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जानिए दशहरा / विजयदशमी क्यों और कैसे मनाएं

हिन्दू धर्मे में नवरात्री का त्यौहार बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है नवरात्रि का त्यौहार साल में दो बार आता है पहला नवरात्रि त्यौहार चैत्र मास में और दूसरा नवरात्रि अश्विन मास में आता है, अश्विन मास में जो नवरात्री का त्यौहार आता है उसे हिन्दू धर्म के लोग बड़ी ही धूम धाम से मानाते है इस त्यौहार में पूरे नौ दिन तक माता के अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है| भक्त लोग माता का पंडाल बनाकर उसमे माता की मूर्ति स्थापित करते है और नौ दिनों तक उनकी पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते है| कुछ भक्त गण माताओं के दर्शन के लिए धार्मिक स्थल पर भी जाते है | 
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा (विजयदशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।
Know-why-and-how-to-celebrate-Dussehra-Vijayadashami-जानिए दशहरा / विजयदशमी क्यों और कैसे मनाएं       दशहरा का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था। राम-रावण युद्ध नवरात्रों में हुआ था। रावण की मृत्यु अष्टमी-नवमी के संधिकाल में हुई थी और उसका दाह संस्कार दशमी तिथि को हुआ। जिसका उत्सव दशमी दिन मनाया, इसीलिये इस त्यौहार को विजयदशमी के नाम भी से जाना जाता है।
सम्पूर्ण भारत में यह त्यौहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को बड़े ही उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस वर्ष दशहरा 08 अक्टूबर 2019 (मंगलवारवार) को मनाया जाएगा। इस विजयदशमी पर विजय मुहूर्त- 14:04 से 14:50 दोपहर तक रहेगा।
  • अपराह्न पूजा समय- 13:17 से 15:36
  • दशमी तिथि आरंभ- 12:37 (7 अक्तूबर 2019)
  • दशमी तिथि समाप्त- 14:50 (8 अक्तूबर 2019)

इस वर्ष दशहरा पर्व तिथि व मुहूर्त 2019 --8 अक्टूबर (मंगलवार) को विजय मुहूर्त में खरीदी और रावण दहन मुहूर्त 
  • दोपहर 14:04 से 14:50 तक..
  • अपराह्न पूजा एवं खरीदी समय- 13:17 से 15:36 तक...
दशहरा / विजयदशमी पूजन के  दौरान अपराजिता पूजा करना शुभ माना जाता है। दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरे अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव का उत्सव आवश्यक भी है।
      भारत के सभी स्थानों में इसे अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। कहीं यह दुर्गा विजय का प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है, तो कहीं नवरात्रों के रूप में। बंगाल में दुर्गा पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। यह त्योहार हर्ष और उल्लास का प्रतीक है। इस दिन मनुष्य को अपने अंदर व्याप्त पाप, लोभ, मद, क्रोध, आलस्य, चोरी, अंहकार, काम, हिंसा, मोह आदि भावनाओं को समाप्त करने की प्रेरणा मिलती है। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंहकार के मद में डूबा हुआ एक दिन अवश्य मुंह की खाता है। रावण बहुत बड़ा विद्वान और वीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसके विनाश कारण बना। यह त्योहार जीवन को हर्ष और उल्लास से भर देता है, साथ यह जीवन में कभी अंहकार न करने की प्रेरणा भी देता है।
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर बड़े-बड़े मेलों का आयोजन भी किया जाता है। जगह-जगह रामकथा को नाटक रूप में दिखाया जाता है। माता या दुर्गा के भक्त नौ दिनों तक नवरात्रि के व्रत रखते हैं। मां दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा करने के पश्चात् दशमी के दिन यह त्यौहार मनाया जाता हैं। दसवें दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पूतले का दहन किया जाता है। इस अवसर पर विद्यालयों में बच्चों के लिए दस  दिन का अवकाश भी घोषित कर दिया जाता है। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.
दशहरा पूजा विधि---- 
दशहरे के दिन कई जगह अस्त्र पूजन भी किया जाता है। वैदिक हिन्दू रीति के अनुसार इस दिन श्रीराम के साथ ही लक्ष्मण जी, भरत जी और शत्रुघ्न जी का पूजन करना चाहिए। इस दिन सुबह घर के आंगन में गोबर के चार पिण्ड मण्डलाकर (गोल बर्तन जैसे) बनाएं। इन्हें श्रीराम समेत उनके अनुजों की छवि मानना चाहिए। गोबर से बने हुए चार बर्तनों में भीगा हुआ धान और चांदी रखकर उसे वस्त्र से ढक दें। फिर उनकी गंध, पुष्प और द्रव्य आदि से पूजा करनी चाहिए। पूजा के पश्चात् ब्राह्मïणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य वर्ष भर सुखी रहता है।
     दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो शुभ तिथयां हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। मां दुर्गा की विशेष आराधनाएं देखने को मिलती हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।
यह हैं दशहरा / विजयदशमी का धार्मिक महत्त्व --- 
पुराणों और शास्त्रों में दशहरे से जुड़ी कई अन्य कथाओं का वर्णन भी मिलता है। लेकिन सबका सार यही है कि यह त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।मान्यता है कि इस दिन श्री राम जी ने रावण को मारकर असत्य पर सत्य की जीत प्राप्त की थी, तभी से यह दिन विजयदशमी या दशहरे के रूप में प्रसिद्ध हो गया। दशहरे के दिन जगह-जगह रावण,कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। देवी भागवत के अनुसार इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस को परास्त कर देवताओं को मुक्ति दिलाई थी, इसलिए दशमी के दिन जगह-जगह देवी दुर्गा की मूर्तियों की विशेष पूजा की जाती है। कहते हैं, रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था। भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कुछ लोग व्रत एवं उपवास करते हैं। दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा करने वाले भक्त मूर्ति-विसर्जन का कार्यक्रम भी गाजे-बाजे के साथ करते हैं।
        भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
क्या आपको पता है की नवरात्रि का त्यौहार और दशवें दिन, विजयादशमी क्यों मनायी जाती है और इसे मनाने का कारण क्या है?
भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्रीने बताया की ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।
जानिए दशहरा / विजयदशमी  मनाये की प्रचलित कथाएं---
पहली कथा इस प्रकार है- प्राचीन काल में जब महिषासुर नामक राक्षस तपस्या कर रहा था तो उसकी तपस्या से खुश होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दिया था, वरदान प्राप्त करने के बाद महिषा सुर और ज्यादा हिंसक हो गया था उसने अपना आतंक इतना ज्यादा फैला रखा था की सारे देवतागण उसके भय के कारण देवीदुर्गा की आराधना करने लगे, ऐसा माना जाता है की देवी दुर्गा के निर्माण होने में देवताओं का सहयोग था महिषा सुर के आतंक से बचने के लिए देवताओं ने अपने अस्त्र शस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे तब जाकर देवी दुर्गा और शक्तिशाली हो गयी थी, इसके बाद महिषा सुर को समाप्त करने के लिए देवी दुर्गा ने  महिषा सुर के साथ पूरे 9 दिन युद्ध की थी और महिषा सुर का वध करने के बाद देवी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाई. तभी से नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है.
दूसरी कथा- विजयादशमी की पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम को जब आयोद्धा छोड़कर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था और उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का हरण कर लिया था तब भगवान राम सीता माता को वापस लाने के लिए नौ देवियों की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने श्री राम भगवान को वरदान दिया था और कई शक्तियां भी प्रदान की थी वरदान प्राप्त करने के बाद दशमे दिन भगवान श्री राम और रावण का युद्ध हुआ और इसी युद्ध में रावण का वद्ध हुआ था और तभी से राम नवमी और विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है.
विजयदशमी पर्व क्यों - 
इसलिए है की इस दिन से हमें अच्छे कर्म करने की शिक्षा मिलती है गर हम भी बेकार कर्म करेंगे तो हमें भी नरक जाना होगा !  ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विजयदशमी पर्व जो की "बुराई पर अच्छाई की जीत" का प्रतिक है, गुण ग्रहण का भाव रहे नित, द्रष्टि न दोषों पर जावे !!
आइये ...विजयदशमी पर अच्छाई पर बुराई की विजय मनाये !
रावण के पुतले को नहीं..रावण की बुराई को मिटाए !

शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएं

मां दुर्गा का प्रत्येक स्वरूप मंगलकारी है और एक-एक स्वरूप एक-एक ग्रह से संबंधित है। इसलिए नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूप की पूजा प्रत्येक ग्रहों की पीड़ा को शांत करती है।देवी माँ या निर्मल चेतना स्वयं को सभी रूपों में प्रत्यक्ष करती है,और सभी नाम ग्रहण करती है। माँ दुर्गा के नौ रूप और हर नाम में एक दैवीय शक्ति को पहचानना ही नवरात्रि मनाना है।असीम आनन्द और हर्षोल्लास के नौ दिनों का उचित समापन बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक पर्व दशहरा मनाने के साथ होता है। नवरात्रि पर्व की नौ रातें देवी माँ के नौ  विभिन्न रूपों को को समर्पित हैं जिसे नव दुर्गा भी कहा जाता है।

। । या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: । ।
जानिए क्यों हैं माँ दुर्गा के नौ रूप---
Sharadiya-Navratri-2019-Worship-Goddess-Durga-Devi-according-to-your-zodiac-sign-food-शारदीय नवरात्रि 2019: आपकी राशि अनुसार कोनसी देवी का पूजन करें, कोनसा भोग लगाएंइस वर्ष, नवरात्रि 29 सितंबर से शुरू हो रही है. यह नौ दिनों का त्योहार है, जो हिंदू धर्म और संस्कृति में बहुत महत्व रखता है. यह सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक है क्योंकि यह भगवान राम की जीत का जश्न मनाता है, जिन्होंने रावण पर अपनी लड़ाई से पहले देवी दुर्गा की पूजा की थी. शारदा नवरात्रि का त्योहार पूरे भारत मं धूम धाम से मनाया जाता है।नवरात्रि एक ऐसा त्यौहार है जिसे बहुत धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और देवी दुर्गा के नौ अवतारों को समर्पित नौ दिन बहुत शुभ माने जाते हैं. भारत के प्रत्येक भाग में, इसका एक अलग महत्व है. नवरात्रि से जुड़ी कहानी देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुई लड़ाई की है. उसने त्रिलोक (पृथ्वी, स्वर्ग और नरक) पर हमला किया, और देवता उसे हराने में सक्षम नहीं थे।
      अंत में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने मिलकर देवी दुर्गा की रचना की, जिन्होंने अंत में महिषासुर को हराया. देवी दुर्गा ने 15 दिनों तक उसके साथ युद्ध किया, जिसके दौरान दानव अपना रूप बदलता रहा. वह देवी दुर्गा को भ्रमित करने के लिए विभिन्न जानवरों में बदल जाता था. अंत में, जब वह एक भैंस में बदल गया, जब देवी दुर्गा ने उसे अपने त्रिशूल से मार डाला. यह महालया के दिन था कि महिषासुर का वध किया गया था.
       नवरात्रि के प्रत्येक दिन का एक अलग रंग होता है. नवरात्रि शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है नौ रातें- नव (नौ) रत्रि (रात). प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है. उत्तर पूर्व भारत के पूर्व और विभिन्न हिस्सों में, नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहां त्योहार राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। 
पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
वन्दे वांछित कामार्थे चंद्रार्घ्कृत शेखराम, सिंहरुढ़ा अष्टभुजा कुष्मांडा यशस्वनिम.
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी.”
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

यह भौतिक नहीं, बल्कि लोक से परे आलौकिक रूप है, सूक्ष्म तरह से, सूक्ष्म रूप। इसकी अनुभूति के लिये पहला कदम ध्यान में बैठना है। ध्यान में आप ब्रह्मांड को अनुभव करते हैं। इसीलिये बुद्ध ने कहा है, आप बस देवियों के विषय में बात ही करते हैं, जरा बैठिये और ध्यान करिये। ईश्वर के विषय में न सोचिये। शून्यता में जाईये, अपने भीतर। एक बार आप वहां पहुँच गये, तो अगला कदम वो है, जहां आपको विभिन्न मन्त्र, विभिन्न शक्तियाँ दिखाई देंगी, वो सभी जागृत होंगी।
     बौद्ध मत में भी, वे इन सभी देवियों का पूजन करते हैं। इसलिये, यदि आप ध्यान कर रहे हैं, तो सभी यज्ञ, सभी पूजन अधिक प्रभावी हो जायेंगे। नहीं तो उनका इतना प्रभाव नहीं होगा। यह ऐसे ही है, जैसे कि आप नल तो खोलते हैं, परन्तु गिलास कहीं और रखते हैं, नल के नीचे नहीं। पानी तो आता है, पर आपका गिलास खाली ही रह जाता है। या फिर आप अपने गिलास को उलटा पकड़े रहते हैं। 10 मिनट के बाद भी आप इसे हटायेंगे, तो इसमें पानी नहीं होगा। क्योंकि आपने इसे ठीक प्रकार से नहीं पकड़ा है। सभी पूजन ध्यान के साथ शुरू होते हैं और हजारों वर्षों से इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। ऐसा पवित्र आत्मा के सभी विविध तत्वों को जागृत करने के लिये, उनका आह्वाहन करने के लिये किया जाता था। हमारे भीतर एक आत्मा है। उस आत्मा की कई विविधतायें हैं, जिनके कई नाम, कई सूक्ष्म रूप हैं और नवरात्रि इन्हीं सब से जुड़े हैं – इन सब तत्वों का इस धरती पर आवाहन, जागरण और पूजन करना।
    नवरात्रि में देवी को खुश करने में पूजन-अर्चना के आलावा उनके भोग का भी विशेष महत्व होता है। ऐसे में जरूरी है कि नवरात्रि के दिन और उनसे सम्बंधित देवी मां की पसंद के हिसाब से ही भोग अर्पित किए जाएं। ऐसा करने से पूजा के फल में बहुत वृद्धि होती है। 
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की माँ दुर्गा की पूजन और आराधना के लिए पूर्व और दक्षिण अच्छी मानी जाती है। इसमें भी पूर्व की दिशा सर्वोत्तम होती है। इस दिशा को ज्ञान, बुद्धि और विवेक की दिशा माना जाता है। इसलिए जब आप माता की स्थापना करें तो उनकी स्थापना पूर्व दिशा में ही करें। इससे आपको अपनी पूजा का पूरा लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त नवरात्रि में अखण्ड जोत के लिए गाय के देसी घी का इस्तेमाल करना अच्छा माना जाता है। जब आप पूजा करते हैं तो आपका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। साथ ही आप माता की जोत की स्थापना कुछ इस तरह करें कि वह आपके सीधे हाथ पर हो। यह पूजा स्थान का अग्निकोण होता है। वहीं पूजा की अन्य सामग्री किसी भी दिशा में रखी जा सकती है। 
     आमतौर पर वास्तुशास्त्र में यह नियम निर्धारित है कि अग्नि से संबंधित कोई भी सामग्री नार्थ-ईस्ट अर्थात ईशान कोण में नहीं रखनी चाहिए लेकिन माता की जोत के साथ यह नियम लागू नहीं होता क्योंकि माता की ज्योति की सकारात्मकता इतनी अधिक होती है कि अगर आप उसे ईशान कोण में रखते हैं तो उसकी सकारात्मकता न सिर्फ उस दिशा की बल्कि पूरे घर की नकारात्मकता को खत्म कर देती है।  नवरात्रि के दिनों में अगर आपके पास कोई स्फटिक या पीतल का श्रीयंत्र है तो उसे पूजा स्थल में अवश्य रखें। इससे आपके लिए धन लाभ के योग बनते हैं। आप यह श्रीयंत्र नवरात्रि के किसी भी दिन स्थापित कर सकते हैं। ध्यान रखें कि आजकल बाजार में प्लास्टिक के श्रीयंत्र भी मिलते हैं, इन्हें पूजाघर में कभी न रखें। इससे आपको किसी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं होगा। 
    माता की चौकी के लिए लकड़ी या शुद्ध धातु जैसे चांदी या सोने का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन गलती से भी इसके लिए कभी भी प्लास्टिक की चौकी का इस्तेमाल न करें। इसके अतिरिक्त आप अपने पूजा स्थान में शुभ और मंगलदायक रंग जैसे लाल और पीले रंग का ही उपयोग में लेने चाहिए। उदाहरण के लिए माता की चौकी में इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े, पूजा के फल और फूल आदि में लाल और पीले रंग को ही महत्ता प्रदान करें। इस उपाय से घर में सकारात्मकता आती है। पीला रंग जहां ज्ञान, बुद्धि और विवेक के देवता सूर्य का प्रतीक है, वहीं लाल रंग शक्ति और मंगल को दर्शाता है।  वास्तु नियमानुसार आप जहां पर बैठकर पूजा कर रहे हैं उसके नीचे कभी भी लटका हुआ बीम नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो आप वहां से थोड़ा हटकर बैठें। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता।
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शारदीय नवरात्रि 2019 पर बन रहे है ये विशेष योग--
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इस नवरात्रि में बन रहा कलश स्थापना और सुख समृद्धि दायक संयोग--
इस बार कलश स्थापना के दिन ही सुख समृद्धि के कारक ग्रह शुक्र का उदय होना बेहद शुभ फलदायी है। शुक्रवार का संबंध देवी लक्ष्मी से है। नवरात्र के दिनों में देवी के सभी रूपों की पूजा होती है। शुक्र का उदित होना भक्तों के लिए सुख-समृद्धि दायक है। धन की इच्छा रखने वाले भक्त नवरात्र दे दिनों में माता की उपासना करके अपनी आर्थिक परेशानी दूर कर सकते हैं। इस दिन बुध का शुक्र के घर तुला में आना भी शुभ फलदायी है।
इस नवरात्र में 4 सर्वार्थ सिद्धि योग---
इस साल की नवरात्र इसलिए भी खास है क्योंकि इस बार पूरे नवरात्र के दौरान 4 सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहे हैं। ऐसे में साधकों को सिद्धि प्राप्त करने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। इस दौरान सभी शुभ काम शुरू कर सकते हैं। 29 सितंबर 2019, 2,6 और 7 अक्टूबर 2019 को भी यह शुभ योग बन रहा है। 
इस शारदीय नवरात्र में बना अमृत सिद्धि योग--
इस वर्ष नवरात्र में दूसरे पूजा यानी 30 सितंबर, चौथे पूजा यानी 2 अक्टूबर को अमृत सिद्धि नामक शुभ योग बन रहा है।
इस वर्ष 2019 की शारदीय नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में--
इस वर्ष नवरात्र का आरंभ हस्त नक्षत्र में होने जा रहा है। इस नक्षत्र में ही कलश स्थापन जाएगा। हस्त नक्षत्र को 26 नक्षत्रों में 13वां और शुभ माना गया है। इसके स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं। इस नक्षत्र को ज्ञान, मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। इस नक्षत्र में कलश में जल भरकर पूजा का संकल्प लेना शुभ फलदायी माना गया है।
इस शुभ संयोग में होगा कलश स्थापना---
29 सितंबर को नवरात्र आरंभ होगा। इसी दिन भक्त 10 दिनों तक माता की श्रद्धा भाव से पूजा का संकल्प लेकर कलश बैठाएंगे, जिसे घट स्थापना भी कहते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस बार कलश स्थापना के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और द्विपुष्कर नामक शुभ योग बन रहा है। ये सभी घटनाएं नवरात्र का शुभारंभ कर रहे हैं।
इन शारदीय नवरात्र में आ रहे हैं दो सोमवार और रविवार--
इस बार नवरात्र का आरंभ रविवार को हो रहा है और इसका समापन मंगलवार को होगा। ऐसे में नवरात्र में दो सोमवार और दो रविवार आने वाले हैं। पहले सोमवार को देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी और अंतिम सोमवार को महानवमी के दिन सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नवरात्र में दो सोमवार का होना शुभ फलदायी माना गया हैं।
इस नवरात्र में बन रहा रवि योग--
इस वर्ष की शारदीय  नवरात्र में तीन दिन रवियोग बन रहा है। तीसरी पूजा यानी 1 अक्टूबर, छठे पूजा यानी 4 अक्टूबर और 7वीं पूजा यानी 5 अक्टूबर 2019 को यह शुभ योग बना है। 8 अक्टूबर 2019 को इसी योग में विजयादशमी का त्योहार भी मनाया जाएगा। इसी योग में देवी का विसर्जन भी होगा।
यह नवरात्र होगा पूरे 9 दिन का--
नवरात्र 9 दिनों का होता है और दसवें दिन देवी विसर्जन के साथ नवरात्र का समापन होता है लेकिन ऐसा हो पाना दुर्लभ संयोग माना गया है क्योंकि कई बार तिथियों का क्षय हो जाने से नवरात्र के दिन कम हो जाते हैं। लेकिन इस बार पूरे 9 दिनों की पूजा होगी और 10 वें दिन देवी की विदाई होगी। यानी 29 सितंबर 2019 से आरंभ होकर 7 अक्टूबर को नवमी की पूजा होगी और 8 अक्टूबर 2019 को देवी वसर्जन होगा।
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नवरात्रि में यदि आप अपनी राशि के अनुसार देवी का चयन कर साधना विधानपूर्वक करें तो आपको अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी।  इस नवरात्रि ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए आपकी राशि के अनुसार आपको किस देवी की पूजा करनी चाहिए ताकि आपको इच्छित फल मिल सके। 

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शैलपुत्री---
देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप है शैलपुत्री। मां का यह स्वरूप चंद्रमा से संबंधित है। इसलिए प्रथम दिन शैलपुत्री माता का पूजन करने से चंद्र से जुड़े समस्त दोष समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की चंद्र की अनुकूलता होने से मानसिक सुख-शांति प्राप्त होती है। देवी दुर्गा जी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के कपड़ों का रंग लाल होता है।ऐसे में आप भी लाल रंग पहन सकते हैं।  वृश्चिक राशि वाले जातकों को भगवती तारा या माता शैलपुत्री की उपासना करनी चाहिए।
     नवरात्र के पहले दिन देवी शैलपुत्री के स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन माता को गाय के दूध से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है। पिपरमिंट युक्त मीठे मसाला पान, अनार और गुड़ से बने पकवान भी देवी को अर्पण किए जाते हैं। पहले दिन घी नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। शंकरजी की पत्नी एवं नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है। इस दिन मां को घी का भोग लगाने से भक्त निरोगी रहते हैं और उनके सारे दुःख ख़त्म होते हैं।
मेष राशि के जातक को भगवती तारा, नील-सरस्वती या माता शैलपुत्री की साधना करनी से लाभ मिलता हैं।
मां शैलपुत्री का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रि उत्सव के दौरान माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों का सम्मान किया जाता है,एवं पूजा जाता है।जिसे नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है,शैल का मतलब शिखर।शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत (शिखर) की बेटी के नाम से जाना जाता है।आमतौर पर यह समझा जाता है,कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री है।लेकिन यह बहुत ही निम्न स्तर की सोच है।किन्तु इसका योग के मार्ग पर वास्तविक अर्थ है-चेतना का सर्वोच्चतम स्थान।यह बहुत दिलचस्प है,जब ऊर्जा अपने चरम स्तर पर है,तभी आप इसका अनुभव कर सकते है,इससे पहले कि यह अपने चरम स्तर पर न पहुँच जाए,तब तक आप इसे समझ नहीं सकते। क्योंकि चेतना की अवस्था का यह सर्वोत्तम स्थान है,जो ऊर्जा के शिखर से उत्पन्न हुआ है।यहाँ पर शिखर का मतलब है,हमारे गहरे अनुभव या गहन भावनाओं का सर्वोच्चतम स्थान।
           जब आप १००% गुस्से में होते हो तो आप महसूस करोगे कि गुस्सा आपके शरीर को कमजोर कर देता है।दरअसल हम अपने गुस्से को पूरी तरह से व्यक्त नहीं करते,जब आप १००% क्रोध में होते हैं,यदि पूरी तरह से क्रोध को आप व्यक्त करें तो आप इस स्थिति से जल्द ही बाहर निकल सकते है। जब आप १००%(100 प्रतिशत) किसी भी चीज में होते है, तभी उसका उपभोग कर सकते है,ठीक इसी तरह जब क्रोध को आप पूरी तरह से व्यक्त करेंगे तब ऊर्जा की उछाल का अनुभव करेंगे,और साथ ही तुरंत क्रोध से बाहर निकल जाएंगे। क्या आपने देखा है कि बच्चे कैसे व्यवहार करते हैं? जो भी वे करते हैं, वे 100% करते हैं।अगर वे गुस्से में हैं, तो वे उस पल में 100% गुस्से में हैं, और फिर तुरंत कुछ ही मिनटों के बाद वे उस क्रोध को भी छोड़ देते हैं।अगर वे नाराज हो जाते हैं, तो भी वे थक नहीं जाते हैं।लेकिन अगर आप गुस्सा हो जाते हैं,तो आपका गुस्सा आपको थका देता है।ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है,क्योंकि आप अपना क्रोध 100% व्यक्त नहीं करते हैं।अब इसका मतलब यह नहीं है,कि आप हर समय नाराज हो जाएँ।तब आपको उस परेशानी का भी सामना करना पड़ेगा जिसकी वजह से क्रोध आता है। जब आप किसी भी अनुभव या भावनाओँ के शिखर तक पहुंचते हैं,तो आप दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव करते हैं,क्योंकि यह चेतना का सर्वोत्तम शिखर है।शैलपुत्री का यही वास्तविक अर्थ है।
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ब्रह्मचारिणी
देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी। देवी के इस स्वरूप का संबंध मंगल से है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मंगल ग्रह से जुड़ी समस्त पीड़ाएं दूर हो जाती है। इससे रोग दूर होते हैं और आत्मविश्वास, आत्मबल में वृद्धि होती है।नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना में गहरे नीले (रॉयल ब्लू) रंग का उपयोग लाभदायक रहता हैं।
वृषभ एवम तुला राशि वाले जातक को श्री विद्या में माता षोडशी या माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए।नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा की ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा होती है। मातारानी को को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। देवी को इस दिन पान-सुपाड़ी भी चढ़ाएं।
मां ब्रह्मचारिणी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

वह जिसका कोई आदि या अंत न हो,वह जो सर्वव्याप्त,सर्वश्रेष्ठ है और जिसके पार कुछ भी नहीं।जब आप आँखे बंद करके ध्यानमग्न होते हैं,तब आप अनुभव करते हैं,कि ऊर्जा अपनी चरम सीमा,या शिखर पर पहुँच जाती है,वह देवी माँ के साथ एक हो गयी है और उसी में ही लिप्त हो गयी है। दिव्यता, ईश्वर आपके भीतर ही है, कहीं बाहर नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि, ‘मैं इसे जानता हूँ’, क्योंकि यह असीम है; जिस क्षण ‘आप जान जाते हैं’, यह सीमित बन जाता है और अब आप यह नहीं कह सकते कि, “मैं इसे नहीं जानता”, क्योंकि यह वहां है – तो आप कैसे नहीं जानते? क्या आप कह सकते हैं कि “मैं अपने हाथ को नहीं जानता।” आपका हाथ तो वहां है, है न? इसलिये, आप इसे जानते हैं। और साथ ही में यह अनंत है अतः आप इसे नहीं जानते | यह दोनों अभिव्यक्ति एक साथ चलती हैं। क्या आप एकदम हैरान, चकित या द्वन्द में फँस गए!
      अगर कोई आपसे पूछे कि “क्या आप देवी माँ को जानते हैं ?” तब आपको चुप रहना होगा क्योंकि अगर आपका उत्तर है कि “मैं नहीं जानता” तब यह असत्य होगा और अगर आपका उत्तर है कि “हाँ मैं जानता हूँ” तो तब आप अपनी सीमित बुद्धि से, ज्ञान से उस जानने को सीमा में बाँध रहे हैं। यह ( देवी माँ ) असीमित, अनन्त हैं जिसे न तो समझा जा सकता है न ही किसी सीमा में बाँध कर रखा जा सकता है।“जानने” का अर्थ है कि आप उसको सीमा में बाँध रहे हैं। क्या आप अनन्त को किसी सीमा में बांध कर रख सकते हैं? अगर आप ऐसा सकते हैं तो फिर वह अनन्त नहीं।
     ब्रह्मचारिणी का अर्थ है वह जो असीम, अनन्त में विद्यमान, गतिमान है। एक ऊर्जा जो न तो जड़ न ही निष्क्रिय है, किन्तु वह जो अनन्त में विचरण करती है। यह बात समझना अति महत्वपूर्ण है – एक गतिमान होना, दूसरा विद्यमान होना। यही ब्रह्मचर्य का अर्थ है।इसका अर्थ यह भी है की तुच्छता, निम्नता में न रहना अपितु पूर्णता से रहना। कौमार्यावस्था ब्रह्मचर्य का पर्यायवाची है क्योंकि उसमें आप एक सम्पूर्णता के समक्ष हैं न कि कुछ सीमित के समक्ष। वासना हमेशा सीमित बँटी हुई होती है, चेतना का मात्र सीमित क्षेत्र में संचार। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी सर्व-व्यापक चेतना है।
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चंद्रघंटा
देवी का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजन करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। जीवन में आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम में वृद्धि होती है। भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा के दौरान पीले रंग के कपड़े पहनना अच्छा माना जाता है। देवी दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए। 
गुड़ और लाल सेब भी मैय्या को बहुत पसंद है। ऐसा करने से सभी बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं।मिथुन एवम कन्या राशि वाले जातक को माता भुवनेश्वरी या माता चन्द्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। 
मां चंद्रघण्टा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि चन्द्रमा हमारे मन का प्रतीक है। मन का अपना ही उतार चढ़ाव लगा रहता है। प्राय:, हम अपने मन से ही उलझते रहते हैं – सभी नकारात्मक विचार हमारे मन में आते हैं, ईर्ष्या आती है, घृणा आती है और आप उनसे छुटकारा पाने के लिये और अपने मन को साफ़ करने के लिये संघर्ष करते हैं।   जैसे ही हमारे मन में नकरात्मक भाव, विचार आते हैं तो हम निरुत्साहित, अशांत महसूस करते हैं। हम विभिन्न तरीकों से इनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं पर यह मात्र कुछ समय के लिए ही काम करता है। कुछ समय पश्चात वही विचार फिर हमें घेर लेते हैं और वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहाँ से हमने शुरुआत करी थी। अतः इन विचारों से पीछा छुड़ाने के संघर्ष में न फँसे। ‘चंद्र’ हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है (ठीक वैसे ही जैसे चन्द्रमा घटता व बढ़ता रहता है)। ‘घंटा’ का अर्थ है जैसे मंदिर के घण्टे-घड़ियाल (bell)। आप मंदिर के घण्टे-घड़ियाल को किसी भी प्रकार बजाएँ, हमेशा उसमे से एक ही ध्वनि आती है। इसी प्रकार एक अस्त-व्यस्त मन जो विभिन्न विचारों, भावों में उलझा रहता है, जब एकाग्र होकर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तब ऊपर उठती हुई दैवीय शक्ति का उदय होता है - और यही चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा का अर्थ है।
        एक ऐसी स्थिति जिसमे हमारा अस्त-व्यस्त मन एकाग्रचित्त हो जाता है। अपने मन से भागे नहीं - क्योंकि यह मन एक प्रकार से दैवीय रूप का प्रतीक, अभिव्यक्ति है। यही दैवीय रूप दुःख, विपत्ति, भूख और यहाँ तक कि शान्ति में भी मौजूद है। सार यह कि सबको एक साथ लेकर चलें - चाहे ख़ुशी हो या गम - सब विचारों, भावनाओं को एकत्रित करते हुए एक विशाल घण्टे -घड़ियाल के नाद की तरह। देवी के इस नाम ‘चन्द्रघण्टा/चन्द्रघंटा’ का यही अर्थ है और तृतीय नवरात्रि के उपलक्ष्य में इसे मनाया जाता है।

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कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी के कुष्मांडा स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप सूर्य से संबंधित है। इनकी पूजा से सूर्य ग्रह से मिल रही पीड़ाएं दूर हो जाती है। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। आर्थिक तरक्की होती है।नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी की उपासन के लिए हरे रंग का उपयोग लाभदायक रहेगा।माता के चौथे स्वरूप की उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी के इस रूप की कृपा से निर्णंय लेने की क्षमता में वृद्धि एवं मानसिक शक्ति अच्छी रहती हैं। इस तिथि को मालपुआ का भोग लगाना अच्छा होता हैं। भोग लगाने के बाद उसे बच्चों में वितरित करने से पुण्य फलों में वृद्धि होती हैं।
कूष्माण्डा का संस्कृत में अर्थ होता है लौकी,कद्दू। अब अगर आप किसी को मज़ाक में लौकी, कद्दू पुकारेंगे तो वह बुरा मान जाएंगे और आपके प्रति क्रोधित होंगे।लौकी, कद्दू गोलाकार है।अतः यहाँ इसका अर्थ प्राणशक्ति से है - वह प्राणशक्ति जो पूर्ण, एक गोलाकार, वृत्त की भांति।
मां कूष्माण्डा का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भारतीय परंपरा के अनुसार लौकी, कद्दू का सेवन मात्र ब्राह्मण, महा ज्ञानी ही करते थे। अन्य कोई भी वर्ग इसका सेवन नहीं करता था। लौकी, कद्दू आपकी प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति को बढ़ाते है। लौकी, कद्दू के गुण के बारे में ऐसा कहा गया है, कि यह प्राणों को अपने अंदर सोखती है, और साथ ही प्राणों का प्रसार भी करती है। यह इस धरती पर सबसे अधिक प्राणवान और ऊर्जा प्रदान करने वाली शाक, सब्ज़ी है। जिस प्रकार अश्वथ का वृक्ष २४ घंटे ऑक्सीजन देता है उसी प्रकार लौकी, कद्दू ऊर्जा को ग्रहण या अवशोषित कर उसका प्रसार करते है।
सम्पूर्ण सृष्टि - प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष , अभिव्यक्त व अनभिव्यक्‍त - एक बड़ी गेंद , गोलाकार कद्दू के समान है। इसमें हर प्रकार की विविधता पाई जाता है - छोटे से बड़े तक। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, ‘ष् ’ का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंडा’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला – सृष्टि या ऊर्जा का छोटे से वृहद ब्रह्मांडीय गोला। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का संचार छोटे से बड़े में होता है। यह बड़े से छोटा होता है और छोटे से बड़ा; यह बीज से बढ़ कर फल बनता है और फिर फल से दोबारा बीज हो जाता है। इसी प्रकार, ऊर्जा या चेतना में सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होने की और विशाल से विशालतम होने का विशेष गुण है,जिसकी व्याख्या कूष्मांडा करती हैं,देवी माँ को कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ यह भी है, कि देवी माँ हमारे अंदर प्राणशक्ति के रूप में प्रकट रहती हैं।
       कुछ क्षणों के लिए बैठकर अपने आप को एक कद्दू के समान अनुभव करें। इसका यहाँ पर यह तात्पर्य है कि अपने आप को उन्नत करें और अपनी प्रज्ञा, बुद्धि को सर्वोच्च बुद्धिमत्ता जो देवी माँ का रूप है, उसमें समा जाएँ। एक कद्दू के समान आप भी अपने जीवन में प्रचुरता बहुतायत और पूर्णता अनुभव करें। साथ ही सम्पूर्ण जगत के हर कण में ऊर्जा और प्राणशक्ति का अनुभव करें। इस सर्वव्यापी, जागृत, प्रत्यक्ष बुद्धिमत्ता का सृष्टि में अनुभव करना ही कूष्माण्डा है।

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स्कंदमाता
देवी स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप बुध ग्रह को नियंत्रित करता है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से बुद्धि, ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। कार्य में लाभ प्राप्त होता है।नवरात्रि के पांचवें दिन भूरा (ग्रे) रंग पहनना शुभ माना जाता है।इस बार पांचवें दिन सरस्वती माता की पूजा की जाएगी। इस दिन देवी स्कंदमाता की की गई पूजा से भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। नवरात्र के पांचवे दिन देवी को शारीरिक कष्टों के निवारण के लिए माता का भोग केले का लगाएं फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करें। इस दिन बुद्धि में वृद्धि के लिए माता को मंत्रों के साथ छह इलायची भी चढ़ाएं।
देवी माँ का पाँचवाँ रूप स्कंदमाता के नाम से प्रचलित है। भगवान् कार्तिकेय का एक नाम स्कन्द भी है जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति के एक साथ सूचक है। स्कन्द इन्हीं दोनों के मिश्रण का परिणाम है। स्कन्दमाता वो दैवीय शक्ति है,जो व्यवहारिक ज्ञान को सामने लाती है – वो जो ज्ञान को कर्म में बदलती हैं।
मां स्कंदमाता का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण--
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

शिव तत्व आनंदमय, सदैव शांत और किसी भी प्रकार के कर्म से परे का सूचक है। देवी तत्व आदिशक्ति सब प्रकार के कर्म के लिए उत्तरदायी है। ऐसी मान्यता है कि देवी इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का समागम है। जब शिव तत्व का मिलन इन त्रिशक्ति के साथ होता है तो स्कन्द का जन्म होता है। स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत, आरम्भ का प्रतीक है.इसे हम क्रियात्मक ज्ञान अथवा सही ज्ञान से प्रेरित क्रिया, कर्म भी कह सकते हैं।
       प्रायः ऐसा देखा गया की है कि ज्ञान तो है, किंतु उसका कुछ प्रयोजन या क्रियात्मक प्रयोग नहीं होता। किन्तु ज्ञान ऐसा भी है, जिसका ठोस प्रोयोजन, लाभ है, जिसे क्रिया द्वारा अर्जित किया जाता है। आप स्कूल, कॉलेज में भौतिकी, रसायन शास्त्र पड़ते हैं जिसका प्रायः आप दैनिक जीवन में कुछ अधिक प्रयोग करते। और दूसरी ओर चिकित्सा पद्धति, औषधि शास्त्र का ज्ञान दिन प्रतिदिन में अधिक उपयोग में आता है। जब आप टेलीविज़न ठीक करना सीख जाते हैं तो अगर कभी वो खराब हो जाए तो आप उस ज्ञान का प्रयोग कर टेलीविज़न ठीक कर सकते हैं। इसी तरह जब कोई मोटर खराब हो जाती है तो आप उसे यदि ठीक करना जानते हैं तो उस ज्ञान का उपयोग कर उसे ठीक कर सकते हैं। इस प्रकार का ज्ञान अधिक व्यवहारिक ज्ञान है। अतः स्कन्द सही व्यवहारिक ज्ञान और क्रिया के एक साथ होने का प्रतीक है। स्कन्द तत्व मात्र देवी का एक और रूप है।
    हम अक्सर कहते हैं, कि ब्रह्म सर्वत्र, सर्वव्यापी है, किंतु जब आपके सामने अगर कोई चुनौती या मुश्किल स्थिति आती है, तब आप क्या करते हैं? तब आप किस प्रकार कौनसा ज्ञान लागू करेंगे या प्रयोग में लाएँगे? समस्या या मुश्किल स्थिति में आपको क्रियात्मक होना पड़ेगा। अतः जब आपका कर्म सही व्यवहारिक ज्ञान से लिप्त होता है तब स्कन्द तत्व का उदय होता है। और देवी दुर्गा स्कन्द तत्व की माता हैं।
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कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करता है। मां कात्यायनी की पूजा से बृहस्पति के दुष्प्रभाव दूर होते हैं। जीवन में संयम, धैर्य और प्रसिद्धि में वृद्धि में होती है। नवरात्रि के छठे दिन लोगों को नारंगी (ऑरेंज) रंग के कपड़े पहनने चाहिए।देवी माँ कात्यायनी की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन शहद का भोग लगाकर मां कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है। इस दिन देवी को प्रसन्न करने के लिए शहद और मीठे पान का भोग लगाया जाता हैं। सूक्ष्म जगत जो अदृश्य, अव्यक्त है, उसकी सत्ता माँ कात्यायनी चलाती हैं। वह अपने इस रूप में उन सब की सूचक हैं, जो अदृश्य या समझ के परे है। माँ कात्यायनी दिव्यता के अति गुप्त रहस्यों की प्रतीक हैं।
मां कात्यायनी का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण --
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

क्रोध किस प्रकार से सकारात्मक बल का प्रतीक है और कब यह नकारात्मक आसुरी शक्ति का प्रतीक बन जाता है ? इन दोनों में तो बहुत गहरा भेद है। आप सिर्फ़ ऐसा मत सोचिये कि क्रोध मात्र एक नकारात्मक गुण या शक्ति है। क्रोध का अपना महत्व, एक अपना स्थान है। सकारात्मकता के साथ किया हुआ क्रोध बुद्धिमत्ता से जुड़ा होता है,और वहीं नकारात्मकता से लिप्त क्रोध भावनाओं और स्वार्थ से भरा होता है। सकारात्मक क्रोध एक प्रौढ़ बुद्धि से उत्पन्न होता है। क्रोध अगर अज्ञान, अन्याय के प्रति है तो वह उचित है। अधिकतर जो कोई भी क्रोधित होता है वह सोचता है कि उसका क्रोध किसी अन्याय के प्रति है अतः वह उचित है! किंतु अगर आप गहराई में, सूक्ष्मता से देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ऐसा वास्तव में नहीं है। इन स्थितियों में क्रोध एक बंधन बन जाता है। अतः सकारात्मक क्रोध जो अज्ञान, अन्याय के प्रति है, वह माँ कात्यायनी का प्रतीक है।
       आपने बहुत सारी प्राकृतिक आपदाओं के बारे में सुना होगा। कुछ लोग इसे प्रकृति का प्रकोप भी कहते हैं। उदाहरणतः बहुत से स्थानों पर बड़े - बड़े भूकम्प आ जाते हैं या तीव्र बाढ़ का सामना करना पड़ता है। यह सब घटनाएँ देवी कात्यायनी से सम्बन्धित हैं। सभी प्राकृतिक विपदाओं का सम्बन्ध माँ के दिव्य कात्यायनी रूप से है। वह क्रोध के उस रूप का प्रतीक हैं जो सृष्टि में सृजनता, सत्य और धर्म की स्थापना करती हैं। माँ का दिव्य कात्यायनी रूप अव्यक्त के सूक्ष्म जगत में नकारात्मकता का विनाश कर धर्म की स्थापना करता है। ऐसा कहा जाता है कि ज्ञानी का क्रोध भी हितकर और उपयोगी होता है,जबकि अज्ञानी का प्रेम भी हानिप्रद हो सकता है। इस प्रकार माँ कात्यायनी क्रोध का वो रूप है, जो सब प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
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कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप शनि ग्रह से संबंधित है। इसलिए सप्तम दिन पूजन करने से शनि की पीड़ा शांत होती है। शनि की साढ़ेसाती, ढैया आदि के दुष्प्रभाव कम होते हैं। नवरात्रि के सातवें दिन सफेद रंग कि कपड़े पहनने चाहिए।
मां कालरात्रि  का यह मंत्र करेगा आपका कल्याण---
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

यह माँ का अति भयावह व उग्र रूप है। सम्पूर्ण सृष्टि में इस रूप से अधिक भयावह और कोई दूसरा नहीं। किन्तु तब भी यह रूप मातृत्व को समर्पित है। देवी माँ का यह रूप ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है।माँ कालरात्रि की पूजा भूत-प्रेतों से मुक्ति दिलवाने वाली होती हैं।देवी कालरात्रि की उपासना करने से सभी दुख दूर होते हैं। इस दिन माता को गुड़ के नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए । नकारात्मक शक्तियों से बचने के लिए आप गुड़ का भोग लगा सकते हैं। इसके अलावा नींबू काटकर भी मां को अर्पित कर सकते हैं।
सिंह राशि वाले जातक को माता पीताम्बरा या माता कालरात्रि की उपासना करनी चाहिए।
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महागौरी
देवी का आठवां स्वरूप महागौरी है। इनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। देवी का यह स्वरूप राहु को नियंत्रित करता है। राहू की पीड़ा होने पर जातक का जीवन अव्यवस्थित हो जाता है। महागौरी की पूजा से राहु शांत होता है। दुर्गा मां की आठवें दिन की पूजा गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए।
मां महागौरी का यह मंत्र करेें आपका कल्याण--
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्र के आंठवें दिन महागौरी के स्वरूप का वंदन किया जाता है। इस दिन नारियल का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि आती है। मां के इस रूप को नारियल का भोग लगाया जाता हैं। इस भोग से संतान सुख की प्राप्ति होती हैं। महागौरी की पूजा करने के बाद पूरी, हलवा और चना कन्याओं को खिलाना शुभ माना जाता है। इनकी पूजा से संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
महागौरी का अर्थ है - वह रूप जो कि सौन्दर्य से भरपूर है, प्रकाशमान है - पूर्ण रूप से सौंदर्य में डूबा हुआ है। प्रकृति के दो छोर या किनारे हैं - एक माँ कालरात्रि जो अति भयावह, प्रलय के समान है, और दूसरा माँ महागौरी जो अति सौन्दर्यवान, देदीप्यमान,शांत है - पूर्णत: करुणामयी, सबको आशीर्वाद देती हुईं। यह वो रूप है, जो सब मनोकामनाओं को पूरा करता है।
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सिद्धिदात्री--
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। 
देवी का नवम स्वरूप सिद्धिदात्री केतु ग्रह को नियंत्रित करता है। इनकी पूजा से केतु ग्रह के दुष्प्रभावों से राहत मिलती है। कर्क,धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि वालों को भी माता कमल/काली या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।इन सभी  राशि वाले जातक को कमला या माता सिद्धिदात्री की उपासना करने से सफलता मिलती हैं। इनकी पूजा आसमानी रंग (हल्के नील रंग) के कपड़े पहनकर करना शुभ माना जाता है।
नवरात्र के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री को जगत को संचालित करने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन माता को हलवा, पूरी, चना, खीर, पुए आदि का भोग लगाएं।कोई भी अनहोनी से बचने के लिए इस दिन मां के भोग में अनार को शामिल किया जाता हैं।
यह मन्त्र करेगा आपका कल्याण--
नवरात्रि का नौवां दिन--
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

हमारी प्रार्थना हैं कि ...
देवी महागौरी आपको भौतिक जगत में प्रगति के लिए आशीर्वाद और मनोकामना पूर्ण करती हैं, ताकि आप संतुष्ट होकर अपने जीवनपथ पर आगे बढ़ें। माँ सिद्धिदात्री आपको जीवन में अद्भुत सिद्धि, क्षमता प्रदान करती हैं ताकि आप सबकुछ पूर्णता के साथ कर सकें। सिद्धि का क्याअर्थ है? सिद्धि, सम्पूर्णता का अर्थ है – विचार आने से पूर्व ही काम का हो जाना। आपके विचारमात्र, से ही, बिना किसी कार्य किये आपकी इच्छा का पूर्ण हो जाना यही सिद्धि है।  आपके वचन सत्य हो जाएँ और सबकी भलाई के लिए हों। आप किसी भी कार्य को करें वो सम्पूर्ण हो जाए - यही सिद्धि है। सिद्धि आपके जीवन के हर स्तर में सम्पूर्णता प्रदान करती है। यही देवी सिद्धिदात्री की महत्ता है।

शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग में

Auspicious-beginning-of-Sharadiya-Navratri-in-Sarvarthasiddhi-Yoga-and-Amritasiddhi-Yoga-2019-शारदीय नवरात्रि का शुभ आरंभ वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग एवं अमृतसिद्धि योग मेंइस वर्ष शारदीय नवरात्रि 29 सितंबर 2019 से शुरु होने जा रहे हैं। हिंदू धर्म के लोगों के लिए ये पूजा अर्चना के विशेष दिन होते हैं। इन दिनों मां दुर्गा के विभिन्न  स्वरूपों की उपासना की जाती है। नवरात्रि के इन में 9 दिनों तक माता दुर्गा के 9 स्वरूपों की आराधना करने से जीवन में ऋद्धि-सिद्धि ,सुख- शांति, मान-सम्मान, यश और समृद्धि की प्राप्ति शीघ्र ही होती है। माता दुर्गा हिन्दू धर्म में आद्यशक्ति  के रूप में सुप्रतिष्ठित है तथा माता शीघ्र फल प्रदान करनेवाली देवी के रूप में लोक में प्रसिद्ध है। देवीभागवत पुराण के अनुसार आश्विन मास में माता की पूजा-अर्चना व नवरात्र व्रत करने से मनुष्य पर देवी दुर्गा की कृपा सम्पूर्ण वर्ष बनी रहती है और मनुष्य का कल्याण होता है। 
   हमारे देश में शारदीय (आश्विन) नवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है, इस समय देश के लगभग सभी छोटे-बड़ें शहरो, गांवों में माँ दुर्गा की मृतिका से बनी प्रतिमा का अस्थाई स्थापना करके पूजा आराधना की जाती है। शरद ऋतु की इस आश्विन नवरात्रि को माँ दुर्गा की असुरों पर विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है, इसलिए नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरुपों की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी राज्यों सहित सभी क्षेत्रों में धूम-धाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में देवी दुर्गा के भक्त नौ दिनों उपवास रखते हैं तथा माता की चौकी स्थापित की जाती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों को बहुत पावन माना जाता है। इन दिनों घरों में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि चीज़ों का परहेज़ कर सात्विक भोजन किया जाता है। नौ दिन उपवास के बाद नवमी या दसवीं पूजन किया जाता है जिसमें कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करके नौ दिनों तक देवी दुर्गा की आराधना और व्रत का संकल्प लिया जाता है। नवरात्रि के दिनों में चारों ओर माता की चौकी और जगराते कर भजन कीर्तन किया जाता है।
इस बार की नवरात्रि में किसी बीजो तिथि का क्षय नहीं है।  8 अक्टूबर 2019 को विजयादशमी है इसी दिन नवरात्रि पूजन का समापन होगा। नवरात्र में लोग अपने घरों में कलश की स्थापना करते हैं।  
यह रहेंगी शरद नवरात्रि की तिथियां --
  1. नवरात्रि प्रथम दिन 1 (प्रतिपदा) को देवी की अस्थाई मूर्ति की स्थापना, घटस्थापना (कलश स्थापना) होगी। पहले दिन माँ शैलपुत्री की होगी। 29 सितंबर 2019 (रविवार) को
  2. नवरात्रि दिन 2 (द्वितीया) मां ब्रह्मचारिणी पूजा, 30 सितंबर 2019 (सोमवार)
  3. नवरात्रि दिन 3 (तृतीया) मां चंद्रघंटा पूजा, 1 अक्टूबर 2019, (मंगलवार)
  4. नवरात्रि दिन 4 (चतुर्थी) मां कूष्मांडा पूजा, 2 अक्टूबर 2019 (बुधवार)
  5. नवरात्रि दिन 5 (पंचमी) मां स्कंदमाता पूजा, 3 अक्टूबर 2019 (गुरुवार)
  6. नवरात्रि दिन 6 (षष्ठी‌) मां कात्यायनी पूजा, 4 अक्टूबर 2019 (शुक्रवार)
  7. नवरात्रि दिन 7 (सप्तमी) मां कालरात्रि पूजा, 5 अक्टूबर 2019 (शनिवार)
  8. नवरात्रि दिन 8 (अष्टमी) मां महागौरी, दुर्गा महा अष्टमी पूजा, दुर्गा महा नवमी पूजा 6 अक्टूबर 2019, (रविवार)
  9. नवरात्रि दिन 9 (नवमी) मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारणा 7 अक्टूबर 2019, (सोमवार) को किया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के नवमें दिन माँ सिद्धदात्री की आयुध पूजा, नवमी हवन, नवरात्रि पारण आदि संपन्न होगा। घट विसर्जन भी इसी दिन किया जा सकता है।
  10. नवरात्रि दिन 10 (दशमी) दुर्गा विसर्जन, विजय दशमी (दशहरे का महापर्व) का पर्व 8 अक्टूबर 2019, (मंगलवार) को मनाया जाएगा।शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन दशमी तिथि को माँ दुर्गा की विदाई एवं अस्थाई रूप से स्थापित मूर्ति विसर्जन होगा। 

नवरात्रि कलश स्थापना समय और पूजा विधि, सामग्री --
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना से होती है।इस साल कलश स्थापना का मुहूर्त 29 सितंबर 2019 को सुबह 6 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।आप इस1 घंटे 24 मिनट के बीच घटस्थापना या कलश स्थापना कर सकते हैं। इसे शुभ मुहूर्त पर करना अनिवार्य है।अगर आप इस मुहूर्त में कलश स्थापना ना कर पायें तो फिर घटस्थापना अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा उसमें कर सकते हैं। कलश स्थापना के लिए तड़के सुबह उठकर सुबह स्नान कर साफ सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 
‘शारदीय नवरात्र’ के व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए। पूजा करने के उपरान्त इस मंत्र द्वारा माता की प्रार्थना करना चाहिए-

"विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमांश्रियम्| रूपंदेहि जयंदेहि यशोदेहि द्विषोजहि ||"

पंचांग के अनुसार 29 सितंबर 2019 को यानी नवरात्र के पहले दिन रात 10.11 मिनट तक प्रतिपदा है। जिस कारण कलश स्थापना का लंबा समय मिलेगा। यानी कि नवरात्रि के पहले दिन कभी भी कलश की स्थापना की जा सकती है। लेकिन कलश स्थापना के लिए प्रात:काल का समय सबसे उत्तम रहेगा।
दुर्गा पूजन सामग्री-
पंचमेवा पंच​मिठाई रूई कलावा, रोली, सिंदूर, १ नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग,  पान के पत्ते 5 , घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, शर्करा ), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी की गांठ , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, , आरती की थाली. कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, ​तिल, सुवर्ण प्र​तिमा 2, आभूषण व श्रृंगार का सामान, फूल माला . दुर्गा पूजन शुरू करने से पूर्व चौकी को धोकर माता की चौकी सजायें।

पूजन और संकल्प की तैयारी --
आसन बिछाकर गणपति एवं दुर्गा माता की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं. इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें 
 “ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥” 

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें – 
ॐ केशवाय नम: ॐ नारायणाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ गो​विन्दाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-

ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। 
त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ 
शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए. अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें- 
चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्,
आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।

दुर्गा पूजन हेतु संकल्प –
पंचोपचार करने बाद संकल्प करना चाहिए. संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें :
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य  ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2072, तमेऽब्दे कीलक नाम संवत्सरे दक्षिणायने शरद ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे आश्विन मासे शुक्ल पक्षे प्र​तिपदायां तिथौ गुरु वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये। 
गणपति पूजन –
किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है.हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें. 
गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। 
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।
आवाहन: हाथ में अक्षत लेकर
आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र ​विनायक।
तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥

ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर अक्षत गणेश जी पर चढा़ दें। हाथ में फूल लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आसनं समर्पया​मि, अर्घा में जल लेकर बोलें ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पया​मि, आचमनीय-स्नानीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पया​मि वस्त्र लेकर ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः वस्त्रं समर्पया​मि, यज्ञोपवीत-ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पया​मि, पुनराचमनीयम्, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः  रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम्  ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः , इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं. इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः, दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं.।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः इदं नानाविधि नैवेद्यानि समर्पयामि, मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र- शर्करा खण्ड खाद्या​नि द​धि क्षीर घृता​नि च,
आहारो भक्ष्य भोज्यं गृह्यतां गणनायक। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें. इदं आचमनीयं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः . इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें- ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः ताम्बूलं 
समर्पया ​मि अब फल लेकर गणपति पर चढ़ाएं ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः फलं समर्पया​मि, ॐ श्री ​सिद्धि ​विनायकाय नमः द्रव्य द​क्षिणां समर्पया​मि, अब ​विषम संख्या में दीपक जलाकर ​निराजन करें और भगवान की आरती गायें। हाथ में फूल लेकर गणेश जी को अ​र्पित करें,  ​फिर तीन प्रद​क्षिणा करें। 
इसी प्रकार से अन्य सभी देवताओं की पूजा करें. जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश के स्थान पर उस देवता का नाम लें. 
कलश पूजन – 
घड़े या लोटे पर कलावा बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें, नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें,हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आवाहन करें. ॐ त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानोहर्विभि:। अहेडमानोवरुणेह बोध्युरुशं समानऽआयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि,
ॐ भूर्भुव: स्व: भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।
इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण देवता की पूजा करें.  
दुर्गा पूजन-
सबसे पहले माता दुर्गा का ध्यान करें-
सर्व मंगल मागंल्ये ​शिवे सर्वार्थ सा​धिके ।
शरण्येत्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
आवाहन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहया​मि॥
आसन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आसानार्थे पुष्पाणि समर्पया​मि॥
अर्घ्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हस्तयो: अर्घ्यं समर्पया​मि॥
आचमन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आचमनं समर्पया​मि॥
स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। स्नानार्थं जलं समर्पया​मि॥
स्नानांग आचमन- स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पया​मि।
पंचामृत स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पंचामृतस्नानं समर्पया​मि॥
गन्धोदक-स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। गन्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
शुद्धोदक स्नान- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। शुद्धोदकस्नानं समर्पया​मि॥
आचमन- शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि।
वस्त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। वस्त्रं समर्पया​मि ॥ वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पया​मि। 
सौभाग्य सू़त्र- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सौभाग्य सूत्रं समर्पया​मि ॥
चन्दन- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। चन्दनं समर्पया​मि ॥
ह​रिद्राचूर्ण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ह​रिद्रां समर्पया​मि ॥
कुंकुम- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कुंकुम समर्पया​मि ॥ 
​सिन्दूर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ​सिन्दूरं समर्पया​मि ॥
कज्जल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कज्जलं समर्पया​मि ॥
दूर्वाकुंर- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दूर्वाकुंरा​नि समर्पया​मि ॥
आभूषण- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आभूषणा​नि समर्पया​मि ॥
पुष्पमाला- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पुष्पमाला समर्पया​मि ॥
धूप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। धूपमाघ्रापया​मि॥ 
दीप- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दीपं दर्शया​मि॥ 
नैवेद्य- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। नैवेद्यं ​निवेदया​मि॥
नैवेद्यान्ते ​त्रिबारं आचमनीय जलं समर्पया​मि।
फल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। फला​नि समर्पया​मि॥
ताम्बूल- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ताम्बूलं समर्पया​मि॥
द​क्षिणा- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। द​क्षिणां समर्पया​मि॥
आरती- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आरा​र्तिकं समर्पया​मि॥
क्षमा प्रार्थना--
न मंत्रं नोयंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥1॥                            
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥2॥                         
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥3॥                          
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति ॥4॥                         
परित्यक्तादेवा विविध​विधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदर जननि कं यामि शरण् ॥5॥              
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥6॥    
                    
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥7॥                            
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः ॥8॥                         
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥9॥                                    
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥10॥                                       
जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि ।
अपराधपरंपरावृतं नहि मातासमुपेक्षते सुतम् ॥11॥                                                     
मत्समः पातकी नास्तिपापघ्नी त्वत्समा नहि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवियथायोग्यं तथा कुरु  ॥12॥

इस बार शारदीय नवरात्रि के 9 दिनों में 8 दिन विशेष योग बनेंगे। जिसकी वजह से नवरात्रि की पूजा काफी शुभ और फलदायी होगी। 2 दिन अमृतसिद्धि, 2 दिन सर्वार्थ सिद्धि और 2 दिन रवि योग बनेंगे। नवरात्रि के यह 9  दिन शक्ति की उपासना के लिए बेहद शुभ होते हैं। ये देश में खुशहाली के संकेत हैं। नवरात्रि का प्रारम्भ सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग जैसे बेहद विशेष संयोग में हो रहा है।
जानिए किस तारीख को क्या योग बनेगा--
  • 30 सितंबर 2019 को अमृत सिद्धि योग 
  • 1 अक्टूबर को रवि योग 
  • 2 अक्टूबर को अमृत और  सिद्धि योग
  • 3 अक्टूबर को सर्वार्थ सिद्धि 
  • 4 अक्टूबर को रवि योग
  • 5 अक्टूबर को रवि योग
  • 6 अक्टूबर को सर्वसिद्धि योग रहेगा।
  • इस वर्ष 2019 में  7 अक्टूबर 2019 को महानवमी दोपहर 12.38 तक रहेगी। इसके बाद दशमी यानी दशहरा होगा।
  • दशहरा या विजयदशमी  8 अक्टूबर 2019 को दोपहर 14 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। यह बहुत ही शुभ सयोग है।

जानिए नवरात्रि में दो सोमवार का महत्व--
9 दिन की नवरात्रि में इस वर्ष दो सोमवार  आ रहे हैं। यह अत्यंत शुभ संयोग है क्योंकि सोमवार को दुर्गा पूजा का हजार, लाख गुना नहीं बल्कि करोड़ गुना फल मिलता है। चूंकि सोमवार का स्वामी चन्द्रमा है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को सोम कहा गया है और भगवान शिव को सोमनाथ। अतः सोमवार के दिन शक्ति की अनेक प्रकार के गन्ध, पुष्प,धूप, दीप, नैवेद्यादि उपचारों से पूजन करने से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।
शारदीय नवरात्रि 2019..
अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 29 सितंबर 2019 (रविवार) से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहा है। इस वर्ष किसी तिथि का क्षय नहीं है, इसलिए पहली बार कलश स्थापित कर माता की आराधना करने वाले भक्तों के लिए इस बार का नवरात्र हर तरह से शुभकारी है। 29 सितंबर (रविवार) को विधि विधान से कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा का आवाह्न होगा। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार इस वर्ष कलश स्थापना के लिए बहुत ही शुभ नक्षत्र ओर याेग का संयाेग बन रहा है। हस्त नक्षत्र से युक्त अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा कलश स्थापना के लिए सर्व मंगलकारी है। 
     28 सितंबर (शनिवार)की रात 11:14 बजे से हस्त नक्षत्र शुरू हाे रहा है, जाे 29 की रात 9:40 बजे तक है। रविवार काे ब्रह्म मुहूर्त से दिन के 2:08 (दोपहर)बजे तक एक साथ ब्रह्म, सर्वार्थ सिद्धि और अमृत याेग है। इसके अलावा कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि पड़ रही है। नक्षत्र, याेग और राशि के हिसाब से सुबह से लेकर दाेपहर 2 बजे तक कलश स्थापन करना अत्यंत शुभ लाभ प्रद है।
     ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि की इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर मां दुर्गा का आगमन हर तरह से शुभ है क्योंकि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर हाे रहा है। हाथी पर माता का आगमन बारिश और उन्नत कृषि के साथ सुख-समृद्धि का प्रतीक है।  मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। इस कारण अधिक बारिश होगी। साथ ही अनाज की पैदावार भी अधिक होगी। किसान खुशहाल होंगे। देश की राजनीति में उथल-फुथल हो सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की शक्ति बढ़ेगी। 
मां दुर्गा का आने-जाने का मिश्रित फल के अनुसार स्थिति सामान्य रहेगा।
उल्लेखनीय हैं कि वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार मां की सवारी दिन के हिसाब से तय होती है– 
  • - सोमवार को मां की सवारी : हाथी।
  • - मंगलवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - बुधवार को मां की सवारी : नाव।
  • - गुरूवार को मां की सवारी : डोली।
  • - शुक्रवार को मां की सवारी : डोली।
  • – शनिवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
  • - रविवार को मां की सवारी : हाथी।

  1. 6 अक्टूबर 2019 काे (रविवार) संधि पूजा हाेगी। 
  2. इस दिन दोपहर के 14.15 बजे तक महाअष्टमी और इसके बाद महानवमी शुरू हाे जाएगी। 
  3. 6 अक्टूबर काे दोपहर में दिन के दाे बजे से संधि पूजा हाेगी। इसी दिन कन्या पूजन भी हाेगी। 
  4. इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर किसी भी तिथि का लाेप नहीं है। 7 अक्टूबर (सोमवार) काे दोपहर में दिन के 15:04 बजे तक महानवमी है। जाे लाेग घराें में कलश स्थापित कर मां की अराधना करेंगे, वे नवमी तिथि समाप्त हाेने से पहले हवन का कार्य संपन्न करेंगे।

मध्यप्रदेश की प्राचीन एवं पौराणिक नगरी उज्जैन में स्थित ऋणमुक्तेश्वर मंदिर का प्रभाव और महत्व

मान्यता है कि ऋणमुक्तेश्वर महादेव के पूजन से किसी भी प्रकार का ऋण भार, पितृ ऋण व अन्य ऋण का जल्द निराकरण हो जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि प्रचलित दन्त कथानुसार शिप्रा नदी के तट पर स्थित वट वृक्ष के नीचे सत्यवादी राजा हरीशचंद्र ने कुछ समय तक तप किया था। उन्हें एक गेंडे के भार इतना सोना ऋषि विश्वामित्र को दान करना था, वह भी तब जब अपना राजपाट पहले ही दान कर चुके थे। इसके बाद विश्वामित्र ने यह दान मांगा था। राजा हरीशचंद्र के स्त्री-बच्चे बिकने के बाद भी यह दान पूर्ण नहीं हो रहा था। यहां वटवृक्ष के नीचे ऋणमुक्तेश्वर महादेव का लिंग स्थित है। राजा ने इसकी पूजा कर वर प्राप्त कर ऋण मुक्त हो गए थे। बाद में इन्हें सुख-वैभव और राजपाट मिल गया था। उज्जैन अवंतिका तीर्थ धाम होने से इस मंदिर में दर्शन कर ही मनुष्य ऋण से मुक्त हो जाता है।
      विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर की नगरी उज्जयिनी (उज्जैन) में मंदिरों की इस श्रृंखला में ऋणमुक्तेश्वर महादेव का अति प्राचीन मंदिर में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में यहां आकर दर्शनार्थी पूजा अर्चना कर विभिन्न ऋणों से मुक्त होने की प्रार्थना करते हैं। उनकी मनोकामना पूरी भी होती है। शहर से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर मोक्षदाईनी क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। यहां प्रति शनिवार को पीली पूजा का बड़ा महत्व है। पीला पूजा से तात्पर्य पीले वस्त्र में चने की दाल, पीला पुष्प, हल्दी की गांठ और थोड़ा सा गु़ड़ बांधकर जलाधारी पर अपनी मनोकामना के साथ अर्पित करना है।
Impact-and-importance-of-the-rin-Mukteshwar-temple-in-Ujjain-मध्यप्रदेश की प्राचीन एवं पौराणिक नगरी उज्जैन में स्थित ऋणमुक्तेश्वर मंदिर का प्रभाव और महत्व       ज्योतिष शास्त्र में कर्ज उतारने के लिये कई उपायों को बताया गया है लेकिन मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुराण प्रसिद्ध ऋण मुक्तेश्वर महादेव की आराधना की जाये या उनके दर्शन ही कर लिये जाये तो ऋण से मुक्ति मिल जाती है।वाल्मीकि धाम क्षेत्र में ऋणमुक्तेश्वर मंदिर स्थित है। मान्यता है कि यह अनादि है। यहां दूर-दूर से भक्त मनोकामना लेकर आते हैं। मान्यता है कि भगवान ऋणमुक्तेश्वर के पूजन से ऋण से मुक्ति मिलती है। पुराणोक्त मान्यता है कि जिस वट वृक्ष के नीचे बैठकर आकाशवाणी सुनकर सत्यवादी राजा हरीशचंद्र, ऋषि विश्वामित्र को दक्षिणा देकर ऋण मुक्त हुये थे वहीं पर राजा हरीशचंद्र ने शिवलिंग स्थापित किया था और उनका नाम ऋण मुक्तेश्वर महादेव हो गया।  
     भगवान शिव ने राजा को यह वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति यहां दर्शन करने के साथ अभिषेक और पीली पूजन करेगा वह ऋण मुक्त तो होगा ही वहीं अन्य सभी तरह की चिंता से भी उसे मुक्ति मिल जायेगी।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की यदि किसी को ऋण से बहुत परेशानी है तो उसे एक बार उज्जैन आकर ऋण मुक्तेश्वर महादेव की पूजन अर्चन जरूर करना चाहिये।
चने की दाल से पूजन
  • कोई भी ऋण स्वर्ण से चुकाया जा सकता है। लेकिन सोने के अभाव मॆ जो भी व्यक्ति चने की दाल जो की देवगुरु ग्रह की वस्तु है।
  • गुरु ग्रह से  सम्बन्धित (सोना, हल्दी, केसर, चना दाल) अपने गुरु का नाम स्मरण कर गणेश गौरी नवग्रह मंडल का पूजन कर अपने नाम कुल,गोत्र का स्मरण कर पूजन करने से भी जातक के सभी प्रकार के भारी से भारी ॠणों का नाश होता है। 
  • भगवान शिव का यह धाम इस कलयुग के ऋणग्रस्त जीवों के लिये सभी तरह से कल्याणकारी है।


जानिए वास्तु अनुसार कैसा हो भवन निर्माण

Know-how-building-should-be-according-to-Vastu-जानिए वास्तु अनुसार कैसा हो भवन निर्माणवास्तु सिद्धांत के अनुसार किसी भी तरह का मकान, फैक्ट्री, दुकान बनवाते समय सबसे महत्वपूर्ण होता है कि इनका मुख्यद्वार किस ओर, किस दिशा एवं किस स्थान पर होना चाहिए। मुख्य द्वार की दिशा का निर्धारण वस्तुतः भूखण्ड के मार्ग के अनुसार किया जाता है परंतु उस दिशा में कौन सा भाग मुख्य द्वार के लिए उपयुक्त है यह वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में वर्णित है। मकान निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहले मकान का नक्शा तैयार किया जाता है अर्थात मकान किस दिशा में होना चाहिए तथा कौन सा कक्ष किस आकार का बनना चाहिए इस पर विचार किया जाता है लेकिन मकान बनाने की प्रक्रिया से पहले उस मकान का मुख्यद्वार किस दिशा में होना चाहिए इसके विषय में विचार किया जाता है।  
मकान के मुख्यद्वार का निर्माण- 
मकान का नक्शा बनाते समय सबसे पहले उसका मुख्यद्वार निर्धारित किया जाता है। प्रवेश निर्धारण की मुख्य विधि के अनुसार भूखण्ड की जिस दिशा में मुख्यद्वार का निर्माण करना हो उस दिशा की भुजा को नौ भागों में विभाजित करके पांच भाग दाहिनी ओर से, तीन भाग बाईं ओर से छोड़कर बचे भाग में द्वार बनाना चाहिए।
      वास्तुशास्त्र में प्रत्येक भूखण्ड एवं भवन में कुछ स्थान शुभ होने के कारण ग्राह्या एवं कुछ स्थान अशुभ होने के कारण त्याज्य माने जाते रहे हैं। सामने दिए गए चित्र में भूखण्ड की चारों भुजाओं को नौ भागों में बांटा गया है। अग्रांकित चित्र में विभिन्न भागों के लिए एक विशेष अंक प्रदान किया जाता है।
इस अंक के स्थान पर मुख्यद्वार बनवाने का फल निम्नानुसार होता हैः-
अंक             फल
1                रोगभय
2               शत्रुवृद्धि
3               धनलाभ
4            विपुल धनप्राप्ति
5.        धर्म एवं सदाचार वृद्धि
6                पुत्र वैर
7.              स्त्रीदोष
8.              निर्धनता
9               अग्निभय
10            कन्यावृद्धि
11             धनलाभ
12           राजसम्मान
13           क्रोध से हानि
14        झूठ बोलने की आदत
15             क्रूर व्यवहार
16        चोरी से हानि का भय
17          संतान की हानि
18       सेवक प्रवृत्ति, अर्थहानि
19          अनुचित प्रवृत्ति
20              पुत्रलाभ
21            भय, मृत्यु
22             निर्धनता
23             निर्धनता
24        वंश पराक्रम हानि
25       अल्पायु एवं निर्धनता
26             व्यर्थ व्यय
27             धनहानि
28             धनवृद्धि
29          योगक्षेम प्राप्ति
31           सामान्य फल
32             पाप संचय

इन तालिका का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि मुख्यद्वार के लिए उचित स्थान 11-12, 28-29, 3-4-5 हैं परंतु हमारा भूखण्ड दक्षिण दिशा की ओर हो तो 20 पर भी मुख्यद्वार का निर्माण कराया जा सकता है।
प्रत्येक भूखण्ड के चारों ओर चार दिशाएं होती है- पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण। वास्तुशास्त्र में लिखा है कि भूखण्ड की पूर्वी दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर ईशान कोण तक का स्थान उत्तम होता है। इस स्थान पर वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण करने से परिवार में सुखों का आगमन होता है। पूर्व के बीच वाले स्थान से आग्नेय कोण तक का स्थान निम्नकोटि का होता है। भूखण्ड के पश्चिम दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर वायव्य कोण तक का स्थान उत्तम गुणों से पूर्ण माना है। पश्चिम दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर नैऋत्य कोण तक का स्थान निम्न गुणों वाला माना गया है। अतः वास्तुशास्त्र में भूखण्ड की उत्तरी दिशा के बीच भाग से लेकर ईशान कोण तक, पूर्व दिशा के बीच से लेकर ईशान कोण तक, दक्षिण दिशा के बीच भाग से आग्नेय कोण तक तथा पश्चिम दिशा के बीच भाग से लेकर वायव्य कोण तक का भाग उत्तम गुणों वाला माना गया है। उत्तर दिशा के बीच वाले भाग से वायव्य कोण तक, पूर्व के बीच भाग से आग्नेय कोण तक तथा दक्षिण दिशा एवं पश्चिम दिशा के बीच भाग से नैऋत्य कोण तक का भाग निम्न गुणों वाला माना गया है।
 उच्चकोटि के मुख्यद्वार- 
वास्तुशास्त्र में भूखण्ड के उत्तर दिशा में ईशान कोण की ओर मुख्यद्वार बनवाना उत्तम होता है। उत्तर दिशा के ईशान कोण वाले स्थान पर मुख्यद्वार बनवाने से इस मकान में रहने वाले को अनेक प्रकार से लाभ मिलता है। भूखण्ड के उत्तर दिशा के ईशान कोण में मुख्यद्वार बनाना चाहिए तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारी सामान रखवाना चाहिए। अतः उत्तर एवं पूर्व दिशा वाला स्थान दक्षिण एवं पश्चिम वाले स्थान से हल्का होता है। वास्तुशास्त्र का आधारभूत नियम है जो कि अत्यंत शुभफलदायक होता है।
भूखण्ड के पूर्व दिशा के ईशान कोण में बनाया गया मुख्यद्वार उच्चकोटि का होता है। इस दिशा में मुख्यद्वार होने से इसमें रहने वाले लोग बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान होते हैं। पूर्व दिशा के ईशान कोण में मुख्यद्वार होने से भारी सामान दक्षिण दिशा में रखा जाता है और आने-जाने का रास्ता उत्तर की ओर होता है जोकि शुभफलदायक होता है। 
भूखण्ड के पश्चिमी वायव्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार उच्चकोटि का होता है। इस कोण में मुख्यद्वार बनाना शुभ फलदायी एवं कल्याणकारी होता है।
निम्नकोटि के मुख्यद्वार-
भूखण्ड के पूर्व आग्नेय कोण में बनाया गया मुख्यद्वार निम्नकोटि का होता है। पूर्वी आग्नेय कोण में द्वार बनाने के परिणाम अच्छे नहीं होते हैं अतः पूर्वी आग्नेय कोण में द्वार कभी न बनवाएं।
भूखण्ड के उत्तरी वायव्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार निम्नकोटि का होता है। इस कोण में मुख्यद्वार बनाने से मकान में निवास करने वालों की मनोस्थिति हमेशा अस्थिर एवं चंचल बनी रहती है। अतः उत्तरी वायव्य कोण में द्वार कभी न बनवाएं।
मुख्यद्वार संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles related to main gate or door-
  1. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान के पश्चिमी ओर बने कक्ष में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कक्ष के उत्तरी अर्द्धभाग की ओर पड़े इससे मुख्यद्वार प्रभावी स्थिति में होगा और धन-धान्य समृद्धि की वृद्धि होती रहेगी।
  2. भूखण्ड चारदीवारी का मुख्यद्वार यदि दक्षिण में हों तो मकान का मुख्यद्वार घर के दक्षिणी ओर के कमरा में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कमरे के पूर्वी अर्द्धभाग में पड़े। यह स्थिति मकान के निवासियों के लिए शुभफलदायक रहेगी।
  3. मकान में द्वार बनवाते समय ध्यान रखें कि द्वार की चौखटें मकान की मुख्य दीवार से लगती हुई न हों। दीवार और द्वार की चौखट के बीच कम से कम चार इंच का अंतर अवश्य ही रहना चाहिए।
  4. द्वार में लगाए गए दरवाजें दो पल्लों वाले एवं अंदर की ओर खुलने वाले होने चाहिए।
  5. मकान के अंदर द्वार, खिड़कियां तथा अलमारियां एक-दूसरे के सामने बनवाएं।
  6. जिस मकान में बहुत से द्वार और आलिंद हों उस द्वार का कोई नियम नहीं होता चाहे जिस ओर दरवाजे बनवाएं।
  7. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार यदि उत्तर में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान के पश्चिमी ओर बने कमरे में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कमरे के उत्तरी अर्द्धभाग की ओर पड़े, इससे मुख्यद्वार और भी प्रभावी स्थिति में होगा और धन-धान्य समृद्धि की वृद्धि होती रहेगी।
  8. यदि मकान का मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो पूर्व दिशा में एक द्वार बनवाना अनिवार्य है। इसी प्रकार मकान का मुख्यद्वार यदि दक्षिण में स्थित हो तो उस मकान में उत्तर में एक द्वार बनवाना अनिवार्य है। यह सिद्धांत आवासीय मकानों के लिए अति आवश्यक है। इससे मकान में निवास करने वालों की गति पूर्वोंमुखी एवं उत्तरोमुखी रहेगी।
  9. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार पूर्व में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान की पूर्वी दिशा के कमरे में बनवाना चाहिए। एक बात का ध्यान रखें कि मकान का मुख्यद्वार उस कमरे के उत्तरी अर्द्धभाग में पड़ता हो। इस प्रकार बनाए गए द्वार से मुख्यद्वार बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली स्थिति में आ जाता है और परिवार के सदस्यों को शुभ व कल्याणकारी फल देता है।
  10. वास्तुशास्त्र में बाहरी एवं भीतरी द्वारों की दिशाओं में चार प्रकार का संबंध माना गया है। जब बाहरी द्वार व भीतरी द्वार एक ही दिशा में आमने-सामने हों तो यह संबंध उत्संग संबंध माना गया है जो कि सर्वोत्तम होता है। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार के बाईं ओर होता हो तो यह संबंध अपसव्य संबंध माना जाता है जो कि अच्छा नहीं होता। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार के दाहिनी ओर होता है तो यह संबंध सत्य संबंध माना गया है जो कि शुभ होता है। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार की विपरीत दिशा में होता हो तो यह संबंध पृष्ट भंग संबंध माना गया है जो कि अशुभ होता है।
  11. दरवाजा अपने आप खुल जाए या बंद हो जाए तो भयदायक होता है। चौखट एक ओर छोटी दूसरी ओर बड़ा हो जाए तो भी अशुभ होता है।
  12. एक दरवाजे के ऊपर यदि दूसरा दरवाजा बनवाना हो तो वह नीचे वाले दरवाजे से आकार में छोटा होना चाहिए तथा ये एक सीध में होने चाहिए।
  13. द्वार के कपाट को खोलने व बंद करने में कोई आवाज नहीं आनी चाहिए।
  14. मुख्यद्वार का आकार मकान के अन्य द्वारों की अपेक्षा बड़ा होना चाहिए।

मकान में दरवाजों की संख्या-
कुछ लोग भ्रमित रहते हैं कि मकान में दरवाजों की संख्या सम होनी चाहिए या विषम। द्वार यदि मकान में उपरोक्त बताए स्थान पर वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाए गए हों तो उनकी संख्या कम हो या विषय कई फर्क नहीं पड़ता। अतः द्वारों की संख्या को महत्व देना आवश्यक नहीं परंतु यदि भूखण्ड की उत्तर दिशा में खाली स्थान न छोड़कर घर में गिनती के आठ द्वारों का निर्माण कराया गया हो तो ऐसी स्थिति में सम संख्याएं शुभ फल नहीं देतीं।
       इसी प्रकार यदि किसी मकान में कुएं, चूल्हें एवं सीढ़ियों का निर्माण शास्त्र सम्मत न करवाया गया हो और दरवाजों की संख्या भी सम संख्या में रखी हो तो इसका फल शुभ नहीं होता। यदि मकान में कुएं, चूल्हे एवं सीढ़ियां वास्तुशास्त्र के अनुसार बनवाए गए हों तो दरवाजों की संख्या चाहे सम हो या विषय कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार मकान में खिड़कियों तथा अलमारियों की संख्या चाहे सम संख्या में हो या विषम इसमें कोई दोष नहीं होता। इसी प्रकार मकान में खिड़कियों तथा अलमारियों की संख्या चाहे सम हो या विषम इसका कोई दोष नहीं होता।
वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में मकान में द्वारों की संख्या संबंधी दिए गए मुख्य निर्देश निम्नानुसार हैं-
  • यदि मकान में चारों दिशाओं में द्वार बनाने हों तो वास्तुशास्त्र के अनुसार ये निम्न स्थानों पर बनवाएं- उत्तर के बीच से ईशान कोण की ओर, पूर्व के बीच भाग से ईशान कोण की ओर, दक्षिण के बीच से आग्नेय कोण की ओर तथा पश्चिम से आग्नेय कोण की ओर।
  • मकान में एक ही प्रवेश द्वार बनाना हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में बनवाना चाहिए। लेकिन माकन दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा की ओर हो तो उसमें कभी एक द्वार नहीं बनवाना चाहिए।
  • अगर मकान में तीन दिशाओं में द्वार बनाना हो तो उत्तर दिशा व पूर्व दिशा में द्वार बनाना आवश्यक है। तीसरा द्वार सुविधानुसार पश्चिम या दक्षिण दिशा में बनाया जा सकता है।
  • अगर मकान में दो प्रवेशद्वार बनाने हों, शुभफल प्राप्त करने के लिए द्वारों को पूर्व दिशा एवं दक्षिण दिशा में ही दो द्वार कभी नहीं बनवाने चाहिए अर्थात मकान मकान में एक प्रवेश द्वार पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में होना अनिवार्य है।

द्वारवेध- मकान के मुख्यद्वार के सामने यदि कोई विघ्न आता हो तो उसे द्वार वेध की संज्ञा दी जाती है जैसे किसी द्वार के सामने खम्भा, सीढ़ी, द्वार, कोण, बाड़ पेड़, मशीन या कोल्हू आदि। मकान के मुख्यद्वार के सामने द्वारवेध नहीं होना चाहिए परंतु यदि द्वारवेध मकान की ऊंचाई के दोगुना से अधिक दूरी पर स्थित हो तो द्वारवेध का अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है। मुख्यद्वार के सामने हमेशा कीचड़ का रहना भी द्वारवेध माना गया है। इस तरह मुख्यद्वार के सामने कीचड़ होने से परिवार में शोक-दुख आदि दोष पैदा करने वाला होता है।
खिड़कियों से संबंधित वास्तु सिद्धांत- 
मकान में वायु का संचरण खिड़कियों के माध्यम से होता है। खिड़कियों से संबंधित वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में वर्णित मुख्य नियम निम्नानुसार हैं-
  1. उत्तर दिशा में अधिक खिड़कियां परिवार में धन-धान्य की वृद्धि करती है। लक्ष्मी व कुबेर की दयादृष्टि बनी रहती है।
  2. खिड़कियों का निर्माण संधि स्थाल में नहीं होना चाहिए।
  3. खिड़कियां द्वार के सामने होनी चाहिए जिससे चुम्बकीय चक्र पूर्ण हो सकें। इससे गृह में सुख शांति बनी रहती है।
  4. वायु प्रदूषण से बचने के लिए मकान में जिन दिशाओं से शुद्ध वायु प्रवेश करती है उसके विपरीत दिशाओं में एग्जास्ट फैन लगाना चाहिए। खिड़कियों की संख्या सम होनी चाहिए।
  5. खिड़कियों के पल्ले अंदर की ओर खुलने चाहिएं।
  6. पश्चिम, पूर्व तथा उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ होता है।
  7.  मकान में खिड़कियों का मुख्य लक्ष्य, मकान में शुद्ध वायु के निरंतर प्रवाह के लिए होता है।
  8. खिड़कियां सम संख्या में लगानी चाहिए। लेकिन यदि मकान का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार किया गया हो तो खिड़कियों की संख्या सम हो या विषम कोई फर्क नहीं पड़ता।
  9. खिड़कियां हमेशा दीवार में ऊपर-नीचे न बनाकर एक ही सीध में बनानी चाहिए।

मकान में बॉलकनी एवं बरामदा-
मकानों में बॉलकनी एवं बरामदे का स्थान महत्वपूर्ण होता है। बॉलकनी, बरामदा, टैरेस आदि मकान में खुले स्थान के अंतर्गत आते हैं। इनमें Y के स्थान पर इसे बनाना शुभ माना जाता है तथा N के स्थान पर बनाना अशुभ होता है। भूखण्ड में उत्तर, पूर्व एवं उत्तर-पूर्व के बीच वाले स्थान अर्थात ईशान कोण में अधिक खुला स्थान रखना चाहिए। दक्षिण और पश्चिम में खुला स्थान कम रखना चाहिए। इसी प्रकार मकान में बॉलकनी एवं बरामदे के रूप में उत्तर-पूर्व में खुला स्थान सर्वाधिक होना चाहिए ताकि उसमें रहने वाले सुख-समृद्धि पा सकें। टैरेंस व बरामदा खुले स्थान के अंतर्गत आता है इसलिए सुख-समृद्धि के लिए उत्तर-पूर्व में ही निर्मित करना चाहिए क्योंकि सुबह के समय सूर्य की किरणें एवं प्राकृतिक हवा खिड़कियों के साथ-साथ बरामदे एवं बॉलकनी से भी आती है।
पश्चिम दिशा में जहां तक हो सकें बॉलकनी एवं बरामदा नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि अस्त होते हुए सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद नहीं होती है।
        बॉलकनी एवं बरामदे का स्थान भूखण्ड की दिशा पर निर्भर है परंतु प्रयास यह होना चाहिए कि प्रातः कालीन सूर्य किरणों का प्रवेश एवं प्राकृतिक हवा का प्रवाह मकान में प्राप्त होता रहें। यदि दोमंजिला मकान हो तो पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर मकान की ऊंचाई कम रखनी चाहिए एवं ऊपरी मंजिल में बॉलकनी या बरामदा उत्तर-पूर्व दिशा में ही बनाना चाहिए।

पूजाघर– यदि आपके पास, स्थान हो तो मकान में पूजाघर का निर्माण ईशान कोण व उत्तर दिशा के बीच या ईशान कोण व पूर्व दिशा के बीच करवाना चाहिए। इसके अतिरिक्त मकान में किसी अन्य स्थान पर पूजा घर कभी नहीं बनाना चाहिए। यदि मकान में स्थान का अभाव भी हो तो भी इसी स्थान पर पूजाघर बनवाना चाहिए। ईशान कोण का स्वामी ईशान को माना गया है साथ ही यह कोण पूर्व एवं उत्तर दिशा के शुभ प्रभावों से युक्त होता है।
      इस चित्र में जिन स्थानों पर Y लिखा है वहां पूजाघर बनवाना उचित होता है तथा जिन स्थानों पर N लिखा है उहां पूजाघर बनवाना अशुभ फलदायक होता है। पूजाघर या पूजास्थान का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि पूजा करते समय पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर रहें। हमारे धार्मिक ग्रंथों एवं वास्तुग्रंथों में कहा गया है कि धन-प्राप्ति के लिए पूजा उत्तर दिशा की ओर मुख करके और ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए।
पूजाघर संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for Pooja Room (chapel)-
  1. पूजाघर के निकट एवं मकान के ईशान कोण में झाडू एवं कूड़ेदान आदि नहीं रखने चाहिएं। पूजाघर हमेशा साफ-सुथरा रखें तथा इस घर के लिए अलग से झाड़ू-पोंछा रखें।
  2. पूजाघर में कभी भी कीमती वस्तुएं तथा पैसे आदि नहीं रखने चाहिए।
  3. पूजाघर को हमेशा शुद्ध, स्वच्छ एवं पवित्र रखें। इसमें कोई भी अपवित्र वस्तु न रखें अर्थात मकान के ईशान कोण हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ रखना चाहिए।
  4. पूजाघर में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य एवं कार्तिकेय का मुख पूर्व दिशा या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।
  5. पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लायी गई प्रतिमा एवं स्थिर प्रतिमा की स्थापना नहीं करनी चाहिए।
  6. पूजाघर में यदि हवनादि की व्यवस्था की गई हो तो यह व्यवस्था
  7. पूजाघर के आग्नेय कोण में ही होनी चाहिए।
  8. पूजाघर का फर्श सफेद या हल्के पीले रंग का होना चाहिए।
  9. पूजाघर की दीवारों का रंग सफेद, हल्का पीला या हल्का नीला होना चाहिए।
  10. पूजाघर कभी भी सोने के कमरा में नहीं बनवाना चाहिए। यदि किसी कारणवश ऐसा करना भी पड़े तो उस कमरे में पूजा वाले स्थान पर चारों ओर पर्दा डालकर रखें और रात को सोने से पहले पूजास्थल का पर्दा ढक दें।
  11. पूजाघर में नीचे अलमारी बनाकर किसी कोर्टकेस संबंधी कागजात रखने से उस कोर्टकेस में विजय प्राप्ति की संभावना बढ़ती है।
  12. पूजाघर में हनुमानजी का मुख नैऋत्य कोण में होना चाहिए।
  13. पूजाघर में गणेश, कुबेर, दुर्गा का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
  14. पूजाघर में प्रतिमाएं कभी प्रवेशद्वार के पास नहीं रखना चाहिए।
  15. धन प्राप्ति के लिए पूजा पूजाघर में उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए।
  16. पूजाघर में देवचित्र एक-दूसरे के सामने नहीं रखने चाहिए।
  17. देवी-देवताओं के चित्र उत्तरी और दक्षिणी दीवार के पास कभी नहीं होने चाहिए।
  18. पूजाघर में महाभारत की तस्वीर, पशु-पक्षी की तस्वीर एवं वास्तुपुरुष की कोई तस्वीर नहीं रखना चाहिए।
  19. रसोईघर- मकान में रसोईघर का निर्माण आग्नेय कोण में किया जाना चाहिए। यदि आग्नेय कोण में रसोईघर बनाना संभव न हो तो पश्चिम दिशा में भी रसोईघर बनाया जा सकता है। रसोईघर की लम्बाई एवं चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिए कि लम्बाई एवं चौड़ाई के गुणनफल में नौ से गुणा करके आठ से भाग देने पर शेषफल दो बचना चाहिए।

रसोईघर संबंधी वास्तु नियम एवं वास्तुदोष निवारण-
  • वास्तुशास्त्र के नियमानुसार रसोईघर कभी भी ईशान कोण में नहीं बनवाना चाहिए। ऐसा करने से परिवार के लोगों को आर्थिक कमी का सामना करना पड़ता है। कुछ स्थिति में यह अधिक दुष्प्रभाव डालता है जिससे वंशवृद्धि रुक जाती है।
  • यदि मकान में चूल्हा ईशान कोण में ही रखा हो तो इसका परिवर्तन करके आग्नेय कोण में स्थापित कर दें। स्थान-परिवर्तन संभव नहीं हो एवं चूल्हा स्लैब पर रखा हो तो स्लैब के नीचे तांबे का बड़ा जल से भरा जलपात्र हमेशा रखें एवं प्रतिदिन सुबह-शाम इसका जल बदलते रहें। भोजन पकाने के तुरंत बाद इस स्थान को साफ कर दें। आग्नेय कोण में एक बल्ब जलाकर रखें जिस पर लाल रंग की पन्नी चढ़ी हो। यदि चूल्हा फर्श पर रखा हो तो जलपात्र चूल्हे के निकट रखा जाना चाहिए। शेष नियम वही रहेंगे।
  • रसोईघर को आठ दिशाओं एवं विदिशाओं में विभाजित करके ऐसी व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए कि चूल्हा रसोईघर के आग्नेय कोण में रहे।
  • ईशान कोण व उत्तर दिशा के अतिरिक्त किसी अन्य कोण या दिशा में चूल्हा रखने से कोई हानि नहीं होती परंतु आग्नेय कोण में जल संबंधी कार्य होता हो तो अवश्य होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आग्नेय कोण में अग्नि संबंधी कार्य न होने से अग्निभय संभव है। यदि आग्नेय कोण में अग्नि संबंधी कार्य जैसे विद्युत उपकणों का संचालन आदि हो रहा है तो चूल्हा ईशान व उत्तर दिशा के अतिरिक्त कहीं भी रख सकते हैं।
  • उत्तर दिशा में चूल्हा रखा जाना वर्जित है। ऐसा करने से अर्थहानि होती है। इसके लिए भी उपरोक्त उपाय करने चाहिए।
  • रसोईघर में भारी सामान बर्तन आदि दक्षिणी दीवार की ओर रखें।
  • मकान में रसोईघर का निर्माण इस प्रकार करवाएं कि मुख्यद्वार से रसोईघर में रखे समान जैसे- गैस, चूल्हा, बर्नर आदि दिखाई न दें। इससे परिवार के संकटग्रस्त होने की संभावना होती है। अनेक स्त्रियां अपने रसोईघर का निर्माण इस प्रकार करवाती है कि खाना बनाते समय घर में कौन आ रहा है इसकी जानकारी खिड़की से देखकर हो जाए। ऐसी स्थिति में बाहर से आने वाले व्यक्ति को उस खिड़की में से चूल्हा दिखाई दे सकता है।
  • रसोईघर में टांड आदि दक्षिण एवं पश्चिम दीवार पर ही बनाए जाने चाहिए परंतु आवश्यकतानुसार चारों दीवारों पर भी बनाए जा सकते हैं।
  • यदि रसोई में फ्रिज भी रखा जाना हो तो उसे आग्नेय, दक्षिण, पश्चिम या उत्तर दिशा में रखा जाना उचित होगा। इसे नैऋत्य कोण में कभी न रखें अन्यथा यह अधिकतर खराब ही रहेगा।
  •  यदि भोजन करने की व्यवस्था भी रसोई घर में की जानी हो तो यह रसोईघर में पश्चिम की ओर होनी चाहिए।
  • रसोईघऱ में गैस बर्नर, चूल्हा स्टोव या हीटर आदि दीवार से लगभग तीन इंच हटकर रखे होने चाहिए।
  • खाना बनाते समय गृहिणी या खाना बनाने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए यह मकान के निवासियों के लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है।
  • वास्तु सिद्धांत के अनुसार रसोईघर में खाली एवं अतिरिक्त गैस सलैण्डर आदि नैऋत्य कोण में रखे जाने चाहिए।
  • अन्न आदि के डिब्बे उत्तर-पश्चिम अर्थात वायव्य कोण में रखे जाने चाहिए। वायव्य कोण में अन्न आदि रखने से घर में अन्न की परिपूर्णता बनी रहती है।
  • रसोईघर में माइक्रो ओवन, मिक्सर, ग्राइंडर आदि दक्षिण दीवार के निकट रखे जाने चाहिए।
  • रसोईघर में पीने का पानी ईशान कोण में या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए।

भोजन के कमरे से संबंधी वास्तुशास्त्र का सिद्धांत- 
आजकल मकान मंद भोजन का कमरा बनावाया जाता है। भोजन का कमरा बनाने के लिए वास्तुशास्त्र के अनुसार पश्चिम दिशा उपयुक्त है। भोजन का कमरे की व्यवस्था रसोईघर से पश्चिम दिशा की ओर की जा सकती है।
  1. भोजन का कमरा रसोईघर के पश्चिम दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है।
  2. भोजन का कमरा मकान की पश्चिम दिशा में बनाया जाना चाहिए। पश्चिम दिशा में भोजन का कमरा होने से भोजन करने से सुख, शांति एवं संतुष्टि मिलती है।
  3. रसोईघर के अंदर ही भोजन करने की व्यवस्था होने पर यह व्यवस्था रसोईघर में पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए।
  4. यदि भोजन का कमरा पश्चिम दिशा के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में बना हुआ हो तो उस कमरा में पश्चिम की ओर वैठकर भोजन किया जाना चाहिए।

भण्डार का कमरा बनाने के लिए वास्तुशास्त्र का सिद्धांत-
भण्डार घर बनाने के दो उद्देश्य होते हैं- एक वर्ष भर के लिए अन्नादि का भण्डारण एवं अनुपयुक्त तथा अतिरिक्त सामान का भण्डारण। यदि व्यक्ति के पास पर्याप्त जगह हो तो दोनों उद्देश्यों के लिए अलग-अलग भण्डार घर बनाना चाहिए और अगर जगह की कमी हो तो दोनों उद्देश्यों की पूर्ति एक ही भंडार घर में की जा सकती है। पहले दोनों उद्देश्यों के लिए अलग-अलग कमरे के विषय में चर्चा करेंगे।
अन्न आदि के भण्डार घर के लिए वास्तु सिद्धांत-
  1. वायव्य कोण में बनाए गए अन्नादि-भण्डार घर में अन्न आदि की कभी कमी नहीं होगी।
  2. अन्न आदि के भण्डार घर में सामान रखने के लिए स्लैब आदि दक्षिण या पश्चिम दीवार पर बनाने चाहिए परंतु आवश्यकता पड़ने पर इन्हें चारों दीवारों पर बनाया जा सकता है। परंतु पूर्वी एवं उत्तरी दीवार पर बनायी स्लैब की चौड़ाई दक्षिण एवं पश्चिम दीवार पर बनायी गई स्लैब से कम होनी चाहिए और इन पर अपेक्षाकृत हल्का सामान रखा जाना चाहिए।
  3. यदि मकान में अन्न आदि के भण्डार वाले घर में खाली स्थान हो तो डाईनिंग टेबल लगाया जा सकता है परंतु डाईनिंग टेबल कमरे की पश्चिम दिशा में या रसोईघर से पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए।
  4. अन्न आदि के भण्डार घर में रखे किसी डिब्बे, कनस्तर आदि को खाली न रहने दें। अन्न आदि के प्रयोग से इनके खाली होने की दशा में उसमें कुछ अन्न आदि अवश्य शेष रखे रहने चाहिए।
  5. प्रतिदिन प्रयोग में आने वाले अन्न आदि को कमरे के उत्तर-पश्चिम दिशा में रखा जाना चाहिए।
  6. अन्न आदि के भण्डार घर का निर्माण मकान में उत्तर दिशा या वायव्य कोण में करना चाहिए।
  7. अन्न आदि के भण्डार घर में तेल, घी, मक्खन, मिट्टी का तेल एवं गैस सलैण्डर आदि इसके आग्नेय कोण में रखा जाना चाहिए।
  8. अन्न आदि के भण्डार घर का द्वार नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी दिशा या विदिशा में बनाया जा सकता है।
  9. अन्न आदि का वार्षिक संग्रह दक्षिण या पश्चिम दीवार के पास होना चाहिए।
  10. वास्तु सिद्धांत के अनुसार अन्न आदि के भण्डार घर के ईशान कोण में शुद्ध एवं पवित्र जल से भरा हुआ मिट्टी या तांबे का एक पात्र रखा जाना चाहिए। ध्यान रखें यह पात्र कभी खाली न हो। अन्न आदि के भण्डार घर में पूर्वी दीवार पर लक्ष्मी नारायण का चित्र लगाना चाहिए।

भण्डार घर के लिए वास्तुशास्त्र की सिद्धांत-
  1. अनुपयोगी सामान के लिए मकान से बाहर चारदीवारी के निकट कबाड़घर बनाना चाहिए परंतु यदि कबाड़घर बना पाना संभव नहीं है और भण्डार घर में ही यह सामान रखा जाता हो तो इसके लिए कमरा का नैऋत्य कोण प्रयोग करना चाहिए।
  2. इस भण्डार घर में अन्न आदि का संग्रह न करें।
  3. भारी सामान दक्षिणी दीवार एवं पश्चिमी दीवार पर दक्षिण दिशा की ओर रखे जाने चाहिए।
  4. इस कमरे का दरवाजा उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए साथ ही एक खिड़की भी इन्हीं दिशाओं में होनी चाहिए।
  5. भण्डार घर मकान के अंदर दक्षिण या पश्चिम भाग में बनाया जाना चाहिए।
  6. शेष दोनों दिशाओं अर्थात पूर्व एवं उत्तर में हल्के सामान रखे जाने चाहिए।
  7. यदि स्थान के अभाव में अन्न आदि का संग्रह भण्डार घर में करना पड़े तो रोजाना प्रयोग होने वाला अन्न रसोईघर में वायव्य कोण में रखे एवं अतिरिक्त अन्न आदि इस भण्डारघर में पश्चिम दीवार के निकट उत्तर दिशा की ओर रखा जा सकता है।

संयुक्त भण्डार घर के लिए वास्तु सिद्धांत-
  1. संयुक्त भण्डार घर में कबाड़ अर्थात ऐसी वस्तुओं को नहीं भरा जाना चाहिए जिनका अब कोई प्रयोग नहीं रह गया हो।
  2. संयुक्त भण्डार घर में अन्य सामानों का भण्डारण दक्षिण एवं पश्चिम दीवार की ओर किया जाना चाहिए।
  3. संयुक्त भण्डार घर मकान के पश्चिम या उत्तर-पश्चिम भाग में बनाया जाना चाहिए।
  4. संयुक्त भण्डार घर में अन्न आदि का भण्डारण वायव्य कोण की ओर किया जाना चाहिए।
  5. संयुक्त भण्डार घर में पूर्व, उत्तर तथा पश्चिम दिशा या इनके कोणों में कोई एक खिड़की अवश्य होनी चाहिए।
  6. संयुक्त भण्डार घर का द्वार नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी स्थान पर बनाया जा सकता है।
  7. संयुक्त भण्डार घऱ के ईशान कोण में जल का पात्र रखना चाहिए।

कबाड़घर- घर में अनेक वस्तुएं इस प्रकार की होती हैं जो कि समय व्यतीत के साथ हमारे लिए उपयोगी नहीं रह जाती। इन वस्तुओं को सामान्य बोलचाल में कबाड़ कहा जाता है। इस कबाड़ में से समय-समय पर बेकार वस्तुओं को बाहर कर देना चाहिए परंतु कभी-कभी काम में आने वाली वस्तुओं का संग्रह कबाड़घर में किया जा सकता है। कबाड़घर का निर्माण मुख्य मकान से बाहर नैऋत्य कोण में किया जाना चाहिए। यदि स्थान की कमी के कारण नैऋत्य कोण में भूमितल पर कबाड़ का भण्डारण किया जाना चाहिए।
कबाड़घर के लिए वास्तु सिद्धांत एवं वास्तुदोष निवारण-
  • कबाड़घर का द्वार मकान के अन्य सभी द्वारों से आकार में छोटा रखना चाहिए।
  • कबाड़घर किसी व्यक्ति को रहने, सोने या किराए पर नहीं दिया जाना चाहिए। मकान का मालिक ऐसे व्यक्ति से हमेशा परेशान रहेगा।
  • उत्तर, पूर्व, ईशान, वायव्य कोण में कबाड़ आदि का भण्डारण करने से अर्थहानि व मानसिक अशांति में वृद्धि होती है। आग्नेय कोण में कबाड़ का भण्डारण करने से अग्नि से हानि होने की संभावना होती है।
  • इस कबाड़घर के द्वार के पास कोई बातचीत आदि नहीं करनी चाहिए न हीं जोर से ठहाका लगाएं और न ही गुस्से में या ऊंची आवाज में बातचीत करें। ऐसा करना घर की खुशियों के लिए हानिकारक है।
  • वास्तु सिद्धांत के अनुसार कबाड़घर का द्वार आग्नेय, ईशान या उत्तर दिशा के अतिरिक्त अन्य किसी दिशा में होना चाहिए।
  • यदि त्रुटिवश या अज्ञानतावश कबाड़ आदि का भण्डारण नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में किया हुआ हो तो इसे तुरंत बदल दें।
  • कबाड़घर में पानी नहीं भरा हुआ होना चाहिए।
  • कबाड़घर का द्वार एक पल्ले का होना चाहिए।
  • कबाड़घर के दरवाजे का रंग काला होना चाहिए।
  • कबाड़घर के फर्श व दीवारों में सीलन नहीं होनी चाहिए।
  • कबाड़घर के दरवाजे का रंग काला होना चाहिए।
  • कबाड़घर का द्वार टिन या लोहे का बनवाना चाहिए।
  • कबाड़घर में किसी देवी-देवता का चित्र न रखें।
  • कबाड़घर की लम्बाई और चौड़ाई न्यूनतम होनी चाहिए।

बेडरुम (सोने का कमरा)- 
अच्छे स्वास्थ्य के लिए सोना बहुत जरूरी होता है। इससे शारीरिक स्फूर्ति, ताजगी एवं सुकून मिलता है। यदि मनुष्य रात को ठीक प्रकार से नहीं सोता तो उठने के बाद कार्य करने में अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं कर पाता। हमने पहले भी चर्चा की है कि मनुष्य का शरीर एक चुम्बक है और सिर उत्तरी ध्रुव एवं पैर दक्षिणी ध्रुव हैं। अतः सोने के समय सिर को दक्षिण दिशा की ओर करके सोना चाहिए ताकि चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह ठीक प्रकार से हो सके। यदि चुम्बकीय प्रवाह शरीर में उचित प्रकार से होगा तो निद्रा भी अच्छी आएगी।
       सोने के कमरे की लम्बाई एवं चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिए कि इनके गुणनफल में नौ से गुणा करके आठ से भाग देने पर तीन या पांच शेष बचें। तीन शेष बचने से दक्षिण दिशा में बनाए गए बेडरूम के आकार का फल शत्रु पर विजय, आर्थिक एवं शारीरिक सुख प्राप्ति के रूप में पड़ता है। पांच शेष बचने से पश्चिम दिशा में बनाए गए सोने का कमरे के आकार का फल आर्थिक सम्पन्नता लाता है।
सोने का कमरा संबंधी वास्तु सिद्धांत एवं वास्तुदोष निवारण-
  1. बच्चों, अविवाहितों या मेहमानों के लिए पूर्व दिशा में सोने का कमरा बनवाएं परंतु इस कमरे में नवविवाहित जोड़े को नहीं ठहराना चाहिए अर्थात इस कमरे में संभोग नहीं करना चाहिए। यदि इस कमरे में ऐसा होता हो तो परिवार को आर्थिक एवं सामाजिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
  2. मकान के मालिक का सोने का कमरा दक्षिण-पश्चिम कोण में या पश्चिम दिशा में होना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व अर्थात स्थिरता का प्रतीक है। अतः इस स्थान पर सोने का कमरा होने से मकान में लम्बे समय तक निवास होता है।
  3. सोने के कमरे में यदि पूजास्थल हो तो वह सोने के कमरे में ईशान कोण की तरफ बनाना चाहिए। ऐसी स्थिति में पलंग पर सोते समय सिर पूर्व की तरफ किया जा सकता है ताकि पांव पूजास्थल की ओर न रहें।
  4. सोने के कमरे में बेड या पलंग इस प्रकार से हों कि उस पर सोने से सिर पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर रहे। इस तरह सोने से सुबह उठने पर मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होगा। पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है। यह जीवनदाता एवं शुभ है। उत्तर दिशा धनपति कुबेर की मानी गई है अतः सुबह उठते उस तरफ मुंह होना भी शुभ है।
  5. यदि मकान के स्वामी का कार्य ऐसा हो जिसमें कि उसे अधिक अर्थात घर से बाहर ही रहना पड़ता हो तो सोने का कमरा वायव्य कोण में बनाना उत्तम होगा।
  6. उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। उत्तर दिशा में सिर करके सोने से नींद नहीं आती है और आती हो तो बुरे स्वप्न अधिक आते हैं।
  7. यदि सोते समय सिर पश्चिम दिशा की ओर रखना हो तो पलंग का एक सिरा पश्चिम की दीवार को छूता रहे।
  8. दक्षिण-पश्चिम या दक्षिण में स्थित सोने के कमरे वयस्क, विवाहित, बच्चों के लिए भी उपयुक्त है।
  9. सोने के कमरा का दरवाजा एक पल्ले का होना चाहिए।
  10. यदि सोते समय सिर दक्षिण दिशा की ओर रखना हो तो पलंग का एक हिस्सा दक्षिण की दीवार को छूता रहे।
  11. अगर मकान में एक से अधिक मंजिलें हों तो मकान के मालिक का सोने का कमरा ऊपर की मंजिल पर बनवाना चाहिए।
  12. पलंग के सामने दीवार पर प्रेरक व रमणिक चित्र लगवाने चाहिए। आदर्शवादी चित्र आत्मबल को बढ़ाते हैं और दाम्पत्य जीवन भी आनन्दमय व विश्वास्त बना रहता है।
  13. सोने के कमरे में प्रकाश की व्यवस्था करते समय पलंग पर मुख के सामने प्रकाश की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए। वास्तुशास्त्र में मुख पर प्रकाश पड़ना अशुभ होता है। सोने के कमरे में प्रकाश हमेशा सिर के पीछे या बाईं ओर पड़ना चाहिए।
  14. सोते समय पैर मुख्यद्वार की ओर नहीं होने चाहिए। मौत होने पर शमशान ले जाने से पहले शरीर को मुख्यद्वार की ओर पैर करके रखा जाता है।
  15. सोने के कमरे में पलंग के दाईं ओर छोटी टेबल आवश्यक वस्तु या दूध, पानी रखने के लिए स्थापित कर सकते हैं।
  16. पलंग सोने के कमरे के द्वार के पास स्थापित नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से चित्त एवं मन में अशांति बनी रहेंगी।
  17. सोने के कमरे में अलमारियों का मुंह नैऋत्य कोण या दक्षिण दिशा की ओर नहीं खुलना चाहिए। यह नियम मात्र उन अलमारियों के लिए है जिनमें चैकबुक, बैंक या व्यापार संबंधी कागजात, रुपये पैसे तथा अन्य कीमती सामान रखा जाता है अर्थात तिजोरी आदि। ऐसी अलमारियों में रखा धन धीरे-धीरे कम होता जाता है। इन अलमारियों का मुंह दक्षिण दिशा को छोड़कर अन्य दिशाओं में रखा जाना चाहिए।
  18. ईशान कोण में आग्नेय दिशा वाले कमरे में छोटे बच्चों के लिए सोने का कमरा का प्रबंध करना चाहिए।
  19. सोने के कमरे में पलंग के ठीक ऊपर छत में कोई शहतीर नहीं होना चाहिए। यदि पलंग के ठीक ऊपर शहतीर हो तो इस शहतीर पर फाल्स सीलिंग करा लेनी चाहिए।
  20. जहां तक संभव हो तिजोरी सोने के कमरे में न रखें यदि रखनी ही पड़े तो यह सोने के कमरे की दक्षिण दिशा में इस प्रकार रखे कि इसे खोलने पर उत्तर दिशा में दृष्टि पड़े।
  21. वास्तु सिद्धांत के अनुसार ड्रेसिंग टेबिल उत्तर दिशा में पूर्व की ओर रखी जानी चाहिए। ड्रेसिंग टेबिल को पश्चिम दिशा में भी रखा जा सकता है।
  22. पूर्वी व उत्तरी दिशा वाले कमरे को सोने का कमरा बनाने के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है।
  23. विद्यार्थियों के लिए पश्चिम दिशा में सिरहाना करना उपयुक्त होता है।
  24. कपड़े रखने के लिए अलमारी वायव्य कोण या दक्षिण दिशा में होनी चाहिए।
  25. बाईं ओर करवट करके लेटने की आदत डालना बहुत अच्छी मानी जाती है।
  26. पूर्व की ओर सिरहाना वृद्धाजनों के लिए उपयुक्त होता है। यह आध्यात्मिक चिंतन, ध्यान, साधना व अच्छी नींद के लिए उपयुक्त है।
  27. पलंग को सोने के कमरे की दीवारों से थोड़ा हटाकर रखना चाहिए।
  28. उत्तर दिशा में सिरहाना कभी नहीं करना चाहिए।
  29.  घड़ी पूर्व या पश्चिम की दीवार पर लगाएं। इसके अलावा उत्तर दिशा की दीवार पर भी अच्छी मानी जाती है।
  30. सोने के कमरे में अध्ययन करने के लिए टेबिल, लाईब्रेरी, पुस्तकों की अलमारी आदि बेडरूम के पश्चिम या नैऋत्य में होनी चाहिए। मेज-कुर्सी इस प्रकार रखी हों कि मुंह पूर्व की ओर या उत्तर की ओर रहें। इस तरह से अध्ययन करने वाला व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न और ज्ञानवान बनता है।
  31. सोने के कमरे में टांड आदि पश्चिम या दक्षिणी दीवार पर बनाना चाहिए परंतु उसके नीचे सोने का पलंग नहीं रखना चाहिए। यदि पलंग रखना ही पड़े तो टांड के नीचे भी फाल्स सीलिंग लगवा दें।
  32. टेलीविजन, हीटर एवं अन्य विद्युत उपकरण कमरे के आग्नेय कोण में होने चाहिए।

स्नानघर एवं शौचालय- 
साधारणतः स्नानघर एवं शौचालय तीन प्रकार से बनाए जाते हैं- घर के सोने के कमरे के साथ संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय, घर के अंदर सबके लिए संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय तथा अलग-अलग स्नानघर एवं शौचालय।
    वास्तुशास्त्र के अनुसार घर के अंदर स्नानघर उत्तर या पूर्व दिशा में बनवाया जा सकता है जबकि शौचालय पश्चिम, वायव्य कोण से हटकर उत्तर दिशा की ओर या दक्षिण दिशा में बनवाया जा सकता है। संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय के लिए पश्चिम वायव्य कोण एवं पूर्वी आग्नेय कोण अच्छे माने जाते हैं।
   वास्तु सिद्धांत के अनुसार बेडरूम से सटे स्नानघर बेडरूम के ऊपर या पूर्व दिशा में जहां दो समांतर बेडरूम हों, वहीं बीच में बनवाएं जाते हैं। इस स्थिति में बीच वाला स्नानघर दक्षिण दिशा के बेडरूम के उत्तर में तथा उत्तरी बेडरूम के दक्षिण में पड़ेगा। वास्तु के अनुसार इस स्थिति को बहुत अच्छा माना जाता है। इसी प्रकार दक्षिण में बने दो समांनतर बेडरूम के बीच में एक स्नानघर बनवाया जा सकता है। इसमें पश्चिम दिशा के बेडरूम के पूर् में तथा पूर्वी बेडरूम के पश्चिम दिशा में स्नानघर पड़ेगा। आजकल शौचालय स्नानघर के साथ ही बनाए जाते हैं। शौचालय की सीट (डब्ल्यू. सी.) इस प्रकार रखें कि बैठने वाले का मुख दक्षिण, पश्चिम की ओर मुख रखना भी ठीक नहीं मानते क्योंकि पूर्व-पश्चिम सूर्योदय और सूर्यास्त से संबंधित हैं अतः यह सूर्य का अपमान करना माना गया है, रामायण में भी इसका वर्णन मिलता है। ईशान कोण में शौचालय नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि यह हानिप्रद हैं। नैऋत्य कोण में शौचालय बनवाएं तो गड्ढा न खुदवाएं, चबूतरा बनवाकर संडास लगवाएं तथा सैप्टिक टैंक मध्य उत्तर या मध्यपूर्व में ही रखें।
स्नानघर संबंधी वास्तु सिद्धांत--
  • यदि मकान का मुख्यद्वार उत्तर दिशा की ओर हो तो भी स्नानघर पूर्व या पूर्वी आग्नेय कोण में बनाना चाहिए।
  • स्नानघर दक्षिण या पश्चिम नैऋत्य कोण में भी बनवाया जा सकता है।
  • यदि मकान का मुख्यद्वार पूर्व दिशा की ओर हो तो स्नानघर पूर्व-आग्नेय कोण में बनवाना चाहिए।
  • यदि मकान का मुख्यद्वार पश्चिम दिशा की ओर हो तो वे स्नानघर पश्चिम नैऋत्य कोण में बनाना चाहिए।
  • स्नानघर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दिशा पूर्व होती है।
  • स्नानघर में गीजर, हीटर एवं अन्य विद्युत उपकरण दक्षिण-पूर्व आग्नेय कोण में लगाए जाने चाहिए।
  • वैसे तो शौचालय स्नानघर में बनाना नहीं चाहिए परंतु यदि बनाना आवश्यक ही हो तो यह स्नानघर में पश्चिम या वायव्य कोण की ओर बनाया जाना चाहिए।
  • स्नानघर की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए जैसे सफेद, हल्का नीला, आसमानी आदि।
  • स्नानघर से सटा हुआ, रसोई के पास एक कपड़े एवं बर्तन होने का स्थान होना सुविधाजनक है।
  • स्नानघर का द्वार रसोईघर के द्वार के ठीक सामने नहीं होना चाहिए।
  • यदि स्नानघर बड़ा हो और उसी में वाशिंग मशीन भी रखी हो तो मशीन को दक्षिण या आग्नेय कोण में रखा जा सकता है।
  • स्नानघर का द्वार पूर्व या उत्तर में होना चाहिए।
  • स्नानघर में बाथटब पूर्व, उत्तर या ईशान कोण से रखा जाना चाहिए।
  • स्नानघर के फर्श का ढाल पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
  • स्नानघर में शॉवर ईशान कोण, उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए।

शौचालय संबंधी वास्तु सिद्धांत-
  • शौचालय का दरवाजा पूर्व दिशा या आग्नेय कोण की तरफ खुलने वाला होना चाहिए।
  • शौचालय में संगमरमर की टाइल्स का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • यदि आपके निर्मित मकान में त्रुटि या अज्ञानवश ईशान कोण में शौचालय का निर्माण हो गया हो तो इसके बाहर एक बड़ा दर्पण इस प्रकार लगाना चाहिए कि नैऋत्य कोण से देखने पर आईना बिल्कुल सामने दिखाई दे या यहां पर शिकार करते हुए शेर या मुंह फाड़े हुए एक शेर का बड़ा चित्र भी लगाया जा सकता है।
  • जिन भूखण्डों के पूर्व या उत्तर दिशा में रास्ते हो उन पर निर्मित मकानों में ईशान कोण में शौचालय नहीं बनवाने चाहिए। मानसिक व पारिवारिक अशांति, असाध्य रोग अनैतिक कामों से पतन होता है।
  • मकान में शौचालय पश्चिम, वायव्य कोण से हटकर उत्तर की ओर या दक्षिण में होना चाहिए।
  • शौचालय का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि शौचालय में बैठते समय मुंह उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर कभी न हो। शौचालय में सीट इस प्रकार लगी होनी चाहिए कि बैठते समय आपका मुंह दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा की ओर रहे।
  • शौचालय का फर्श मकान के फर्श से एक या दो फीट ऊंचा होना चाहिए।
  • शौचालय में एक खिड़की उत्तर, पश्चिम या पूर्व दिशा में होनी चाहिए।
  • शौचालय में पानी की टोटी पूर्व या उत्तर दिशा में होनी चाहिए।

शौचकूप या सैप्टिक टैंक- 
शौचालय से मल आदि की निकासी के लिए सामान्यतः सीवर का प्रयोग किया जाता है परंतु जिस स्थान पर सीवर लाईन नहीं होती वहां पर शौचकूप बनवाया जाता है। इस शौचकूप में यह मल इकट्ठा होता रहता है और एक समयांतराल पर इसे साफ करा दिया जाता है। चूंकि शौचकूप बनवाने के लिए गड्ढा खोदना होता है अतः इसका निर्माण नैऋत्य कोण में कभी नहीं करवाना चाहिए क्योंकि वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार नैऋत्य कोण में किसी भी प्रकार का गड्ढा या खुदाई नहीं होनी चाहिए। इससे वहां के निवासियों को भयंकर परिणाम प्राप्त होते हैं।
शौचकूप या सौप्टिक टैंक संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for septic tank-
  1. सैप्टिक टैंक की लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशा में एवं चौड़ाई उत्तर दक्षिण दिशा में होनी चाहिए।
  2. सैप्टिक टैंक वायव्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य, पश्चिम दिशा में वायव्य कोण की अपेक्षा अधिक हटा हुआ भी बनाया जा सकता है।
  3. नैऋत्य कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक मकान के स्वामी के जीवन के लिए कुप्रभावी होता है।
  4. सैप्टिक टैंक का तीन चौथाई भाग जिसमें कि जल होता है पूर्व दिशा में होना चाहिए एवं मल आदि के लिए स्थान उत्तर दिशा में होना चाहिए।
  5. शौचकूप या सैप्टिक टैंक मकान के वायव्य कोण एवं उत्तर दिशा के मध्य में होना चाहिए।
  6. आग्नेय कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होता है।
  7. सैप्टिक टैंक दक्षिण या पश्चिम की ओर नहीं बनाना चाहिए।
  8. पूर्व दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मान-सम्मान की कमी करता है।
  9. सैप्टिक टैंक हमेशा दीवार से एक या दो फीट हटाकर बनाना चाहिए।
  10. दक्षिण दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मकान के मालिक के जीवन साथी के जीवन के लिए हानिप्रद है।
  11. उत्तर दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक धन की हानि कराता है।
  12. सैप्टिक टैंक भूमि तल से नीचा होना चाहिए।
  13. ईशान कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक आजीविका के लिए हानिकारक है।
  14. पश्चिम दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मानसिक अशांति उत्पन्न करता है।

नलकूप या जलस्रोत- 
नलकूप या मकान में प्रयोग किए जाने वाले जल का स्रोत ईशान कोण में होना चाहिए अर्थात मकान में जल ईशान कोण से ही आना चाहिए। यदि हम मयूनिसपल कॉरपोरेशन (नगर निगम) की वाटर लाइन का प्रयोग कर रहे हैं तो भी वाटर कनैक्शन भूखण्ड के ईशान कोण से ही आना चाहिए परंतु यह मकान के ईशान कोण एवं भूखण्ड ईशान कोण को मिलाने वाली रेखा पर नहीं होना चाहिए।
नलकूप एवं जलस्रोत संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for tube well or water source-
  1. दक्षिण में कूप या गड्ढ़ा स्त्रियों की अकाल मौत का कारण होता है। इस कूप को तुरंत भरवा देना चाहिए एवं कूप का निर्माण ईशान कोण में किया जाना चाहिए या इससे गहरा कूप ईशान कोण में बनवा लेना चाहिए और दक्षिण दिशा में स्थित कूप के जल का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इसके जल को एक पाइप लाइन द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर से ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करना चाहिए। इस कूप के ढक्कन पर भारी सामान रखा जाना चाहिए। इस पर जनरेटर को भी स्थापित किया जा सकता है।
  2. कूप या हैंडपम्प के लिए पूर्व या उत्तरी ईशान कोण सर्वोत्तम स्थान है। उत्तरी ईशान या पूर्व ईशान में कुआं या गड्ढ़ा हो तो सुख, सम्पन्नता, वंश वृ्द्धि व प्रसिद्धि प्राप्ति होती है।
  3. दक्षिण नैऋत्य कोण में कूप या गड्ढ़ा हो तो स्त्री रोगग्रस्त रहती है, चरित्रहीन एवं कर्जदार होती है। इस कूप को तुरंत भरवा देना चाहिए एवं कूप का निर्माण ईशान कोण में किया जाना चाहिए।
  4. मकान की चारदीवारी के ईशान कोण में पम्पसेट हो तो उस पर बनने वाली छत की आकृति झोंपड़ी जैसे होनी चाहिए एवं यह निर्माण पूर्व व उत्तर की दीवारों से सटा हुआ नहीं होना चाहिए।
  5. पूर्वी आग्नेय कोण में कूप या गड्ढ़ा रोगों, अग्निभय एवं चोरी का संकेतक है। इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इसके जल को एक पाइप लाइन के द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर से ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करना चाहिए।
  6. कूप के तल में चौकोर या वृत्ताकार वलय बिठाने पर भी कुएं की जगत (मुंडेर) का निर्माण गोलाकृति में ही होना चाहिए।
  7. पश्चिम में कूप या गड्ढ़ा पुरुषों के लिए अस्वास्थ्यकारी होता है। इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इससे जल को एक पाइप लाइन के द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करन
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