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शनि हुए मार्गी, जानिए अगले 5 महीनों में मार्गी शनि का आपकी राशि पर क्या प्रभाव होगा

हिंदू मान्यताओं में ग्रहों और नक्षत्रों की चाल का बहुत महत्व है। मान्यता है कि इनके स्थान परिवर्तन का असर इंसान के जीवन पर भी पड़ता है। यह अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है। ग्रहों के न्यायधीश और व्यक्ति को कर्मों के आधार पर फल देने वाले शनि अपनी चाल बदलेंगे। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि भारतीय ज्योतिष के नौ ग्रहों में से एक प्रमुख न्यायप्रिय शनि ग्रह का वक्री होना प्रमुख घटना है। शनि एक राशि में 30 महीने, गुरू 13 महीने, राहु केतु 18 महीने और अन्य ग्रह दिनों के हिसाब से रहते हैं। शनि इस समय धनु राशि में वक्री अवस्था में गोचर है। शनि 30 अप्रैल 2019 से वक्री चल रहे है। 
    आज 18 सितंबर को शनि धनु राशि में वक्री से मार्गी हो जाएगा। शनि जो धनु राशि में उल्टा चल रहे थे 18 सितंबर से सीधा चलने लगेगा। शनि के सीधा को शुभ माना जाता है। दो ग्रह राहु- केतु को छोड़कर 18 सितंबर से सभी ग्रह मार्गी रहेंगे। शनि के मार्गी  शनिदेव का वक्री अथवा मार्गी होना पृथ्वीवासियों के प्रति बड़ी घटना के रूप में देखा जाता है। जिस राशि पर भ्रमण करने के मध्य ये वक्री रहते हैं, उन्हें काफी मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। शनि के मार्गी होने से पिछले कुछ समय से चली आ रही परेशानियां खत्म होगी। शनि के मार्गी होने से खासतौर पर मेष और सिंह राशि वालों के लिए कई सुखद समाचार मिलेगा।

Saturn-is-Margi-know-how-Margi-Saturn-will-affect-your-zodiac-in-the-next-5-months.-शनि हुए मार्गी, जानिए अगले 5 महीनों में मार्गी शनि का आपकी राशि पर क्या प्रभाव होगा
      आज दोपहर 18 सितंबर 2019 (बुधवार) से शनि भी अपनी चाल बदलकर उलटी से सीधी मार्ग यानी मार्गी चाल पर होंगे। इस तरह करीब 142 दिन बाद धनु राशि में चल रहे शानि देव अब उल्टी चाल छोड़कर सीधी चाल चलना शुरू करेंगे। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शनिदेव 30 अप्रैल 2019 को वक्री हुए थे। अपने कुल 142 दिन के इस वक्रत्वकाल में शनि ने लगभग सभी राशियों को कार्यों में अड़चन, आर्थिक संकट, रोग, पारिवारिक जीवन में समस्याएं, दाम्पत्य सुख में कमी जैसी अनेक परेशानियों से लोगों का सामना हुआ है। लेकिन अब आज 18 सितंबर से शनि के धनु राशि में मार्गी होने से सभी राशि वालों को राहत महसूस होगी। शनि के मार्गी होने से जीवन की बाधाएं समाप्त होंगी, धन आगमन के बंद रास्ते खुलेंगे और प्रत्येक क्षेत्र में तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा। राजनीति में उथल-पुथल  देखने को मिल सकती है। डिप्रेशन व अकारण ही घटनाएं बढ़ सकती हैं।
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार 18 सितम्बर 2019 (बुधवार) दोपहर 2 बजकर 15 मिनट पर शनि ने अपनी चाल बदल दी हैं और धनु राशि में सीधी चाल चलेंगे। इस राशि में शनि अगले पांच महीने यानी 24 जनवरी 2020 तक सीधी चाल से चलते हुए शनि मकर राशि में प्रवेश करेंगे।  
जानिए आने वाले अगले 5 महीनों में मार्गी शनि का आपकी राशि पर क्या प्रभाव होने वाला है
  1. मेष - इस राशि के जातक को शनि के स्थान परिर्वतन करने से भाग्य का सहयोग मिलेगा। चीजें बेहतर होंगी। कार्यक्षेत्र में सफलता मिलेगी और करियर भी अच्छा बनेगा। नए अवसर प्राप्त होंगे। कारोबार के सिलसिले में की गई यात्रा लाभप्रद रहेगी। शत्रु पक्ष निर्बल रहेंगे। मित्रों से सहयोग मिलेगा। रुके हुए कार्य आज पूरे हो सकते हैं, प्रयास कीजिए। आपकी कोई इच्छा आज पूरी होने वाली है भाग्य 90 प्रतिशत साथ दे रहा है। माता-पिता और गुरुओं का आशीर्वाद मिलेगा। ध्यान रखें--अष्टम ढैया से निकले शनि को मना लें, आप संकट में आ सकते हैं।
  2. वृषभ- शनि की बदली हुई चाल इस राशि के लिए शुभ है। जातकों को धन लाभ होगा। नये काम शुरू करने के लिए भी समय शुभ है। मन अस्थिर रहेगा और विचारों के भंवर में डूबते रहेंगे। लेखकों और कलाकारों के लिए दिन सृजनात्मक रहेगा। वैसे आज संभलकर काम करें, काम में बाधा आ सकती है। स्थान परिवर्तन का योग बना है। यात्रा में असुविधा हो सकती है। गुरु मंत्र का जप करें। भाग्य 53 प्रतिशत तक साथ देगा।स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। नौकरी से जुड़ी दिक्कतें खत्म होंगी। वाणी पर संयम रखें और विवाद से दूर रहें। कष्ट से छुटकारा मिलेगा।  ध्यान रखें-- परेशानियां तो आएंगी पर शनि मंत्र को जपने से आपको परेशानी कम होगी।
  3. मिथुन- इस राशि के जातक के लिए भी अगले 5 महीने फलदायी हैं। विवाह से जुड़ी  समस्याओं का हल मिलेगा। रूके हुए काम पूरे होंगे। जीवनसाथी का भरपूर साथ मिलेगा। जिन लोगों का अपने जीवनसाथी के साथ मनमुटाव था वो खत्म हो जाएगा। विशिष्ट लोगों से संपर्क बनेंगे जिनका भविष्य में लाभ भी मिल सकता है। कारोबार के लिहाज से यात्रा सुखद रहेगी। उन्नति का समाचार मिलेगा। आज जो भी कीजिए दिल खोलकर कीजिए, शत्रु निर्बल रहेंगे। सेहत अच्छी रहेगी। वैसे इस दौरान किसी से कर्ज लेने से बचें। ध्यान रखें --घरेलू समस्याओं से जूझना पड़ेगा। शनि को मनाने की तैयारी करें।
  4. कर्क- इस राशि के जातक को लंबी बीमारी से राहत मिलेगी। आय में बढोत्तरी होगी। कार्यक्षेत्र में व्यस्तता रहेगी। कारोबार में धन लाभ होगा। आज का कर्म आपके कल का भविष्य बनाएगा अतः सोच-समझकर काम करें और निर्णय लें।कानूनी और सरकारी मसलों में कोई जोखिम नहीं ले। विरोधियों से दूर रहें। अधिकारी वर्ग से लाभ होगा। ध्यान रखें -- इस अवधि में कष्टों से मुक्ति मिलेगी किन्तु शनि की भक्ति को भुलाकर भी छोड़े नहीं।
  5. सिंह- इस राशि के जातक को संतान का भरपूर साथ और प्यार मिलेगा। धन अर्जित करने में सफलता मिलेगी। अपने और अपने संतान के स्वास्थ्य का ध्यान जरूर रखें।इस आप सकारात्मक उर्जा से भरपूर रहेंगे। काम में रुचि रहेगी और जो भी करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। मित्रों और सज्जनों से सहयोग मिलेगा। विरोधी भी आज सहयोग मांगने पर मदद करेंगे। कुल मिलाकर स्थिति सामान्य और सुखद रहने वाली है। किसी प्रकार की जल्दबाजी से बचें। ध्यान रखें -- ढैया से होगी मुक्ति, अब मिलेगी कष्टक में मुक्ति।
  6. कन्या- माता का साथ मिलेगा। यह समय घर और गाड़ी लेने के लिए भी अच्छा रहने वाला है। जीवनसाथी से विवादों में ना उलझें। यात्रा में असुविधा हो सकती है। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। अपने सामान का ध्यान रखें, खोने का भय है। कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।धार्मिक कार्यों में रूचि रहेगी। विदेश जाने की संभावना बन सकती है। ध्यान रखें -- सावधानी रखें।अच्छे दिन गए ।इस राशि वालो के लिए परेशानियों का आगमन होने वाला है।
  7. तुला- आपके लिए शनि का मार्गी चाल शुभ रहने वाला है। भाई-बहनों से प्रेम बढ़ेगा और शुभ समाचार मिलेंगे। कला और मनोरंजन में रुचि रहेगी। धर्म-कर्म के काम में मन लगेगा। आसपास की यात्रा लाभदायक रहेगी। कार्यक्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी मित्रों से सहयोग मिलेगा। बुजुर्गों व साधु-संतों से आशीर्वाद प्राप्त होगा।आय में वृद्धि हो सकती है। पदोन्नति का भी योग बन रहा है। आपके मान-सम्मान में वृद्धि होगी। पैतृक संपत्ति विवाद खत्म होगा। ध्यान रखें -- इस राशि वालो। हो जाओ खुश। आ रहे हैं अच्छे दिन कर ले अपनी मन की सभी इच्छा पूरी।
  8. वृश्चिक- संपत्ति के मामले में आपको लाभ मिल सकता है। परिश्रम अधिक है। मान-सम्मान में वृद्धि का योग है। कार्यक्षेत्र में व्यस्तता बढ़ेगी। नए अवसर व नए लोगों से परिचय होगा। सक्रिय रहें, सुअवसर को हाथ से न जाने दें। पारिवारिक मामलों में धन खर्च कर सकते हैं। खराब रिश्तों में सुधार होगा और मान-सम्मान बढ़ेगा। रूके हुए काम पूरे होंगे। ध्यान रखें -- आपको शनि की अच्छी दृष्टि के लिए अभी आपको ढाई साल और इंतजार करना होगा।  
  9. धनु- आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। नई नौकरी तलाश रहे हैं तो इसमें सफलता के योग हैं और आप सकारात्मक बने रहेंगे। शादीशुदा लोग जीवनसाथी को लेकर परेशान हो सकते हैं। भविष्य की चिंता सताएगी। संघर्ष अधिक करना पड़ेगा। व्यर्थ की भागदौड़ रहेगी। मन दुविधा में रहेगा। बिजनेस बढ़ेगा और आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे। ध्यान रखें -- इस राशि वालों को शनि की साढ़ेसाती की वजह से किसी शुभ समाचार के मिलने में देरी हो सकती है।
  10. मकर- आपके लिए विदेश जाने की पूरी संभावना बन रही है। धार्मिक यात्राओं पर भी जा सकते हैं। पैसों से जुड़ी कुछ परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। जीवनसाथी से मनमुटाव की आशंका रहेगी। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए जल्दबाजी से बचें और वाणी पर संयम रखें। ध्यान रखें -- इस राशि के जातकों के सभी कार्यों के पूरा होने में विलम्ब होगा।
  11. कुंभ- आपके लिए अगले कुछ दिन लाभ वाले हैं। इच्छापूर्ति होगी। सोचे हुए कार्य पूर्ण होंगे। किसी बड़े अधिकारी का समर्थन प्राप्त होगा। कार्यक्षेत्र में प्रभाव और जिम्मेदारी बढ़ेगी। अचानक लाभ से प्रसन्न होंगे। कोई डील करने जा रहे हैं तो अपनी बुद्धि और चतुराई से लाभदायक सौदा कर सकते हैं।नौकरी में परिवर्तन के योग के साथ मान-सम्मान बढ़ेगा। रूके हुए धन प्राप्त होंगे। प्रेम संबंधो में मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।  शनिदेव इस राशि वालों पर मेहबान हैं। आपका कल्याण करेंगे।
  12. मीन- आपके लिए अगले कुछ दिन मिलेजुले रहने वाले हैं। परिश्रम और संघर्ष के बाद सफलता मिलेगी जिससे आनंदित होंगे। विरोधी साजिश कर सकते हैं, लेकिन आपका अहित नहीं कर पाएंगे। जीवनसाथी से आनंद और खुशी मिलेगी।काम को लेकर कुछ बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। वैसे समय के साथ आप इनसे निपटने में भी कामयाब होंगे। नौकरीपेशा लोग खुश रहेंगे। ध्यान रखें -- इस राशि के जातकों के काम के बीच कोई बाधा नहीं आएगी पर काम आधा अधूरा ही बनेगा।

जानिए कौन से ग्रह देते हैं जोड़ों का दर्द एवं साथ ही जानिए दर्द को ठीक करने के ज्योतिषीय उपाय

अक्सर हम देखते हैं की जोड़ों के दर्द से पीड़ित लोगों को दैनिक काम-काज करने में बहुत समस्या आती है। जिन रोगों में यह दर्द, लक्षण, रूप मिलता है इनमें से एक है संधिगत वात। जोड़ों के इस विकार में वायु ही मुख्य कारण होता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार आयुर्वेद में हड्डी और जोड़ों में वायु का निवास होता है। वायु के असंतुलन से जोड़ भी प्रभावित होते हैं। अतः वायु गड़बड़ा जाने से जोड़ों में दर्द होता है। क्योंकि गठिया रोग जोड़ों से संबंधित है इसलिए जोड़ों की रचना को भी समझ लेना उचित होगा। 
    गठिया में जोड़ों की रचना में विकृति पैदा होती है। हड्डियों के बीच का जोड़ एक झिल्ली से बनी थैली में रहता है, जिसे सायनोवियल कोष या आर्टीक्युलेट कोष कहते हैं। जोड़ों की छोटी रचनाएं इसी कोष में रहती हैं। हड्डियों के बीच की क्रिया ठीक तरह से हो तथा हड्डियों के बीच घर्षण न हो, इसलिए जोड़ों में हड्डियों के किनारे लचीले और नर्म होते हैं। यहां पर एक प्रकार की नर्म हड्डियां रहती हैं, जिन्हें कार्टीलेज या आर्टीक्युलेट कहते हैं, जो हड्डियों को रगड़ खाने से बचाती है। पूरे जोड़ को घेरे हुए एक पतली झिल्ली होती है जिसके कारण जोड़ की बनावट ठीक रहती है। इस झिल्ली से पारदर्शी, चिकना तरल पदार्थ उत्पन्न होता है, जिसे सायनोवियल तरल कहते हैं। संपूर्ण सायनोवियल कोष में यह तरल भरा रहता है। किसी भी बाह्य चोट से जोड़ को बचाने का काम यह तरल करता है। इस तरल के रहते जोड़ अपना काम ठीक ढंग से करता है। 
Know-which-planets-give-joint-pain-and-also-know-astrological-ways-to-cure-pain- जानिए कौन से ग्रह देते हैं जोड़ों का दर्द एवं साथ ही जानिए दर्द को ठीक करने के ज्योतिषीय उपाय        गठिया रोग का एक कारण शरीर में अधिक मात्रा में यूरिक एसिड का होना माना गया है। जब गुर्दों द्वारा यह कम मात्रा में विसर्जित होता है या मूत्र त्यागने की क्षमता कम हो जाती है तो मोनो सोडियम -बाइयूरेट -क्रिस्टल जोड़ों के उत्तकों में जमा होकर तेज उत्तेजना एवं प्रदाह उत्पन्न करने लगता है। तब प्रभावित भाग में रक्त संचार असहनीय दर्द पैदा कर देता है। गठिया रोगियों का वजन अक्सर ज्यादा होता है और ये देखने में स्वस्थ एवं प्रायः मांसाहारी और खाने-पीने के शौकीन होते हैं। 
      भारी और तैलीय भोजन, मांस, मक्खन, घी और तेज-मसाले, शारीरिक एवं मानसिक कार्य न करना, क्रोध, चिंता, शराब का सेवन, पुरानी कब्ज आदि कारणों से जोड़ों में मोनो-सोडियम बाइयूरेट जमा होने से असहनीय पीड़ा होती है जिससे मानव गठिया रोग से पीड़ित हो जाता है।
जन्म कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही घुटनो के दर्द, कमर दर्द, गर्दन के दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या, कोहनी और कंधो के जॉइंट्स में दर्द के जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
     वैसे तो हमारे स्वास्थ से जुडी कोई भी समस्या जीवन की गति को धीमा कर ही देती है पर जोड़ो के दर्द या जॉइंट्स पेन की समस्या हमारे जीवन में एक बोझ की तरह होती है जिससे जीवन ठहर सा जाता है घुटनो के दर्द की समस्या बहुत से लोगो के जीवन में एक बड़ी बाधा बनी रहती है तो बहुत से लोग कमर दर्द के कारण कितनी ही समस्याओं का सामना करते हैं तो आइये जानते हैं ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से की कौन कौन से ग्रहयोग व्यक्ति को जोड़ो के दर्द की समस्या देते हैं –
      “ज्योतिष की चिकित्सीय शाखा हमारे स्वास्थ और शारीरिक गतिविधियों को समझने तथा उनके निदान में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ज्योतिष में “शनि” को हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स का कारक माना गया है हमारे शरीर में हड्डियों का नियंत्रक ग्रह तो सूर्य है पर हड्डियों के जोड़ों की स्थिति को “शनि” नियंत्रित करता है अतः हमारे शरीर में हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स की मजबूत या कमजोर स्थिति हमारी कुंडली में स्थित ‘शनि” के बल पर निर्भर करती है कुंडली में शनि पीड़ित स्थिति में होने पर व्यक्ति अक्सर जॉइंट्स पेन या जोड़ो के दर्द से परेशान रहता है और कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही घुटनो के दर्द, कमर दर्द, गर्दन के दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या, कोहनी और कंधो के जॉइंट्स में दर्द के जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त कुंडली का “दसवा भाव” घुटनो का प्रतिनिधित्व करता है छटा भाव कमर का प्रतिनिधित्व करता है, तीसरा भाव कन्धों का प्रतिनिधित्व करता है और सूर्य को हड्डियों और केल्सियम का कारक माना गया है अतः इन सबकी भी यहाँ सहायक भूमिका है। 
        ज्योतिषीय दृष्टिकोण काल पुरूष की कुंडली में दशम भाव और मकर राशि महत्वपूर्ण जोड़ों का नेतृत्व करती है जैसे ‘घुटने’। इसलिए दशम भाव एवं मकर राशि के दूषित प्रभावों में रहने से रोग उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त शनि, शुक्र और मंगल ग्रह एवं लग्न यदि किसी कुंडली में निर्बल और दुष्प्रभावों में हो तो जातक को गठिया जैसा रोग देता है।  पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया यदि किसी की कुंडली में शनि, शुक्र, मंगल, दशम भाव, दशमेश, लग्न, लग्नेश यदि दुष्प्रभावों में रहते हैं तो संबंधित ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और गोचर के अशुभ रहने से गठिया रोग होता है।
      ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं की जोड़ो के दर्द की समस्या में मुख्य भूमिका “शनि” की ही होती है क्योंकि शनि को हड्डियों के जोड़ो का नैसर्गिक कारक माना गया है और शनि हमारे शरीर में उपस्थित हड्डियों के सभी जॉइंट्स का प्रतिनिधित्व करता है। अतः कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही व्यक्ति को दीर्घकालीन या निरन्तर जोड़ी के दर्द की समस्या बनी रहती है।"
  1. यदि शनि कुंडली में छटे या आठवे भाव में हो तो ऐसे में व्यक्ति को घुटनो, कमर आदि के जोड़ो के दर्द की समस्याएं होती हैं।
  2. शनि यदि नीच राशि (मेष) में हो तो भी व्यक्ति जोड़ो के दर्द से समस्याग्रस्त रहता है।
  3. शनि का केतु और मंगल के योग से पीड़ित होना भी जॉइंट्स पेन की समस्या देता है।
  4. शनि यदि सूर्य से पूर्णअस्त हो तो भी जोड़ो के दर्द की समस्या रहती है।
  5. शनि का अष्टमेश या षष्टेश के साथ होना भी जॉइंट्स पेन की समस्या देता है।
  6. यदि कुंडली के दशम भाव में कोई पाप योग बन रहा हो या दशम भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो तो भी घुटनो के दर्द की समस्या रहती है।
  7. छटे भाव में पाप योग बनना कमर दर्द की समस्या देता है।
  8. यदि कुंडली में शनि पीड़ित स्थिति में हो तो शनि की दशा में भी जॉइंट्स पेन की समस्या बनी रहती है।

समझें विभिन्न जन्म लग्नों के अनुसार जोड़ो के दर्द या गठिया रोग को--
  • मेष लग्न: जब लग्नेश मंगल शनि से युक्त दशम भाव में हो और शुक्र पंचम या षष्ठ में सूर्य से अस्त हो तो जातक को गठिया जैसा रोग हो सकता है।
  • वृषभ लग्न: शुक्र षष्ठ भाव में चंद्र से युक्त हो और शनि से दृष्ट हो, मंगल राहु से युक्त होकर दशम भाव में हो तो जातक को गठिया जैसा रोग हो सकता है। 
  • मिथुन लग्न: लग्नेश बुध षष्ठ या अष्टम भाव में हो और अस्त हो, मंगल दशम भाव में गुरु से युक्त या दृष्ट हो, शनि द्वादश भाव में चंद्र से युक्त होकर स्थित या दृष्टि रखता हो तो जातक को गठिया जैसा रोग देता है। 
  • कर्क लग्न: चंद्र शनि से युक्त होकर षष्ठ भाव में हो, मंगल लग्न में राहु या केतु से युक्त या दृष्ट हो, बुध दशम भाव में शुक्र से युक्त हो तो जातक को गठिया जैसा रोग देता है।
  • सिंह लग्न: शनि दशम भाव में चंद्र से युक्त हो, लग्नेश सूर्य, राहु से युक्त होकर तृतीय या षष्ठ भाव में हो, शुक्र अस्त हो तो जातक जोड़ों के दर्द से परेशान रहता है। 
  • कन्या लग्न: शनि लग्न में राहु या केतु से युक्त हो, लग्नेश बुध षष्ठ या अष्टम भाव में अस्त हो, मंगल दशम भाव में चंद्र से युक्त या दृष्ट हो तो जातक जोड़ों के दर्द से परेशान रहता है। 
  • तुला लग्न: लग्नेश शुक्र अस्त होकर चंद्र से दृष्ट या युक्त होकर जल राशि में हो, शनि षष्ठ भाव में गुरु से युक्त या दृष्ट हो, मंगल अस्त हो तो जातक जोड़ों के दर्द से परेशान रहता है। 
  • वृश्चिक लग्न: बुध लग्नस्थ होकर राहु-केतु से दृष्ट या युक्त हो, शनि षष्ठ भाव में चंद्र से युक्त या दृष्ट हो, मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक को संबंधित रोग देता है। 
  • धनु लग्न: लग्नेश गुरु अष्टम या द्वादश भाव में चंद्र से युक्त हो, शनि वक्री होकर दशम भाव में या दशम भाव पर दृष्टि, मंगल, शुक्र अस्त हो तो जातक को गठिया रोग देते हैं। 
  • मकर लग्न: गुरु राहु से युक्त होकर दशम भाव में हो, लग्नेश शनि वक्री हो, सूर्य लग्न में हो, शुक्र अस्त हो, मंगल दशम भाव में हो तो जातक को गठिया जैसा रोग होता है। 
  • कुंभ लग्न: मंगल दशम भाव में राहु-केतु से युक्त या दृष्ट हो, सूर्य लग्न में या अष्टम भाव में गुरु से युक्त हो, शनि वक्री हो तो जातक को जोड़ों का दर्द देता है। 
  • मीन लग्न: गुरु तृतीय, षष्ठ या अष्टम भाव में मंगल से युक्त या दृष्ट हो, शुक्र-शनि दशम भाव में राहु-केतु से युक्त या दृष्ट हो, चंद्र अस्त हो तो जातक को गठिया जैसा रोग देते हैं। उपरोक्त सभी योगों का प्रभाव अपनी संबंधित ग्रहों की दशा-अंतर्दशा एवं गोचर के दुष्प्रभावों के कारण होता है। इसके उपरांत जातक रोग रहित हो जाता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में ग्रह स्थिति भिन्न होने के कारण व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपाय भी भिन्न होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार वात दोष होने से गठिया रोग उत्पन्न होता है जिसमें यूरिक एसिड की मात्रा कम हो जाती है। शनि ग्रह वात प्रकृति का है और रोग को धीरे-धीरे बढ़ाता है। शुक्र ग्रह वात-कफ प्रकृति का है। यह शरीर में हार्मोन को संतुलित रखता है। इसलिए इसके दूषित हो आयुर्वेदिक उपचार सरसों के तेल में अजवायन और लहसुन जलाकर तेल मालिश करने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। काले तिलों को पीस कर बराबर मात्रा में गुड़ मिलाकर बकरी के दूध से सेवन करने से आराम मिलता है। मजीठ, हरड़, बहेड़ा, आंवला, कुटकी, बच, नीम की छाल, दारू हल्दी, गिलोय का काढ़ा बना कर पीने से गठिया में आराम मिलता है। 
       बड़ी इलायची, तेजपत्ता, दाल चीनी, शतावर, गंगरेन, पुनर्नका, असगंध, पीपर, रास्ना, सोंठ, गोखरू, विधारा, तज निशीथ, इन सबको गिलोय रस में घोट कर गोली बनाकर बकरी के दूध के साथ दो-दो गोली सुबह शाम सेवन करने से आराम मिलता है। असगंध के पत्ते में चुपड़कर गर्म कर के दर्द के स्थान पर बांधने से आराम होता है। दशमूल काढ़ा या दशमूलारिष्ट की चार-चार चम्मच दिन में दो-तीन बार थोड़ा सा पानी मिलाकर लेने से गठिया दर्द में आराम मिलता है। अश्वगंधा चूर्ण एक ग्राम, शृंग भस्म 500 मि. ग्राम और वृद्ध वात चिंतामणि रस 65 मि. ग्राम, तीनों को मिलाकर तीन बार दूध या शहद के साथ सेवन करें। लहसुन को दूध में उबालकर, खीर बना कर खाने से गठिया रोग ठीक होता है। सौंठ, अखरोट और काले तिल, अनुपात 1ः2ः4 में पीसकर, सुबह-शाम गरम पानी से 15 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से लाभ मिलता है। जाने से हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं जिससे शरीर विकृत होने लगता है। मंगल ग्रह पित्त प्रकृति का है जो रक्त के लाल कणों का कारक है इसलिए ग्रह के दूषित होने से रक्त में विकार उत्पन्न होता है और जोड़ों को शुष्क कर देता है। जोड़ों में तरल पदार्थ की मात्रा को इतना कम कर देता है कि उठते-बैठते जोड़ों से आवाज आने लगती है और जोड़ विकृत हो जाते हैं।
इन उपाय से होगा जोड़ों के दर्द में लाभ–
  • ॐ शम शनैश्चराय नमः का नियमित जाप करें।
  • शनिवार को मन्दिर में पीपल पर सरसो के तेल का दिया जलाएं।
  • शनिवार को संध्याकाल में सरसो के तेल का परांठा कुत्ते को खिलाएं।
  • किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श के बाद शनि का कोई रत्न भी धारण कर सकते हैं पर किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बिना शनि का कोई भी रत्न ना पहने।
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

जाने किन ज्योतिष योग वाला जातक बनता हैं डॉक्टर (चिकित्सक)

दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही ‘कौन-सा विषय चुनें’ यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है। हम सब अपनी पसंद के कार्यक्षेत्र में जाना चाहते हैं, परन्तु बहुत बार हमारी यह इच्छा अधूरी रह जाती है। ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिसके माध्यम से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन सा क्षेत्र हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है।
    प्रत्येक युवक / युवती की यह अभिलाषा होती है कि वह जो भी कार्य करे वह उसकी रुचि के अनुसार हो, क्योंकि रुचि के अनुसार कार्य करने में सफलता शतप्रतिशत मिलती है परन्तु कभी ऐसा भी होता है कि अपनी रुचि वाला क्षेत्र चुन कर भी असफ़लता हाथ लगती है। ऐसा विशेष कर होता है, अतः यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि कौन सा कार्य हमारे अनुकूल होगा जिससे सफलता मिले। हर व्यक्ति में अलग-अलग क्षमता होती है लेकिन स्वयं यह तय करना कठिन होता है कि हममें क्या क्षमता है इसलिये कभी कभी गलत निर्णय लेने से असफलता हाथ लगती है, परन्तु ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिसके द्वारा उचित व्यवसाय/क्षेत्र चुनने में मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
    आजकल हाईस्कूल करने के बाद एक दुविधा यह रहती है कि कौन से विषय चुने जाए जिससे डॉक्टर या इन्जीनियर का व्यवसाय चुनने मे सहायता मिल सके इसके लिये कुन्डली के ज्योतिषीय योग हमारी सहायता कर सकते हैं तो आइये इस पर चर्चा करें कि ज्योतिेष के द्वारा कैसे जाना जाय कि किस क्षेत्र मे सफलता मिलेगी। पण्डित दयानन्द शास्त्री के मतानुसार जातक की जन्म पत्रिका में लग्न, लग्नेश, दशम भाव, दशमेश इन पर विभिन्न ग्रहों का प्रभाव, जातक को उचित व्यव्साय जैसे कि डॉक्टर या इन्जीनियर के क्षेत्र का चयन करने मे सहयता करता है। ग्रहों का विभिन्न राशियों में स्थित होना भी व्यव्साय का चयन करने में मदद करता है। यदि चर राशियों में अधिक ग्रह हों तो जातक को चतुराई, युक्ति निपुणता से सम्बधित व्यवसाय में सफलता मिलती है। वह ऐसा व्यव्साय करता है जिसमें निरंतर घूमना पड़ता हो। और यदि स्थिर राशि में ज्यादा ग्रह होते हैं तो एक स्थान वाला कार्य करता है जिसमे डॉक्टरी मुख्य है तथा द्विस्वभाव राशि में अधिक ग्रह हों तो जातक अध्यापन आदि कार्य करता है जिसमे एक स्थान पर भी तथा काम के सिलसिले मे आना जाना भी आवश्यक होता है।
      ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ज्योतिष विज्ञान के आधार पर व्यक्ति की कुण्डली का विवेचन करके करियर के क्षेत्र का निर्धारण किया जा सकता है।आज के युग में सबसे महत्वपूर्ण पेशा डाक्टर का है। डाक्टर को लोग आज भी भगवान के तुल्य ही मानते है। डाक्टरी का पेशा चुनने से पहले इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। व्यक्ति में डाक्टरी की शिक्षा लेने की कितनी सम्भावना है ? क्या व्यक्ति चिकित्सा के क्षेत्र सफलता प्राप्त करेगा ? चिकित्सा के क्षेत्र में व्यक्ति फिजीशियन बनेगा, सजर्न बनेगा, या किसी रोग का विशेषज्ञ बनेगा ?
      सर्जनों की कुण्डली में सूर्य व मंगल दोनों का मजबूत होना जरूरी होता है। क्योंकि सूर्य, आत्म-विश्वास, ऊर्जा का कारक है और मंगल, टेकनिक, साहस व चीड़-फाड़ से सम्बन्धित होता है। जब तक व्यक्ति आत्म-विश्वास, साहस, टेकनिक व ऊर्जा से लबरेज नहीं होगा तब-तक वह एक सफल सर्जन चिकित्सक नहीं बन पायेगा। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं की किसी भी जातक की कुण्डली में शिक्षा के भाव जन्मपत्री में दूसरा व पंचम भाव शिक्षा से सम्बन्धित होता है। दूसरे भाव से प्राथमिक शिक्षा के बारे में जाना जाता है और पंचम भाव से उच्च शिक्षा का आकलन किया जाता है। किसी भी तकनीकी शिक्षा का करियर के रूप में परिवर्तन होना तभी संभव है, जब पंचम भाव व पंचमेश का सीधा सम्बन्ध दशम भाव या दशमेश से बन जाये। अतः इनका आपस में रिलेशन होना आवश्यक होता है। इससे यह पता किया जा सकता व्यक्ति जिस क्षेत्र में शिक्षा में शिक्षा प्राप्त करेगा, उसे उसी क्षेत्र में जीविका प्राप्त होगी या नहीं ?
Know-which-astrological-yoga-person-becomes-a-doctor-जाने किन ज्योतिष योग वाला जातक बनता हैं डॉक्टर (चिकित्सक)   ज्योतिष में चन्द्रमा को जड़-बूटी का एंव मन का कारक माना जाता है। यदि चन्द्रमा मजबूत नहीं होगा तो डाक्टर के द्वारा दी गई दवायें लाभ नहीं करेगी। चन्द्र पीडि़त हो या पाप ग्रहों द्वारा दृष्ट हो तो डाक्टर में मरीज को तड़पते हुये देखते रहने की सहनशक्ति विद्यमान होती है। डाक्टर की कुण्डली में चन्द्रमा का सम्बन्ध त्रिक भावों में होना सामान्य योग है।सूर्य व चन्द्रमा जड़ी-बूटियों का कारक होता है और गुरू एक अच्छा सलाहकार व मार्गदर्शक होता है। इन तीनों का सम्बन्ध छठें भाव, दशम भाव व दशमेश से होने से व्यक्ति आयुर्वेदिक चिकित्सक बनता है। चिकित्सक बनने में मंगल ग्रह का विशेष रोल होता है। मंगल साहस, चीड़-फार, आपरेशन आदि चीजों का कारक होता है। मंगल अचानक होने वाली घबराहट से बचाता है और त्वरित निर्णय लेने की शक्ति देता है। चिकित्सा क्षेत्र में गुरू की भूमिका भी अहम होती है। गुरू की कृपा से ही कोई व्यक्ति किसी का इलाज करके उसे स्वस्थ्य कर सकता है। किसी भी व्यक्ति के एक सफल चिकित्सक बनने के लिए गुरू का लग्न, पंचम व दशम भाव से सम्बन्ध होना आवश्यक होता है।
     किसी भी जन्म कुंडली में पंचम भाव का दशम भाव से जितना अच्छा सम्बन्ध होगा, अजीविका के क्षेत्र में यह उतना ही अच्छा माना जायेगा। इन दोनों भावों में स्थान परिवर्तन, राशि परिवर्तन, दृष्टि सम्बन्ध या युति सम्बन्ध होना चाहिए। यदि पंचम व दशम भाव के सम्बन्ध से बनने वाला योग छठें या बारहवें भाव में बन रहा है तो चिकित्सा के क्षेत्र में जाने की प्रबल सम्भावना रहती है।
कुछ मुख्य योग निम्न हैं --
  1. यदि मेष, वृश्चिक, वृष, तुला, मकर या कुम्भ राशि कीं लग्न हो और उनमें मंगल-शनि या चंद्र-शनि या बुध-शनि की युति हो या फिर सूर्य-चंद्र के साथ अलग-अलग तीन ग्रहों की युति हो, तो जातक चिकत्सा विज्ञान की पढाई कर चिकित्सक बनने की प्रबल संभावना रहती है।
  2. चाहे कोई भी लग्न या राशि हो और केन्द्र में सूर्य-शनि या सूर्य-मंगल-शनि या चंद्र-शनि या चन्द्र-मंगल-शनि या बुध-शनि या बुध-मंगल-शनि या सूर्य-बुध-शनि या चंद्र-बुध-शनि की युति में से किसी की भी युति हो व इनमें कोई दो केन्द्रधिपत्य हो और युति कारक ग्रहों में से कोई अस्त न हो, तो जातक के डाँक्टर बनने की प्रबल संभावना होती है ।
  3. सामान्यत: यदि लग्न में मंगल स्वराशि या उच्चराशि का होकर बैठा हो तो भी जातक को सर्जरी में निपुण बनाता है । मंगल चुंकि साहस व रक्त का कारक है ओर सर्जन के लिए रक्त और साहस दोनों से संबंध होता है ।
  4. यदि कुंडली में ” कर्क राशि एवं मंगल बलवान हो तथा लग्न व दशम से मंगल तथा राहू का किसी भी रुप में संबंध हो, तो भी जातक को डॉक्टर बनाता है।
  5. केतु हमेशा डाक्टर की कुंडली में बली होता है । साथ ही सूर्य, मंगल एवं गुरू भी ताकतवर होने चाहिए। चुंकि सूर्य आत्मा का कारक है एवं गुरू बहुत बड़ा मरीज को ठीक करने वाला होता है ।
  6. वृश्चिक राशि दवाओं का प्रतिनिधित्व करती है, अत: इसका स्वामी मंगल भी ताकतवर होना चाहिए ।
  7. भाव 6 एवं उसका स्वामी का यदि भाव 10 से संबंध हो रहा हो, तो भी डॉक्टर बनाने में सहायक होता है |
  8. यदि मंगल या केतू बली होकर दशवें भाव या दशमेश से संबंध बना रहा हो तो जातक सर्जरी वाला डॉक्टर हो सकता है |
  9. मीन या मिथुन राशि गुप्त रोगियों से संबंधित दवाओं के डॉक्टर बनाने में के सहायक होता है ।
  10. यदि पंचमेश भाव 8 मेँ हो, तो भी डॉक्टर बनने की संभावना होती है ।
  11. यदि भाव 10 में चतुथेंश हो और दशमेश भाव 4 में हो, तो जातक दवाऐ जानने वाला दवाओं के माध्यम से जीवन यापन कर डॉक्टरी पेशा अपनाता है ।
  12. जिन जातकों की कुंडली में चंद्र व गुरु का बली संबध होता है, वे भी सफल चिकत्सक होते है ।
  13. यदि कुंडली का आत्म्कारक ग्रह अपने मूल त्रिकोंण का लग्न में पंचमेश से युति कर रहा हो, तो जातक प्रसिद्ध नाम वाला चिकत्सक होता है ।
  14. यदि अकारात्मक ग्रह या भाग्येश या दोनो वर्गोत्त्मी होकर कारकांश कुंडली में लग्न से केन्द्र में हो, तो रसायन से संबंधित दवाओं का व्यवसाय करने की संभावना रहती है ।
  15. यदि सूर्य और मंगल की पंचम भाव से युति हो और शनि अथवा राहू भाव 6 में हो, तो जातक सर्जन हो सकता है।
  16. यदि वृश्चिक राशि में बुध तथा तृतीय भाव पर चंद्र की दृष्टि हो तो जातक मनोचिकित्सक हो सकता है ।
  17. यदि कुंभ लग्न में स्वगृही मंगल दशम भाव से हो तथा चंद्र व सूर्य भी अच्छी स्थिति में हो, तो ऐसा जातक भी सर्जन हो सकता है ।
  18. यदि समराशि का बुध हो और लग्न विषम राशि की हो तथा धनेश मार्गी हो तथा अच्छे स्थान में हो, मंगल व चंद्र भी अच्छी स्थिति में हों, तो जातक को विख्यात चिकत्साशास्त्री बना सकता है ।
  19. यदि कर्क लग्न की कुंडली के छठे भाव में गुरु व केतू बैठे हों, तो जातक होम्योपैथिक चिकित्सक बन सकता है ।
  20. सिह लग्न कुंडली के दशम भाव में लग्नेश सूर्य हो और दशमेश शुक्र नवमस्थ हो तथा योगकारक पाल शुभ स्थान में बली हो, तो डॉक्टर बनता है ।
  21. कुंडली में यदि मंगल लाभ भाव में हो तथा तृतीयेश भाव 5 में बैठे एवं शुक्र चंद्र व सूर्य भी अच्छी स्थिति में हों, तो जातक का स्त्री एवं बाल रोग विशेषज्ञ बनने की सभावना होती है
  22. कुंडली के पंचम भाव में यदि सूर्य-राहू या राहू-बुध युति हों तथा ‘दशमेश की इन पर दृष्टि हो, साथ ही मंगल, चंद्र ,गुरु भी अच्छी स्थिति में हो, तो जातक चिकित्सा क्षेत्र में ज्योतिष प्रयोग द्वारा सफल चिकित्सक बन सकता है|
  23. यदि कुंडली में लाभेश और रोगेश की युति ताभ भाव में हो तथा मंगल,चंद,सूर्य भी शुभ होकर अच्छी स्थिति में हो, तो जातक का चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ने की संभावना होती है ।

धारा 370 हटाने के ज्योतिषीय कारण ओर प्रभाव

भारत की उपलब्ध (प्रचलित) जन्मपत्रिका में इस समय चंद्रमा में बृहस्पति की दशा चल रही है. भारत भूमि के बारे में ज्योतिषीय आंकलन करने के लिए ज्योतिषियों के पास जो आधार है वह है स्वतंत्र भारत की जन्मपत्रिका। 
उज्जैन (मध्यप्रदेश) निवासी आदरणीय पंडित सूर्य नारायण व्यास वह मूर्धन्य विद्वान ज्योतिषी थे जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता का मुहूर्त 14 अगस्त की रात्रिकालीन अभिजीत (12 बजे ) या ये कहें की 15 अगस्त की सुबह 00 बजे का निकला था। स्वतंत्र भारत का जन्म 15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि दिल्ली में हुआ था और कुंडली इस प्रकार है: भारत के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर वृष लग्न उदित हो रहा था। राहू – लग्न, मंगल – मिथुन, सूर्य, चंद्र, बुध, शुक्र, शनि – कर्क, बृहस्पति – तुला और केतु – वृश्चिक राशि में विराजमान थे।
    इसके विपरीत पाकिस्तान एक दिन पहले बिना मुहूर्त के आजाद हुआ. जिसका परिणाम है की आज 71-72 सालों के उपरांत भारत की स्थिति पाकिस्तान से कहीं ज्यादा सुदृढ है. भारत के लिये यह समय (वर्ष 2019) मिले जुले परिणाम लेकर आने वाला रह सकता है। लेकिन अगस्त 2019 के बाद हालातों में सुधार दिखाई देने लगेगा। बृहस्पति मार्गी हो जायेगें, शनि भी मार्गी हो जायेंगें। तो इसके काफी सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगेंगें। कुल मिलाकर एक बेहतर वर्षांत की उम्मीद भारत 2019 से कर सकता है। हालांकि यह पूरा साल भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये स्वयं को साबित करने वाला साल रहने वाला है। इसलिये देश के प्रत्येक व्यक्ति का योगदान इसमें शामिल है। 
Astrological causes and effects of removal of section 370 35a kashmir-धारा 370 हटाने के ज्योतिषीय कारण ओर प्रभाव      ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि वर्ष 2019 का आरंभ कन्या लग्न में हुआ था जो कि भारत की राशि से देखा जाये तो तीसरा स्थान है। वर्ष लग्न स्वामी बुध हैं जो भारत की कुंडली के अनुसार पंचम घर के कारक हैं। कुल मिलाकर साल 2019 शिक्षा और नई तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी रह सकता है या अपना विशेष मुकाम हासिल कर सकता है। वर्ष लग्न के अनुसार लग्न स्वामी बुध पराक्रम भाव में विचरण करने से भारत अपने पराक्रम एवं मेहनत के बल पर विश्व में भी अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हो सकता है। 
    पराक्रम में बुध के साथ सूर्य के होने से जहां बुधादित्य युति बन रही है वहीं शनि भी इसी घर में विराजमान हैं। जो कि 2019 में भारत के लिये काफी चुनौतिपूर्ण समय के संकेत कर रहे हैं। भारत की राशि के स्वामी चंद्रमा वर्ष कुंडली में सप्तम भाव में शुक्र के साथ गोचर कर रहे हैं। यह संकेत कर रहे हैं कि भारत 2019 में सांस्कृतिक तौर पर दुनिया में अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ सकता है। कला के मामले में दुनिया भर में भारत अपना नाम कमा सकता है। विश्व के अलग-अलग देशों में भारत की पहचान बढ़ेगी। किसी विशेष क्षेत्र में भारत विश्व का नेतृत्व भी कर सकता है।
     इस वर्ष को आर्थिक रूप से चुनौतिपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है या कह सकते हैं कुछ क्षेत्रों में धंधें में मंदे के संकेत मिल रहे हैं। आर्थिक तौर पर स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं कही जा सकती। वित्तिय घाटा बढ़ने के आसार हैं। इसका कारण है राहू इस समय राशि परिवर्तन करेंगें। निर्यात के मामले में भी भारत को प्रतिद्वंदी देशों से चुनौतियों का सामना इस समय करना पड़ सकता है। बृहस्पति धर्म इत्यादि विषयों से सम्बंधित ग्रह हैं  तथा गोचर में शनि का बृहस्पति की राशि में होना धार्मिक न्याय की बात करता है. बृहस्पति देवताओं के गुरु थे और सही गलत का ज्ञान वही देवताओं को कराते थे और शनिदेव को कर्मों का दंडनायक माना गया है. अत: कश्मीरी हिन्दू, तीन तलाक और राम मंदिर मुद्दा इत्यादि जो धर्म आधारित है, पिछले कुछ समय से इन पर कार्य हो रहा है l
अब हम आते हैं 5 अगस्त, 2019 के एतिहासिक फैसले पर जब धारा 370 और 35 ए को हटाया गया. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने कहा कि धारा 370 हटाने वाले दिन पांच अगस्त 2019 की प्रश्न कुंडली तुला लग्न की बनती है। जहां सूर्य, शुक्र, बुध, मंगल कर्मभाव में स्थित हैं। सूर्य कर्म भाव में दिग्बली हो जाता है और लग्नेश के साथ युति करके स्थित है। वहीं, बुध भाग्य भाव व द्वादशेष के मालिक होकर कर्म भाव में स्थित है। यह दोनों ही स्थितियां ज्योतिषीय गणना अनुसार श्रेष्ठ कारक है, लेकिन मंगल कर्म भाव में नीचस्त होने से कुछ विरोध व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास करेगा और तनावपूर्ण स्थिति हो सकती है। जबकि शनि पराक्रम भाव व गुरु के द्वितीय भाव में स्थित होने से भारत की स्थिति बहुत मजबूत बनी हुई है। ऐसे में पड़ोसी देश यदि भारत पर हमला करने का प्रयास गलती से भी करता है तो उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी। 
    भारत की कुंडली में सिंह राशि अर्थात चतुर्थ भाव भारत के उत्तर दिशा को दर्शाता हैl भारत के उत्तर अर्थात जम्मू कश्मीर के फैसले के समय गोचर का चंद्रमा भारत की कुंडली के पांचवें भाव जो की जम्मू कश्मीर की संपदा को दर्शाता है को लाभ पहुंचने वाला निर्णय बना रहा है. चतुर्थ भाव का स्वामी सूर्य का गोचर का तीसरे घर में अर्थात जम्मू-कश्मीर से बारहवें भाव में होना, इस प्रदेश से किसी भी चीज़ के अंत को दर्शाता है जैसे की धारा 370 आदि. हम सभी जानते हैं कि 10 सितम्बर 2015 से स्वतंत्र भारत की कुंडली में चंद्रमा की महादशा शुरू हुई हैl चंद्रमा भारत की कुंडली में पराक्रम और पड़ोसी देशों से सम्बंधित भाव का स्वामी हैl अत: इस दशा में भारत के पराक्रम का लोहा पूरा विश्व मानेगा क्योंकी चंद्रमा अपनी खुद की राशि में भी है l 
   राहू जब तृतीय भाव, कर्क राशि से मिथुन राशि की तरफ अर्थात पराक्रम भाव से निकल रहा है तो पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक करता हुआ गयाl
सावधान ओर सतर्क रहने की आवश्यकता--
फिलहाल गोचर में शनि व केतु की युति भारत की कुंडली से आठवें चल रही है l आठवां घर गुप्त कार्यों का होता है l निर्णयों का गुप्त रखा जाना ही सफलता तक पहुंचायेगाl यही युति कोई हमला, दुर्घटना भी दर्शाती है, अत: भारत देश को बहुत सतर्क रहने की जरुरत है. भारत की कुंडली के ग्रह योग बहुत मजबूत स्थिति लिए हुए हैं। ऐसे में कश्मीर पर लिया गया धारा 370 हटाने का फैसला हमारे पक्ष में ही जाएगा। हालांकि, कुछ समय तक हमारी सेना को चौकन्ना रहना होगा। फिर ग्रहों की चाल बदलने के बाद स्थिति शांतिपूर्ण रहेगी।

क्रोध, मंगल और ज्योतिष

क्रोध का मुख्य कारण अहंकार है। अगर हम क्रोध पर नियंत्रण चाहते हैं तो अहंकार को हमें सबसे पहले कुचलना होगा।   कुछ लोगों को गुस्से के बारे में भी ढेरों भ्रांतियां होती हैं। जैसे मैं गुस्सा करना छोड़ दूंगा तो मेरा रौब कम हो जाएगा या दूसरों की गलती का एहसास कराने के लिए, सबक सिखाने के लिए गुस्सा दिखाना जरूरी है। या सामने वाला व्यक्ति हर कदम पर हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहा हो तो क्रोधित होकर प्रतिकार करना आवश्यक है। 
      यह क्रोध ही दुख का कारण है तथा अनन्त बार जन्म-मरण करवाता है। क्रोध कैसे आता है? अहम् पर चोट पडऩे से क्रोध आता है। अन्दर में यह जो अहंकार बैठा है, वही क्रोध का कारण है। अगर कुछ करना ही है तो इस अहंकार को कम करने की कोशिश करें, जीवन सुखमय हो सकता है।
     पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाये तो क्रोध के मुख्य कारण मंगल, सूर्य, शनि, राहु तथा चंद्रमा होते हैं। सूर्य सहनशक्ति है तो मंगल अक्रामक और चंद्रमा शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों का प्रतीक। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया यदि जन्मकुंडली में सूर्य और चंद्रमा, मंगल ग्रह एक-दूसरे के साथ किसी रूप में सम्बद्ध है तो व्यक्ति के अन्दर क्रोध अधिक रहता है। इसके अलावा मंगल शनि की युति क्रोध को जिद के रूप बदल देती है। राहु के लग्न, तीसरे अथवा द्वादश स्थान में होने पर काल्पनिक अहंकार के कारण अपने आप को बडा मानकर अंहकारी बनाता है जिससे क्रोध उत्पन्न हो सकता है।
क्रोध, मंगल और ज्योतिष      ज्योतिष में मंगल को क्रोध, वाद विवाद, लड़ाई झगड़ा, हथियार, दुर्घटना, एक्सीडेंट, अग्नि, विद्युत आदि का कारक ग्रह माना गया है तथा राहु को आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, शत्रु, षड़यंत्र, नकारात्मक ऊर्जा, तामसिकता, बुरे विचार, छल, और बुरी आदतों का कारक ग्रह माना गया है, इसलिए फलित ज्योतिष में मंगल और राहु के योग को बहुत नकारात्मक और उठापटक कराने वाला योग माना गया है ।
         गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक हैं क्योंकि क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि का नाश होता हैं जब बुद्धि का नाश हो जाता है तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है । ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि मंगल और राहु स्वतंत्र रूप से अलग अलग इतने नाकारात्मक नहीं होते पर जब मंगल और राहु का योग होता है तो इससे मंगल और राहु की नकारात्मक प्रचंडता बहुत बढ़ जाती है जिस कारण यह योग विध्वंसकारी प्रभाव दिखाता है, मंगल राहु का योग प्राकृतिक और सामाजिक उठापटक की स्थिति तो बनाता ही है पर व्यक्तिगत रूप से भी मंगल राहु का योग नकारात्मक परिणाम देने वाला ही होता है।
       ज्योतिष में लग्न भाव यानि प्रथम भाव को स्वभाव और शारीरिक बनावट का कारक माना जाता है। दूसरा भाव धन और वाणी का और पंचम भाव बुद्धि का होने से मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करता है। इन तीनों भावों से व्यक्ति के सवभाव को देखा जाता है। चन्द्रमा, बुध और मंगल के कारण मन, वाणी, और क्रोध पर नियंत्रण नहीं रहता। अगर कुण्डली में मंगल, चन्द्रमा और बुध ग्रह नीच राशि ने हों या इन पर राहु और सूर्य की क्रूर दृस्टि हो तो अनियंत्रित क्रोध जातक में होता है।
       मंगल कुण्डली के प्रथम, तीसरे ,चतृर्थ, पंचम या अस्टम भाव में हो तो व्यक्ति में क्रोध की अधिकता होती है। 
मंगल इन भावो में नीच राशि में हो तो  व्यक्ति को ज्यादा क्रोधित सवभाव का बनाता है।  सूर्य-मंगल, गुरु-मंगल,मंगल-बुध,मंगल-शनि, बुध-शनि, गुरु राहु , राहु-चन्द्रमा, शनि चन्द्रमा का कुण्डली में इकठे होना भी क जातक में क्रोध को बढ़ाता है।
        पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार यदि जन्मकुंडली में मंगल और राहु एक साथ हो अर्थात कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो सर्वप्रथम तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उस भाव को पीड़ित करता है और उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है उदाहरण के लिए यदि कुंडली के लग्न भाव में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में स्वास्थ पक्ष की और से हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी, धन भाव में मंगल राहु का योग होने पर आर्थिक संघर्ष और क़ुतुब के सुख में कमी होगी इसी प्रकार पंचम भाव में मंगल राहु का योग शिक्षा और संतान पक्ष को बाधित करेगा।
      इसके अलावा कुंडली में मंगल राहु का योग होने से व्यक्ति का क्रोध विध्वंसकारी होता है, समान्य रूप से तो प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध आता है पर कुंडली में राहु मंगल का योग होने पर व्यक्ति का क्रोध बहुत प्रचंड स्थिति में होता है और व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता और बहुत बार क्रोध में बड़े गलत कदम उठा बैठता है, कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर जीवन में दुर्घटनाओं की अधिकता होती है और कई बार दुर्घटना या एक्सीडेंट का सामना करना पड़ता है।।
      कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को वहां चलाने में भी सावधानी बरतनी चाहिए , कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को शत्रु और विरोधियों की और से भी बहुत समस्याएं रहती है और जीवन में वाद विवाद तथा झगड़ों की अधिकता होती है, कुंडली में मंगल राहु का योग बड़े भाई के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है और मंगल राहु के योग के नकारात्मक परिणाम के कारण ही व्यक्ति को जीवन में कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, इसके अलावा यदि स्त्री जातक की कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो वैवाहिक जीवन को बिगड़ता है स्त्री की कुंडली में मंगल पति और मांगल्य का प्रतिनिधि ग्रह होता है और राहु से पीड़ित होने के कारण ऐसे में पति सुख में कमी या वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।
     जिन लोगो की कुंडली में मंगल राहु का योग होता है उन्हें अक्सर जमीन जायदात से जुडी समस्याएं भी परेशान करती हैं इसके अलावा मंगल राहु का योग हाई बी.पी. मांसपेशियों की समस्या, एसिडिटी, अग्नि और विद्युत दुर्घटना जैसी समस्याएं भी उत्पन्न करता है. यदि किसी जातक को गुस्सा अधिक आता है तो उसे ईश्वर का नाम लेना शुरू कर देना चाहिए, ईश्वर के नाम लेने से गुस्सा अवश्य ही शांत हो जाता है। इसके अलावा क्रोध किस कारण आता है, इस बात की सलाह भी ज्योतिषी से लेना उचित होता है, क्योंकि यदि कुंडली में कोई ग्रह योग ऐसी स्थिति निर्मित कर रहा है तो उसका निदान किया जा सकता है।

तो यहाँ हमने देखा की मंगल और राहु का योग किस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है यदि कुंडली में मंगल राहु के योग के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हो तो निम्नलिखित उपाय लाभकारी होंगें---
  • ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें। 
  • हनुमान चालीसा का पाठ करें। 
  • प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें। 
  • प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं। 
  • प्रतिदिन मस्तक पर सफ़ेद चन्दन का तिलक लगाएं।
  • उपाय के तोर पर चांदी का बेजोड़ छला या कडा धारण सोमवार को करने से क्रोध में कमी आती है।
  • ॐ सौं सोमाये नमः और ॐ भोम भोमाये नमः का जप करने या करवाने से क्रोध पर काबू पाया जा सकता है।
  • चांदी के गिलास में पानी और दूध का सेवन करें।
  • बड़े बजुर्गों के चरण स्पर्श करना और उनसे आशीर्वाद लेना क्रोध की शांति के लिए रामबाण है।
  • योग्य एवम अनुभवी ज्योतिषाचार्य से परामर्श कर के ताम्बे में मूंगा या चांदी में साउथ सी मोती धारण करना चाहिए।
  • मंगलवार को आठ मीठी रोटी कोयों को या कुत्तों को डालनी चाहिए।
  • अभिमंत्रित मंगल यंत्र पास रखने से तत्काल लाभ होता है।

क्रोध निवारण में वास्तु का योगदान/उपयोग--
क्रोध इंसान की प्रगति का बहुत बड़ा दुश्मन है। अपने गुस्से की वजह से इंसान बड़े-बड़े नुकसान कर डालता है। क्रोध के कारण उसकी सामाजिक क्षति तो होती ही है वो रिश्तों और पैसों से भी हाथ धो बैठता है। क्रोध को शांत करने के लिए वास्तुशास्त्र में भी कुछ उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाकर आप अपने क्रोध को नियंत्रण में रख सकते हैं।
उपाय निम्नलिखित है...
  • वास्तुशास्त्र के अनुसार अपने घर के किसी भी कोने में गंदगी ना रखें क्योंकि गंदगी क्रोध को उकसाती है।
  • पूर्व दिशा में कोई भारी सामान ना रखें। शाम होते ही घर में धूप बत्ती या अगरबत्ती को जलायें।
  • वास्तुशास्त्र के अनुसार क्रोध को शांत रखने के लिए रोज सूर्य भगवान को जल अर्पित करें। इससे मन में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और क्रोध जैसी नकारात्मक ऊर्जा आपसे दूर रहती है।
  • वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में लाल रंग का प्रयोग ना करें, घर में ना तो पेंट लाल हो और ना ही चादरें और पर्दे लाल रंग के हों।

क्रोध (गुस्से) से होने वाली हानियाँ (नुकसान)—
  • यदि कोई व्यक्ति लगातार गुस्सा करता है तो उसे सर दर्द की शिकायत हो सकती है क्यूंकि गुस्सा करने से सर मे ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होती है।।
  • ये क्रोध व्यक्ति को अवसादग्रस्त भी कर सकता है।।
  • क्रोध करने वालों को हाई ब्लड प्रेशर की बिमारी भी हो सकती है ।।
  • क्रोधी लोगों को मधुमेह (डाइबिटीज) होने का खतरा बढ़ जाता है ।।
  • क्रोध करने वालों की फेफड़ो की कार्य क्षमता भी प्रभावित होती है ।।
  • कुछ लोगो को सांस लेने मे भी समस्या होने लगती है।।
  • क्रोध करने वाले कुछ लोग पाचन तंत्र की समस्या से ग्रस्त हो जाते है ।।
  • गुस्सेल लोगो को नींद आने मे भी समस्या होने लगती है.
  • गुस्सा आदमी को जुर्म की दुनिया मे भी घुसा देता है.

वास्तव मे देखा जाए तो गुस्से से व्यक्ति खुद को ही सजा देता है. अतः ये जरुरी है की हम अपने क्रोध पर नियंत्रण करे ।।
इन उपायों से/सावधानी से भी होता है क्रोध/गुस्सा शान्त/नियंत्रण---
  1. दो पके मीठे सेब बिना छीले प्रातः खाली पेट चबा-चबाकर पन्द्रह दिन लगातार खाने से गुस्सा शान्त होता है। बर्तन फैंकने वाला, तोड़ फोड़ करने वाला और पत्नि और बच्चों पर हाथ उठाने वाला व्यक्ति भी अपने क्रोध से मुक्ति पा सकेगा। इसके सेवन से दिमाग की कमजोरी दूर होती है और स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।
  2. प्रतिदिन प्रातः काल आंवले का एक पीस मुरब्बा खायें और शाम को एक चम्मच गुलकंद खाकर ऊपर से दुध पी लें। बहुत क्रोध आना शीघ्र ही बन्द होगा।
  3. गुस्सा आने पर दो तीन गिलास खूब ठंडा पानी धीरे धीरे घूँट घूँट लेकर पिएं । पानी हमारेशारीरिक तनाव को कम करके क्रोध शांत करने में मददगार होता है।
  4. यदि गुस्सा बहुत आता हो तो धरती माता को रोज सुबह उठकर हाथ से पाँच बार छूकर प्रणाम करें और सबसे विशाल ह्रदय धरती माँ से अपने गुस्से पर काबू करने और सहनशील होने का  मागें।
  5. हमेशा याद रखे की गुस्सा हमारे लिए हानिकारक है, अतः इसे छोड़ना चाहिए।।
  6. जब भी गुस्सा आने लगे तो लम्बी साँसे लेने लग जाए कुछ देर तक।।
  7. रोज सुबह शाम ध्यान करे और व्यायाम भी करे।।
  8. मंत्र जाप और सूर्य नमस्कार:— शारीरिक और मानसिक दोनों कमजोरियों पर विजय पाने के लिए मंत्रजाप और सूर्य नमस्कार अचूक अस्त्र हैं, इन्हें प्रमाणित करने की भी आवश्यकता नहीं है। सूर्य नमस्कार, हमारे आत्मविश्वास, आरोग्य को बढ़ाने में सहायक होता है। मंत्रजाप मन की शक्ति को बढ़ाता है और निरंतर अभ्यास से एकाग्रता और धैर्य बढ़ता है।।
  9. रोज सुबह हरी घास पे चलना चाहिए नंगे पाँव।।
  10. अगर कुंडली मे ग्रह खराब हो तो किसी अच्छे ज्योतिष से संपर्क करके उसके उपाय करने चाहिए।।
  11. अच्छे और सकारात्मक विचारों को पढ़ना चाहिए।।
  12. ॐ का जप भी बहुत लाभदायक रहता है।।
  13. पलाश के छोटे छोटे पत्तों की सब्जी खाने से गुस्सा, और पित्त जल्दी ही शांत होता है ।
  14. रविवार को अदरक, टमाटर और लाल रंग के कपड़े गुस्सा अधिक बढ़ाते हैं अत: इनका कम से कम प्रयोग करें ।
  15. ऐसे लोगो को हरड़ का प्रयोग लाभदायक रहता है  ।
  16. गर्म चीज़ो का इस्तामाल कम करना चाहिए ।
  17. दूध छाछ का सेवन करना चाहिए  ।
  18. आंवला और शह्द का इस्तामाल करे  ।
  19. तला और मिर्च मसाला वाला भोजन ना करे ।
  20. पानी ज़्यादा पिए
  21. गाय को रोटी दे ।
  22. चंदन का टीका लगाए ।
  23. आर्गला स्त्रोत का पाठ करे ।
  24. आपके परिवार में जिनको गुस्सा बहुत आता हो, बात- बात में चिढ़ जाते हो वे लोग सोमवार का उपवास करें, या एक समय भोजन करें। रात कों चन्द्रमा कों अर्घ दें तथा अपने गुस्से पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करें । इससे भी मन शान्त रहता है, गुस्से पर नियंत्रण रहता है।
  25. भोजन में बहुत अधिक खट्टी, तीखी, मसालेदार चीजें खाने से आँखें जलती हैं, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आता है, शीघ्र गुस्सा आता है, अकारण ही सीने और पेट में जलन होती है अत: इन चीजों का बिलकुल त्याग कर देना चाहिए ।
  26. यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।
  27. भोजन को चबा-चबाकर शांति से खायें।
  28. जब भी क्रोध आए तो उस वक्त अपना चेहरा आइने में देखने से भी लज्जावश गुस्सा चला जाएगा।
  29. एक कटोरी में पानी भरकर उस पानी को देखकर ऊॅ शांति…….ऊॅ शांति…….ऊॅ शांति का मंत्र 21 बार जप करें और बाद में इस पानी को पी लें। एैसा करने से आपके क्रोधी स्वभाव में परिवर्तन आएगा।
  30. चांदी के गिलास में जल व दूध का सेंवन करें।
  31. 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  32. गणेश स्त्रोत का नियमित पाठ करें।
  33. रोज सुबह उठकर अपने बड़ों के चरण स्पर्श करें।
  34. रोज सुबह सूर्य को जल अर्पित करें।
  35. सूर्य के सामने गायत्री मंत्र का जाप करें।

जानिए कैसे पाएं क्रोध/झुंझलाहट और चिड़चिड़ेपन से छुटकारा--
अत्‍यधिक क्रोध के अलावा अक्‍सर हम छोटी-छोटी बातों को लेकर झुंझलाहट भी दिखाने लगते हैं। 
वेदों को दुनिया की सबसे प्राचीन लिखित सामग्री माना गया है। इन्‍हीं वेदों में छिपा है दुनिया के हर मसले का वैज्ञानिक हल। दरअसल भगवान शिव के पुत्र और प्रथमपूज्‍य भगवान गणेश ने समूची मानव जाति को क्रोध पर नियंत्रण करने का रहस्‍य बताया है। भगवान गणेश के बताए वैदिक मंत्र के द्वारा कोई भी इंसान अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्‍त कर सकता है। 

"ॐ गतक्रोधाय नम: "

वैदिक विधान के अनुसार इस अचूक मंत्र का प्रतिदिन 108 बार पांच मालाओं में (108x5) जप करना चाहिए। दरअसल प्राचीन ऋषि और आधुनिक विज्ञान का भी यही मानना है कि मस्‍तिष्‍क की तंत्रिकाओं के जरिए गुस्‍से पर ना सिर्फ काबू पाया जा सकता है बल्‍कि अपनी खुशियों को बढ़ाया भी जा सकता है। महर्षि वेदव्‍यास ने अपने महान ग्रंथ "महाभारत" में क्रोध नियंत्रण पर बहुत कुछ लिखा हैं। 

इसमें कलिपुरुष (कलियुग) द्वारा राजा नल को वरदान देते हुए जो बातें कहीं उन्‍हें प्रतिदिन 108 बार मनन करने से झुंझलाहट और चिड़चिड़ेपन से निजात मिलती है। 

कर्कोटस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च। ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तनं कलिनाशनम्।।

क्रोध पर काबू पाने का विष्‍णु मंत्र--- 

ॐ शांताकाराय नम: 
वैदिक शांति मंत्र 

ॐ ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं: पूर्णात्‍पूर्णमुदच्‍यते, पूर्णस्‍य पूर्णमादाय पुर्णमेवावशिष्‍यते, ॐ शान्‍ति: शान्‍ति: शान्‍ति: 

उपरोक्‍त मंत्र का प्रतिदिन 21 बार जप करने से लाभ निश्‍चित है। यह भी ध्‍यान रखें कि मंत्रों को पूरी शुद्धता के साथ ही पढ़ें।
अहंकार (क्रोध) शान्ति हेतु  विधि पूर्वक नकुल मंत्र का जाप कराना चाहिए या स्वयं करना चाहिए–
जिस प्रकार नकुल ने अहि का विच्छेद करके सत्य का रूप धारण किया था उसी प्रकार आप अपने जीवन में मधुरता की कामना से नकुल मंत्र का जाप करें या करवाएं।
-‘‘ यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः। एवं कामस्य विच्छिन्नं स धेहि वो यादितिः।।
का जाप दुर्गादेवी के षोडषोपचार पूजन के उपरांत विधिवत् संकल्प लेकर इस मंत्र का जाप करने से रिश्तों की समस्त विषमताएं समाप्त होकर जीवन में सुख प्राप्त होता है।
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  1.  वे सभी जातक जिन्हे ज्यादा गुस्सा आता हो उन्हें चाय, काफी, मदिरा से परहेज करना चाहिए ये शरीर को उत्तेजित करते है उसके स्थान पर छाछ, मीठा दूध या नींबू पानी का प्रयोग करना चाहिए ।
  2. किसी को यदि गुस्सा आने वाला हो तो 5-6 बार गहरी गहरी साँस लीजिए, कुछ पलों के लिए अपनी आँखे बंद करके ईश्वर का ध्यान करें उन्हें प्रणाम करें उनसे अपना कोई भी निवेदन करें। यह गुस्सा कम करने का सबसे बढ़िया तरीका है। इससे आप भड़कने से पहले ही निश्चित रूप से शांत हो जाएँगे।
  3. अपने घर के किसी भी कोने में गंदगी ना रखें क्योंकि गंदगी क्रोध को उकसाती है।
  4. पूर्व दिशा में कोई भारी सामान ना रखें।
  5. शाम होते ही अपने घर, दुकान या ऑफिस में धूप बत्ती को जलाकर वहां का वातावरण सुगन्धित रखें।
  6. जिस स्त्री का पति हर समय बिना बात के ही गुस्सा करता रहता है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार, सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार किसी भी दिन एक नए सफेद कपड़े में एक डली गुड़, चांदी एवं तांबे के दो सिक्के, एक मुट्ठी नमक व गेहूं को बांधकर अपने शयनकक्ष में कहीं ऐसी जगह छिपा कर रख दें जहाँ पति को पता न चले । इसके प्रभाव से भी पति का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगेगा।

किसी ने बिल्कुल सटीक कहा है कि अपने भीतर से अहंकार को निकालकर खुद को हल्का कीजिए क्योंकि ऊंचा वही उठता है जो हल्का होता है। अगर आप अपनी खूबियों और तरक्की को ताउम्र बरकरार रखना चाहते हैं तो अहंकार से दूर ही रहिए। अपनी तरक्की और सुख के लिए ईश्वर को धन्यवाद करते रहें। अहंकार के राक्षस से बचने का यही सबसे कारगर रास्ता है।

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