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जानिए सर्जरी/ऑपरेशन हेतु शुभ मुहूर्त का महत्व

प्रिय पाठकों/मित्रों, शुभ मुहूर्त में जब आप कोई भी कार्य करते है तो वह बिना बाधा के संपन्न होता है ऐसा शास्त्र कथन है तथा अनुभव जन्य भी है। कहा जाता है कि यदि आपने काल को पहचान लिया तो आपका कार्य निश्चित ही सफल होगा इसमें संदेह नहीं है । कहा गया है —

काल की गति जो पहचानै । 
प्रभु पाद पद पावै।। 

सामान्यतः हम सब लोगों के मुख से यह शब्द हमेशा निकलता है कि आज का दिन बहुत शुभ था आज सारा काम समय से हो गया। किन्तु अगले क्षण यह प्रश्न उठता है आखिर ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि आज हम सही समय पर घर से निकले थे और एकदम सही समय पर कार्यस्थल पर पहुंच गए थे। वस्तुतः किसी कार्य का अल्प प्रयास में ही हो जाना या तुरंत हो जाना या यह सब जाने अनजाने में शुभ मुहूर्त वा शुभ समय का ही परिणाम है ऐसा समझना चाहिए।
जानिए सर्जरी/ऑपरेशन हेतु शुभ मुहूर्त का महत्व-Know-the-Importance-of-Auspicious-Missions-for-Surgery-Operation     ध्यान रखें,मंगल ही शल्य चिकित्सा के लिए जिम्मेदार होता है। शल्य चिकित्सा के लिए अग्नि राशियां और अग्नि तत्व की सबसे बड़ी भूमिका होती है. वृश्चिक राशि को भी शल्य चिकित्सा से जोड़ा जाता है। कुंडली में रक्त और सुरक्षा का कारक मंगल होता है। स्वास्थ्य की हर तरह की मजबूती मंगल ही प्रदान करता है । मंगल खून खराबे का स्वामी भी होता है और हिंसा भी करवाता है परन्तु जब यही हिंसा व्यक्ति के कल्याण के लिए हो तो इसे शल्य चिकित्सा कहा जाता है ।
         जब कुंडली में ग्रह खराब स्थिति में बैठे हों और उस समय ऑपरेशन करवाया जाए तो इससे ऑपरेशन के समय कई खतरनाक स्थितियां पैदा हो सकती हैं और विषम परिस्थितियों में मृत्यु भी हो सकती है । इसलिए इस विषय पर जानकारी देते हुए ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की ऑपरेशन के समय ग्रहों का अच्छी स्थिति में होना बेहद आवश्यक है । जब तक आपातकालीन स्थिति न हो और जहाँ तक संभव हो तब तक किसी जानकार ज्योतिषी को कुंडली दिखाकर और एक अच्छा मुहूर्त निकलवाकर ही ऑपरेशन करवाना चाहिए।
जानिए क्यों जरुरी है सर्जरी/ऑपरेशन के शुभ मुहूर्त--
शुभ मुहूर्त इसलिए जरुरी है की जिस प्रकार हम व्यवहार में अच्छा-खराब, सुख-दुःख, सफलता-असफलता का स्वाद दिन प्रतिदिन लेते रहते है उसी प्रकार व्यवहार में शुभ-अशुभ भी अनुभूत है। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि अशुभ समय है तो शुभ समय वा शुभ मुहूर्त भी अवश्य ही होगा । यह स्वाभाविक है कि अशुभ समय में किया गया कार्य में व्यवधान उत्पन्न होता है।
         परन्तु इस विचार को अंधविश्वास मानने वाले यह कह सकते है कि क्या गारंटी है की शुभ समय में किया गया कार्य पूरा हो ही जाए या उसमे कोई व्यवधान न हो तो मेरा केवल यह कहना है की अशुभ समय के चयन से तो शुभ समय का चयन अच्छा ही होगा क्योकि यदि अच्छा मुहूर्त हमारा भाग्य नहीं बदल सकता तो कार्य की सफलता के पथ को सुगम तो बना ही सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शुभ मुहूर्त आपके भविष्य को बदले या न बदले परंतु यदि आप जीवन के प्रमुख कार्य यदि शुभ मुहूर्त में करते है तो आपका मन सकारात्मक रहेगा और कार्य निश्चित ही होगा। यह जानकर हमें अवश्य ही शुभ समय का चयन करना चाहिए।
जानिए कैसे बनता है सर्जरी का शुभ मुहूर्त --
मुहूर्त शास्त्र के मूल शास्वत ग्रंथों में यदि तलाशें तो रोगों के उपचार के लिए शुभ समय, दिन, माह आदि का सुन्दर वर्णन मिल जाएगा। इनका यदि बौद्धिकता से अनुसरण किया जाए तो अच्छे परिणामों की सम्भावना निश्चित रूप से बढ़ जाएगी। 
  • किस समय चिकित्सक से मिलें? 
  • किस दिन से अथवा किस समय से उपचार प्रारम्भ करें? 
  • शल्य चिकित्सा हेतु जा रहें हैं तो किस समय उसके लिए चिकित्सक तैयारी प्रारम्भ करें??
 ऐसे अनेक प्रश्न है जो जिज्ञासु मन में उठ रहें होंगे। मात्र थोड़े से ज्ञान और अल्प समय में इन प्रश्नों का समाधान मिल सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सर्जरी का शुभ मुहूर्त निकालने के लिए अनेक बातो का ध्यान रखा जाता है जैसे – वार, तिथि, नक्षत्र, करण, योग, नव ग्रहों की स्थिति, मल मास, अधिक मास, शुक्र और गुरु अस्त, अशुभ योग, भद्रा, शुभ लग्न, शुभ योग तथा राहू काल इन्ही के योग से शुभ मुहूर्त निकाला जाता है।

जैसे सर्वार्थसिद्धि योग :- यदि सोमवार के दिन रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा तथा श्रवण नक्षत्र हो तो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है। अब आप ही बताइये इतना सब कुछ करने के बाद शुभ मुहूर्त निकाला जाता है तो अवश्य ही यह समय आपके जीवन में ज्योति का काम करेगा।
रोगी के शल्य /ऑपरेशन कराने का शुभ मुहूर्त ---
यदि आप बीमार है और उस बिमारी का इलाज शल्य चिकित्सा है तथा डॉक्टर ने आपको यह बताया है कि आप ऑपरेशन कराना होगा। इस स्थिति में आप अपने डॉक्टर से पूछ सकते है कि कब तक कराना है यदि तुरंत ऑपरेशन कराना है तब तो बिना सोचे समझे आपको ऑपरेशन करा लेना चाहिए परन्तु यदि डॉक्टर यह कहता है कि आप अपने सुविधानुसार ऑपरेशन करा सकते है तो आपको ऑपरेशन के लिए निर्धारित शुभ मुहूर्त का अवश्य ही चयन करना चाहिए यदि ऐसा करते है तो ऑपरेशन के सफलता का चांस बढ़ जाता है ।
        शल्य चिकित्सा में जा रहे हैं तो इसी प्रकार प्रयास करें कि दोनों पक्षों की 4, 9, 14 तिथियाँ, सोमवार, मंगलवार अथवा गुरूवार और अश्विनी, मृगशिरा, पुष्प, हस्त, स्वाति, अनुराधा, ज्येष्ठा, श्रवण अथवा शतमिषा नक्षत्रों के संयोग एक साथ मिल जाएं। यदि पूर्णतया विशुद्ध गणनाओं में जाना है तो ज्योतिष ज्ञान, ग्रहगोचर आदि का ज्ञान परम आवश्यक है। औषधि सेवन के लिए प्रारम्भ करने के लिए समय के अभाव में यदि विशुद्ध गणना करना सम्भव न हो तब पंचाग से मात्र तिथि, वार और नक्षत्र देखकर उपचार प्रारम्भ कर सकते हैं। शुक्ल पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 और 15 तिथियाँ इसके लिए शुभ सिद्ध होती हैं। संयोग से यह तिथियाँ रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरूवार अथवा शुक्रवार की पड़ती हैं तो यह और भी अच्छा योग है। इनमें यदि अश्विनी, मृगाशिरा, पुनर्वस, पुष्प, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, श्रवण, घनिष्ठा और रेवती नक्षत्र भी मिल जाए अर्थात् तिथि, दिन और नक्षत्र तीनों के संयोग एक साथ बन जाएं तब तो बहुत ही संतोष जनक परिणाम औषधि और चिकित्सा के सिद्ध हो सकते हैं।
इनका भी रखें विशेष ध्यान--
  1. जहाँ तक संभव हो ऑपरेशन शुक्ल पक्ष में ही करवाना चाहिए । 
  2. ऑपरेशन के लिए जहाँ तक संभव हो पूर्णिमा का दिन नहीं चुनना चाहिए क्योंकि इस दिन शारीरिक द्रव्यों का संचार अपने चरम पर होता है ।
  3. ऑपरेशन के समय गोचर का चन्द्रमा जन्म राशि में संचार नहीं कर रहा होना चाहिए। 
  4. शनिवार और मंगलवार ऑपरेशन के लिए अच्छे हैं । 
  5. मंगल का मज़बूत होना ज़रूरी है । 
  6. जन्म कुंडली के आठवें घर में कोई ग्रह नहीं होना चाहिए । 
  7. आर्द्रा, ज्येष्ठ, मूल और अश्लेषा नक्षत्र और चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी तिथियां ऑपरेशन के लिए अच्छी हैं ।
  8. शरीर के जिस भी हिस्से पर ऑपरेशन किया जाना है, उस हिस्से पर कुंडली के जिस घर का अधिकार होता है वह घर अच्छी स्थिति में होना चाहिए और उसपर अच्छे ग्रहों की दृष्टि होनी चाहिए ।अगर इन सब चीज़ों का ध्यान रखा जाए तो ऑपरेशन से सम्बंधित खतरे को काफी काम किया जा सकता है ।

शल्य चिकित्सा हेतु शुभ मुहूर्त का विचार निम्न प्रकार से करना चाहिए....
  • शुभ तिथियां :- 2, 3, 5, 6, 7, 10, 12, 13 ( शुक्ल पक्ष की ) हैं।
  • शुभ वार :- रविवार, मंगलवार, गुरूवार और शनिवार हैं।
  • शुभ नक्षत्र :- अश्विनी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, श्रवण तथा विशाखा हैं।

उपर्युक्त शुभ मुहूर्त के निर्धारण में यदि शुभ तिथियां, वार तथा नक्षत्र का एक साथ निर्धारण नहीं हो पा रहा है तो इनमे से कम से कम दो का चयन कर ऑपरेशन करवा लेना चाहिए। 

जैसे — जून 2019 में 4 जून को तिथि, वार तथा नक्षत्र नियम के अनुरूप है। परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य तिथि उपलब्ध नहीं है ऐसी स्थिति में हमें तिथि, वार तथा नक्षत्र में किसी दो का चयन कर ऑपरेशन करवा लेना चाहिए।
जानिए उन ज्योतिषीय योग को जिनके कारण शल्य चिकित्सा होती ही है ?

  • - कुंडली में अग्नि तत्व की मात्रा ज्यादा होने पर
  • - कुंडली में मंगल के पापक्रान्त होने पर
  • - शनि का सम्बन्ध अग्नि राशियों से होने पर
  • - छठवें भाव में ज्यादा ग्रहों के होने पर
  • - हाथ में तारा या द्वीप होने पर
  • - हथेलियों का रंग लाल होने पर
  • - नाखूनों के टेढ़े मेढ़े होने पर
जानिए कब व्यक्ति शल्य चिकित्सा से बच जाता है ?

  • - कुंडली में बृहस्पति या शुक्र के मजबूत होने पर
  • - केंद्र में केवल शुभ ग्रहों के होने पर
  • - शुभ दशा आ जाने पर
  • - छोटी मोटी दुर्घटना या चोट चपेट लग जाने से
  • - अगर व्यक्ति का जन्म एकदम सुबह का हो या संध्याकाळ का हो
क्या करें जब जन्म कुंडली में हो शल्य चिकित्सा के योग ?

  • - लाल पुष्प से नृसिंह भगवान की उपासना करें
  • - उनके मंत्रों का नियमित जप करें
  • - यथाशक्ति रक्तदान करें
  • - दक्षिण दिशा की तरफ सर करके सोएं।
(निवेदन - ध्यान रखें, जो डॉक्टर मरीज़ को देख रहा है अगर उसे लगता है की मुहूर्त का इंतज़ार करने में खतरा है तो अच्छा रहेगा की मुहूर्त का इंतज़ार न किया जाए । बस भगवान् को याद करें और ऑपरेशन करवा लें ।)

जानिए स्वस्तिक का अर्थ,प्रभाव, परिणाम एवं कारण

स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है।
         ‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है। स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 
Know-the-meaning-effect-results-and-reasons-of-the-swastika-जानिए स्वस्तिक का अर्थ,प्रभाव, परिणाम एवं कारण       जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 
           ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की भारतीय संस्कृति में मांगलिक कार्यो में हर काम की शुरुआत में स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। स्वस्तिक को कल्याण का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू परंपरा के अनुसार स्वस्तिक को सर्व मंगल , कल्याण की दृष्टि से , सृष्टि में सर्व व्यापकता ही स्वास्तिक का रहस्य है। अनंत शक्ति, सौन्दर्य, चेतना , सुख समृद्धि, परम सुख का प्रतीक माना जाता है। स्वस्तिक  चिन्ह लगभग हर समाज मे आदर से पूजा जाता है क्योंकि स्वस्तिक के चिन्ह की बनावट ऐसी होती है, कि वह दसों दिशाओं से सकारात्मक एनर्जी को अपनी तरफ खींचता है। इसीलिए किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले पूजन कर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। ऐसे ही शुभ कार्यो में आम की पत्तियों को आपने लोगों को अक्सर घर के दरवाजे पर बांधते हुए देखा होगा क्योंकि आम की पत्ती ,इसकी लकड़ी ,फल को ज्योतिष की दृष्टी से भी बहुत शुभ माना जाता है। आम की लकड़ी और स्वास्तिक दोनों का संगम आम की लकड़ी का स्वस्तिक उपयोग किया जाए तो इसका बहुत ही शुभ प्रभाव पड़ता है। यदि किसी घर में किसी भी तरह वास्तुदोष हो तो जिस कोण में वास्तु दोष है उसमें आम की लकड़ी से बना स्वास्तिक लगाने से वास्तुदोष में कमी आती है क्योंकि आम की लकड़ी में सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करती है। यदि इसे घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाए तो घर के सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। 
        इसके अलावा पूजा के स्थान पर भी इसे लगाये जाने का अपने आप में विशेष प्रभाव बनता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मंगल प्रसंगों के अवसर पर पूजा स्थान तथा दरवाजे की चौखट और प्रमुख दरवाजे के आसपास स्वस्तिक चिह्न् बनाने की परंपरा है। वे स्वस्तिक कतई परिणाम नहीं देते, जिनका संबंध प्लास्टिक, लोहा, स्टील या लकड़ी से हो। सोना, चांदी, तांबा अथवा पंचधातु से बने स्वस्तिक प्राण प्रतिष्ठित करवाकर चौखट पर लगवाने से सुखद परिणाम देते हैं, जबकि रोली-हल्दी-सिंदूर से बनाए गए स्वस्तिक आत्मसंतुष्टि ही देते हैं। अशांति दूर करने तथा पारिवारिक प्रगति के लिए स्वस्तिक यंत्र रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य तथा दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी श्रीयंत्र के साथ लगाना लाभदायक है।
         ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अकेला स्वस्तिक यंत्र ही एक लाख बोविस घनात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम है। वास्तुदोष के निवारण में भी चीनी कछुआ ७00 बोविस भर देने की क्षमता रखता है, जबकि गणोश की प्रतिमा और उसका वैकल्पिक स्वस्तिक आकार एक लाख बोविस की समानता रहने से प्रत्येक घर में स्थापना वास्तु के कई दोषों का निराकरण करने की शक्ति प्रदान करता है। गाय के दूध, गाय के दूध से बने हुए दही और घी, गोनीत, गोबर, जिसे पंचगव्य कहा जाता है, को समानुपात से गंगा जल के साथ मिलाकर आम अथवा अशोक के पत्ते से घर तथा व्यावसायिक केंद्रों पर प्रतिदिन छिटकाव करने से ऋणात्मक ऊर्जा का संहार होता है। तुलसी के पौधे के समीप शुद्ध घी का दीपक प्रतिदिन लगाने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। 
       ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। गृहप्रवेश से पहले मुख्य द्वार के ऊपर स्वस्तिक चिह्व अंकित करके कल्याण की कामना की जाती है। देवपूजन, विवाह, व्यापार, बहीखाता पूजन, शिक्षारम्भ तथा मुण्डन-संस्कार आदि में भी स्वस्तिक-पूजन आवश्यक समझा जाता है। महिलाएँ अपने हाथों में मेहन्दी से स्वस्तिक चिह्व बनाती हैं। इसे दैविक आपत्ति या दुष्टात्माओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। 
    स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। सु का अर्थ अच्छा, अस का अर्थ सत्ता या अस्तित्व और क का अर्थ कर्त्ता या करने वाले से है। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द का अर्थ हुआ अच्छा या मंगल करने वाला। अमरकोश में भी स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध अर्थात् सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। स्वस्तिक शब्द की निरुक्ति है – स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
          प्राचीन काल में हमारे यहाँ कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने से पूर्व मंगलाचरण लिखने की परम्परा थी, लेकिन चूँकि आम आदमी के लिए मंगलाचरण लिखना सम्भव नहीं था, इसलिए पातंजल योग के अनुसार ऋषियों ने स्वस्तिक चिह्व का निर्माण किया, ताकि उसे बनाने मात्र से सभी कार्य सानन्द सम्पन्न हो सकें। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोडी और आगे की तरफ मुडी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुडती हैं। इसे 'दक्षिणावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुडती हैं। इसे 'वामावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 
      जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही 'वामावर्त स्वस्तिक' अंकित था। परिणामस्वरूप उसे पराजय का मुख देखना पडा। स्वस्तिक की दो रेखाएँ पुरुष और प्रकृति की प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्व को विष्णु, सूर्य, सृष्टिचक्र तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे गणेश का प्रतीक मानकर इसे प्रथम वन्दनीय भी माना है। पुराणों में इसे सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना गया है। वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। यास्काचार्य ने इसे ब्रह्म का ही एक स्वरूप माना है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को हिन्दुओं के चार वर्णों की एकता का प्रतीक मानते हैं। इन भुजाओं को ब्रह्मा के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में भी स्वीकार किया गया है। 
       स्वस्तिक धनात्मक चिह्व या 'प्लस' को भी इंगित करता है, जो अधिकता और सम्पन्नता का प्रतीक है। स्वस्तिक की खडी रेखा को स्वयं ज्योतिर्लिंग का तथा आडी रेखा को विश्व के विस्तार का भी संकेत माना जाता है। इन चारों भुजाओं को चारों दिशाओं के कल्याण की कामना के प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, जिन्हें बाद में इसी भावना के साथ रेडक्रॉस सोसायटी ने भी अपनाया। 'इलेक्ट्रोनिक थ्योरी' ने इन दो भुजाओं को नगेटिव और पोजिटिव का भी प्रतीक माना जाता है, जिनके मिलने से अपार ऊर्जा प्राप्त होती है। स्वस्तिक के चारों ओर लगाये जाने वाले बिन्दुओं को भी चार दिशाओं का प्रतीक माना गया है। एक पारम्परिक मान्यता के अनुसार चतुर्मास में स्वस्तिक व्रत करने तथा मन्दिर में अष्टदल से स्वस्तिक बनाकर उसका पूजन करने से महिलाओं को वैधव्य का भय नहीं रहता। पद्मपुराण में इससे संबंधित एक कथा का भी उल्लेख है। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हमारे मांगलिक प्रतीकों में स्वस्तिक एक ऐसा चिह्व है, जो अत्यन्त प्राचीन काल से लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों में प्रचलित रहा है। भारत में तो इसकी जडें गहरायी से पैठी हुई हैं ही, विदेशों में भी इसका काफी अधिक प्रचार प्रसार हुआ है। अनुमान है कि व्यापारी और पर्यटकों के माध्यम से ही हमारा यह मांगलिक प्रतीक विदेशों में पहुँचा। भारत के समान विदेशों में भी स्वस्तिक को शुभ और विजय का प्रतीक चिह्व माना गया। इसके नाम अवश्य ही अलग-अलग स्थानों में, समय-समय पर अलग-अलग रहे। सिन्धु-घाटी से प्राप्त बर्तन और मुद्राओंे पर हमें स्वस्तिक की आकृतियाँ खुदी मिली हैं, जो इसकी प्राचीनता का ज्वलन्त प्रमाण है। सिन्धु-घाटी सभ्यता के लोग सूर्यपूजक थे और स्वस्तिक चिह्व, सूर्य का भी प्रतीक माना जाता रहा है। ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी की खण्डगिरि, उदयगिरि की रानी की गुफा में भी स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मत्स्य पुराण में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वस्तिक की चर्चा की गयी है। पाणिनी की व्याकरण में भी स्वस्तिक का उल्लेख है। पाली भाषा में स्वस्तिक को साक्षियों के नाम से पुकारा गया, जो बाद में 'साखी' या साकी कहलाये जाने लगे। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वीकृत अष्टमंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। स्वस्तिक चिह्व की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल की प्रतीक माना जाता है। वे हैं – अरहन्त-मंगल, सिद्ध-मंगल, साहू-मंगल और 'केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगल'। महात्मा बुद्ध की मूर्तियों पर और उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिह्व मिलते हैं। अमरावती के स्तूप पर स्वस्तिक चिह्व हैं। विदेशों में इस मंगल-प्रतीक के प्रचार-प्रसार में बौद्ध धर्म के प्रचारकों का भी काफी योगदान रहा है। 
         बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण ही जापान में प्राप्त महात्मा बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हुए मिले हैं। ईरान, यूनान, मैक्सिको और साइप्रस में की गई खुदाइयों में जो मिट्टी के प्राचीन बर्तन मिले हैं, उनमें से अनेक पर स्वस्तिक चिह्व हैं। आस्ट्रिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में अपोलो देवता की एक प्रतिमा है, जिस पर स्वस्तिक चिह्व बना हुआ है। टर्की में ईसा से २२०० वर्ष पूर्व के ध्वज-दण्डों में अंकित स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। इटली के अनेक प्राचीन अस्थि कलशों पर भी स्वस्तिक चिह्व हैं। एथेन्स में शत्रागार के सामने यह चिह्व बना हुआ है। स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड में अनेक ऐसे प्राचीन पत्थर मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हैं। प्रारम्भिक ईसाई स्मारकों पर भी स्वस्तिक चिह्व देखे गये हैं। कुछ ईसाई पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि ईसाई धर्म के प्रतीक 'क्रॉस' का भी प्राचीनतम रूप स्वस्तिक ही है। छठी शताब्दी में चीनी राजा वू ने स्वस्तिक को सूर्य के प्रतीक के रूप में मानने की घोषणा की थी। 
         चीन में ताँगवंश के इतिहास-लेखक फुंगल्से ने लिखा है – "प्रतिवर्ष सातवें महीने के सातवें दिन मकडयों को लाकर उनसे जाले में स्वस्तिक चिह्व बुनवाते हैं। अगर कहीं किसी को पहले से ही जाले में स्वस्तिक चिह्व बना हुआ मिल जाए तो उसे विशेष सौभाग्य का सूचक मानते हैं।" तिब्बत में मृतकों के साथ स्वस्तिक चिह्व रखने की प्राचीन परम्परा रही है। बेल्जियम के नामूर संग्रहालय में एक ऐसा उपकरण रखा है, जो हड्डी से बना हुआ है। उस पर क्रॉस के कई चिह्व बने हुए हैं तथा उन चिह्वों के बीच में एक स्वस्तिक चिह्व भी है। इटली के संग्रहालय में रखे एक भाले पर भी स्वस्तिक का चिह्व है। रेड इण्डियन, स्वस्तिक को सुख और सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। वे इसे अपने आभूषणों में भी धारण करते हैं। इस प्रकार हमारा मंगल-प्रतीक स्वस्तिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सदैव पूज्य और सम्माननीय रहा है तथा इसके इस स्वरूप में हमारे यहाँ आज भी कोई कमी नहीं आयी है। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
          स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। 
        भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 
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ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिन्दू धर्म परंपराओं में स्वस्तिक शुभ व मंगल का प्रतीक माना जाता है। इसलिए हर धार्मिक, मांगलिक कार्य, पूजा या उपासना की शुरुआत स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर की जाती है। धर्मशास्त्रों में स्वस्तिक चिन्ह के शुभ होने और बनाने के पीछे विशेष कारण बताया गया हैं। 
जानते हैं यह विशेष बात – 
सूर्य और स्वस्तिक सूर्य देव अनेक नामो वाले प्रत्यक्ष देव है , यह अपनी पृथ्वी को ही नहीं अपितु अपने विशाल परिवार जिसमें गृह नक्श्तर आदि प्रमुख हैं अक सञ्चालन करते हैं स्वस्तिक का अर्थ है >>सुख,और आनंद देने वाला चतुष्पथ चोराहा . ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सूर्य और स्वस्तिक का कितना गहरा सम्बन्ध है यह इस से सोपस्ट हो जाता है देवत गोल और नक्श्तर मार्ग में से चारो दिशाओं के देवताओं से स्वस्तिक बनता है और इस मार्ग में आने वाले सभी देवी देव भी हमें स्वस्ति प्रदान करते हैं . वेदों में इसका लेख बहुत देखने को मिलता है..
       स्वस्तिक का बहुत ही महत्व है , इससे सुख,वैभव,यश,लक्ष्मी , कीर्ति और आनंद मिलता है, और हर शुभ कार्य में स्वस्तिक को प्रथम और प्रमुख स्थान प्राप्त होता है, वैदिक युग से ही इनकी सर्व मान्यता पाई और देखी जाती है, दरअसल, शास्त्रों में स्वस्तिक विघ्रहर्ता व मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश का साकार रूप माना गया है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसमें जो चार बिन्दियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में भी स्वस्तिक के श्री गणेश स्वरूप होने की पुष्टि होती है। हिन्दू धर्म की पूजा-उपासना में बोला जाने वाला वेदों का शांति पाठ मंत्र भी भगवान श्रीगणेश के स्वस्तिक रूप का स्मरण है। 
      यह शांति पाठ है – स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु इस मंत्र में चार बार आया स्वस्ति शब्द चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन है। असल में स्वस्तिक बनाने के पीछे व्यावहारिक दर्शन यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम, प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सद्भाव, सौंदर्य, विश्वास, शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं श्री गणेश का वास होता है और उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। चूंकि श्रीगणेश विघ्रहर्ता हैं, इसलिए ऐसी मंगल कामनाओं की सिद्धि में विघ्रों को दूर करने के लिए स्वस्तिक रूप में गणेश स्थापना की जाती है। इसीलिए श्रीगणेश को मंगलमूर्ति भी पुकारा जाता है। 
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    ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक को हिन्दू धर्म ने ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी धर्मों ने परम पवित्र माना है। स्वस्तिक शब्द सू + उपसर्ग अस् धातु से बना है। सु अर्थात अच्छा, श्रेष्ठ, मंगल एवं अस् अर्थात सत्ता। यानी कल्याण की सत्ता, मांगल्य का अस्तित्व। स्वस्तिक हमारे लिए सौभाग्य का प्रतीक है।स्वस्तिक दो रेखाओं द्वारा बनता है। दोनों रेखाओं को बीच में समकोण स्थिति में विभाजित किया जाता है। दोनों रेखाओं के सिरों पर बायीं से दायीं ओर समकोण बनाती हुई रेखाएं इस तरह खींची जाती हैं कि वे आगे की रेखा को न छू सकें। स्वस्तिक को किसी भी स्थिति में रखा जाए, उसकी रचना एक-सी ही रहेगी। 
      स्वस्तिक के चारों सिरों पर खींची गयी रेखाएं किसी बिंदु को इसलिए स्पर्श नहीं करतीं, क्योंकि इन्हें ब्रहाण्ड के प्रतीक स्वरूप अन्तहीन दर्शाया गया है। स्वस्तिक की खड़ी रेखा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग का संकेत देती है। आड़ी रेखा विश्व के विस्तार को बताती है। स्वस्तिक गणपति का भी प्रतीक है। स्वस्तिक को भगवान विष्णु व श्री का प्रतीक चिह्न् माना गया है। स्वस्तिक की चार भुजाएं भगवान विष्णु के चार हाथ हैं। इस धारणा के अनुसार, भगवान विष्णु ही स्वस्तिक आकृति में चार भुजाओं से चारों दिशाओं का पालन करते हैं। 
      स्वस्तिक के मध्य में जो बिन्दु है, वह भगवान विष्णु का नाभिकमल यानी ब्रम्हा का स्थान है। स्वस्तिक धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उपासना के लिए भी बनाया जाता है। हिंदू व्यापारियों के बहीखातों पर स्वस्तिक चिह्न् बना होता है। जब इसकी कल्पना गणेश रूप में हो तो स्वस्तिक के दोनों ओर दो सीधी रेखाएं बनायी जाती हैं, जो शुभ-लाभ एवं ऋद्धि-सिद्धि की प्रतीक हैं। हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार, अभिमंत्रित स्वस्तिक रूप गणपति पूजन से घर में लक्ष्मी की कमी नहीं होती। पतंजलि योगशास्त्र के अनुसार, कोई भी कार्य निर्विघ्न समाप्त हो जाए, इसके लिए कार्य के प्रारम्भ में मंगलाचरण लिखने का प्रचलन रहा है। परन्तु ऐसे मंगलकारी श्लोकों की रचना सामान्य व्यक्तियों से संभव नहीं। इसी लिए ऋषियों ने स्वस्तिक का निर्माण किया। मंगल कार्यो के प्रारम्भ में स्वस्तिक बनाने मात्र से कार्य संपन्न हो जाता है, यह मान्यता रही है। 
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वैज्ञानिक आधार— 
स्वस्तिक चिह्न् का वैज्ञानिक आधार भी है। गणित में + चिह्न् माना गया है। विज्ञान के अनुसार, पॉजिटिव तथा नेगेटिव दो अलग-अलग शक्ति प्रवाहों के मिलनबिन्दु को प्लस (+) कहा गया है, जो कि नवीन शक्ति के प्रजनन का कारण है। प्लस को स्वस्तिक चिह्न् का अपभ्रंश माना जाता है, जो सम्पन्नता का प्रतीक है। किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पूर्व हम स्वस्तिवाचन करते हैं अर्थात मरीचि, अरुन्धती सहित वसिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह तथा कृत आदि सप्त ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 
 वास्तुशास्त्र में स्वस्तिक—- 
स्वस्तिक का वास्तुशास्त्र में अति विशेष महत्व है। यह वास्तु का मूल चिह्न् है। स्वस्तिक दिशाओं का ज्ञान करवाने वाला शुभ चिह्न् है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की घर को बुरी नजर से बचाने व उसमें सुख-समृद्धि के वास के लिए मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वस्तिक चिह्न् बनाया जाता है। स्वस्तिक चक्र की गतिशीलता बाईं से दाईं ओर है। इसी सिद्धान्त पर घड़ी की दिशा निर्धारित की गयी है। पृथ्वी को गति प्रदान करने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत उत्तरायण से दक्षिणायण की ओर है। इसी प्रकार वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा का बड़ा महत्व है। इस ओर भवन अपेक्षाकृत अधिक खुला रखा जाता है, जिससे उसमें चुम्बकीय ऊर्जा व दिव्य शक्तियों का संचार रहे। वास्तुदोष क्षय करने के लिए स्वस्तिक को बेहद लाभकारी माना गया है। मुख्य द्वार के ऊपर सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न् बनाना चाहिए। यह चिह्न् नौ अंगुल लम्बा व नौ अंगुल चौड़ा हो। घर में जहां-जहां वास्तुदोष हो, वहां यह चिह्न् बनाया जा सकता है।

जानिए अंगारकी चतुर्थी का महत्व और कैसे मनाएं अंगारकी चतुर्थी

वर्ष भर में जितनी भी संकष्टी पड़ती हैं उनमे अंगारकी संकष्टी का विशेष महत्व है. कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. शास्त्रों के अनुसार, चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा और व्रत करना फलदायी माना जाता है. जिस माह संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन आती है उसे अंगारकी चतुर्थी और संकट हारा चतुर्थी भी कहा जाता है. इस वर्ष 03 अप्रैल 2018 को अंगारकी संकष्टी चतुर्थी आ रही है. 
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यह व्रत भारत में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिमी व दक्षिणी भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है. संकष्टी शब्द का हिंदी अर्थ है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना’। इसीलिए बहुत सी महिलाएं एवं पुरुष बड़े श्रद्धाभाव के साथ इस व्रत को करते है। इसे संकट चौथ और गणेश संकष्टी चौथ भी कहते हैं. वैशाख मास संकष्टी चतुर्थी 3 अप्रैल को है. मंगलवार को पड़नेवाली चतुर्थी को अतिशुभकारी माना जाता है ।
जानिए अंगारकी चतुर्थी का महत्व और कैसे मनाएं अंगारकी चतुर्थी-Learn-the-Importance-of-Angarqi-Chaturthi-and-How-to-Celebrate-Angarqi-Chaturthi         मान्यता है कि अंगारक (मंगल देव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने वरदान दिया कि चतुर्थी तिथि अगर मंगलवार को पड़े तो उसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जायेगा. इस व्रत को करने से पूरे साल भर के चतुर्थी व्रत करने का फल प्राप्त होता है. इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी काम बिना किसे विघ्न के संपूर्ण हो जाते हैं. भक्तों को गणेश जी की कृपा से सारे सुख प्राप्त होते हैं. इस व्रत में अन्न नहीं खाया जाता । दिन में फल, जूस, मिठाई खाने का विधान है. शाम को पूजा के बाद फलाहार करते हैं, जिसमें साबूदाना खिचड़ी, राजगिरा का हलवा, आलू मूंगफली, सिंघाड़े के आटे से बनी चीजें खा सकते हैं. सभी चीजें सेंधा नमक में बनायी जाती हैं. विधिपूर्वक व्रत रखने से जीवन में सुख-शांति आती है तथा व्यक्ति को अच्छी बुद्धि, धन-धान्य की प्राप्ति होती है । 
अंगारकी संकष्टी चतुर्थी पूजा की विधि--- 
प्रातः काल स्नान आदि कर स्वछ होकर लाल वस्त्र धारण करें. गणपति की मूर्ति स्थापित करें. पंचामृत से, कच्चे दूध से एवं गंगाजल से उन्हें स्नान कर कर , उन्हें लाल वस्त्र, मोदक, दूर्वा, जामुन, गुल्हड के फूल , तिल के लड्डू अर्पित करें. धूप दीप जला कर, रोलि, अक्षत, चंदन, अष्टगंध आदि से षोडशोपचार द्वारा पूजन करना चाहिए. इसके पश्चात गणपति का ध्यान कर अथर्व स्त्रोत का पाठ करें , दिन भर उनका स्मरण कर  “ॐ ग़ं गणपतए नमः”  का जप करना चाहिए । 
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गणपति विघ्नहरता माने जाते हैं आपके समस्त कष्टों को दूर कर सकते हैं. जीवन में जो भी समस्याएं हों , गणपति की शरण में जाने से वह दूर हो जाती हैं. गणपति को समस्त देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाता है. कोई भी शुभ कार्य करने से पहले गणपति की आराधना पहले की जाती है फिर वह कार्य शुरू किया जाता है । 
 मंत्र -- 
 गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्। 
उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।
  1. इस दिन दिनभर फलाहार में ही रहना उत्तम माना गया है। इसलिए फलाहार में ही व्रत के नियमों का पालन करें। 
  2. शाम के समय को चांद निकलने से पहले पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान थाली में तिल और गुड़ के लड्डू, फूल, कलश में पानी, चंदन, धूप, केला या नारियल प्रसाद के तौर पर रखना चाहिए। 
  3. पूजा करते समय दुर्गा माता की मूर्ति भी साथ में रखें। गणेश जी की पूजा के दौरान माता की मूर्ति रखना शुभ माना जाता है। 
  4. गणेश जी के मंत्र के साथ पूजा करें। माथे पर चंदन लगाएं, धूप जलाएं, फूल और लड्डू चढ़ाएं और जल अर्पित करें।
  5. पूजा के बाद प्रसाद और लड्डुओं को प्रसाद के तौर पर बांटे। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अंगारकि संकष्टी को चंद्रमा की किरण गणपति पर पड़ें तो उस समय अथर्वशीर्ष का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है. चंद्र दर्शन के पश्चात ही इस व्रत को समाप्त किया जाता है.

      माना जाता है की भगवान शिव ने भी इस व्रत को किया था एवं इस दिन गणपति के साथ, माता पार्वती, भगवान शिव जी एवं चंद्रमाका पूजन करना चाहिए.दिन भर व्रत रख कर संध्या में पूर्व मुखी हो कर या फिर ईशान कोण, या उत्तर दिशा की तरफ मुख कर गणपति आराधना के पश्चात चंद्र दर्शन करने के बाद व्रत तोड़े. इस दिन व्रत करने से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है एवं समस्त विघ्नों का नाश होता है इसीलिए गणपति को विघ्नहर्ता भी बोला गया है । 03rd अप्रैल 2018(मंगलवार) तदनुसार वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी (अंगारकी चतुर्थी) पर चंद्रोदय का समय रात्रि 21:27 रहेगा । 
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अंगारक चतुर्थी के दिन जरूर पढ़ें मयूरेश स्तोत्र--- 
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए गणपति जी को सबसे पहले याद किया जाता है। परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और चहुँओर प्रगति, चिंता व रोग निवारण के लिए गणेशजी का मयूरेश स्तोत्र सिद्ध एवं तुरंत असरकारी माना गया है। राजा इंद्र ने मयूरेश स्तोत्र से गणेशजी को प्रसन्न कर विघ्नों पर विजय प्राप्त की थी। इसका पाठ किसी भी चतुर्थी पर फलदायी है लेकिन अंगारक चतुर्थी पर इसे पढ़ने से फल सहस्त्र गुना बढ़ जाता है। 
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विधि : --- 
  •  * सबसे पहले स्वयं शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें 
  •  * यदि पूजा में कोई विशिष्‍ट उपलब्धि की आशा हो तो लाल वस्त्र एवं लाल चंदन का प्रयोग करें 
  • * पूजा सिर्फ मन की शांति और संतान की प्रगति के लिए हो तो सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। सफेद चंदन का प्रयोग करें। 
  •  * पूर्व की तरफ मुंह कर आसन पर बैठें। 
  •  * ॐ गं गणपतये नम: के साथ गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें।

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* निम्न मंत्र द्वारा गणेशजी का ध्यान करें--- 
* 'खर्वं स्थूलतनुं गजेंन्द्रवदनं लंबोदरं सुंदरं प्रस्यन्दन्मधुगंधलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् दंताघातविदारितारिरूधिरै: सिंदूर शोभाकरं वंदे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम।' 
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फिर गणेशजी के 12 नामों का पाठ करें।
 - किसी भी अथर्वशीर्ष की पुस्तक में 12 नामों वाला मंत्र आसानी से मिल जाएगा।(12 नाम हिंदी में भी स्मरण कर सकते हैं) 
 - आपकी सुविधा के लिए मंत्र - ---
 'सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णक: लंबोदरश्‍च विकटो विघ्ननाशो विनायक : धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजानन: द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छृणयादपि विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमें तथा संग्रामेसंकटेश्चैव विघ्नस्तस्य न जायते' 
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- गणेश आराधना के लिए 16 उपचार माने गए हैं--- 
 1. आवाहन 2. आसन 3. पाद्य (भगवान का स्नान‍ किया हुआ जल) 4. अर्घ्य 5. आचमनीय 6. स्नान 7. वस्त्र 8. यज्ञोपवित 9 . गंध 10. पुष्प (दुर्वा) 11. धूप 12. दीप 13. नेवैद्य 14. तांबूल (पान) 15. प्रदक्षिणा 16. पुष्‍पांजलि
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मयूरेश स्त्रोतम् ब्रह्ममोवाच --- - 
'पुराण पुरुषं देवं नाना क्रीड़ाकरं मुदाम। मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 
 परात्परं चिदानंद निर्विकारं ह्रदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया। सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 नानादैव्या निहन्तारं नानारूपाणि विभ्रतम। नानायुधधरं भवत्वा मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरे विभुम्। सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 पार्वतीनंदनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम्। भक्तानन्दाकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम्। 
 मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम। समष्टिव्यष्टि रूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 सर्वज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम्। सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 अनेककोटिब्रह्मांण्ड नायकं जगदीश्वरम्। अनंत विभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 
 मयूरेश उवाच --- इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्व पापप्रनाशनम्। सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम्।। 
 कारागृह गतानां च मोचनं दिनसप्तकात्। आधिव्याधिहरं चैव मुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्।।
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जानिए गणपति आराधना में रखी जाने वाली सावधानियां --- 
  •  * गणेश को पवित्र फूल ही चढ़ाया जाना चाहिए। 
  •  * जो फूल बासी हो, अधखिला हो, कीड़ेयुक्त हो वह गणेशजी को कतई ना चढ़ाएं।
  •  * गणेशजी को तुलसी पत्र नहीं चढ़ाया जाता। 
  •  * दूर्वा से गणेश देवता पर जल चढ़ाना पाप माना जाता है 

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जानिए नौकरी में प्रमोशन/तरक्की/उन्नति के लिए कुछ ज्योतिषीय उपाय

आज के समय की सबसे बड़ी समस्या है अच्छी नौकरी, अगर किसी के पास अच्छी नौकरी है तो उसे समय पर अच्छा प्रमोशन या वेतन वृद्धि नहीं मिलती। हर व्यक्ति अपनी नौकरी में प्रमोशन या पदोन्नति चाहता हैं। अगर आप नौकरी में उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं और बात नहीं बन रही है तो यहां ज्योतिष अनुसार सरल उपाय बताये जा रहे हैं। ऐसी समस्याओं को दूर करने के लिए आपको मेहनत तो करनी ही है पर साथ-साथ अगर यह उपाय भी करेंगे तो आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की बहुत बार ऐसा होता है की जन्मकुण्डली में किसी भी प्रकार के ग्रह दोष के चलते हमें बहुत सी परेशानियां अकारण घेरे रहती हैं। हम चाह कर भी उन परेशानियों से निजात नहीं पा पाते। एक परेशानी खत्म होते ही दूसरी सिर उठा कर खड़ी रहती है। नौकरी में प्रमोशन और इंक्रीमेंट चाहते हैं तो एक आसान और प्रभावशाली उपाय अपनाने से निश्चित ही लाभ होगा। इसके अतिरिक्त ऑफिस में अन्य लोगों के कारण आपको समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो या बॉस बेवजह आप पर भड़कता रहता हो और प्रमोशन के योग बनते बनते रह जाते हों। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वैदिक ज्योतिष में दशम भाव कर्म का भाव होता है। इस भाव से हमें नौकरी और व्यवसाय का बोध होता है। इसके अलावा दशम भाव और दशम भाव का स्वामी सांसारिक जीवन में हमारे प्रदर्शन के बारे में सूचित करता है। 
Know-some-astrological-measures-for-promotions-in-the-job-जानिए नौकरी में प्रमोशन/तरक्की/उन्नति के लिए कुछ ज्योतिषीय उपाय       वैदिक ज्योतिष के अनुसार कई ग्रह दशम भाव के लिए लाभकारी होते हैं और शुभ फल देते हैं। इनमें सूर्य कार्य क्षेत्र में हमारे लक्ष्य और महत्वाकांक्षा का कारक होता है। मंगल ग्रह हमारी व्यावसायिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए ऊर्जा प्रदान करता है और बेहतर प्रयासों के लिए प्रेरित करता है। वहीं बुध ग्रह बुद्धि और ज्ञान का कारक होता है इसलिए बुध के प्रभाव से कार्य क्षेत्र में उन्नति मिलती है। बृहस्पति यानि गुरु की कृपा से नौकरी और व्यवसाय में कई अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं, साथ ही करियर के क्षेत्र में बढ़ोत्तरी होती है। इसके अलावा शनि देव जिन्हें कर्म अधिकारी कहा जाता है। वे हर मनुष्य को उसके कर्म के आधार पर शुभ फल और दंड देते हैं। काल पुरुष राशि चक्र में शनि स्वयं दशम भाव के स्वामी हैं। इस वजह से शनि देव कर्म और कार्य क्षेत्र में मनुष्य को अनुशासन, समर्पण और प्रतिबद्धता के लिए प्रेरित करते हैं। 
     पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कुंडली में दशम भाव के स्वामी और दशम भाव के पीड़ित रहने से हमारी प्रोफेशनल लाइफ में परेशानियां आती हैं। जब कोई क्रूर ग्रह दशम भाव में स्थित रहकर अशुभ फल देता है तो इसके परिणामस्वरुप नौकरी और व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जॉब मिलने में देरी, नौकरी से निकाला जाना, पदोन्नति नहीं होना, जॉब को लेकर असंतुष्ट रहना और करियर में तमाम तरह की परेशानी देखनी पड़ती है। जन्म कुंडली के अध्ययन से इस बात का पता लगाया जा सकता है। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नौकरी में प्रमोशन के उपाय जानने वाले जातकों के लिए यह लेख वरदान साबित होगा। इस लेख में हम आपको नौकरी में तरक्की पाने के सरल उपाय दे रहे हैं। नौकरी पेशा से जुड़े लोगों को हर साल पदोन्नति और वेतन वृद्धि का इंतज़ार रहता है। सालभर बेहतर प्रदर्शन और मेहनत करने पर प्रमोशन और सैलरी इंक्रीमेंट मिलने से नौकरी करने वाला हर व्यक्ति खुश होता है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि जॉब कर रहे जातकों को उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता है। उनके प्रमोशन में किसी न किसी प्रकार की रुकावट या बाधा देखने को मिलती है। ऐसे लोगों के लिए वैदिक ज्योतिष में नौकरी में तरक्की के उपाय बताए गए हैं। इन उपायों के माध्यम से नौकरी कर रहे जातक आसानी से अपनी मेहनत का फल प्रमोशन और इंक्रीमेंट के रूप में प्राप्त कर सकते हैं। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के मतानुसार इन सभी मुश्किलों के समाधान के लिए केवल एक अचूक उपाय आपकी मदद कर सकता है। आपके द्वारा की गई मेहनत रंग लाएगी और आप दिन दुगुनि रात चौगुनी तरक्की करेंगे। यदि आप अपनी नौकरी में प्रमोशन या पदोन्नति चाहते हैं तो यहां ज्योतिष अनुसार कुछ उपाय बता रहे हैं। इनमें से कोई भी एक उपाय आजमा सकते हैं। बस किसी भी एक उपाय ही लगातार करने से आपकी मनोकामनापूर्ण हो जाएगी।
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 इन ज्योतिषीय उपाय से होगा नौकरी में प्रमोशन -- 
 कुंडली में दशम भाव के स्वामी से संबंधित मंत्रों का जप करना चाहिए। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि जातक विभिन्न ग्रहों के दुष्प्रभाव से पीड़ित रहता है तो भी नौकरी में परेशानी आती है। इसके निराकरण लिए घर पर नवग्रह हवन या मंदिर में नवग्रह अभिषेक करवाना चाहिए। इसके प्रभाव से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवग्रह हवन व अभिषेक से राहु-केतु के दोषों से भी मुक्ति मिलती है।       सूर्योदय के समय सूर्य देव को जल चढ़ाएं और गायत्री मंत्र या सूर्य मंत्र का जप करें। ऐसा करने से व्यावसायिक जीवन में उन्नति होती है। सूर्य के प्रभाव से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को जीवन में आने वाली कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। इसके प्रभाव से आपको कार्य स्थल पर अपने वरिष्ठ सहकर्मियों और अधिकारियों के साथ तालमेल बनाकर चलने में मदद मिलेगी। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनिवार के दिन शनि मंदिर में तेल का दीया जलाने से भी नौकरी में आ रही परेशानियां दूर होती है। शनि मंत्र का जप करने से शनि से संबंधित दुष्प्रभाव कम होते हैं। शनि देव की कृपा से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा से हमारी प्रोफेशनल लाइफ में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वे लोग जो व्यवसाय करते हैं उनके लिए व्यापार वृद्धि यंत्र एक वरदान है। इस यंत्र को अपने कार्य स्थल या ऑफिस में स्थापित करें। इस यंत्र के सकारात्मक प्रभाव से धन लाभ, संतुष्टि व आर्थिक हानि का संकट दूर होता है। साथ ही बिजनेस में पार्टनरशिप और व्यवसाय के विस्तार में मदद मिलती है।
       हनुमानजी का आकाश में उड़ता हुआ एक चित्र लगाएं और प्रतिदिन उसके समक्ष बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। प्रति मंगलवार या शनिवार को बढ़ के पत्ते पर आटे का दीया जलाकर उसे हनुमानजी के मंदिर में रख आएं। ऐसा कम से कम 11 मंगलवार या शनिवार करें। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनिवार की सुबह जल्दी उठें और सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं। इसके बाद घर में किसी पवित्र स्थान पर पूजन का विशेष प्रबंध करें या किसी मंदिर में जाएं। शनिवार शनि की पूजा का विशेष दिन माना जाता है। शनि हमारे कर्मों का फल देने वाले देवता हैं। अत: इसी दिन शनि देव का विधिवत पूजन करनी चाहिए। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नौकरी या प्रमोशन की इच्छा रखने वाले लोगों को प्रतिदिन पक्षियों को मिश्रित अनाज खिलाना चाहिए। आप सात प्रकार के अनाजों को एकसाथ मिलाकर पक्षियों को खिलाएं। इसमें गेहूं, ज्वार, मक्का, बाजरा, चावल, दालें शामिल की जा सकती हैं। प्रतिदिन सुबह-सुबह यह उपाय करें, जल्दी ही नौकरी से जुड़ी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी।उनके लिए जल की व्यवस्था भी करें। यह उपाय कम से कम 43 दिन तक करें। जब पक्षी आपके घर की छत पर चहकेंगे तो घर के ईर्द गिर्द फैली नकारत्मकता का नाश होगा और सकारात्मकता का संचार होगा। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की प्रमोशन/ तरक्की के लिए सूर्य देवता को मनाना काफी शुभ बताया जाता है। जो लोग आसानी से तरक्की करते हैं उनका सूर्य काफी स्ट्रोंग होता है। आप प्रतिदिन सुबह सूर्य को पानी अर्पित करें और सूर्य नमस्कार किया करें। सूर्य देवता को जल अर्पित करने वाला बर्तन तांबे का हो और उसके अन्दर कुछ बूंदे गंगाजल की डाल लें। जल अर्पित करने के बाद आप सूर्य देवता से अपनी इच्छा रोज जाहिर किया करें। अगर लाख मेहनत करने पर भी मनचाहा वेतन या प्रमोशन नहीं मिल रहा है तो आज से ही रोज रात में एक हरे कपड़े में एक इलायची को बांधकर तकिए के नीचे रखकर सो जाएं और प्रात: उसे घर के किसी बाहरी व्यक्ति को दे दीजिए। 
        पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि नौकरी-पेशा करने वाले जातकों को जॉब में प्रमोशन नहीं मिल रहा है अथवा उनकी तनख़्वाह में वृद्धि नहीं हो रही है तो उन्हें मंगलवार के दिन हनुमान जी की आराधना करना चाहिए। हर रविवार को गाय को किसी बर्तन में गुड़ व गेहूं रखकर स्नेहपूर्वक खिलाएं। इसके साथ ही मंदिर में पीली वस्तुएं दान करें। शुक्ल पक्ष के सोमवार को तीन गोमती चक्र चांदी के तार से बांध कर हमेशा अपने पास रखें। 
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 नौकरी में तरक़्क़ी पाने, नई नौकरी पाने, सैलरी में वृद्धि के लिए एवं मनपसंद स्थानातंरण के अलावा नौकरी में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए अन्य ज़रुरी उपाय-- 
 1. किसी ग़रीब को काले कंबल का दान करें 
 2. पिसी हुई हल्दी को बहते पाने में डालें 
 3. घर से निकलने से पूर्व पहले दाहिना पैर निकालें 
 4. सोमवार को कनिष्ठिका अँगुली में चाँदी की अंगूठी में मोती धारण करें 
 5.सुबह पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएँ एवं पदोन्नति की कामना करें 
 6. रविवार या मंगलवार के दिन मन में पदोन्नति की कामना करते हुए लाल कपड़े में जटा वाला नारियल बांधें और उसे पूर्व दिशा की ओर बहते हुए जल में प्रवाहित करें 
 7. शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले सोमवार के दिन सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र को चाँदी के तार में बाँधकर अपने पास रखें 
 8. घर से निकलते समय एक नींबू को अपने सिर के ऊपर से 7 बार घुमाएँ और चार लौंग इसके अन्दर डालें। अब इस नींबू को अपनी जेब या बैग में रखें और शाम को किसी बहते पानी में या किसी सुनसान जगह रख दें 
 9. यदि मनचाहा स्थानांतरण चाहते हैं तो अपने तकिये के नीचे अनंतमूल की जड़ को रखकर सोएँ 
 10. प्रत्येक शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे सरसो के तेल का दीपक जलाकर 7 परिक्रमा करें। 
 11. प्रत्येक गुरुवार को पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाएँ लेकिन वृक्ष को स्पर्श न करें 
 12. पिता की सेवा करें और उन्हें यथासंभव कुछ उपहार दें 
 13. पीपल के 11 साबुत पत्ते लेकर उन पर लाल सिन्दूर से राम-राम लिखकर प्रत्येक पत्ते को माथे से लगाकर साइड रखते जाएं। जब सभी पत्तों पर राम-राम लिख जाये तो मौली माला बनाकर हनुमान जी से अपनी नौकरी की प्रार्थना करते हुए उन्हें ये माला पहना दें। ऐसा लगातार 7 शनिवार तक करें 
 14. नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय एक नींबू में 4 लौंग गाढ़कर ॐ हं हनुमंते नमः मंत्र का 21 बार जाप करके नींबू को जेब या पर्स में रखकर जाएं और वापिस आकर ,किसी पीपल के पेड़ के नीचे रख दें 15. किसी अच्छे से ज्योतिषी को अपनी जन्म पत्रिका दिखाकर दशम भाव तथा दशमेश को मज़बूती प्रदान करें

जानिए 2018 में मौनी अमावस्या व्रत का महत्व और स्नान- दान के शुभ मुहूर्त

मौनी अमावस्या का हिन्दू धर्म में बेहद खास महत्व है। माघ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही मौनी अमावस्या कहते है। इस दिन मौन व्रत करना चाहिए। बता दें, मुनि शब्द से ही ‘मौनी’ शब्द की उत्पत्ति हुई है। इसीलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन मौन रहकर यमुना या गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। इस दिन मौन रहना चाहिए। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन मौन रहकर प्रयाग संगम अथवा पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। मौन रहकर वाणी को शक्ति मिलती है म।नसिक समस्या हो वहम की समस्या हो तो इस दिन मौन रहकर इस समस्या क निदान होत। है । ग्रहों की शांति के लिये और उसके निवारण के लिये मौन रहें । 
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जानिए 2018 में मौनी अमावस्या व्रत का महत्व और स्नान- दान के शुभ मुहूर्त-Know-the-importance-of-fasting-in-the-year-2018-and-the-auspicious-timeमाघ माह के स्नान का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पर्व अमावस्या ही है। इस माह की अमावस्या और पूर्णिमा दोनों ही तिथियां बहुत पर्व है। इन दिनों में पृथ्वी के किसी न किसी भाग में सूर्य या चंद्र ग्रहण हो सकता है। इसलिए इस दिन स्नानादि करके पुण्य कर्म किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की चंद्रमा को मन का स्वामी माना जाता है और अमावस्या को चंद्र के दर्शन नहीं होते, जिसके कारण मन की स्थिति कमजोर होती है। इसीलिए इस दिन मौन व्रत रखकर मन को संयम में रखने का विधान बनाया गया है। शास्त्रों में कहा गया है की होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है उससे कई गुना अधिक पुण्य मन में हरी का नाम लेने से मिलता है। क्योंकि इस व्रत को करने वाले को पुरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता है इसीलिए यह योग पर आधारित व्रत भी कहलाता है। 
       मौनी अमावस्या के दिन संतों और महात्माओं की तरह चुप रहना उत्तम माना जाता है। अगर चुप नहीं रह सकते को इस दिन मुख से कोई कटु शब्द नहीं निकालने चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान् शिव दोनों की ही पूजा का विधान है। मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान, पुण्य तथा जाप करने चाहिए. यदि किसी व्यक्ति की सामर्थ्य त्रिवेणी के संगम अथवा अन्य किसी तीर्थ स्थान पर जाने की नहीं है तब उसे अपने घर में ही प्रात: काल उठकर दैनिक कर्मों से निवृत होकर स्नान आदि करना चाहिए अथवा घर के समीप किसी भी नदी या नहर में स्नान कर सकते हैं. पुराणों के अनुसार इस दिन सभी नदियों का जल गंगाजल के समान हो जाता है. स्नान करते हुए मौन धारण करें और जाप करने तक मौन व्रत का पालन करें | इस दिन व्यक्ति प्रण करें कि वह झूठ, छल-कपट आदि की बातें नहीं करेगें. 
      इस दिन से व्यक्ति को सभी बेकार की बातों से दूर रहकर अपने मन को सबल बनाने की कोशिश करनी चाहिए. इससे मन शांत रहता है और शांत मन शरीर को सबल बनाता है. इसके बाद व्यक्ति को इस दिन ब्रह्मदेव तथा गायत्री का जाप अथवा पाठ करना चाहिए. मंत्रोच्चारण के साथ अथवा श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करना चाहिए. दान में गाय, स्वर्ण, छाता, वस्त्र, बिस्तर तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करनी चाहिए | ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शास्त्रों में वर्णित है कि नदी, सरोवर के जल में स्नान कर सूर्य को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देना चाहिए लेकिन जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। सोमवती अमावस्या या मौनी अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें। सोमवती अमावस्या के दिन सूर्य नारायण को जल देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी। इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना और दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।
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मौनी अमावस्या 2018 :-
  •  वर्ष 2018 में मौनी अमावस्या 16 जनवरी 2018 मंगलवार के दिन होगी। 
  •  मौनी अमावस्या का समय अमावस्या तिथि = 16 जनवरी 2017, मंगलवार 05:11 बजे प्रारंभ होगी। 
  •  अमावस्या तिथि = 17 जनवरी 2017, बुधवार 07:47 बजे समाप्त होगी। 
  •  कुम्भ मेले के दौरान इलाहबाद के प्रयाग में मौनी अमावस्या का स्नान सबसे महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि इस दिन हिन्दू धर्मवलंभी न केवल मौन व्रत रखते है बल्कि भगवान् पूजा अर्चना भी करते है। 

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जानिए इस मोनी अमावस्या पर विशेष क्या करे — 
  1.  *सुबह शाम स्नान क संकल्प करे 
  2. *जल को सिर पर लगाकर स्नान करे 
  3. *साफ कपड़े पहने *सूर्य को तिल डालकर जल चढ़ाये 
  4. *श्री कृष्णा और शिवजी के कोई भी मंत्र का उचारण करे 
  5. *दान करे 
  6. *जल और फल खाकर व्रत करे । 

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इस मंत्र का करें जाप ---
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अमावस्या के दिन इस मंत्र के जप से विशेष उपलब्धि प्राप्त होगी। साथ ही स्नान दान का पूरा पुण्य भी मिलेगा। 
 यह हैं मंत्र-- अयोध्या, मथुरा, माया, काशी कांचीअवन्तिकापुरी, द्वारवती ज्ञेया: सप्तैता मोक्ष दायिका।। गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिंधु कावेरी जलेस्मिनेसंनिधि कुरू।। 
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क्या करें उपाय राहु केतु के लिये --- 
 -शिवजी के मंदिर ज़रूर जाये -शिवलिंग पर जल चढ़ाये -एक रुद्राक्ष की माला अर्पित करे और धूप दीप जलाकर नीचे दिये मंत्र को 108 बार बोले : और रुद्राक्ष की माला धारण कर ले । ग्रहों की दोषों का भी निवारण होता है । गले मे पहन ले जीवन की परेशानियों से मुक्ति मिलेगी | 
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जानिए इस वर्ष मोनी अमावस्या पर क्या करे दान --- 
  •  -मुक्ति और मोक्ष के लिये – गौ दान करे 
  • -आर्थिक समस्या के लिये -भूमि दान 
  • -ग्रह नक्षत्र के दोष निवारण के लिये – काले तिल य तिल के लड्डू दान करे
  •  -कर्ज़ा मुक्ति के लिये – पीले धातु का दान / पीतल /पीले वस्तुओं क दान
  •  -पारिवारिक समस्या के निदान – देशी घी का दान 
  • -बाधा मुक्ति – नमक का दान 
  • -संतान से जुड़ी कोई समस्या – चाँदी का दान 

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जानिए क्या करें इस वर्ष मोनी अमावस्या पर-- 
कम बोले और मौन रहें | ॐ नम :शिवाय क जाप करे मृत्युंजय मंत्र का जाप करे गायत्री मंत्र का जाप करे पूजा करने से पहले अन्न जल न ग्रहण करे गाय कुत्ते और कौवे को भोजन दे ब्रह्मण को भोजन कराये कुष्ठ रोगियों को भोजन कराये हो सके घर मे हवन करे इससे पितृ दोष का निवारण होता है । 
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मोनी अमवस्या के दिन व्रत का है बड़ा महत्व ---- 
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेटकर परिक्रमा करने का विधान होता है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधानपूर्वक तुलसी के पेड़ को चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी खास महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।
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जानिए मौनी अमावस्या को किए जाने वाले ज्योतिषीय और तांत्रिक उपाय को---
 हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के अंत में अमावस्या तिथि आती है। इस प्रकार एक वर्ष में 12 अमावस्या आती है, लेकिन इन सभी में माघ मास में आने वाली अमावस्या बहुत ही विशेष मानी गई है। इसे मौनी व मानी अमावस्या कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस अमावस्या पर स्नान, दान, श्राद्ध व व्रत का विशेष महत्व हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है। तंत्र शास्त्र में भी मौनी अमावस्या को विशेष तिथि माना गया है। मान्यता है कि इस दिन किए गए उपाय विशेष ही शुभ फल प्रदान करते हैं। ये उपाय बहुत ही आसान हैं। जानिए मौनी अमावस्या के दिन आप कौन-कौन से उपाय कर सकते हैं- 
  1. हिंदू धर्म में अमावस्या को पितरों की तिथि माना गया है। इसलिए इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए गाय के गोबर से बने उपले (कंडे) पर शुद्ध घी व गुड़ मिलाकर धूप (सुलगते हुए कंडे पर रखना) देनी चाहिए। यदि घी व गुड़ उपलब्ध न हो तो खीर से भी धूप दे सकते हैं। यदि यह भी संभव न हो तो घर में जो भी ताजा भोजन बना हो, उससे भी धूप देने से पितर प्रसन्न हो जाते हैं। धूप देने के बाद हथेली में पानी लें व अंगूठे के माध्यम से उसे धरती पर छोड़ दें। ऐसा करने से पितरों को तृप्ति का अनुभव होता है। 
  2. मौनी अमावस्या के दिन भूखे प्राणियों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है। इस दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद आटे की गोलियां बनाएं। गोलियां बनाते समय भगवान का नाम लेते रहें। इसके बाद समीप स्थित किसी तालाब या नदी में जाकर यह आटे की गोलियां मछलियों को खिला दें। इस उपाय से आपके जीवन की अनेक परेशानियों का अंत हो सकता है। अमावस्या के दिन चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे। 
  3. मौनी अमावस्या को शाम के समय घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में रुई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें। साथ ही दीएं में थोड़ी सी केसर भी डाल दें। यह मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का उपाय है। 
  4. मौनी अमावस्या व मंगलवार के शुभ योग में किसी भी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। संभव हो तो हनुमानजी को चमेली के तेल से चोला भी चढ़ा सकते हैं। ये उपाय करने से साधक की समस्त मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। 
  5. मौनी अमावस्या की रात को करीब 10 बजे नहाकर साफ पीले रंग के कपड़े पहन लें। इसके उत्तर दिशा की ओर मुख करके ऊन या कुश के आसन पर बैठ जाएं। अब अपने सामने पटिए (बाजोट या चौकी) पर एक थाली में केसर का स्वस्तिक या ऊं बनाकर उस पर महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें। इसके बाद उसके सामने एक दिव्य शंख थाली में स्थापित करें। अब थोड़े से चावल को केसर में रंगकर दिव्य शंख में डालें। घी का दीपक जलाकर नीचे लिखे मंत्र का कमलगट्टे की माला से ग्यारह माला जाप करें- 

 मंत्र-
 सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि मुक्ति भुक्ति प्रदायिनी। मंत्र पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
 मंत्र जाप के बाद इस पूरी पूजन सामग्री को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। इस प्रयोग से आपको धन लाभ होने की संभावना बन सकती है। 
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मौनी अमावस्या पर कालसर्प दोष निवारण हेतु उपाय- 
  1. मौनी अमावस्या पर सुबह स्नान आदि करने के बाद चांदी से निर्मित नाग-नागिन की पूजा करें और सफेद पुष्प के साथ इसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। कालसर्प दोष से राहत पाने का ये अचूक उपाय है।
  2.  कालसर्प दोष निवारण के लिए मौनी अमावस्या के दिन लघु रुद्र का पाठ स्वयं करें या किसी योग्य पंडित से करवाएं। ये पाठ विधि-विधान पूर्वक होना चाहिए। 
  3. मौनी अमावस्या पर गरीबों को अपनी शक्ति के अनुसार दान करें व नवनाग स्तोत्र का पाठ करें।
  4.  मौनी अमावस्या पर सुबह नहाने के बाद समीप स्थित शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर तांबे का नाग चढ़ाएं। इसके बाद वहां बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें और शिवजी से कालसर्प दोष मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। 
  5. मौनी अमावस्या पर सफेद फूल, बताशे, कच्चा दूध, सफेद कपड़ा, चावल व सफेद मिठाई बहते हुए जल में प्रवाहित करें और कालसर्प दोष की शांति के लिए शेषनाग से प्रार्थना करें। 
  6. मौनी अमावस्या पर शाम को पीपल के वृक्ष की पूजा करें तथा पीपल के नीचे दीपक जलाएं। 
  7.  मौनी अमावस्या पर कालसर्प यंत्र की स्थापना करें, इसकी विधि इस प्रकार है- आज सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर भगवान शंकर का ध्यान करें और फिर कालसर्प दोष यंत्र का भी पूजन करें। सबसे पहले दूध से कालसर्प दोष यंत्र को स्नान करवाएं, इसके बाद गंगाजल से स्नान करवाएं। तत्पश्चात गंध, सफेद पुष्प, धूप, दीप से पूजन करें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का रुद्राक्ष की माला से जप करें। कम से कम एक माला जाप अवश्य करें।  

मंत्र- 
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्। शंखपाल धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
 एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्। सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।। 
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।
 इस प्रकार प्रतिदिन कालसर्प यंत्र की पूजा करने तथा मंत्र का जाप करने से शीघ्र ही कालसर्प दोष का प्रभाव होने लगता है और शुभ परिणाम मिलने लगते हैं।
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