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"माँ बगलामुखी जयंती",इस वर्ष 14 मई 2016 को मनाई जायेगी

माँ बगलामुखी रोग शोक और शत्रु को समूल नष्ट कर देती है,जो हमारा अनिष्ट चाहते है उनका अनिष्ट करती है,प्रबल से प्रबल शत्रु भी इनके साधक और उपासको के आगे पानी भरते हैं,और कोई इनके उपासको का बाल भी बंका नही कर सकता है।। माँ बगलामुखी १० महाविद्याओं में आठवां स्वरुप हैं। ये महाविद्यायें भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली हैं। सांख़यायन तन्त्र के अनुसार बगलामुखी को सिद्घ विद्या कहा गया है। तन्त्र शास्त्र में इसे ब्रह्मास्त्र, स्तंभिनी विद्या, मंत्र संजीवनी विद्या तथा प्राणी प्रज्ञापहारका एवं षट्कर्माधार विद्या के नाम से भी अभिहित किया गया है। 
           सांख़यायन तंत्र के अनुसार ‘कलौ जागर्ति पीतांबरा।’ अर्थात कलियुग के तमाम संकटों के निराकरण में भगवती पीता बरा की साधना उत्तम मानी गई है। अतः आधि व्याधि से त्रस्त वर्तमान समय में मानव मात्र माँ पीतांबरा की साधना कर अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक सिद्घियों को अर्जित कर अपनी समस्त अभिलाषाओं को प्राप्त कर सकता है। बगलामुखी की साधना से साधक भयरहित हो जाता है और शत्रु से उसकी रक्षा होती है। बगलामुखी का स्वरूप रक्षात्मक, शत्रुविनाशक एवं स्तंभनात्मक है। यजुर्वेद के पंचम अध्याय में ‘रक्षोघ्न सूक्त’ में इसका वर्णन है। इसका आविर्भाव प्रथम युग में बताया गया है। 
          कलियुग में माँ बगलामुखी की साधना उपासना तुरंत फलदायी होती है तथा यह विजय की देवी हैं इनके भक्त कभी पराजय का मुंह नही देखते,देश के जाने माने अधिकांश राजनेता और राजनीती करने वाले व्यक्ति इनके उपासक है, जो अपनी चुनाव विजय तथा शत्रुओ के पराभव के लिए गुप्त रूप से इनके तांत्रिक अनुष्ठान हवन पूजन आदि कराते हैं।। इनके हवन में पिसी हुई शुद्ध हल्दी,मालकांगनी, काले तिल,गूगल,पीली हरताल,पीली सरसो, नीम का तेल, सरसो का तेल,बेर की लकड़ी,सूखी साबुत लाल मिर्च आदि भिन्न 2 सामग्रियों का उपयोग भिन्न 2 कामनाओ के लिए किया जाता है।। तांत्रिक पद्धति से किया गया माँ बगलामुखी का पूजन त्वरित और तीव्र परिणाम देता है जब शत्रु भारी पड रहे हो,पानी सर के ऊपर से गुज़र रहा हो ,मुक़दमे पीछे न छोड़ रहे हो,मेहनत करने के बाद भी व्यापर ठप हो रहा हो,कोई मार्ग नही सूझ रहा हो,उच्चाधिकारी परेशान कर रहे हो उत्पीड़न कर रहे हो,ऐसे विकट समय में व्यक्ति को माँ बगलामुखी(ब्रह्मास्त्र विद्या) का एक बार आश्रय लेकर इनकी शक्ति का प्रमाण और परिणाम अवश्य देखना चाहिए! 
            इस वर्ष 14 मई 2016 को माँ बगलामुखी जयंती है जोकि अपने आप में इनके पूजन हवन अनुष्ठान आदि कार्यो के लिए स्वयं सिद्ध मुहूर्त है, आप भी माँ बगलामुखी की साधना पूजा हवन अर्चना करके माँ की कृपा प्राप्त करे और अपने गुप्त प्रत्यक्ष सूक्ष्म स्थूल समस्त दरिद्रत आदि शत्रुओ पर विजय प्राप्त करके माँ की शक्ति का अनुभव करे।।
आइये जाने की केसे मनाएं “बगलामुखी जयंती”..??? केसे करें माँ बगलामुखी साधना..??? क्या सावधानियां एवं उपाय और मन्त्र जाप किये जाएँ..?? 
maa-bagla-mukhi-jyanti-this-year-will-be-celebrated-on-May-14-2016-"माँ बगलामुखी जयंती",इस वर्ष 14 मई 2016 को मनाई जायेगी देवी बगलामुखी तंत्र की देवी है। तंत्र साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पहले देवी बगलामुखी को प्रसन्न करना पड़ता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार वैशाख शुक्ल अष्टमी को मां बगलामुखी की जयंती मनाई जाती है। होगा महाभय का नाश….शत्रु मिटेंगे-मिलेगी सफलता….पुत्र,पत्नी, परिवार और संपत्ति की होगी सुरक्षा…. जीवन में हर ओर मिलेगी सफलता ही सफलता….आ गयी है शत्रु बाधा नाशक…… “बगलामुखी जयंती” वैसाख माह को पवित्र और शुद्ध मास माना जाता है। इस माह में सारे शुभ काम किये जाते हैं। यह इस मास की विशेषता है कि शुक्ल पक्ष के द्वितीया को परशुराम जयंती, तृतीया को अक्षय तृतीया, त्रेता युग का प्रारंभ इसी दिन हुआ था। चतुर्थी को गणेश चतुर्थी, पंचमी को आदि शंकराचार्य जयंती, षष्ठी को रामानुचार्य जयंती, सप्तमी को गंगा सप्तमी, अष्टमी को बगलामुखी जयंती, नवमी को जानकी जयंती, त्रयोदशी को नरसिंह जयंती और पूर्णिमा को भगवान बुद्ध की जयंती होती है। इस दिन व्रत एवं पूजा उपासना कि जाती है साधक को माता बगलामुखी की निमित्त पूजा अर्चना एवं व्रत करना चाहिए. बगलामुखी जयंती पर्व देश भर में हर्षोउल्लास व धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं। इस अवसर पर जगह-जगह अनुष्ठान के साथ भजन संध्या एवं विश्व कल्याणार्थ महायज्ञ का आयोजन किया जाता है तथा महोत्सव के दिन शत्रु नाशिनी बगलामुखी माता का विशेष पूजन किया जाता है और रातभर भगवती जागरण होता है।। 
 **** जानिए कौन है बगलामुखी मां..??? 
 मां बगलामुखी जी आठवी महाविद्या हैं। इनका प्रकाट्य स्थल गुजरात के सौरापट क्षेत्र में माना जाता है। हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। इसलिए, हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं। माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं. माँ बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए।। 
          देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है. बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं. देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है।। पीताम्बरा की उपासना से मुकदमा में विजयी प्राप्त होती है। शत्रु पराजित होते हैं। रोगों का नाश होता है। साधकों को वाकसिद्धि हो जाती है। इन्हें पीले रंग का फूल, बेसन एवं घी का प्रसाद, केला, रात रानी फूल विशेष प्रिय है। पीताम्बरा का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया और नलखेडा(जिला-शाजापुर) और आसाम के कामाख्या में है। 
 ****जानिए क्या करें " माँ बगलामुखी जयंती" के दिन..??? 
 इस दिन साधक को माता बगलामुखी की निमित्त व्रत एवं उपवास करना चाहिए तथा देवी का पूजन करना चाहिए। देवी बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्त के शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों को रोक देती हैं। देवी बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है। इसका कारण है कि इनका रंग सोने के समान पीला है। इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है। साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए। 
यह हें माँ बगलामुखी मंत्र —
- श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि। 
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये। 
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:। 
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:। 

इसके पश्चात आवाहन करना चाहिए…. 
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा। 

अब देवी का ध्यान करें इस प्रकार….. 
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम् हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम् हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

 **** सामान्य बगलामुखी मंत्र —– 
 "ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा"। माँ बगलामुखी की साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है. यह मंत्र विधा अपना कार्य करने में सक्षम हैं. मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है. बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए. देवी बगलामुखी पूजा अर्चना सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली तथा मुकदमों में विजय दिलाने वाली होती है।।
 **** जानिए श्री सिद्ध बगलामुखी देवी महामंत्र को—–
 "ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:" इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे —- 
1. मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते है। 
2. मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है। 
3. तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है। 
4. हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।
 1) भय नाशक मंत्र—– अगर आप किसी भी व्यक्ति वस्तु परिस्थिति से डरते है और अज्ञात डर सदा आप पर हावी रहता है तो देवी के भय नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए… 
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हन 
पीले रंग के वस्त्र और हल्दी की गांठें देवी को अर्पित करें… पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें… रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें… दक्षिण दिशा की और मुख रखें…. 
2) शत्रु नाशक मंत्र—- अगर शत्रुओं नें जीना दूभर कर रखा हो, कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्करों से तंग हो गए हों, शत्रु चैन से जीने नहीं दे रहे, प्रतिस्पर्धी आपको परेशान कर रहे हैं तो देवी के शत्रु नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए…. 
ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु 
नारियल काले वस्त्र में लपेट कर बगलामुखी देवी को अर्पित करें…. मूर्ती या चित्र के सम्मुख गुगुल की धूनी जलाये …. रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय पश्चिम कि ओर मुख रखें…. 
3) जादू टोना नाशक मंत्र—- यदि आपको लगता है कि आप किसी बुरु शक्ति से पीड़ित हैं, नजर जादू टोना या तंत्र मंत्र आपके जीवन में जहर घोल रहा है, आप उन्नति ही नहीं कर पा रहे अथवा भूत प्रेत की बाधा सता रही हो तो देवी के तंत्र बाधा नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए…. 
ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पीताम्बरे तंत्र बाधाम नाशय नाशय 
आटे के तीन दिये बनाये व देसी घी ड़ाल कर जलाएं…. कपूर से देवी की आरती करें…. रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय दक्षिण की और मुख रखे…. 
4) प्रतियोगिता इंटरवियु में सफलता का मंत्र—– आपने कई बार इंटरवियु या प्रतियोगिताओं को जीतने की कोशिश की होगी और आप सदा पहुँच कर हार जाते हैं, आपको मेहनत के मुताबिक फल नहीं मिलता, किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो पा रहे, तो देवी के साफल्य मंत्र का जाप करें…. 
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं बगामुखी देव्यै ह्लीं साफल्यं देहि देहि स्वाहा: 
बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं… देवी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख एक अखंड दीपक जला कर रखें… रुद्राक्ष की माला से 8 माला का मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय पूर्व की और मुख रखें… 
5) बच्चों की रक्षा का मंत्र—- यदि आप बच्चों की सुरक्षा को ले कर सदा चिंतित रहते हैं, बच्चों को रोगों से, दुर्घटनाओं से, ग्रह दशा से और बुरी संगत से बचाना चाहते हैं तो देवी के रक्षा मंत्र का जाप करना चाहिए.. . 
ॐ हं ह्लीं बगलामुखी देव्यै कुमारं रक्ष रक्ष 
देवी माँ को मीठी रोटी का भोग लगायें… दो नारियल देवी माँ को अर्पित करें… रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें…. मंत्र जाप के समय पश्चिम की ओर मुख रखें… 
6) लम्बी आयु का मंत्र—- यदि आपकी कुंडली कहती है कि अकाल मृत्यु का योग है, या आप सदा बीमार ही रहते हों, अपनी आयु को ले कर परेशान हों तो देवी के ब्रह्म विद्या मंत्र का जाप करना चाहिए… 
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी स्वाहा: 
पीले कपडे व भोजन सामग्री आता दाल चावल आदि का दान करें… मजदूरों, साधुओं,ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन खिलाये… प्रसाद पूरे परिवार में बाँटें…. रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें… 
7) बल प्रदाता मंत्र—- यदि आप बलशाली बनने के इच्छुक हो अर्थात चाहे देहिक रूप से, या सामाजिक या राजनैतिक रूप से या फिर आर्थिक रूप से बल प्राप्त करना चाहते हैं तो देवी के बल प्रदाता मंत्र का जाप करना चाहिए… 
ॐ हुं हां ह्लीं देव्यै शौर्यं प्रयच्छ 
पक्षियों को व मीन अर्थात मछलियों को भोजन देने से देवी प्रसन्न होती है… पुष्प सुगंधी हल्दी केसर चन्दन मिला पीला जल देवी को को अर्पित करना चाहिए… पीले कम्बल के आसन पर इस मंत्र को जपें…. रुद्राक्ष की माला से 7 माला मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें… 
8) सुरक्षा कवच का मंत्र—- प्रतिदिन प्रस्तुत मंत्र का जाप करने से आपकी सब ओर रक्षा होती है, त्रिलोकी में कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता …. 
ॐ हां हां हां ह्लीं बज्र कवचाय हुम 
देवी माँ को पान मिठाई फल सहित पञ्च मेवा अर्पित करें.. छोटी छोटी कन्याओं को प्रसाद व दक्षिणा दें… रुद्राक्ष की माला से 1 माला का मंत्र जप करें… मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें… ये स्तम्भन की देवी भी हैं। कहा जाता है कि सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिलकर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रु नाश, वाक सिद्धि, वाद-विवाद में विजय के लिए देवी बगलामुखी की उपासना की जाती है।

बगलामुखी देवी को प्रसन्न करने के लिए 36 अक्षरों का बगलामुखी महामंत्र —- 
‘ऊं हल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिहवां कीलय बुद्धिं विनाशय हल्रीं ऊं स्वाहा’ 
का जप, हल्दी की माला पर करना चाहिए। 
 **** जानिए केसे करें मां बगलामुखी पूजन…?? 
 माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के लुए पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें।। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। 
         आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें. इस पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।। 
 ****इस अवसर पर मां बगलामुखी को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार पूजन करें- 
 साधक को माता बगलामुखी की पूजा में पीले वस्त्र धारण करना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर इस प्रकार संकल्प करें-
 ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य……(अपने गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नोहं ……(नाम) मम सर्व शत्रु स्तम्भनाय बगलामुखी जप पूजनमहं करिष्ये। तदगंत्वेन अभीष्टनिर्वध्नतया सिद्ध्यर्थं आदौ: गणेशादयानां पूजनं करिष्ये।
 इसके बाद भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। नीचे लिखे मंत्रों से गौरी आदि षोडशमातृकाओं का पूजन करें- 
गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया। देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातर:।। 
धृति: पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मन: कुलदेवता। गणेशेनाधिकाह्योता वृद्धौ पूज्याश्च षोडश।। 

       इसके बाद गंध, चावल व फूल अर्पित करें तथा कलश तथा नवग्रह का पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात इस मंत्र का जप करते हुए देवी बगलामुखी का आवाह्न करें- 
नमस्ते बगलादेवी जिह्वा स्तम्भनकारिणीम्। भजेहं शत्रुनाशार्थं मदिरा सक्त मानसम्।। 
 आवाह्न के बाद उन्हें एक फूल अर्पित कर आसन प्रदान करें और जल के छींटे देकर स्नान करवाएं व इस प्रकार पूजन करें- 
गंध- ऊँ बगलादेव्यै नम: गंधाक्षत समर्पयामि। का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीला चंदन लगाएं और पीले फूल चड़ाएं। 
पुष्प- ऊँ बगलादेव्यै नम: पुष्पाणि समर्पयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले फूल चढ़ाएं। 
धूप- ऊँ बगलादेव्यै नम: धूपंआघ्रापयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को धूप दिखाएं। 
दीप- ऊँ बगलादेव्यै नम: दीपं दर्शयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को दीपक दिखाएं। 
नैवेद्य- ऊँ बगलादेव्यै नम: नैवेद्य निवेदयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। 
अब इस प्रकार प्रार्थना करें- 
जिह्वाग्रमादाय करणे देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयन्ताम्। 
गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि।। 
 अब क्षमा प्रार्थना करें- 
 आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।। 
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।। 
 अब नीचे लिखे मंत्र का एक माला जप करें- 
गायत्री मंत्र- ऊँ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भनबाणाय धीमहि। तन्नो बगला प्रचोदयात्।। 
अष्टाक्षर गायत्री मंत्र- ऊँ ह्रीं हं स: सोहं स्वाहा। हंसहंसाय विद्महे सोहं हंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।। 
अष्टाक्षर मंत्र- ऊँ आं ह्लीं क्रों हुं फट् स्वाहा 
त्र्यक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं ऊँ 
नवाक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि ठ: 
एकादशाक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि स्वाहा। ऊँ ह्ल्रीं हूं ह्लूं बगलामुखि ह्लां ह्लीं ह्लूं सर्वदुष्टानां ह्लैं ह्लौं ह्ल: वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय ह्ल: ह्लौं ह्लैं जिह्वां कीलय ह्लूं ह्लीं ह्लां बुद्धिं विनाशाय ह्लूं हूं ह्लीं ऊँ हूं फट्। 
षट्त्रिंशदक्षरी मंत्र- ऊँ ह्ल्रीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ऊँ स्वाहा। अंत में माता बगलामुखी से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं से मुक्ति की प्रार्थना करें। 
 **** जानिए माँ बगलामुखी की कथा— 
 देवी बगलामुखी जी के संदर्भ में एक कथा बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच जाता है और अनेकों लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया. यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।। इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव उनसे कहते हैं कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएँ, तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुँच कर कठोर तप करते हैं।।
        भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया देवी शक्ति उनकी साधना से प्रसन्न हुई और सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ।। उस समय चतुर्दशी की रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी नें प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका. देवी बगलामुखी को बीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वम ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्र महारुद्र कहा जाता है इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं. तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।।
 **** " माँ बगलामुखी साधना" इन बातों का रखें विशेष ध्यान/सावधानियां— 
 बगलामुखी आराधना में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। साधना में पीत वस्त्र धारण करना चाहिए एवं पीत वस्त्र का ही आसन लेना चाहिए। आराधना में पूजा की सभी वस्तुएं पीले रंग की होनी चाहिए। आराधना खुले आकश के नीचे नहीं करनी चाहिए। आराधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा साधना क्रम में स्त्री स्पर्श, चर्चा और संसर्ग कतई नहीं करना चाहिए। साधना डरपोक किस्म के लोगों को नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी देवी अपने साधक की परीक्षा भी लेती हैं। साधना काल में भयानक अवाजें या आभास हो सकते हैं, इससे धबराना नहीं चाहिए और अपनी साधना जारी रखनी चाहिए। 
          साधना गुरु की आज्ञा लेकर ही करनी चाहिए और शुरू करने से पहले गुरु का ध्यान और पूजन अवश्य करना चाहिए। बगलामुखी के भैरव मृत्युंजय हैं, इसलिए साधना के पूर्व महामृत्युंजय मंत्र का एक माला जप अवश्य करना चाहिए। साधना उत्तर की ओर मुंह करके करनी चाहिए। मंत्र का जप हल्दी की माला से करना चाहिए। जप के पश्चात् माला अपने गले में धारण करें। साधना रात्रि में 9 बजे से 12 बजे के बीच प्रारंभ करनी चाहिए। मंत्र के जप की संखया निर्धारित होनी चाहिए और रोज उसी संखया से जप करना चाहिए। यह संखया साधक को स्वयं तय करना चाहिए। साधना गुप्त रूप से होनी चाहिए। साधना काल में दीप अवश्य जलाया जाना चाहिए। जो जातक इस बगलामुखी साधना को पूर्ण कर लेता है, वह अजेय हो जाता है, उसके शत्रु उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते।

जानिए किन उपायों / टोटकों द्वारा पायें इस अक्षय तृतीय (सोमवार, 9 मई 2016) पर सुख-वैभव-समृद्धि

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है। अक्षय तृतीया का शाब्दिक अर्थ है कि जिस तिथि का कभी क्षय न हो अथवा कभी नाश न हो, जो अविनाशी हो।अक्षय तृतीया का पर्व ग्रीष्म ऋतृ में पड़ता है, इसलिए इस पर्व पर ऐसी वस्तुओं का दान करना चाहिए। जो गर्मी में उपयोगी एंव राहत प्रदान करने वाली हो। 
Know-What-measures-Totkon-obtain-this-renewable-by-third-Monday-May-9th-2016-are-the-glory-and-prosperity-जानिए किन उपायों / टोटकों द्वारा पायें इस अक्षय तृतीय (सोमवार, 9 मई 2016) पर सुख-वैभव-समृद्धि           पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09039390067 ) के अनुसार अक्षय तृतीया पर कुंभ का पूजन व दान अक्षय फल प्रदान करता है। धर्मशास्त्र की मान्यता अनुसार यदि इस दिन नक्षत्र व योग का शुभ संयोग भी बन रहा हो तो इसके महत्व में और वृद्घि होती हैं। इस वर्ष रोहिणी नक्षत्र व सौभाग्य योग के साथ आ रही आखातीज पर दिया गया कुंभ का दान भाग्योदय कारक होगा। इस दिन दान एंव उपवास करने हजार गुना फल मिलता है। अक्षय तृतीया के दिन महालक्ष्मी की साधना विशेष लाभकारी एंव फलदायक सिद्ध होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया की अधिष्ठात्री देवी माता गौरी है। उनकी साक्षी में किया गया धर्म-कर्म व दिया गया दान अक्षय हो जाता है, इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया है। आखातीज अबूझ मुहूर्त मानी गई है। अक्षय तृतीया से समस्त मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते है। हालांकि मेष राशि के सूर्य में धार्मिक कार्य आरंभ माने जाते है, लेकिन शास्त्रीय मान्यता अनुसार सूर्य की प्रबलता व शुक्ल पक्ष की उपस्थिति में मांगलिक कार्य करना अतिश्रेष्ठ हैं। 
***** क्या करें अक्षय तृतीया के दिन--???? पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09039390067 ) के अनुसार 
  1. इस दिन समुद्र या गंगा स्नान करना चाहिए। 
  2. प्रातः पंखा, चावल, नमक, घी, शक्कर, साग, इमली, फल तथा वस्त्र का दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी चाहिए।
  3. ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। 
  4. इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए। 
  5. आज के दिन नवीन वस्त्र, शस्त्र, आभूषणादि बनवाना या धारण करना चाहिए। 
  6. नवीन स्थान, संस्था, समाज आदि की स्थापना या शुभारम्भ भी आज ही करना चाहिए। 

**** शास्त्रों में अक्षय तृतीया का वर्णन/ जानकारी ----- 
  1.  इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है।
  2. इसी दिन श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। 
  3. नर-नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था। 
  4. श्री परशुरामजी का अवतरण भी इसी दिन हुआ था। 
  5. हयग्रीव का अवतार भी इसी दिन हुआ था। 
  6. वृंदावन के श्री बाँकेबिहारीजी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण-दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढँके रहते हैं। 
  7. भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। 
  8. भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। 
  9. ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। हैं। अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है।
 यदि आपकी जन्म कुंडली में स्थित ग्रह आपके ऊपर अशुभ प्रभाव डाल रहे हैं तो इसके लिए उपाय भी अक्षय तृतीया से प्रारंभ किया जा सकता है। 
उपाय------ अक्षय तृतीया के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निपट कर तांबे के बर्तन में शुद्ध जल लेकर भगवान सूर्य को पूर्व की ओर मुख करके चढ़ाएं तथा इस मंत्र का जप करें- ""ऊँ भास्कराय विग्रहे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ।""
       प्रत्येक दिन सात बार इस प्रक्रिया को दोहराएं। आप देखेंगे कि कुछ ही दिनों में आपका भाग्य चमक उठेगा। यदि यह उपाय सूर्योदय के एक घंटे के भीतर किया जाए तो और भी शीघ्र फल देता है।

कब और कैसे मनाएं हनुमान जयंती वर्ष 2016 में.. क्या करें उपाय या टोटकें इस हनुमान जयंती पर

 When-and-how-to-celebrate-Hanuman-Jayanti-in-2016-What-measures-or-the-Hanuman-Jayanti-कब और कैसे मनाएं हनुमान जयंती वर्ष 2016 में ?? क्या करें उपाय या टोटकें इस हनुमान जयंती पर पवनपुत्र हनुमान जी को शिवजी का ग्यारहवां अवतार माना जाता है। हिन्दू मान्यतानुसार रुद्रावतार भगवान हनुमान माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र हैं। भगवान हनुमान जी की जन्मतिथि पर कई मतभेद हैं लेकिन अधिकतर लोग चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही हनुमान जयंती के रूप में मानते हैं। हनुमान जी के जन्म का वर्णन वायु- पुराण में किया गया है।
 **** हनुमान जयंती 2016---- 
इस वर्ष हनुमान जयंती 22अप्रैल 2016 (शुक्रवार को) वैशाख पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र और तुला राशि में मनाई जाएगी। 
**** जानिए की कैसे करें हनुमान जी की पूजा --- 
हनुमान जयंती के दिन प्रात: काल सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। पूजा में ब्रह्मचर्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हनुमान जी की पूजा में चन्दन, केसरी, सिन्दूर, लाल कपड़े और भोग हेतु लड्डू अथवा बूंदी रखने की परंपरा है। 
 **** इस हनुमान जयंती पर आजमाएं ये उपयोगी उपाय या टोटके- हनुमान जयंती के टोटके विशेष फल प्रदान करते है। 
  1.  हनुमानजी और मंगल देवता की विशेष पूजा का दिन होता है। यह टोटके हनुमान जयंती से आरंभ कर प्रति मंगलवार को करने से मनोकामनाओं की पूर्ती होती है। व्यक्ति जब तरक्की करता है, तो उसकी तरक्की से जल कर उसके अपने ही उसके शत्रु बन जाते हैं और उसे सहयोग देने के स्थान पर वही उसके मार्ग को अवरूद्ध करने लग जाते हैं। ऎसे शत्रुओं से निपटना अत्यधिक कठिन होता है। 
  2. हनुमान जयंती के दिन 11 पीपल के पत्ते लें। उनको गंगाजल से अच्छी तरह धोकर लाल चंदन से हर पत्ते पर 7 बार राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मन्दिर में चढा आएं तथा वहां प्रसाद बाटें और इस मंत्र का जाप जितना कर सकते हो करें। "जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरू देव की नांई" हनुमान जयंती के बाद 7 मंगलवार इस मंत्र का लगातार जप करें। प्रयोग गोपनीय रखें। आश्चर्यजनक धन लाभ होगा। 
  3. हनुमान जयंती का विशेष टोटका बजरंगबली---- चमत्कारिक सफलता देने वाले देवता माने गए हैं। हनुमान जयंती पर उनका यह टोटका विशेष रूप से धन प्राप्त के लिए किया जाता है साथ ही यह टोटका हर प्रकार का अनिष्ट भी दूर करता है.... 
  4. कच्ची धानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें। संकट दूर होगा और धन भी प्राप्त होगा।
  5. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की सेवा हनुमान जयंती के दिन और बाद में महीने में किसी भी एक मंगलवार को करने से आपका मानसिक तनाव हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।। 
  6. यदि आप हनुमान जयंती पर और बाद में साल में एक बार किसी मंगलवार को अपने खून का दान करते हैं तो आप हमेशा दुर्घटनाओं से बचें रहेंगे। 
  7.  अगर धन लाभ की स्थितियां बन रही हो, किन्तु फिर भी लाभ नहीं मिल रहा हो, तो हनुमान जयंती पर गोपी चंदन की नौ डलियां लेकर केले के वृक्ष पर टांग देनी चाहिए। स्मरण रहे यह चंदन पीले धागे से ही बांधना है।
  8. एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मौली, अक्षत अर्पित कर पूजन करें। फिर हनुमान जी के मन्दिर में चढा आएं। धन लाभ होगा। 
  9. पीपल के वृक्ष की जड में तेल का दीपक जला दें। फिर वापस घर आ जाएं एवं पीछे मुडकर न देखें। धन लाभ होगा।

इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों

Holika-Dahan-in-2016-on-how-and-when-the-day-is-done-and-why-इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों       हमारी भारतीय सनातन संस्कृति में प्रमुख त्यौहारों को कब और कैसे मनाना चाहिए उसके बारे में भारतीय धर्म ग्रंथों में निर्णय सिंधु , धर्म सिंधु, पुरुषार्थ चिंतामणि, समय प्रकाश, तिथि निर्णय और व्रत पर्व विवेक आदि में उसके नियम स्पष्ट लिखे हुए है । कुछ अल्प ज्ञानी लोग जिनको इन नियमो की जानकारी तो होती नही है वे लोग अपनी अल्प जानकारी के कारण लोगों को भ्रमित करते और त्योहारों को एक दिन की जगह दो दिन करवा देते है इस कारण लोगों की आस्था कम होती हैं ।
         उसी क्रम में इस साल 2016 में "होलिका दहन" को लेकर भ्रम की स्थिति बन रही है उसमे कुछ अल्प ज्ञानी उसको मनाने की दिनांक को सवेरे और सायं काल को मनाने की परिस्थिति उत्पन्न कर रहे हैं ऐसे लोगों और धर्म प्रेमी लोगों के लिए कुछ नियम लिख रहे है । वैसे होलिका दहन के बारे में विभिन्न ग्रंथो में " फाल्गुन पूर्णिमा में प्रदोष के समय होलिका दहन किया जाता है और भद्रा में होलिका दहन पूर्ण रूप से वर्जित हैं विशेष परिस्थिति में भद्रा मुख को छोड़ कर भद्रा के पुच्छ में करने का विधान है और इसके कई नियम और भी है जिनको आप को बताना जरुरी है ।

  1. --- यदि पूर्णिमा दो दिन प्रदोष को व्याप्त कर रही हो तो दूसरे दिन ही प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है । क्योंकि प्रथम दिन प्रदोष भद्रा के कारण दूषित रहता है । 
  2.  -- यदि दूसरे दिन प्रदोष के समय पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तब दूसरे दिन पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या उससे ज्यादा हो और अगले दिन प्रतिपदा वृद्धिगामिनि हो तब दूसरे दिन ही प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होता है । यहाँ प्रतिपदा का ह्रास हो तो पहले दिन भद्रा के पुच्छ या भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा में ही होलिका दहन किया जाता है ।
  3. --- दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन निशा काल से पहले भद्रा समाप्त हो जाये तो वहाँ भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए । इस स्थिति में वेद व्यास जी के "भविष्योत्तर पुराण " में लिखे वाक्य को बताना जरुरी है :- 

सार्धयाम प्रयम् वा स्यात् द्वितीये दिवसे यदा । 
प्रतिपद् वर्धमाना तू तदा सा होलिका स्मृता ।। 

       इसका अर्थ यह है की यदि पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या इससे अधिक समय को व्याप्त करे और उसके साथ प्रतिपदा वृद्धिगामिनी हो तो वहाँ होलिका दहन सायं व्यापिनी पूर्णिमा के कल में करनी चाहिए । यहाँ ध्यान रहे की कोई भी तिथि यदि सार्ध त्रियाम व्यापिनी है तो वह अनिवार्यतः सायं व्यापिनी व्यापिनी अवश्य होती है और सार्ध त्रियाम पूर्णिमा सयम व्यापिनी होने से प्रदोष व्यापिनी ही मणि जाती है अतः वहाँ होलिका दहन शास्त्र सम्मत है । यही बात "पुरुषार्थ चिंतामणि " ग्रन्थ में इस प्रकार स्पष्ट लिखी हूई है ---

 "यदा तु द्वितीय दिने सार्धयाम त्रयं पूर्णिमा प्रतिपदश्च वृद्धि: । 
तदा पूर्णिमान्त्यभागे सायाह्न काल एव दीपनीया होलिका " 

        यानि उपरोक्त लिखित विस्तृत विवेचन का सारांश यह है की क्या इस वर्ष 2016 में ( 22-23 मार्च को) होलिका दहन में भद्रा बनेगी बाधा ???
         होलिका दहन में इस बार भद्रा बाधक बन रहा है। 22 मार्च 2016 दिन मंगलवार को भद्रा कुल 11 घंटे 10 मिनट का होगा जो शाम 2/29बजे से रात 3/19 बजे तक रहेगा। फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र गण्ड योग . दिन मंगलवार होलिका दहन भद्रा के पुच्छ समय रात 03/19 बजे से 05/05बजे तक हो सकेगा। रात 03/19 बजे के बाद होली जलाई जा सकती है। अगले दिन 23 मार्च 2016 को धुलेंडी मनेगी।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रतिवर्ष धुलेंडी चैत्र प्रतिपदा को होती है लेकिन इस बार 9 वर्ष बाद फाल्गुन में ही धुलेंडी मनेगी। उन्होंने बताया कि भद्रा में होलिका दहन नहीं करना चाहिए। भद्रा में होली जलाने से राष्ट्र, नगर एवं ग्राम को हानि होती है। धर्म सिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा मुख की रात्रि 02/29 से 03/19 बजे तक रहेगी। उस समय को त्याग करके भद्रा का पुच्छ समय 03/19 बजे से 05/05 बजे तक होलिका दहन करें या फिर प्रातः 05/05 बजे से सूर्योदय तक होलिका दहन श्रेष्ठ होगा।

जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय

इस छोटे से उपाय द्वारा बदकिस्मत लोगों की भी किस्मत साथ देने लगेगी ---- 
  भरसक कोशिशों के बाद भी आप किसी काम में बार-बार असफल हो रहे हैं या मेहनत के अनुसार सफलता नहीं मिल पा रही है। ऐसे में किस्मत या भाग्य का साथ न होने की बात कही जाती है। ज्यादा धन या पैसा कमाने के लिए किस्मत का साथ होना बहुत जरूरी है अन्यथा इस मनोकामना की पूर्ति होना असंभव सा ही है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से दुर्भाग्य पीछा छोड़ देता है और भाग्य साथ देने लगता है। 
If-you-do-not-measure-it-with-luck-जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय इस छोटे से उपाय द्वारा बदकिस्मत लोगों की भी किस्मत साथ देने लगेगी
     यदि आपको भी पूरी मेहनत के बाद उचित सफलता प्राप्त नहीं हो रही है तो प्रतिदिन सूखे आटे में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गाय को खिलाएं। ऐसा नियमित रूप से प्रतिदिन करें। गाय को सभी शास्त्रों के अनुसार पूजनीय एवं पवित्र माना गया है। गाय में ही सभी देवी-देवताओं का वास है और इसकी पूजा करने से भक्त को भाग्य का साथ मिलता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गौमाता को संतुष्ट करने पर वे सेवक को सेवा के प्रतिफल में आशीर्वाद स्वरूप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। गाय को सूखे आटे में हल्दी मिलाकर खिलाने से वे अतिप्रसन्न होती हैं।।
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     कई बार इंसान चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता और कई बार उसे बैठे बैठे मिल जाता है ये किस्मत का खेल है, कई बार जब किस्मत साथ न दे तो लोग गम में डूब जाते है किसी को ईश्वर तो किसी को ज्योतिषी याद आते है, कभी कभी जब किसी कि किस्मत साथ दे रही होती है तो हम अक्सर उसे अपनी योग्यता मान लेते हैं कई लोग समय का लाभ उठा लेते है तो कई ऊपर से नीचे आ जाते है। मेरा कहने का अर्थ है इंसान का कभी न कभी वक्त के साथ किस्मत भी साथ देती है जब उसके पुण्य कर्म अच्छे होते है इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करो, अपने धर्म का पालन करो किस्मत के बारे मे तो मे हर मनुष्य थोड़ी बहुत जानकारी रखता है, कहते हैं जब हम कड़े परिश्रम करने के बाद सफलता प्राप्त करते है तो वह हमारे कर्म है लेकिन जब हम बिना मेहनत के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं उसे किस्मत कहते है। 
 ****करे नई उर्जा का संचार---- 
यदि आप अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करना चाहते है तो ऐसा नियमित रूप से करेगे तो इससे आपके सितारे चमक उठेगे। ब्रह्म बेला में उठ कर इश्वर का नाम, ध्यान, योग और पूजा करने से अकस्मात् लाभ होता है। 
 1. सूर्योदय से पूर्व ब्रह्मा बेला में उठे, और अपने दोनों हांथो की हंथेली को रगरे और हंथेली को देख कर अपने मुंह पर फेरे, क्योंकि :- शास्त्रों में कहा गया है की कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती । करमूले स्थिता गौरी, मंगलं करदर्शनम् ॥ हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, तथा हाथ के मूल मे सरस्वती का वास है अर्थात भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है, ज़िसके बल पर हम धन अर्थात लक्ष्मी अर्जित करतें हैं। जिसके बल पर हम विद्या सरस्वती प्राप्त करतें हैं।इतना ही नहीं सरस्वती तथा लक्ष्मी जो हम अर्जित करते हैं, उनका समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभू स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। ऐसे में क्यों न सुबह अपनें हाथ के दर्शन कर प्रभू की दी हुई ताकत का लाभ उठायें।।
 इन उपायों/ प्रयोगों द्वारा चमकेगी आपकी भी किस्मत----- 
 तंत्र शास्त्र व ज्योतिष के अंतर्गत ऐसे कई छोटे-छोटे उपाय हैं, जिन्हें करने से थोड़े ही समय में व्यक्ति की किस्मत बदल सकती है। मगर बहुत कम लोग इन छोटे-छोटे उपायों के बारे में जानते हैं। जो लोग जानते हैं वे ये उपाय करते नहीं और अपनी किस्मत को ही दोष देते रहते हैं। जानिए कुछ अचूक उपाय या प्रयोग जिन्हें सच्चे मन से करने से आपकी किस्मत चमक सकती है। 
 ये उपाय इस प्रकार हैं--- 
  1. रोज सुबह जब आप उठें तो सबसे पहले दोनों हाथों की हथेलियों को कुछ क्षण देखकर चेहरे पर तीन चार बार फेरें। धर्म ग्रंथों के अनुसार हथेली के अग्र भाग में मां लक्ष्मी, मध्य भाग में मां सरस्वती व मूल भाग (मणि बंध) में भगवान विष्णु का स्थान होता है। इसलिए रोज सुबह उठते ही अपनी हथेली देखने से भाग्य चमक उठता है। 
  2.  भोजन के लिए बनाई जा रही रोटी में से पहली रोटी गाय को दें। धर्म ग्रंथों के अनुसार गाय में सभी देवताओं का निवास माना गया है। अगर प्रतिदिन गाय को रोटी दी जाए तो सभी देवता प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामना पूरी करते हैं। 
  3. अगर आप चाहते हैं कि आपकी किस्मत चमक जाए तो प्रतिदिन चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे। 
  4. घर में स्थापित देवी-देवताओं को रोज फूलों से श्रृंगारित करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि फूल ताजे ही हो। सच्चे मन से देवी-देवताओं को फूल आदि अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं व साधक का भाग्य चमका देते हैं। 
  5.  घर को साफ-स्वच्छ रखें। प्रतिदिन सुबह झाड़ू-पोछा करें। शाम के समय घर में झाड़ू-पोछा न करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं और साधक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ सकता है।

2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या 9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय

     नया साल सभी के लिए कुछ ना कुछ नया और शुभ लेकर आता है। इस साल भी शनि दोष से पीडि़त या फिर अन्य ग्रहों की उल्टी चाल से ग्रस्त लोगों को अपनी पीड़ा दूर करने के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। नए साल 2016 की पहली शनिश्चरी अमावस्या 9 जनवरी 2016 को है। इसे लेकर शनि मंदिरों में तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं। इसी के साथ पीडि़त लोग भी अपने कष्टों से निजात पाने के लिए खास उपाय कर सकते हैं। शनिश्चरी अमावस्या शनिवार को सुबह 7:40 बजे से शुरू होकर दूसरे दिन 10 जनवरी 2016, रविवार सुबह 7:20 बजे तक रहेगी।

-January-9-2016-The-first-shaneshchari-amavasya-these-are-measures-2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या  9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय
 ये उपाय करें---- 

  1. सुंदरकांड का पाठ, हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। 
  2. सरसों या तिल के तेल के दीपक में दो लोहे की कीलें डालकर पीपल पर रखें।
  3. शनिदेव पर तिल या सरसों के तेल का दान करें। 
  4. चीटीं को शक्कर का बूरा डालें। 
  5. अपने वजन के बराबर सरसों का खली (पीना) गौशाला में डालें। 
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ श्री शनिस्तोत्रम्----- 
 यह स्तोत्र जातकों के हर प्रकार के कष्टों को दूर करने वाला है। यह स्तोत्र मानसिक अशांति, पारिवारिक कलह व दांपत्य सुख में दरार पाटने में समर्थ है। यदि इस स्तोत्र का 21 बार प्रति शनिवार को लगातार 7 शनिवार को पाठ किया जाये साथ ही शनिदेव का तैलाभिषेक से पूजन किया जाए तो निश्चय ही इन बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
 ‘‘तुष्टोददाति वैराज्य रुष्टो हरति तत्क्षणात्’’ धन्य है शनिदेव। शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं भी आशुतोष बन गये। प्रस्तुत स्तोत्र ज्वलंत उदाहरण है।
-January-9-2016-The-first-shaneshchari-amavasya-these-are-measures-2016 की पहली शनैश्चरी अमावस्या  9 जनवरी 2016 को, कष्ट दूर करने के ये हैं उपाय       राजा दशरथ शनि से युद्ध करने उनके पास गये थे, किन्तु धन्य है शनिदेव - जिसने शत्रु को मनचाहा वरदान देकर सेवक बना लिया। विशेष कहने की आवश्यकता नहीं, स्वयं शनि-स्तोत्र ही इसका प्रमाण है। अत: इसका स्तवन, श्रवण से लाभान्वित हो स्वयं को कृतार्थ करना चाहिए। शनि का प्रकोप शान्त करने के लिए पुराणों में एक कथा भी मिलती है कि महाराजा दशरथ के राज्यकाल में उनके ज्योतिषियों ने उन्हें बताया कि महाराज, शनिदेव रोहिणी नक्षत्र को भेदन करने वाले हैं। 
       जब भी शनिदेव रोहिणी नक्षत्र का भेदन करते हैं तो उस राज्य मेें पूरे बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होती है और अकाल पड़ जाता है। इससे प्रजा का जीवित बच पाना असम्भव हो जाता है। महाराज दशरथ को जब यह बात ज्ञात हुई तब वह नक्षत्र मंडल में अपने विशेष रथ द्वारा आकाश मार्ग से शनि का सामना करने के लिए पहुँच गये। शनिदेव महाराज दशरथ का अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुए और वरदन मांगने के लिए कहा। शनिदेव को प्रसन्न देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा कि हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें। शनि महाराज प्रसन्न थे और उन्होंने तुरन्त उन्हें वचन दिया कि उनकी पूजा पर उनके रोहिणी भेदन का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसके साथ यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा किये गये इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर भी मेरा अशुभ प्रभाव कभी नहीं पड़ेगा। 
 श्री शनि चालीसा----- 
 शनि चालीसा का पाठ सबसे सरल है। अतः यहां सर्वाधिक प्रचलित चालीसा प्रस्तुत की जा रही है। शनि चालीसा भी हनुमान चालीसा जैसे ही अति प्रभावशाली है। शनि प्रभावित जातकों के समस्त कष्टों का हरण शनि चालीसा के पाठ द्वारा भी किया जा सकता है। सांसारिक किसी भी प्रकार का शनिकृत दोष, विवाह आदि में उत्पन्न बाधाएं इस शनि चालीसा की 21 आवृति प्रतिदिन पाठ लगातार 21 दिनों तक करने से दूर होती हैं और जातक शांति सुख सौमनस्य को प्राप्त होता है। अन्य तो क्या पति-पत्नी कलह को भी 11 पाठ के हिसाब से यदि कम से कम 21 दिन तक किया जाये तो अवश्य उन्हें सुख सौमनस्यता की प्राप्ति होती है।
 श्री शनि चालीसा---- 
 दोहा---- 
जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज। 
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।। 

 चौपाई---- 
 जयति-जयति शनिदेव दयाला। 
 करत सदा भक्तन प्रतिपाला।। 

चारि भुजा तन श्याम विराजै। 
 माथे रतन मुकुट छवि छाजै।। 

परम विशाल मनोहर भाला। 
 टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।। 

कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै। 
 हिये माल मुक्तन मणि दमकै।। 

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। 
 पल विच करैं अरिहिं संहारा।। 

पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। 
 यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।

 सौरि मन्द शनी दश नामा। 
 भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।। 

जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं। 
 रंकहु राउ करें क्षण माहीं।। 

पर्वतहूं तृण होई निहारत। 
 तृणहंू को पर्वत करि डारत।। 

राज मिलत बन रामहि दीन्हा। 
 कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।। 

बनहूं में मृग कपट दिखाई। 
 मात जानकी गई चुराई।। 

लषणहि शक्ति बिकल करि डारा। 
 मचि गयो दल में हाहाकारा।। 

दियो कीट करि कंचन लंका।
 बजि बजरंग वीर को डंका।। 

नृप विक्रम पर जब पगु धारा। 
 चित्रा मयूर निगलि गै हारा।। 

हार नौलखा लाग्यो चोरी।
 हाथ पैर डरवायो तोरी।।

 भारी दशा निकृष्ट दिखाओ। 
 तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।

 विनय राग दीपक महं कीन्हो। 
 तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।। 

हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी। 
 आपहुं भरे डोम घर पानी।। 

वैसे नल पर दशा सिरानी। 
 भूंजी मीन कूद गई पानी।। 

श्री शकंरहि गहो जब जाई। 
 पारवती को सती कराई।। 

तनि बिलोकत ही करि रीसा। 
 नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।। 

पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी। 
 बची द्रोपदी होति उघारी।। 

कौरव की भी गति मति मारी। 
 युद्ध महाभारत करि डारी।। 

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। 
 लेकर कूदि पर्यो पाताला।। 

शेष देव लखि विनती लाई। 
 रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।। 

वाहन प्रभु के सात सुजाना। 
 गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।। 

जम्बुक सिंह आदि नख धारी। 
 सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।। 

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। 
 हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।। 

गर्दभहानि करै बहु काजा। 
 सिंह सिद्धकर राज समाजा।।

 जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै। 
 मृग दे कष्ट प्राण संहारै।। 

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। 
 चोरी आदि होय डर भारी।। 

तैसहिं चारि चरण यह नामा। 
 स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।। 

लोह चरण पर जब प्रभु आवैं। 
 धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।। 

समता ताम्र रजत शुभकारी। 
 स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।। 

जो यह शनि चरित्रा नित गावै। 
 कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।। 

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
 करैं शत्राु के नशि बल ढीला।। 

जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
 विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।। 

पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत। 
 दीप दान दै बहु सुख पावत।। 

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। 
 शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।। 

 दोहा--- 
 प्रतिमा श्री शनिदेव की, लोह धातु बनवाय। 
प्रेम सहित पूजन करै, सकल कष्ट कटि जाय।। 

चालीसा नित नेम यह, कहहिं सुनहिं धरि ध्यान।
 नि ग्रह सुखद ह्नै, पावहिं नर सम्मान।। 
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दशरथ कृत शनि स्तोत्र---- (हिन्दी पद्य रूपान्तरण)----
 हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले।
 कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले।। 

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे। 
सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे।।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले। 
हे दीर्घ नेत्र वालेे, शुष्कोदरा निराले।। 

भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले। 
कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले।।

 तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे। 
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।।

 हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।
 हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ।।

 हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे। 
 हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे।। 

हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी। 
हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी।। 

विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।
 स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे।। 

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी। 
तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी।। 

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे।। 

नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो।
 हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो।। 

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले। 
 स्वीकारो भजन मेरे।
 स्वीकारो नमन मेरे।। 

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि। 
वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये।। 

उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।।

 हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता। 
मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता।। 

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। शनि पूज्य चरण तेरे।। 

हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर। 
हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर।। 

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।
 स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे।। 

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै। 
बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै।। 

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले। 
 स्वीकारो नमन मेरे। 
 हैं पूज्य चरण तेरे।। 
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आरती श्री शनिदेव की----  कर्मफल दाता श्री शनिदेव की भक्ति और आरती करने से हर प्रकार के कष्टों का शमन हो जाता है। श्री शनिदेव को काला कपड़ा और लोहा बहुत प्रिय है। उन्हें आक का फूल बहुत भाता है। शनिवार और अमावस्या तिथि को उनको उड़द, गुड़, काले तिल और सरसों का तेल चढ़ाना लाभप्रद रहता है। श्रद्धापूर्वक उनकी आरती करने से सब प्रकार की प्रतिकूलताएं समाप्त हो जाता हैं। 
 दोहा---- 
 जय गणेश, गिरजा, सुवन, मंगल करण कृपाल।
 दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल।। 
 जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहं विनय महाराज। 
 करहंु कृपा रक्षा करो, राखहुं जन की लाज।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

प्रेम विनय से तुमको ध्याऊं, सुधि लो बेगि हमारी।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

देवों में तुम देव बड़े हो, भक्तों के दुख हर लेते। 
रंक को राजपाट, धन-वैभव, पल भर में दे देते। 
तेरा कोई पार न पाया तेरी महिमा न्यारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

वेद के ज्ञाता, जगत-विधाता तेरा रूप विशाला। 
कर्म भोग करवा भक्तों का पाप नाश कर डाला। 
यम-यमुना के प्यारे भ्राता, भक्तों के भयहारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

स्वर्ण सिंहासन आप विराजो, वाहन सात सुहावे। 
श्याम भक्त हो, रूप श्याम, नित श्याम ध्वजा फहराये।
 बचे न कोई दृष्टि से तेरी, देव-असुर नर-नारी।। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

उड़द, तेल, गुड़, काले तिल का तुमको भोग लगावें। 
लौह धातु प्रिय, काला कपड़ा, आक का गजरा भावे।
 त्यागी, तपसी, हठी, यती, क्रोधी सब छबी तिहारी। 
आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।। 

शनिवार प्रिय शनि अमावस, तेलाभिषेक करावे। 
शनिचरणानुरागी मदन तेरा आशीर्वाद नित पावे। 
छाया दुलारे, रवि सुत प्यारे, तुझ पे मैं बलिहारी।
 आरती श्री शनिदेव तुम्हारी।।

क्या ज्योतिषीय उपाय "ग्रह-मंत्र साधना" भी विज्ञान है.

What-astrological-remedy-planet-mantra-meditation-is-also-science-क्या ज्योतिषीय उपाय "ग्रह-मंत्र साधना" भी विज्ञान है.      मंत्र ध्वनि-विज्ञान का सूक्ष्मतम विज्ञान है मंत्र-शरीर के अन्दर से सूक्ष्म ध्वनि को विशिष्ट तरंगों में बदल कर ब्रह्मांड में प्रवाहित करने की क्रिया है जिससे बड़े-बड़े कार्य किये जा सकते हैं ! प्रत्येक अक्षर का विशेष महत्व और विशेष अर्थ होता है ! प्रत्येक अक्षर के उच्चारण में चाहे वो वाचिक,उपांसू या मानसिक हो विशेष प्रकार की ध्वनि निकलती है तथा शरीर में एवं विशेष अंगो नाड़ियों में विशेष प्रकार का कम्पन पैदा करती हैं जिससे शरीर से विशेष प्रकार की ध्वनि तरंगे निकलती है जो वातावरण-आकाशीय तरंगो से संयोग करके विशेष प्रकार की क्रिया करती हैं ! विभिन्न अक्षर (स्वर-व्यंजन) एक प्रकार के बीज मंत्र हैं ! विभिन्न अक्षरों के संयोग से विशेष बीज मंत्र तैयार होते है जो एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालते हैं, परन्तु जैसे अंकुर उत्पन्न करने में समर्थ सारी शक्ति अपने में रखते हुये भी धान,जौ,गेहूँ अदि संस्कार के अभाव में अंकुर उत्पन्न नहीं कर सकते वैसे ही मंत्र-यज्ञ आदि कर्म भी सम्पूर्ण फलजनित शक्ति से सम्पन्न होने पर भी यदि ठीक-ठीक से अनुष्ठित न किये जाय तो कदापि फलोत्पादक नहीं होते हैं ! घर्षण के नियमों से सभी लोग भलीभातिं परिचित होगें !
       घर्षण से ऊर्जा आदि पैदा होती है ! मंत्रों के जप से भी श्वास के शरीर में आवागमन से तथा विशेष अक्षरों के अनुसार विशेष स्थानों की नाड़ियों में कम्पन(घर्षण) पैदा होने से विशेष प्रकार का विद्युत प्रवाह पैदा होता है, जो साधक के ध्यान लगाने से एकत्रित होता है तथा मंत्रों के अर्थ (साधक को अर्थ ध्यान रखते हुए उसी भाव से ध्यान एकाग्र करना आवश्यक होता है) के आधार पर ब्रह्मांड में उपस्थित अपने ही अनुकूल उर्जा से संपर्क करके तदानुसार प्रभाव पैदा होता है ! रेडियो,टी०वी० या अन्य विद्युत उपकरणों में आजकल रिमोट कन्ट्रोल का सामान्य रूप से प्रयोग देखा जा सकता है.. इसका सिद्धान्त भी वही है ! 
      मंत्रों के जप से निकलने वाली सूक्ष्म उर्जा भी ब्रह्मांड की उर्जा से संयोंग करके वातावरण पर बिशेष प्रभाव डालती है ! हमारे ऋषि-मुनियों ने दीर्घकाल तक अक्षरों,मत्राओं, स्वरों पर अध्ययन प्रयोग, अनुसंधान करके उनकी शक्तियों को पहचाना जिनका वर्णन वेदों में किया है इन्ही मंत्र शक्तियों से आश्चर्यजनक कार्य होते हैं जो अविश्वसनीय से लगते हैं,यद्यपि समय एवं सभ्यता तथा सांस्कृतिक बदलाव के कारण उनके वर्णनों में कुछ अपभ्रंस शामिल हो जाने के वावजूद भी उनमें अभी भी काफी वैज्ञानिक अंश ऊपलब्ध है बस थोड़ा सा उनके वास्तविक सन्दर्भ को दृष्टिगत रखते हुए प्रयोग करके प्रमाणित करने की आवश्यकता है ! पदार्थ जगत में विस्फोट होता है उर्जा की प्राप्ति के लिये पदार्थ को तोड़ना पड़ता है परन्तु चेतना जगत में मंत्र एवं मात्रिकाओं का स्फोट किया जाता है ..शारीरिक रोग उत्पन्न होने का कारण भी यही है कि जैव-विद्युत के चक्र का अव्यवस्थित हो जाना या जैव-विद्युत की लयबद्धता का लड़खड़ा जाना ही रोग की अवस्था है जब हमारे शरीर में उर्जा का स्तर निम्न हो जाता है तब अकर्मण्यता आती है तथा मंत्र जप के माध्यम से ब्रह्मांडीय उर्जा-प्रवाह को ग्रहण करके अपने शरीर के अन्दर की उर्जा का स्तर ऊचा उठाया जा सकता है और अकर्मण्यता को उत्साह में बदला जा सकता है चुकि संसार के प्राणी एवं पदार्थ सब एक ही महान चेतना के अंशधर है,इसलिये मन में उठे संकल्प का परिपालन पदार्थ चेतना आसानी से करने लगती है.. जब संकल्प शक्ति क्रियान्वित होती है तो फिर इच्छानुसार प्रभाव एवं परिवर्तन भी आरम्भ हो जाता है ! 
       जातक जन्म कुंडली में उपस्थित "शुभ ग्रह-मंत्र साधना" से मन, बुद्धि, चित अहंकार में असाधारण परिवर्तन होता हे..... विवेक, दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और बुद्धि के विशेष रूप से उत्पन्न होने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुखों का निवारण हो जाता है वैज्ञानिक परिभाषा में हम इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि मंत्र विज्ञान का सच यही है कि यह वाणी की ध्वनि के विद्युत रूपान्तरण की अनोखी विधि है ! हमारा जीवन,हमारा शरीर और सम्पूर्ण ब्रह्मांण जिस उर्जा के सहारे काम करता है,उसके सभी रूप प्रकारान्तर में विद्युत के ही विविध रूप हैं.. मंत्र-विद्या में प्रयोग होने वाले अक्षरों की ध्वनि (उच्चारण की प्रकृति अक्षरों का दीर्घ या अर्धाक्षर, विराम, अर्धविराम आदि मात्राओं) इनके सूक्ष्म अंतर प्रत्यन्तर मंत्र-विद्या के अन्तर-प्रत्यन्तरों के अनुरूप ही प्रभावित व परिवर्तित किये जा सकते हैं.. मंत्र-विज्ञान के अक्षर जो मनुष्य की वाणी की ध्वनि जो शरीर की विभिन्न नाड़ियों के कम्पन से पैदा होते हैं तथा जो कि मानव के ध्यान एवं भाव के संयोग से ही विशेष प्रकार कि विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं वही जैव-विद्युत आन्तरिक या बाह्य वातावरण को अपने अनुसार ही प्रभावित करके परिणाम उत्पन्न करती है ! सही मंत्र का चुनाव किसी योग्य विद्वान से परामर्श पश्चात् ही करना श्रेयकर रहेगा। सभी मंत्र सभी जातको के लिए सामान रूप से हितकारी नहीं होते, अतः सावधानी जरुर बरतें।"

जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें

Here-on-this-Navratri-Durga-A-few-things-to-note-in-the-text-जानिए इस नवरात्री पर दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें
  1. दुर्गा सप्तशती के किसी भी चरित्र -का कभी भी आधा पाठ ना करें एवं न कोई वाक्य छोड़े। 
  2.  पाठ को मन ही मन में करना निषेध माना गयाहै। अतः मंद स्वर में समान रूप से पाठ करें। 
  3. पाठ केवल पुस्तक से करें यदि कंठस्थ हो तो बिना पुस्तक के भी कर सकते हैं। 
  4.  पुस्तक को चौकी पर रख कर पाठ करें। हाथ में लेकर पाठ करने से आधा फल प्राप्त होता है। 
  5. पाठ के समाप्त होने पर बालाओं व ब्राह्मण को भोजन करवाएं। 
 जानिए कि अभिचार कर्म में किन नर्वाण मंत्र का प्रयोगहोता हैं।। जैसे--- 
  1. मारण के लिए : ---ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै देवदत्त रं रंखे खे मारय मारय रं रं शीघ्र भस्मी कुरू कुरू स्वाहा। 
  2. मोहन के लिए :---- क्लीं क्लीं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैविच्चे देवदत्तं क्लीं क्लीं मोहन कुरू कुरूक्लीं क्लींस्वाहा॥ 
  3. स्तम्भन के लिए : ----ऊँ ठं ठं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेदेवदत्तं ह्रीं वाचं मुखं पदं स्तम्भय ह्रींजिहवांकीलय कीलय ह्रीं बुद्धि विनाशय -विनाशय ह्रीं।ठं ठं स्वाहा॥ 
  4. आकर्षण के लिए :---- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदतं यंयं शीघ्रमार्कषय आकर्षय स्वाहा॥ 
  5.  उच्चाटन के लिए:----ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तफट् उच्चाटन कुरू स्वाहा। 
  6. वशीकरण के लिए :-- ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तंवषट् में वश्य कुरू स्वाहा। 
  7. सर्व सुख समृद्धि के लिए--- 
 ।।सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।। 
 ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। 
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
 जय जय श्री अम्बे माँ दुर्गा माँ .... ॐ एम् ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ।। 
 नोट : मंत्र में जहां "देवदत्त" शब्द आया है वहां संबंधित व्यक्ति का नाम लेना चाहिये।। 
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ऐसे करें " माँ" की आराधना(एक भावांजलि--कविता)---- 
माँ तुम आओ सिंह की सवार बन कर ।। 
माँ तुम आओ रंगो की फुहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ पुष्पों की बहार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सुहागन का श्रृंगार बनकर ।। 
माँ तुम आओ खुशीयाँ अपार बनकर ।। 
माँ तुम आओ रसोई में प्रसाद बनकर ।। 
माँ तुम आओ रिश्तो में प्यार बनकर ।। 
माँ तुम आओ बच्चो का दुलार बनकर ।। 
माँ तुम आओ व्यापार में लाभ बनकर ।। 
माँ तुम आओ समाज में संस्कार बनकर ।। 
माँ तुम आओ सिर्फ तुम आओ, क्योंकि तुम्हारे आने से ये सारे।। 
सुख खुद ही चले आयेगें। तुम्हारे दास बनकार ।। 
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इस नवरात्रि पर इन उपायों द्वारा करें कार्य बाधा का शमन
  1. नित्य प्रात: काल स्नानदि से निवृत होकर गीता के ग्यारवे अध्याय का पाठ करने से कार्यो मे आने वाली बाधायें नष्ट हो जाती है । 
  2. गीता के ग्यारवे अध्याय के 36 वे श्लोक को लाल स्याही से लिखकर घर मे टांग दे । सभी प्रकार की बाधायें दूर हो जायेगी ।
  3. अपने दिन का आरंभ करते समय जब आप बाहर निकले तो पहले दाया पांव बाहर निकालें । आपके वांछित कार्यो मे कोई बाधा नही आयेगी । 
  4. घर से निकलते समय कोई मीठा पदार्थ -गुड़, शक्कर, मिठाई या शक्कर मिला दही खा ले ।कार्यों की बाधा दूर हो जायेगी ।
  5. तुलसी के तीन चार पत्तो को ग्रहण करके घर से बाहर जाने पर भी कार्यों की सभी बाधाए दूर हो जाती है । 
  6. अगर बार-बार कार्यों मे बाधा आ रही हो तो अपने घर मे श्यामा तुलसी का पौधा लगाऐ । समध्याकाल शुध्द घी का दीपक जलाऐं ।
  7. 5 बत्ती का दीपक हनुमानजी के मंन्दिर मे जला आयें । इससे सभी प्रकार की बाधाएं और परेशानियां दूर हो जायेगी । 
  8. प्रात:काल भगवती दूर्गा को पॉच पुष्प चढाएं । आपके कार्यों की सभी बाधाऐ दूर हो जायेगी । 
  9. घर से बाहर निकलते समय जिधर का स्वर चल रहा हो , उसी तरफ का पैर पहले बाहर निकाले । इससे कार्यों मे बाधा नही आयेगी ।

चंद्रग्रहण पर करें ग्रहण दोष से मुक्ति के उपाय

जानिए कुंडली के अनिष्ट कारक ग्रहण योग---
       हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है. चंद्रमा दुसरे भाव में शुभ फल देता है और अष्टम भाव में अशुभ फल देता है ।। 
       
पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार चन्द्र ग्रह वृषभ राशी में उच्च और वृश्चक राशी में नीच का होता है. जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है.
 जानिए क्या होता हैं ग्रहण दोष..??? 
 ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। 
चूड़ामणि चंद्रग्रहण चंद्रग्रहण पर करें ग्रहण दोष से मुक्ति के उपाय-In-the-year-2015-two-total-lunar-eclipses-will-occur-One-Total-Solar-Eclipse-and-one-partial      इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . 
      .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है 
         अगर आकड़ों की बात करें तो राहु केतु एक राशि का भोग 18 महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है
 ---ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है. 
 ----चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं ।। कुंडली चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं ।।
        पंडित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है ।। 
        पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है ।। जिस जातक की जन्म कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बन रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है ।।
        ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है ।। 
 जानिए ग्रहण योग के लक्षण---
  1.  दूसरो को दोष देने की आदत 
  2.  वाणी दोष से सम्बन्ध ख़राब होते जाते है ,सम्बन्ध नहीं बचते
  3.  सप्तम भाव का दोष marriage सुख नहीं देता 
  4.  प्रथम द्वितीय नवम भाव में बनने वाले दोष भाग्य कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है , 
  5.  मन हमेशा नकारात्मक रहता है , 
  6.  हमेशा आदमी depression में रहता है, 
  7.  कभी भी ऐसे आदमी को रोग मुक्त नहीं कहा जा सकता 
  8.  पैरो में दर्द होना , दूसरे को दोष देना ,खाने में बल निकलते है , 

 उपाय 
  1. त्रयोदशी को रुद्राभिषेक करे specially शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को 
  2. खीरा कब्ज दूर करता है ,liver मजबूत करता है ,पित्त रोग में फायदा करता है ,जो लोग FAT कम करना चाहे उनको फायदा करता है, किडनी problems में फायदा करता है 
  3. ग्रहण योग वाले आदमी के पास काफी उर्जा होती है यदि वो उसे +वे कर ले तो जीवन में अच्छी खासी सफलता मिल जाती है 

 ग्रहण योग के लक्षण
  1.  घर में अचानक आग लग जाये या चोरी हो जाये 
  2.  12th house में चंद्रमा after marriage गरीबी दे देगा जानिए ग्रहण योगों को +ve करने का तरीका--- 
  3.  गुरु के सानिध्य में रहे , 
  4.  मंदिर आते जाते रहे , 
  5.  हल्दी खाते रहे , 
  6.  गाय के सानिध्य में रहे , 
  7.  सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे , 
  8.  घर के पश्चिमी हिस्से की सफाई करे ,मंगल वार शनिवार को श्रम दान करे , 
  9.  चांदी का चौकोर टुकड़ा अपनी जेब में रखे यदि माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है , 
  10.  संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर बना ले या किसी और के नाम पे रख दे ,

 कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम में खर्च करे , किसी जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रहण योग निवारण का एक आसान उपाय ( इसे ग्रहण काल के मध्य में करे)
 1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु के साथ है तो चूना पत्थर ले उसे एक भूरे कपडे में बांध कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा किसी मंदिर में चढ़ा देवें।।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि यह चंद्र ग्रहण सोमवार (28सितम्बर,2015) को हो रहा हैं इसलिए यह ग्रहण "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" कहलाएगा॥ 'चूड़ामणि चंद्रग्रहण' का स्नान, दान आदि की दृष्टी से विशेष महत्त्व होता हैं अतः जिन क्षेत्र में यह ग्रहण दिखाई देगा वहां इस इस प्रकार के दान का विशेष महत्त्व होगा॥ श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा चंद्र ग्रहण होने से इसका महत्त्व बहुत बढ़ गया हैं।। 
     इस दिन उज्जैन स्थित प्राचीन सिद्धवट तीर्थ पर ( मध्यप्रदेश) आकर अपनी जन्म कुंडली, चंद्र कुंडली और नवमांश कुंडली में स्थित ग्रहण दोष के साथ साथ पितृदोष या कालसर्प दोष/ याग की शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध, नागबलि-- नारायण बाली श्राद्ध कर्म करवाने से पितरों को मुक्ति मिलती हैं।।। 
    पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार का यह "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" मीन राशि और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हो रहा हैं। इसलिए यह ग्रहण इस राशि और नक्षत्र वाले व्यक्तियों के लिए अधिक पीड़ा परेशनिदायक हैं॥ इस मीन राशि के अलावा मेष, मिथुन, कर्क, कन्या,तुला, वृश्चिक एवम कुम्भ राशि वालों को भी सावधानी रखनी चाहिए॥

सोमवार--भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होगा चंद्र ग्रहण

full-moon-willlunar-eclipse-सोमवार--भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होगा चंद्र ग्रहणइस वर्ष का पितृपक्ष यानि श्राद्धपक्ष आगामी 28 सितम्बर, 2015 (सोमवार) से आरम्भ होगा॥ इसी दिन (भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा) को खग्रास या ग्रस्तास्त चंद्रग्रहण भी होगा जो की केवल पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात के तटवर्ती क्षेत्र में ही अल्प अवधि (01 मिनट से 03 मिनट) के लिए दृश्य होगा  महाराष्ट्र, पंजाब,हरियाणा एवम दिल्ली तथा हिमाचल प्रदेश में इसका असर या प्रभाव नहीं होगा .
         इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 08 बजकर 20 मिनट तक ही रहेगी तत्पश्चात एकम तिथि आरम्भ हो जाएगी॥ चूँकि इस खग्रास चंद्र ग्रहण का आरम्भ सायंकाल 06 बजकर 37 मिनट से होगा और इसका समापन 09 बजकर 57 मिनट पर होगा॥ पण्डित दयानन्द शास्त्री के मुताबिक चूँकि यह ग्रहण सोमवार को हो रहा हैं इसलिए यह ग्रहण "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" कहलाएगा॥ 'चूड़ामणि चंद्रग्रहण' का स्नान, दान आदि की दृष्टी से विशेष महत्त्व होता हैं अतः जिन क्षेत्र में यह ग्रहण दिखाई देगा वहां इस इस प्रकार के दान का विशेष महत्त्व होगा॥ श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा चंद्र ग्रहण होने से इसका महत्त्व बहुत बढ़ गया हैं।। 
        इस दिन उज्जैन स्थित प्राचीन सिद्धवट तीर्थ पर ( मध्यप्रदेश) आकर पितृदोष या कालसर्प दोष/ याग की शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध, नागबलि-- नारायण बाली श्राद्ध कर्म करवाने से पितरों को मुक्ति मिलती हैं।।। पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार का यह "चूड़ामणि चंद्रग्रहण" मीन राशि और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हो रहा हैं। इसलिए यह ग्रहण इस राशि और नक्षत्र वाले व्यक्तियों के लिए अधिक पीड़ा परेशनिदायक हैं॥ इस मीन राशि के अलावा मेष, मिथुन, कर्क, कन्या,तुला, वृश्चिक एवम कुम्भ राशि वालों को भी सावधानी रखनी चाहिए॥ यह खग्रास या ग्रस्तास्त चंद्रग्रहण मुख्य रूप से अफ्रीका,यूरोप, पश्चिमी एशिया(चीन, रुस, थाईलैंड,आस्ट्रेलिया, म्यांमार और दक्षिण कोरिया) एवम अमेरिका में दृश्य होगा॥ 
      भारत में यह खग्रास चंद्रग्रहण भुज,पोरबन्दर एवम जामनगर तथा नालिया (गुजरात) एवम राजस्थान के शाहगढ़ और घोटारु में देखा जा सकेगा॥ पण्डित "विशाल" दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिन क्षेत्रों में यह ग्रहण दृश्य होगा वहां इस ग्रहण का सूतक 27 सितम्बर, 2015(रविवार) को सायंकाल 06 बजकर 37 से आरम्भ होगा और चन्द्रास्त तक रहेगा॥ भारत में 28 सितम्बर को चन्द्रास्त का अधिकतम समय शाम को 06 बजकर 42 मिनट हैं॥ विशेष संकेत---जिन राशि या नक्षत्र वाले जातकों को इस ग्रहण का फल अशुभ हैं उन्हें ग्रहण का दर्शन नहीं करना चाहिए॥गर्भवती स्त्रियां विशेष सावधानी रखें॥ ग्रहण अवधि में भोजन नहीं करें। अपने इष्टदेव की आराधना, भजन एवम मन्त्र जप आदि सद्कार्य करें॥ शभम भवतु॥ कल्याण हो।। 
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जानिए की चन्द्रग्रहण कब होता है ??? 
 जब सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पड़ता है। चूंकि ग्रहों व उपग्रहों का अपना कोई प्रकाश नहीं है, ये केवल सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं अतः चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़ने के कारण ही चन्द्र ग्रहण होता है। चन्द्रग्रहण का प्रकार और उसकी लम्बाई चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों व उसके कक्षीय पथ पर निर्भर करती है। जब हम जमीन पर खड़े होते हैं और सूरज कि रोशनी हमारी शारीर पर पड़ती है, तो जमीन पर हमें अपनी परछाई दिखती है l ठीक इसी प्रकार चन्द्रमा और पृथ्वी पर सूर्य के प्रकाश के पड़ने पर परछाइयां आकाश में बनती हैं.चुकि पृथ्वी और चन्द्रमा का आकार गोल है, इसलिए इसकी परछाइयां शंकु के आकार कि होती हैं.ये परछाइयां बहुत लम्बी होती हैं l 
        जो पिण्ड सूरज से जितनी अधिक दुरी पर होगा, परछाइयां भी उतनी ही अधिक लम्बी होंगी . ग्रहण का अर्थ है , किसी पिण्ड के हिस्से पर परछाई पड़ने से कालापन (अंधेरा ) हो जाना . हम जानते है कि पृथ्वी सूर्य कि परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथ्वी कि परिक्रमा करता है ये दोनों ही हज़ारों मिल लम्बी परछाइयां बनाते हैं, घूमते-घूमते जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही सीधी रेखा में आ जाते है, तथा पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच में होती है, तो पृथ्वी कि परछाई या छाया, जो सूर्य के विपरीत दिशा में होती है, चन्द्रमा पर पड़ती है. यह भी कह सकते है. कि पृथ्वी के बीच में आ जाने से सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पहुच पाता .जितने स्थान पर प्रकाश नहीं पहुच पता, उतना स्थान प्रकाश रहित (अन्धकार युक्त) हो जाता है .यही चन्द्रग्रहण कहलाता है . ऐसी स्थिति पूर्णिमा के दिन ही आ सकती है . इसलिए चन्द्रग्रहण जब भी होता है, केवल पूर्णिमा के दिन ही होता है. चन्द्रमा का जितना हिस्सा परछाई से ढक जाता है, उतना ही चन्द्रग्रहण होता है . यदि पृथ्वी कि छाया पुरे चन्द्रमा को ढक लेती है, तो पूर्ण चन्द्रग्रहण हो जाता है . आमतौर पर एक वर्ष में चन्द्रमा के तीन ग्रहण होते हैं l जिनमें एक पूर्ण चन्द्रग्रहण होता है . अब प्रश्न उठता है कि पूर्णिमा तो हर महीने होती है, लेकिन चन्द्रग्रहण तो हर मास नहीं होता. इसका कारण यह है कि चन्द्रमा के घुमने के रास्ते का ताल पृथ्वी के भ्रमंपथ के ताल के साथ 5 डिग्री का कोण बंटा है. इस कारण चन्द्रमा पृथ्वी कि छाया के स्तर से उपर निचे घूमता है .कभी-कभी ही ये तीनों एक सीधे में आते हैं . अत: चन्द्रग्रहण हर पूर्णिमा को नहीँ पड़ता. गणित का प्रयोग करके खगोलविद् आसानी से यह बता देते हैं कि चन्द्रग्रहण कब पड़ेगा और वह कितने समय रहेगा.
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 जानिए की क्या सावधानियां रखें ग्रहण के दोरान..??? 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार यदि आप गर्भवती हैं, या आपके घर में कोई महिला गर्भवती है या फिर आप इस साल फेमिली प्‍लानिंग करने जा रहे हैं, तो ग्रहण की इन तिथियों को कैलेंडर में जरूरनोट कर लें। --इसके अलावा नया मकान, या नई दुकान लेने जा रहे हैं, तो इन ति‍थियों पर लेने से बचें। ---इन तिथियों पर आपकी करियर लाइव, निजी जीवन, आय के स्रोत, परिवार, प्रेम-संबंध, आदि में व्‍यापक परिवर्तन हो सकते हैं। खुशियां आ सकती हैं या हो सकता है दु:ख घर कर जाये, लिहाजा आपको इन तिथियों पर विशेष सावधानी बरतनी होगी। --बेहतर होगा यदि उन सभी बातों का पालन करें, जो बड़े बुजुर्ग बताते हैं। पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार गर्भवती स्त्री को सूर्य एवं चन्द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्योंकी उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें. । ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और किसी वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है,क्योंकि ऐसी धारणा है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं । 
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  1.  पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार क्या सावधानियां रखे ग्रहण के समय..???
  2.  ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए। 
  3.  ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता आती है ।
  4.  शौच करने से पेट में क्रमी रोग पकड़ता है । ये शास्त्र बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता। 
  5. ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है । 
  6. ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से सर्प की योनि मिलती है । 
  7. जीव-जंतु या किसी की हत्या करने से नारकीय योनी में भटकना पड़ता है ।
  8. ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश किया तो कुष्ठ रोगी के शरीर में जाना पड़ेगा। 
  9. ग्रहण के समय बाथरूम में नहीं जाना पड़े, ऐसा खायें। 
  10. ग्रहण के दौरान मौन रहोगे, जप और ध्यान करोगे तो अनंत गुना फल होगा। पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार ग्रहण विधि निषेध === 
  11.  सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्बदेख कर भोजन करना चाहिये । (1 प्रहर = 3 घंटे) 
  12. ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहियेव दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना औरभोजन करना – ये सब कार्य वर्जित हैं । 
  13.  ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके जल मे जल डाल देना चाहिए । ऐसा करने से देनेवालेको उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले को उसका दोष भी नहीं लगता। 
  14. कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये । 
  15. ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थाे मे तिल या कुशा डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिये ।
  16. ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति मे ही करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिये । 
  17. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्तहोता है । 
  18. तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु संतानयुक्त ग्रहस्थको ग्रहणऔर संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिये। 
  19.  स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षाे का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।
  20.  देवी भागवत में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये । 
  21.  देवी भागवत में आता है की सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। ग्रहण के अवसर पर पृथवी को नहीं खोदना चाहिए । 
  22.  पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर ( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालकक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।
  23.  ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए। 
  24. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। 
  25.  ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। 
  26. ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए।

 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार ग्रहण के समय केसे करें मंत्र सिद्धि .???
 1. ग्रहण के समय “ घ् ह्रीं नमः “ मंत्र का 10 माला जप करें इससे ये मंत्र सिद्धि हो जाता है । 
 2. श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके श्घ् नमो नारायणायश् मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणाशक्ति), कवित्व शक्ति तथा वाक सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
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 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा और स्नान मान्यता है कि चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ, अनुष्ठान, दान आदि का अत्यधिक फल मिलता है। मत्स्य पुराण के अनुसार ग्रहण काल के दौरान जातक को श्वेत पुष्पों और चन्दन आदि से चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। चन्द्र ग्रहण के खत्म होने पर जातक को स्नान और दान (विशेषकर गाय का दान) करना चाहिए।हिंदू धर्म की मान्‍यता के अनुसार चंद्र ग्रहण अच्‍छा नहीं माना जाता है। ग्रहण के कुप्रभाव से बचने के लिये इन तिथियों पर आप गरीबों को दान दें। गरीबों को भोजन करायें, मंत्रों का उच्‍चारण करें, जिनमें गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्‍ठ फल देगा। अपने ईष्‍ट देव का ध्‍यान करें। भोजन नहीं करें। ग्रहण के बाद स्‍नान करें और ताज़ा भोजन करें। साथ ही यदि आप गर्भवती हैं तो आपके होने वाले बच्‍चे पर ग्रहण के प्रभाव से बचाने के लिये एकांत स्‍थान पर बैठ जायें और ईश्‍वर का ध्‍यान करें। यह काम आप सूर्य ग्रहण के समय भी करें।
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 ग्रहण काल में चन्द्र के प्रभावों को शुभ करने के लिये चन्द्र की वस्तुओं का दान किया जाता है – 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए निम्न उपाय करे –ग्रहण में बालक, वृद्ध और रोगी के लिए कोई नियम शास्त्रों में नहीं बताया गया है । 
  1. चिटियों को पिसा हुआ चावल व आट्टा डाले । 
  2. चन्द्र की दान वस्तुओं में मोती, चांदी, चावल, मिसरी, सफेद कपड़ा,सफेद फूल, शंख, कपूर,श्वेत चंदन, पलाश की लकड़ी, दूध, दही, चावल, घी, चीनी आदि का दान करना शुभ रहेगा ,
  3. कुंडली के अनुसार चन्द्रमा को मन और माँ का कारक माना गया है जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस भाव में हो उसके अनुसार दान करना चाहिए . चन्द्र वृष राशी में शुभ और वृश्चिक राशी में अशुभ होता है , जब चन्द्र जन्म कुण्डली मे उच्च का या अपने पक्के भाव का हो तब चन्द्र से सम्बन्धित वस्तुऑ का दान नही करना चाहिए, अगर चन्द्र दितीय चतुर्थ भाव मे हो तो चावल चीनी दुध का दान न करे , यदि चन्द्र वृश्चिक राशी में हो तो चन्द्र की शुभता प्राप्त करने के लिए मन्दिर,मस्जिद, गुरुद्धारा, शमशान या आम जनता के लिए प्याउ( पानी की टंकी ) बनवाए या किसी मिटटी के बर्तन में चिड़ियों के लिये पानी रखे . 

चन्द्र का वैदिक मंत्र :- चंद्रमा के शुभ प्रभाव प्राप्त करने हेतु चंद्रमा के वैदिक मंत्र का 11000 जप करना चाहिए।.
”””ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः “””या “””ऊँ सों सोमाय नमः “”
 —-चन्द्र दोष दूर करने के लिए सोमवार, अमावस्या का दिन बहुत ही शुभ होता है। किंतु चन्द्र दोष से पीडि़त के लिए चन्द्रग्रहण के दौरान चन्द्र उपासना बहुत ही जरूरी होती है। शिव जी की आराधना करें। अपने श्री इष्ट देवताये नम:, का जाप करे…. 
 इस चंद्रग्रहण पर करें यह प्रयोग, बिजनेस में जरुर मिलेगी सफलता—- 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार यदि आपका बिजनेस ठीक नहीं चल रहा है तो घबराईए बिल्कुल मत क्यों की 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को को आने वाला चंद्र ग्रहण इस समस्या से छुटकारा पाने का श्रेष्ठ अवसर है। 
बिजनेस की सफलता के लिए चंद्रग्रहण के दिन यह प्रयोग करें-
 ऐसे करें प्रयोग—– पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को ग्रहण से पहले नहाकर लाल या सफेद कपड़े पहन लें। इसके बाद ऊन व रेशम से बने आसन को बिछाकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। जब ग्रहण काल प्रारंभ हो तब चमेली के तेल का दीपक जला लें। अब दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला लें तथा बाएं हाथ में 5 गोमती चक्र लेकर नीचे लिखे मंत्र का 54 बार जप करें- 
मन्त्र 
“”””ऊँ कीली कीली स्वाहा””” 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार अब इन गोमती चक्रों को एक डिब्बी में डाल दें और फिर क्रमश: 5 हकीक के दाने व 5 मूंगे के दाने लेकर पुन: इस मंत्र का 54 बार उच्चारण करें। अब इन्हें भी एक डिब्बी में डालकर उसके ऊपर सिंदूर भर दें। अब दीपक को बुझाकर उसका तेल भी इस डिब्बी में डाल दें। इस डिब्बी को बंद करके अपने घर, दुकान या ऑफिस में रखें। आपका बिजनेस चल निकलेगा।
 —-इस चंद्रग्रहण पर करें यह उपाय/टोटका, होगा अचानक धन लाभ—- चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को तंत्र शास्त्र के अनुसार ग्रहण के दौरान किया गया प्रयोग बहुत प्रभावशाली होता है और इसका फल भी जल्दी ही प्राप्त होता है। इस मौके का लाभ उठाकर यदि आप धनवान होना चाहते हैं तो नीचे लिखा उपाय करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी और आपको अचानक धन लाभ होगा। 
ऐसे करें उपाय/टोटका —- 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण 28 सितम्बर,2015 (सोमवार) को ग्रहण के पूर्व नहाकर साफ पीले रंग के कपड़े पहन लें। ग्रहण काल शुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके ऊन या कुश के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने पटिए(बाजोट या चौकी) पर एक थाली में केसर का स्वस्तिक या ऊँ बनाकर उस पर महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें। इसके बाद उसके सामने एक दिव्य शंख थाली में स्थापित करें।अब थोड़े से चावल को केसर में रंगकर दिव्य शंख में डालें। घी का दीपक जलाकर नीचे लिखे मंत्र का कमलगट्टे की माला से ग्यारह माला जप करें- ये हें मंत्र—- 
 सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि मुक्ति मुक्ति प्रदायिनी। 
 मंत्र पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।। 
 पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के अनुसार मंत्र जप के बाद इस पूरी पूजन सामग्री को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में आपको अचानक धन लाभ होगा।
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 जानिए कुंडली के अनिष्ट कारक ग्रहण योग--- 
 हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है. चंद्रमा दुसरे भाव में शुभ फल देता है और अष्टम भाव में अशुभ फल देता है. चन्द्र ग्रह वृषव राशी में उच्च और वृश्चक राशी में नीच का होता है. जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है. 

 जानिए क्या होता हैं ग्रहण दोष..??? 
 ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .
                  पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग 18 महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है
 ---ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है.
 ----चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . 
        चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. 
        ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है 

 जानिए ग्रहण योग के लक्षण--- 
 दूसरो को दोष देने की आदत 
 वाणी दोष से सम्बन्ध ख़राब होते जाते है ,सम्बन्ध नहीं बचते
सप्तम भाव का दोष marriage सुख नहीं देता 
प्रथम द्वितीय नवम भाव में बनने वाले दोष भाग्य कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है ,
 मन हमेशा नकारात्मक रहता है , 
हमेशा आदमी depression में रहता है,
कभी भी ऐसे आदमी को रोग मुक्त नहीं कहा जा सकता
पैरो में दर्द होना , दूसरे को दोष देना ,खाने में बल निकलते है , 
 ---उपाय --- 
त्रयोदशी को रुद्राभिषेक करे specially शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को
खीरा कब्ज दूर करता है ,liver मजबूत करता है ,पित्त रोग में फायदा करता है ,जो लोग FAT कम करना चाहे उनको फायदा करता है, किडनी problems में फायदा करता है --ग्रहण योग वाले आदमी के पास काफी उर्जा होती है यदि वो उसे +वे कर ले तो जीवन में अच्छी खासी सफलता मिल जाती है 
ग्रहण योग के लक्षण
  1. घर में अचानक आग लग जाये या चोरी हो जाये 
  2. 12th house में चंद्रमा after marriage गरीबी दे देगा जानिए ग्रहण योगों को +ve करने का तरीका---
  3. गुरु के सानिध्य में रहे , 
  4. मंदिर आते जाते रहे , 
  5. हल्दी खाते रहे , 
  6. गाय के सानिध्य में रहे , 
  7. सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे , -
  8. चांदी का चौकोर टुकड़ा अपनी जेब में रखे यदि माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है , 
  9. संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर बना ले या किसी और के नाम पे रख दे , 
  10. कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम में खर्च करे , 

 किसी जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रहण योग निवारण का एक आसान उपाय ( इसे ग्रहण काल के मध्य में करे)---
 1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु के साथ है तो चूना पत्थर ले उसे एक भूरे कपडे में बांध कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा किसी मंदिर में चढ़ा दे.
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