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जानिए इस वर्ष 2019 में कब करें "हरतालिका तीज व्रत"

हरतालिका तीज व्रत 2 सितंबर 2019 को ही मनाया जाना शास्त्र सम्मत क्यों होगा

सम्पूर्ण भारतवर्ष में "हरतालिका तीज" सुहागिन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले प्रमुख व्रतों में से एक है। यह व्रत पति की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए रखा जाता है। इस दौरान महिलाएं निर्जला व्रत रखकर माता गौरी और भगवान भोले नाथ की आराधना करती हैं। हिन्‍दू पंचांग के अनुसार यह व्रत हर साल भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया को आता है लेकिन इस बार जन्‍माष्‍टमी की ही तरह हरतालिका तीज  की तिथि को लेकरक असमंजस की स्थिति बन गई है। महिलाओं को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर किस दिन हरतालिका तीज का व्रत रखा जाना चाहिए। कुछ लोग कह रहे हैं कि व्रत 1 सितंबर को होगा, जबकि कुछ लोग 2 सितंबर को व्रत रखने की सलाह दे रहे हैं।
*पंचांग भेद* को लेकर एक बार फिर *हरितालिका तीज व्रत* की तिथि 1 सितंबर रविवार और 2 सितंबर सोमवार को पंचांगों में बताई गई है।
नीमच के *निर्णय सागर पंचांग* में हरितालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल द्वितीया रविवार *( 1 सितंबर )* को बताई है।
जबकि *उज्जैन के महाकाल पंचांग* में हरितालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया सोमवार *( 2 सितंबर )* को बताई है।
Know-when-to-do-Hartalika-Teej-Vrat-in-2019-जानिए इस वर्ष 2019 में कब करें "हरतालिका तीज व्रत"सम्पूर्ण भारत वर्ष में "हरतालिका तीज" सुहागिन महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक है. यह व्रत पति की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए रखा जाता है। इस दौरान महिलाएं निर्जला व्रत रखकर माता गौरी और भगवान भोले नाथ की आराधना करती हैं। हिन्‍दू पंचांग के अनुसार यह व्रत हर साल भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया को आता है. लेकिन इस बार जन्‍माष्‍टमी की ही तरह हरतालिका तीज की तिथि को लेकरक असमंजस की स्थिति बन गई है. महिलाओं को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर किस दिन हरतालिका तीज का व्रत रखा जाना चाहिए. कुछ लोग कह रहे हैं कि व्रत 1 सितंबर को होगा, जबकि कुछ लोग 2 सितंबर को व्रत रखने की सलाह दे रहे हैं।  इस तरह की स्थिति करीब 23 वर्षों के बाद उत्पन्न हो गयी है। 
हरतालिका तीज की तिथि को लेकर असमंजस क्‍यों?
हरतालिका तीज का व्रत भादो माह की शुक्‍ल पक्ष तृतीया यानी कि गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले रखा जाता है. अब समस्‍या यह है कि इस साल पंचांग की गणना के अनुसार तृतीया तिथि का क्षय हो गया है यानी कि पंचांग में तृतीया तिथि का मान ही नहीं है. इस हिसाब से 1 सितंबर को जब सूर्योदय होगा तब द्वितीया तिथि होगी, जो कि 08 बजकर 27 मिनट पर खत्‍म हो जाएगी इसके बाद तृतीया तिथि लग जाएगी।  के मुताबिक तृतीया तिथि अगले दिन यानी कि दो सितंबर को सूर्योदय से पहले ही सुबह 04 बजकर 57 मिनट पर समाप्‍त हो जाएगी। ऐसे में असमंजस इस बात का है कि जब तृतीया तिथि को सूर्य उदय ही नहीं हुआ तो व्रत किस आधार पर रखा जाए।शास्त्रों के अनुसार तृतीया और चतुर्थी मिली हुई तिथि में तीज व्रत का पूजा करना उत्तम है। यही कारण है कि 2 सितंबर को तीज व्रत है। उज्जैन (मध्यप्रदेश) के आसपास के अधिकतर महिलाएं दो सितंबर 2019 को ही तीज व्रत करेंगी।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि व्रतधारी सुहागनों को हस्‍त नक्षत्र में तीज का पारण नहीं करना चाहिए। जो महिलाएं 1 सितंबर 2019 को व्रत रखेंगी उन्‍हें 2 सितंबर को तड़के सुबह हस्‍त नक्षत्र में ही व्रत का पारण करना पड़ेगा, जो कि गलत है। वहीं अगर महिलाएं 2 सितंबर 2019 को व्रत करें तो वे 3 सितंबर को चित्रा नक्षत्र में व्रत का पारण करेंगी। 
पुराणों में चित्रा नक्षत्र में व्रत का पारण करना शुभ और सौभाग्‍यवर्द्धक माना गया है।
  • इन तिथि भेद का स्पष्टिकरण  *निर्णय सिंधु के पृष्ठ 169 - 170 पर विस्तार से दिया गया है।*
  • निर्णय सिंधु ने स्पष्ट किया है कि हरतालिका व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया को होता है। उसमें अगली तिथि ग्रहण करना चाहिए। चतुर्थी सहित तीज अधिक फल देती है। यह सौभाग्य को बढ़ाने वाली होती है।* 
  • जबकि
  • द्वितीया से संयुक्त तीज व्रत वैधव्य प्रदान करती है।* 
  • अतः हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया सोमवार 2 सितंबर को ही करना उत्तम है। निर्णय सिंधु के अनुसार 1 सितंबर को तीज व्रत करने की मनाही है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार अगर आप हरतालिका तीज का व्रत रखने की सोच रही हैं तो पहले अपने किसी परिचित विद्वान और अनुभवी पंडित या ज्‍योतिषी से तिथी को लेकर विचार-विमर्श जरूर कर लें। इस व्रत में सुहागन व्रती महिला निर्जला रहकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं ।हरतालिका तीज व्रत उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में रखा जाता है। इस दिन महिलाएं शिव, पार्वती के साथ गणेश जी की पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन निर्जला व्रत करती हैं। कुछ महिलाएं उसी दिन शाम के पूजन के बाद जल ग्रहण कर लेती हैं तो कुछ अगले दिन ही जल ग्रहण करती हैं। कहा जाता है कि अगर एक बार आप इस व्रत को करना शुरू कर देते हैं तो इसे दोबारा छोड़ा नहीं जाता है। इस व्रत को सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं।
     आचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने कहा कि दिनभर निर्जला रहकर महिलाएं शाम में बालू से बने शिव-पार्वती की पूजा करते हैं। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार हरितालिका व्रत से सौभाग्यवती स्त्री जहां दीर्घायु पति पाती हैं वहीं यदि कुमारी व्रत करें तो मनचाहा वर प्राप्त कर सकती हैं। क्षेत्रवाद के अनुसार परंपरा का निर्वहन किया जाता है।

जाने और समझे पर्युषण पर्व के महत्व को,उद्देश्य और कैसे मनाएं

जैन धर्म में सभी पर्वों का राजा है "पर्युषण पर्व"---

प्रिय पाठकों/मित्रों, पर्यूषण पर्व जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर संप्रदाय के जैन अनुयायी इसे दस दिन तक मनाते हैं। इस पर्व में जातक विभिन्न आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ करके जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर अर्हंतों में से ही होते हैं। 
      इस धर्म में चातुर्मास पर्व यानि चार महीने तक चलने वाला पर्व का बहुत महत्व हैं। जैन धर्म में यह चार महीने अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और इन चार महीनों में भी पर्युषण पर्व का समय सबसे अहम् होता हैं. जैन धर्म में पर्युषण महापर्व विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक पर्व हैं, जो हर वर्ष वर्षा ऋतू के समय आता हैं. हिन्दू पंचांग के अनुसार भादो मास में पड़ने वाला यह पर्व, जैन धर्म के अनुयाइयों के लिए आत्मा से परमात्मा तक पहुचने का पर्व होता हैं।
      पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के मतानुसार यह पर्व भाद्रपद कृष्ण १२ से प्रारम्भ हो कर भाद्रपद शुक्ला ४ को पूर्ण होता है। पर्युषण पर्व का अन्तिम दिन संवत्सरी कहलाता है। संवत्सरी पर्व पर्युषण ही नहीं जैन धर्म का प्राण है। इस दिन सांवत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं। सांवत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी ८४ लाख जीव योनी से क्षमा याचना की जाती है। यहाँ क्षमा याचना सभी जीवों से वैर भाव मिटा कर मैत्री करने के लिए होती है। क्षमा याचना शुद्ध ह्रदय से करने से ही फल प्रद होती है। इसे औपचारिकता मात्र नही समझना चाहिए।पर्यूषण पर्व पर क्षमत्क्षमापना या क्षमावाणी का कार्यक्रम ऐसा है जिससे जैनेतर जनता को काफी प्रेरणा मिलती है। इसे सामूहिक रूप से विश्व-मैत्री दिवस के रूप में मनाया जा सकता है। पर्यूषण पर्व के समापन पर इसे मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी या ऋषि पंचमी को संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। उन्हें वे 'दसलक्षण' के नाम से भी संबोधित करते हैं।
जाने और समझे पर्युषण पर्व के महत्व को,उद्देश्य और कैसे मनाएं-Know-and-understand-the-importance-of-Paryushan-festival-purpose-and-how-to-celebrate        उस दिन लोग उपवास रखते हैं और स्वयं के पापों की आलोचना करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसके साथ ही वे चौरासी लाख योनियों में विचरण कर रहे, समस्त जीवों से क्षमा माँगते हुए यह सूचित करते हैं कि उनका किसी से कोई बैर नहीं है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय-व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ- सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं।

इस वर्ष पर्युषण पर्व का शुभारम्भ 27 अगस्त 2019  (मंगलवार) से होगा और समापन भी 03 सितम्बर 2019 (मंगलवार) को ही  होगा |

"खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्तिमे सव्व भुएस्‌ वैरं ममझं न केणई।"

यह वाक्य परंपरागत जरूर है, मगर विशेष आशय रखता है। इसके अनुसार क्षमा माँगने से ज्यादा जरूरी क्षमा करना है। क्षमा देने से आप अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे और सभी जीवों और पदार्थों के प्रति मैत्री भाव रखेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है जब वह अपने सेबाहर हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमा-भाव इसका मूलमंत्र है।
       पर्युषण शब्द का अर्थ है एक स्थान पर निवास करना। द्रव्य से इस समय साधू साध्वी भगवंत एक स्थान पर निवास करते हैं। भाव से अपनी आत्मा में स्थिरवास करना ही वास्तविक पर्युषण है। इस लिए इस समय यथासंभव विषय एवं कषायों से दूर रह कर अपनी आत्मा में लीन होने के लिए आत्म चिंतन करना चाहिए। साथ ही सामायिक, प्रतिक्रमण, देवपूजन, गुरुभक्ति, साधर्मी वात्सल्य आदि भी यथाशक्ति करने योग्य है।
     जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है− आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है− कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण−पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।पर्युषण आत्मशुद्धि का पर्व है, कोई लौकिक त्यौहार नहीं। जैन धर्म पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित हैं. इस धर्म की मान्यताओं के अनुसार किसी भी जीव के साथ किसी भी तरह की हिंसा को पुर्णतः अनुचित कहा गया हैं और अपनी इसी विचारधारा को ध्यान में रखकर जैन धर्म में पर्युषण पर्व की शुरुआत की गयी थी.
      जैन धर्म के संस्थापक भगवान् महावीर के अनुसार अपने आसपास की धरती में बारिश का मौसम ही एक ऐसा समय होता हैं जब सबसे अधिक कीड़े मकोड़े या इसी तरह के कई अन्य जीव वातावरण में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं. इन प्राणियों में कई ऐसे जीव भी होते हैं जो खुली आँखों से हमें दिखाई भी नही देते हैं और ऐसे में यदि मनुष्य जाति अधिक चलना-फिरना करे तो  इस तरह के जीवों को नुकसान पहुचता हैं जो जैन धर्म की विचारधारा के विपरीत एक तरह की हिंसा मानी जाती हैं. अपनी इसी विचार को ध्यान में रख कर भगवान महावीर ने सभी लोगों से यहीं कहाँ कि इन चार महीनो में हम सब को एक ही जगह रह कर धर्म कल्याण के लिय कार्य करना चाहिए. तब से महावीर की इन बातों को जैन साधू सिरोधार्य कर के हर वर्ष किसी एक स्थान का चयन कर ठहर जाते हैं और वही से लोगों को धर्म और कल्याण की बाते समझाते हैं.
       इस पर्युषण पर्व का मुख्य उद्देश्य यह होता हैं कि जैन धर्म में उल्लेखित अहिंसा का विचार पूरी दुनिया में जाए और जितना संभव हो सके मनुष्य जाति दुनिया में व्याप्त बाकि प्राणियों की मृत्यु का कारण न बने। पर्युषण में दान, शील, तप व भाव रूप चार प्रकार के धर्म की आराधना की जाती है। इस में भी भाव धर्म की विशेष महत्ता है। दान, शील व तप रूप धर्म-क्रिया मात्र भाव-धर्म को पुष्ट करने के साधन हैं। पर्युषण में अनुकम्पा दान, सुपात्र दान व अभय दान रूप दान-धर्म, सदाचार, विषय त्याग, ब्रह्मचर्य अदि रूप शील धर्म, उपवास, आयम्बिल, विगय त्याग, रसत्याग आदि रूप बाह्य धर्म व प्रायश्चित्त, विनय, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान व कायोत्सर्ग रूप अभ्यंतर तप की आराधना करनी चाहिए।
     यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय−व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ−सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ−सफाई करते हैं। पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है। 
      पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। 
जैनी आचरण और व्यवहार से जीव मात्र की रक्षा को अपना परम कर्तव्य मानते हैं। विशेषकर चातुर्मास के इन दिनों परिवेश में और अप्रत्यक्ष रूप से भी पशु हिंसा से बचने का यथासंभव प्रयास किया जाता है। सूक्ष्म जीवों के नाश की आशंका को देखते हुए आहार में 'खाद्य-अखाद्य' का विशेष ध्यान रखा जाता है। जैन समुदाय की भावनाओं को देखते हुए पर्युषण पर्व के दौरान मुंबई में नियत दिन कत्लखाने बंद रखे जाते हैं। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक त्योहार है। पर्व शुरू होने के साथ ही ऐसा लगता है मानो किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो। यह पर्व मैत्री और शांति का पर्व है। जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्यूषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। उन्हें वे दसलक्षण के नाम से भी संबोधित करते हैं। यह पर्व अपने आप में ही क्षमा का पर्व है। इसलिए जिस किसी से भी आपका बैरभाव है, उससे शुद्ध हृदय से क्षमा मांग कर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें। 
          भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम हैं। संसार के सारे तीर्थ जिस प्रकार समुद्र में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार दुनिया भर के संयम, सदाचार एवं शील ब्रह्मचर्य में समाहित हो जाते हैं। मानव की सोई हुई अन्तः चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है। जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो।
       दशलक्षण पर्व, जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण पर्व है। दशलक्षण पर्व संयम और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के जातक अपने मुख्य दस लक्षणों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। जैन धर्मानुसार दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य को इस संसार से मुक्ति मिल सकती है। संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र त्यौहार पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत−उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा भगवान महावीर का अभिषेक कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं जैसे बाहर का खाना पूर्णतः वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैन धर्मावलंबी अपने यहां पर क्षमा की विजय पताका फहराते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलकर अपने अगले भव को सुधारने का प्रयत्न करते हैं। आइए! हम सभी अपने राग−द्वेष और कषायों को त्याग कर भगवान महावीर के दिखाए मार्ग पर चलकर विश्व में अहिंसा और शांति का ध्वज फैलाएं। क्षमा करें और कराएं।इस दौरान जैन साधु व साध्वी किसी एक जगह पर स्थिर होकर तप, प्रवचन तथा जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में ध्यान लगाते हैं, जबकि आम धर्मानुयायी त्याग-प्रत्याख्यान, पौषध सामायिक, स्वाध्याय, जप-तप, आगम, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा, संयम और उपवास के साथ जैन मुनियों की सेवा में दिन व्यतीत करते हैं।
पर्यूषण पर्व का उद्देश्य ----
पर्यूषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करके आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है। पर्यूषण पर्व के इस शुभ अवसर पर जैन संत और विद्वान समाज को पर्यूषण पर्व की दशधर्मी शिक्षा को अनुसरण करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
पर्यूषण पर्व समारोह -----
पर्यूषण पर्व के दौरान मंदिर, उपाश्रय, स्थानक तथा समवशरण परिसर में अधिकाधिक समय तक रहना जरूरी माना जाता है। इस दौरान कई जातक निर्जला व्रत भी करते हैं।
पर्यूषण पर्व की शिक्षा ---
मानव की सोई हुई अन्त: चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है।
एकता पर्व----
पर्युषण, जैन अनुयायियों के आध्यात्मिक पर्वों में अग्रगण्य और जैन एकता का प्रतीक पर्व है। इसका अर्थ है परि+उषण यानी आत्मा के उच्चभावों में रमण और आत्मा के सात्विक भावों का चिंतन। श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी या त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी या पंचमी तक अष्टदिवसीय साधना के रूप में तथा दिगम्बर परम्परा में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद चतुर्दशी तक क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, तप, त्याग, अकिचन्य, ब्रह्मचर्य आदि दस लक्षण पर्व धर्म आराधना के रूप में मनाया जाता है।
     चातुर्मास प्रारंभ से एक माह बीस दिन बाद तक का काल 'संवत्सरी पर्व' कहलाता है। पर्युषण पर्व के आखिरी दिन, यानी संवत्सरी पर गुरू के सन्मुख प्राणीमात्र से ज्ञात-अज्ञात, स्वार्थ या प्रमादवश हुई गलतियों के लिए अंतरमन की गहराई से जीव मात्र से क्षमायाचना की जाती है तथा दूसरों को क्षमादान दिया जाता है।
आठ कर्मों के निवारण के लिए साधना----
अपने चारों ओर फैले बाहर के विषय – विकारों से मन को हटा कर अपने घर में आध्यात्मिक भावों में लीन हो जाना। यदि हम हर घड़ी हर समय अपनी आत्मा का शोधन नहीं कर सकते तो कम से कम पर्युषण के इन आठ दिनों में तो अवश्य ही करें। आठ कर्मों के निवारण के लिए साधना के ये आठ दिन जैन परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण बन गए। सारांश में हम यह कह सकते हैं कि इन आठ दिनों में धर्म ही जीवन का रूप ले लेता है। धर्म से समाज में सहयोग और सामाजिकता का समावेश होता है। बगैर इसके समाज का अस्तित्व संभव नहीं है। इसी से समाज , जाति और राष्ट्र में समरसता आती है और उसकी उन्नति होती है। इसी से मनुष्य का जीवन मूल्यवान बनता है। धर्म प्रधान व्यक्ति सभी को समान दृष्टि से देखता है। अमीर – गरीब , ऊंच – नीच सभी उसकी दृष्टि में बराबर हैं। धर्म प्रधान व्यक्ति न किसी से डरता है और न ही उससे कोई डरता है। धर्म तो जीवन की औषधि है। वह जब मनुष्य में आता है तो ईर्ष्या , मद , घृणा जैसे कई रोग व विकार स्वत : दूर हो जाते हैं। पर्युषण महापर्व धर्ममय जीवन जीने का संदेश देता है।
     इन दिनों साधु वर्ग के लिए पांच विशेष कर्तव्य बताए गए हैं -संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, यथाशक्ति तपश्चर्या, आलोचना और क्षमायाचना। इसी तरह गृहस्थों (श्रावकों) के लिए भी कुछ विशेष कर्तव्य बताए गए हैं। इनमें मुख्य हैं -शास्त्रों का श्रवण, यथाशक्ति तप, अभयदान, सुपात्र दान, ब्रह्मचर्य का पालन, आरंभ स्मारक का त्याग, संघ की सेवा और क्षमा याचना।
आराधना-----
धर्म आराधना और उपासना
इसके अलावा आलस्य तथा प्रमाद का परित्याग करके धर्म आराधना और उपासना के लिए तत्पर बने रहना ही पर्युषण पर्व का मुख्य संदेश है। पर्युषण एक क्षमा पर्व भी है। यह हमें क्षमा मांगने और क्षमा करने की सीख देता है। क्षमा मांगना साहस भरा काम है, न कि दुर्बलता का। क्षमा करना वीरता का काम है। पर्युषण का यह पक्ष हमारे सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को नया जीवन देता है।
       संपूर्ण दुनिया में पर्युषण ही ऐसा पर्व है जो हाथ मिलाने और गले लगने का नहीं, पैरों में झुककर माफी माँगने की प्रेरणा देता है। हम सभी मिलकर इस पर्व के दस दिनों में क्षमा, मार्दव (अहंकार), आर्जव (सरल बनना), शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य ( ये ही दसलक्षण धर्म के सर्वोच्च गुण हैं। ) जो पर्युषण पर्व के रूप में आकर हमें पूरे देशव‍ासियों, प‍ारिवारिकजनों और जैन धर्मावलंबियों और प्राणी मात्र के प्रति सुख-शांति का संदेश देते हुए सभी को क्षमा करने और क्षमा माँगने की प्रेरणा देते हैं। जो व्यक्ति गलती या वैर-विरोध हो जाने पर तुरंत क्षमा माँग लेता है उसे पूरे वर्ष में एक बार नहीं, 365 बार क्षमा करने और माँगने का सौभाग्य मिल जाता है। वर्ष भर छोटे बड़ों को प्रणाम करते हैं पर एकमात्र पर्युषण पर्व ऐसा है जिसमें क्षमा पर्व के दिन सास बहू को, पिता-पुत्र को बड़े-छोटों को प्रणाम करने के लिए अंत:प्रेरित हो उठते हैं। आइए,इस क्षमा पर्व का लाभ उठाएँ।  सबसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगे सभी को जैन पयुर्षण के क्षमावाणी पर्व पर दिल से मिच्छामी दुक्कड़म ‘उत्तम क्षमा’।
 अंत में आप सभी को जय जिनेंद्र।।

जानिए 2019 में कब और कैसे मनाएं गणेश चौथ (गणेश चतुर्थी)

भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को दिन मध्याह्र काल में, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था। इसी कारण मध्याह्र काल में ही भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसे बहुत शुभ माना गया है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 2 सितंबर,2019 (सोमवार) को मनाया जाएगा। भारतीय पुराणों में गणेश जी को विद्या-बुद्धि का प्रदाता, विघ्न-विनाशक और मंगलकारी बताया गया है। हर माह के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत किया जाता है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन  पूजन का शुभ मूहर्त दोपहर 11 बजकर 4 मिनट से 1 बजकर 37 मिनट तक है। पूजा का शुभ मूहर्त करीब दो घंटे 32 मिनट की अवधि है। 
        भाद्र प्रद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व बहुत ही विशेष होता है। इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। हर साल भाद्रपद मास में गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन लोग खासतौर पर गणेश भगवान की पूजा करते हैं। महिलाएं इस दिन व्रत रहती हैं। मान्यता है कि इन 10 दिनों में बप्पा अपने भक्तों के घर आते हैं और उनके दुख हरकर ले जाते हैं। यही वजह है कि लोग उन्हें अपने घर में विराजमान करते हैं। 10 दिन बाद उनका विसर्जन किया जाता है। लगभग 10 दिन तक चलने वाला गणेश चतुर्थी उत्सव इस वर्ष 2 सितंबर 2019 से शुरू होकर 13 सितम्बर (अनन्त चतुर्दशी ) पर सम्पन्न होगा। गणेश चतुर्थी पर लोग अपने घरों में गणेश भगवान को विराजमान करते हैं और गणेश चतुर्थी के दिन उनका विसर्जन किया जाता है। लोक 11, 7 दिन के लिए घर में गणपति को विराजमान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बप्पा इन दिनों में अपने भक्तों के सभी दुख दूर करके ले जाते हैं। 
Know-when-and-how-to-celebrate-Ganesh-Chauth-Ganesh-Chaturthi-in-2019-जानिए 2019 में कब और कैसे मनाएं गणेश चौथ (गणेश चतुर्थी)     ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की महाराष्ट्र में यह त्योहार गणेशोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। ये दस तक त्योहार चलता है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होता है। इस दौरान गणेश की भव्य पूजा की जाती है। लोग अपने घरों में भी इस मौके पर गणेश जी की प्रतिमा का स्थापना करते हैं। गणपति ऐसे देव हैं जिनके शरीर के अवयवों पर संपूर्ण ब्रह्माण का वास होता है। चारों वेद और उनकी ऋचाएं होती हैं। इसलिए गणपति की पूजा सदा आगे से करनी चाहिए। उनकी परिक्रमा लें लेकिन पीठ के दर्शन नहीं करें।
जानिए कैसे करें गणपति की प्रतिष्ठापना---
गजानन को लेने जाएं तो नवीन वस्त्र धारण करें। इसके बाद हर्षोल्लास के साथ उनकी सवारी लाएं। घर में लाने के बाद चांदी की थाली में स्वास्तिक बनाकर उसमें गणपति को विराजमान करें। चांदी की थाली संभव न हो पीतल या तांबे का प्रयोग करें।  घर में विराजमान करें तो मंगलगान करें, कीर्तन करें। लड्डू का भोग भी लगाएं। इसके बाद रोज सुबह -शाम उनकी आरती करें और मोदक का भोग लगाएं और अंतिम दिन विसर्जन करें।
जानिए कैसा हो पूजा स्थल--
आज आप इस समय अपने घर गणपति को विराजमान करें। कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। चार हल्दी की बंद लगाएं। एक मुट्ठी अक्षत रखें। इस पर छोटा बाजोट, चौकी या पटरा रखें। लाल, केसरिया या पीले वस्त्र को उस पर बिछाएं। रंगोली, फूल, आम के पत्ते और अन्य सामग्री से स्थान को सजाएं। तांबे का कलश पानी भर कर, आम के पत्ते और नारियल के साथ सजाएं। यह तैयारी गणेश उत्सव के पहले कर लें। 
जानिए क्यों नही करने चाहिए विघ्नहर्ता गणेश जी की पीठ के दर्शन--
देवों के देव गणपति जी की पूजा करते समय ध्यान रखें कि कभी उनकी पीठ का दर्शन ना करें। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं की विघ्नहर्ता गणपति ऐसे देव हैं जिनके शरीर के अवयवों पर संपूर्ण ब्रह्माण का वास होता है।  गणपति की सूंड पर धर्म का वास है। नाभि में जगत वास करता है। उनकी आंखों या नयनों में लक्ष्य, कानों में ऋचाएं और मस्तक पर ब्रह्मलोक का वास है। हाथों में अन्न और धन, पेट में समृद्धि और पीठ पर दरिद्रता का वास है। इसलिए, पीठ के दर्शन कभी नहीं करने चाहिएं।
विघ्नहर्ता विनायक गणेश जी के कुछ सिद्ध ओर प्रभावी (लाभकारी) मन्त्र ये हैं--

नमस्ते योगरूपाय सम्प्रज्ञातशरीरिणे । असम्प्रज्ञातमूर्ध्ने ते तयोर्योगमयाय च ॥
अर्थ
हे गणेश्वर ! सम्प्रज्ञात समाधि आपका शरीर तथा असम्प्रज्ञात समाधि आपका मस्तक है । आप दोनों के योगमय होने के कारण योगस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।

वामाङ्गे भ्रान्तिरूपा ते सिद्धिः सर्वप्रदा प्रभो । भ्रान्तिधारकरूपा वै बुद्धिस्ते दक्षिणाङ्गके ॥
अर्थ:
प्रभो ! आपके वामांग में भ्रान्तिरूपा सिद्धि विराजमान हैं, जो सब कुछ देनेवाली हैं तथा आपके दाहिने अंग में भ्रान्तिधारक रूपवाली बुद्धि देवी स्थित हैं ।

मायासिद्धिस्तथा देवो मायिको बुद्धिसंज्ञितः । तयोर्योगे गणेशान त्वं स्थितोऽसि नमोऽस्तु ते ॥
अर्थ :
भ्रान्ति अथवा माया सिद्धि है और उसे धारण करनेवाले गणेशदेव मायिक हैं । बुद्धि संज्ञा भी उन्ही की है । हे गणेश्वर ! आप सिद्धि और बुद्धि दोनों के योग में स्थित हैं । आपको बारम्बार नमस्कार है ।

जगद्रूपो गकारश्च णकारो ब्रह्मवाचकः । तयोर्योगे गणेशाय नाम तुभ्यं नमो नमः ।।

अर्थ :
गकार जगत्स्वरूप है और णकार ब्रह्मका वाचक है । उन दोनों के योग में विद्यमान आप गणेश-देवता को बारम्बार नमस्कार है ।

चौरवद्भोगकर्ता त्वं तेन ते वाहनं परम् । मूषको मूषकारूढो हेरम्बाय नमो नमः ॥

अर्थ :
आप चौर की भाँति भोगकर्ता हैं, इसलिए आपका उत्कृष्ट वाहन मूषक है । आप मूषक पर आरूढ़ हैं । आप हेरम्ब को बारम्बार नमस्कार है ।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए की आप कैसे अपनी  राशि के अनुसार गणेश जी को भोग लगाकर इस गणेशोत्सव पर उनकी विशेष कृपा पा सकते हैं।
  1. मेष राशि वाले लोग - बप्पा को छुआरा और गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।
  2. वृषभ राशि वाले लोग -- गणपति जी को मिश्री या नारियल से बने लड्डू का भोग लगाएं।
  3. मिथुन राशि वाले -- लोग गणपति को मूंग के लड्डू का भोग लगाएं।
  4. कर्क राशि वाले -- लोग मोदक, मक्खन या खीर का भोग लगाएं। 
  5. सिंह राशि वाले --जातक गु़ड़ से बने मोदक या छुआरे का भोग लगाएं ।    
  6. कन्या राशि वाले-- लोग हरे फल या किशमिश का भोग लगाएं। 
  7. तुला राशि वाले -- जातक मिश्री, लड्डू और केला का भोग लगाएं।
  8. वृश्चिक राशि वाले --लोग गणपति को छुआरा और गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।  
  9. धनु राशि वाले -- लोग भगवान गणेश को लगाएं मोदक व केला का भोग।
  10. मकर राशि वाले -- लोग तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
  11. कुंभ राशि वाले -- लोग गणपति को गु़ड़ के लड्डू का भोग लगाएं।
  12. मीन राशि वाले -- लोग बेसन के लड्डू, केला व बादाम का भोग लगाएं।

जानिए इस वर्ष गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त आपकी सुविधानुसार--
गणेश चतुर्थी के दिन भी गणपति को वारजमान कराकर विसर्जन कराया जा सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया बहुत लोगों द्वारा नहीं अपनाई जाती और वे कुछ दिन (3 दिन,5 दिन, 7 दिन या 11 दिन) भगवान गणेश को अपने घर पर रखने के बाद ही विदाई देते हैं। इस त्योहार के दौरान भक्त अमूमन 7 से 11 दिन के लिए अपने घर में गणपति को विराजमान कराते हैं। वहीं, कुछ लोग 3, 5, 7 या 10 दिन में भी गणपति का विसर्जन करते हैं। इस तरह से 11 दिन चलने वाला गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त हो जाता है।

ऐसे में पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जाने इस वर्ष 2019 में गणेशोत्सव के दिन के हिसाब से गणपति विसर्जन के शुभ मुहूर्त --
गणेश चतुर्थी (स्थापना) के दिन विसर्जन (2 सितंबर, 2019 को)के शुभ मुहूर्त इस तरह रहेंगें--
  • दोपहर में मुहूर्त: 1.55 AM से 6.38 PM तक 
  • शाम में मुहूर्त: 6.38 PM से 8.04 PM 
  • रात का मुहूर्त: 10.55 PM से 12.21 AM (3 सितंबर)
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 1.47 AM से 6.04 AM (3 सितंबर)

तीन दिन पर गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त  --
  • सुबह का मुहूर्त: 6.04 AM से 9.12 AM तक और फिर 10.46 AM से 12.20 PM तक 
  • दोपहर में मुहूर्त: 3.28 PM से 6.36 PM तक 
  • शाम में मुहूर्त: 8.20 PM से 12.20 AM (5 सितंबर) 
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 3.12 AM से 4.39 AM (5 सितंबर)

सात दिन होने पर गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त--
  • सुबह का मुहूर्त: 7.39 AM से 12.19 PM 
  • दोपहर में मुहूर्त: 1.52 PM से 3.25 PM  
  • शाम में मुहूर्त: 6.31 PM से 10.52 PM 
  • रात का मुहूर्त: 1.46 AM से 03.13 AM (9 सितंबर) 
  • तड़के सुबह मुहूर्त: 4.40 AM से 6.07 AM (9 सितंबर)

गणेश (अनन्त) चतुर्दशी यानी गणेश महोत्सव के 11वें दिन अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन का शुभ मुहूर्त--
  • सुबह का मुहूर्त: 6.08 AM से 7.40 AM और फिर 10.45 AM से 3.22 PM 
  • दोपहर में मुहूर्त: 4.54 PM से 6.27 PM  
  • शाम में मुहूर्त: 6.27 PM से 9.22 PM 
  • रात का मुहूर्त: 12.18 AM से 1.45 AM (13 सितंबर)

जाने और समझें उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर के महत्व को

प्रसिद्ध उज्जैन स्थित नागचन्द्रेश्वर मंदिर देश का एक ऐसा मंदिर है जिसके कपाट साल में केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं। हालांकि यहां ऐसी कोई विषम भौगोलिक या प्राकृतिक परिस्थिति नहीं है, तब भी इस मंदिर के पट केवल सावन महीने में नागपंचमी के दिन खोले जाते हैं। नागचन्द्रेश्वर मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर के परिसर में सबसे ऊपर यानी तीसरे खंड में स्थित है. ग्यारहवीं शताब्दी के इस मंदिर में नाग पर आसीन शिव-पार्वती की अतिसुंदर प्रतिमा है, जिसके ऊपर छत्र के रूप में नागदेवता अपना फन फैलाए हुए हैं।
       हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परम्परा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर जी का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाँकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि  नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं। भगवान शिव के इस रुप को नागचन्द्रेश्वर महादेव कहा जाता है. यहां की परंपरा के अनुसार आम दर्शनार्थी नागचन्द्रेश्वर महादेव का दिव्य दर्शन वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी पर्व के दिन ही कर पाते हैं।
जाने और समझें उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर के महत्व को-Know-the-Importance-of-Ujjain-Nagchandreshwar-Templeगौरतलब है कि श्री महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में बंटा है और इस मंदिर के विशाल प्रांगण पहली मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर, दूसरी मंजिल पर श्री ओंकारेश्वर और तीसरी मंजिल पर भगवान नागचन्द्रेश्वर स्थापित हैं।  ऐतिहासिक साक्ष्य यह बताते हैं कि श्री नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी थी. नागपंचमी पर्व के अवसर पर श्री महाकालेश्वर और श्री नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की जाती है।नागचंद्रेश्वर मंदिर में  11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।
  पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं। उज्जैन (मप्र) के महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। ये मंदिर साल में एक बार नाग पंचमी पर ही खुलता है। मान्यता है कि इस मंदिर में विराजित नाग चंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष और दुर्भाग्य दूर हो जाता है।
    प्राचीन परंपरा अनुसार का एकमात्र ऐसा भगवान नागचन्द्रेश्वर का मंदिर है जो भारतीय संस्कृति के अनुसार वर्ष में केवल श्रावण शुक्ल की पंचमी के दिन आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है. 60 फुट ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के नागपंचमी के पर्व के श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये पहुंचने हेतु पुराने समय में एक-एक फुट की सीढियां बनाई थीं जो रास्ता संकरा और छोटा था. इस रास्ते से एक समय में एक ही दर्शनार्थी आ जा सकता था. लेकिन वर्ष प्रतिवर्ष देश के विभिन्न प्रांतों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को देखते हुए एक अन्य लोहे की सीढियां का निर्माण कराया गया था. वर्तमान में आने जाने के अलग-अलग रास्ते बनाये गये हैं. 
      इन लोहे की सीढियों के मार्ग के निर्माण होने से एक दिन में लाखों श्रद्धालु कतारबद्ध होकर नागचन्द्रेश्वर मंदिर में दर्शन का पुण्य लाभ लेते है. महाकालेश्वर मंदिर के महंत प्रकाशपुरी ने बताया कि नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी और चमत्कारिक एवं आकर्षक प्रतिमा के साथ श्री लक्ष्मी माता और शंकर पार्वती नंदी पर विराजित हैं। यह मंदिर शिखर के प्रथम तल पर स्थित है और नागचन्द्रेश्वर भगवान के साथ इनका भी पूजन नागपंचमी के दिन किया जाता है. उज्जैन में गत 17 जुलाई 2019 से शुरू हुए श्रावण माह की नागपंचमी के दिन में भगवान महाकालेश्वर मंदिर सहित अन्य महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में दर्शनार्थी दर्शन के लिये आते हैं. महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा भगवान महाकालेश्वर और भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए आये दर्शनार्थियों को नागपंचमी पर्व पर दोनों अलग-अलग मंदिर आने जाने के पृथक व्यवस्था की जाती है।
जानिए क्या है पौराणिक मान्यता
सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। लेकिन महाँकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।
     यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।
  • नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए इस वर्ष 5 अगस्त 2019 को मंदिर के पट खुलेंगे।  नागपंचमी के बाद मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे।
  • नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। 
  • नागपंचमी पर्व पर बाबा महाँकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।
  • 5 अगस्त 2019 को (नागपंचमी के शुभ अवसर पर) को दोपहर 12 बजे पूजा होगी, यह सरकारी पूजा होगी यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है।इसके बाद रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा।
  • महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थित श्रीनागचंद्रेश्वर मंदिर के पट नागपंचमी के दिन साल में एक बार 24 घंटे के लिए खुलते हैं। इस साल नागपंचमी 5 अगस्त, सोमवार के दिन पड़ रही है, वहीं मंदिर के कपाट रविवार की रात को 12 बजे खोल दिए जाएंगे। मान्यताओं के अनुसार यहां मंदिर में नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।

विश्व की एकमात्र अद्भुत प्रतिमा हैं 
नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।
महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ी विशेष जानकारी (बातें)
  • मध्य प्रदेश के उज्जैन में पवित्र शिप्रा नदी के तट पर बसे उज्जैन को पुराने समय में अवंतिका, उज्जयिनी आदि नामों से जाना जाता था। यहां शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग हैं।
  • महाकाल भगवान के दर्शन से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। इस ज्योतिर्लिंग के महत्व और शक्तियों का वर्णन कई ग्रंथों में मिलता हैं। महाकाल ज्योतिर्लिंग को कालों का काल माना जाता हैं। कहा जाता है कि इनके दर्शन करने से मनुष्य को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
  • उज्जैन प्राचीन सप्त पुरियों में से एक है। कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य के समय उज्जैन भारत की राजधानी थी। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने यहीं पर महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी।
  • उज्जैन को ज्योतिष विद्या का केन्द्र भी माना जाता है। साथ ही, इसी स्थान से समय की गणना भी की जाती है। इसलिए इस स्थान को पृथ्वी के नाभि प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है।
  • रोज सुबह महाकाल की भस्म आरती होती है।

कैसे पहुंचे उज्जैन 
  • हवाई मार्ग-उज्जैन से लगभग 60 किमी दूरी पर इंदौर का एयरपोर्ट है। यहां तक हवाई मार्ग से पहुंच सकते हैं। इसके बाद रेल या सड़क मार्ग से महाकाल मंदिर पहुंचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग-देश के लगभग सभी बड़े शहरों से उज्जैन के लिए रेल गाड़ियां मिल जाती हैं।
  • सड़क मार्ग-उज्जैन भोपाल से करीब 200 किमी और इंदौर से करीब 60 किमी दूर स्थित है। सभी प्रमुख शहरों से उज्जैन पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से भी कई साधन मिल जाते हैं।

जानिए स्वस्तिक का अर्थ,प्रभाव, परिणाम एवं कारण

स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है।
         ‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है। स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 
Know-the-meaning-effect-results-and-reasons-of-the-swastika-जानिए स्वस्तिक का अर्थ,प्रभाव, परिणाम एवं कारण       जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 
           ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की भारतीय संस्कृति में मांगलिक कार्यो में हर काम की शुरुआत में स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। स्वस्तिक को कल्याण का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू परंपरा के अनुसार स्वस्तिक को सर्व मंगल , कल्याण की दृष्टि से , सृष्टि में सर्व व्यापकता ही स्वास्तिक का रहस्य है। अनंत शक्ति, सौन्दर्य, चेतना , सुख समृद्धि, परम सुख का प्रतीक माना जाता है। स्वस्तिक  चिन्ह लगभग हर समाज मे आदर से पूजा जाता है क्योंकि स्वस्तिक के चिन्ह की बनावट ऐसी होती है, कि वह दसों दिशाओं से सकारात्मक एनर्जी को अपनी तरफ खींचता है। इसीलिए किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले पूजन कर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। ऐसे ही शुभ कार्यो में आम की पत्तियों को आपने लोगों को अक्सर घर के दरवाजे पर बांधते हुए देखा होगा क्योंकि आम की पत्ती ,इसकी लकड़ी ,फल को ज्योतिष की दृष्टी से भी बहुत शुभ माना जाता है। आम की लकड़ी और स्वास्तिक दोनों का संगम आम की लकड़ी का स्वस्तिक उपयोग किया जाए तो इसका बहुत ही शुभ प्रभाव पड़ता है। यदि किसी घर में किसी भी तरह वास्तुदोष हो तो जिस कोण में वास्तु दोष है उसमें आम की लकड़ी से बना स्वास्तिक लगाने से वास्तुदोष में कमी आती है क्योंकि आम की लकड़ी में सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करती है। यदि इसे घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाए तो घर के सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। 
        इसके अलावा पूजा के स्थान पर भी इसे लगाये जाने का अपने आप में विशेष प्रभाव बनता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मंगल प्रसंगों के अवसर पर पूजा स्थान तथा दरवाजे की चौखट और प्रमुख दरवाजे के आसपास स्वस्तिक चिह्न् बनाने की परंपरा है। वे स्वस्तिक कतई परिणाम नहीं देते, जिनका संबंध प्लास्टिक, लोहा, स्टील या लकड़ी से हो। सोना, चांदी, तांबा अथवा पंचधातु से बने स्वस्तिक प्राण प्रतिष्ठित करवाकर चौखट पर लगवाने से सुखद परिणाम देते हैं, जबकि रोली-हल्दी-सिंदूर से बनाए गए स्वस्तिक आत्मसंतुष्टि ही देते हैं। अशांति दूर करने तथा पारिवारिक प्रगति के लिए स्वस्तिक यंत्र रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य तथा दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी श्रीयंत्र के साथ लगाना लाभदायक है।
         ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अकेला स्वस्तिक यंत्र ही एक लाख बोविस घनात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम है। वास्तुदोष के निवारण में भी चीनी कछुआ ७00 बोविस भर देने की क्षमता रखता है, जबकि गणोश की प्रतिमा और उसका वैकल्पिक स्वस्तिक आकार एक लाख बोविस की समानता रहने से प्रत्येक घर में स्थापना वास्तु के कई दोषों का निराकरण करने की शक्ति प्रदान करता है। गाय के दूध, गाय के दूध से बने हुए दही और घी, गोनीत, गोबर, जिसे पंचगव्य कहा जाता है, को समानुपात से गंगा जल के साथ मिलाकर आम अथवा अशोक के पत्ते से घर तथा व्यावसायिक केंद्रों पर प्रतिदिन छिटकाव करने से ऋणात्मक ऊर्जा का संहार होता है। तुलसी के पौधे के समीप शुद्ध घी का दीपक प्रतिदिन लगाने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। 
       ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। गृहप्रवेश से पहले मुख्य द्वार के ऊपर स्वस्तिक चिह्व अंकित करके कल्याण की कामना की जाती है। देवपूजन, विवाह, व्यापार, बहीखाता पूजन, शिक्षारम्भ तथा मुण्डन-संस्कार आदि में भी स्वस्तिक-पूजन आवश्यक समझा जाता है। महिलाएँ अपने हाथों में मेहन्दी से स्वस्तिक चिह्व बनाती हैं। इसे दैविक आपत्ति या दुष्टात्माओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। 
    स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। सु का अर्थ अच्छा, अस का अर्थ सत्ता या अस्तित्व और क का अर्थ कर्त्ता या करने वाले से है। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द का अर्थ हुआ अच्छा या मंगल करने वाला। अमरकोश में भी स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध अर्थात् सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। स्वस्तिक शब्द की निरुक्ति है – स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
          प्राचीन काल में हमारे यहाँ कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने से पूर्व मंगलाचरण लिखने की परम्परा थी, लेकिन चूँकि आम आदमी के लिए मंगलाचरण लिखना सम्भव नहीं था, इसलिए पातंजल योग के अनुसार ऋषियों ने स्वस्तिक चिह्व का निर्माण किया, ताकि उसे बनाने मात्र से सभी कार्य सानन्द सम्पन्न हो सकें। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोडी और आगे की तरफ मुडी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुडती हैं। इसे 'दक्षिणावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुडती हैं। इसे 'वामावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 
      जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही 'वामावर्त स्वस्तिक' अंकित था। परिणामस्वरूप उसे पराजय का मुख देखना पडा। स्वस्तिक की दो रेखाएँ पुरुष और प्रकृति की प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्व को विष्णु, सूर्य, सृष्टिचक्र तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे गणेश का प्रतीक मानकर इसे प्रथम वन्दनीय भी माना है। पुराणों में इसे सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना गया है। वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। यास्काचार्य ने इसे ब्रह्म का ही एक स्वरूप माना है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को हिन्दुओं के चार वर्णों की एकता का प्रतीक मानते हैं। इन भुजाओं को ब्रह्मा के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में भी स्वीकार किया गया है। 
       स्वस्तिक धनात्मक चिह्व या 'प्लस' को भी इंगित करता है, जो अधिकता और सम्पन्नता का प्रतीक है। स्वस्तिक की खडी रेखा को स्वयं ज्योतिर्लिंग का तथा आडी रेखा को विश्व के विस्तार का भी संकेत माना जाता है। इन चारों भुजाओं को चारों दिशाओं के कल्याण की कामना के प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, जिन्हें बाद में इसी भावना के साथ रेडक्रॉस सोसायटी ने भी अपनाया। 'इलेक्ट्रोनिक थ्योरी' ने इन दो भुजाओं को नगेटिव और पोजिटिव का भी प्रतीक माना जाता है, जिनके मिलने से अपार ऊर्जा प्राप्त होती है। स्वस्तिक के चारों ओर लगाये जाने वाले बिन्दुओं को भी चार दिशाओं का प्रतीक माना गया है। एक पारम्परिक मान्यता के अनुसार चतुर्मास में स्वस्तिक व्रत करने तथा मन्दिर में अष्टदल से स्वस्तिक बनाकर उसका पूजन करने से महिलाओं को वैधव्य का भय नहीं रहता। पद्मपुराण में इससे संबंधित एक कथा का भी उल्लेख है। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हमारे मांगलिक प्रतीकों में स्वस्तिक एक ऐसा चिह्व है, जो अत्यन्त प्राचीन काल से लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों में प्रचलित रहा है। भारत में तो इसकी जडें गहरायी से पैठी हुई हैं ही, विदेशों में भी इसका काफी अधिक प्रचार प्रसार हुआ है। अनुमान है कि व्यापारी और पर्यटकों के माध्यम से ही हमारा यह मांगलिक प्रतीक विदेशों में पहुँचा। भारत के समान विदेशों में भी स्वस्तिक को शुभ और विजय का प्रतीक चिह्व माना गया। इसके नाम अवश्य ही अलग-अलग स्थानों में, समय-समय पर अलग-अलग रहे। सिन्धु-घाटी से प्राप्त बर्तन और मुद्राओंे पर हमें स्वस्तिक की आकृतियाँ खुदी मिली हैं, जो इसकी प्राचीनता का ज्वलन्त प्रमाण है। सिन्धु-घाटी सभ्यता के लोग सूर्यपूजक थे और स्वस्तिक चिह्व, सूर्य का भी प्रतीक माना जाता रहा है। ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी की खण्डगिरि, उदयगिरि की रानी की गुफा में भी स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मत्स्य पुराण में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वस्तिक की चर्चा की गयी है। पाणिनी की व्याकरण में भी स्वस्तिक का उल्लेख है। पाली भाषा में स्वस्तिक को साक्षियों के नाम से पुकारा गया, जो बाद में 'साखी' या साकी कहलाये जाने लगे। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वीकृत अष्टमंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। स्वस्तिक चिह्व की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल की प्रतीक माना जाता है। वे हैं – अरहन्त-मंगल, सिद्ध-मंगल, साहू-मंगल और 'केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगल'। महात्मा बुद्ध की मूर्तियों पर और उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिह्व मिलते हैं। अमरावती के स्तूप पर स्वस्तिक चिह्व हैं। विदेशों में इस मंगल-प्रतीक के प्रचार-प्रसार में बौद्ध धर्म के प्रचारकों का भी काफी योगदान रहा है। 
         बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण ही जापान में प्राप्त महात्मा बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हुए मिले हैं। ईरान, यूनान, मैक्सिको और साइप्रस में की गई खुदाइयों में जो मिट्टी के प्राचीन बर्तन मिले हैं, उनमें से अनेक पर स्वस्तिक चिह्व हैं। आस्ट्रिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में अपोलो देवता की एक प्रतिमा है, जिस पर स्वस्तिक चिह्व बना हुआ है। टर्की में ईसा से २२०० वर्ष पूर्व के ध्वज-दण्डों में अंकित स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। इटली के अनेक प्राचीन अस्थि कलशों पर भी स्वस्तिक चिह्व हैं। एथेन्स में शत्रागार के सामने यह चिह्व बना हुआ है। स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड में अनेक ऐसे प्राचीन पत्थर मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हैं। प्रारम्भिक ईसाई स्मारकों पर भी स्वस्तिक चिह्व देखे गये हैं। कुछ ईसाई पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि ईसाई धर्म के प्रतीक 'क्रॉस' का भी प्राचीनतम रूप स्वस्तिक ही है। छठी शताब्दी में चीनी राजा वू ने स्वस्तिक को सूर्य के प्रतीक के रूप में मानने की घोषणा की थी। 
         चीन में ताँगवंश के इतिहास-लेखक फुंगल्से ने लिखा है – "प्रतिवर्ष सातवें महीने के सातवें दिन मकडयों को लाकर उनसे जाले में स्वस्तिक चिह्व बुनवाते हैं। अगर कहीं किसी को पहले से ही जाले में स्वस्तिक चिह्व बना हुआ मिल जाए तो उसे विशेष सौभाग्य का सूचक मानते हैं।" तिब्बत में मृतकों के साथ स्वस्तिक चिह्व रखने की प्राचीन परम्परा रही है। बेल्जियम के नामूर संग्रहालय में एक ऐसा उपकरण रखा है, जो हड्डी से बना हुआ है। उस पर क्रॉस के कई चिह्व बने हुए हैं तथा उन चिह्वों के बीच में एक स्वस्तिक चिह्व भी है। इटली के संग्रहालय में रखे एक भाले पर भी स्वस्तिक का चिह्व है। रेड इण्डियन, स्वस्तिक को सुख और सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। वे इसे अपने आभूषणों में भी धारण करते हैं। इस प्रकार हमारा मंगल-प्रतीक स्वस्तिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सदैव पूज्य और सम्माननीय रहा है तथा इसके इस स्वरूप में हमारे यहाँ आज भी कोई कमी नहीं आयी है। 
          ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
          स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। 
        भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 
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ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिन्दू धर्म परंपराओं में स्वस्तिक शुभ व मंगल का प्रतीक माना जाता है। इसलिए हर धार्मिक, मांगलिक कार्य, पूजा या उपासना की शुरुआत स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर की जाती है। धर्मशास्त्रों में स्वस्तिक चिन्ह के शुभ होने और बनाने के पीछे विशेष कारण बताया गया हैं। 
जानते हैं यह विशेष बात – 
सूर्य और स्वस्तिक सूर्य देव अनेक नामो वाले प्रत्यक्ष देव है , यह अपनी पृथ्वी को ही नहीं अपितु अपने विशाल परिवार जिसमें गृह नक्श्तर आदि प्रमुख हैं अक सञ्चालन करते हैं स्वस्तिक का अर्थ है >>सुख,और आनंद देने वाला चतुष्पथ चोराहा . ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सूर्य और स्वस्तिक का कितना गहरा सम्बन्ध है यह इस से सोपस्ट हो जाता है देवत गोल और नक्श्तर मार्ग में से चारो दिशाओं के देवताओं से स्वस्तिक बनता है और इस मार्ग में आने वाले सभी देवी देव भी हमें स्वस्ति प्रदान करते हैं . वेदों में इसका लेख बहुत देखने को मिलता है..
       स्वस्तिक का बहुत ही महत्व है , इससे सुख,वैभव,यश,लक्ष्मी , कीर्ति और आनंद मिलता है, और हर शुभ कार्य में स्वस्तिक को प्रथम और प्रमुख स्थान प्राप्त होता है, वैदिक युग से ही इनकी सर्व मान्यता पाई और देखी जाती है, दरअसल, शास्त्रों में स्वस्तिक विघ्रहर्ता व मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश का साकार रूप माना गया है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसमें जो चार बिन्दियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में भी स्वस्तिक के श्री गणेश स्वरूप होने की पुष्टि होती है। हिन्दू धर्म की पूजा-उपासना में बोला जाने वाला वेदों का शांति पाठ मंत्र भी भगवान श्रीगणेश के स्वस्तिक रूप का स्मरण है। 
      यह शांति पाठ है – स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु इस मंत्र में चार बार आया स्वस्ति शब्द चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन है। असल में स्वस्तिक बनाने के पीछे व्यावहारिक दर्शन यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम, प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सद्भाव, सौंदर्य, विश्वास, शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं श्री गणेश का वास होता है और उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। चूंकि श्रीगणेश विघ्रहर्ता हैं, इसलिए ऐसी मंगल कामनाओं की सिद्धि में विघ्रों को दूर करने के लिए स्वस्तिक रूप में गणेश स्थापना की जाती है। इसीलिए श्रीगणेश को मंगलमूर्ति भी पुकारा जाता है। 
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    ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वस्तिक को हिन्दू धर्म ने ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी धर्मों ने परम पवित्र माना है। स्वस्तिक शब्द सू + उपसर्ग अस् धातु से बना है। सु अर्थात अच्छा, श्रेष्ठ, मंगल एवं अस् अर्थात सत्ता। यानी कल्याण की सत्ता, मांगल्य का अस्तित्व। स्वस्तिक हमारे लिए सौभाग्य का प्रतीक है।स्वस्तिक दो रेखाओं द्वारा बनता है। दोनों रेखाओं को बीच में समकोण स्थिति में विभाजित किया जाता है। दोनों रेखाओं के सिरों पर बायीं से दायीं ओर समकोण बनाती हुई रेखाएं इस तरह खींची जाती हैं कि वे आगे की रेखा को न छू सकें। स्वस्तिक को किसी भी स्थिति में रखा जाए, उसकी रचना एक-सी ही रहेगी। 
      स्वस्तिक के चारों सिरों पर खींची गयी रेखाएं किसी बिंदु को इसलिए स्पर्श नहीं करतीं, क्योंकि इन्हें ब्रहाण्ड के प्रतीक स्वरूप अन्तहीन दर्शाया गया है। स्वस्तिक की खड़ी रेखा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग का संकेत देती है। आड़ी रेखा विश्व के विस्तार को बताती है। स्वस्तिक गणपति का भी प्रतीक है। स्वस्तिक को भगवान विष्णु व श्री का प्रतीक चिह्न् माना गया है। स्वस्तिक की चार भुजाएं भगवान विष्णु के चार हाथ हैं। इस धारणा के अनुसार, भगवान विष्णु ही स्वस्तिक आकृति में चार भुजाओं से चारों दिशाओं का पालन करते हैं। 
      स्वस्तिक के मध्य में जो बिन्दु है, वह भगवान विष्णु का नाभिकमल यानी ब्रम्हा का स्थान है। स्वस्तिक धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उपासना के लिए भी बनाया जाता है। हिंदू व्यापारियों के बहीखातों पर स्वस्तिक चिह्न् बना होता है। जब इसकी कल्पना गणेश रूप में हो तो स्वस्तिक के दोनों ओर दो सीधी रेखाएं बनायी जाती हैं, जो शुभ-लाभ एवं ऋद्धि-सिद्धि की प्रतीक हैं। हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार, अभिमंत्रित स्वस्तिक रूप गणपति पूजन से घर में लक्ष्मी की कमी नहीं होती। पतंजलि योगशास्त्र के अनुसार, कोई भी कार्य निर्विघ्न समाप्त हो जाए, इसके लिए कार्य के प्रारम्भ में मंगलाचरण लिखने का प्रचलन रहा है। परन्तु ऐसे मंगलकारी श्लोकों की रचना सामान्य व्यक्तियों से संभव नहीं। इसी लिए ऋषियों ने स्वस्तिक का निर्माण किया। मंगल कार्यो के प्रारम्भ में स्वस्तिक बनाने मात्र से कार्य संपन्न हो जाता है, यह मान्यता रही है। 
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वैज्ञानिक आधार— 
स्वस्तिक चिह्न् का वैज्ञानिक आधार भी है। गणित में + चिह्न् माना गया है। विज्ञान के अनुसार, पॉजिटिव तथा नेगेटिव दो अलग-अलग शक्ति प्रवाहों के मिलनबिन्दु को प्लस (+) कहा गया है, जो कि नवीन शक्ति के प्रजनन का कारण है। प्लस को स्वस्तिक चिह्न् का अपभ्रंश माना जाता है, जो सम्पन्नता का प्रतीक है। किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पूर्व हम स्वस्तिवाचन करते हैं अर्थात मरीचि, अरुन्धती सहित वसिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह तथा कृत आदि सप्त ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 
 वास्तुशास्त्र में स्वस्तिक—- 
स्वस्तिक का वास्तुशास्त्र में अति विशेष महत्व है। यह वास्तु का मूल चिह्न् है। स्वस्तिक दिशाओं का ज्ञान करवाने वाला शुभ चिह्न् है। ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की घर को बुरी नजर से बचाने व उसमें सुख-समृद्धि के वास के लिए मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वस्तिक चिह्न् बनाया जाता है। स्वस्तिक चक्र की गतिशीलता बाईं से दाईं ओर है। इसी सिद्धान्त पर घड़ी की दिशा निर्धारित की गयी है। पृथ्वी को गति प्रदान करने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत उत्तरायण से दक्षिणायण की ओर है। इसी प्रकार वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा का बड़ा महत्व है। इस ओर भवन अपेक्षाकृत अधिक खुला रखा जाता है, जिससे उसमें चुम्बकीय ऊर्जा व दिव्य शक्तियों का संचार रहे। वास्तुदोष क्षय करने के लिए स्वस्तिक को बेहद लाभकारी माना गया है। मुख्य द्वार के ऊपर सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न् बनाना चाहिए। यह चिह्न् नौ अंगुल लम्बा व नौ अंगुल चौड़ा हो। घर में जहां-जहां वास्तुदोष हो, वहां यह चिह्न् बनाया जा सकता है।
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