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जानिए ज्योतिष में पंचक का प्रभाव और महत्त्व

Know-the-impact-and-significance-of-the-quintet-in-astrology-जानिए ज्योतिष में पंचक का प्रभाव और महत्त्वकिसी भी काम को मंगलमय ढ़ग से पूरा करने के लिए यह बहुत अवश्यक है की उसे शुभ समय पर किया जाए। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं की सभी नक्षत्रों का अपना-अपना प्रभाव होता है। कुछ शुभ फल देते हैं तो कुछ अशुभ लेकिन कुछ ऐसे काम होते हैं जो कुछ नक्षत्रों में नहीं करने चाहिए। उज्जैन के ज्योतिषी पंडित पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया जब चंद्रमा गोचर में कुंभ और मीन राशि से होकर गुजरता है तो यह समय अशुभ माना जाता है इस दौरान चंद्रमा धनिष्ठा से लेकर शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती से होते हुए गुजरता है इसमें नक्षत्रों की संख्या पांच होती है इस कारण इन्हें पंचक कहा जाता है। 
           कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हे विशेष रुप से पंचक के दौरान करने की मनाही होती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों के योग को ही पंचक कहा जाता है इसलिये पंचक को ज्योतिष शुभ नक्षत्र नहीं मानता अतः सावधानी रखें,ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों और नक्षत्र के अनुसार ही किसी कार्य को करने या न करने के लिये समय तय किया जाता है जिसे हम शुभ या अशुभ मुहूर्त कहते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में आरंभ होने वाले कार्यों के परिणाम मंगलकारी होते हैं जबकि शुभ मुहूर्त को अनदेखा करने पर कार्य में बाधाएं आ सकती हैं और उसके परिणाम अपेक्षाकृत तो मिलते नहीं बल्कि कई बार बड़ी क्षति होने का खतरा भी रहता है। 
           उज्जैन के ज्योतिषी पंडित पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया भारतीय ज्योतिष में पंचक को अशुभ माना गया है। इसके अंतर्गत धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र आते हैं। पंचक के दौरान कुछ विशेष काम करने की मनाही है। इस बार शुक्रवार (21 अप्रैल) की सुबह लगभग 10.14 बजे से पंचक शुरू हो गया था, जो 25 अप्रैल, मंगलवार की रात लगभग 09.03 तक रहेगा। 
      उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, शनिवार से शुरू होने के कारण ये मृत्यु पंचक कहलाएगा। पंचक कितने प्रकार का होता है और इसमें कौन से काम नहीं करने चाहिए, पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है। उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं। 
       उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है। 
  1. रोग पंचक--- उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार रविवार को शुरू होने वाला पंचक रोग पंचक कहलाता है। इसके प्रभाव से ये पांच दिन शारीरिक और मानसिक परेशानियों वाले होते हैं। इस पंचक में किसी भी तरह के शुभ काम नहीं करने चाहिए। हर तरह के मांगलिक कार्यों में ये पंचक अशुभ माना गया है।
  2. राज पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सोमवार को शुरू होने वाला पंचक राज पंचक कहलाता है। ये पंचक शुभ माना जाता है। इसके प्रभाव से इन पांच दिनों में सरकारी कामों में सफलता मिलती है। राज पंचक में संपत्ति से जुड़े काम करना भी शुभ रहता है। 
  3.  अग्नि पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मंगलवार को शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इन पांच दिनों में कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फैसले, अपना हक प्राप्त करने वाले काम किए जा सकते हैं। इस पंचक में अग्नि का भय होता है। इस पंचक में किसी भी तरह का निर्माण कार्य, औजार और मशीनरी कामों की शुरुआत करना अशुभ माना गया है। इनसे नुकसान हो सकता है। 
  4. मृत्यु पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनिवार को शुरू होने वाला पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। नाम से ही पता चलता है कि अशुभ दिन से शुरू होने वाला ये पंचक मृत्यु के बराबर परेशानी देने वाला होता है। इन पांच दिनों में किसी भी तरह के जोखिम भरे काम नहीं करना चाहिए। इसके प्रभाव से विवाद, चोट, दुर्घटना आदि होने का खतरा रहता है। 
  5. चोर पंचक उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। इस पंचक में यात्रा करने की मनाही है। इस पंचक में लेन-देन, व्यापार और किसी भी तरह के सौदे भी नहीं करने चाहिए। मना किए गए कार्य करने से धन हानि हो सकती है। 

इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है। इन दो दिनों में शुरू होने वाले दिनों में पंचक के पांच कामों के अलावा किसी भी तरह के शुभ काम किए जा सकते हैं| 
 जानिए उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसारपंचक के नक्षत्रों का शुभ फल-- मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार पंचक के नक्षत्रों का शुभ फल--
  1. घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इनमें चलित काम करना शुभ माना गया है जैसे- यात्रा करना, वाहन खरीदना, मशीनरी संबंधित काम शुरू करना शुभ माना गया है। 
  2. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र माना गया है। इसमें स्थिरता वाले काम करने चाहिए जैसे- बीज बोना, गृह प्रवेश, शांति पूजन और जमीन से जुड़े स्थिर कार्य करने में सफलता मिलती है। 
  3. रेवती नक्षत्र मैत्री संज्ञक होने से इस नक्षत्र में कपड़े, व्यापार से संबंधित सौदे करना, किसी विवाद का निपटारा करना, गहने खरीदना आदि काम शुभ माने गए हैं। 

 जानिए उज्जैन के ज्योतिषी पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार केसा होता है पंचक के नक्षत्रों का अशुभ प्रभाव--- 
  1. धनिष्ठा नक्षत्र में आग लगने का भय रहता है। 
  2. शतभिषा नक्षत्र में वाद-विवाद होने के योग बनते हैं। 
  3. पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र है यानी इस नक्षत्र में बीमारी होने की संभावना सबसे अधिक होती है। 
  4. उत्तरा भाद्रपद में धन हानि के योग बनते हैं। 
  5. रेवती नक्षत्र में नुकसान व मानसिक तनाव होने की संभावना होती है। 

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पंचक में न करें ये 5 काम 
  1. पंचक में चारपाई बनवाना भी अच्छा नहीं माना जाता। ऐसा करने से कोई बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। 
  2. पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि जलने वाली वस्तुएं इकट्ठी नहीं करना चाहिए, इससे आग लगने का भय रहता है।
  3. पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है। 
  4. पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का कहना है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है। 
  5. पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से पहले किसी योग्य पंडित की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। यदि ऐसा न हो पाए तो शव के साथ पांच पुतले आटे या कुश (एक प्रकार की घास) से बनाकर अर्थी पर रखना चाहिए और इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार करना चाहिए, तो पंचक दोष समाप्त हो जाता है। ऐसा गरुड़ पुराण में लिखा है। 

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ये शुभ कार्य कर सकते हैं पंचक में---
 पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं। पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है। 
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पंचक में कुछ कार्य विशेष रूप से निषिद्ध कहे गए हैं- 
  1. पंचकों में शव का क्रियाकर्म करना निषिद्ध है क्योकि पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने पर कुटुंब या पड़ोस में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। 
  2. पंचकों के पांच दिनों में दक्षिण दिशा की यात्रा वर्जित कही गई है क्योंकि दक्षिण मृत्यु के देव यम की दिशा मानी गई है। 
  3. चर संज्ञक धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहने के कारण घास लकड़ी ईंधन इकट्ठा नहीं करना चाहिए। 
  4. मृदु संज्ञक रेवती नक्षत्र में घर की छत डालना धन हानि व क्लेश कराने वाला होता है।
  5. पंचकों के पांच दिनों में चारपाई नहीं बनवानी चाहिए।

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जानिए पंचक दोष दूर करने के उपाय- 
  1. लकड़ी का समान खरीदना अनिवार्य होने पर गायत्री यग्य करें।
  2. दक्षिण दिशा की यात्रा अनिवार्य हो तो हनुमान मंदिर में पांच फल चढ़ाएं। 
  3. मकान पर छत डलवाना अनिवार्य हो तो मजदूरों को मिठाई खिलाने के पश्चात छत डलवाएं।
  4. पलंग या चारपाई बनवानी अनिवार्य हो तो पंचक समाप्ति के बाद ही इस्तेमाल करें। पंचक के दौरान इस दौरान कोई पलंग, चारपाई, बेड आदि नहीं बनवाना चाहिये माना जाता है कि पंचक के दौरान ऐसा करने से बहुत बड़ा संकट आ सकता है। 
  5. शव का क्रियाकर्म करना अनिवार्य होने पर शव दाह करते समय कुशा के पंच पुतले बनाकर चिता के साथ जलाएं। पंचक में यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार विशेष विधि के तहत किया जाना चाहिये अन्यथा पंचक दोष लगने का खतरा रहता है जिस कारण परिवार में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। इस बारे में गुरुड़ पुराण में विस्तार से जानकारी मिलती है इसमें लिखा है कि अंतिम संस्कार के लिये किसी विद्वान ब्राह्मण की सलाह लेनी चाहिये और अंतिम संस्कार के दौरान शव के साथ आटे या कुश के बनाए हुए पांच पुतले बना कर अर्थी के साथ रखें और शव की तरह ही इन पुतलों का भी अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से करना चाहिये। 
  6. पंचक शुरु होने से खत्म होने तक किसी यात्रा की योजना न बनाएं मजबूरी वश कहीं जाना भी पड़े तो दक्षिण दिशा में जाने से परहेज करें क्योंकि यह यम की दिशा मानी जाती है। इस दौरान दुर्घटना या अन्य विपदा आने का खतरा आप पर बना रहता है। 

 विशेष सावधानी-- किसी भी उपाय को आरंभ करने से पहले अपने इष्ट देव का मंत्र जाप अवश्य करें।

जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण)

 Learn-Astrology-and-abdominal-disease-abdominal-pain-concerned-astrological-reasons-जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण)ज्योतिष शास्त्र ग्रहों के चलन, उनके समागम या वियोग से सामान्य जन जीवन, पृथ्वी व मनुष्य जाति पर होने वाले शुभाशुभ प्रभावों का निर्धारण तथा उससे होने वाले परिवर्तनों (सुख-दुख) का ज्ञान कराता है। आकाशीय पिंडों, ग्रहों के परिचालन द्वारा उत्पन्न होने वाले योगों की गणना एवं उनसे होने वाले दुष्प्रभावों को गणना द्वारा प्रतिपादित करना इस शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य है जिनमें दुखरूपी व्याधि, अनिष्ट कृत्य, किसी कार्य में विलंब तथा संखरूपी व्याधि परिहार, मांगलिक कार्य इत्यादि का संपादन करता है। ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। षड्यन वेदांगों में ज्योतिष शास्त्र जिसे वैदिक वांङमय के मतानुसार वेदों के नेत्र रूप में निर्देशित किया गया है। अर्थात बिना इस शास्त्र के ज्ञान के हमें काल ज्ञान नहीं हो सकता। यजुर्वेद के इस मंत्र द्वारा यह कामना की गयी है -
भद्रं कर्मेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्य जत्राः। 
स्थिरैरजै तुष्टवा सस्तनूभित्र्यशेयहि देवहितं यदायुः।। 
            ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। मनुष्य स्वस्थ व दीर्घ जीवनयापन करता है। इसके लिए आवश्यक है कि समय से पूर्व उचित निदान, यह तभी संभव हैं जब कारण के मूल का ज्ञान बहुत से रोगों के कारण ज्ञात हो जाते हैं पर बहुतों के कारण अंत तक नहीं ज्ञात होते। रोगों का संबंध पूर्व जन्म से भी होता है। आचार्य चरक लिखते हैंः कर्मजा व्याध्यः केचित दोषजा सन्ति चापरे। 
 त्रिषठाचार्य ने भी लिखा है- जन्मांतरम् कृतं पापं व्यधिरुपेण जायते। अर्थात कुछ व्याधियां पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से होती हैं तथा कुछ व्याधियां शरीरस्थ दोषों (त्रिदोष-वात, पित्त, कफ) के प्रभाव से होती हैं। आचार्य कौटिल्य का कथन है कि सभी वस्तुओं का परित्याग करके सर्वप्रथम शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर नष्ट होने पर सबका नाश हो जाता है। महर्षि चरक ने भी उपनिषदों में वर्णित तीन ऐषणाओं के अतिरिक्त एक चैथी प्राणेप्रणा की बात कही है जिसका अर्थ है कि प्राण की रक्षा सर्वोपरि है। 
जैसा कि महाभारत के उद्योग पर्व में कहा गया है- मृतकल्पा हि रोगिणः। रोगस्तु दोष वैषम्यं दोष साम्यम रोगत। (अष्टांग हृदय 1/20) शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इन तीन दोषों को संतुलित रखना पड़ता है क्योंकि सब रोगों का कारण त्रिदोष वैषम्य ही है। सभी रोगों के साक्षात कारण प्रकुपित दोष ही हैं । हमारे आचार्यों ने मनुष्य के प्रत्येक अंगों की स्थिति ज्ञात करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में काल पुरुष की कल्पना की है, काल पुरुष के अंगों में मेषादि राशियों का समावेश किया गया हैः काल पुरुष के अंग सिर मेष मुख वृष बांह मिथुन हृदय कर्क उदर सिंह कटि कन्या वस्ति तुला गर्दन वृश्चिक उरु धनु जानु मकर जंघा कुंभ चरण मीन जातक स्कंध में मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को लग्नादि बारह भावों में विभक्त कर द्वादश भाव तनु, धन, सहज, सुहृत, सतु, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय व व्यय के नाम से जाने जाते हैं। इन बारह भावों में छठा भाव रिपु भाव है। इसे रोग भाव भी कहा जाता है। 
          छठे भाव से रोग व शत्रु दोनों का विचार किया जाता है। आठवें व बारहवें भाव तथा भावेश का भी संबंध रोग से होता है। पेट दर्द (उदर रोग विकार) उत्पत्र करने में भी शनि एक महत्वपुर्ण भुमिका निभाता हैं। सूर्य एवं चन्द्र को बदहजमी का कारक मानते हैं, जब सूर्य या चंद्र पर शनि का प्रभाव हो, चंद्र व बृहस्पति को यकृत का कारक भी माना जाता है। इस पर शनि का प्रभाव यकृत को कमजोर एवं निष्क्रिय प्रभावी बनाता हैं। पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार बुध पर शनि के दुष्प्रभाव से आंतों में खराबी उत्पत्र होती हैं। वर्तमान में एक कष्ट कारक रोग एपेण्डीसाइटिस भी बृहस्पति पर शनि के अशुभ प्रभाव से देखा गया है। शुक्र को धातु एवं गुप्तांगों का प्रतिनिधि माना जाता हैं। जब शुक्र शनि द्वारा पीडि़त हो तो जातक को धातु सम्बंधी कष्ट होता है। जब शुक्र पेट का कारक होकर स्थित होगा तो पेट की धातुओं का क्षय शनि के प्रभाव से होगा।बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! 
          आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है | ज्योतिष शास्त्र में उदर का स्थान कालपुरुष की कुंडली में उदर का स्थान पंचम भाव है जिसकी राशि सिंह है। सिंह राशि जो पंचम भाव का कारक हैः उससे प्रभावित अंग उदर है जिसमें मन्दाग्नि, गुल्म, पथरी, पाण्डुरोग, यकृत इत्यादि के रोग उत्पन्न होते हैं। अतिसार संग्रहणी, प्लीहा, उदरशूल, अरुचि या मुंह का स्वाद बिगड़ना, अजीर्ण इत्यादि। चिकित्सकों का विचार है कि वीर्य का देह में विशेष महत्व है, वीर्य के क्षीण होने पर वायु विकृत हो जाती है जिससे पाचन तंत्र बिगड़ जाता है तथा मन्दाग्नि, गैस या गुल्म सरीखे रोग पैदा होते हैं। उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय कारण पराशर आचार्यों ने उदर रोग को निम्न प्रकार से रेखांकित किया है। षष्ठ भाव फलाध्याय में लिखते हैं कि षष्ठेश अपने घर, लग्न या अष्टम भाव में हो तो शरीर में व्रण (घाव) होता है। षष्ठ राशि में जो राशि हो उस राशि के आश्रित अंगों में रोग उत्पन्न होता है।
          राहु या केतु हो तो पेट में घाव होता है। जातकालंकार में लिखते हैं कि षष्ठेशे पापयुक्ते तनु निधन गते तनु निधनगते नु शरीरे व्रणास्युः जातक के जन्मांग चक्र में रोग का विचार मुख्यतः षष्ठ भाव, षष्ठेश, षष्ठ भावस्थ ग्रह, अष्टम भाव, अष्टमेश, अष्टम भावस्थ ग्रह, द्वादश भाव, द्वादशेश, द्वादशस्थ ग्रह, षष्ठेश से युक्त एवं दृष्ट ग्रहों द्वारा एवं मंगल ग्रह द्वारा किया जाता है। इसमें हमें ग्रह राशियों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ये निर्बल, दोष युक्त या पुष्ट दोषयुक्त होकर रोगकारक, मारक या रोग निवारक बन जाते हैं। उदररोग के ज्योतिषीय कारण जो प्रमुख रूप से उदर रोग को निर्देशित करने में सहायक होते हैंः ƒ सूर्य, मंगल, शनि, राहु-केतु में से तीन ग्रहों का एक स्थान पर युति करना पेट में विकार देता है। ƒ नीच राशि का चंद्रमा लग्नस्थ होकर मंगल, शनि या राहु से दृष्ट हो तो उदर रोग देता है। ƒपंचम भाव का संबंध पाचन तंत्र, पाचन क्रिया से है। सूर्य को पाचन तंत्र का नियंत्रक माना जाता है। हमारे प्राचीन विद्वानों का मत है कि पाचन क्रिया में रश्मियों का महत्वपूर्ण योगदान है। जब भी सूर्य आभाहीन होता है उदर में गड़बड़ी देता है। ज्योतिष का नियम है- औषधि, मणि, मंत्राणां, ग्रह नक्षत्र तारिका। भाग्य काले भवेत्सिहि अभाग्यं निष्फलं भवेत्।। सत्य ही कहा गया है कि जहां भौतिक विज्ञान की सीमाएं समाप्त होती हैं वहीं से अध्यात्म विज्ञान की सीमाएं प्रारंभ होती हैं। 
 शनिकृत कुछ विशेष उदर रोग योगः- 
  •  1 कर्क, वृश्चिक, कुंभ नवांश में शनिचंद्र से योग करें तो यकृत विकार के कारण पेट में गुल्म रोग होता है। 
  • 2 द्वितीय भाव में शनि होने पर संग्रहणी रोग होता हैं। इस रोग में उदरस्थ वायु के अनियंत्रित होने से भोजन बिना पचे ही शरीर से बाहर मल के रुप में निकल जाता हैं। 
  • 3 सप्तम में शनि मंगल से युति करे एवं लग्रस्थ राहू बुध पर दृष्टि करे तब अतिसार रोग होता है। 
  • 4 मीन या मेष लग्र में शनि तृतीय स्थान में उदर मंे दर्द होता है। 
  • 5 सिंह राशि में शनि चंद्र की यूति या षष्ठ या द्वादश स्थान में शनि मंगल से युति करे या अष्टम में शनि व लग्र में चंद्र हो या मकर या कुंभ लग्रस्थ शनि पर पापग्रहों की दृष्टि उदर रोग कारक है। 
  • 6 कुंभ लग्र में शनि चंद्र के साथ युति करे या षष्ठेश एवं चंद्र लग्रेश पर शनि का प्रभाव या पंचम स्थान में शनि की चंद्र से युति प्लीहा रोग कारक है। 

 बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है ! पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार कुंडली में लगन में राहू और सप्तम स्थान में केतु हो तो व्यक्ति को लिवर में इन्फेक्शन होता है ! आठवे भाव में बुध सूर्य के साथ मकर राशि के हो के बैठा है तो निश्चित तोर पर उस व्यक्ति को पेशाब से सम्बंधित समस्या होती है जैसे किडनी में स्टोन या इन्फेक्शन होता है ! कुम्भ लगन में सूर्य हो तो वह व्यक्ति हमेशा एसिडिटी ,बदहजमी तथा पेट में तनाव रहता है ,लगन कुंडली के बारहवे भाव में सिंह राशि का केतु शनि हो तो बवासीर की समस्या तथा गुदा रोग होता है ,अगर बृहस्पति सप्तम या अष्टम भाव में हो तो पीठ तथा पैरो में दर्द देते है !
               कुंडली देख के तमाम उन समसयाओं का समधान हो सकता है जो देखने में तो कम लगता है लेकिन असधारण होता है !क्यो की हर ग्रह का प्रभाव का एक हिस्सा होता है ! और उस आधार पर किस ग्रह का प्रभाव किस अंग पर पड़ रहा है तथा उसका दुस्प्रभाव क्या होगा इसका अध्यन कर इनके रोगों से बचा जा सकता है ! उपचार कई तरीके से होता है जैसे ग्रहों की शान्ति , रत्न धारण कर ,दान तथा उपवास द्वारा हर रोग का उपचार संभव है ! उदर योग ज्योतिषीय दृष्टिकोण भी रोगों का कारण उदर रोग को माना जाता है। जब तक पाचन शक्ति अच्छी रहती है तब तक जातक का शरीर भी हृष्ट पुष्ट रहता है। पाचन शक्ति की प्रबलता में कंद मूल या प्याज से रोटी खाने वाला भी तरोताजा एवं हृष्ट पुष्ट दिखता है। वहीं पाचन शक्ति कमजोर हो, तो पंचमेवा का सेवन करने वाला भी अति दुर्बल हो जाता है। वास्तव में पाचन क्रिया का समाप्त होना ही मृत्यु समझा जाता है। पाचक रसों में विकृति आने पर शरीर पर रोगों का आक्रमण आसानी से होता है। 
         रोग दो प्रकार के माने जाते हैं- निज रोग जिसे शारीरिक एवं मानसिक में विभक्त किया गया है और आगंतुक रोग जिसमें दृष्टि निर्मित व अदृष्ट निर्मित रोग आते हंै। शारीरिक रोग शरीर में वात पित्त व कफ की कमी या अधिकता से होते हैं और मानसिक रोग भय, शोक तथा क्रोध के कारण। ये रोग अष्टम भाव में स्थित राशि व उसके स्वामी अष्टमस्थ ग्रह व अष्टम भाव पर दृष्टि कारक ग्रह से युति दृष्टि किसी ग्रह या भाव कारक से होने पर होते हैं। आगंतुक रोग में दृष्टि रोग घात के कारण होते हैं तो अदृष्ट रोग देवी देवताओं के प्रकोप के कारण। इन रोगों का विचार छठे भाव, भावेश, षष्ठस्थ ग्रह व षष्ठ भाव पर दृष्टि कारक ग्रहों के अनुसार किया जाता है। पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार यदि जन्मांग में पंचम भाव, भावेश या कारक ग्रह का छठे भाव से सबंध हो, तो दोष विकृति के कारण रोग होता है। आगंतुक रोग होने पर जातक के लिए तंत्र मंत्र यंत्र का उपचार ही प्रभावी होगा। 
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ज्योतिष के अनुसार रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समय में किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष पर पापग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप दृष्टि,पापग्रहों की राशि एवं नक्षत्र में उपस्थित होना, पापग्रह अधिष्ठित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है। इन रोगकारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर रहने पर रोग की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं भाव मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो का प्रतिनिधित्व करते है। चिकित्सकीय उपचार से राहत की बजाय परेशानी होती रहती है। उदर के कारक भाव के विषय में उत्तर कालमृत में कहा गया है। गम्भीर्यघनता रहस्यविनया वृतान्तसंलेखनं। क्षेमस्नेह प्रबन्ध काव्यरचना कार्यप्रवेशोदराः। 
           अर्थात् गंभीरता, दृढ़ता, रहस्य, विनय, वृत्तांत लेख, क्षेम, स्नेह, प्रबंध, काव्य रचना, कार्य प्रारंभ एवं उदर पंचम भाव के कारक हैं। प्रत्येक ग्रह उदर रोग देने में सक्षम है। लेकिन उदर व उदर व्याधि हेतु चंद्र ‘‘मुखकान्तिश्वेतवर्णोंदरा’’ एवं वृह ‘’पुत्र पौत्र जठर व्याधि द्विपात्सम्पदो’’ प्रमुख माने गए हैं। चंद्र एवं गुरु को यकृत का कारक भी मानते हैं। हमारे शरीर में यकृत एक महत्वपूर्ण अंग है। यकृ त से उत्पन्न पित्त से ही भोजन का पाचन होता है। यदि चंद्र व गुरु शुभ होकर कमजोर हों एवं पाप पीड़ित हो तो पित्त की कमी के कारण भोजन का पाचन सही नहीं रहेगा। किंतु उक्त दोनों ग्रह अशुभ होकर बली हों तो पित्त की अधिकता के कारण पाचन तंत्र विकृत हो जाएगा। फलतः उदर रोग दोनो स्थितियों में जटिल हो जाता है। जन्मांग में चंद्र व गुरु शुभ होकर बलवान हों तो जातक को शुभफल की प्राप्ति होती है। दूसरी तरफ इनकी शुभता से पाचन शक्ति व्यवस्थित रहती है। फलतः जातक का सर्वांगीण विकास होता है। उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय योग- यदि लग्नेश, षष्ठेश व बुध एकत्र हों, तो जातक पित्त जनित रोग से और यदि लग्नेश, षष्ठेश व शनि एकत्र हो तो गैस व्याधि से पीड़ित रहता है। लग्नेश, षष्ठेश, बुध व शनि का चतुर्विध कोई संबंध बन रहा हो, तो पित्ताधिक्य व गैस व्याधि होती है अर्थात जातक एसिडिटी से ग्रस्त होता है जो आजकल आम है। मंगल लग्न में हो व षष्ठेश निर्बल हो, तो अजीर्ण और लग्न में पाप ग्रह व अष्टम में शनि हो तो कुक्षि में पीड़ा होती है।
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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 –मध्य प्रदेश) एवं 09024390067 –राजस्थान) के अनुसार
  1.  लग्न में पाप ग्रह राहु व केतु हों, तो इनकी दृष्टि पंचम पर होगी व अष्टमस्थ शनि की दृष्टि भी पंचम पर होगी। यदि इस स्थिति में गुरु भी पीड़ित हो, तो जातक एपेंण्डिसाइटिस से ग्रस्त होता है। 
  2. लग्नेश यदि शत्रु राशि या नीच राशि में हो, मंगल चैथे भाव में व शनि पापग्रह से दृष्ट हो, तो जातक उदर शूल से ग्रस्त होता है। 
  3. सूर्य व चंद्र छठे भाव में हो, तो वायु विकार से पाण्डु रोग और इनके साथ मंगल की युति हो, तो उदर शूल होता है। यदि सप्तम भाव में शुक्र पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो जातक संग्रहणी रोग का शिकार होता है। 
  4. द्वितीय स्थान में शनि या राहु हो या कारकांश कुंडली में पंचम स्थान में केतु हो तो भी संग्रहणी रोग होता है। 
  5. लग्न में राहु व बुध एवं सप्तम स्थान में शनि व मंगल हों या लग्नेश व गुरु त्रिक भाव में हों, तो जातक अतिसार से ग्रस्त होता है। 
  6. लग्नेश व बुध या गुरु की युति त्रिक भाव में हो या पंचम भाव में नीच राशि में बुध या गुरु स्थित हो, तो जातक पित्त का रोगी होता है। 
  7.  षष्ठेश चंद्र पाप ग्रह के साथ हो या पंचम स्थान में शनि व चंद्र हों या लग्नेश व सप्तमेश चंद्र पर केवल पाप ग्रहों की दृष्टि हो या जन्मराशि व षष्ठेश केवल पापग्रहों से दृष्ट हों या सूर्य व मंगल के मध्य चंद्र हो व सूर्य मकर में हो, तो जातक प्लीहा रोग से ग्रस्त होता है। 
  8. छठे या बारहवें भाव में शनि व मंगल हों या सिंहस्थ चंद्र पाप पीड़ित हो या लाभेश तृतीय स्थान में हो या केंद्र त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जातक शूल रोग से ग्रस्त होता है। 
  9. सप्तम में राहु व केतु का होना या लग्न में चंद्रमा व अष्टम में शनि का होना भी उदर रोग का कारक है। 
  10.  जन्मांग में यदि पंचम भाव में शुभ ग्रह बली होकर स्थित हो, पंचमेश व पंचम कारक भी बली हो, तो जातक को उदर रोग सामान्यतः नहीं होता है। लेकिन पंचम भाव में पाप ग्रहों का होना पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि होना, पंचम भाव व पंचमेश का पाप कर्तरी प्रभाव में होना आदि उदर रोग के कारक हैं। 
  11. पाप ग्रहों का प्रभाव जैसे-जैसे पंचम भाव, पंचमेश व पंचम कारक पर बढ़ता जाएगा उदर रोग उतना ही जटिल होता जाएगा। अर्थात उदर रोगों के होने या उनसे मुक्ति में ग्रहों की भूमिका गोचर व दशाकाल के आधार पर निर्भर होती है। 

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भाव मंजरी के अनुसार- मेष राशि सिर में, वृष मुंह में , मिथुन छाती में, कर्क ह्नदय में, सिंह पेट में, कन्या कमर में, तुला बस्ति में अर्थात पेडू में, वृश्च्कि लिंग में , धनु जांघो में, मकर घुटनों में, कुम्भ पिंण्डली में तथा मीन राशि को पैरो में स्थान दिया गया है। राशियों के अनुसार ही नक्षत्रों को उन अंगो में स्थापित करने से कल्पिम मानव शरीराकृति बनती है।इन नक्षत्रों व राशियों को आधार मानकर ही शरीर के किसी अंग विशेष में रोग या कष्ट का पूर्वानुभान किया जा सकता है। शनि तमोगुणी ग्रह क्रुर एवं दयाहीन, लम्बे नाखुन एवं रूखे-सूखे बालों वाला, अधोमुखी, मंद गति वाला एवं आलसी ग्रह है। इसका आकार दुर्बल एवं आंखे अंदर की ओर धंसी हुई है। जहां सुख का कारण बृहस्पति को मानते है। तो दुःख का कारण शनि है। शनि एक पृथकत्ता कारक ग्रह है पृथकत्ता कारक ग्रह होने के नाते इसकी जन्मांग में जिस राशि एवं नक्षत्र से सम्बन्ध हो, उस अंग विशेष में कार्य से पृथकत्ता अर्थात बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैंै। 
            शनि को स्नायु एवं वात कारक ग्रह माना जाता है । नसों वा नाडियों में वात का संचरण शनि के द्वारा ही संचालित है। आयुर्वेद में भी तीन प्रकार के दोषों से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। ये तीन दोष वात, कफ व पित्त है। हमारे शरीर की समस्त आन्तरिक गतिविधियां वात अर्थात शनि के द्वारा ही संचालित होती है। आयुर्वेद शास्त्रों में भी कहा गया हैः- पित्त पंगु कफः पंगु पंगवो मल धातवः। वायुना यत्र नीयते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।। अर्थात पित्त, कफ और मल व धातु सभी निष्क्रिय हैं। स्वयं ये गति नहीं कर सकते । शरीर में विद्यमान वायु ही इन्हें इधर से उधर ले जा सकती है। जिस प्रकार बादलों को वायु ले जाती है। यदि आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो वात ही सभी कार्य समपन्न करता है। इसी वात पर ज्योतिष शास्त्र शनि का नियंत्रण मानता है। शनि के अशुभ होने पर शरीरगत वायु का क्रम टूट जाता है। अशुभ शनि जिस राशि, नक्षत्र को पीडीत करेगा उसी अंग में वायु का संचार अनियंत्रित हो जायेगा, जिससे परिस्थिति अनुसार अनेक रोग जन्म ले सकते है। इसका आभास स्पष्ट है कि जीव-जन्तु जल के बिना तो कुछ काल तक जीवित रह सकते है, लेकिन बीना वायु के कुछ मिनट भी नहीं रहा जा सकता है। नैसर्गिक कुण्डली में शनि को दशम व एकादश भावों का प्रतिनिधि माना गया है। 
            इन भावो का पीडित होना घुटने के रोग , समस्त जोडों के रोग , हड्डी , मांसपेशियों के रोग, चर्च रोग, श्वेत कुष्ठ, अपस्मार, पिंडली में दर्द, दाये पैर, बाये कान व हाथ में रोग, स्नायु निर्बलता, हृदय रोग व पागलपन देता है। रोगनिवृति भी एकादश के प्रभाव में है उदरस्थ वायु में समायोजन से शनि पेट मज्जा को जहां शुभ होकर मजबुत बनाता है वहीं अशुभ होने पर इसमें निर्बलता लाता है। फलस्वरूप जातक की पाचन शक्ति में अनियमितता के कारण भोजन का सहीं पाचन नहीं है जो रस, धातु, मांस, अस्थि को कमजोर करता है। समस्त रोगों की जड पेट है। पाचन शक्ति मजबुत होकर प्याज-रोटी खाने वालो भी सुडौल दिखता है वहीं पंचमेवा खाने वाला बिना पाचन शक्ति के थका-हारा हुआ मरीज लगता है। मुख्य तौर पर शनि को वायु विकार का कारक मानते है जिससे अंग वक्रता, पक्षाघात, सांस लेने में परेशानी होती है। शनि का लौह धातु पर अधिकार है। शरीर में लौह तत्व की कमी होने पर एनीमिया, पीलिया रोग भी हो जाता है। अपने पृथकत्ता कारक प्रभाव से शनि अंग विशेष को घात-प्रतिघात द्वारा पृथक् कर देता है। इस प्रकार अचानक दुर्घटना से फे्रकच्र होना भी शनि का कार्य हो सकता है। 
            यदि इसे अन्य ग्रहो का भी थोडा प्रत्यक्ष सहयोग मिल जाये तो यह शरीर में कई रोगों को जन्म दे सकता है। जहां सभी ग्रह बलवान होने पर शुभ फलदायक माने जाते है, वहीं शनि दुःख का कारक होने से इसके विपरित फल माना है कि- आत्मादयो गगनगैं बलिभिर्बलक्तराः। दुर्बलैर्दुर्बलाः ज्ञेया विपरीत शनैः फलम्।। अर्थात कुण्डली में शनि की स्थिति अधिक विचारणीय है। इसका अशुभ होकर किसी भाव में उपस्थित होने उस भाव एवं राशि सम्बधित अंग में दुःख अर्थात रोग उत्पन्न करेगा। गोचर में भी शनि एक राशि में सर्वाधिक समय तक रहता है जिससे उस अंग-विशेष की कार्यशीलता में परिवर्तन आना रोग को न्यौता देना है। कुछ विशेष योगों में शनि भिन्न-भिन्न रोग देता है। 
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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि को सन्तुलन और न्याय का ग्रह माना गया है.जो लोग अनुचित बातों के द्वारा अपनी चलाने की कोशिश करते हैं,जो बात समाज के हित में नही होती है और उसको मान्यता देने की कोशिश करते है,अहम के कारण अपनी ही बात को सबसे आगे रखते हैं,अनुचित विषमता,अथवा अस्वभाविक समता को आश्रय देते हैं… शनि उनको ही पीडित करता है.शनि हमसे कुपित न हो,उससे पहले ही हमे समझ लेना चाहिये,कि हम कहीं अन्याय तो नही कर रहे हैं,या अनावश्यक विषमता का साथ तो नही दे रहे हैं.यह तपकारक ग्रह है,अर्थात तप करने से शरीर परिपक्व होता है,शनि का रंग गहरा नीला होता है,शनि ग्रह से निरंतर गहरे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर गिरती रहती हैं.शरी में इस ग्रह का स्थान उदर और जंघाओं में है.सूर्य पुत्र शनि दुख दायक,शूद्र वर्ण,तामस प्रकृति,वात प्रकृति प्रधान तथा भाग्य हीन नीरस वस्तुओं पर अधिकार रखता है. पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि सीमा ग्रह कहलाता है,क्योंकि जहां पर सूर्य की सीमा समाप्त होती है,वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है.जगत में सच्चे और झूठे का भेद समझना,शनि का विशेष गुण है.यह ग्रह कष्टकारक तथा दुर्दैव लाने वाला है.विपत्ति,कष्ट,निर्धनता,देने के साथ साथ बहुत बडा गुरु तथा शिक्षक भी है,जब तक शनि की सीमा से प्राणी बाहर नही होता है,संसार में उन्नति सम्भव नही है.शनि जब तक जातक को पीडित करता है,तो चारों तरफ़ तबाही मचा देता है.जातक को कोई भी रास्ता चलने के लिये नही मिलता है.करोडपति को भी खाकपति बना देना इसकी सिफ़्त है. अच्छे और शुभ कर्मों बाले जातकों का उच्च होकर उनके भाग्य को बढाता है,जो भी धन या संपत्ति जातक कमाता है,उसे सदुपयोग मे लगाता है. 
               पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार शरीर में वात रोग हो जाने के कारण शरीर फ़ूल जाता है,और हाथ पैर काम नही करते हैं,गुदा में मल के जमने से और जो खाया जाता है उसके सही रूप से नही पचने के कारण कडा मल बन जाने से गुदा मार्ग में मुलायम भाग में जख्म हो जाते हैं,और भगन्दर जैसे रोग पैदा हो जाते हैं.एकान्त वास रहने के कारण से सीलन और नमी के कारण गठिया जैसे रोग हो जाते हैं,हाथ पैर के जोडों मे वात की ठण्डक भर जाने से गांठों के रोग पैदा हो जाते हैं,शरीर के जोडों में सूजन आने से दर्द के मारे जातक को पग पग पर कठिनाई होती है. दिमागी सोचों के कारण लगातार नशों के खिंचाव के कारण स्नायु में दुर्बलता आजाती है.अधिक सोचने के कारण और घर परिवार के अन्दर क्लेश होने से विभिन्न प्रकार से नशे और मादक पदार्थ लेने की आदत पड जाती है,अधिकतर बीडी सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से क्षय रोग हो जाता है… अधिकतर अधिक तामसी पदार्थ लेने से कैंसर जैसे रोग भी हो जाते हैं.पेट के अन्दर मल जमा रहने के कारण आंतों के अन्दर मल चिपक जाता है,और आंतो मे छाले होने से अल्सर जैसे रोग हो जाते हैं.शनि ऐसे रोगों को देकर जो दुष्ट कर्म जातक के द्वारा किये गये होते हैं,उन कर्मों का भुगतान करता है.जैसा जातक ने कर्म किया है उसका पूरा पूरा भुगतान करना ही शनिदेव का कार्य है. =============================================== 
इन उपायों-मंत्रो से होगा रोग निवारण– 
 शनि ग्रह की पीडा से निवारण के लिये पाठ,पूजा,स्तोत्र,मंत्र, और गायत्री आदि को लिख रहा हूँ,जो काफ़ी लाभकारी सिद्ध होंगे.नित्य १०८ पाथ करने से चमत्कारी लाभ प्राप्त होगा. 
 विनियोग:-
शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:,आपो देवता,शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:. नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें. अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर),देवी: ललाटे (माथा).अभिषटय मुखे (मुख),आपो कण्ठे (कण्ठ),भवन्तु ह्रदये (ह्रदय),पीतये नाभौ (नाभि),शं कट्याम (कमर),यो: ऊर्वो: (छाती),अभि जान्वो: (घुटने),स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़),न: पादयो: (पैर). अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:.अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:.आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:.पीतये अनामिकाभ्याम नम:.शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:.स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:. 
अथ ह्रदयादिन्यास:-शन्नो देवी ह्रदयाय नम:.अभिष्टये शिरसे स्वाहा.आपो भवन्तु शिखायै वषट.पीतये कवचाय हुँ.(दोनो कन्धे).शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट.स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट. 
ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान.चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी.. शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात. 
वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:.औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:. जप मंत्र :- ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: । नित्य २३००० जाप प्रतिदिन.
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इन रोगों-बिमारियों का कारण भी शनि देव/गृह ही होते हैं—–
  1.  ===उन्माद नाम का रोग शनि की देन है,जब दिमाग में सोचने विचारने की शक्ति का नाश हो जाता है,जो व्यक्ति करता जा रहा है,उसे ही करता चला जाता है,उसे यह पता नही है कि वह जो कर रहा है,उससे उसके साथ परिवार वालों के प्रति बुरा हो रहा है,या भला हो रहा है,संसार के लोगों के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं,उसे पता नही होता,सभी को एक लकडी से हांकने वाली बात उसके जीवन में मिलती है,वह क्या खा रहा है,उसका उसे पता नही है कि खाने के बाद क्या होगा,जानवरों को मारना,मानव वध करने में नही हिचकना,शराब और मांस का लगातार प्रयोग करना,जहां भी रहना आतंक मचाये रहना,जो भी सगे सम्बन्धी हैं,उनके प्रति हमेशा चिन्ता देते रहना आदि उन्माद नाम के रोग के लक्षण है.
  2.  ====वात रोग का अर्थ है वायु वाले रोग,जो लोग बिना कुछ अच्छा खाये पिये फ़ूलते चले जाते है,शरीर में वायु कुपित हो जाती है,उठना बैठना दूभर हो जाता है,शनि यह रोग देकर जातक को एक जगह पटक देता है,यह रोग लगातार सट्टा,जुआ,लाटरी,घुडदौड और अन्य तुरत पैसा बनाने वाले कामों को करने वाले लोगों मे अधिक देखा जाता है.किसी भी इस तरह के काम करते वक्त व्यक्ति लम्बी सांस खींचता है,उस लम्बी सांस के अन्दर जो हारने या जीतने की चाहत रखने पर ठंडी वायु होती है वह शरीर के अन्दर ही रुक जाती है,और अंगों के अन्दर भरती रहती है.अनितिक काम करने वालों और अनाचार काम करने वालों के प्रति भी इस तरह के लक्षण देखे गये है. 
  3.  ====भगन्दर रोग गुदा मे घाव या न जाने वाले फ़ोडे के रूप में होता है.अधिक चिन्ता करने से यह रोग अधिक मात्रा में होता देखा गया है.चिन्ता करने से जो भी खाया जाता है,वह आंतों में जमा होता रहता है,पचता नही है,और चिन्ता करने से उवासी लगातार छोडने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है,मल गांठों के रूप मे आमाशय से बाहर कडा होकर गुदा मार्ग से जब बाहर निकलता है तो लौह पिण्ड की भांति गुदा के छेद की मुलायम दीवाल को फ़ाडता हुआ निकलता है,लगातार मल का इसी तरह से निकलने पर पहले से पैदा हुए घाव ठीक नही हो पाते हैं,और इतना अधिक संक्रमण हो जाता है,कि किसी प्रकार की एन्टीबायटिक काम नही कर पाती है. 
  4.  ====गठिया रोग शनि की ही देन है.शीलन भरे स्थानों का निवास,चोरी और डकैती आदि करने वाले लोग अधिकतर इसी तरह का स्थान चुनते है,चिन्ताओं के कारण एकान्त बन्द जगह पर पडे रहना,अनैतिक रूप से संभोग करना,कृत्रिम रूप से हवा में अपने वीर्य को स्खलित करना,हस्त मैथुन,गुदा मैथुन,कृत्रिम साधनो से उंगली और लकडी,प्लास्टिक,आदि से यौनि को लगातार खुजलाते रहना,शरीर में जितने भी जोड हैं,रज या वीर्य स्खलित होने के समय वे भयंकर रूप से उत्तेजित हो जाते हैं.और हवा को अपने अन्दर सोख कर जोडों के अन्दर मैद नामक तत्व को खत्म कर देते हैं,हड्डी के अन्दर जो सबल तत्व होता है,जिसे शरीर का तेज भी कहते हैं,धीरे धीरे खत्म हो जाता है,और जातक के जोडों के अन्दर सूजन पैदा होने के बाद जातक को उठने बैठने और रोज के कामों को करने में भयंकर परेशानी उठानी पडती है,इस रोग को देकर शनि जातक को अपने द्वारा किये गये अधिक वासना के दुष्परिणामों की सजा को भुगतवाता है. 
  5.  =====स्नायु रोग के कारण शरीर की नशें पूरी तरह से अपना काम नही कर पाती हैं,गले के पीछे से दाहिनी तरफ़ से दिमाग को लगातार धोने के लिये शरीर पानी भेजता है,और बायीं तरफ़ से वह गन्दा पानी शरीर के अन्दर साफ़ होने के लिये जाता है,इस दिमागी सफ़ाई वाले पानी के अन्दर अवरोध होने के कारण दिमाग की गन्दगी साफ़ नही हो पाती है,और व्यक्ति जैसा दिमागी पानी है,उसी तरह से अपने मन को सोचने मे लगा लेता है,इस कारण से जातक में दिमागी दुर्बलता आ जाती है,वह आंखों के अन्दर कमजोरी महसूस करता है,सिर की पीडा,किसी भी बात का विचार करते ही मूर्छा आजाना मिर्गी,हिस्टीरिया,उत्तेजना,भूत का खेलने लग जाना आदि इसी कारण से ही पैदा होता है.इस रोग का कारक भी शनि है, 
  6.  ===पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार अगर लगातार शनि के बीज मंत्र का जाप जातक से करवाया जाय,और उडद जो शनि का अनाज है,की दाल का प्रयोग करवाया जाय,रोटी मे चने का प्रयोग किया जाय,लोहे के बर्तन में खाना खाया जाये,तो इस रोग से मुक्ति मिल जाती है. 
  7. ===इन रोगों के अलावा पेट के रोग,जंघाओं के रोग,टीबी,कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है. ———————————————————————————-

 उदर रोग का एक महत्व पूर्ण प्रयोग — 
 इस साधना को करने से से पेट की तमाम बिमारिओ से निज़ात पाई जा सकती है | बद हज्मी, पेट गैस ,दर्द और आव का पूर्ण इलाज हो जाता है | इसे ग्रहन काल ,दीपावली और होली आदि शुभ महूरतों में कभी भी सिद्ध किया जा सकता है | आप दिन या रात में कभी भी कर सकते है | इस मंत्र को १०८ वार जप कर सिद्ध कर ले प्रयोग के वक़्त ७ वार पानी पे मन्त्र पढ़ फुक मारे और रोगी को पिला दे जल्द ही फ़ायदा होगा | 
 साबर मन्त्र — || ॐ नमो अदेस गुरु को शियाम बरत शियाम गुरु पर्वत में बड़ बड़ में कुआ कुआ में तीन सुआ कोन कोन सुआ वाई सुआ छर सुआ पीड़ सुआ भाज भाज रे झरावे यती हनुमत मार करेगा भसमंत फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा || 
 आधा सिर दर्द — आधा सिर दर्द और माई ग्रेन एक बहुत बड़ी समस्या है | उस के लिए एक महत्व पूर्ण मन्त्र दे रहा हू | इसे भी ग्रहन काल दीपावली आदि पे उपर वाले तरीके से सिद्ध कर ले | प्रयोग के वक़्त एक छोटी नमक की डली ले कर उस पर ७ वार मन्त्र पढ़े और पानी में घोल कर माथे पे लगादे आधे सिर की दर्द फोरन बंद हो जाएगी | 
 साबर मन्त्र :- को करता कुडू करता बाट का घाट का हांक देता पवन बंदना योगीराज अचल सचल || 
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शनि की जडी बूटियां—– 
बिच्छू बूटी की जड या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है.
 शनि सम्बन्धी दान पुण्य—– 
पुष्य,अनुराधा,और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समय में शनि पीडा के निमित्त स्वयं के वजन के बराबर के चने,काले कपडे,जामुन के फ़ल,काले उडद,काली गाय,गोमेद,काले जूते,तिल,भैंस,लोहा,तेल,नीलम,कुलथी,काले फ़ूल,कस्तूरी सोना आदि दान की वस्तुओं शनि के निमित्त दान की जाती हैं. 
शनि सम्बन्धी वस्तुओं की दानोपचार विधि—— 
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067के अनुसार जो जातक शनि से सम्बन्धित दान करना चाहता हो वह उपरोक्त लिखे नक्षत्रों को भली भांति देख कर,और समझ कर अथवा किसी समझदार ज्योतिषी से पूंछ कर ही दान को करे.शनि वाले नक्शत्र के दिन किसी योग्य ब्राहमण को अपने घर पर बुलाये.चरण पखारकर आसन दे,और सुरुचि पूर्ण भोजन करावे,और भोजन के बाद जैसी भी श्रद्धा हो दक्षिणा दे.फ़िर ब्राहमण के दाहिने हाथ में मौली (कलावा) बांधे,तिलक लगावे.जिसे दान देना है,वह अपने हाथ में दान देने वाली वस्तुयें लेवे,जैसे अनाज का दान करना है,तो कुछ दाने उस अनाज के हाथ में लेकर कुछ चावल,फ़ूल,मुद्रा लेकर ब्राहमण से संकल्प पढावे,और कहे कि शनि ग्रह की पीडा के निवार्णार्थ ग्रह कृपा पूर्ण रूपेण प्राप्तयर्थम अहम तुला दानम ब्राहमण का नाम ले और गोत्र का नाम बुलवाये,अनाज या दान सामग्री के ऊपर अपना हाथ तीन बार घुमाकर अथवा अपने ऊपर तीन बार घुमाकर ब्राहमण का हाथ दान सामग्री के ऊपर रखवाकर ब्राहमण के हाथ में समस्त सामग्री छोड देनी चाहिये.इसके बाद ब्राहमण को दक्षिणा सादर विदा करे.जब ग्रह चारों तरफ़ से जातक को घेर ले,कोई उपाय न सूझे,कोई मदद करने के लिये सामने न आये,मंत्र जाप करने की इच्छायें भी समाप्त हो गयीं हों,तो उस समय दान करने से राहत मिलनी आरम्भ हो जाती है.सबसे बडा लाभ यह होता है,कि जातक के अन्दर भगवान भक्ति की भावना का उदय होना चालू हो जाता है और वह मंत्र आदि का जाप चालू कर देता है.जो भी ग्रह प्रतिकूल होते हैं वे अनुकूल होने लगते हैं.जातक की स्थिति में सुधार चालू हो जाता है.और फ़िर से नया जीवन जीने की चाहत पनपने लगती है.और जो शक्तियां चली गयीं होती हैं वे वापस आकर सहायता करने लगती है | 
क्या करें उपाय-- किसी अनुभवी ज्योतिषीे या हस्तरेखा विशेषज्ञ से सलाह लेकर विधिपूर्वक मूंगा रत्न धारण करने से भी पेट के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। 
 इसके अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ घरेलू उपाय इस प्रकार हैं-- रात को दूध में आधा चम्मच हल्दी डालकर पीना चाहिए। एक चुटकी छोटी हर्र गर्म पानी में मिलाकर पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है। जीरा तथा सेंधा नमक पीसकर गर्म पानी के साथ खाने से भूख में कमी, पेट फूलने, दस्त, कब्ज और खट्टी डकारों से मुक्ति मिलती है। 
 एक गिलास गर्म पानी में दो चम्मच शहद और एक नींबू का रस डालकर पीने से अधिक चर्बी व मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है। एक गिलास पानी में पांच ग्राम फिटकरी घोलकर पीने से हैजे में लाभ होता है। रात को सोने के पहले दूध में मुनक्का उबालकर पीने से कब्ज से छुटकारा मिलता है। यदि समय रहते किसी योग्य हस्त रेखा विशेषज्ञ अथवा अनुभवी विद्वान् ज्योतिषी से सलाह लेकर उक्त उपाय किए जाएं, तो पेट के रोगों से रक्षा हो सकती है।

इन उपायों द्वारा पाएं डरावने सपनों से मुक्ति/छुटकारा

Get-rid-of-the-nightmare-of-these-measures-escape-इन उपायों द्वारा पाएं डरावने सपनों से मुक्ति/छुटकारालोग कई बार यह शिकायत करते है कि वे रात में किसी डरवाने सपने के कारण अचानक से उठ जाते हैं। और यह समस्या केवल एक बार नहीं हर बार हो रहीे हो तो यह एक बड़ी परेशानी बन सकती है।स्वप्न के विभिन्न शुभ-अशुभ संकेत शास्त्रों में उल्लेखित हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे द्वारा देखा गया सपना यदि शुभ फल दे तो हमें खुशी होती है लेकिन वहीं दूसरी ओर यदि यह किसी अशुभ घटना का संकेत देता है तो हम पहले ही डर जाते हैं।
                   स्वप्न ज्योतिष की माने तो सपने चार प्रकार के होते हैं- पहला दैविक, दूसरा शुभ, तीसरा अशुभ और चौथा मिश्रित। ये सभी भविष्य में होने वाली अच्छी-बुरी घटनाओं के बारे में हमें बताते हैं। कुछ सपने जल्दी सच हो जाते हैं तो कुछ देर से। कई बार संकेत तो दूर, कुछ सपने हमें उसमें देखे गए दृश्यों से ही डरा देते हैं। हम इतना भयभीत होकर उठते हैं मानों हमारी जान जाने वाली हो। सपने में भूत, आत्मा, किसी की मौत, अपनी मौत या फिर कोई भयानक दृश्य हमें पसीने से भरी हुई हालत में नींद से उठाता है।
 जानिए कुछ सपने हमें आने वाली मुसीबत के लिए पहले से चेतावनी देते है
  1. सपने में कई बार हम ऐसी घटना देखते है जो हमारे भूतकाल से जुड़ी हुई होती है, या फिर वो देखते है जो आने वाले भविष्य में होने वाला है। कई बार हम अपने जीवन में जैसी सोच रखते है, जैसे माहोल में रहते है वैसा ही रात को सपना देखते है। सपने हमेशा अधूरे नहीं रहते है, वे कई बार पुरे भी होते है, कभी सपने तुरंत पुरे होते है, तो कभी थोड़े समय बाद अपना असर देते है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर सपने का कोई न कोई मतलब और उनका अर्थ होता है। सपने हमारे आने वाले भविष्य का आइना है, वो हमें आने वाली मुसीबत के लिए पहले से चेतावनी देते है। तब हम इस चिंता में पड़ जाते हैं कि यदि यह सपना सच हो गया तो? यदि सपने में हमने जो कुछ भी देखा वह आने वाले दिनों में घटित हो गया तो? तब हम क्या करेंगे? लेकिन घबराइए नहीं, इसके भी उपाय शास्त्रों में मौजूद हैं। 
  2.  यदि स्वप्न अधिक भयानक और रात्रि 12 से 2 बजे देखा जए तो तुरंत श्री शिव का नाम स्मरण करें। शिव जी के बीज मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हुए सो जाएं। तत्पश्चात् ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि करके शिवमंदिर में जाकर जल चढ़ाएं पूजा करें व पुजारी को कुछ दान करें। इससे संकट नष्ट हो जाता है।
  3. यदि स्वप्न 4 बजे के बाद देखा गया है और स्वप्न बुरा है, तो प्रातः उठकर बिना किसी से कुछ बोले तुलसी के पौधे से पूरा स्वप्न कह डालें। कोई दुष्परिणाम नहीं होगा। स्नान के बाद “ॐ नमः शिवाय” का एक माला, यानि कि कम से कम 108 बार जप करें। 
  4. ऐसा माना जाता है कि जब कभी किसी भी प्रकार का बुरा सपना देखा जाए, तो हनुमानजी को याद करें। वह ना केवल सपनों के माध्यम से होने वाले नुकसान को, बल्कि मनुष्य पर होने वाले हर प्रकार के बुरे प्रभावों को नष्ट करने में सक्षम हैं। 
  5. हनुमान जी सब प्रकार का अनिष्ट दूर करने वाले हैं। बुरे स्वप्न का अनिष्ट दूर करने के लिए सुंदरकांड, बजरंग बाण, संकटमोचन स्तोत्र अथवा हनुमान चालीसा का पाठ भी सांयकाल के समय किया जा सकता है। -
  6. यदि स्वप्न बहुत बुरा है और आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है, तो सुबह उठकर सफेद काग़ज़ पर स्वप्न को लिखें फिर उसे जला दें। राख नाली में पानी डाल कर बहा दें। फिर स्नान करके एक माला शिव के मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करें। दुष्प्रभाव नष्ट हो जाएगा। 
  7. स्वप्न ज्योतिष के अनुसार रात के पहले पहर में देखे गए सपने का फल एक साल के अंदर मिलता है। दूसरे पहर में देखे गए सपने का फल छ: महीने में मिलता है। 
  8. तीसरे पहर में देखे गए सपने का फल तीन महीने में मिलता है और चौथे पहर यानी सुबह देखे गए सपने का फल तुरंत मिलता है। 
  9. यदि बुरा सपना देखकर यदि रात में ही किसी को बता दें तो उस सपने का फल नष्ट हो जाता है अथवा सुबह उठकर भगवान शंकर को नमस्कार कर उसके बाद तुलसी के पौधे को जल चढाएं तो भी उस बुरे सपने का फल नष्ट हो जाता है।
  10.  रात को सोने से पहले भगवान विष्णु, शंकर, महर्षि अगस्त्य और कपिल मुनि का स्मरण करने से बुरे सपने नहीं आते। 

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यह हैं उपाय डरावने सपने से मुक्ति/छुटकारा पाने के-- 
  1.  सिरहाने में चाकू को रखें--- जिन लोगों को अक्सर रात में बुरे सपने आने की वजह से अचानक नींद टूटती हो तो वे रात में अपने सिरहाने के नीचे एक चाकू रखें। यदि आप चाकू नहीं रख सकते हो तो किसी भी तरह की नुकीली वस्तु आप जरूर रखें। जैसे कांटे वाली चम्मच, कैंची या फिर नेल कटर आदि।चाकू न होने पर कैंची, नेल-कटर, कांटा आदि भी तकिए के नीचे रख सकते हैं। जिससे रात को डर नहीं लगता।
  2.  पीले रंग के चावल--- तकिये के नीचे पीले चावलों को एक कपड़े में बांधकर सिरहाने के नीचे रख दें। हल्दी में चावलों को मिलाकर आप पीले चावल बना सकते हैं। इससे बुरे सपने नहीं आते हैं। 
  3.  बहुत फायदा करेगी छोटी इलायची--- रात में सोने से पहले आप अपने तकिये के नीचे पांच छोटी इलायची को किसी कपड़े में बांध लें और उसे अपने सिरहाने के नीचे रख दें। इससे रात को बुरे सपने और उनसे नींद टूटने की समस्या ठीक हो जाएगी। 
  4.  तांबे के बर्तन में पानी--- नींद यदि रात के समय में बार बार टूट जाती हो या नींद के समय में डर लगता हो तो आप अपने बिस्तर के पास में एक पानी से भरा तांबे का बर्तन रख दें। और सुबह के समय में इस पानी को किसी गमले या पौधों के उपर डालें। इस उपाय से आपको फायदा मिलेगा। 

 इसके अलावा कुछ बातों का जरूर ध्यान रखें, जैसे-- 
  1.  भूलकर भी अपने बिस्तर के नीचे कभी जूता या चप्पल ना रखें।पलंग के आस-पास अौर नीचे रखे जूते-चप्पल भी डर अौर बुरे सपनों का कारण बनता है। 
  2.  चादर एकदम गहरे व गाढ़े रंग की ना हो।जिस चादर पर डार्क या हिंसक जानवरों का प्रिंट हो उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। फटी हुई चादर का भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 
  3.  रात को सोने से पहले अपने बिस्तर को जरूर साफ करें । पैरों को धो कर और साफ करके अपने बिस्तर पर जाएं।गंदे या अव्यवस्थित बिस्तरे पर सोने से भी डर अौर बुरे सपने आते हैं। इसलिए सोने से पूर्व बिस्तरा साफ करके सोएं। 
  4.  महिलाएं खास बात का ध्यान रखें रात को बाल बांधकर सोना चाहिए। रात को बाल खुले रखकर सोने से भी बुरे सपने आते हैं।

आपकी शादी में अवरोध/बाधा के ये वास्तुदोष हो सकते हैं कारण

 A-breakdown-in-your-marriage-barrier-may-cause-the-Vaastudosh-आपकी शादी में अवरोध/बाधा के ये वास्तुदोष हो सकते हैं कारण
वास्तुशास्‍त्र एक व‌िज्ञान है जो द‌िशा एवं आपके आस-पास मौजूद चीजों से उत्पन्न उर्जा के प्रभाव को बताता है।हमारे जीवन में वास्तु का महत्व बहुत ही आवश्यक है। इस विषय में ज्ञान अतिआवश्यक है। वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार वास्तुशास्त्र पूर्णत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है, अत: वास्तु दोष का प्रभाव मानव जीवन पर अवश्य पड़ता है। वास्तु दोष रहित भवन में मनुष्य को शांति प्राप्त होती है। वास्तु दोष होने पर उस गृह में निवास करने वाले सदस्य किसी न किसी रूप में कष्ट स्वरूप जीवन व्यतीत करते हैं। वास्तु दोष से व्यक्ति के जीवन में बहुत ही संकट आते हैं। ये समस्याएँ घर की सुख-शांति पर प्रभाव डालती हैं। 
             वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि वास्तु को ध्यान में रखकर घर का निर्माण किया जाए तो वास्तुदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। वर्तमान के बदलते दौर में वास्तु का महत्व दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। आजकल कई बड़े-बड़े बिल्डर व इंटीरियर डेकोरेटर भी घर बनाते व सजाते समय वास्तु का विशेष ध्यान रखते हैं। दी में देरी होना पैरेंट्ंस के लिए चिंता का सबब हो सकता है। वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार आपके घर में कुछ वास्तु दोष की वजह से भी शादी विवाह में देरी हो सकती है। वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि आपके घर में वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार उर्जा अगर अनुकूल है तो आपकी प्रगत‌ि होगी और प्रत‌िकूल उर्जा होने पर परेशानी आती है और यह जीवन के हर क्षेत्र पर लागू होता है चाहे वह आपका वैवाह‌िक संबंध हों या फिर व‌िवाह की चाहत। 
 वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार आपके विवाह में देरी के ये वास्तुदोष हो सकते हैं कारण-- 
  1. ---वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार व‌िवाह योग्य कुंवारे लड़कों को दक्ष‌िण और दक्ष‌िण पश्च‌िम द‌िशा में नहीं सोना चाह‌िए। इससे व‌िवाह में बाधा आती है। माना जाता है क‌ि इससे अच्छे र‌‌िश्ते नहीं आते हैं।
  2.  ---- वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार किसी भी भवन में पानी का निकास उत्तर- पूर्व की ओर होना वस्तु शास्त्र सम्मत है परन्तु वायव्य कोण में भवन के पानी का निकास होना भी वास्तु दोष है। उपरोक्त दोषों के कारण भवन में वास्तु दोष होता है। वास्तु दोष के फलस्वरूप संतान संबंधी कष्ट, पीड़ा और संतानहीनता का कष्ट देखना पड़ता है। 
  3. ---काले रंग के कपड़े और दूसरी चीजों का इस्तेमाल कम करना चाह‌िए। 
  4. ---वास्तु के मुताबिक जिन लड़कों की शादी में देरी हो रही है तो उनका बेडरुम साउथ-ईस्ट दिशा से हटा देना चाहिए। 
  5.  --- वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि किसी भवन में उत्तर-पश्चिम वायव्य कोण में रसोई हो तो वास्तु दोष होता है। इस दोष के कारण परिवार में संतान पक्ष से, कष्टों एवं दुखों का सामना करना पड़ता है। 
  6. ---- शादी में देरी वाले को अपना ब‌िस्तर इस तरह रखना चाह‌िए ताक‌ि सोते समय पैर उत्तर और स‌िर दक्ष‌िण द‌िशा में हो। सोने के इस न‌ियम की अनदेखी से बचना चाह‌िए।
  7.  ---- आपके घर के ज‌िन कमरों में एक से अध‌िक दरवाजे हों उस कमरे में व‌िवाह योग्य लड़कों को सोना चाह‌िए। ज‌िन कमरों में हवा और रोशनी का प्रवेश कम हो उन कमरों में नहीं सोना चाह‌िए। 
  8. ---आपके कमरों का रंग डार्क यानी गहरा नहीं होना चाह‌िए। दीवारों का रंग चमकीला, पीला, गुलाबी होना शुभ होता है। 
  9. ------ वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार वास्तु शास्त्र के अनुसार विवाह योग्य युवक-युवती जिस पलंग पर सोते हैं, उसके नीचे लोहे की वस्तुएं या व्यर्थ का सामान नहीं रखना चाहिए। ऐसा होने से उनके विवाह योग में बाधा उत्पन्न होती है। 
  10. ----ज्योतिष विज्ञान के अनुसार जन्म लग्र कुंडली में पंचम भाव संतान की स्थिति का विवरण देता है। इसका विस्तृत अर्थ यह हुआ कि यदि किसी भवन में वास्तु का वायव्य कोण दूषित है तो उस गृह स्वामी की जन्म लग्र कुंडली में भी पंचम एवं षष्ठम भाव भी दूषित व दोषयुक्त होंगे अथवा जिस जातक की जन्म कुंडली में ये दोनों भाव दूषित होंगे वह अवश्य ही वायव्य दोष अर्थात् वास्तु दोष से भी पीड़ित होगा। 
  11.  ----ऐसी जगह पर नहीं सोएं जहां बीम लटका हुआ द‌िखाई दे।
  12.  --- वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार वायव्य कोण उत्तर और पश्चिम के संयोग से निर्मित होने वाला कोण या स्थान है। हमारे शास्त्रों के अनुसार यहां चंद्रमा का आधिपत्य होता है। इसके दूषित होने से संतान कष्ट होता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार जन्म लग्र कुंडली के पंचम भाव एवं षष्ट भाव में दोष होने से वायव्य कोण में दोष पैदा होता है क्योंकि जन्म कुंडली में पंचम भाव एवं षष्ठम भाव इसके कारक भाव हैं। 
  13. ---- यदि कोई और भी आपके साथ कमरे में रहता है तो अपना ब‌िछावन दरवाजे के नजदीक रखें।
  14.  ---यदि भवन में वायव्य कोण उत्तर-पूर्व के ईशान कोण से नीचा हो तो भवन में वास्तु दोष होता है। इस दोष के कारण संतान के विवाह में बाधा उत्पन्न होती है। 
  15. ----वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार विवाह में देरी हो रही है तो इस बात का ध्यान रखें कि घर में अंडरग्राउंड वाटर टैंक साउथ-वेस्ट कॉर्नर में न रखें। वास्तु के मुताबिक घर की साउथ-वेस्ट दिशा में अंडरग्राउंड वाटर टैंक होने से शादी में देरी हो सकती है। 
  16.  ----- वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि कोई विवाह योग्य युवक-युवती विवाह के लिए तैयार न हो, तो उसके कक्ष की उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से वह विवाह के लिए मान जाता है। 
  17. ----वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार यदि विवाह प्रस्ताव में व्यवधान आ रहे हों तो विवाह वार्ता के लिए घर आए अतिथियों को इस प्रकार बैठाएं कि उनका मुख घर में अंदर की ओर हो और उन्हें घर का दरवाजा दिखाई न दे। ऐसा करने से बात पक्की होने की संभावना बढ़ जाती है। 
  18. ----वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार किसी भी घर के मध्य में सीढियां होना भी विवाह में देरी का एक कारण है। इसलिए वास्तु के मुताबिक घर का मध्य हमेशा खाली रखना चाहिए।

जानिए राहु को और जानिए कैसे करें राहु को प्रसन्न

हिंदू धर्म के ज्योतिषियों के अनुसार माना जाता है कि हर कोई किसी न किसी ग्रह दोष से परेशान रहता है। जिसके कारण उसके जीवन में हमेशा समस्याएं बनी रहती है। जिसके लिए हम ऐसे उपाय करते है। जिससे इऩ समस्याओं से निजात मिल जाएं, लेकिन जब तक आप यह नही जान पाएगे कि कौन सा ग्रह का दोष है। तब तक न तो उस ग्रह को शांत कर सकते है न ही आप परेशानियों से निजात पा सकते है। हिंदु धर्म ग्रंथों में राहु और केतू दो ग्रह हैं जिन्‍हे दोष के रूप में जाना जाता है। 
Rahu-and-Rahu-जानिए राहु को और जानिए कैसे करें राहु को प्रसन्न         राहु और केतू, एक ही असुर का नाम है जिसने अमृत मंथन के दौरान छल से अमृत पी लिया था और जब उसने आधा अमृत पी लिया तब पता चला कि वह असुर है तो भगवान विष्‍णु ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। वह मरा नहीं, लेकिन सि‍र और धड़ दो हिस्‍सों में बंट गया, जिसे राहु-केतु के नाम से जाना गया। ये एक ग्रह बन गए जो लोगों की कुंडली में दोष माने जाते हैं। हिंदू धर्म में इन्‍हे दूर करने के कई उपाय हैं, जिन्‍हे लोगों के द्वारा अपनाया जाता है। अगर आपकी कुंडली में राहु दोष है तो यह आपको बुरे प्रभाव देगा। लेकिन समस्या यह है कि आप कैसे पहचानेगे कि राहु दोष है। तो हम आपको बताते है कि किन लक्षणों से आप जान सकते है कि राहु दोष है कि नही। जानिे राहु दोष के लक्षण और इससे निजात पाने के सरल उपाय। 
 लक्षण- अगर आपकी कुंडली में राहु दोष है तो आपको मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, स्वयं को ले कर ग़लतफहमी, आपसी तालमेल में कमी, बात बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना और अपशब्द बोलना साथ ही अगर आपकी कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ हौ तो आपके हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं। कई बार किसी समय-विशेष में कोई ग्रह अशुभ फल देता है, ऐसे में उसकी शांति आवश्यक होती है। गृह शांति के लिए कुछ शास्त्रीय उपाय प्रस्तुत हैं। इनमें से किसी एक को भी करने से अशुभ फलों में कमी आती है और शुभ फलों में वृद्धि होती है। 
 राहु मंत्र- 
 ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्। सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्। 
 ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:। 
 ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु प्रचोदयात्।
      ग्रहों के मंत्र की जप संख्या, द्रव्य दान की सूची आदि सभी जानकारी एकसाथ दी जा रही है। मंत्र जप स्वयं करें या किसी कर्मनिष्ठ ब्राह्मण से कराएं।दान द्रव्य सूची में दिए पदार्थों को दान करने के अतिरिक्त उसमें लिखे रत्न-उपरत्न के अभाव में जड़ी को विधिवत् स्वयं धारण करें, शांति होगी , राहु के लिए :समय रात्रिकालभैरव पूजन या शिव पूजन करें। काल भैरव अष्टक का पाठ करें। राहु मूल मंत्र का जप रात्रि में 18,000 बार 40 दिन में करें।
मंत्र : 'ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:'। 
        दान-द्रव्य :गोमेद, सोना, सीसा, तिल, सरसों का तेल, नीला कपड़ा, काला फूल, तलवार, कंबल, घोड़ा, सूप।शनिवार का व्रत करना चाहिए। भैरव, शिव या चंडी की पूजा करें। 8 मुखी रुद्राक्ष धारण कर गोमेद राहु रत्नगोमेद एक रत्न है जिसे राहु ग्रह से समबन्धित किसी भी विषय के लिए धारण करने हेतु ज्योतिषशास्त्री परामर्श देते हैं. गोमेद न सिर्फ राहु ग्रह की बाधाओं को दूर करता है बल्कि, गोमेद कई प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से भी निजातदिलाता है | गोमेद एक ऐसा रत्न है जो नज़र की बाधाओं, भूत-प्रेत एवं जादू-टोने से भी सुरक्षा प्रदान करता है. गोमेद में इतनी सारी खूबियां हैं जिनसे व्यक्ति के जीवन की बहुत सीमुश्किलें दूर हो सकती हैं. लेकिन इसे किसी अच्छे ज्योतिषी से सलाह लेकर धारण करना चाहिए. 
 गोमेद क्या है ??
 गोमेद को अंग्रेजी में Agate, Hessonit, Onyx के नाम से जाना जाता है. संस्कृत में गोमद को गोमेदक, पीत रक्तमणि, पिग स्फटिक कहा गया है. सुलेमानी, हजार यामनी नाम से भी गोमद को जाना जाता है. गोमद को बंगाल में मोदित मणि के नाम से पुकारते हैं. गोमेद राहु का मुख्य रत्न है. इस रत्न में राहु की शक्तियां एवं गुण मौजूद है. गोमेद राहु की नकारात्मक उर्जा को सकारत्मक उर्जा में परिवर्तित करके राहु के कष्टकारी प्रभाव से व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है. 
 गोमेद की पहचान--- 
 असली गोमेद को उसके रंग एवं चमक से पहचाना जा सकता है. गोमूत्र से मिलता जुलता रंग होने के कारण इसे गोमेद कहा जाता है. यह एक चमकीला पत्थर होता है जो दिखने में शहद के रंग के समान भूरा होता है. गोमेद धुएं के सामन एवं काले रंग का भी होता है. गोमेद के ऊपर जब प्रकाश डालाजाता है जो उससे जो रोशनी पार करके निकली है उसका रंग गोमूत्र जैसा दिखता है. असली गोमेद कीपहचान इस तरह आसानी से की जा सकती है. शुद्ध गोमेद चिकना, चमकीला एवं सुन्दर दिखता है. 
 गोमेद किसे धारण करण चाहिए--- 
 कुण्डली में राहु जिस भाव में हो उस भाव के शुभ फल को बढ़ाने के लिए राहु रत्न गोमेद पहनना चाहिए (Hessonite should be worn to strengthen the house where Rahu is located). ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राहु तीसरे, छठे भाव में हो तो गोमेद पहनना चाहिए. मेष लग्न की कुण्डली में यदि राहु नवें घर मेंहै तो गोमेद पहनने से भाग्य बलवान होता है. राहु यदि दशम अथवा एकादश भाव में है तब भी गोमेदधारण करना उत्तम होता है. लग्न में राहु होने पर स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों को कम करने हेतु गोमद पहनना फायदेमंद होता है. राजनीति एवं न्याय विभाग से जुड़े लोगों की कुण्डली में राहु मजबूत होने पर सफलता तेजी से मिलती है. राहु को बलवान बनाने के लिए इन्हें गोमेद रत्न धारण करना चाहिए.गोमेद धारण करने का समय (When to wear Gomed / Hessonite)कोई भी रत्न तब अधिक शुभ फल देता है जब वह शुभ समय में धारण किया जाता है. गोमेद रत्न धारण करने का शुभ और उचित समय तब माना जाता है जब राहु की महादशा अथवा दशा चल रही हो.गोमेद नहीं पहनें (Who should not wear Gomed / Hessonite)
         रत्न विज्ञान के अनुसार जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में राहु अष्टम या द्वादश भाव में हो तो गोमेद धारण करना उपयुक्त नहीं होता है.गोमेद के उपरत्न (The sub-gemstones of Gomed / Hessonite)गोमेद रत्न जो धारण नहीं कर सकते वह चाहें तो इसका उपरत्न पहन सकते हैं. गोमेद के उपरत्न हैं अकीक, तुरसा एवं साफीगोमेद धारण में सावधानी (Precautions while wearing Gomed /Hessonite) गोमेद रत्न धारण करने से पहले यह जांच करलें कि रत्न में दोष नहीं हो. दोषपूर्ण रत्न धारण करने से फायदे की बजाय नुकसान हो सकता है (Do not wear a flawed Hessonite). जिस गोमेद में लाल या काले धब्बे हों उसे पहनने से दुर्घटना की आशांका रहती है. गोमेद यदि चमकहीन हो तो धारण करने वाले व्यक्ति के सम्मान में कमी आती है. जिस गोमेद में अनेक रंगों की परछाई हों उसे पहनने से धन की हानि होती है. 
        ऐसे गोमेद को नहींपहनना चाहिए.गोमेद से लाभ (Benefits from Gomed / Hessonite)गोमेद पहनने से राहु का अशुभ प्रभाव दूर होता है. कालसर्प दोष के कष्टों से भी बचाव होता है. जिन लोगों की सेहत अक्सर खराब रहती है उन्हें भी गोमेद पहनने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है. पाचन सम्बन्धी रोग, त्वचा रोग, क्षय रोग तथा कफ-पित्त को भी यह संतुलित रखता है. आयुर्वेद के अनुसार गोमेद के भस्म का सेवन करने से बल एवं बुद्धि बढ़ती है. पेट की खराबी में गोमद का भस्म काफी फायदेमंद होता है. राहु तीव्र फल देने वाला ग्रह है. गोमेद पहनने से राहु से मिलने वाले शुभ फलों में तेजी आती है. व्यक्ति को मान-सम्मान एवं धन आदि प्राप्त होता है ,
         राहु-केतु का उपाय( Remedy for Rahu - Ketu) अधिकांश व्यक्ति राहु-केतु से पीड़ित रहते हैं। ऐसे जातकों के लिए शिव की पूजा करना सर्वथा लाभकारी है। इसके साथ ही छोटे-छोटे उपाय करें, तो राहु-केतु निस्तेज होंगे शिव भक्त बड़े उत्साह से हर साल श्रावण मास की प्रतीक्षा करते हैं। सत्यम् शिवम् और सुंदरम् के प्रतीक भगवान शिव सभी जीवों के लिए परम कल्याणकारी माने जाते हैं। इनके शिव नाम में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन का महीना भगवान शंकर को अतिप्रिय है। ज्योतिष शास्त्र में भी इस माह का महत्व बताया गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर भक्त अपने सारे दु:खों से निजात पाना चाहते हैं, तो इसमाह उन ग्रहों को शांत कर सकते हैं, जो उनकी कुंडली में अशुभ भाव में बैठे हुए हैं। ऐसे ही दो ग्रह हैं, राहु और केतु। जिस तरह शनि को प्रसन्न करने के लिए शिव जी की पूजा करना शुभ कहा गया है, उसी तरह सावन माह में इन ग्रहों के लिए विशेष पूजा लाभकारी बताई जाती है। अगर आपके ऊपर शनि-राहु या अशुभ ग्रहों की दशा चल रही है, तो आप पूरे माह शिवलिंग पर प्रतिदिन काले तिल चढ़ाएं तथा तामसिक भोजन का त्याग करें। 
         जन्मकुंडली के अनुसार जो ग्रह आपके लिए सकारात्मक हो, इस माह में उस ग्रह का रत्न धारण कर उसे मजबूत करने से भी न चूकें। अगर आपकी कुंडली में राहु और केतु अशुभ स्थान पर बैठे हों, तो श्रावण मास में इनका भी उपाय कर लेना श्रेयस्कर रहता है। दरअसल राहु और केतु कुंडली में कालसर्प योग बनाते हैं। यह ऐसा योग है, जो आपके बनते हुए कामों में बाधा डाल देता है। अगर राहु और केतु के बीच में सारे ग्रह आ जाएं या फिर राहु सूर्य अथवा चंद्र के साथ आ जाए, तो जातक की कुंडली में बाधा दिखाई देती है। कुंडली में इनकी महादशा और अंतर्दशा भी होतीहै। इसलिए श्रावण मास में शिव की पूजा से इन्हें निस्तेज करना सबसे प्रमुख उपाय माना जाता है। अगर आप इस माह में बुधवारया शनिवार के दिन रुद्राभिषेक करते हैं, तो आपको राह-केतु की अशुभ छाया से मुक्ति मिल सकती है। इसके अलावा नदी में चांदी के नाग-नागिन प्रवाहित करने से कालसर्प योग नाम का दोष भी मिटता है। 
      यदि आप श्रावण मास में आने वाली नाग पंचमी के दिन शिव मंदिर में शिवलिंग पर तांबे के नाग की स्थापना करवाएं, तो यह लाभप्रद होगा। इससे सर्प बाधा भी दूर होती है। आपकी कुंडली में राहु पांचवें घर में हो, तो ऐसे जातक को संतान सुख बाधित होता है। इसके लिए सावन में व्रत रखें और नाग-नागिन को कद्दू या सीताफल में रखकर बहाएं। आपको शीघ्र इस दोष से मुक्ति मिल जाएगी।यदि आप केतु से परेशान हैं, तो शिव के साथ भैरव की पूजा करें तथा शनिवार को कुत्तों को गुलाबजामुन या दूसरी मीठी चीजें खिलाएं। असल में भैरव की सवारी कुत्ता मानी गई है। इसके साथ ही चितकबरे वस्त्र दान करें। केतु की पीड़ा शांत होगी। शिव मंदिर में ध्वज लगाने से भी केतु शांत होता है। केतु को ध्वज का प्रतीक भी माना जाता हैै । 
जानिए राहु की महादशा में अन्य ग्रह की अन्तर्दशा आने पर क्या उपाय करने चाहिए--- 
 "कुंडली में राहु की स्तिथि/पोजीशन ये बताती है की राहु अपनी महादशा मैं कैसा फल देगा। परन्तु राहु कितना भी शुभ क्यों न हो ये तो पक्का है की कुछ तो अशुभ करेगा ही। राहु को सर्प का मुंह कहा गया ये और ये कैसे हो सकता है की सर्प का मुंह कुछ भी बुरा न करे। नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है।" 
 राहु महादशा उपाय--- महादशा अन्तर्दशा उपाय--- 
【१】राहू की महादशा में राहू का अंतर दान करें उड़द दाल, काले तिल, नीले कपडे, गरम कम्बल सफाई कर्मचारी अथवा नीची जाती को, चीटी को शुगर भगवन भैरव के मंदिर में रविवार को शराब चदाएं और तेल का दीपक जलाएं शराब का सेवन बिलकुल न करें 
 【2】राहू की महादशा में बृहस्पति, गुरु का अंतर स्वर्ण से बनी भगवन शिव की मूर्ति की पूजा करें किसी अपांग छात्र की पड़ी या इलाज़ में सहायता करें शिव मंदिर में नित्य झाड़ू लगायें पीले रंग के फूल से शिव पूजन करें शैक्षणिक संस्था के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था कराएं 
【३】 राहू की महादशा में शनि का अंतर महामृत्युंजय मंत्र का एक दिन में कम से कम ३२४ बार जप महामृत्युंजय मंत्र के जप स्वयं, अथवा किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जप के पश्चात् दशांश हवन कराएं जिसमें जायफल की आहुतियां अवश्य दें। भगवान शिव की शमी के पत्रों से पूजा शिव सहस्त्रनाम का पाठ काले तिल से शिव का पूजन नवचंडी का पूर्ण अनुष्ठान करते हुए पाठ एवं हवन कराएं। 
【4】 राहू की महादशा में बुध का अंतर दान करें उड़द दाल, काले तिल, नीले कपडे, गरम कम्बल सफाई कर्मचारी अथवा नीची जाती को, चीटी को शुगर भगवन गणेश को शतनाम सहित दुर्वांकुर चडाते रहे पक्षी को हरी मूंग खिलाएं हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं। कोढ़ी, रोगी और अपंग को खाना खिलाएं। 
【 ५】राहू की महादशा में केतु का अंतर दान करें उड़द दाल, काले तिल, नीले कपडे, गरम कम्बल सफाई कर्मचारी अथवा नीची जाती को, चीटी को शुगर भैरव जी के मंसिर में ध्वजा चदाएं कुत्तो को रोटी, बराद या बिस्किट खिलाएं घर या मंदिर में गुग्गुल का धुप करें कौओं को खीर-पूरी खिलाएं। 
【6】राहू की महादशा में Venus, शुक्र का अंतर माँ दुर्गा तथा माँ लक्ष्मी की पूजा करें सांड को गुड या घास खिलाएं शिव मंदिर में स्थित नंदी की पूजा करें तथा वस्त्र आदि दें स्फटिक की माला धारण करें एकाक्षी श्रीफल की स्थापना कर पूजा करें। 
 【 7 】राहू की महादशा में Sun, सूर्य का अंतर भगवन सूर्य की पूजा करें तथा सुभाह जल्दी उनको जल अर्पित करें हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण करते रहें। चाक्षुषोपनिषद् का पाठ करें। सूअर को मसूर की दाल खिलाएं। 
 【८】 राहू की महादशा में Moon, चन्द्र का अंतर माता की सेवा करें--- हर सोमवार को भगवन शिव का शुद्ध दूध से अभिषेक करें चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को भेंट करें 
【९】राहू की महादशा में Mars, मंगल का अंतर गाय का दान करें राहु मंत्र दिन में कम से कम ३ माला करें =================================================================== 
सांसारिक जीवन में व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन को सुखी व संपन्न बनाने की कोशिशें जन्म से लेकर मृत्यु तक लगातार चलती हैं। सुखों से भरे जीवन की कामनाओं को पूरा करने के लिए खासतौर पर हर इंसान बुद्धि, ज्ञान के साथ संतान, भवन, वाहन से समृद्ध होना चाहता है। जिसके लिये वह देव उपासना व शास्त्रों के उपाय भी अपनाता है। ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक जन्मकुण्डली में शनि-राहु की युति भी इन सुखों को नियत करने वाली होती है। खासतौर पर जब जन्मकुण्डली में शनि-राहु की युति चौथे भाव में बन रही हो। तब वह पांचवे भाव पर भी असर करती है। हालांकि दूसरे ग्रहों के योग और दृष्टि भी अच्छे और बुरे फल दे सकती है। लेकिन यहां मात्र शनि-राहु की युति के अशुभ प्रभाव की शांति के उपाय बताए जा रहे हैं। हिन्दू पंचांग में शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि की उपासना कर पीड़ा और कष्टों से मुक्ति का माना जाता है। यह दिन शनि की पीड़ा, साढ़े साती या ढैय्या से होने वाले बुरे प्रभावों की शांति के लिए भी जरूरी है। किंतु यह दिन एक ओर क्रूर ग्रह राहु की दोष शांति के लिए भी अहम माना जाता है। 
          राहु के बुरे प्रभाव से भयंकर मानसिक पीड़ा और अशांति हो सकती है। अगर आपको भी सुखों को पाने में अड़चने आ रही हो या कुण्डली में बनी शनि-राहु की युति से प्रभावित हो, तो यहां जानें ऐसे सुख व आनंद लेने के लिए शनि-राहु के दोष शांति के सरल उपाय - 
  1.  - शनिवार की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन नवग्रह मंदिर में शनिदेव और राहु को शुद्ध जल से स्नान कर पंचोपचार पूजा करें और विशेष सामग्रियां अर्पित करें। 
  2.  - शनि मंत्र ऊँ शं शनिश्चराये नम: और राहु मंत्र ऊँ रां राहवे नम: का जप करें। हनुमान चालीसा का पाठ भी बहुत प्रभावी होता है। 
  3.  - शनिदेव के सामने तिल के तेल का दीप जलाएं। तेल से बने पकवानों का भोग लगाएं। लोहे की वस्तु चढाएं या दान करें। 
  4.  - राहु की प्रसन्नता के लिए तिल्ली की मिठाईयां और तेल का दीप लगाएं। शनि व राहु की धूप-दीप आरती करें। समयाभाव होने पर नीचे लिखें उपाय भी न के वल आपकी मुसीबतों को कम करते हैं, बल्कि जीवन को सुख और शांति से भर देते हैं। 
  5.  - किसी मंदिर में पीपल के वृक्ष में शुद्ध जल या गंगाजल चढ़ाएं। पीपल की सात परिक्रमा करें। अगरबत्ती, तिल के तेल का दीपक लगाएं। समय होने पर गजेन्दमोक्ष स्तवन का पाठ करें। इस बारे में किसी विद्वान ब्राह्मण से भी जानकारी ले सकते हैं। 
  6. - इसी तरह किसी मंदिर के बाहर बैठे भिक्षुक को तेल में बनी वस्तुओं जैसे कचोरी, समोसे, सेव, भुजिया यथाशक्ति खिलाएं या उस निमित्त धन दें।

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 कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाने से शनि के साथ ही राहु-केतु से संबंधित दोषों का भी निवारण हो जाता है। राहु-केतु के योग कालसर्प योग से पीड़‍ित व्यक्तियों को यह उपाय लाभ पहुंचाता है। इसके अलावा निम्न मंत्रों से भी पीड़ित जातकों को अत्यंत फायदा पहुंचता है। राहु मंत्र को अगर सिद्ध किया जाए तो राहु से जुड़ी परेशानियां समाप्त होती हैं। ध्यान रहे कि राहु मंत्र की माला का जाप 8 बार किया जाता है।
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राहु पुराणों और ज्योतिष शास्त्र में---- 
 श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दनु से विप्रचित्ति नामक पुत्र हुआ जिसका विवाह हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से हुआ | राहु का जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ इसीलिए राहू का एक नाम सिंहिकेय भी है | जब भगवान विष्णु की प्रेरणा से देव दानवों ने क्षीर सागर का मंथन किया तो उस में से अन्य रत्नों के अतिरिक्त अमृत की भी प्राप्ति हुई | भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवों व दैत्यों को मोह लिया और अमृत बाँटने का कार्य स्वयम ले लिया तथा पहले देवताओं को अमृत पान कराना आरम्भ कर दिया| 
       राहु को संदेह हो गया और वह देवताओं का वेश धारण करके सूर्य देव तथा चन्द्र देव के निकट बैठ गया |विष्णु जैसे ही राहु को अमृत पान कराने लगे सूर्य व चन्द्र ने जो राहु को पहचान चुके थे विष्णु को उनके बारे में सूचित कर दिया |भगवान विष्णु ने उसी समय सुदर्शन चक्र द्वारा राहु के मस्तक को धड से अलग कर दिया |पर इस से पहले अमृत की कुछ बूंदें राहु के गले में चली गयी थी जिस से वह सर तथा धड दोनों रूपों में जीवित रहा |सर को राहु तथा धड को केतु कहा जाता है 

राहु व केतु को ग्रहत्व की प्राप्ति--- 
  1.  राहु के मस्तक कटते ही देवों व दानवों में महा संग्राम छिड़ गया |राहु और केतु सूर्य व चन्द्र से बदला लेने के उद्देश्य से ग्रसित करने के लिए उनके पीछे दोडे| भयभीत हो कर चंद्रमा शिव की शरण में चला गया | आशुतोष ने चन्द्र को अपने मस्तक पर धारण कर लिया | राहु ने भगवान शंकर की स्तुति की और अपना ग्रास चन्द्र देने की प्रार्थना की |शिव ने प्रसन्न होकर राहु और केतु दोनों को नवग्रह मंडल में स्थान दिया तथा समस्त लोकों में पूजित होने का वर दिया | 
  2.  राहु का स्वरूप और प्रकृति--- मत्स्य पुराण के अनुसार राहु विकराल मुख का ,नील वर्ण ,हाथ में तलवार ,ढाल ,त्रिशूल व वर मुद्रा धारण किये है | इसकी वात प्रकृति है | इसे दूसरों के अभिप्राय को जान लेने वाला तीव्र बुद्धि का कहा गया है |सर्वमान्य ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार राहु अशुभ ,क्रूर ,मलिंरूप वाला ,अन्त्यज जाति का , दीर्घ सूत्री ,नील वर्ण का तथा तीव्र बुद्धि का माना गया है | 
  3.  राहु का रथ एवम गति--- पुराणों के अनुसार राहु का रथ तमोमय है जिसको काले रंग के आठ अश्व खींचते हैं |इसकी गति सदैव वक्री रहती है | एक राशि को यह अठारह मास में भोग करता है |अमावस्या में पृथ्वी और सूर्य के मध्य राहु रुपी चन्द्र छाया आने पर सूर्य का बिंब अदृश्य हो जाता है जिसे सूर्य ग्रहण कहते हैं | 
  4. कारकत्व--- प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथोंके अनुसार राहु सांप,सपेरे,कीट,विष,जूआ , कुतर्क,अपवित्रता असत्य वादन ,नैऋत्य दिशा ,सोये हुए प्राणी ,वृद्ध , ,दुर्गा की उपासना ,ढीठ पना , चोरी ,आकस्मिक प्राकृतिक घटनाएं ,मद्य पान ,मांसाहार ,वैद्यक ,हड्डी ,गुप्तचर ,गोमेद ,रांगा ,मछली व नीले पदार्थों का कारक है | 
  5.  रोग --- जनम कुंडली में राहु पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो , छटे -आठवें -बारहवें भाव में स्थित हो तो चर्म रोग,शूल,अपस्मार ,चेचक वात शूल, दुर्घटना, कुष्ठ ,सर्प दंश ,हृदय रोग,पैर में चोट तथा अरुचि इत्यादि रोग होते हैं | 
  6.  फल देने का समय--- राहु अपना शुभाशुभ फल 42 से 48 वर्ष कि आयु में , अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है |वृद्धावस्था पर भी इस का अधिकार कहा गया है | 
जानिए आपकी राशि अनुसार राहु का फल--- जन्म कुंडली में राहु का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :- 
  1.  मेष में –राहु हो तो जातक तमोगुणी ,क्रोध की अधिकता से दंगा फसाद करने वाला तथा जूए लाटरी में धन नष्ट करने वाला होता है |आग और बिजली से भय रहता है | 
  2.  वृष में राहु हो तो जातक सुखी ऐश्वर्यवान,सरकार से पुरस्कृत ,कामी और विद्वान होता है | 
  3.  मिथुन में राहु हो तो जातक विद्वान ,धन धान्य से सुखी ,समृद्ध व् यश मान प्राप्त करने वाला होता है | 
  4. कर्क में राहु हो तो जातक मनोरोगी ,नजला जुकाम से पीड़ित ,माता के कष्ट से युक्त होता है | 
  5.  सिंह में राहु हो तो जातक ह्रदय या उदररोगी राजकुल का विरोधी तथा अग्नि विष आदि से कष्ट उठाने वाला होता है | | 
  6.  कन्या में राहु हो तो जातक विद्यावान,मित्रवान, साहस के कार्यों से लाभ उठाने वाला तथा सफलता प्राप्त करने वाला होता है | 
  7. तुला मे राहु हो तो जातक गुर्दे के दर्द से पीड़ित ,व्यापार से लाभ उठाने वाला होता है | 
  8.  वृश्चिक में राहु हो तो जातक नीच संगति वाला ,शत्रु से पीड़ित ,दुःसाहसी व् अग्नि विष शस्त्र आदि से पीड़ित होता है | 
  9.  धनु में राहु हो तो जातक असफल ,परेशान,वात रोगी , निम्न कार्यों में रूचि लेने वाला होता है | 
  10.  मकर में राहु हो तो जातक विदेश यात्रा करने वाला ,धनी,घुटने से पीड़ित और मित्र से हानि उठाने वाला होता है | 
  11.  कुम्भ में राहु हो तो जातक श्रम के कार्य से लाभ उठाने वाला ,मित्रों से सहयोग लेने वाला ,धन संपत्ति से युक्त होता है | 
  12.  मीन में राहु हो तो जातक उत्साह हीन ,मन्दाग्नि युक्त होता है | (राहु पर किसी अन्य शुभाशुभ ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में शुभाशुभ परिवर्तन भी संभव है ) 


राहु का भाव फल---- जन्म कुंडली में राहु का विभिन्न भावों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :--- 
  1.  लग्न में स्थित राहु से जातक शत्रु विजयी ,अपना काम निकाल लेने वाला ,कामी ,शिरो वेदना से युक्त,आलसी,क्रूर,दया रहित,साहसी,अपने सम्बन्धियों को ही ठगने वाला ,दुष्ट स्वभाव का ,वातरोगी होता है | 
  2. धन भाव में स्थित राहु से जातक असत्य बोलने वाला ,नष्ट कुटुंब वाला ,अप्रिय भाषण कर्ता,निर्धन ,परदेस में धनी,कार्यों में बाधाओं वाला,मुख व नेत्र रोगी ,अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करने वाला होता है 
  3.  पराक्रम भाव में स्थित राहु से जातक पराक्रमी ,सब से मैत्री पाने वाला ,शत्रु को दबा कर रखने वाला ,कीर्तिमान ,धनी ,निरोग होता है | निर्बल और पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट होने पर छोटे भाई के सुख में कमी करता है | 
  4.  सुख भाव में स्थित राहु से जातक की माता को कष्ट रहता है |मानसिक चिंता रहती है |प्रवासी तथा अपने ही लोगों से झगड़ता रहता है |
  5.  संतान भाव में स्थित राहु से संतान चिंता ,उदर रोग ,शिक्षा में बाधा ,वहम का शिकार होता है | 
  6.  शत्रु भाव में स्थित राहु से जातक रोग और शत्रु को नष्ट करने वाला ,पराक्रमी ,धनवान ,राजमान्य ,विख्यात होता है | 
  7.  जाया भाव में स्थित राहु से विवाह में विलम्ब या बाधा ,स्त्री को कष्ट ,व्यर्थ भ्रमण ,कामुकता ,मूत्र विकार ,दन्त पीड़ा तथा प्रवास में कष्ट उठाने वाला होता है | 
  8.  आयु भाव में स्थित राहु से पैतृक धन संपत्ति की हानि,कुकृत्य करने वाला ,बवासीर का रोगी ,भारी श्रम से वायु गोला ,रोगी तथा 32 वें वर्ष में कष्ट प्राप्त करने वाला होता है | 
  9.  भाग्य भाव में स्थित राहु से विद्वान ,कुटुंब का पालन करने वाला ,देवता और तीर्थों में विशवास करने वाला ,कृतज्ञ ,दानी ,धनी, सुखी होता है | 
  10.  कर्म भाव में स्थित राहु से अशुभ कार्य करने वाला ,घमंडी ,झगडालू ,शूर ,गाँव या नगर का अधिकारी ,पिता को कष्ट देने वाला होता है | 
  11.  लाभ भाव में स्थित राहु से पुत्रवान ,अपनी बुद्धि से दूसरों का धन अपहरण करने वाला ,विद्वान ,धनी ,सेवकों से युक्त,कान में पीड़ा वाला ,विदेश से लाभ उठाने वाला होता है | 
  12.  व्यय भाव में स्थित राहु से दीन, पसली में दर्द से युक्त ,असफल ,दुष्टों का मित्र ,नेत्र व पैर का रोगी,कलहप्रिय,बुरे कर्मों में धन का व्यय करने वाला ,अस्थिर मति का होता है | 
 राहु का सामान्य दशा फल--- 
 जन्म कुंडली में राहु स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ युक्त -दृष्ट ,लग्न से शुभ स्थानों पर हो, केन्द्रेशसे त्रिकोण में या त्रिकोणेश से केन्द्र में युति सम्बन्ध बनाता हो तो राहु की दशा में बहुत सुख ,ज्ञान वृद्धि ,धन धान्य की वृद्धि ,पुत्र प्राप्ति ,राजा और मित्र सहयोग से अभीष्ट सिद्धि ,विदेश यात्रा ,प्रभाव में वृद्धि, राजनीति और कूटनीति में सफलता तथा सभी प्रकार के सुख वैभव प्रदान करता है | राहु शत्रु –नीचादि राशि का पाप युक्त,दृष्ट हो कर 6-8-12 वें स्थान पर हो तो उसकी अशुभ दशा में सर्वांग पीड़ा ,चोर –अग्नि –शस्त्र से भय ,विष या सर्प से भय ,पाप कर्म के कारण बदनामी,असफलता ,विवाद ,वहम करने की मनोवृत्ति ,कुसंगति से हानि ,वात तथा त्वचा रोग ,दुर्घटना से भय होता है | 
गोचर में राहु---- 
  1.  जन्म या नाम राशि से 3,6 ,11वें स्थान पर राहु शुभ फल देता है |शेष स्थानों पर राहु का भ्रमण अशुभ कारक होता है | 
  2.  जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर राहु का गोचर सर पीड़ा ,भ्रम ,अशांति , विवाद और वात पीड़ा करता है 
  3. दूसरे स्थान पर राहु के गोचर से घर में अशांति और कलह क्लेश होता है |चोरी या ठगी से धन कि हानि ,नेत्र या दांत में कष्ट होता है | परिवार से अलग रहना पड़ जाता है | 
  4.  तीसरे स्थान पर राहु का गोचर आरोग्यता , मित्र व व्यवसाय लाभ ,शत्रु की पराजय ,साहस पराक्रम में वृद्धि ,शुभ समाचार प्राप्ति ,भाग्य वृद्धि ,बहन व भाई के सुख में वृद्धि व राज्य से सहयोग दिलाता है | 
  5.  चौथे स्थान पर राहु के गोचर से कुसंगति , स्थान हानि ,स्वजनों से वियोग या विरोध ,सुख हीनता ,मन में स्वार्थ व लोभ का उदय , वाहन से कष्ट ,छाती में पीड़ा होती है | 
  6.  पांचवें स्थान पर राहु के गोचर से भ्रम ,योजनाओं में असफलता ,पुत्र को कष्ट, धन निवेश में हानि व उदर विकार होता है |शुभ राशि में शुभ युक्त या शुभ दृष्ट हो तो सट्टे लाटरी से लाभ कराता है | 
  7.  छ्टे स्थान पर राहु के गोचर से धन अन्न व सुख कि वृद्धि ,आरोग्यता , शत्रु पर विजय व संपत्ति का लाभ, मामा या मौसी को कष्ट होता है | 
  8.  सातवें स्थान पर राहु के गोचर से दांत व जननेंन्द्रिय सम्बन्धी रोग , मूत्र विकार ,पथरी ,यात्रा में कष्ट , दुर्घटना ,स्त्री को कष्ट या उस से विवाद , आजीविका में बाधा होती है| 
  9.  आठवें स्थान पर राहु के गोचर से धन हानि ,कब्ज ,बवासीर इत्यादि गुदा रोग ,असफलता ,स्त्री को कष्ट ,राज्य से भय ,व्यवसाय में बाधा ,पिता को कष्ट ,परिवार में अनबन ,शिक्षा प्राप्ति में बाधा व संतान सम्बन्धी कष्ट होता है | 
  10.  नवें स्थान पर राहु के गोचर से भाग्य कि हानि ,असफलता ,रोग व शत्रु का उदय ,धार्मिक कार्यों व यात्रा में बाधा आती है | 
  11.  दसवें स्थान पर राहु के गोचर से मानसिक चिंता , अपव्यय ,पति या पत्नी को कष्ट , कलह,नौकरी व्यवसाय में विघ्न , अपमान ,कार्यों में असफलता ,राज्य से परेशानी होती है | 
  12.  ग्यारहवें स्थान पर राहु के गोचर से धन ऐश्वर्य की वृद्धि ,सट्टे लाटरी से लाभ ,आय में वृद्धि ,रोग व शत्रु से मुक्ति , कार्यों में सफलता, मित्रों का सहयोग मिलता है | 
  13.  बारहवें स्थान पर राहु के गोचर से धन कि हानि ,खर्चों कि अधिकता ,संतान को कष्ट ,प्रवास , बंधन ,परिवार में अनबन व भाग्य कि प्रतिकूलता होती है | 

 ( गोचर में राहु के उच्च ,स्व मित्र,शत्रु नीच आदि राशियों में स्थित होने पर , अन्य ग्रहों से युति ,दृष्टि के प्रभाव से या वेध स्थान पर शुभाशुभ ग्रह होने पर उपरोक्त गोचर फल में परिवर्तन संभव है | ) 
 कालसर्प दोष---- 
 कुछ आधुनिक ज्योतिषियों ने गत कुछ वर्षों से यह भ्रामक प्रचार किया है की जब कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य में आ जाएँ तो काल सर्प योग बनता है जिसका प्रभाव जातक पर बड़ा अशुभ पड़ता है | वास्तविकता यह है कि पराशर होरा शास्त्र ,बृहज्जातक ,सारावली ,मानसागरी,फलदीपिका ,जातक पारिजात आदि किसी भी वैदिक शास्त्रीय ज्योतिष ग्रन्थ में ऐसे किसी कुयोग का कहीं वर्णन नहीं है| साथ ही जीवन में सभी प्रकार से सफलता पाने वाले असंख्य ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कुंडली में यह कुयोग है पर फिर भी वे सफलता के शिखर पर पहुंचे|मार्तंड पंचांगकार ने इस विषय पर 2011-12 के पंचांग में विस्तृत लेख लिखा है तथा कालसर्प योग में जन्में कुछ महान व्यक्तियों कि सूची दी है जिसमें सम्राट हर्ष वर्धन ,अब्राहम लिंकन ,जवाहर लाल नेहरु ,डा ० राधा कृष्णन ,अभिनेता दलीप कुमार व अशोक कुमार, धीरू भाई अम्बानी इत्यादि शामिल हैं | अतः इस योग से भयभीत करने वाले पाखंडी ज्योतिषियों से दूर रहें और उनकी बातों में आ कर धन को व्यर्थ में न गवाएं | 
 राहु शान्ति के उपाय---- 
जन्मकालीन राहु अशुभ फल देने वाला हो या गोचर में अशुभ कारक हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है | रत्न धारण –गोमेद पञ्च धातु की अंगूठी में आर्द्रा,स्वाती या शतभिषा नक्षत्र में जड़वा कर शनिवार को सूर्यास्त के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प, काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|रांगे का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है | 
 दान ,जाप – 
 ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र का १८००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,सतनाजा ,नारियल , रांगे की मछली ,नीले रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें | मछलियों को चारा देना भी राहु शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है | 
राहु के कुप्रभाव से बचने के लिये रत्न धारण करना----
 राहु के कुप्रभाव से कालान्तर तक बचने के लिये रत्नों को धारण किया जाता है,अलग अलग भावों के राहु के प्रभाव के लिये अलग अलग तरह के रंग के और प्रकृति के रत्न धारण करवाये जाते है,अधिकतर लोग गोमेद को राहु के लिये प्रयोग करवाते है,लेकिन गोमेद एक ही रंग और प्रकृति का हो,यह जरूरी नही होता है,जैसे धन के भाव को राहु खराब कर रहा है,और अक्समात कारण बनने के बाद धन समाप्त हो जाता है,तो खूनी लाल रंग का गोमेद ही काम करेगा,अगर उस जगह पीला या गोमूत्र के रंग का गोमेद पहिन लिया जाता है,तो वह धार्मिक कारणों को करने के लिये और सलाह लेने का मानस ही बनाता रहेगा. इसके अलावा भी राहु के लिये कई उपाय जीवन में बहुत जरूरी है,इन उपायों के करने से भी राहु अपनी सिफ़्त को कन्ट्रोल में रखता है। राहु का पहला कार्य होता है झूठ बोलना और झूठ बोलकर अपनी ही औकात को बनाये रखना,वह किसी भी गति से अपने वर्चस्व को दूसरों के सामने नीचा नही होना चाहता है। 
         अधिकतर जादूगरों की सिफ़्त में राहु का असर बहुत अधिक होता है,वे पहले अपने शब्दों के जाल में अपनी जादूगरी को देखने वाली जनता को लेते है फ़िर उन्ही शब्दों के जाल के द्वारा जैसे कह कुछ रहे होते है जनता का ध्यान कहीं रखा जाता है और अपनी करतूत को कहीं अंजाम दे रहे होते है,इस प्रकार से वे अपने फ़ैलाये जाल में जनता को फ़ंसा लेते है. राहु का कार्य अपने प्रभाव में लेकर अपना काम करना होता है,सम्मोहन का नाम भी दिया जाता है,जो लोग अपने प्रभाव को फ़ैलाना चाहते है वे अपने सम्मोहन को कई कारणों से फ़ैलाना भी जानते है,जैसे ही सम्मोहन फ़ैल जाता है लोगों का काम अपने अपने अनुसार चलने लगता है। जैसे पुलिस के द्वारा अक्सर शक्ति प्रदर्शन किया जाता है,उस शक्ति प्रदर्शन की भावना में लोगों के अन्दर पुलिस का खौफ़ भरना होता है,यही खौफ़ अपराधी को अपराध करने से रोकता है,यह खौफ़ नाम का सम्मोहन फ़ायदा देने वाला होता है। 
         इसी प्रकार से अपने कार्यालय आफ़िस गाडी घर शरीर को सजाने संवारने के पीछे जो सम्मोहन होता है वह अपने को समाज में बडा प्रदर्शित करने का सम्मोहन होता है,अपने को बडा प्रदर्शित करना भी शो नामका सम्मोहन राहु की श्रेणी में आता है. राहु की जादूगरी से अक्सर लोग अपने को दुर्घटना में भी ले जाते है,जैसे उनके अन्दर किसी अच्छे या बुरे काम को करने का विचार लगातार दिमाग में चल रहा है,अथवा घर या कोई विशेष टेंसन उनके दिमाग में लगातार चल रही है,उस टेंशन के वशीभूत होकर जहां उनको जाना है उस स्थान पर जाने की वजाय अन्य किसी स्थान पर पहुंच जाते है,अक्सर गाडी चलाते वक्त जब इस प्रकार का कारण दिमाग में चलता है तो अक्समात ही अपनी गाडी या वाहन को मोडना या साइड में ले जाना या वचारों की तंद्रा में खो कर चलना दुर्घटना को जन्म देता है,राहु की यह कार्यप्रणाली बहुत ही खतरनाक होती है. 
       राहु अगर कमजोर है तो किसी ग्रह की सहायता से केतु राहु से बचाने का काम करता है,वह वक्त पर या तो ध्यान देता है और या फ़िर किसी के द्वारा इशारा करवा कर आने वाली दुर्घटना को दूर कर देता है. राहु शराब के रूप में शरीर के खून में उत्तेजना देता है,मानसिक गति को भुलाने का काम करता है लेकिन शरीर पर अधिक दबाब आने के कारण शरीर के अन्दरूनी अंग अपना अपना बल समाप्त करने के बाद बेकार हो जाते है,यह राहु अपने कारणों से व्यक्ति की जिन्दगी को समाप्त कर देता है. लाटरी जुआ सट्टा के समय राहु केवल अपने ख्यालों में रखता है और जो अंक या कार्य दिमाग में छाया हुआ है उस विचार को दिमाग से नही निकलने देता है,सौ मे से दस को वह कुछ देता है और नब्बे का नुकसान करता है. 
        ज्योतिष के मामले में राहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है. वैसे राहु की देवी सरस्वती है और अपने समय पर व्यक्ति को सत्यता भी देती है लेकिन सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है,जहां सरस्वती होती है वहां लक्ष्मी नही और जहां लक्ष्मी होती है वहां सरस्वती नही.जो लोग दोनो को इकट्ठा करने के चक्कर में होते है वे या तो कुछ समय तक अपने झूठ को चलाकर चुप हो जाते है या फ़िर सरस्वती खुद उन्हे शरीर धन और समाज से दूर कर देती है,अथवा किसी लक्ष्मी के कारण से उन्हे खुद राहु के साये में जैसे जेल या बन्दी गृह में अपना जीवन निकालना पडता है. राहु अलग अलग भावों में अपनी अलग अलग शक्ति देता है,अलग अलग राशि से अपना अलग अलग प्रभाव देता है,तुला राशि के दूसरे भाव में अगर राहु विद्यमान है तो इस राशि वाला जातक विष जैसी वस्तुओं को आराम से सेवन कर सकता है,और मृत्यु भी इसी प्रकार के कारकों से होती है,उसके बोलने पर गालियों का समिश्रण होता है,मतलब जो भी बात करता है वह बिच्छू के जहर जैसी लगती है,अगर गुरु या कोई सौम्य ग्रह सहायता में नही है तो अक्सर इस प्रकार के लोग शमशान के कारकों के लिये मशहूर हो जाते है,
          जैसे जन्म तारीख 8th September 1993 समय 11.10 स्थान कानपुर भारत, जातक का नाम विशेश्वर कानपुर में गंगा नदी के किनारे शवों को जलाने का काम कर रहा है.राहु धुयें के रूप में चिताओं की बदबू को सूंघ भी रहा है और देखने में मैला कुचैला भी है,जन्म एक सभ्रांत परिवार में छठे भाई के रूप में हुआ है. राहु गाने बजाने की विद्या के साथ में अपनी गति भी देता है और मनोरंजन के रूप में भी माना जाता है,जैसे किसी सिनेमा मनोरंजन के काम में महारत हासिल करना,भद्दी बातें कहकर अपने को मनोरंजन की दुनिया में शामिल कर लेना और उन बातों को मजाक में कह देना जो बातें अगर सभ्रांत परिवार में कही जायें तो लोग लड मरे,इस बात को समझने के लिये देखिये "पप्पू-हरामी" कर्क का राहु मंगल बुध केतु सामने. राहु खून की बीमारियां और इन्फ़ेक्सन भी देता है,
       जैसे मंगल नीच के साथ अगर मंगल की युति है तो जातक को लो ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,वही बात अगर उच्च के मंगल के साथ है तो हाई ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,और मंगल राहु के साथ गुरु भी कन्या राशि के साथ या छठे भाव के मालिक के साथ मिल गया है तो शुगर की बीमारी भी साथ में होगी. राहु मंगल गुरु अगर बारहवें भाव में है तो केतु अपने आप छठे भाव में होगा,जातक को समाज में कहा तो जायेगा कि वह बहुत विद्वान है लेकिन छुपे रूप में वह शराब मांस का शौकीन होगा,या फ़िर अस्पताल की नौकरी करता होगा या जेल के अन्दर खाना बनाने का काम करता होगा. तीसरे भाव का राहु अपने पराक्रम और चालाकी के लिये माना जायेगा इस प्रकार के व्यक्ति के अन्दर अपनी छा जाने वाली प्रकृति से कोई रोक नही सकता है,वह जिसके सामने भी बात करेगा,उस पर वह अपने कार्यों से बातों से और अपने शौक आदि से छा जाने वाली प्रकृति को अपनायेगा,इसके साथ बुद्धि के अन्दर केवल अपने को प्रदर्शित करने की कला का ही विकास होगा,उसका जीवन साथी अक्सर समाज से अलग और गृहस्थ जीवन कभी सुखी नही होगा। 
         चौथे भाव का राहु शक की बीमारी को देता है रहने वाले स्थान को सुनसान रखने के लिये माना जाता है,मन के अन्दर आशंकाये हमेशा अपने प्रभाव को बनाये रखती है,यहां तक कि रोजाना के किये जाने वाले कामों के अन्दर भी शंका होती है,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर अपमान मृत्यु और जान जोखिम का असर रहता है,बडे भाई और मित्र के साथ कब अपघात कर दे कोई पता नही होता है,जो भी लाभ के साधन होते है उनके लिये हमेशा शंका वाली बातें ही होती है,माता के लिये अपमान और जोखिम देने वाला घर में रहते हुये अपने प्रयासों से कोई न कोई आशंका को देते रहना उसका काम हो जाता है,लेकिन बाहर रहकर अपने को अपने अनुसार किये जाने वाले कामों में वह सुरक्षित रखता है पिता के लिये कलंक देने वाला होता है. पंचम भाव का राहु संतान और बुद्धि को बरबार रखता है,जल्दी से जल्दी हर काम को करने के चक्कर में वह अपनी विद्या को बीच में तोड लेता है,नकल करने की आदत या चोरी से विद्या वाली बातों को प्रयोग करने के कारण वह बुद्धि का विकास नही कर पाता है,जब भी कभी विद्या वाली बात को प्रकट करने का अवसर आता है कोई न कोई बहाना बनाकर अपने को बचाने का प्रयास करता है पत्नी या जीवन साथी के प्रति वह प्रेम प्रदर्शित नही कर पाता है और आत्मीय भाव नही होने से संतान के उत्पन्न होने में बाधा होती है
        . छठा राहु बुद्धि के अन्दर भ्रम देता है,लेकिन उसके मित्रों या बडे भाई बहिनो के प्रयास से उसे मुशीबतों से बचा लिया जाता है,अपमान लेने में उसे कोई परहेज नही होता है,कोई भी रिस्क को ले सकता है,किसी भी कुये खाई पहाड से कूदने में उसे कोई डर नही लगता है,वह किसी भी कार्य को करने के लिये भूत की तरह से काम कर सकता है और किसी भी धन को बडे आराम से अपने कब्जे में कर सकता है,गूढ ज्ञान के लिये वह अपने को आगे रखता है,बाहरी लोगों से और पराशक्तियों के प्रति उसे विश्वास होता है,अपने खुद के परिवार के लिये आफ़तें और शंकाये पैदा करता रहता है. राहु को दवाइयों के रूप में भी माना जाता है,जो दवाइयां शरीर में एल्कोहल की मात्रा को बनाती है और जो दवाइयां दर्द आदि से छुटकारा देती है वे राहु की श्रेणी में आती है. राहु की आशंका कभी कभी बहुत बडा कार्य कर जाती है जैसे कि अपना प्रभाव फ़ैलाने के लिये कोई झूठी अफ़वाह फ़ैला कर अपना काम बना ले जाना. धर्म स्थान पर राहु का रूप साफ़ सफ़ाई करने वाले व्यक्ति के रूप में होता है,धन के स्थान में राहु का रूप आई टी फ़ील्ड की सेवाओं के रूप में माना जाता है,जहां असीमित मात्रा की गणना होती है वहां राहु का निवास होता है.
 राहु दोष दूर करने के आध्‍यात्मिक उपाय--- 
  1.  प्रत्‍येक शनिवार शाकाहारी भोजन करें:-- राहु और केतू दोष ग्रह है। इसके लिए आपको शनिवार को पूजा करनी चाहिए और इस दिन पूर्णत: शाकाहारी भोजन का सेवन करना चाहिए।
  2.  भगवान शिव की पूजा करें:--- अगर आपकी कुंडली में राहु-केतू का दोष है तो भगवान शिव की पूजा करें। भगवान शिव, राहु-केतू और शनि के दोषों का निवारण करते है। आप प्रतिदिन 21 बार ओउम् नम: शिवाय का जाप करेें। 
  3.  राहु शांति पूजा का प्रदर्शन करें:--- राहु और केतू के दोषों को शांत करने के लिए आप राहु शांति पूजा का प्रदर्शन करें। इस पूजा को आप घर पर आयोजित करवाएं, इससे आपके घर में सुख और शांति भी आएगी। सिद्धवट मंदिर/घाट (उज्जैन--मध्यप्रदेश) पर राहु दोष निवारणार्थ पूजन/दान आदि करें || 
  4. श्रीकलाहस्‍ती मंदिर के दर्शन करें:---श्रीकला हस्‍ती मंदिर आंध्रप्रदेश में स्थित है। जिन लोगों के जीवन में राहु-केतू दोष है वह इस मंदिर में दर्शन के लिए अवश्‍य जाएं। साल में भारी संख्‍या में लोग यहां दर्शन करने आते है।
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