आदि व्यक्तिगत मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। देश के तमाम साधू-संत चातुर्मास करने अलग-अलग सिद्ध स्थानों पर पहुंचते हैं और विशेष साधना में लीन हो जाते हैं। चातुर्मास समाप्त होने पर वह किसी दूसरी जगह जाकर दोबारा से साधना शुरू करते हैं।चातुर्मास में यात्रा करने से यह बचते हैं, क्योंकि ये वर्षा ऋतु का समय रहता है, इस दौरान नदी-नाले उफान पर होते है तथा कई छोटे-छोटे कीट उत्पन्न होते हैं। इस समय में विहार करने से इन छोटे-छोटे कीटों को नुकसान होने की संभावना रहती है। इसी वजह से जैन धर्म में चातुर्मास में संत एक जगह रुककर तप करते हैं। चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद विष्णुजी फिर से सृष्टि का भार संभाल लेते हैं।
जानिए चातुर्मास में क्या खाएं और न खाएं??
इस दौरान बैंगन, मूली और परवल न खाएं। दूध, शकर, दही, तेल, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन, मसालेदार भोजन, मिठाई और सुपारी का सेवन नहीं किया जाता है। मांसाहार और शराब का सेवन भी वर्जित है। शहद या अन्‍य किसी प्रकार के रस का प्रयोग भी नहीं किया जाता है। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, आलू, कंदमूल यानी जमीन के अंदर उगने वाली सब्जियां आदि, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक माह में प्याज, लहसुन एवं उड़द की दाल आदि का त्याग कर दिया जाता है।
जानिए चातुर्मास के व्रत नियम को---
चातुर्मास में फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। इन 4 महीनों में ज्यादातर समय मौन रहने की कोशिश की जाती है। हो सके तो दिन में केवल एक बार ही भोजन करना चाहिए। सहवास न करें और झूठ न बोलें। पलंग पर नहीं सोना चाहिए। हर तरह के संस्कार और मांगलिक कार्य भी इन दिनों में नहीं किए जाते हैं। नियम और संयम से रहने के लिए इन 4 महीनों में हर तरह की भौतिक सुख सुविधाओं से दूर रहने की कोशिश की जाती है। शरीर को आराम नहीं दिया जाता है और लगातार भगवान के नाम का जाप किया जाता है। 
इस समय करें भगवान का ध्यान--
इन 4 महीनों में किया गया शारीरिक तप भगवान से जुड़ने में मदद करता है। चातुर्मास में शरीरिक और मानसिक तप के अलावा मन की शुद्धि पर भी जोर दिया गया है। जिसे धार्मिक और आध्यात्मिक तप भी कहा जा सकता है। इस तरह के तप से मन में नकारात्मक विचार और गलत काम करने की इच्छाएं पैदा नहीं होती। इन दिनों में जप-तप और ध्यान की मदद से परमात्मा के साथ जुड़ने की कोशिश की जाती है। जिससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। 
चातुर्मास के वैज्ञानिक महत्व को समझें--
चातुर्मास धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्व पूर्ण है। इन दिनों में परहेज करने और संयम से जीवन जीने पर जोर दिया जाता है। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो इन दिनों में  बारिश होने से हवा में नमी बढ़ जाती है। इस कारण बैक्‍टीरिया और कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। जिनकी वजह से संक्रामक रोग और अन्य तरह की बीमारियां होने लगती हैं। इनसे बचने के लिए खान-पान में सावधानी रखी जाती है और संतुलित जीवनशैली अपनाई जाती है।

इस वर्ष 21 जून 2020 से आरम्भ होगी गुप्त नवरात्रि

देवी भागवत के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्रि आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि के दौरान साधक माँ काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, माँ ध्रूमावती, माँ बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि यह गुप्त नवरात्रि तंत्र विद्या सीखने वाले और मां दुर्गा से मुंहमांगी मनोकामना करने वाले के लिए विशेष महत्व रखता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष 22 जून 2020 से आर्द्रा नक्षत्र और सूर्य-चंद्र की उपस्थिति में नवरात्रि प्रारंभ होगी। जो 29 जून 2020 भड़ली नवमी तक चलेगी। इस बार पंचमी और षष्ठी का योग रहेगा इसलिए नवरात्र का पारण 29 जून को किया जाएगा। उसके अगले दिन 23 जून 2020 को जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव भी मनाया जाएगा।
घट स्थापना --
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की आषाढ़ माह में गुप्त नवरात्र के इन नौ दिनों में क्रम के अनुसार 22 जून 2020 को कलश सुबह 9:30 से 11 के बीच अभिजित मुहूर्त में स्थापित किया जा सकता है। 
  • इस क्रम में 22 जून को शैलपुत्री, 
  • 23 जून को ब्रह्मचारिणी, 
  • 24 जून को चंद्रघंटा, 
  • 25 जून को कूष्माण्डा का पूजन किया जाएगा। 
  • 26 जून को स्कंदमाता और मां कात्यायनी दोनों का पूजन किया जाएगा। 
  • उसके बाद 27 जून को कालरात्रि, 
  • 28 जून को महागौरी और 
  • 29 जून 2020 को सिद्धिदात्री का पूजन किया जाएगा।


 इस दौरान योग्य एवम अनुभवी आचार्य के सानिध्य में करवाया गया दुर्गा या चंडी यज्ञ विशेष कल्याणकारी रहेगा। यह गुप्त नवरात्रि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और आसपास के इलाकों में विशेष रूप से मनाई जाती है।  मान्यता के अनुसार गुप्त नवरात्रि के दौरान अन्य नवरात्रि की तरह ही पूजन करने का विधान है। इन दिनों भी 9 दिन के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिपदा से नवमीं तक प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की आराधना करनी चाहिए।
Gupt-Navratri-will-begin-this-year-from-21-june-2020- इस वर्ष 21 जून 2020 से आरम्भ होगी गुप्त नवरात्रि     गुप्त नवरात्रि में गुप्त विधि द्वारा नौ देवियों की पूजा गुप्त कार्य के लिए की जाती है। इस दौरान निराकार पूजा करने का विधान है। वर्तमान समय में राजनैतिक अस्थिरता को देखते हुए इस बार गुप्त नवरात्रि अनुष्ठान अधिक होने की संभावना है। कई जनप्रतिनिधि मंत्री बनने की चाह रखने अपने-अपने घरों में यज्ञ विधान कराएंगे। वैसे अनलॉक-1 में इन अनुष्ठानों के लिए वातावरण भी उनके अनुकूल बना है। ऐसे माहौल में की गई भक्ति-आराधना उपासकों को सिद्धि प्राप्त कराने में सहायक है।
  गुप्त नवरात्रि में घट स्थापना कर कलश में ही सभी शक्तियों का आवाहन किया जाता है। इस आवाह्न पूजन में सिद्ध मंत्र जाप व कार्य के अनुसार जड़ी-बूटियों से हवन करने का महत्व है। सभी प्रकार की पुष्टता के लिए हमारे शास्त्रों में जड़ी-बूटियों से यज्ञादि करने का विधान बताया है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इन यज्ञों से वायु मंडल में व्याप्त कीटाणु-विषाणु नष्ट हो जाते हैं। श्रद्धालु अपने घर में रहकर गुप्त साधना कर नौ देवियों की कृपा पा सकते हैं।
गुप्त नवरात्र में होती है मानसिक पूजा---
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि गुप्त नवरात्रि में मानसिक पूजा की जाती है। माता की आराधना मनोकामनाओं को पूरा करती है। गुप्त नवरात्र में माता की पूजा देर रात ही की जाती है। नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए भक्त को प्रतिपदा के दिन घट स्थापना करना चाहिए। भक्त को सुबह शाम मां दुर्गा की पूजा करना चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं का पूजन करने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए।
  गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं। यह नवरात्रि तंत्र साधना, जादू-टोना, वशीकरण आदि चीज़ों के लिए विशेष महत्व रखता है। गुप्त नवरात्रि के नौ दिनों तक साधक मां दुर्गा की कठिन भक्ति और तपस्या करते हैं। खासकर निशा पूजा की रात्रि में तंत्र सिद्धि की जाती है। इस भक्ति और सेवा से मां प्रसन्न होकर साधकों को दुर्लभ और अतुल्य शक्ति देती हैं। साथ ही सभी मनोरथ सिद्ध करती हैं।
क्या रखें सावधानी गुप्त नवरात्रि में --
  • नौ दिनों तक ब्रह्मचर्य नियम का जरूर पालन करें। 
  • तामसी भोजन का त्याग करें।
  • कुश की चटाई पर शैया करनी चाहिए।
  • निर्जला अथवा फलाहार उपवास रखें।
  • मां की पूजा-उपासना करें।
  • लहसुन-प्याज का उपयोग न करें।-
  • माता-पिता की सेवा और आदर सत्कार करें।

माघ नवरात्री उत्तरी भारत में अधिक प्रसिद्ध है, और आषाढ़ नवरात्रि मुख्य रूप से दक्षिणी भारत में लोकप्रिय है।

कंकण सूर्यग्रहण 21 जून को, जाने क्या होंगे इस सूर्यग्रहण के प्रभाव

आगामी 21 जून 2020, (रविवार) आषाढ़ कृष्ण अमावस्या को होने जा रहा सूर्यग्रहण भारत में खंडग्रास के रूप में ही दृश्य होगा। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि यह सूर्य  ग्रहण गंड योग और मृगशिरा नक्षत्र में होगा। पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की यह ग्रहण क्योंकि मिथुन राशि और मृगशिरा नक्षत्र में लग रहा है इसलिए मिथुन वालों पर इस ग्रहण का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिलेगा। भारत में इस सूर्यग्रहण का आरम्भ प्रातः 10 बजकर 13 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। भारत के अतिरिक्त यह खंडग्रास सूर्यग्रहण विदेश के कुछ क्षेत्रों में भी दिखाई देगा।इस ग्रहण का व्यापक प्रभाव भारत, दक्षिण पूर्वी यूरोप, अफ्रीका, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, वर्मा पर दिखाई देगा।
उज्जैन में कब देखा जा सकता है सूर्य ग्रहण--
  • उज्जैन में पूर्ण ग्रहण शुरू होगा 21 जून सुबह 10 बजकर 10 मिनट पर  एवम ग्रहण का मध्य दोपहर 11 बजकर 52 मिनट पर होगा ।
  • पूर्ण ग्रहण की समाप्ति दोपहर 1 बजकर 42 मिनट पर होगी आंशिक ग्रहण की समाप्ति। इस ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे  32 मिनट की होगी। इसके बाद साल के अंत में एक और सूर्य ग्रहण होगा।
  • ग्रहण का स्पर्श जयपुर में 10.13 मिनट प्रातः, ग्रहण का मध्य 11.56 एवं ग्रहण का मोक्ष दोपहर 1 बजकर 31 मिनट में होगा।

कब लगेगा इस सूर्य ग्रहण का सूतक--
सूर्यग्रहण का सूतक 12 घंटे पहले लग जाता है। इस सूर्यग्रहण का सूतक 20 जून को रात्रि 10 बजकर 14 मिनट से आरम्भ हो जाएगा, जो कि सूर्यग्रहण ग्रहण के समाप्त होने तक रहेगा। 21 तारीख को देश की राजधानी दिल्ली में सुबह 9 बजकर 15 मिनट से यह ग्रहण आरंभ हो जाएगा। इस ग्रहण का परमग्रास 99.4 प्रतिशत रहेगा, यानी कुछ स्थानों पर सूर्य पूरी तरह छुप जाएगा। यह ग्रहण करीब 5 घंटे, 48 मिनट 3 सेकंड का रहेगा।  दो चंद्र ग्रहण  के बाद जब पूर्ण ग्रहण होता है तो चंद्रमा सूर्य को कुछ देर के लिए पूरी तरह ढक लेता है। हालांकि, आंशिक और कुंडलाकार  ग्रहण में सूर्य का केवल कुछ हिस्सा ही ढकता है। 21 जून को पड़ने जा रहा सूर्य ग्रहण कुंडलाकार है। कुंडलाकार ग्रहण ‘रिंग ऑफ़ फायर’ बनाता है, लेकिन यह पूर्ण ग्रहण से अलग होता है।

यह होगा इस कंकण सूर्य ग्रहण का भारत देश के ऊपर प्रभाव--
Kakan-solar-eclipse-on-June-21-what-will-be-the-effects-of-this-solar-eclipse- कंकण सूर्यग्रहण 21 जून को, जाने क्या होंगे इस सूर्यग्रहण के प्रभावग्रहण के समय 6 ग्रहों का वक्री होना इस बात का संकेत दे रहा है कि प्राकृतिक आपदाओं यथा समुद्री चक्रवात, तूफान, अत्यधिक वर्षा, महामारी आदि से जन-धन की हानि हो सकती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार वर्ष 2020 में मंगल अग्नि तत्व का प्रतीक है और यह जलीय राशि में 5 मास तक रहेंगे इस कारण सामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा और महामारी का भय बना रहेगा।इस ग्रहण के समय कुल 6 ग्रह वक्री होंगेऔर ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में बैठकर सूर्य चंद्रमा बुद्ध व राहू को देख रहा होगा , जो अच्छा संकेत नहीं है। इससे समंदर में चक्रवात, तूफान, बाढ़ वह अत्यधिक बारिश जैसे प्राकृतिक प्रकोप के आसार बनेंगे।
         ज्योतिर्विद पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की इस सूर्य ग्रहण काल में शनि और गुरु का मकर राशि में वक्री होने से पडोसी देशों में राजनितिक उठापठक से भारत को चिंता बनी रहेगी। शनि मंगल और गुरु इन तीनों ग्रहों के प्रभाव से देशों में आर्थिक मंदी का असर बना रहेगा बना रहेगा। चीन की सामरिक गतिविधिया जल, थल और आकाश में बढ़ने से पडोसी देशो के मध्य चिंता का कारण बनेगा।इस ग्रहण के कारण भारत का पड़ोसी देशों से संबंध प्रभावित हो सकता है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का सरकार का प्रयास बाधित होगा। कोरोना से बड़ी संख्या में लोग पीड़ित हो सकते हैं जिससे सरकार को नई रणनीति तैयार करनी होगा।शनि, मंगल और गुरु के प्रभाव से विश्व के कई बड़े देशों में आर्थिक मंदी का असर एक वर्ष तक देखने को मिलेगा। लेकिन स्वतंत्र भारत की कुंडली के ग्रह गोचर की स्थिति के मुताबिक भारत के लिए राहत की बात यह होगी कि देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। विश्व में भारत की साख भी बढ़ेगी।
जानिए सूर्य ग्रहण के बाद क्या करें ?
सूर्यग्रहण के समाप्त होने के बाद किसी पवित्र नदी यथा गंगा, नर्मदा, रावी, यमुना, सरस्वती, पुनपुन इत्यादि में स्नान करें। यह संभव न हो तो तालाब, कुएं या बावड़ी में स्नान करें। यदि यह भी संभव न हो तो घर पर रखे हुए तीर्थ जल मिलाकर स्नान करना चाहिए। ग्रहण के समय हमें शुभ कार्य करना चाहिए। यह शुभ कार्य कल्याण प्रदान करने वाला होता है। ग्रहण के सूतक तथा ग्रहण काल में व्यक्ति को अपनी इच्छापूर्ति के लिए स्नान, ध्यान, मन्त्र, स्तोत्र-पाठ, मंत्रसिद्धि, तीर्थस्नान, हवन-कीर्तन, दान इत्यादि कार्य करना चाहिए। ऐसा करने से सभी प्रकार के बाधाओं से निवृत्ति एवं सुख की प्राप्ति होती है।
   पंडित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस ग्रहण को धार्मिक दृष्टि से महत्‍वपूर्ण माना जा रहा है क्‍योंकि यह चंद्र ग्रहण के मात्र 16 दिन बाद लग रहा है जो कि हिंदू काल गणना के मान से एक पाक्षिक (15 दिन) की अवधि पूरी होने पर लगेगा। दूसरा यह ग्रहण कंकणाकृति होगा एवं भारत में खंडग्रास रूप में दिखाई देगा। गत चंद्र ग्रहण में तो सूतक मान्‍य नहीं था लेकिन सूर्य ग्रहण में सूतक का काल मान्‍य होगा। इसकी अवधि 12 घंटे पहले से ही लग जाएगी। यह ग्रहण भारत, दक्षिण पूर्व यूरोप एवं पूरे एशिया में देखा जा सकेगा। पिछले साल के आखिरी सप्‍ताह और इस साल के पहले सप्‍ताह में ग्रहण का संयोग था। पहले सूर्य ग्रहण उसके बाद चंद्र ग्रहण लगा था। अब इस बार पहले चंद्र ग्रहण लगा है और उसके बाद सूर्य ग्रहण होगा। इसके बाद आगामी 5 जुलाई को एक बार फिर से चंद्र ग्रहण लगेगा।
अलग-अलग मान्यताएं--
ग्रहण को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं।जैसे आमतौर लोग पर घर पर रहना पसंद करते हैं और ग्रहण के समय कुछ भी खाने से बचते हैं। इसके अलावा, दरभा घास या तुलसी के पत्तों को खाने और पानी में डाल दिया जाता है, ताकि ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचा जा सके।कई लोग ग्रहण खत्म होने के बाद स्नान करने में विश्वास करते हैं और नए कपड़े पहनते हैं। इसी तरह सूर्य देव की उपासना वाले मंत्रों का उच्चारण भी ग्रहण के दौरान किया जाता है।
जानिए कैसा रहेगा सूर्यग्रहण का सभी राशियों पर प्रभाव----
  1. मेष : राजकीय सम्मान पाने की प्रबल संभावना है।
  2. वृषभ : आर्थिक परेशानी और व्यापार में नुक्सान हो सकता है संभाल कर रहें।
  3. मिथुन : किसी अप्रिय घटना-दुर्घटना के शिकार हो सकते है सावधानी रखें सब ठीक होगा।
  4. कर्क : शरीर में कहीं चोट लग सकती है ।
  5. सिंह : दाम्पत्य का सुख मिलेगा परन्तु वाणी में मधुरता बनाएं रखें।
  6. कन्या : आपके लिए शुभ रहेगा। बंधु-बांधव का सहयोग मिलेगा।
  7. तुला : वाद-विवाद से बचें। क्रोध के कारण नुक्सान हो सकता है।
  8. वृश्चिक : आप अचानक किसी परेशानी में फंस सकते हैं ।
  9. धनु : दाम्पत्य जीवन खटास आ सकती है। पत्नी वा पत्नी को कोई गिफ्ट दें।
  10. मकर : आपके लिए यह ग्रां शुभ फल देने वाला होगा।
  11. कुंभ : तनाव व मानसिक परेशानी हो सकती है।
  12. मीन : अनियोजित खर्च से आप परेशान हो सकते हैं ।
सूर्यग्रहण के बाद क्या-क्या दान करें ?
ग्रहण समाप्ति होने के बाद स्वर्ण, कंबल, तेल, कपास या मच्छरदानी का दान करना चाहिए।

सूतक एवं ग्रहणकाल में क्या नहीं करें ?
धार्मिक आस्थावान प्रवृत्ति के लोगो को अपने कल्याण के लिए सूतक एवं ग्रहणकाल में ऐसे किंचित कार्य है जिसे नहीं करना चाहिए। ग्रहण शुभ एवं अशुभ दोनों फल प्रदान करता है। अतः अब आपके ऊपर निर्भर करता है कि आपने किस फल के अनुरूप कार्य किया है। 
  • ग्रहण काल का अन्न अशुद्ध हो जाता ही इस कारण ग्रहण के समय भोजन नहीं करना चाहिए ऐसा करने से आप अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो सकते है। ग्रहण या सूतक से पहले ही यदि सभी खाने वाले पदार्थ यथा दूध दही चटनी आचार आदि में कुश रख देते है तो यह भोजन दूषित नहीं होता है और आप पुनः इसको उपयोग में ला सकते है।
  • सूतक एवं ग्रहण काल में छल-कपट, झूठ, डिंग हाँकना आदि से परहेज करना चाहिए।
  • ग्रहण काल में मन तथा बुद्धि पर पड़ने वाले कुप्रभाव से बचने के लिए जप, ध्यानादि करना चाहिए है।
  • व्यक्ति को मूर्ति स्पर्श, नाख़ून काटना, बाल काटना अथवा कटवाना, निद्रा मैथुन आदि कार्य बिल्कुल ही नहीं करना चाहिए।
  • इस काल में रति क्रिया से बचना चाहिए। ग्रहण काल में शरीर, मन तथा बुद्धि के मध्य तालमेल बनाये रखना चाहिए।
  • मन-माने आचरण करने से मानसिक तथा बौद्धिक विकार के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य का भी क्षय होता है। अत एव हमें अवश्य ही ग्रहणकाल में मन,वचन तथा कर्म से सावधान रहना चाहिए।
  • इस समय बच्चे, वृद्ध,गर्भवती महिला, एवं रोगी को यथानुकूल खाना अथवा दवा लेने में कोई दोष नहीं लगता है।

माँ बगलामुखी के इस मन्त्र से शत्रु, भूत-प्रेत, जेल, मुकदमा या हो धन की समस्या, हर बाधा होगी दूर

हर समस्या का समाधान हैं इस बीज मंत्र में

शत्रुओं पर विजय प्राति, शत्रु भय से मुक्ति तथा प्रभावशाली वाक-शक्ति की प्राप्ति के लिए मां बगलामुखी की साधना की जाती है।देवी बगलामुखी दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या है। माता बगलामुखी की उपासना से शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है। बगलामुखी मंत्र सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति दिलाते है , रोगों की पुरानी समस्याओं और दुर्घटनाओं से सुरक्षा प्रदान करते है और संरक्षण देते है। ऐसा कहा जाता है की बगलामुखी मंत्र के नियमित जप से अहंकार नष्ट होता है और शत्रुओं का नाश होता है।
From-this-Mantra-of-Baglamukhi-Mantra-ghost-prison-lawsuit-or-money-problem-every-obstacle-will-be-overcome    ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि माँ बगलामुखी की इस साधना में एक विशेष संख्या में बगलामुखी मंत्र के जाप का विधान है। सामान्य शत्रु बाधा दूर करने के लिए इस मंत्र का कम से कम 10 हजार बार जाप करना करना चाहिए, लेकिन अगर कोई बहुत बड़ी शत्रु बाधा हो या शत्रुता में जीवन-मरण का प्रश्न हो तो ऐसे में कम से कम 1 लाख बार इस मंत्र का जाप करने वाला कभी भी शत्रु से हारता नहीं। ऐसे व्यक्ति को हर प्रकार के वाद-विवाद में विजय मिलती है और वह अपनी बातों को सही सिद्ध कर पाता है। कई जगहों पर मां बगलामुखी के सर्व कामना पूर्ति बीज मंत्र को अशुद्ध रूप से लिखा पाया जाता है, और अगर कोई अशुद्ध मंत्र का उच्चारण या जप करता है तो उसे कोई बड़ी हानि भी हो सकती है । मंत्र के जानकार कहते है कि वहीं यदि इस मन्त्र का सही उच्चारण किया जाय तो मां बगलामुखी का यह बीज मंत्र साधक की समस्त मनोकानाओं की पूर्ति कर सकता हैं । बगलामुखी माता के उक्त मंत्र का जप करें, जप से विधिवत माँ बगलामुखी का पूजन करें। एवं निश्चित संख्या में जप पूरा होने के बाद गाय के शुद्ध घी से 251 बार हवन करें। हवन में आम, पलाश, गुलर आदि का समिधाओं का उपयोग करें।

बगलामुखी मंत्र के लिए कुल जप संख्या--
1,25000 बार

बगलामुखी मंत्र जप का श्रेष्ठ समय या मुहूर्त---
शुक्ल पक्ष, चन्द्रावली, शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि, रात्रि समय

इस मंत्र के शुद्ध और भावपूर्ण उच्चारण से शत्रु को शांत किया जा सकता है, मुकदमा भी जीत सकते है, आधिदैविक और आधिभौतिक समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है, बंधनों से मुक्ति मिल सकती है, जेसै कोई बेकसूर व्यक्ति जेल में है या जेल जाने के आसार हैं तो इस मंत्र की साधना से 100% बच सकता हैं । भूत प्रेत और जादू टोन की बाधा से रक्षा होती है, सारे डर खत्म हो जाते है । धन संबंधित समस्या दूर हो जाती हैं । इस साधना से कोई भी अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बना सकता है ।

शुद्ध बगलामुखी बीज मंत्र---

ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानाम वाचं मुखम पदम् स्तम्भय ।
जिव्हां कीलय बुद्धिम विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ।।

बगलामुखी मन्त्र के प्रारंभ में ह्री या ह्लीं दोनों में से किसी भी बीज का प्रयोग किया जा सकता है, ह्रीं तब लगायें जब आपका धन किसी शत्रु ने हड़प लिया है और ह्लीं का प्रयोग शत्रु को पूरी तरह से परास्त करने के लिए ही करें । इससे शत्रु को वश में करने की अद्भुत शक्ति मिलती है, लेकिन यह सब एक दो दिन में नहीं होगा बल्कि इसके लिए संकल्प लेकर कम से कम 40 दिन का विशेष अनुष्ठान करने का नियम हैं । बिना नियमों की जानकारी इस साधना को नहीं करना चाहिए । अन्यथा समस्या से छूटकारा नहीं सकेगा । माँ बगलामुखी अपने भक्त से श्रद्धा और विशवास चाहती हैं, यदि आपको पूरी श्रद्धा है और नियमों के साथ साधना करेंगे तो सफलता जरूर मिलेगी ।नलखेड़ा, मध्यप्रदेश स्थित विश्वप्रसिद्ध मां बगलामुखी मन्दिर, जो महाभारत कालीन एवम पांडवों द्वारा स्थापित हैं, में यह अनुष्ठान सम्पन्न करवाने हेतु पंडित दयानन्द शास्त्री जी से सम्पर्क कर सकते हैं।

ऐसे करे शत्रु को परास्त---

अगर कोई शत्रु अत्यंत शक्तिशाली हो तो ऐसी अवस्था में यदि मां बगलामुखी के इस मन्त्र को नीचे लिखे अनुसार शुद्धता पूर्वक उच्चारण कर जप किया जाए तो शत्रु से तुरंत सुरक्षा मिलती है ।

ॐ ह्लीं बगलामुखी अमुक (शत्रु का नाम लें ) दुष्टानाम वाचं मुखम पदम स्तम्भय स्तम्भय ।
जिव्हां कीलय कीलय बुद्धिम विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ।।

इस मन्त्र में अमुक शब्द के स्थान पर शत्रु का नाम लेकर कम से कम 11 सौ बार एक दिन में जप करें, ऐसा करने से मां बगुलामुखी साधक की रक्षा करेंगी एवं साधक का शत्रु या तो किसी मुसीबत में फंस जाएगा या फिर कोई भारी गलती करके स्वयं ही फंस जाएगा ।

सम्पुट युक्त बगलामुखी मन्त्र--

सम्पुट मन्त्र की शक्ति को दोगुना करने के लिए किया जाता है, किसी भी मन्त्र की शक्ति को सम्पुट द्वारा बढ़ने के लिए साधक को पहले बिना सम्पुट से निश्चित संख्या में जप करना चाहिए, उसके बाद ही सम्पुट लगाया जा सकता है । मन्त्र के आदि में और अंत में बीज लगाने से मन्त्र सम्पुट युक्त हो जाता है ।

यह होते हैं बगलामुखी मंत्र के लाभ---
ऐसा माना जाता है की बगलामुखी मंत्र में चमत्कारी शक्तियां है।पंडित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार माँ बगलामुखी मंत्र शत्रुओं पर विजय सुनिश्चित करने के लिए जाना जाता है। प्रशासन और प्रबंधन के लोगों को , नेताओं को , ऋण या मुकदमे की समस्याओं का सामना कर रहे लोगो को बगलामुखी मंत्र का विशेष सुझाव दिया जाता है। बगलामुखी मंत्र का उपयोग व्यापार में क्षति का सामना कर रहे व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है , जैसे वित्तीय समस्याएं , झूठी अदालत के मामले , निराधार आरोप , ऋण की समस्याएं , व्यापार में बाधाएं आदि। प्रतियोगी परीक्षाओं और वाद-विवाद आदि में भाग लेने वाले लोगों के लिए भी बगलामुखी मंत्र प्रभावी है। बगलामुखी मंत्र अनिष्ट आत्माओं और अशुभ दृष्टि से सुरक्षित रहने में सहयोग करता है।नलखेड़ा, मध्यप्रदेश स्थित विश्वप्रसिद्ध मां बगलामुखी मन्दिर, जो महाभारत कालीन एवम पांडवों द्वारा स्थापित हैं, में यह अनुष्ठान सम्पन्न करवाने हेतु पंडित दयानन्द शास्त्री जी से सम्पर्क कर सकते हैं।
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