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जानिए 24 जनवरी 2020 को कैसे होगा दूर सभी राशियों से शनि का प्रकोप

हिंदू धर्म में हर ग्रह का अपना एक अलग स्थान है. इन्ही ग्रहों के आधार पर यहाँ भविष्यवाणीयाँ की जाती है l समय समय पर इन ग्रहों का प्रभाव हमारे सांसारिक जीवन पर बहुत ही महत्वपूर्ण होता है l और इन सब में भी शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव तो बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है इसीलियें हमारे ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द जी शास्त्री ने आप सभी के लिए शनि की साढेसाती का प्रभाव किन-किन राशियों पर कब-कब होगा यहाँ बताया है. आप सभी यह महत्वपूर्ण जानकारी आप तक व अन्य लोगों तक जरुर पहुंचाएं.
Know-how-far-Saturn-will-get-out-of-all-zodiac-signs-on-24-January-2020- जानिए 24 जनवरी 2020 को कैसे होगा दूर सभी राशियों से शनि का प्रकोपवैदिक ज्योतिष शास्त्र में ग्रह गोचर का विशेष महत्व होता है। जब कोई ग्रह एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में स्थान परिवर्तन करता है तो उसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ता है। अगले वर्ष की शुरुआत ( 2020) में ग्रहों की स्थितियों में कई बड़े फेरबदल होने वाले हैं। वर्ष 2020 के शुरूआती दिनों में ही शनि अपनी राशि बदलेंगे। शनि 24 जनवरी 2020 को धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। शनि के राशि परिवर्तन से अगले वर्ष 2020 में किन राशियों से शनि की अशुभ छाया हट जाएगी और किन राशि पर इनका प्रकोप रहेगा।
    शनि के गोचर, साढ़ेसाती और महादशा का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है, क्योंकि इसके प्रभाव से मनुष्य के जीवन में बड़े बदलाव होते हैं, जैसे शादी , नौकरी, व्यवसाय, संतान आदि। हालांकि ये परिवर्तन सुखद और दुखद दोनों हो सकते हैं। शनि देव बुध, शुक्र और राहु के साथ मित्रता रखते हैं तो सूर्य, चंद्रमा और मंगल के साथ इनका संबंध शत्रुता का है। बृहस्पति और केतु के साथ इनका संबंध सम रहता है। मकर तथा कुंभ राशियों के ये स्वामी माने जाते हैं।  मिथुन और तुला राशि वालों की ढैय्या साल 24 जनवरी साल 2020 में शुरु होने जा रही है। 
   यहां से मकर की द्वितीय ढैय्या, धनु की अंतिम ढैय्या और वृश्चिक राशि वाले शनि की साढ़े साती से मुक्त हो जाएंगे इस प्रकार शनि के धनु राशि के गोचर से 6 राशियों मेष,कर्क,सिंह,तुला,कुम्भ,एवं मीन को शुभ फलों की प्राप्ति होगी। शेष 6 राशियों ,वृषभ,मिथुन,कन्या,वृश्चिक धनु,मकर अशुभ फलों में वृद्धि करेंगे अतः उन्हें सतर्क एवं सावधान रह कर जरूरी उपाय करना चाहिए। शनि ग्रह का गोचर 24 जनवरी 2020 यानी शुक्रवार के दिन रात को 12 बजकर 10 मिनिट पर धनु राशि से मकर राशि मे हो रहा है शनि की यह अपनी ही राशि है । इसके बाद वर्ष 2022 में शनि (शुक्रवार) दिनांक 29 अप्रैल 2022 को दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे। साथ ही साल 2025 में शनि, शनिवार दिनांक 29 मार्च 2025 को रात 11 बजकर 02 मिनट पर कुंभ से मीन राशि में प्रवेश करेंगे।
   वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि को न्यायधीश की उपाधि दी गई है। जब भी शनि का राशि परिवर्तन होता है तो प्रकृति के साथ- साथ मानव जीवन पर भी इसका अत्याधिक प्रभाव देखने को मिलता है।पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शनि मध्यम वर्ग, मजदूर वर्ग का भी कारक माना जाता है। शनि के राशि परिवर्तन के साथ ही कुछ राशियों पर शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव शुरू हो जाएगा तो कुछ को इन सब चीजों से राहत मिलेगी। 
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए शनि का मकर राशि में गोचर करने पर सभी 12 राशियों पर क्या होगा प्रभाव (असर)---
  1. शनि गोचर 2020 मेष राशि -- शनि का गोचर आपके दसवें भाव में हो रहा है। कुंडली में दसवें भाव से कर्म को देखा जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए काफी शुभ है। शनि का परिवर्तन आपके कर्म को प्रभावित करेगा। इस राशि परिवर्तन से नौकरी करने वाले लोगों को अत्यंत ही लाभ प्राप्त हो सकता है। आपको इस समय में प्रमोशन मिल सकता है। मेष राशि के जो लोग काफी समय से अच्छी नौकरी का प्रयास कर रहे हैं तो इनको इस समय में एक अच्छी नौकरी प्राप्त हो सकती है। लेकिन इस समय में आपको अपनी माता और जीवनसाथी की सेहत का ख्याल रखना होगा। वहीं जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेद भी हो सकता है। 
  2. शनि गोचर 2020 वृषभ राशि --- शनि के मकर राशि में जाने से इस रााशि से शनि की ढैय्या का असर बिल्कुल खत्म हो जाएगा। शनि का गोचर आपके नवें भाव में हो रहा है। कुंडली में नवें भाव से भाग्य का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ है। शनि का परिवर्तन आपके भाग्य में वद्धि करेगा। इस राशि के जिन लोगों का कोई काम काफी समय से अटका हुआ था। वह इस समय में पूरा हो जाएगा। आपको इस समय में आपके भाग्य का भरपूर साथ मिलेगा। लेकिन आपका इस समय अपने छोटे भाई बहनों के साथ विवाद हो सकता है। आपको इस समय में आपका कोई रोग भी परेशान करता है। धार्मिक कार्यों में आप इस समय बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे। 
  3. शनि गोचर 2020 मिथुन राशि --- शनि का गोचर आपके अष्टम भाव में हो रहा है। कुंडली में अष्टम भाव से मृत्यु का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए अशुभ रहेगा। शनि का परिवर्तन आपकी परेशानियों को बढ़ा सकता है। इस राशि परिवर्तन के साथ ही आपकी शनि की ढैय्या भी आरंभ हो जाएगी। इस समय आपका अपने परिवार में झगड़ा हो सकता है। इसलिए आपको अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। कार्यक्षेत्र में भी आपकाअपने उच्च अधिकारियों के साथ मतभेद हो सकता है। इसलिए आपको इस समय बहुत ही ज्यादा संभल कर चलना चाहिए। बच्चों की सेहत का इस समय विशेष ध्यान रखें।  
  4. शनि का गोचर 2020 कर्क राशि -- शनि का गोचर आपके सप्तम भाव में हो रहा है। कुंडली में सप्तम भाव से वैवाहिक जीवन का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ रहेगा। शनि का परिवर्तन आपके वैवाहिक जीवन में खुशियों का संदेश लेकर आ रहा है। इस समय जो जातक विवाह करना चाहते हैं उनके लिए यह समय काफी शुभ है। इस समय में आपका विवाह हो सकता है। कार्यक्षेत्र में भी आपको इस समय लाभ मिल सकता है। वहीं अगर आप नौकरी में परिवर्तन करना चाहते हैं तो भी यह समय आपके लिए काफी अच्छा है। इस समय आपकी प्रवृति काफी गंभीर हो जाएगी और आप सभी काम को काफी सोच विचार कर करेंगे। 
  5. शनि गोचर 2020 सिंह राशि -- शनि का गोचर आपके छठवें भाव में हो रहा है। कुंडली में छठवें भाव से रोग और शत्रु का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए सामान्य रहेगा। इस परिवर्तन से आपके शुत्र परास्त होंगे। अगर आपको काफी से किसी रोग ने परेशान कर रखा था तो वह भी इस समय में ठीक हो जाएगा। कोर्ट कचहरी के क्षेत्र में भी इस समय आपको सफलता प्राप्त होगी। लेकिन इस समय में आपके खर्चे बढ़ सकते हैं। ससुराल पक्ष से भी आपको इस समय परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इस समय आपरे पराक्रम में वृद्धि होगी। अगर आप विदेश जाना चाहते हैं तो भी आपके लिए समय काफी शुभ है। 
  6. शनि गोचर 2020 कन्या राशि --- इस राशि पर से शनि की ढैय्या समाप्त हो जाएगी। इस वजह से तमाम तरह की परेशानियों से इन्हें निजात मिल जाएगी। शनि का गोचर आपके पांचवें भाव में हो रहा है। कुंडली में पांचवें भाव से संतान और विद्या का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ रहेगा। इस परिवर्तन से आपको संतान सुख की प्राप्ति होगी। इस समय नव दंपत्ति के यहां संतान की किलकारियां गुंज सकती है। विद्यार्थियों को भी इस समय लाभ प्राप्त हो सकता है। अगर आप अपने किसी मंदपंसद कॉलेज या स्कूल में एडमिशन लेना चाहते हैं तो आपके लिए यह समय काफी शुभ है। लेकिन आपको इस समय वैवाहिक सुख में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं आपकी आय में भी कमीं हो सकती है। 
  7. शनि गोचर 2020 तुला राशि --- 24 जनवरी 2020 से शनि का मकर राशि में यानि आपके चतुर्थ भाव में प्रवेश होगा| उस समय स्थितिया परिवर्तन होगी और आपके सुख में वृद्धि होगी आपकी माता के साथ आपका रिश्ता अच्छा रहेगा किसी भी तरह का कोई भी आप कार्य भूमि, वाहन से सम्बंधित करते है| तो आपको उसमे सफलता हासिल होंगी| इसके अलावा गुरु जो की 30 मार्च को नीच के होकर मकर राशि में प्रवेश कर रहे है| उसके बाद वो 30 जून को पुनः धनु राशि में प्रवेश करेंगे और 20 नवम्बर को पुनः मकर राशि में प्रवेश कर जायेंगे| ये कुछ उत्तार चढाव गुरु का इस साल देखने को मिलेगा| राहू इस साल आपके भाग्य स्थान से आपके अष्टम स्थान यानि वृषभ राशि में 23 सितम्बर 2020 को प्रवेश करेंगे| वही 23 सितम्बर 2020 को केतु भी आपके राशि से द्वितीय भाव में यानि वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे|शनि का गोचर आपके चौथे भाव में हो रहा है। कुंडली में चौथे भाव से सुख और माता का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए अशुभ रहेगा। इस राशि परिवर्तन के साथ ही आपके ऊपर शनि की ढैय्या की शुरू हो जाएगी। इस समय में आपकी माता की सेहत ठीक रहेगी। आपको वाहन, भूमि और वाहन के सभी सुख प्राप्त होंगे। लेकिन इस समय आपको अपने कार्यक्षेत्र में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इस समय में आपको शत्रु बाधा हो सकती है। कोर्ट कचहरी के मामलों में भी आपको परेशानी हो सकती है। शारीरीक का भी इस समय में आपको सामना करना पड़ सकता है। 
  8. शनि गोचर 2020 वृश्चिक राशि -----शनि के मकर राशि में जाने से वृश्चिक राशि वालों पर अब शनि की टेढ़ी नजर नहीं रहेगी। शनि का गोचर आपके तीसरे भाव में हो रहा है। कुंडली में तीसरे भाव से पराक्रम और छोटे भाई बहन का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ रहेगा। शनि का परिवर्तन आपके पराक्रम में वृद्धि करेगा। इस समय में आप अपना सभी काम अपने पराक्रम के दम पर पूरा कर लेंगे। आपका भाग्य भी इस समय में आपका साथ देगा। धार्मिक कार्यों में भी आप इस समय बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे लेकिन आपको इस समय में अपनी संतान की तरफ से परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। आपके खर्च भी इस समय में अत्याधिक बढ़ सकते हैं। 
  9. शनि गोचर 2020 धनु राशि---धनु राशि अग्नितत्व, द्विस्वभाव राशि है । धनु राशि में स्थित होकर शनि तृतीय दृष्टि से कुम्भ राशि को प्रभावित करेंगे जो उनकी मूलत्रिकोण राशि है। ज्यादा अशुभ प्रभाव नहीं रहेगा। सप्तम दृष्टि से मिथुन राशि को देखेंगे जो उनके मित्र बुध की राशि है। शनि की दशम दृष्टि कन्या पर रहेगी जो फिर से बुध की ही राशि है ।  यह याद रखियेगा की शनि ग्रह गोचरवश राशि के अंतिम भाग में अर्थात 20 डिग्री से 30 डिग्री विशेष प्रभाव या फल उत्पन्न करते हैं। शनि एक राशि से दूसरी राशि में जाने के लिए लगभग ढाई साल का समय लेते हैं। यहां से, वह संपत्ति को इंकित करनेवाले चौथे भाव, दीर्घायु को इंकित करनेवाले 8 वीं भाव और लाभ और व्यवसाय को इंकित करने वाले 11 वें भाव पर अपनी दृष्टि डालते है। धनुष राशीवालों के लिए इन साढ़े सात वर्ष (साडे सती) को 'पाद शनी' कहा जाता है, जिसके दौरान शनि आपको अच्छे फल प्रदान करेगा, बशर्ते आपने अच्छी नैतिकता बनाए रखी हो। यह गोचर आपके करियर में सकारात्मक मोड़ ला सकता है, वित्तीय स्थिति में सुधार कर सकता है और आपके लंबित सपने को पूरा कर सकता है।इस राशि वाले सभी जातक सतर्क ओर सावधानी रखें। साल 2020 में शनि धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। ऐसे में धनु राशि वालों से दूसरे चरण की साढ़ेसाती खत्म हो जाएगी और तीसरी चरण साढ़ेसाती यानी उतरती साढ़ेसाती आरंभ हो जाएगी। इससे धनु राशि वालों की पहले की मुकाबले से उनके जीवन में परेशानियां कम होती चली जाएगी। इस राशि के जो लोग सरकारी नौकरी में हैं, उनके लिए नौकरी में पदोन्नति और वित्तीय वृद्धि होगी। कला और सिनेमा क्षेत्र के लोग इस अवधि के दौरान अपने पेशे में लोकप्रियता और सुधार का आनंद लेंगे।  इस अवधि में शनि धनु राशि से द्वितीय भाव में गोचर करेगा, जो वित्त और परिवार का द्योतक है।शनि का गोचर आपके दूसरे भाव में हो रहा है। कुंडली में दूसरे भाव से धन और कुंटुंब का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए मध्यम रहेगा। शनि का परिवर्तन आपके धन में वृद्धि करेगा। इसी के साथ आप पर शनि की साढेसाती की आखिरी ढैय्या शुरु हो जाएगी। आपका परिवार भी इस समय में आपका पूरा साथ देगा। लेकिन आपको इस समय में कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ेगा। आपको अपने ससुराल पक्ष से परेशानि हो सकती है। आपकी माता का स्वास्थय भी इस समय में खराब हो सकता है। वहीं लाभ की अपेक्षा आपको नुकसान का सामना भी करना पड़ सकता है। 
  10. शनि गोचर 2020 मकर राशि --- शनि का गोचर आपके लग्न भाव में हो रहा है। कुंडली में लग्न भाव से शरीर का विचार किया जाता है। अगर आप व्यापार करते हैं तो आपको इस समय बाहरी देशों के साथ अपना व्यापार बढ़ाने का मौका मिलेगा। आयात-निर्यात के क्षेत्र में आपको सफलता मिल सकती है। विदेश यात्रा अथवा जन्मस्थान से दूर जाने के योग भी आपके लिये बन रहे हैं। वर्ष 2020 में मंगल का लाभ स्थान में होना आपके अंदर हर समस्या से लड़ने की शक्ति प्रदान करेगा। इस वर्ष आपकी राशि पर शनि की साढेसाती का प्रथम चरण समाप्त हो जाएगा। जिससे आपको काफी राहत मिलेगी। वर्ष राशिफल 2020 में 24 जनवरी को शनि राशि परिवर्तन कर आपकी ही राशि में प्रवेश कर जाएंगें। स्वराशि के शनि का होना आपके लिये शनि का शश महायोग बनाएगा। जिससे आपके कार्यक्षेत्र की स्थिति में काफी अच्छा बदलाव देखने को मिलेगा।शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए सामान्य ही रहेगा। शनि का परिवर्तन आपके शरीर के लिए तो ठीक है। लेकिन इस समय आपमें आलस्य की अधिकता रहेगी। जिसके कारण आप अपने कार्यों को ठीक प्रकार से नहीं कर पाएंगे। आपका इस समय में अपने जीवनसाथी के साथ भी झगड़ा हो सकता है। अगर आप व्यापार करते हैं तो आपको इस समय काफी संभल कर चलना चाहिए। नौकरी करने वाले जातकों को भी कार्यस्थल में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 
  11. शनि गोचर 2020 कुंभ राशि --- इस राशि के जेक विशेष ध्यान(सावधानी) रखें क्यों कि शनि का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है। कुंडली में बारहवें भाव से खर्च का विचार किया जाता है। पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शनि का राशि परिवर्तन इस राशि के लिए अशुभ ही रहेगा। शनि का परिवर्तन आपके खर्चों को बढाएगा। इस राशि परिवर्तन के साथ ही आप पर शनि की साढेसाती शुरू हो जाएगी। इस समय में आपको खर्च बढ़ सकते हैं। आपको कोई पुराना रोग भी फिर से परेशान कर सकता है। शत्रुओं से आपको इस समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। परिवार में भी किसी के साथ आपका झगड़ा हो सकता है। धन संबंधी परेशानियां भी हो सकती है। इस समय में आपको भाग्य के भरोसे नहीं रहना चाहिए। 
  12. शनि गोचर 2020 मीन राशि---- शनि का गोचर आपके ग्यारहवें भाव में हो रहा है। कुंडली में ग्यारहवें भाव से आय का विचार किया जाता है। शनि का राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ रहेगा। शनि का परिवर्तन आपकी आय को बढाएगा। यह राशि परिवर्तन आपकी सभी इच्छाओं को पूर्ण करेगा। इस समय में आपकी सैलरी बढ़ सकती है। कार्यक्षेत्र में भी आपका मान सम्मान बढ़ेगा। आपके स्वाभाव में गंभीरता आएगी और आप अपने सभी कामों को अत्याधिक विचारकर ही करेंगे। लेकिन ध्यान रखें, वैवाहिक जीवन के लिए यह समय ठीक नहीं है। आप वयस्त होने के कारण इस समय अपने पार्टनर को समय नहीं दे पाएंगे और अगर आप शादीशुदा हैं तो आपका अपनी ससुरालवालों के साथ मतभेद हो सकता है। 

जाने और समझें, शनि का फल कथन कैसे करें--
आपकी कुंडली और गोचर मिलाकर ही फलकथन किया जा सकता है अकेला गोचर कभी भी फलदाई नहीं होता  फलदीपिका, जातक पारिजात जैसे महान ज्योतिष ग्रंथों में एक बहुत सरल तरीका बताया हुआ है की जन्म चन्द्रराशि से 3, 6, 11 राशि में शनि का गोचर शुभ होता है यदि क्रमशः वेध स्थान 12, 9, 5 में कोई अन्य ग्रह न हो। उदाहरणार्थ तुला राशि के लिए धनु का शनि 3वे होकर शुभ होना चाहिए अगर 12वे कन्या में कोई ग्रह (सूर्य के अतिरिक्त) गोचर न कर रहा हो। परन्तु किसी ग्रह के गोचर का मनुष्य पर प्रभाव सिर्फ जन्म लग्न अथवा जन्म राशि देखकर बताना असंभव है। इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है। साथ ही शनि के अलावा 8 और ग्रह हैं जिनके गोचर का प्रभाव आपको देखना होगा। मैं आपको एक छोटा सा सूत्र देता हूँ जिसको आप खुद अपनी कुंडली में देख सकते हैं की शनि का गोचर आपको कैसा फल देगा। इसके लिए आप अपनी कुंडली में शनि का अष्टकवर्ग देखिये। इस अष्टक वर्ग में देखिये की धनु राशि में कितने बिंदु/रेखा/अंक हैं। अगर यह संख्या 0, 1, 2, 3 है तो सामान्यतः अशुभ फल मिलेगा, अगर संख्या 4 है तो मिला जुला, 5, 6, 7, 8 है तो शुभ फल मिलेगा। ऐसा आप अनुमान लगा सकते हैं।अतः अगर आपकी चन्द्र राशि तुला, कर्क, कुम्भ है और आपकी कुंडली में शनि के अष्टक वर्ग में 5 से 8 बिंदु हैं तो आप शनि के धनु राशि में गोचर से अच्छे फल की आशा कर सकते हो।

जानिए शनि की साढ़ेसाती को कम करने के उपाय ---
कृपया इन्हें आप नियमिति ध्यान रख करें l इससे आप पर शनि का प्रकोप कम हो जायेंगा. इस समय साढे साती ‘वृश्चिक’ ‘धनु’ और ‘मकर’ राशि में चालू है और इनका प्रभाव काफी गहरा हो रहा है इन राशि के जातकों को बहुत ही ध्यान से अपने सारे काम पूर्ण करने चाहिए. 
साढ़ेसाती से बचने के लिए यह है महत्वपूर्ण उपाय .
  1. साडेसाती राशि वाले जातक नित्य सुबह उठकर ‘ॐ शं शनिश्चराय नमः’ का जाप अवश्य करना चाहियें l
  2. नित्य शनिदेव की मूर्ति को हाथ जोड़ नमस्कार कर घर से निकलना चाहियें l
  3. यदि हो सकें तो नित्य शनि देव की चालीसा को पढ़ना चाहियें l
  4. सप्ताह में शनिवार के दिन शनि देव की पूजा अवश्य करनी चाहियें l
  5. यदि आप से हो सके तो शनिवार को शनि देव के उपवास करें l यह विशेष फलदायक होंगे l
  6.  (नोट : ध्यान रहे उपवास में कोई भी विघ्न नहीं आना चाहियें क्यूँ की शनि देव जल्दी नाराज हो जातें है l तो इस बात का अवश्य ध्यान दे अगर संकल्प ले तो उसे पूरा करें न हो सके तो न ले l
  7. शनि देव का यंत्र अपने पूजा स्थल अपने तिजोरी में अवश्य रखें l
  8. शनि देव को मनाने के लिए आप मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में भी पूजा कर सकते है l हनुमान देव की पूजा शनि की पूजा कहलाती है l
  9. शनिवार को काला वस्त्र पहने l अगर न पहन सकों तो कम से कम एक काला रुमाल अपने पास अवश्य रखें l
  10. शनि देव सूर्य भगवान के पुत्र है इसलिए रोज सूर्य भगवान को जल अवस्य चढ़ाएं इससे विशेष कृपा प्राप्त होंगी l
  11. शनि देव की माता छाया है l इसलिए आप शाम के समय या रात को शनि देव का ध्यान करें इससे भी उनकी कृपा बनी रहेंगी l
  12. “ॐ शं शनिश्चराय नमः” यह मंत्र जितना आप जपेंगे l उतना शनि का प्रकोप कम होगा l यह मंत्र ही साढ़ेसाती का रामबाण उपाय है l

26 दिसंबर को लगेगा वर्ष का अंतिम सूर्य ग्रहण

वर्ष 2019 का अंतिम सूर्य  ग्रहण जो कि 26 दिसम्बर 2019 को होगा वह केवल (भारत में )केरल राज्य में दिखाई देगा। इस सूर्य ग्रहण पर सूर्य आग की एक अंगूठी की तरह दिखाई देगा। ग्रहण का वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टि से प्रकृति तथा मानव समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि हर साल घटित होने वाले सूर्य ग्रहण को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।  पृथ्वी से सूय ग्रहण और चंद्र ग्रहण दो तरहे के ग्रहण ही नजर आते हैं। सूर्य ग्रहण को लेकर वैज्ञानिक भाषा में बताया गया है कि जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा या कोई दूसरा ग्रह आता है तो इसे सूर्य ग्रहण कहते हैं। इसी तरह जब चांद और सूरज के बीच पृथ्वी आती है तो उसे चंद्र ग्रहण कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि इस वर्ष का आखिरी सूर्य ग्रहण अभी बाकी है जो 26 दिसंबर को पड़ने जा रहा है यह साल का अंतिम सूर्य ग्रहण भी होगा। वर्ष 2019 की शुरुआत चंद्र ग्रहण से हुई थी और खत्म सूर्य ग्रहण के साथ होगी। इस वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण 21 जनवरी को पड़ा था।
Last-solar-eclipse-of-the-year-2019-on-26-December-26 दिसंबर को लगेगा वर्ष का अंतिम सूर्य ग्रहण       वर्ष का तीसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर 2019 को लगेगा। यह वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा, जो भारतीय समयानुसार सुबह 08:17 से लेकर 10: 57 बजे तक रहेगा। यह ग्रहण भारत के साथ पूर्वी यूरोप, एशिया, उत्तरी/पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीका में दिखाई देगा। 26 दिसंबर 2019 के सूर्यग्रहण को भारत में केरल राज्य में कोयम्बटूर और मदुरै में स्पष्ट देखा जा सकेगा।  पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि 26 दिसंबर को रायपुर (छत्तीसगढ़) में सुबह 8 बजकर 15 मिनट से लेकर 11 बजकर 15 मिनट तक आंशिक रूप से सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। पंचांगकर्ता पण्डित भागीरथ जोशी के अनुसार देश के मैदानी इलाकों में पूर्ण सूर्यग्रहण 2114 में ही देखा जा सकेगा। 20 मार्च 2034 को भी भारत में यह खगोलीय घटना होगी लेकिन कारगिल के दुर्गम पहाड़ों में ही इसे देखा जा सकेगा।
जानिए किस राशि और नक्षत्र होगा इस सूर्य ग्रहण का प्रभाव--
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार यह सूर्य ग्रहण धनु राशि और मूल नक्षत्र में लगेगा। धनु राशि तथा मूल नक्षत्र से संबंधित व्यक्तियों के जीवन पर इसका प्रभाव पड़ेगा। इन राशियों और नक्षत्र से संबंधित लोगों को सूर्य ग्रहण के समय सतर्क रहने की आवश्यकता है। 26 दिसंबर 2019 को सूर्यग्रहण का स्पर्श, मोक्ष मूल नक्षत्र और धनु राशि में हो रहा है। यह ग्रहण पूरे भारत में दिखाई देगा। साथ साथ रशिया, ऑस्ट्रेलिया और सोलोमन द्वीप में भी नजर आएगा। वर्ष 2019 का अंतिम और एक मात्र सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई देगा, इसलिए यहाँ पर इस ग्रहण का सूतक भी लागू  होगा। इस मौके पर  हरियाणा की तीर्थनगरी कुरुक्षेत्र में 26 दिसम्बर सूर्य ग्रहण मेला का आयोजन किया जाएगा जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचेंगे।
यह रहेगा 26 दिसम्बर को सूर्य ग्रहण प्रारंभ और समाप्त होने का समय--

  1. सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर 2019 प्रारंभ समय - सुबह 8 बजकर 17 मिनट (26 दिसंबर 2019)
  2. सूर्य ग्रहण परमग्रास - सुबह 9 बजकर 31 मिनट (26 दिसंबर 2019)
  3. सूर्य ग्रहण दिसंबर 2019 समाप्ति समय - सुबह 10 बजकर 57 मिनट (26 दिसंबर 2019)

यह रहेगा 26 दिसम्बर (सूर्य ग्रहण) 2019 को सूतक काल का समय--

  • सूतक काल प्रारंभ- शाम 5 बजकर 31 मिनट से (25 दिसंबर 2019)
  • सूतक काल समाप्त - अगले दिन सुबह 10 बजकर 57 मिनट तक (26 दिसंबर 2019)


कितने प्रकार का होता है सूर्य ग्रहण
  • पूर्ण सूर्य ग्रहण - जब पूर्णत: अंधेरा छाये तो इसका तात्पर्य है कि चंद्रमा ने सूर्य को पूर्ण रूप से ढ़क लिया है इस अवस्था को पूर्ण सूर्यग्रहण कहा जायेगा।
  • खंड या आंशिक सूर्य ग्रहण - जब चंद्रमा सूर्य को पूर्ण रूप से न ढ़क पाये तो तो इस अवस्था को खंड ग्रहण कहा जाता है। पृथ्वी के अधिकांश हिस्सों में अक्सर खंड सूर्यग्रहण ही देखने को मिलता है।
  • वलयाकार सूर्य ग्रहण - वहीं यदि चांद सूरज को इस प्रकार ढके की सूर्य वलयाकार दिखाई दे यानि बीच में से ढका हुआ और उसके किनारों से रोशनी का छल्ला बनता हुआ दिखाई दे तो इस प्रकार के ग्रहण को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है। सूर्यग्रहण की अवधि भी कुछ ही मिनटों के लिये होती है। सूर्य ग्रहण का योग हमेशा अमावस्या के दिन ही बनता है।

जाने और समझें वलयाकार सूर्य ग्रहण कब होता है ?
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि वलयाकार सूर्य ग्रहण उस समय घटित होता है, जब चंद्रमा पृथ्वी से बहुत दूर होते हुए भी पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। इस कारण चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी को अपनी छाया में नहीं ले पाता है। वलयाकार सूर्य ग्रहण में सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होता रहता है। इस घटना को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते है। वहीं आने वाले नए वर्ष 2020 में 6 नए ग्रहण लगने वाले है। साल की शुरुआत में 10 जनवरी को साल का पहला चंद्रग्रहण लेगा। इसके बाद अंतिम चंद्र ग्रहण 15 दिंसबर 2020 में लगेगा।
     वर्ष 2020 में कुल 6 ग्रहण लगने वाले हैं, जिनमें पहला चंद्रग्रहण 10 जनवरी को होगा और अंतिम ग्रहण 15 दिसंबर को लगने जा रहा है। वैज्ञानिक जिसे केवल एक खगोलीय घटना मानते हैं तो वहीं धार्मिक मान्‍यताएं भी अपना तर्क देती हैं। ज्योतिषों के अनुसार, ग्रहण से केवल प्रकृति पर फर्क नहीं पड़ता है बल्कि मानव जाति पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। सूर्य और चंद्रग्रहण का अलग-अलग राशियों पर अलग प्रभाव पड़ता है।
चंद्र ग्रहण क्यों होता है?
इसका सीधा सा जवाब है कि चंद्रमा का पृथ्वी की ओट में आ जाना। उस स्थिति में सूर्य एक तरफ, चंद्रमा दूसरी तरफ और पृथ्वी बीच में होती है। जब चंद्रमा धरती की छाया से निकलता है तो चंद्र ग्रहण पड़ता है।
चंद्रग्रहण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है---
चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन पड़ता है लेकिन हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण नहीं पड़ता है। इसका कारण है कि पृथ्वी की कक्षा पर चंद्रमा की कक्षा का झुके होना। यह झुकाव तकरीबन 5 डिग्री है इसलिए हर बार चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश नहीं करता। उसके ऊपर या नीचे से निकल जाता है. यही बात सूर्यग्रहण के लिए भी सच है। सूर्य ग्रहण हमेशा अमावस्या के दिन होते हैं क्योंकि चंद्रमा का आकार पृथ्वी के आकार के मुकाबले लगभग 4 गुना कम है। इसकी छाया पृथ्वी पर छोटी आकार की पड़ती है इसीलिए पूर्णता की स्थिति में सूर्य ग्रहण पृथ्वी के एक छोटे से हिस्से से ही देखा जा सकता है। लेकिन चंद्र ग्रहण की स्थिति में धरती की छाया चंद्रमा के मुकाबले काफी बड़ी होती है. लिहाजा इससे गुजरने में चंद्रमा को ज्यादा वक्त लगता है।

जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को

इस वर्ष भैरवाष्टमी 19 नवंबर 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। काल भैरव उत्तम तंत्र साधाना के लिए माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में बताया गया है कि भगवान शंकर का ही भैरव बाबा अवतार हैं। भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है। इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन-पूजन शुभ फल देने वाला होता है। हमारे वैदिक ग्रंथों अनुसार श्री काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था, तब से इसे भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इसीलिए काल भैरव की पूजा मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी पर करनी चाहिए।
Learn and understand the importance and impact of Shri Bhairav Ashtami-जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को    पौराणिक कथानुसार एक बार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने भगवान भोलेनाथ की वेशभूषा और उनके गणों का उपहास उड़ाया, तब उस समय भगवान शिव के क्रोध से विशालकाय दंडधारी प्रचंडकाय काया प्रकट हुई और ब्रह्मा जी का वध करने के लिए बढ़ने लगी दौड़ी। पुराणों के अनुसार, इस काया ने ब्रह्मदेव के एक शीश को अपने नाखून से काट भी दिया। तभी भगवान शिव ने बीच बचाव करते हुए उसे शांत किया गया और फिर तब से ही ब्रह्मा जी के चार शीष ही बचे। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह विशाल काया प्रकट हुई थी, वह दिन मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी का दिन था। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न इस काया का नाम भैरव पड़ा। भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए कालभैरव रूप की पूजा करने से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर हो जाता है। शिव पुराण के अनुसार शती काल भैरव भगवान शिव का रौद्र रूप है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेखानुसार कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। कालभैरव रोग, भय, संकट और दुख के स्वामी माने गए हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।
पुराणों में बताए गए हैं 12 भैरव--- 
धर्म ग्रंथों में मिलते है | भक्तजन इनमें से किसी एक रूप की उपासना भैरव उपासक यदि सच्चे मन से कर लेते है | तो उन पर भैरव का प्रभाव पूरा -पूरा रहता है | अपने भक्तों के सारे संकट हरण करने के लिए वे स्वयं आते है |
ऐसे हैं श्री भैरव जी के सभी बारह स्वरुप (नाम)--
  • 1. बाल भैरव 
  • 2. बटुक भैरव 
  • 3. स्वर्णाकर्षण भैरव
  • भैरव जी के ये तीनों रूप सबसे सुंदर और मृदुल माने गए है | जिनमें स्वर्णाकर्षण भैरव को धन-धान्य के स्वामी और सृष्टि के पालन पोषण कर्ता के रूप पूजा जाता है | भैरव जी के ये तीनों स्वरुप पूर्णतः सात्विक माने गये है तथा भगवान विष्णु , राम , कृष्ण आदि के समान जी इन रूपों की पूजा की जाती है |
  • 4. महाकाल भैरव
  • भैरव जी के उपरोक्त तीनों स्वरुप के बिल्कुल विपरीत है –
  •  महाकाल भैरव | महाकाल भैरव को मृत्यु का देवता माना जाता है | यही काल रूप है | इस रूप को लेकर ही तंत्र साधना की जाती है | तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए भैरव जी को महाकाल भैरव के रूप में पूजा जाता है | इसलिए गृहस्थ जीवन में महाकाल भैरव की उपासना न करके बाल भैरव , बटुक भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव इन रूपों में पूजा की जानी चाहिए |
इनके अतिरिक्त भैरव जी के अन्य 8 रूप इस प्रकार से है ---
  • 5. असिताग भैरव
  • 6. रु रु भैरव 
  • 7. चंड भैरव
  • 8. क्रोधोन्मत भैरव
  • 9. भयंकर भैरव
  • 10. कपाली भैरव
  • 11. भीषण भैरव
  • 12. संहार भैरव
भैरव जी के ये सभी रूप सोम्य नहीं है बल्कि प्रचंड रूप है | भैरव जी को भगवान शिव का पाँचवा और रौद्र अवतार माना गया है | भैरव जी के सभी 12 रूपों में 9 रूपों को प्रचंड माना गया है | जिनकी उपासना तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए की जाती है | रविवार, बुधवार या भैरव अष्टमी पर इन 8 नामों का उच्चारण करने से मनचाहा वरदान मिलता है। भैरव देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं और हर तरह की सिद्धि प्रदान करते हैं। क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है। 
  • इस वर्ष कालभैरव अष्टमी (जयन्ती) मंगलवार, नवम्बर 19, 2019 को मनाई जाएगी।
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 19, 2019 को03:35 पी एम बजे से आरम्भ होकर..
  • अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 20, 2019 को01:41 पी एम बजे होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहां शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है। भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि आप जन्मकुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो श्री भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण सरलता से कर सकते है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है। भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं। भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है। इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
   राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार नारद पुराण में बताया गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्‍य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं। कालभैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं। सारे संकट भक्तों के भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं।  कहा जाता है कि बहुत मुश्किल भैरव साधना है। साथ ही सात्विकता और एकाग्रता का ध्यान भैरव बाबा की साधाना में करना होता है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शिव ने मार्गशीर्ष कृष्‍ण पक्ष अष्टमी के दिन अवतार लिया था। इस तिथि पर प्रत और पूजा इस उपलक्ष के तौर पर होती है। 
जानिए भैरव बाबा का महत्व 
हिंदू देवताओं में भैरव बाबा का बहुत महत्व माना गया है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि भैरव बाब दिशाओं के रक्षक और काशी के संरक्षक हैं। भैरव बाबा के कई रूप में और बटुक भैरव और काल भैरव एक ही हैं। 
श्री भैरव जी के विभिन्न स्वरूप
शिवजी के रज, तम और सत्व गुणों के आधार पर श्री भैरव के स्वरूप कौन-कौन से हैं और किस मनोकामना के लिए कौन से स्वरूप की पूजा की जाती है...
  1. बटुक भैरव--यह भैरव का सात्विक और बाल स्वरूप है। जो लोग सभी सुख, लंबी आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा और मुक्ति पाना चाहते हैं, वे बटुक भैरव की पूजा कर सकते हैं।
  2. काल भैरव--यह भैरव का तामसिक स्वरूप है, लेकिन कल्याणकारी है। इस स्वरूप को काल का नियंत्रक माना गया है।इनकी पूजा अज्ञात भय, संकट, दुख और शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।
  3. आनंद भैरव---यह भैरव का राजस यानी रज स्वरूप माना गया है। दस महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव की भी पूजा की जाती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिल सकती हैं।
जानिए भैरव अष्टमी के व्रत का महत्व 
शास्‍त्रों में कहा गया है कि शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश भैरवाष्टमी के दिन व्रत और पूजा-अर्चना करने से होता है। मान्यताओं के अनुसार,सभी तरह के पाप इस दिन भैरव बाबा की विशेष पूजा अर्चना करने से धूल जाते हैं। श्री कालभैरव जी के दर्शन और पूजा इस तिथि पर करने से शुभ फल मिलता है। 
जानिए भैरव जी की पूजा के लाभ
ऐसा कहा जाता है कि पूजा-अर्चना भैरव जी की इस दिन करने से सारी मनोकामना पूर्ण होती है। जो भक्त इस दिन भैरव बाबा की पूजा करते हैं वह निर्भय होते हैं साथ ही उनके सारे कष्ट भी दूर हो जाते हैं। भैरव बाबा की पूजा और व्रत इस दिन करने से सारे विघ्न खत्म हो जाते हैं। भूत, पिशाच एवं काल भी इनके भक्तों से दूर रहते हैं।
लाभदायक होती हरण भैरव की साधना 
ग्रहों के क्रूर प्रभाव भी भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं। इतना ही नहीं हर तरह की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव भी भैरव बाबा की साधना से दूर होते हैं। 
ऐसे करें भैरव पूजन
षोड्षोपचार पूजन के साथ भैरव बाबा की पूजा करनी चाहिए। रात्र में जागरण करना चाहिए। भैरव कथा व आरती रात में भजन कीर्तन करते हुए करनी चाहिए ऐसा करके विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।

वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी

देवगुरु वृहस्पति लगभग 12 वर्षों बाद पुनः 05 नवंबर 2019 को प्रातः अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहे हैं। ये एक सदी में लगभग आठ बार धनु राशि की परिक्रमा करते हैं।  देव वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर 2019, मंगलवार रात 12 बजकर 3 मिनट पर अपनी राशि धनु में गोचर करेगा और 29 मार्च 2020, रविवार शाम को 7 बजकर 8 मिनट तक इसी राशि में स्थित रहेगा। गुरु के धनु राशि में गोचर करने से 'हंस' योग बनता है। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के भी स्वामी हैं। कर्क राशि इनकी उच्च और मकर राशि नीच संज्ञक कही गयी है। जिन जातकों की जन्मकुंडली में गुरु धनु राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में होंगे उनके लिए 'हंस' योग श्रेष्ठतम फलदाई रहेगा।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ एवं शीघ्रफलदाई ग्रह माना गया है। जन्मकुंडली में द्वितीय, पंचम, नवम तथा एकादश भाव के कारक होते हैं।
गुरु बृहस्पति का कुंडली पर प्रभाव--
कुंडली में बृहस्पति की अनुकूल स्थिति व्यक्ति को मान सम्मान और ज्ञान प्रदान करती है तथा व्यक्ति को धन की प्राप्ति भी अच्छी मात्रा में होती है। संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी बृहस्पति की मजबूत स्थिति को देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर गुरु बृहस्पति जब इसके विपरीत अवस्था में होते हैं तो इन सभी कारकों में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है। 
 Lord-Jupiter-in-Scorpio-keep-careful-for-5-months-वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी    मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, संयम, धैर्य, तरक्की, ज्ञान, सदाचरण और वैवाहिक सुख का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति 5 नवंबर को सुबह अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहा है। वर्ष 2019 में बृहस्पति ने कई बार मार्गी-वक्री गति करते हुए आगे-पीछे की राशियों में गोचर किया। धनु राशि में चल रहे बृहस्पति 10 अप्रैल को वक्री हुए थे। वक्री गति करते हुए ये 22 अप्रैल को पिछली राशि वृश्चिक में आ गए थे। इसके बाद 11 अगस्त को वृश्चिक राशि में ही मार्गी हो गए थे। अब मार्गी गति करते हुए 5 नवंबर को पुन: अपनी ही राशि धनु में आ रहे हैं। बृहस्पति कर्क राशि में उच्च का होता है और मकर में नीच का। धनु और मीन इसकी स्वयं की राशि है। यह धनु और मीन राशि के स्वामी हैं और कर्क राशि में उच्च तथा मकर राशि में नीच अवस्था में माने जाते हैं। कुंडली में चंद्रमा लग्न पर बृहस्पति की दृष्टि अमृत समान मानी जाती है। यह स्थिति गजकेसरी योग बनाती हैं।

देव गुरु वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर को कल धनु राशि में प्रवेश करेंगे जहाँ 30 मार्च 2020 तक  इसी राशि में रहने वाले हैं. वह 22 अप्रैल 2019 से वृश्चिक राशि में ही विराजमान थे. गुरु के राशि परिवर्तन का प्रभाव सभी राशियों के जातकों पर पड़ेगा। किसी राशि के जातक को धन का लाभ होगा तो किसी को स्वास्थ्य की परेशानी होगी। पांच राशि वालों के जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। यह बात उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिष पण्डित दयानन्द शास्त्री जी सभी राशि परिवर्तन से होने वाले असर के बारे में बताते हुए कही
जीवन में बदलाव लाएगा--
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि भारतीय वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत ग्रहों में बृहस्पति को देवताओं का गुरु कहा गया है और ग्रहों के मंत्रिमंडल में इन्हें मंत्री का पद प्राप्त है। ये नैसर्गिक रूप से सब से शुभ ग्रह माने जाते हैं। यह वृद्धि के कारक हैं इसलिए अच्छी या बुरी जो भी घटना हो उसमें इनका योग वृद्धि कारक होता है। यह हमारे जीवन में हमारे गुरु और गुरु तुल्य लोगों, हमारे परिवार के बड़े बुजुर्गों, संतान, धन तथा ज्ञान का कारक प्राप्त है। जन्म कुंडली में गुरु की स्थिति से जातक के जीवन के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलती हैं। इसलिए यह राशि परिवर्तन कई तरह से जीवन में बदलाव लाएगा।
     गुरु एक राशि में करीब एक साल रहते हैं इसलिए 12 साल के बाद फिर से अपनी राशि धनु में लौटते हैं। 5 नवंबर को गुरु सुबह  अपनी राशि धनु में लौट रहे हैं। अपनी राशि धनु में गुरु अगले साल 2020 मार्च तक रहेंगे। इस राशि में गुरु का स्वागत दो पाप ग्रह केतु और शनि करेंगे। शनि और केतु से साथ गुरु का संयोग यूं तो शुभ नहीं है फिर भी गोचर के अनुसार कुछ राशियों को इसका परिवर्तन शुभ लाभ  होगा तो किसी को होगा नुकसान. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानते हैं कि अगले 5 महीने किन किन राशि वालों को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।
  1. मेष राशि- मेष राशि से नवम भाव में गुरु का गोचर रुके हुए कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ भाग्य में वृद्धि करेगा तथा मनचाहा परिणाम देगा. इस राशि के लिए बृहस्पति नवम भाव में गोचर करेगा। इस राशि वालों को अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता। इस राशि के लिए बृहस्पति भाग्योदकारी है। नौकरी में प्रमोशन, व्यापार में लाभ मिलेगा। पारिवारिक जीवन अच्छा रहेगा। घर में नए मेहमान आएंगे। आर्थिक मामलों के लिए वक्त शुभ रहेगा। आपको कई स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है। धार्मिक कार्यों में रुचि होगी। धार्मिक यात्राओं पर जा सकते हैं। तीर्थयात्रा हो सकती है. सत्संग का लाभ मिलेगा. पार्टी व पिकनिक का कार्यक्रम बन सकता है. स्वादिष्ट भोजन का आनंद प्राप्त होगा. रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे. पठन-पाठन व लेखन के काम में मन लगेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. पारिवारिक सुख-शांति बनी रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  2. वृषभ राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर अष्टम भाव में होगा। इससे कुछ परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखना होगा। पेट संबंधी रोग आ सकते हैं। अनचाही यात्राएं होंगी। आर्थिक पक्ष कमजोर रहेगा। धन संचय करने में परेशानी आ सकती है। उधार चुकाने का दबाव रहेगा। व्यापार में मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी। धार्मिक कार्यों की ओर रूझान बढ़ेगा। रोजगार में वृद्धि होगी. प्रतिद्वंद्वी सक्रिय रहेंगे. शारीरिक कष्ट की वजह से बाधा संभव है. उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे. आय में वृद्धि होगी. वरिष्ठ जनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. पार्टनरों से मतभेद दूर होंगे. कुसंगति से हानि होगी. विवेक से कार्य करें।
  3. मिथुन राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर सप्तम स्थान में रहेगा। इस समय आपका वैवाहिक जीवन सुखद रहेगा। वैवाहिक जीवन में चल रहे मतभेद दूर होंगे। आर्थिक स्थिति के लिए समय उत्तम है। पार्टनरशिप में कोई नया कार्य प्रारंभ करना चाहते हैं तो अवश्य करें लाभ होगा। प्रेम संबंधों में नयापन आएगा। नौकरी में तरक्की, बिजनेस में लाभ की स्थिति मिलेगी। समाज में सम्मान प्राप्त होगा। अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. किसी व्यक्ति के व्यवहार से मन खिन्न रहेगा. पुराना रोग उभर सकता है. दूर का समाचार मिल सकता है. चिंता तथा तनाव में वृद्धि होगी. पार्टनरों तथा मातहतों से मतभेद बढ़ सकते हैं. दूसरों से अपेक्षा न करें. आय में निश्चितता रहेगी.
  4. कर्क राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति छठे भाव में गोचर करेगा। कर्क राशि में बृहस्पति उच्च का होता है। इसलिए इसका शुभ प्रभाव मिलने वाला है। इस राशि के जो लोग शत्रुओं से परेशान हैं, उनकी यह परेशानी शीघ्र दूर होगी। रोगों से मुक्ति मिलने का समय है। हालांकि मानसिक रूप से मजबूत रहना होगा कोई अनपेक्षित घटना हो सकती है। वैवाहिक जीवन के लिए समय ठीक है। आर्थिक स्थिति में मजबूती आएगी। थोड़े प्रयास से ही कार्य बनेंगे. सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी. सामाजिक कार्य करने का अवसर मिलेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. संतान पक्ष से कोई खराब सूचना मिल सकती है. चिंता तथा तनाव रहेंगे. प्रतिद्वंद्वी शांत रहेंगे. विवाद से स्वाभिमान को ठेस पहुंच सकती है. जोखिम न लें.
  5. सिंह राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति पंचम स्थान में गोचर करने जा रहा है। अपने मित्र सूर्य की राशि में मार्गी गुरु का प्रवेश इसके लिए शुभ रहेगा। इस राशि के जातकों की पारिवारिक स्थिति सुखद रहेगी। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। कर्ज मुक्ति की स्थिति बन रही है। संतान पक्ष की चिंता दूर होगी। संतानों के विवाह की बात बनेगी। नौकरीपेशा को सम्मान, व्यापारियों को कार्य विस्तार का सुख प्राप्त होगा। परिवार में अतिथियों का आगमन होगा. शुभ समाचार प्राप्त होंगे. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी. कोई नया काम करने की योजना बन सकती है. व्यवसाय ठीक चलेगा. थकान महसूस होगी. आलस्य हावी रहेगा. बेचैनी रहेगी. पारिवारिक सहयोग प्राप्त होगा. मतभेद कम होंगे. जल्दबाजी न करें।
  6. कन्या राशि- इस राशि के लिए गुरु का गोचर चतुर्थ स्थान में होगा। चतुर्थ स्थान सुख स्थान होता है, इसलिए यहां पर बृहस्पति का मार्गी होना इस राशि वालों को अनेक प्रकार के सुख प्रदान करेगा। पारिवारिक जीवन में मधुरता तो आएगी ही, जो लोग वैवाहिक सुख की प्रतीक्षा कर रहे हैं उनकी इच्छा पूरी होने वाली है। भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि होगी। स्वयं पर खर्च करेंगे। पर्यटन का अवसर आएगा। दोस्तों के साथ मेल मुलाकात होगी। भाग्योन्नति के प्रयास सफल रहेंगे. यात्रा मनोरंजक रहेगी. सुखमय जीवन व्यतीत होगा. किसी बड़ी समस्या का हल मिलेगा. प्रसन्नता रहेगी. धन प्र‍ाप्ति सुगम होगी. वरिष्ठजनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. अप्रत्याशित लाभ हो सकता है. ऐश्वर्य के साधनों पर बड़ा खर्च होगा.
  7. तुला राशि- इस राशि के लिए गुरु मार्गी तृतीय स्थान में होगा। भाई-बंधुओं के साथ रिश्ते सुधरेंगे। पैतृक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद सुलझने की स्थिति में आ जाएंगे। अभी तक आपकी जो योजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही थीं, उन्हें गति मिलेगी। सम्मान और सुख प्राप्त होगा। सेहत के लिहाज से यह गोचर ठीक नहीं रहेगा। मस्तिष्क संबंधी रोग उभर सकते हैं। पेट के निचले हिस्से के रोग भी परेशान करेंगे। संतान पक्ष की चिंता रहेगी। मशीनरी से चोट लग सकती है। इस राशि के जातकों को वैवाहिक प्रस्ताव मिल सकता है. अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. बनते कामों में विघ्न आ सकते हैं. कर्ज लेना पड़ सकता है. स्वास्थ्य कमजोर रहेगा. काम में मन नहीं लगेगा. पार्टनरों से मतभेद हो सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. कीमती वस्तुएं संभालकर रखें. विवाद न करें.
  8. वृश्चिक राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर द्वितीय स्थान में हो रहा है। धन स्थान में बृहस्पति का बैठना शुभ संकेत है। आपकी आर्थिक योजनाओं को गति मिलेगी। नया कार्य व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते हैं या पुराने को विस्तार देना चाहते हैं तो समय अच्छा है। इस दौरान किसी बड़े प्रोजेक्ट के पूरे हो जाने से मानसिक सुख-श्ाांति प्राप्त होगी। वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। प्रेम संबंध में अनुकूलता प्राप्त होगी, लेकिन पार्टनर के साथ पारदर्शी व्यवहार करना होगा। कानूनी अड़चन आ सकती है. वाणी पर नियंत्रण रखें. बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे. शारीरिक कष्ट संभव है. बेचैनी रहेगी. मनोरंजक यात्रा होगी. धनलाभ के अवसर हाथ आएंगे. लेन-देन में जल्दबाजी न करें. भाइयों से सहयोग मिलेगा. घर में सुख-शांति बनी रहेगी.
  9. धनु राशि- इसी राशि में बृहस्पति आ रहा है और यह लग्न यानी प्रथम स्थान है। यहां पर बृहस्पति के मार्गी होने से शारीरिक दिक्कतें दूर होंगी। सुख-सौभाग्य प्राप्त होगा। धन की तंगी दूर होने की स्थिति बनेगी और आय के एक से अधिक साधन प्राप्त होंगे। सेहत के लिहाज से यह गोचर अच्छा साबित होगा। बीमारियों पर हो रहे खर्च में कमी आएगी। जीवनसाथी के साथ पर्यटन का मौका आएगा। शत्रुओं को परास्त करने में कामयाब होंगे। सभी कार्य आपके मनोनुकूल होंगे। मानसिक द्वंद्व रहेगा. चोट व रोग से बचें. अपरिचितों पर विश्वास न करें. जल्दबाजी न करें. नई योजना बनेगी. नए कार्य प्रारंभ करने का मन बनेगा. व्यवसाय में अनुकूलता रहेगी. मित्रों के साथ अच्‍छा समय गुजरेगा. प्रसन्नता रहेगी. मनोरंजन के अवसर मिलेंगे. भाग्य का साथ मिलेगा.
  10. मकर राशि- इस राशि के लिए द्वादश स्थान में मार्गी बृहस्पति का आना मिलाजुला प्रभाव दिखाएगा। चूंकि द्वादश स्थान व्यय भाव होता है इसलिए खर्च में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होगी, लेकिन ध्यान रखना होगा कि यह खर्च कहां हो रहा है। अनावश्यक कार्यों पर खर्च करने से खुद को रोकना होगा। आय के साधनों में वृद्धि होगी। कोई ऐसा कार्य प्राप्त होने के योग बन रहे हैं जो आपके धन भंडार में वृद्धि करेगा। पारिवारिक जीवन सुखद रहेगा। सेहत बेहतर रहेगी। तीर्थ दर्शन हो सकता है. सत्संग का लाभ मिलेगा. प्रभावशाली व्यक्तियों से मेलजोल बढ़ेगा. कार्य की बाधा दूर होगी. व्यापार-व्यवसाय मनोनुकूल रहेगा. पारिवारिक सहयोग मिलेगा. कुछ तनाव भी हो सकता है. थकान हो सकती है. परिस्थिति अनुकूल रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  11. कुंभ राशि- कुंभ राशि के लिए एकादश भाव में मार्गी बृहस्पति के आने से स्थितियों में सुधार आएगा। अब तक जो भागदौड़ और जीवन में अनिश्चितता बनी हुई थी वह दूर हो जाएगी। अपने बारे में कोई अच्छा निर्णय ले पाएंगे। हालांकि अभी भी कोई बड़ा निवेश करने से बचना होगा। खासकर वाहन, मशीनरी के कार्यों में निवेश करें। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में अवश्य वृद्धि होगी। अविवाहितों को विवाह सुख की प्राप्ति होगी।प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी. कामकाज मनमाफिक चलेगा. प्रसन्नता रहेगी. प्रभावशाली व्यक्तियों का सहयोग मिलेगा. जल्दबाजी से का‍म बिगड़ सकते हैं. पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी. सुख-शांति बनी रहेगी. वाणी में हल्के शब्दों के प्रयोग से बचें. सुख के साधनों पर खर्च होगा.
  12. मीन राशि- यह राशि चक्र की अंतिम राशि हैं। मीन राशि के लिए मार्गी बृहस्पति का गोचर दशम स्थान में होगा। कार्य स्थान में बृहस्पति का शुभ प्रभाव मिलेगा। जिनके पास नौकरी नहीं है उन्हें नौकरी मिलेगी। बिजनेस प्रारंभ करने के लिए सही वक्त है, कार्य विस्तार करें। प्रॉपर्टी और वाहन में निवेश फलेगा। सेहत में सुधार आएगा। परिवार के बुजुर्गों के सहयोग से सही निर्णय ले पाएंगे। मित्रों, भाई-बंधुओं के साथ संबंधों में सुधार आएगा। पारिवारिक समागम का अवसर आएगा।कष्ट, भय, तनाव व चिंता का वातावरण बन सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. वाहन व मशीनरी के प्रयोग में विशेष सावधानी रखें. दूसरों के झगड़ों में न पड़ें. कीमती वस्तुएं गुम हो सकती हैं. आय में निश्चितता रहेगी. व्यवसाय ठीक चलेगा. नौकरी में सह‍कर्मियों से विवाद संभव है।
बृहस्पति ग्रह की शांति के कुछ उपाय ---
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आपकी कुंडली में बृहस्पति अनुकूल अवस्था में नहीं है तो आपको पुखराज रत्न धारण करना चाहिए।
- बृहस्पति धनु और मीन राशियों के स्वामी हैं इसलिए अगर इन दोनों राशियों के जातक पुखराज धारण करें तो उन्हें शुभ फल मिलते हैं। इसके साथ ही बृहस्पति ग्रह के अच्छे फल प्राप्त करने के लिए गुरुवार के दिन या बृहस्पति की होरा में गुरु यंत्र को अपने घर में स्थापित करना चाहिए। आप गुरु ग्रह के शुभ परिणाम प्राप्त करने के लिए पीपल की जड़ को गुरु की होरा या गुरु के नक्षत्रों में भी धारण कर सकते हैं।

जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व

इस कार्तिक महीने में कई धार्मिक अनुष्ठान और कार्यक्रम होंगे। इस महीने में खासतौर पर तुलसी और शालिग्राम की विशेष पूजा और आराधना की जाएगी। यह महीना त्योहारों का महीना भी होगा। इस महीने में व्रत, स्नान और दान करने से तमाम तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कार्तिक माह को सनातन हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है। कार्तिक माह में पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है।
    कार्तिक माह हिंदू पंचांग का आठवां महीना है। चातुर्मास में आने वाले 4 महीनों में ये चौथा महीना है। इस बार इसकी शुरुआत रेवती नक्षत्र और हर्षण योग के साथ हो रही है। इस महीने में कई बड़े त्योहार पड़ेंगे। यह महीना काफी महत्वपूर्ण है और इसकी शुरुआत शरद पूर्णिमा के अगले दिन से होती है। ग्रंथों के अनुसार इस माहीने में तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक इस बार 14 अक्टूबर 2019, सोमवार से शुरू हो रहा है, जो 12 नवंबर 2019, मंगलवार को समाप्त होगा।
Know-when-is-Kartik-Purnima-2019-Importance-of-karthik-month-जानिए कार्तिक पूर्णिमा 2019 कब है? कार्तिक महीने का महत्व      हिंदू पंचांगों के अनुसार कार्तिक मास को सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने में दान पुण्य करने से घर-परिवार और कारोबार में सुख शांति आती है। कार्तिक मास में तुलसी विवाह का भी बड़ा महत्व है. इस महीने में तुलसी की श्रद्धा भाव से पूजा करने पर मनवांछित फल मिलते हैं। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे।हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस माह में 8 नवंबर 2019 को जहां देवउठनी एकादशी पर देव जागेंगे, वहीं 12 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा तक कई प्रमुख व्रत व त्योहार भी आएंगे।
    उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि तुलसी में साक्षात् मां लक्ष्मी का निवास माना गया है। इस चलते कार्तिक मास मेंं तुलसी के समीप दीपक जलाना शुभ माना गया है। ऋतु चक्र के आधार पर भी इस माह का महत्व है क्योंकि कार्तिक मास से लोगों का खान-पान और पहनावा बदलेगा। कार्तिक महीने में दान, पूजा-पाठ तथा स्नान का बहुत महत्व होता है तथा इसे कार्तिक स्नान की संज्ञा दी जाती है। यह स्नान सूर्योदय से पूर्व किया जाता है। स्नान कर पूजा-पाठ को खास अहमियत दी जाती है। साथ ही देश की पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व होता है। इस दौरान घर की महिलाएं नदियों में ब्रह्ममूहुर्त में स्नान करती हैं। यह स्नान विवाहित तथा कुंवारी दोनों के लिए फलदायी होता है। इस महीने में दान करना भी लाभकारी होता है। दीपदान का भी खास विधान है। यह दीपदान मंदिरों, नदियों के अलावा आकाश में भी किया जाता है। यही नहीं ब्राह्मण भोज, गाय दान, तुलसी दान, आंवला दान तथा अन्न दान का भी महत्व होता है।
      हिन्दू धर्म में इस महीने में कुछ परहेज बताए गए हैं। कार्तिक स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को इसका पालन करना चाहिए। इस मास में धूम्रपान निषेध होता है। यही नहीं लहुसन, प्याज और मांसाहर का सेवन भी वर्जित होता है। इस महीने में भक्त को बिस्तर पर नहीं सोना चाहिए उसे भूमि शयन करना चाहिए। इस दौरान सूर्य उपासना विशेष फलदायी होती है। साथ ही दाल खाना तथा दोपहर में सोना भी अच्छा नहीं माना जाता है।  पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी जी भगवान विष्णु की प्रिया हैं। तुलसी की पूजा कर भक्त भगवान विष्णु को भी प्रसन्न कर सकते हैं। इसलिए श्रद्धालु गण विशेष रूप से तुलसी की आराधना करते हैं। इस महीने में स्नान के बाद तुलसी तथा सूर्य को जल अर्पित किया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। यही नहीं तुलसी के पत्तों को खाया भी जाता है जिससे शरीर निरोगी रहता है। साथ ही तुलसी के पत्तों को चरणामृत बनाते समय भी डाला जाता है। यही नहीं तुलसी के पौधे का कार्तिक महीने में दान भी दिया जाता है। तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीया भी जलाया जाता है। अगर यह पौधा घर के बाहर होता है तो किसी भी प्रकार का रोग तथा व्याधि घर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। तुलसी अर्चना से न केवल घर के रोग, दुख दूर होते हैं बल्कि अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
      हिन्दू धर्म में पवित्र कार्तिक माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने अति पुष्करिणी कहा है।स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है वह इन्हीं तीन तिथियों की प्रातः स्नान करने से पूर्ण फल का भागी हो जाता है। त्रयोदशी को स्नानोपरांत समस्त वेद प्राणियों समीप जाकर उन्हें पवित्र करते हैं।  चतुर्दशी में समस्त देवता एवं यज्ञ सभी जीवों को पावन बनाते हैं, और पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप, तप, पूजन, कीर्तन दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। इन तीन दिनों में भगवत गीता एवं श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा का श्रवण, गीतापाठ विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने से प्राणी पापमुक्त-कर्ज मुक्त होकर भगवान श्रीविष्णु जी की कृपा पाता है।
    पवित्र कार्तिक महीने में झूठ बोलना, चोरी-ठगी करना, धोखा देना, जीव हत्या करना, गुरु की निंदा करने व मदिरापान करने से बचना चाहिए। एकादशी से पूर्णिमा तक के मध्य भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खुले आसमान में दीप जलाते हुए इस मंत्र -
 दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च ! नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् !!

अर्थात -
मै सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप अर्पित करता हूँ जो भगवान को अतिप्रिय है। साथ ही इसमंत्र का ''नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे ! नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः !! 

उच्चारण करते हुए, 'पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है, धर्म स्वरूप श्रीविष्णु को नमस्कार है, यमदेव को नमस्कार है तथा जीवन यात्रा के दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले भगवान रूद्र को नमस्कार है का उच्चारण करते हुए आकाशदीप जलाएं। 
इस प्रकार करने से कोई भी प्राणी कार्तिक माह में भगवान की कृपा का पात्र बन सकता हैं।
विशेष महत्व है कार्तिक महीने का ---
भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने इसी महीने में तारकासुर राक्षस का वध किया था इस कारण से इस महीने का नाम कार्तिक पड़ा। कार्तिक माह में भगवान कार्तिकेय और तुलसी की भी विशेष पूजा की जाती है। साथ ही इसी महीने तुलसी विवाह भी होता है। कार्तिक महीना महीने में विवाहित महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखेंगी। जिसमें महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखेंगी। वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिक माह बहुत ही पवित्र माना जाता है. भारत के सभी तीर्थों के समान पुण्य फलों की प्राप्ति एक इस माह में मिलती है. इस माह में की पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है इसके अलावा इसी महीने दीपावली, धनतेरस, रमा एकादशी और आंवला नवमी जैसे बड़े त्योहार होंगे।
इस साल कार्तिक अमावस्या 27 अक्टूबर 2019 से शुरू होकर 28 अक्टूबर 2919 यानी दो दिन चलेगी. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस 28 को मनाया जाएगा। 29 अक्टूबर को भाईदूज का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन बहनें अपने भाईयों की पूजा करती हैं।
8 नवंबर 2019 को तुलसी विवाह-
कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी को तुलसी विवाह की परंपरा है. इस साल 8 नवंबर को तुलसी विवाह किया जाएगा. इसके बाद 12 नवंबर को कार्तिक महीने का आखिरी दिन है. इस दिन कार्तिक अमावस्या मनाई जाती है. कार्तिक अमावस्या के दिन व्रत और ईष्टदेव की आराधना करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.
भगवान श्री कृष्ण का प्रिय है कार्तिक मास-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास भगवान श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय महीना है. राधा इस महीने में कृष्ण से रूठ गई थीं और उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बांधकर अपना गुस्सा उतारा था. मगर कृष्ण ने कुछ नहीं किया वे बस मुस्कुराते रहे. जब राधा का गुस्सा शांत हुआ तो उन्होंने कृष्ण से माफी मांगी. मगर कृष्ण ने राधा से कहा कि वे हमेशा उनसे बंधे ही रहना चाहते हैं. इसलिए उन्हें कार्तिक महीना काफी पसंद था.
कार्तिक में महिलाओं के पर्व ज्यादा--
17 अक्टूबर, शनिवार से प्रमुख पर्वों की शुरुआत करवा चौथ के साथ हो रही है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा पर्व है। इसके बाद स्कंद षष्ठी, रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी व्रत के साथ सौंदर्य का पर्व रूप चौदस, सुहाग पड़वा, आंवला नवमी जैसे पर्व भी महिलाओं से जुड़े हैं।
जानिए इस वर्ष 2019 के कार्तिक मास में किस दिन कौन सा पर्व मानेगा--
  1. 17 अक्टूबर - करवा चौथ
  2. 21 अक्टूबर - अहोई अष्टमी
  3. 24 अक्टूबर- रमा एकादशी व्रत
  4. 25 अक्टूबर- गोवत्स द्वादशी
  5. 25 अक्टूबर - धनतेरस
  6. 26 अक्टूबर- रूप चौदस
  7. 27 अक्टूबर- दीपावली
  8. 28 अक्टूबर- गोवर्धन पूजा, अन्नकूट
  9. 29 अक्टूबर - भाई दूज
  10. 2 नवंबर - सूर्य षष्ठी
  11. 4 नवंबर - गोपाष्टमी
  12. 5 नवंबर - आंवला नवमी
  13. 8 नवंबर - देवउठनी ग्यारस
  14. 11 नवंबर - वैकुंठ चतुर्दशी
  15. 12 नवंबर - कार्तिक पूर्णिमा (11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी)

सनातन धर्म में पूर्णिमा  को शुभ , मंगल और फलदायी माना गया है। हिन्दू पंचांग केअनुसार वर्ष में 16 पूर्णिमा होती है और इस 16 पूर्णिमा में  वैसाख, माघ और कार्तिक पूर्णिमा   को स्नान-दान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा (मंगलवार) 12 नवंबर 2019 को मनाई जाएगी।  ऐसा कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने अपना पहला अवतार लिया था. वे मत्स्य यानी मछली के रूप में प्रकट हुए थे. वैष्णव परंपरा में कार्तिक माह को दामोदर माह के रूप में भी जाना जाता है. बता दें कि श्रीकृष्ण के नामों में से एक नाम दामोदर भी है. कार्तिक माह में लोग गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान आदि करते हैं. कार्तिक महीने के दौरान गंगा में स्नान करने की शुरुआत शरद पूर्णिमा के दिन से होती है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होती है. कार्ती पूर्णिमा के दौरान उत्सव मनाने की शुरुआत प्रबोधिनी एकादशी के दिन से होती है. कार्तिक महीने मे पूर्णिमा शुक्ल पक्ष के दौरान एकदशी ग्यारहवें दिन और पूर्णिमा पंद्रहवीं दिन होती है. इसलिए कार्तिक पूर्णिमा उत्सव पांच दिनों तक चलता है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  पूर्णिमा यानी चन्द्रमा की पूर्ण अवस्था। पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा से जो किरणें निकलती हैं वह काफी सकारात्मक होती हैं और सीधे दिमाग पर असर डालती हैं। चूंकि चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक है, इसलिए पृथ्वी पर सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्रमा का ही पड़ता है। भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख, माघ और कार्तिक माह की पूर्णिमा स्नान-दान के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। इस पूर्णिमा में जातक को नदी या अपने स्नान करने वाले जल में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करना चाहिए और इसके बाद भगवान विष्णु का विधिवत पूजन करना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखकर एक समय भोजन करें। गाय का दूध, केला, खजूर, नारियल, अमरूद आदि फलों का दान करना चाहिए। ब्राह्मण, बहन, बुआ आदि को कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। 
      कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन वृषोसर्ग व्रत रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान कार्तिकेय और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान हैं। यह व्रत शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है। इसे नक्त व्रत भी कहा जाता है।इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, उज्जैन,कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। 
कार्तिक पूर्णिमा विधि विधान—-
कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है. अन्न, धन एव वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है इस दिन जो भी आप दान करते हैं उसका आपको कई गुणा लाभ मिलता है. मान्यता यह भी है कि आप जो कुछ आज दान करते हैं वह आपके लिए स्वर्ग में सरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में आपको प्राप्त होता है.
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है. शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें. आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें.
     नारद पुराण के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन स्नान आदि कर उपवास रखते हुए भगवान कार्तिकेय की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसी दिन प्रदोष काल में दीप दान करते हुए संसार के सभी जीवों के सुखदायक माने जाने वाले वृषोसर्ग व्रत का पालन करना चाहिए। इस दिन दीपों का दर्शन करने वाले जंतु जीवन चक्र से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन अगर संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्थान करना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्र उदय के बाद वरुण, अग्नि और खड्गधारी कार्तिकेय की गंध, फूल, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजा कर हवन करना चाहिए।
    इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उन्हें दान देना चाहिए। घर के बाहर दीप जलाना चाहिए और उसके पास एक छोटा सा गड्ढा खोदकर उसे दूध से भरना चाहिए। गड्ढे में मोती से बने नेत्रों वाली सोने की मछली डालकर उसकी पूजा करते हुए “महामत्स्याय नमः” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। पूजा के बाद सोने की मछली को ब्राह्मण को दान कर देनी चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था. सिख सम्प्रदाय को मानने वाले सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सगंध लेते हैं. अतः इस दिन गुरू नानक जयन्ती भी मनाई जाती है ।
दान और पूजा क्यों करें????
इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए। कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में व्रत करके वृष (बैल) दान करने से शिव पद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पत्ति बढ़ती है। इस दिन उपवास करके भगवान का स्मरण, चिंतन करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। इस दिन मेष (भेड़) दान करने से ग्रहयोग के कष्टों का नाश होता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  इस दिन कन्यादान से ‘संतान व्रत’ पूर्ण होता है। कार्तिकी पूर्णिमा से प्रारम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस दिन कार्तिक के व्रत धारण करने वालों को ब्राह्मण भोजन, हवन तथा दीपक जलाने का भी विधान है। इस दिन यमुना जी पर कार्तिक स्नान की समाप्ति करके राधा-कृष्ण का पूजन, दीपदान, शय्यादि का दान तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। कार्तिक की पूर्णिमा वर्ष की पवित्र पूर्णमासियों में से एक है।
      हिन्दू धर्म के वेदो, महापुराणों और शास्त्रो ने कार्तिक माह को हिंदी वर्ष का पवित्र और पावन महीना बताया है। कार्तिक माह की शुरुवात शरद या आश्विन पूर्णिमा के दिन से होती है जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन खत्म होती है। कार्तिक माह को स्नान माह भी कहा जाता है क्योकि इस दौरान लोग प्रतिदिन सुबह में पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान कर, पूजा अर्चना व् दान करते है। भीष्म पंचक और विष्णु पंचक का व्रत भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है। 
        ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैदिक काल में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 
      इस बार 23 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र दोपहर 16 बजकर 42 मिनिट तक रहेगा तत्पश्चात रोहिणी नक्षत्र लग जायेगा।।जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायरू श्री सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चैराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। कार्तिकी में यह तिथि देव दीपावली-महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। चान्द्रायणव्रत की समाप्ति भी आज के दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी आदि पवित्र नदियों के समीप स्नान के लिए सहस्त्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेले का रूप बन जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक माह को दामोदर माह भी कहा जाता है क्योकि भगवान विष्णु को दामोदर के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।  कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में अवतरित हुए थे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव जी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। त्रिपुरासुर के वध के पश्चात समस्त लोको के देवी देवताओ ने इस प्रसन्नता में गंगा नदी के किनारे असंख्य  दिये जलाये थे जिस कारण कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली भी कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी के किनारे वाराणसी में देव दीपावली मनाया जाता है। 
जानिए वर्ष 2018 में कार्तिक पूर्ण‍िमा पूजन विधि और समय---
कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा-अराधना करनी चाहिए |
वर्ष 2019 में कार्तिक पूर्णिमा की पूर्णिमा तिथि दिनांक 12 नवम्बर 2019  (मंगलवार) को है।  इस वर्ष दिनांक 11नवंबर , 2019 को 18:04:00 से पूर्णिमा आरम्भ होगी एवम 12 नवंबर, 2019 को 19:06:40 पर पूर्णिमा समाप्त होगी। यदि संभव हो पाए तो इस दिन गंगा स्नान भी करें. अगर हो सके तो पूरे दिन या एक समय व्रत जरूर रखें. कार्तिक पूर्ण‍िमा के दिन खाने में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. अगर हो सके तो ब्राह्मणों को दान दें. केवल इतना ही नहीं, शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने से पुण्य की प्राप्त‍ि होती है |
      गंध, अक्षत, पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, पीपल के पत्तों से गंगाजल से पूजन करें। पूजा गृह, नदियों, सरोवरों, मन्दिरों में दीपदान करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मिट्टी का दीपक अवश्य जलाएं। इससे हमेशा संतति सही रास्ते पर चलेगी। धन की कभी भी कमी नहीं होगी। सुख, समृद्धि में बढ़ोतरी होगी। जीवन में ऊब, उकताहट, एकरसता दूर करने का अचूक उपाय। व्रत से ऐक्सिडेंट-अकाल मृत्यु कभी नहीं होंगे। बच्चे बात मानने लगेंगे। परिवार में किसी को पानी में डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा नहीं होगा। बुरे वक्त में लिया कर्ज उतर जाएगा। आकस्मिक नेत्र रोग से बचाव होगा। नए मकान, वाहन आदि खरीदने के योग बनेंगे।
कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा ----
एक बार त्रिपुर नामक राक्षस ने कठोर तपस्या की, त्रिपुर की तपस्या का प्रभाव जड़-चेतन, जीव-जन्तु तथा देवता भयभीत होने लगे. उस वक्त देवताओं ने त्रिपुर की तपस्या को भंग करने के लिए खूबसूरत अप्सराएं भेजीं लेकिन इसके बावजूद भी वह त्रिपुर की तपस्या को विफल करने में असफल रहीं. त्रिपुर की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी स्वयं उसके सामने प्रकट हुए और उन्होंने त्रिपुर से वर मांगने के लिए कहा. 
     त्रिपुर ने वर मांगते हुए कहा कि 'न मैं देवताओं के हाथ से मरु, न मनुष्यों के हाथ से. ब्रह्मा जी से वर कती प्राप्ति होने के बाद त्रिपुर निडर होकर लोगों पर अत्याचार करने लगा. लोगों पर अत्याचार करने के बाद भी जब उसका मन नहीं भरा तो उसने कैलाश पर्वत पर ही चढ़ाई कर दी. यही कारण था कि त्रिपुर और भगवान शिव के बीच युद्ध होने लगा. भगवान शिव और त्रिपुर के बीच लंबे समय तक युद्ध चलने के बाद अंत में भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से त्रिपुर का वध कर दिया. इस दिन से ही क्षीरसागर दान का अनंत माहात्म्य माना जाता है. 
कार्तिक पूर्णिमा व्रत,पूजा विधि तथा महत्व ---
कार्तिक पूर्णिमा को स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। पूजा-अर्चना की समाप्ति के बाद अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए ।  दान ब्राह्मणो, बहन, भांजे आदि को देना चाहिए। ऐसी मान्यता है की कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। 
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  शाम के समय वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु इस मंत्र का उच्चारण करते हुए चाँद देव को अर्घ्य देना चाहिए। एकादशी व् तुलसी विवाह से चली आ रही पंचक व्रत कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होती है। तो प्रेम से बोलिए भगवान विष्णु जी की जय हो।  आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं। इसीलिए दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा बिना विष्णु, श्रीगणेश के साथ की जाती है। लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह विष्णु स्वरूप शालिग्राम से होता है। इसी खुशी में देवता स्वर्गलोक में दिवाली मनाते हैं इसीलिए इसे देव दिवाली कहा जाता है।

सफलता का मंत्र---
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम…पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय…..पूर्णमेवावशिष्यते

क्यों किया जाता हें कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान ???
कार्तिक पूर्णिमा पर नदी स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बड़ी संख्या में देश की सभी प्रमुख नदियों पर श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचते हैं। प्राचीन काल से ही यह प्रथा चली आ रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान का बड़ा ही महत्व है। आरोग्य प्राप्ति तथा उसकी रक्षा के लिए भी प्रतिदिन स्नान लाभदायक होता है। फिर भी माघ वैशाख तथा कार्तिक मास में नित्य दिन के स्नान का खास महत्व है। खासकर गंगा स्नान से।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  यह व्रत शरद पूर्णिमा से आरंभ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को संपन्न किया जाता है। इसमें स्नान कुआं, तालाब तथा नदी आदि में करना ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। कुरुक्षेत्र, अयोध्या तथा काशी आदि तीर्थों पर स्नान का और भी अधिक महत्व है। भारत के बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटी-छोटी बस्तियों में भी अनेक स्त्रीपुरुष, लड़के-लड़कियां कार्तिक स्नान करके भगवान का भजन तथा व्रत करते हैं। सायंकाल के समय मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीप जलाये जाते हैं। लंबे बांस में लालटेन बांधकर किसी ऊंचे स्थान पर कंडीलें प्रकाशित करते हैं। इन व्रतों को स्त्रियां तथा अविवाहित लड़कियां बड़े मनोयोग से करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे कुवांरी लड़कियों को मनपसंद वर मिलता है। तथा विवाहित स्त्रियों के घरों में सुख-समृद्धि आती है। 
जानिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी स्नान क्यों किया जाता है?
इसके कई कारण हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास को बहुत पवित्र और पूजा-अर्चना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। पुण्य प्राप्त करने के कई उपायों में कार्तिक स्नान भी एक है। पुराणों के अनुसार इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में किसी पवित्र नदी में स्नानकर भगवान विष्णु या अपने इष्ट की आराधना करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  ऐसा माना जाता है कलियुग में कार्तिक पूर्णिमा पर विधि-विधान से नदी स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।
       कार्तिक महीने में नदी स्नान का धार्मिक महत्व तो है साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्षा ऋतु के बाद मौसम बदलता है और हमारा शरीर नए वातावरण में एकदम ढल नहीं पाता। ऐसे में कार्तिक मास में सुबह-सुबह नदी स्नान करने से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है जो कि पूरा दिन साथ रहती है। जिससे जल्दी थकावट नहीं होती और हमारा मन कहीं ओर नहीं भटकता। साथ ही जल्दी उठने से हमें ताजी हवा से प्राप्त होती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही फायदेमंद होती है। ऐसे में ताजी और पवित्र नदी स्नान से कई शारीरिक बीमारियां भी समाप्त हो जाती है।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।
कार्तिक पूर्णिमा का क्यों हें इतना महत्व —-
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष पंद्रह पूर्णिमाएं होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर १६ हो जाती है।कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है । इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फाल मिलता है।
      कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। इस दिन किये जाने वाले अन्न, धन एव वस्त्र दान का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी दान किया जाता हैं उसका कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो कुछ दान करता है वह उसके लिए स्वर्ग में संरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में उसे पुनःप्राप्त होता है।
      मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान यानी बछड़ा दान करने से शिवपद की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है. इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी.वैष्णव मत में इस कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है क्योंकि इस दिन ही भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था. इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी (Maha kartiki Purnima) भी कहा गया है. यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है. अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है. इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है. कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है |
      ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा(KartikTripuri Poornima) के नाम से भी जाना जाता है. इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे. ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका नक्षत्र में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है.शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
     ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इसमें कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो “पद्मक योग” बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
दीप दान का है महत्व----
मत्स्य पुराण के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप-दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। इसलिए इस दिन ब्राह्मणों को विधिवत आदर भाव से निमंत्रित करके भोजन कराना चाहिए।
    ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुर्नजन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि के वक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवप्रद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पति बढ़ती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरंभ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।
सिख धर्म के लिए भी खास है कार्तिक पूर्णिमा का दिन-----
सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानक। गुरु नानकदेव से मोक्ष तक पहुँचने के एक नए मार्ग का अवतरण होता है। इतना प्यारा और सरल मार्ग कि सहज ही मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है।गुरू नानक जयन्‍ती, 10 सिक्‍ख गुरूओं के गुरू पर्वों या जयन्तियों में सर्वप्रथम है। यह सिक्‍ख पंथ के संस्‍थापक गुरू नानक देव, जिन्‍होंने धर्म में एक नई लहर की घोषणा की, की जयन्‍ती है।गुरू नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) है। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं।
      गुरु नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु माने जाते हैं। इन्हें सिख धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। गुरु नानक जी का जन्मदिन प्रकाश दिवस के रूप में "कार्तिक पूर्णिमा" के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष गुरु नानक जयंती 12 नवंबर, 2019 को मनाई जाएगी। इस दिन जगह-जगह जुलूस निकाले जाते हैं और गुरुद्वारों में "गुरु ग्रंथ साहिब" का अखंड पाठ किया जाता है।
    कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि का विशेष महत्व होता है. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन दान का फल दोगुना या उससे भी ज्यादा मिलता है.शायद आप जानते नहीं होंगे कि कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था|
जन्म - 
  • श्री गुरु नानक देव जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी गांव में कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन 1469 को राएभोए के तलवंडी नामक स्थान में, कल्याणचंद (मेहता कालू) नाम के एक किसान के घर गुरु नानक का जन्म हुआ था। उनकी माता का नाम तृप्ता था। तलवंडी को ही अब नानक के नाम पर ननकाना साहब कहा जाता है, जो पाकिस्तान में है...गुरु नानक देव जी बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। बहुत कम आयु से ही उन्होंने भ्रमण द्वारा अपने उपदेशों और विचारों को जनता के बीच रखा।
  • गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। 
  • संत साहित्य में नानक अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।
  • सिक्‍ख समाज में कई धर्मों के चलन व विभिन्‍न देवताओं को स्‍वीकार करने के प्रति अरुचि ने व्‍यापक यात्रा किए हुए नेता को धार्मिक विविधता के बंधन से मुक्‍त होने, तथा एक प्रभु जो कि शाश्‍वत सत्‍य है के आधार पर धर्म स्‍थापना करने की प्रेरणा दी। 

इस कार्तिक पूर्णिमा पर करें ये उपाय/टोटके---(कार्तिक पूर्णिमा को ये उपाय करने से मां लक्ष्मी होगी प्रसन्न)---
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक मास में शुद्ध घी, तिलों के तेल और सरसों के तेल का दीपक जलाने से अश्वतमेघ यज्ञ जितना पुण्य प्राप्त होता है। इस माह में दीपदान करने से भगवान विष्णुक भी प्रसन्नन होते हैं। 
हिंदू धर्म शास्त्रों में भी कहा गया है कि – मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्यु: कपर्दका:।
अर्थात किसी व्यक्ति के पास धन-संपत्ति का अभाव होने पर उसके मित्र भी उसका साथ छोड़ देते है। प्राचीन मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी को ऐश्वर्य और वैभव की देवी कहा गया है। परंतु व्यक्ति को वैभव, ऐश्वर्य के साथ आनंद और सुख तभी मिलता है जब वह पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ धन कमाता है।

  1. इस महीने में लक्ष्मी जी के समक्ष दीप जलाने का भी अत्यधिक महत्व है। यह दीप जीवन के अंधकार को दूर कर, आशा की रोशनी देने का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक माह में घर के मंदिर, नदी के तट एवं शयन कक्ष में दीप जलाने का महत्व पाया गया है।
  2. यमुना जी पर कार्तिक स्नान का समापन करके भगवान श्री कृष्ण जी का राधा जी सहित पूजन करके दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से श्री कृष्ण जी की भक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा के महापर्व का लाभ उठाएं। इस पुनीत अवसर पर श्रद्धा तथा विश्वास पूर्वक पूजा पाठ और हवन इत्यादि करें।
  3. कार्तिक के पूरे माह में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके तुलसी को जल चढ़ाने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस माह में तुलसी के पौधे को दान करना भी शुभ माना गया है।
  4. माँ लक्ष्मी को गन्ना, अनार व सीताफल चढ़ाएँ। 
  5. सम्भव हो तो इस दिन मंदिर में भंडारा करवाएं। 
  6. दीपदान संध्याकाल में ही करें।
  7. कार्तिक माह में तुलसी का पूजन और सेवन करने से घर में सदा सुख-शांति बनी रहती है। तुलसी की कृपा से आपके घर से नकारात्मसक शक्ति दूर रहती है।
  8. इन दिनों दरिद्रता के नाश के लिए पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें।
  9. शाम के समय ‘वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरू’ मंत्र बोलते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान श्रेष्ठ कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के संबंध में ऋषि अंगिरा ने लिखा है कि इस दिन सबसे पहले हाथ-पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें। 
  10. यदि स्नान में कुश और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फलों से सम्पूर्ण पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  दान देते समय जातक हाथ में जल लेकर ही दान करें। स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है गृहस्थ व्यक्ति को तिल व आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करने से असीम पुण्य मिलता है। 
  11. विधवा तथा सन्यासियों को तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मिट्टी को लगाकर स्नान करना चाहिए। इस दौरान भगवान विष्णु के ऊं अच्युताय नम:, ऊं केशवाय नम:, ऊॅ अनंताय नम: मन्त्रों का जाप करना चाहिए। 
  12. पूर्णिमा मां लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहती है। पूर्णिमा को प्रात: 5 बजे से 10:30 मिनट तक मां लक्ष्मी का पीपल के वृक्ष पर निवास रहता है। इस दिन जो भी जातक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है उस पर मां लक्ष्मीप्रसन्न होती है। 
  13. प्रातः काल उठकर व्रत रहने का संकल्प लें। 
  14. गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कीजिए। 
  15. श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। 
  16. श्री रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें। 
  17. इस पवित्र दिन पर चंद्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, प्रीति, अनुसुइया तथा छमा इन 6 कृतिकाओं का पूजन करें।
  18. कार्तिक पूर्णिमा के गरीबों को चावल दान करने से चन्द्र ग्रह शुभ फल देता है। इस दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिलकार चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते है। 
  19. ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की  कार्तिक पूर्णिमा को घर के मुख्यद्वार पर आम के पत्तों से बनाया हुआ तोरण अवश्य बांधे। वैवाहिक व्यक्ति पूर्णिमा के दिन भूलकर भी अपनी पत्नी या अन्य किसी से शारीरिक सम्बन्ध न बनाएं, अन्यथा चन्द्रमा के दुष्प्रभाव आपको व्यथित करेंगे। 
  20. आज के दिन चन्द्रमा के उदय होने के बाद खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें। 
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