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जानिए वास्तु अनुसार कैसा हो भवन निर्माण

Know-how-building-should-be-according-to-Vastu-जानिए वास्तु अनुसार कैसा हो भवन निर्माणवास्तु सिद्धांत के अनुसार किसी भी तरह का मकान, फैक्ट्री, दुकान बनवाते समय सबसे महत्वपूर्ण होता है कि इनका मुख्यद्वार किस ओर, किस दिशा एवं किस स्थान पर होना चाहिए। मुख्य द्वार की दिशा का निर्धारण वस्तुतः भूखण्ड के मार्ग के अनुसार किया जाता है परंतु उस दिशा में कौन सा भाग मुख्य द्वार के लिए उपयुक्त है यह वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में वर्णित है। मकान निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहले मकान का नक्शा तैयार किया जाता है अर्थात मकान किस दिशा में होना चाहिए तथा कौन सा कक्ष किस आकार का बनना चाहिए इस पर विचार किया जाता है लेकिन मकान बनाने की प्रक्रिया से पहले उस मकान का मुख्यद्वार किस दिशा में होना चाहिए इसके विषय में विचार किया जाता है।  
मकान के मुख्यद्वार का निर्माण- 
मकान का नक्शा बनाते समय सबसे पहले उसका मुख्यद्वार निर्धारित किया जाता है। प्रवेश निर्धारण की मुख्य विधि के अनुसार भूखण्ड की जिस दिशा में मुख्यद्वार का निर्माण करना हो उस दिशा की भुजा को नौ भागों में विभाजित करके पांच भाग दाहिनी ओर से, तीन भाग बाईं ओर से छोड़कर बचे भाग में द्वार बनाना चाहिए।
      वास्तुशास्त्र में प्रत्येक भूखण्ड एवं भवन में कुछ स्थान शुभ होने के कारण ग्राह्या एवं कुछ स्थान अशुभ होने के कारण त्याज्य माने जाते रहे हैं। सामने दिए गए चित्र में भूखण्ड की चारों भुजाओं को नौ भागों में बांटा गया है। अग्रांकित चित्र में विभिन्न भागों के लिए एक विशेष अंक प्रदान किया जाता है।
इस अंक के स्थान पर मुख्यद्वार बनवाने का फल निम्नानुसार होता हैः-
अंक             फल
1                रोगभय
2               शत्रुवृद्धि
3               धनलाभ
4            विपुल धनप्राप्ति
5.        धर्म एवं सदाचार वृद्धि
6                पुत्र वैर
7.              स्त्रीदोष
8.              निर्धनता
9               अग्निभय
10            कन्यावृद्धि
11             धनलाभ
12           राजसम्मान
13           क्रोध से हानि
14        झूठ बोलने की आदत
15             क्रूर व्यवहार
16        चोरी से हानि का भय
17          संतान की हानि
18       सेवक प्रवृत्ति, अर्थहानि
19          अनुचित प्रवृत्ति
20              पुत्रलाभ
21            भय, मृत्यु
22             निर्धनता
23             निर्धनता
24        वंश पराक्रम हानि
25       अल्पायु एवं निर्धनता
26             व्यर्थ व्यय
27             धनहानि
28             धनवृद्धि
29          योगक्षेम प्राप्ति
31           सामान्य फल
32             पाप संचय

इन तालिका का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि मुख्यद्वार के लिए उचित स्थान 11-12, 28-29, 3-4-5 हैं परंतु हमारा भूखण्ड दक्षिण दिशा की ओर हो तो 20 पर भी मुख्यद्वार का निर्माण कराया जा सकता है।
प्रत्येक भूखण्ड के चारों ओर चार दिशाएं होती है- पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण। वास्तुशास्त्र में लिखा है कि भूखण्ड की पूर्वी दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर ईशान कोण तक का स्थान उत्तम होता है। इस स्थान पर वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण करने से परिवार में सुखों का आगमन होता है। पूर्व के बीच वाले स्थान से आग्नेय कोण तक का स्थान निम्नकोटि का होता है। भूखण्ड के पश्चिम दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर वायव्य कोण तक का स्थान उत्तम गुणों से पूर्ण माना है। पश्चिम दिशा के बीच वाले स्थान से लेकर नैऋत्य कोण तक का स्थान निम्न गुणों वाला माना गया है। अतः वास्तुशास्त्र में भूखण्ड की उत्तरी दिशा के बीच भाग से लेकर ईशान कोण तक, पूर्व दिशा के बीच से लेकर ईशान कोण तक, दक्षिण दिशा के बीच भाग से आग्नेय कोण तक तथा पश्चिम दिशा के बीच भाग से लेकर वायव्य कोण तक का भाग उत्तम गुणों वाला माना गया है। उत्तर दिशा के बीच वाले भाग से वायव्य कोण तक, पूर्व के बीच भाग से आग्नेय कोण तक तथा दक्षिण दिशा एवं पश्चिम दिशा के बीच भाग से नैऋत्य कोण तक का भाग निम्न गुणों वाला माना गया है।
 उच्चकोटि के मुख्यद्वार- 
वास्तुशास्त्र में भूखण्ड के उत्तर दिशा में ईशान कोण की ओर मुख्यद्वार बनवाना उत्तम होता है। उत्तर दिशा के ईशान कोण वाले स्थान पर मुख्यद्वार बनवाने से इस मकान में रहने वाले को अनेक प्रकार से लाभ मिलता है। भूखण्ड के उत्तर दिशा के ईशान कोण में मुख्यद्वार बनाना चाहिए तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारी सामान रखवाना चाहिए। अतः उत्तर एवं पूर्व दिशा वाला स्थान दक्षिण एवं पश्चिम वाले स्थान से हल्का होता है। वास्तुशास्त्र का आधारभूत नियम है जो कि अत्यंत शुभफलदायक होता है।
भूखण्ड के पूर्व दिशा के ईशान कोण में बनाया गया मुख्यद्वार उच्चकोटि का होता है। इस दिशा में मुख्यद्वार होने से इसमें रहने वाले लोग बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान होते हैं। पूर्व दिशा के ईशान कोण में मुख्यद्वार होने से भारी सामान दक्षिण दिशा में रखा जाता है और आने-जाने का रास्ता उत्तर की ओर होता है जोकि शुभफलदायक होता है। 
भूखण्ड के पश्चिमी वायव्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार उच्चकोटि का होता है। इस कोण में मुख्यद्वार बनाना शुभ फलदायी एवं कल्याणकारी होता है।
निम्नकोटि के मुख्यद्वार-
भूखण्ड के पूर्व आग्नेय कोण में बनाया गया मुख्यद्वार निम्नकोटि का होता है। पूर्वी आग्नेय कोण में द्वार बनाने के परिणाम अच्छे नहीं होते हैं अतः पूर्वी आग्नेय कोण में द्वार कभी न बनवाएं।
भूखण्ड के उत्तरी वायव्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार निम्नकोटि का होता है। इस कोण में मुख्यद्वार बनाने से मकान में निवास करने वालों की मनोस्थिति हमेशा अस्थिर एवं चंचल बनी रहती है। अतः उत्तरी वायव्य कोण में द्वार कभी न बनवाएं।
मुख्यद्वार संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles related to main gate or door-
  1. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान के पश्चिमी ओर बने कक्ष में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कक्ष के उत्तरी अर्द्धभाग की ओर पड़े इससे मुख्यद्वार प्रभावी स्थिति में होगा और धन-धान्य समृद्धि की वृद्धि होती रहेगी।
  2. भूखण्ड चारदीवारी का मुख्यद्वार यदि दक्षिण में हों तो मकान का मुख्यद्वार घर के दक्षिणी ओर के कमरा में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कमरे के पूर्वी अर्द्धभाग में पड़े। यह स्थिति मकान के निवासियों के लिए शुभफलदायक रहेगी।
  3. मकान में द्वार बनवाते समय ध्यान रखें कि द्वार की चौखटें मकान की मुख्य दीवार से लगती हुई न हों। दीवार और द्वार की चौखट के बीच कम से कम चार इंच का अंतर अवश्य ही रहना चाहिए।
  4. द्वार में लगाए गए दरवाजें दो पल्लों वाले एवं अंदर की ओर खुलने वाले होने चाहिए।
  5. मकान के अंदर द्वार, खिड़कियां तथा अलमारियां एक-दूसरे के सामने बनवाएं।
  6. जिस मकान में बहुत से द्वार और आलिंद हों उस द्वार का कोई नियम नहीं होता चाहे जिस ओर दरवाजे बनवाएं।
  7. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार यदि उत्तर में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान के पश्चिमी ओर बने कमरे में इस प्रकार बनवाया जाए कि मुख्यद्वार कमरे के उत्तरी अर्द्धभाग की ओर पड़े, इससे मुख्यद्वार और भी प्रभावी स्थिति में होगा और धन-धान्य समृद्धि की वृद्धि होती रहेगी।
  8. यदि मकान का मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो पूर्व दिशा में एक द्वार बनवाना अनिवार्य है। इसी प्रकार मकान का मुख्यद्वार यदि दक्षिण में स्थित हो तो उस मकान में उत्तर में एक द्वार बनवाना अनिवार्य है। यह सिद्धांत आवासीय मकानों के लिए अति आवश्यक है। इससे मकान में निवास करने वालों की गति पूर्वोंमुखी एवं उत्तरोमुखी रहेगी।
  9. भूखण्ड की चारदीवारी का मुख्यद्वार पूर्व में हो तो मकान का मुख्यद्वार मकान की पूर्वी दिशा के कमरे में बनवाना चाहिए। एक बात का ध्यान रखें कि मकान का मुख्यद्वार उस कमरे के उत्तरी अर्द्धभाग में पड़ता हो। इस प्रकार बनाए गए द्वार से मुख्यद्वार बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली स्थिति में आ जाता है और परिवार के सदस्यों को शुभ व कल्याणकारी फल देता है।
  10. वास्तुशास्त्र में बाहरी एवं भीतरी द्वारों की दिशाओं में चार प्रकार का संबंध माना गया है। जब बाहरी द्वार व भीतरी द्वार एक ही दिशा में आमने-सामने हों तो यह संबंध उत्संग संबंध माना गया है जो कि सर्वोत्तम होता है। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार के बाईं ओर होता हो तो यह संबंध अपसव्य संबंध माना जाता है जो कि अच्छा नहीं होता। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार के दाहिनी ओर होता है तो यह संबंध सत्य संबंध माना गया है जो कि शुभ होता है। जब बाहरी द्वार भीतरी द्वार की विपरीत दिशा में होता हो तो यह संबंध पृष्ट भंग संबंध माना गया है जो कि अशुभ होता है।
  11. दरवाजा अपने आप खुल जाए या बंद हो जाए तो भयदायक होता है। चौखट एक ओर छोटी दूसरी ओर बड़ा हो जाए तो भी अशुभ होता है।
  12. एक दरवाजे के ऊपर यदि दूसरा दरवाजा बनवाना हो तो वह नीचे वाले दरवाजे से आकार में छोटा होना चाहिए तथा ये एक सीध में होने चाहिए।
  13. द्वार के कपाट को खोलने व बंद करने में कोई आवाज नहीं आनी चाहिए।
  14. मुख्यद्वार का आकार मकान के अन्य द्वारों की अपेक्षा बड़ा होना चाहिए।

मकान में दरवाजों की संख्या-
कुछ लोग भ्रमित रहते हैं कि मकान में दरवाजों की संख्या सम होनी चाहिए या विषम। द्वार यदि मकान में उपरोक्त बताए स्थान पर वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाए गए हों तो उनकी संख्या कम हो या विषय कई फर्क नहीं पड़ता। अतः द्वारों की संख्या को महत्व देना आवश्यक नहीं परंतु यदि भूखण्ड की उत्तर दिशा में खाली स्थान न छोड़कर घर में गिनती के आठ द्वारों का निर्माण कराया गया हो तो ऐसी स्थिति में सम संख्याएं शुभ फल नहीं देतीं।
       इसी प्रकार यदि किसी मकान में कुएं, चूल्हें एवं सीढ़ियों का निर्माण शास्त्र सम्मत न करवाया गया हो और दरवाजों की संख्या भी सम संख्या में रखी हो तो इसका फल शुभ नहीं होता। यदि मकान में कुएं, चूल्हे एवं सीढ़ियां वास्तुशास्त्र के अनुसार बनवाए गए हों तो दरवाजों की संख्या चाहे सम हो या विषय कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार मकान में खिड़कियों तथा अलमारियों की संख्या चाहे सम संख्या में हो या विषम इसमें कोई दोष नहीं होता। इसी प्रकार मकान में खिड़कियों तथा अलमारियों की संख्या चाहे सम हो या विषम इसका कोई दोष नहीं होता।
वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में मकान में द्वारों की संख्या संबंधी दिए गए मुख्य निर्देश निम्नानुसार हैं-
  • यदि मकान में चारों दिशाओं में द्वार बनाने हों तो वास्तुशास्त्र के अनुसार ये निम्न स्थानों पर बनवाएं- उत्तर के बीच से ईशान कोण की ओर, पूर्व के बीच भाग से ईशान कोण की ओर, दक्षिण के बीच से आग्नेय कोण की ओर तथा पश्चिम से आग्नेय कोण की ओर।
  • मकान में एक ही प्रवेश द्वार बनाना हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में बनवाना चाहिए। लेकिन माकन दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा की ओर हो तो उसमें कभी एक द्वार नहीं बनवाना चाहिए।
  • अगर मकान में तीन दिशाओं में द्वार बनाना हो तो उत्तर दिशा व पूर्व दिशा में द्वार बनाना आवश्यक है। तीसरा द्वार सुविधानुसार पश्चिम या दक्षिण दिशा में बनाया जा सकता है।
  • अगर मकान में दो प्रवेशद्वार बनाने हों, शुभफल प्राप्त करने के लिए द्वारों को पूर्व दिशा एवं दक्षिण दिशा में ही दो द्वार कभी नहीं बनवाने चाहिए अर्थात मकान मकान में एक प्रवेश द्वार पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में होना अनिवार्य है।

द्वारवेध- मकान के मुख्यद्वार के सामने यदि कोई विघ्न आता हो तो उसे द्वार वेध की संज्ञा दी जाती है जैसे किसी द्वार के सामने खम्भा, सीढ़ी, द्वार, कोण, बाड़ पेड़, मशीन या कोल्हू आदि। मकान के मुख्यद्वार के सामने द्वारवेध नहीं होना चाहिए परंतु यदि द्वारवेध मकान की ऊंचाई के दोगुना से अधिक दूरी पर स्थित हो तो द्वारवेध का अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है। मुख्यद्वार के सामने हमेशा कीचड़ का रहना भी द्वारवेध माना गया है। इस तरह मुख्यद्वार के सामने कीचड़ होने से परिवार में शोक-दुख आदि दोष पैदा करने वाला होता है।
खिड़कियों से संबंधित वास्तु सिद्धांत- 
मकान में वायु का संचरण खिड़कियों के माध्यम से होता है। खिड़कियों से संबंधित वास्तुशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में वर्णित मुख्य नियम निम्नानुसार हैं-
  1. उत्तर दिशा में अधिक खिड़कियां परिवार में धन-धान्य की वृद्धि करती है। लक्ष्मी व कुबेर की दयादृष्टि बनी रहती है।
  2. खिड़कियों का निर्माण संधि स्थाल में नहीं होना चाहिए।
  3. खिड़कियां द्वार के सामने होनी चाहिए जिससे चुम्बकीय चक्र पूर्ण हो सकें। इससे गृह में सुख शांति बनी रहती है।
  4. वायु प्रदूषण से बचने के लिए मकान में जिन दिशाओं से शुद्ध वायु प्रवेश करती है उसके विपरीत दिशाओं में एग्जास्ट फैन लगाना चाहिए। खिड़कियों की संख्या सम होनी चाहिए।
  5. खिड़कियों के पल्ले अंदर की ओर खुलने चाहिएं।
  6. पश्चिम, पूर्व तथा उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ होता है।
  7.  मकान में खिड़कियों का मुख्य लक्ष्य, मकान में शुद्ध वायु के निरंतर प्रवाह के लिए होता है।
  8. खिड़कियां सम संख्या में लगानी चाहिए। लेकिन यदि मकान का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार किया गया हो तो खिड़कियों की संख्या सम हो या विषम कोई फर्क नहीं पड़ता।
  9. खिड़कियां हमेशा दीवार में ऊपर-नीचे न बनाकर एक ही सीध में बनानी चाहिए।

मकान में बॉलकनी एवं बरामदा-
मकानों में बॉलकनी एवं बरामदे का स्थान महत्वपूर्ण होता है। बॉलकनी, बरामदा, टैरेस आदि मकान में खुले स्थान के अंतर्गत आते हैं। इनमें Y के स्थान पर इसे बनाना शुभ माना जाता है तथा N के स्थान पर बनाना अशुभ होता है। भूखण्ड में उत्तर, पूर्व एवं उत्तर-पूर्व के बीच वाले स्थान अर्थात ईशान कोण में अधिक खुला स्थान रखना चाहिए। दक्षिण और पश्चिम में खुला स्थान कम रखना चाहिए। इसी प्रकार मकान में बॉलकनी एवं बरामदे के रूप में उत्तर-पूर्व में खुला स्थान सर्वाधिक होना चाहिए ताकि उसमें रहने वाले सुख-समृद्धि पा सकें। टैरेंस व बरामदा खुले स्थान के अंतर्गत आता है इसलिए सुख-समृद्धि के लिए उत्तर-पूर्व में ही निर्मित करना चाहिए क्योंकि सुबह के समय सूर्य की किरणें एवं प्राकृतिक हवा खिड़कियों के साथ-साथ बरामदे एवं बॉलकनी से भी आती है।
पश्चिम दिशा में जहां तक हो सकें बॉलकनी एवं बरामदा नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि अस्त होते हुए सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद नहीं होती है।
        बॉलकनी एवं बरामदे का स्थान भूखण्ड की दिशा पर निर्भर है परंतु प्रयास यह होना चाहिए कि प्रातः कालीन सूर्य किरणों का प्रवेश एवं प्राकृतिक हवा का प्रवाह मकान में प्राप्त होता रहें। यदि दोमंजिला मकान हो तो पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर मकान की ऊंचाई कम रखनी चाहिए एवं ऊपरी मंजिल में बॉलकनी या बरामदा उत्तर-पूर्व दिशा में ही बनाना चाहिए।

पूजाघर– यदि आपके पास, स्थान हो तो मकान में पूजाघर का निर्माण ईशान कोण व उत्तर दिशा के बीच या ईशान कोण व पूर्व दिशा के बीच करवाना चाहिए। इसके अतिरिक्त मकान में किसी अन्य स्थान पर पूजा घर कभी नहीं बनाना चाहिए। यदि मकान में स्थान का अभाव भी हो तो भी इसी स्थान पर पूजाघर बनवाना चाहिए। ईशान कोण का स्वामी ईशान को माना गया है साथ ही यह कोण पूर्व एवं उत्तर दिशा के शुभ प्रभावों से युक्त होता है।
      इस चित्र में जिन स्थानों पर Y लिखा है वहां पूजाघर बनवाना उचित होता है तथा जिन स्थानों पर N लिखा है उहां पूजाघर बनवाना अशुभ फलदायक होता है। पूजाघर या पूजास्थान का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि पूजा करते समय पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर रहें। हमारे धार्मिक ग्रंथों एवं वास्तुग्रंथों में कहा गया है कि धन-प्राप्ति के लिए पूजा उत्तर दिशा की ओर मुख करके और ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए।
पूजाघर संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for Pooja Room (chapel)-
  1. पूजाघर के निकट एवं मकान के ईशान कोण में झाडू एवं कूड़ेदान आदि नहीं रखने चाहिएं। पूजाघर हमेशा साफ-सुथरा रखें तथा इस घर के लिए अलग से झाड़ू-पोंछा रखें।
  2. पूजाघर में कभी भी कीमती वस्तुएं तथा पैसे आदि नहीं रखने चाहिए।
  3. पूजाघर को हमेशा शुद्ध, स्वच्छ एवं पवित्र रखें। इसमें कोई भी अपवित्र वस्तु न रखें अर्थात मकान के ईशान कोण हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ रखना चाहिए।
  4. पूजाघर में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य एवं कार्तिकेय का मुख पूर्व दिशा या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।
  5. पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लायी गई प्रतिमा एवं स्थिर प्रतिमा की स्थापना नहीं करनी चाहिए।
  6. पूजाघर में यदि हवनादि की व्यवस्था की गई हो तो यह व्यवस्था
  7. पूजाघर के आग्नेय कोण में ही होनी चाहिए।
  8. पूजाघर का फर्श सफेद या हल्के पीले रंग का होना चाहिए।
  9. पूजाघर की दीवारों का रंग सफेद, हल्का पीला या हल्का नीला होना चाहिए।
  10. पूजाघर कभी भी सोने के कमरा में नहीं बनवाना चाहिए। यदि किसी कारणवश ऐसा करना भी पड़े तो उस कमरे में पूजा वाले स्थान पर चारों ओर पर्दा डालकर रखें और रात को सोने से पहले पूजास्थल का पर्दा ढक दें।
  11. पूजाघर में नीचे अलमारी बनाकर किसी कोर्टकेस संबंधी कागजात रखने से उस कोर्टकेस में विजय प्राप्ति की संभावना बढ़ती है।
  12. पूजाघर में हनुमानजी का मुख नैऋत्य कोण में होना चाहिए।
  13. पूजाघर में गणेश, कुबेर, दुर्गा का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
  14. पूजाघर में प्रतिमाएं कभी प्रवेशद्वार के पास नहीं रखना चाहिए।
  15. धन प्राप्ति के लिए पूजा पूजाघर में उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए।
  16. पूजाघर में देवचित्र एक-दूसरे के सामने नहीं रखने चाहिए।
  17. देवी-देवताओं के चित्र उत्तरी और दक्षिणी दीवार के पास कभी नहीं होने चाहिए।
  18. पूजाघर में महाभारत की तस्वीर, पशु-पक्षी की तस्वीर एवं वास्तुपुरुष की कोई तस्वीर नहीं रखना चाहिए।
  19. रसोईघर- मकान में रसोईघर का निर्माण आग्नेय कोण में किया जाना चाहिए। यदि आग्नेय कोण में रसोईघर बनाना संभव न हो तो पश्चिम दिशा में भी रसोईघर बनाया जा सकता है। रसोईघर की लम्बाई एवं चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिए कि लम्बाई एवं चौड़ाई के गुणनफल में नौ से गुणा करके आठ से भाग देने पर शेषफल दो बचना चाहिए।

रसोईघर संबंधी वास्तु नियम एवं वास्तुदोष निवारण-
  • वास्तुशास्त्र के नियमानुसार रसोईघर कभी भी ईशान कोण में नहीं बनवाना चाहिए। ऐसा करने से परिवार के लोगों को आर्थिक कमी का सामना करना पड़ता है। कुछ स्थिति में यह अधिक दुष्प्रभाव डालता है जिससे वंशवृद्धि रुक जाती है।
  • यदि मकान में चूल्हा ईशान कोण में ही रखा हो तो इसका परिवर्तन करके आग्नेय कोण में स्थापित कर दें। स्थान-परिवर्तन संभव नहीं हो एवं चूल्हा स्लैब पर रखा हो तो स्लैब के नीचे तांबे का बड़ा जल से भरा जलपात्र हमेशा रखें एवं प्रतिदिन सुबह-शाम इसका जल बदलते रहें। भोजन पकाने के तुरंत बाद इस स्थान को साफ कर दें। आग्नेय कोण में एक बल्ब जलाकर रखें जिस पर लाल रंग की पन्नी चढ़ी हो। यदि चूल्हा फर्श पर रखा हो तो जलपात्र चूल्हे के निकट रखा जाना चाहिए। शेष नियम वही रहेंगे।
  • रसोईघर को आठ दिशाओं एवं विदिशाओं में विभाजित करके ऐसी व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए कि चूल्हा रसोईघर के आग्नेय कोण में रहे।
  • ईशान कोण व उत्तर दिशा के अतिरिक्त किसी अन्य कोण या दिशा में चूल्हा रखने से कोई हानि नहीं होती परंतु आग्नेय कोण में जल संबंधी कार्य होता हो तो अवश्य होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आग्नेय कोण में अग्नि संबंधी कार्य न होने से अग्निभय संभव है। यदि आग्नेय कोण में अग्नि संबंधी कार्य जैसे विद्युत उपकणों का संचालन आदि हो रहा है तो चूल्हा ईशान व उत्तर दिशा के अतिरिक्त कहीं भी रख सकते हैं।
  • उत्तर दिशा में चूल्हा रखा जाना वर्जित है। ऐसा करने से अर्थहानि होती है। इसके लिए भी उपरोक्त उपाय करने चाहिए।
  • रसोईघर में भारी सामान बर्तन आदि दक्षिणी दीवार की ओर रखें।
  • मकान में रसोईघर का निर्माण इस प्रकार करवाएं कि मुख्यद्वार से रसोईघर में रखे समान जैसे- गैस, चूल्हा, बर्नर आदि दिखाई न दें। इससे परिवार के संकटग्रस्त होने की संभावना होती है। अनेक स्त्रियां अपने रसोईघर का निर्माण इस प्रकार करवाती है कि खाना बनाते समय घर में कौन आ रहा है इसकी जानकारी खिड़की से देखकर हो जाए। ऐसी स्थिति में बाहर से आने वाले व्यक्ति को उस खिड़की में से चूल्हा दिखाई दे सकता है।
  • रसोईघर में टांड आदि दक्षिण एवं पश्चिम दीवार पर ही बनाए जाने चाहिए परंतु आवश्यकतानुसार चारों दीवारों पर भी बनाए जा सकते हैं।
  • यदि रसोई में फ्रिज भी रखा जाना हो तो उसे आग्नेय, दक्षिण, पश्चिम या उत्तर दिशा में रखा जाना उचित होगा। इसे नैऋत्य कोण में कभी न रखें अन्यथा यह अधिकतर खराब ही रहेगा।
  •  यदि भोजन करने की व्यवस्था भी रसोई घर में की जानी हो तो यह रसोईघर में पश्चिम की ओर होनी चाहिए।
  • रसोईघऱ में गैस बर्नर, चूल्हा स्टोव या हीटर आदि दीवार से लगभग तीन इंच हटकर रखे होने चाहिए।
  • खाना बनाते समय गृहिणी या खाना बनाने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए यह मकान के निवासियों के लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है।
  • वास्तु सिद्धांत के अनुसार रसोईघर में खाली एवं अतिरिक्त गैस सलैण्डर आदि नैऋत्य कोण में रखे जाने चाहिए।
  • अन्न आदि के डिब्बे उत्तर-पश्चिम अर्थात वायव्य कोण में रखे जाने चाहिए। वायव्य कोण में अन्न आदि रखने से घर में अन्न की परिपूर्णता बनी रहती है।
  • रसोईघर में माइक्रो ओवन, मिक्सर, ग्राइंडर आदि दक्षिण दीवार के निकट रखे जाने चाहिए।
  • रसोईघर में पीने का पानी ईशान कोण में या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए।

भोजन के कमरे से संबंधी वास्तुशास्त्र का सिद्धांत- 
आजकल मकान मंद भोजन का कमरा बनावाया जाता है। भोजन का कमरा बनाने के लिए वास्तुशास्त्र के अनुसार पश्चिम दिशा उपयुक्त है। भोजन का कमरे की व्यवस्था रसोईघर से पश्चिम दिशा की ओर की जा सकती है।
  1. भोजन का कमरा रसोईघर के पश्चिम दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है।
  2. भोजन का कमरा मकान की पश्चिम दिशा में बनाया जाना चाहिए। पश्चिम दिशा में भोजन का कमरा होने से भोजन करने से सुख, शांति एवं संतुष्टि मिलती है।
  3. रसोईघर के अंदर ही भोजन करने की व्यवस्था होने पर यह व्यवस्था रसोईघर में पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए।
  4. यदि भोजन का कमरा पश्चिम दिशा के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में बना हुआ हो तो उस कमरा में पश्चिम की ओर वैठकर भोजन किया जाना चाहिए।

भण्डार का कमरा बनाने के लिए वास्तुशास्त्र का सिद्धांत-
भण्डार घर बनाने के दो उद्देश्य होते हैं- एक वर्ष भर के लिए अन्नादि का भण्डारण एवं अनुपयुक्त तथा अतिरिक्त सामान का भण्डारण। यदि व्यक्ति के पास पर्याप्त जगह हो तो दोनों उद्देश्यों के लिए अलग-अलग भण्डार घर बनाना चाहिए और अगर जगह की कमी हो तो दोनों उद्देश्यों की पूर्ति एक ही भंडार घर में की जा सकती है। पहले दोनों उद्देश्यों के लिए अलग-अलग कमरे के विषय में चर्चा करेंगे।
अन्न आदि के भण्डार घर के लिए वास्तु सिद्धांत-
  1. वायव्य कोण में बनाए गए अन्नादि-भण्डार घर में अन्न आदि की कभी कमी नहीं होगी।
  2. अन्न आदि के भण्डार घर में सामान रखने के लिए स्लैब आदि दक्षिण या पश्चिम दीवार पर बनाने चाहिए परंतु आवश्यकता पड़ने पर इन्हें चारों दीवारों पर बनाया जा सकता है। परंतु पूर्वी एवं उत्तरी दीवार पर बनायी स्लैब की चौड़ाई दक्षिण एवं पश्चिम दीवार पर बनायी गई स्लैब से कम होनी चाहिए और इन पर अपेक्षाकृत हल्का सामान रखा जाना चाहिए।
  3. यदि मकान में अन्न आदि के भण्डार वाले घर में खाली स्थान हो तो डाईनिंग टेबल लगाया जा सकता है परंतु डाईनिंग टेबल कमरे की पश्चिम दिशा में या रसोईघर से पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए।
  4. अन्न आदि के भण्डार घर में रखे किसी डिब्बे, कनस्तर आदि को खाली न रहने दें। अन्न आदि के प्रयोग से इनके खाली होने की दशा में उसमें कुछ अन्न आदि अवश्य शेष रखे रहने चाहिए।
  5. प्रतिदिन प्रयोग में आने वाले अन्न आदि को कमरे के उत्तर-पश्चिम दिशा में रखा जाना चाहिए।
  6. अन्न आदि के भण्डार घर का निर्माण मकान में उत्तर दिशा या वायव्य कोण में करना चाहिए।
  7. अन्न आदि के भण्डार घर में तेल, घी, मक्खन, मिट्टी का तेल एवं गैस सलैण्डर आदि इसके आग्नेय कोण में रखा जाना चाहिए।
  8. अन्न आदि के भण्डार घर का द्वार नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी दिशा या विदिशा में बनाया जा सकता है।
  9. अन्न आदि का वार्षिक संग्रह दक्षिण या पश्चिम दीवार के पास होना चाहिए।
  10. वास्तु सिद्धांत के अनुसार अन्न आदि के भण्डार घर के ईशान कोण में शुद्ध एवं पवित्र जल से भरा हुआ मिट्टी या तांबे का एक पात्र रखा जाना चाहिए। ध्यान रखें यह पात्र कभी खाली न हो। अन्न आदि के भण्डार घर में पूर्वी दीवार पर लक्ष्मी नारायण का चित्र लगाना चाहिए।

भण्डार घर के लिए वास्तुशास्त्र की सिद्धांत-
  1. अनुपयोगी सामान के लिए मकान से बाहर चारदीवारी के निकट कबाड़घर बनाना चाहिए परंतु यदि कबाड़घर बना पाना संभव नहीं है और भण्डार घर में ही यह सामान रखा जाता हो तो इसके लिए कमरा का नैऋत्य कोण प्रयोग करना चाहिए।
  2. इस भण्डार घर में अन्न आदि का संग्रह न करें।
  3. भारी सामान दक्षिणी दीवार एवं पश्चिमी दीवार पर दक्षिण दिशा की ओर रखे जाने चाहिए।
  4. इस कमरे का दरवाजा उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए साथ ही एक खिड़की भी इन्हीं दिशाओं में होनी चाहिए।
  5. भण्डार घर मकान के अंदर दक्षिण या पश्चिम भाग में बनाया जाना चाहिए।
  6. शेष दोनों दिशाओं अर्थात पूर्व एवं उत्तर में हल्के सामान रखे जाने चाहिए।
  7. यदि स्थान के अभाव में अन्न आदि का संग्रह भण्डार घर में करना पड़े तो रोजाना प्रयोग होने वाला अन्न रसोईघर में वायव्य कोण में रखे एवं अतिरिक्त अन्न आदि इस भण्डारघर में पश्चिम दीवार के निकट उत्तर दिशा की ओर रखा जा सकता है।

संयुक्त भण्डार घर के लिए वास्तु सिद्धांत-
  1. संयुक्त भण्डार घर में कबाड़ अर्थात ऐसी वस्तुओं को नहीं भरा जाना चाहिए जिनका अब कोई प्रयोग नहीं रह गया हो।
  2. संयुक्त भण्डार घर में अन्य सामानों का भण्डारण दक्षिण एवं पश्चिम दीवार की ओर किया जाना चाहिए।
  3. संयुक्त भण्डार घर मकान के पश्चिम या उत्तर-पश्चिम भाग में बनाया जाना चाहिए।
  4. संयुक्त भण्डार घर में अन्न आदि का भण्डारण वायव्य कोण की ओर किया जाना चाहिए।
  5. संयुक्त भण्डार घर में पूर्व, उत्तर तथा पश्चिम दिशा या इनके कोणों में कोई एक खिड़की अवश्य होनी चाहिए।
  6. संयुक्त भण्डार घर का द्वार नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी स्थान पर बनाया जा सकता है।
  7. संयुक्त भण्डार घऱ के ईशान कोण में जल का पात्र रखना चाहिए।

कबाड़घर- घर में अनेक वस्तुएं इस प्रकार की होती हैं जो कि समय व्यतीत के साथ हमारे लिए उपयोगी नहीं रह जाती। इन वस्तुओं को सामान्य बोलचाल में कबाड़ कहा जाता है। इस कबाड़ में से समय-समय पर बेकार वस्तुओं को बाहर कर देना चाहिए परंतु कभी-कभी काम में आने वाली वस्तुओं का संग्रह कबाड़घर में किया जा सकता है। कबाड़घर का निर्माण मुख्य मकान से बाहर नैऋत्य कोण में किया जाना चाहिए। यदि स्थान की कमी के कारण नैऋत्य कोण में भूमितल पर कबाड़ का भण्डारण किया जाना चाहिए।
कबाड़घर के लिए वास्तु सिद्धांत एवं वास्तुदोष निवारण-
  • कबाड़घर का द्वार मकान के अन्य सभी द्वारों से आकार में छोटा रखना चाहिए।
  • कबाड़घर किसी व्यक्ति को रहने, सोने या किराए पर नहीं दिया जाना चाहिए। मकान का मालिक ऐसे व्यक्ति से हमेशा परेशान रहेगा।
  • उत्तर, पूर्व, ईशान, वायव्य कोण में कबाड़ आदि का भण्डारण करने से अर्थहानि व मानसिक अशांति में वृद्धि होती है। आग्नेय कोण में कबाड़ का भण्डारण करने से अग्नि से हानि होने की संभावना होती है।
  • इस कबाड़घर के द्वार के पास कोई बातचीत आदि नहीं करनी चाहिए न हीं जोर से ठहाका लगाएं और न ही गुस्से में या ऊंची आवाज में बातचीत करें। ऐसा करना घर की खुशियों के लिए हानिकारक है।
  • वास्तु सिद्धांत के अनुसार कबाड़घर का द्वार आग्नेय, ईशान या उत्तर दिशा के अतिरिक्त अन्य किसी दिशा में होना चाहिए।
  • यदि त्रुटिवश या अज्ञानतावश कबाड़ आदि का भण्डारण नैऋत्य कोण के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में किया हुआ हो तो इसे तुरंत बदल दें।
  • कबाड़घर में पानी नहीं भरा हुआ होना चाहिए।
  • कबाड़घर का द्वार एक पल्ले का होना चाहिए।
  • कबाड़घर के दरवाजे का रंग काला होना चाहिए।
  • कबाड़घर के फर्श व दीवारों में सीलन नहीं होनी चाहिए।
  • कबाड़घर के दरवाजे का रंग काला होना चाहिए।
  • कबाड़घर का द्वार टिन या लोहे का बनवाना चाहिए।
  • कबाड़घर में किसी देवी-देवता का चित्र न रखें।
  • कबाड़घर की लम्बाई और चौड़ाई न्यूनतम होनी चाहिए।

बेडरुम (सोने का कमरा)- 
अच्छे स्वास्थ्य के लिए सोना बहुत जरूरी होता है। इससे शारीरिक स्फूर्ति, ताजगी एवं सुकून मिलता है। यदि मनुष्य रात को ठीक प्रकार से नहीं सोता तो उठने के बाद कार्य करने में अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं कर पाता। हमने पहले भी चर्चा की है कि मनुष्य का शरीर एक चुम्बक है और सिर उत्तरी ध्रुव एवं पैर दक्षिणी ध्रुव हैं। अतः सोने के समय सिर को दक्षिण दिशा की ओर करके सोना चाहिए ताकि चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह ठीक प्रकार से हो सके। यदि चुम्बकीय प्रवाह शरीर में उचित प्रकार से होगा तो निद्रा भी अच्छी आएगी।
       सोने के कमरे की लम्बाई एवं चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिए कि इनके गुणनफल में नौ से गुणा करके आठ से भाग देने पर तीन या पांच शेष बचें। तीन शेष बचने से दक्षिण दिशा में बनाए गए बेडरूम के आकार का फल शत्रु पर विजय, आर्थिक एवं शारीरिक सुख प्राप्ति के रूप में पड़ता है। पांच शेष बचने से पश्चिम दिशा में बनाए गए सोने का कमरे के आकार का फल आर्थिक सम्पन्नता लाता है।
सोने का कमरा संबंधी वास्तु सिद्धांत एवं वास्तुदोष निवारण-
  1. बच्चों, अविवाहितों या मेहमानों के लिए पूर्व दिशा में सोने का कमरा बनवाएं परंतु इस कमरे में नवविवाहित जोड़े को नहीं ठहराना चाहिए अर्थात इस कमरे में संभोग नहीं करना चाहिए। यदि इस कमरे में ऐसा होता हो तो परिवार को आर्थिक एवं सामाजिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
  2. मकान के मालिक का सोने का कमरा दक्षिण-पश्चिम कोण में या पश्चिम दिशा में होना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व अर्थात स्थिरता का प्रतीक है। अतः इस स्थान पर सोने का कमरा होने से मकान में लम्बे समय तक निवास होता है।
  3. सोने के कमरे में यदि पूजास्थल हो तो वह सोने के कमरे में ईशान कोण की तरफ बनाना चाहिए। ऐसी स्थिति में पलंग पर सोते समय सिर पूर्व की तरफ किया जा सकता है ताकि पांव पूजास्थल की ओर न रहें।
  4. सोने के कमरे में बेड या पलंग इस प्रकार से हों कि उस पर सोने से सिर पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर रहे। इस तरह सोने से सुबह उठने पर मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होगा। पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है। यह जीवनदाता एवं शुभ है। उत्तर दिशा धनपति कुबेर की मानी गई है अतः सुबह उठते उस तरफ मुंह होना भी शुभ है।
  5. यदि मकान के स्वामी का कार्य ऐसा हो जिसमें कि उसे अधिक अर्थात घर से बाहर ही रहना पड़ता हो तो सोने का कमरा वायव्य कोण में बनाना उत्तम होगा।
  6. उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। उत्तर दिशा में सिर करके सोने से नींद नहीं आती है और आती हो तो बुरे स्वप्न अधिक आते हैं।
  7. यदि सोते समय सिर पश्चिम दिशा की ओर रखना हो तो पलंग का एक सिरा पश्चिम की दीवार को छूता रहे।
  8. दक्षिण-पश्चिम या दक्षिण में स्थित सोने के कमरे वयस्क, विवाहित, बच्चों के लिए भी उपयुक्त है।
  9. सोने के कमरा का दरवाजा एक पल्ले का होना चाहिए।
  10. यदि सोते समय सिर दक्षिण दिशा की ओर रखना हो तो पलंग का एक हिस्सा दक्षिण की दीवार को छूता रहे।
  11. अगर मकान में एक से अधिक मंजिलें हों तो मकान के मालिक का सोने का कमरा ऊपर की मंजिल पर बनवाना चाहिए।
  12. पलंग के सामने दीवार पर प्रेरक व रमणिक चित्र लगवाने चाहिए। आदर्शवादी चित्र आत्मबल को बढ़ाते हैं और दाम्पत्य जीवन भी आनन्दमय व विश्वास्त बना रहता है।
  13. सोने के कमरे में प्रकाश की व्यवस्था करते समय पलंग पर मुख के सामने प्रकाश की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए। वास्तुशास्त्र में मुख पर प्रकाश पड़ना अशुभ होता है। सोने के कमरे में प्रकाश हमेशा सिर के पीछे या बाईं ओर पड़ना चाहिए।
  14. सोते समय पैर मुख्यद्वार की ओर नहीं होने चाहिए। मौत होने पर शमशान ले जाने से पहले शरीर को मुख्यद्वार की ओर पैर करके रखा जाता है।
  15. सोने के कमरे में पलंग के दाईं ओर छोटी टेबल आवश्यक वस्तु या दूध, पानी रखने के लिए स्थापित कर सकते हैं।
  16. पलंग सोने के कमरे के द्वार के पास स्थापित नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से चित्त एवं मन में अशांति बनी रहेंगी।
  17. सोने के कमरे में अलमारियों का मुंह नैऋत्य कोण या दक्षिण दिशा की ओर नहीं खुलना चाहिए। यह नियम मात्र उन अलमारियों के लिए है जिनमें चैकबुक, बैंक या व्यापार संबंधी कागजात, रुपये पैसे तथा अन्य कीमती सामान रखा जाता है अर्थात तिजोरी आदि। ऐसी अलमारियों में रखा धन धीरे-धीरे कम होता जाता है। इन अलमारियों का मुंह दक्षिण दिशा को छोड़कर अन्य दिशाओं में रखा जाना चाहिए।
  18. ईशान कोण में आग्नेय दिशा वाले कमरे में छोटे बच्चों के लिए सोने का कमरा का प्रबंध करना चाहिए।
  19. सोने के कमरे में पलंग के ठीक ऊपर छत में कोई शहतीर नहीं होना चाहिए। यदि पलंग के ठीक ऊपर शहतीर हो तो इस शहतीर पर फाल्स सीलिंग करा लेनी चाहिए।
  20. जहां तक संभव हो तिजोरी सोने के कमरे में न रखें यदि रखनी ही पड़े तो यह सोने के कमरे की दक्षिण दिशा में इस प्रकार रखे कि इसे खोलने पर उत्तर दिशा में दृष्टि पड़े।
  21. वास्तु सिद्धांत के अनुसार ड्रेसिंग टेबिल उत्तर दिशा में पूर्व की ओर रखी जानी चाहिए। ड्रेसिंग टेबिल को पश्चिम दिशा में भी रखा जा सकता है।
  22. पूर्वी व उत्तरी दिशा वाले कमरे को सोने का कमरा बनाने के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है।
  23. विद्यार्थियों के लिए पश्चिम दिशा में सिरहाना करना उपयुक्त होता है।
  24. कपड़े रखने के लिए अलमारी वायव्य कोण या दक्षिण दिशा में होनी चाहिए।
  25. बाईं ओर करवट करके लेटने की आदत डालना बहुत अच्छी मानी जाती है।
  26. पूर्व की ओर सिरहाना वृद्धाजनों के लिए उपयुक्त होता है। यह आध्यात्मिक चिंतन, ध्यान, साधना व अच्छी नींद के लिए उपयुक्त है।
  27. पलंग को सोने के कमरे की दीवारों से थोड़ा हटाकर रखना चाहिए।
  28. उत्तर दिशा में सिरहाना कभी नहीं करना चाहिए।
  29.  घड़ी पूर्व या पश्चिम की दीवार पर लगाएं। इसके अलावा उत्तर दिशा की दीवार पर भी अच्छी मानी जाती है।
  30. सोने के कमरे में अध्ययन करने के लिए टेबिल, लाईब्रेरी, पुस्तकों की अलमारी आदि बेडरूम के पश्चिम या नैऋत्य में होनी चाहिए। मेज-कुर्सी इस प्रकार रखी हों कि मुंह पूर्व की ओर या उत्तर की ओर रहें। इस तरह से अध्ययन करने वाला व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न और ज्ञानवान बनता है।
  31. सोने के कमरे में टांड आदि पश्चिम या दक्षिणी दीवार पर बनाना चाहिए परंतु उसके नीचे सोने का पलंग नहीं रखना चाहिए। यदि पलंग रखना ही पड़े तो टांड के नीचे भी फाल्स सीलिंग लगवा दें।
  32. टेलीविजन, हीटर एवं अन्य विद्युत उपकरण कमरे के आग्नेय कोण में होने चाहिए।

स्नानघर एवं शौचालय- 
साधारणतः स्नानघर एवं शौचालय तीन प्रकार से बनाए जाते हैं- घर के सोने के कमरे के साथ संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय, घर के अंदर सबके लिए संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय तथा अलग-अलग स्नानघर एवं शौचालय।
    वास्तुशास्त्र के अनुसार घर के अंदर स्नानघर उत्तर या पूर्व दिशा में बनवाया जा सकता है जबकि शौचालय पश्चिम, वायव्य कोण से हटकर उत्तर दिशा की ओर या दक्षिण दिशा में बनवाया जा सकता है। संयुक्त स्नानघर एवं शौचालय के लिए पश्चिम वायव्य कोण एवं पूर्वी आग्नेय कोण अच्छे माने जाते हैं।
   वास्तु सिद्धांत के अनुसार बेडरूम से सटे स्नानघर बेडरूम के ऊपर या पूर्व दिशा में जहां दो समांतर बेडरूम हों, वहीं बीच में बनवाएं जाते हैं। इस स्थिति में बीच वाला स्नानघर दक्षिण दिशा के बेडरूम के उत्तर में तथा उत्तरी बेडरूम के दक्षिण में पड़ेगा। वास्तु के अनुसार इस स्थिति को बहुत अच्छा माना जाता है। इसी प्रकार दक्षिण में बने दो समांनतर बेडरूम के बीच में एक स्नानघर बनवाया जा सकता है। इसमें पश्चिम दिशा के बेडरूम के पूर् में तथा पूर्वी बेडरूम के पश्चिम दिशा में स्नानघर पड़ेगा। आजकल शौचालय स्नानघर के साथ ही बनाए जाते हैं। शौचालय की सीट (डब्ल्यू. सी.) इस प्रकार रखें कि बैठने वाले का मुख दक्षिण, पश्चिम की ओर मुख रखना भी ठीक नहीं मानते क्योंकि पूर्व-पश्चिम सूर्योदय और सूर्यास्त से संबंधित हैं अतः यह सूर्य का अपमान करना माना गया है, रामायण में भी इसका वर्णन मिलता है। ईशान कोण में शौचालय नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि यह हानिप्रद हैं। नैऋत्य कोण में शौचालय बनवाएं तो गड्ढा न खुदवाएं, चबूतरा बनवाकर संडास लगवाएं तथा सैप्टिक टैंक मध्य उत्तर या मध्यपूर्व में ही रखें।
स्नानघर संबंधी वास्तु सिद्धांत--
  • यदि मकान का मुख्यद्वार उत्तर दिशा की ओर हो तो भी स्नानघर पूर्व या पूर्वी आग्नेय कोण में बनाना चाहिए।
  • स्नानघर दक्षिण या पश्चिम नैऋत्य कोण में भी बनवाया जा सकता है।
  • यदि मकान का मुख्यद्वार पूर्व दिशा की ओर हो तो स्नानघर पूर्व-आग्नेय कोण में बनवाना चाहिए।
  • यदि मकान का मुख्यद्वार पश्चिम दिशा की ओर हो तो वे स्नानघर पश्चिम नैऋत्य कोण में बनाना चाहिए।
  • स्नानघर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दिशा पूर्व होती है।
  • स्नानघर में गीजर, हीटर एवं अन्य विद्युत उपकरण दक्षिण-पूर्व आग्नेय कोण में लगाए जाने चाहिए।
  • वैसे तो शौचालय स्नानघर में बनाना नहीं चाहिए परंतु यदि बनाना आवश्यक ही हो तो यह स्नानघर में पश्चिम या वायव्य कोण की ओर बनाया जाना चाहिए।
  • स्नानघर की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए जैसे सफेद, हल्का नीला, आसमानी आदि।
  • स्नानघर से सटा हुआ, रसोई के पास एक कपड़े एवं बर्तन होने का स्थान होना सुविधाजनक है।
  • स्नानघर का द्वार रसोईघर के द्वार के ठीक सामने नहीं होना चाहिए।
  • यदि स्नानघर बड़ा हो और उसी में वाशिंग मशीन भी रखी हो तो मशीन को दक्षिण या आग्नेय कोण में रखा जा सकता है।
  • स्नानघर का द्वार पूर्व या उत्तर में होना चाहिए।
  • स्नानघर में बाथटब पूर्व, उत्तर या ईशान कोण से रखा जाना चाहिए।
  • स्नानघर के फर्श का ढाल पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
  • स्नानघर में शॉवर ईशान कोण, उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए।

शौचालय संबंधी वास्तु सिद्धांत-
  • शौचालय का दरवाजा पूर्व दिशा या आग्नेय कोण की तरफ खुलने वाला होना चाहिए।
  • शौचालय में संगमरमर की टाइल्स का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • यदि आपके निर्मित मकान में त्रुटि या अज्ञानवश ईशान कोण में शौचालय का निर्माण हो गया हो तो इसके बाहर एक बड़ा दर्पण इस प्रकार लगाना चाहिए कि नैऋत्य कोण से देखने पर आईना बिल्कुल सामने दिखाई दे या यहां पर शिकार करते हुए शेर या मुंह फाड़े हुए एक शेर का बड़ा चित्र भी लगाया जा सकता है।
  • जिन भूखण्डों के पूर्व या उत्तर दिशा में रास्ते हो उन पर निर्मित मकानों में ईशान कोण में शौचालय नहीं बनवाने चाहिए। मानसिक व पारिवारिक अशांति, असाध्य रोग अनैतिक कामों से पतन होता है।
  • मकान में शौचालय पश्चिम, वायव्य कोण से हटकर उत्तर की ओर या दक्षिण में होना चाहिए।
  • शौचालय का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि शौचालय में बैठते समय मुंह उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर कभी न हो। शौचालय में सीट इस प्रकार लगी होनी चाहिए कि बैठते समय आपका मुंह दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा की ओर रहे।
  • शौचालय का फर्श मकान के फर्श से एक या दो फीट ऊंचा होना चाहिए।
  • शौचालय में एक खिड़की उत्तर, पश्चिम या पूर्व दिशा में होनी चाहिए।
  • शौचालय में पानी की टोटी पूर्व या उत्तर दिशा में होनी चाहिए।

शौचकूप या सैप्टिक टैंक- 
शौचालय से मल आदि की निकासी के लिए सामान्यतः सीवर का प्रयोग किया जाता है परंतु जिस स्थान पर सीवर लाईन नहीं होती वहां पर शौचकूप बनवाया जाता है। इस शौचकूप में यह मल इकट्ठा होता रहता है और एक समयांतराल पर इसे साफ करा दिया जाता है। चूंकि शौचकूप बनवाने के लिए गड्ढा खोदना होता है अतः इसका निर्माण नैऋत्य कोण में कभी नहीं करवाना चाहिए क्योंकि वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार नैऋत्य कोण में किसी भी प्रकार का गड्ढा या खुदाई नहीं होनी चाहिए। इससे वहां के निवासियों को भयंकर परिणाम प्राप्त होते हैं।
शौचकूप या सौप्टिक टैंक संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for septic tank-
  1. सैप्टिक टैंक की लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशा में एवं चौड़ाई उत्तर दक्षिण दिशा में होनी चाहिए।
  2. सैप्टिक टैंक वायव्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य, पश्चिम दिशा में वायव्य कोण की अपेक्षा अधिक हटा हुआ भी बनाया जा सकता है।
  3. नैऋत्य कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक मकान के स्वामी के जीवन के लिए कुप्रभावी होता है।
  4. सैप्टिक टैंक का तीन चौथाई भाग जिसमें कि जल होता है पूर्व दिशा में होना चाहिए एवं मल आदि के लिए स्थान उत्तर दिशा में होना चाहिए।
  5. शौचकूप या सैप्टिक टैंक मकान के वायव्य कोण एवं उत्तर दिशा के मध्य में होना चाहिए।
  6. आग्नेय कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होता है।
  7. सैप्टिक टैंक दक्षिण या पश्चिम की ओर नहीं बनाना चाहिए।
  8. पूर्व दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मान-सम्मान की कमी करता है।
  9. सैप्टिक टैंक हमेशा दीवार से एक या दो फीट हटाकर बनाना चाहिए।
  10. दक्षिण दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मकान के मालिक के जीवन साथी के जीवन के लिए हानिप्रद है।
  11. उत्तर दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक धन की हानि कराता है।
  12. सैप्टिक टैंक भूमि तल से नीचा होना चाहिए।
  13. ईशान कोण में बनाया गया सैप्टिक टैंक आजीविका के लिए हानिकारक है।
  14. पश्चिम दिशा में बनाया गया सैप्टिक टैंक मानसिक अशांति उत्पन्न करता है।

नलकूप या जलस्रोत- 
नलकूप या मकान में प्रयोग किए जाने वाले जल का स्रोत ईशान कोण में होना चाहिए अर्थात मकान में जल ईशान कोण से ही आना चाहिए। यदि हम मयूनिसपल कॉरपोरेशन (नगर निगम) की वाटर लाइन का प्रयोग कर रहे हैं तो भी वाटर कनैक्शन भूखण्ड के ईशान कोण से ही आना चाहिए परंतु यह मकान के ईशान कोण एवं भूखण्ड ईशान कोण को मिलाने वाली रेखा पर नहीं होना चाहिए।
नलकूप एवं जलस्रोत संबंधी वास्तु सिद्धांत-
Vaastu principles for tube well or water source-
  1. दक्षिण में कूप या गड्ढ़ा स्त्रियों की अकाल मौत का कारण होता है। इस कूप को तुरंत भरवा देना चाहिए एवं कूप का निर्माण ईशान कोण में किया जाना चाहिए या इससे गहरा कूप ईशान कोण में बनवा लेना चाहिए और दक्षिण दिशा में स्थित कूप के जल का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इसके जल को एक पाइप लाइन द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर से ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करना चाहिए। इस कूप के ढक्कन पर भारी सामान रखा जाना चाहिए। इस पर जनरेटर को भी स्थापित किया जा सकता है।
  2. कूप या हैंडपम्प के लिए पूर्व या उत्तरी ईशान कोण सर्वोत्तम स्थान है। उत्तरी ईशान या पूर्व ईशान में कुआं या गड्ढ़ा हो तो सुख, सम्पन्नता, वंश वृ्द्धि व प्रसिद्धि प्राप्ति होती है।
  3. दक्षिण नैऋत्य कोण में कूप या गड्ढ़ा हो तो स्त्री रोगग्रस्त रहती है, चरित्रहीन एवं कर्जदार होती है। इस कूप को तुरंत भरवा देना चाहिए एवं कूप का निर्माण ईशान कोण में किया जाना चाहिए।
  4. मकान की चारदीवारी के ईशान कोण में पम्पसेट हो तो उस पर बनने वाली छत की आकृति झोंपड़ी जैसे होनी चाहिए एवं यह निर्माण पूर्व व उत्तर की दीवारों से सटा हुआ नहीं होना चाहिए।
  5. पूर्वी आग्नेय कोण में कूप या गड्ढ़ा रोगों, अग्निभय एवं चोरी का संकेतक है। इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इसके जल को एक पाइप लाइन के द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर से ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करना चाहिए।
  6. कूप के तल में चौकोर या वृत्ताकार वलय बिठाने पर भी कुएं की जगत (मुंडेर) का निर्माण गोलाकृति में ही होना चाहिए।
  7. पश्चिम में कूप या गड्ढ़ा पुरुषों के लिए अस्वास्थ्यकारी होता है। इस कूप पर ढक्कन लगवाकर इससे जल को एक पाइप लाइन के द्वारा ईशान कोण से भूखण्ड के बाहर ले जाकर फिर ईशान कोण से पाइप लाइन द्वारा भूखण्ड एवं मकान में लाकर प्रयोग करन

जानिए की मकान की नींव खुदाई के समय किन बातों का रखें ध्यान

Here-what-to-keep-in-mind-while-digging-the-foundation-of-a-house-जानिए की मकान की नींव खुदाई के समय किन बातों का रखें ध्यानभारतीय समाज में अनेक शास्त्र पाये जाते हैं. इनमे से एक शास्त्र है ‘वास्तु शास्त्र’ है, जिसका प्रयोग प्राचीन समय से ही किया जाता है. वास्तु शास्त्र का हमारे जीवन में बहुत महत्तव होता है. जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में रोग के प्रविष्ट करने का मुख्य मार्ग मुख होता है उसी प्रकार किसी भी प्रकार के भवन निमार्ण में वास्तु शास्त्र का बड़ा ही महत्तव होता है | यदि वास्तु के नियम का पालन किया जाये तो जीवन सुखमय हो जाता है | वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन निमार्ण करने के साथ-साथ घर की वस्तुओं के रखरखाव में भी वास्तुशास्त्र का बहुत अधिक महत्व है.
         जब भी आप घर बनाए तो वास्तु के नियमों का पालन करें. जिससे घर में सुख शांति तथा सम्रद्धि बनीं रहे |सुख, शांति समृद्धि के लिए निर्माण के पूर्व वास्तुदेव का पूजन करना चाहिए एवं निर्माण के पश्चात् गृह-प्रवेशके शुभ अवसर पर वास्तु-शांति, होम इत्यादि किसी योग्य और अनुभवी ब्राह्मण, गुरु अथवा पुरोहित के द्वारा अवश्य करवाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जमीन के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवें स्कंद में लिखा है कि पृथ्वी के नीचे पाताललोक है और इसके स्वामी शेषनाग है, इसलिए कभी भी,किसी भी स्थान पर नीव पूजन/भूमि पूजन करते समय चांदी के नाग का जोड़ा रखा जाता हैं | 
 घर की नींव रखने से पहले इन बातों का रखें ध्यान---- 
 वास्तु प्राप्ति के लिए अनुष्ठान, भूमि पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापना व गृह प्रवेश आदि अवसरों पर वास्तु देव की पूजा का विधान है। ध्यान रखें यह पूजन किसी शुभ दिन या फिर रवि पुष्य योग को ही कराना चाहिए। 
 आवश्यक सामग्री-- रोली, मोली, पान के पत्ते, लौंग, इलाइची, साबुत, सुपारी, जौ, कपूर, चावल, आटा, काले तिल, पीली सरसों, धूप, हवन सामग्री, पंचमेवा( काजू, बादाम, पिस्ता, किशमिश, अखरोट), गाय का शुद्ध घी, जल के लिए तांबे का पात्र, नारियल, सफेद वस्त्र, लाल वस्त्र, लकड़ी के 2 पटरे, फूल, दीपक, आम के पत्ते, आम की लकड़ी, पंचामृत( गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) आदि। जल के लिए तांबे का पात्र, चावल, हल्दी, सरसों, चांदी का नाग-नागिन का जोड़ा, अष्टधातु कश्यप, 5 कौड़ियां, 5 सुपारी, सिंदूर, नारियल, लाल वस्त्र, घास, रेजगारी, बताशे, पंच रत्न, पांच नई ईंटें आदि। इसके बाद किसी विद्वान से पूजन करवाएं। 
लग्न शुद्धि :- गृहारंभ हेतु स्थिर या द्विस्वभाव राशि का बलवान लग्न लेना चाहिए। (प्रातः उपराहन या संध्याकाल में गृहारंभ करना चाहिए) उपरोक्त लग्न के केंद्र, त्रिकोण स्थानों में शुभ ग्रह तथा 3, 6, 11 वें स्थान में अशुभ (पापग्रह) हों या छठा स्थान खाली हो। आठवां और बारहवां स्थान भी ग्रह रहित होना चाहिए। इस प्रकार का लग्न और ग्रह स्थिति भवन निर्माण के शुभारंभ हेतु श्रेष्ठ कही गई है। श्रीशुकदेव के मतानुसार पाताल से तीस हजार योजन दूर शेषजी विराजमान हैं। शेषनाग के सिर पर पृथ्वी रखी है। जब ये शेष प्रलयकाल में जगत् के संहार की इच्छा करते हैं, तो क्रोध से कुटिल भृकुटियों के मध्य तीन नेत्रों से युक्त 11 रूद्र त्रिशुल लिए प्रकट होते हैं। 
          गौरतलब है कि पौराणिक ग्रंथो में शेषनाग के फन पर पृथ्वी के टिके होने के संकेत मिलते हैं। नींव पूजन का कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फन पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण किए हुए हैं ठीक उसी प्रकार मेरे इस भवन की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फन पर पूर्ण मजबूती के साथ स्थापित रहे। क्योंकी शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वाहन कर शेषनाग को बुलाया जाता है ताकि वे साक्षात उपस्थित होकर भवन की रक्षा वहन करें।नींव खोदते समय यदि भूमि के भीतर से पत्थर या ईंट निकले तो आयु की वृद्धि होती है। जिस भूमि में गड्ढा खोदने पर राख, कोयला, भस्म, हड्डी, भूसा आदि निकले, उस भूमि पर मकान बनाकर रहने से रोग होते हैं तथा आयु का ह्रास होता है और दु:ख की प्राप्ति होती है। । 
 पौराणिक ग्रंथों में शेषनाग के फण पर पृथ्वी टिकी होने का उल्लेख मिलता है--- 
 शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम्। 
यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम्।। 
        इन परमदेव ने विश्वरूप अनंत नामक देवस्वरूप शेषनाग को पैदा किया, जो पहाड़ों सहित सारी पृथ्वी को धारण किए है। उल्लेखनीय है कि हजार फणों वाले शेषनाग सभी नागों के राजा हैं। भगवान की शय्या बनकर सुख पहुंचाने वाले, उनके अनन्य भक्त हैं। बहुत बार भगवान के साथ-साथ अवतार लेकर उनकी लीला में भी साथ होते हैं। श्रीमद्भागवत के 10 वे अध्याय के 29 वें श्लोक में भगवान कृष्ण ने कहा है- "अनन्तश्चास्मि नागानां" यानी मैं नागों में शेषनाग हूं। नींव पूजन का पूरा कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फण पर पूरी पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, ठीक उसी तरह मेरे इस घर की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फण पर पूरी मजबूती के साथ स्थापित रहे। शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं। 
          इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वान पर शेषनाग को बुलाया जाता है, ताकि वे घर की रक्षा करें। विष्णुरूपी कलश में लक्ष्मी स्वरूप सिक्का डालकर फूल और दूध पूजा में चढ़ाया जाता है, जो नागों को सबसे ज्यादा प्रिय है। भगवान शिवजी के आभूषण तो नाग हैं ही। लक्ष्मण और बलराम भी शेषावतार माने जाते हैं। इसी विश्वास से यह प्रथा जारी है। 
 गृहारंभ की नींव :- वैशाख, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष और फाल्गुन इन चंद्रमासों में गृहारंभ शुभ होता है। इनके अलावा अन्य चंद्रमास अशुभ होने के कारण निषिद्ध कहे गये हैं। वैशाख में गृहारंभ करने से धन धान्य, पुत्र तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। श्रावण में धन, पशु और मित्रों की वृद्धि होती है। कार्तिक में सर्वसुख।मार्गशीर्ष में उत्तम भोज्य पदार्थों और धन की प्राप्ति। फाल्गुन में गृहारंभ करने से धन तथा सुख की प्राप्ति और वंश वृद्धि होती है। किंतु उक्त सभी मासों में मलमास का त्याग करना चाहिए। भवन निर्माण कार्य शुरू करने के पहले अपने आदरणीय विद्वान पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवा लेना चाहिए। 
         भवन निर्माण में शिलान्यास के समय ध्रुव तारे का स्मरण करके नींव रखें। संध्या काल और मध्य रात्रि में नींव न रखें।नए भवन निर्माण में ईंट, पत्थर, मिट्टी ओर लकड़ी नई ही उपयोग करना। एक मकान की निकली सामग्री नए मकान में लगाना हानिकारक होता है। किसी भी इमारत के निर्माण में कई क्रिया-व्यापार जुडे़ रहते हैं। जैसे नींव डालने के लिए खुदाई करना, कुंए की खुदाई, वास्तविक निर्माण कार्य आरंभ करना, रेत डालना, दरवाजे़ लगाना आदि। इन सबके लिए विशेष मुहूर्त होते हैं जिनका पालन करने से शुभ परिणाम प्राप्त केए जा सकते हैं, साथ ही निर्माण कार्य भी तेजी से और सुरक्षित ढंग से होता है। 
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जानिए कैसे करें नींव की खुदाई--- 
 भूमि पूजन के बाद नींव की खुदाई ईशान कोण से ही प्रारंभ करें। ईशान के बाद आग्नेय कोण की खुदाई करें। आग्नेय के बाद वायव्य कोण, वायव्य कोण के बाद नैऋत्य कोण की खुदाई करें। कोणों की खुदाई के बाद दिशा की खुदाई करें। पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में क्रम से खुदाई करें। 
 जानिए कैसे करें नींव की भराई--- 
 नींव की भराई, नींव की खुदाई के विपरीत क्रम से करें। सबसे पहले नेऋत्य कोण की भराई करें। उसके बाद क्रम से वायव्य, आग्नेय, ईशान की भराई करें। अब दिशाओं में नींव की भराई करें। सबसे पहले दक्षिण दिशा में भराई करें। अब पश्चिम ,उत्तर व पूर्व में क्रम से भराई करें। 
 जानिए कैसे करें नींव पूजन में कलश स्थापना----
 नींव पूजन में तांबे का कलश स्थापित किया जाना चाहिए। कलश के अंदर चांदी के सर्प का जोड़ा, लोहे की चार कील, हल्दी की पांच गांठे, पान के 11 पत्तें, तुलसी की 35 पत्तियों, मिट्टी के 11 दीपक, छोटे आकार के पांच औजार, सिक्के, आटे की पंजीरी, फल, नारियल, गुड़, पांच चैकोर पत्थर, शहद, जनेऊ, राम नाम पुस्तिका, पंच रत्न, पंच धातु रखना चाहिए। समस्त सामग्री को कलश में रखकर कलश का मुख लाल कपड़े से बांधकर नींव में स्थापित करना चाहिए।
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भूमि पूजन तथा गृहारम्भ---- 
 भूखंड पर भवन निर्माण के लिए नींव की खुदाई और शिलान्यास शुभ मुहूर्त में किया जाना चाहिए। शिलान्यास का अर्थ है शिला का न्यास अर्थात् गृह कार्य निर्माण प्रारम्भ करने से पुर्व उचित मुहूर्त में खुदाई कार्य करवाना। यदि मुहूर्त सही हो तो भवन का निर्माण शीघ्र और बिना रुकावट के पूरा होता है। शिलान्यास के लिए उपयुक्त स्थान पर नींव के लिए खोदी गई खात (गड्ढे) में पूजन एवम् अनुष्ठान पूर्वक पांच शिलाओं को स्थापित किया जाता है। 
  •  (1) शास्त्र के अनुसार शिलान्यास के लिए खात (गड्ढा) सूर्य की राशि को ध्यान में रखकर किया जाता है, जैसे- सूर्य खात निर्णय राशि 5,6,7, (सिंह, कन्या, तुला) आर्ग्नेय कोण राशि 2,3,4, (वृष, मिथुन, कर्क) नैऋत्य कोण राशि 11,12,1 (कुंभ, मीन, मेष) वायव्य कोण राशि 8,9,10 (वृश्चिक, धनु, मकर) ईशान कोण आधुनिक वास्तुशस्त्रियों का मानना है कि किसी भी समय में खुदाई केवल उत्तर-पूर्व दिशा से ही शुरू करनी चाहिए। 
  •  (2) जब भूमि सुप्तावस्था में हो तो खुदाई शुरू नहीं करनी चाहिए। सूर्य संक्रांति से 5,6,7,9,11,15,20,22,23 एंव 28 वें दिन भूमि शयन होता है। मतान्तर से सूर्य के नक्षत्र 5,7,9,12,19 तथा 26 वे नक्षत्र में भूमि शयन होता है।   (3) मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक में गृह आदि का निर्माण करने से गृहपति को पुत्र तथा स्वास्थ्य लाभ होता है। 
  •  (4) महर्षि वशिष्ठ के मत में शुक्लपक्ष में गृहारम्भ करने से सर्वविध सुख और कृष्णपक्ष में चारों का भय होता है। 
  •  (5) गृहारम्भ में 2,3,5,6,7,10,11,12,13, एवम 15 तिथियां शुभ होती हैं। प्रतिपदा को गृह निर्माण करने से दरिद्रता, चतुर्थी को धनहानि, अष्टमी को उच्चाटन, नवमी को शस्त्र भय, अमावस्या को राजभय और चतुर्दशी को स्त्रीहानि होती है। महर्षि मृगु के मत में चतुर्थी, अष्टमी, अमावस्या तिथियां, सूर्य, चन्द्र और मंगलवारों को त्याग देना चाहिए। 
  •  (6) चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, पुष्य, उत्तराषाढा, उत्तराफाल्गुणनी, उत्तराभद्रपदा, रोहिणी, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्रों में गृहारम्भ शुभ होता है। 
  •  (7) शुभ्रग्रह से युक्त और वृष्ट, स्थिर तथा द्विस्वभाव लग्न में वास्तुकर्म शुभ होता है। शुभग्रह बलवान होकर दशमस्थान हो अथवा शुभग्रह पंचम, पवम हो और चंद्रमा, 1,4,7,10 स्थान में हो तथा पापग्रह तहसरे, छठे ग्यारहवें स्थान में हो तो ग्रह शुभ होता है। 
  •  (8) रविवार या मंगलवार को गृह आरम्भ करना कष्टदायक होता है। सोमवारी कल्याणकारी, बुधवार धनदायक, गुरूवार बल-बुद्धिदायक, शुक्रवार सुख-सम्पदाकारक तथा शनिवार कष्टविनाशक होता है। 
  •  (9) वास्तुप्रदीप कं अनुसार, शनिवार स्वाति नक्षत्र, सिंह लग्न, शुक्लपक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग तथा श्रावण मास, इन सात सकारों के योग में किया गया वास्तुकर्म पुत्र, धन-धान्य और ऐश्वर्य दायक होता है। 
  •  (10) पुष्प, उत्तरफाल्गुनी, उत्तराषढ़ा, उत्तराभद्रपद, रोहिणी, मृगश्रि, श्रवण, अश्लेष एवम् पूर्वाषढ़ा नक्षत्र यदि बृहस्पति से युक्त हो और गुरुवार हो तो उसमें बनाया गया गृह पुत्र और रात्यदायक होता है। 
  •  (11) विशाखा, अश्विनी, चित्रा, घनिष्ठा, शतभिषा और आर्द्रा ये नक्षत्र शुक्र से युक्त हो और शुक्रवार का ही दिन हो तो ऐसा गृह धन तथा धान्य देता है। 
  •  (12) रोहिणी, अश्विनी, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा हस्त ये नक्षत्र बुध से युक्त हो और उस दिन बुधवार भी हो तो वह गृह सुख और पुत्रदायक होता है। 
  •  (13) कर्क लग्न में चंद्रमा, केंद्र में बृहस्पति, शेष ग्रह मित्र तथा उच्च अंश में हों तो ऐसे समय में बनाया हुआ गृह लक्ष्मी से युक्त होता है। 
  •  (14) मीन राशि में स्थित शुक्र यदि लग्न में हो या कर्क का बृहस्पति चौथे स्थान में स्थित हो अथ्वा तुला का शनि ग्यारहवें स्थान में हो तो वह घर सदा धन युक्त रहता है। 
  •  (15) चंद्रमा, गुरू या शुक्र यदि निर्बल, नीचराशि में या अस्त हो तो गृहारम्भकार्य नहीं करना चाहिए। 
  •  (16) अगर घर की कोई महिला सदस्य गर्भावस्था कें आखिरी कुछ माह में हो या घर का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार हो तो खुदाई का कार्य प्रारम्भ नहीं करना चाहिए। 
  •  (17) शनिवार रेवती नक्षत्र, मंगल की हस्त, पुष्प नक्षत्र में स्थिति, गुरू शुक्र अस्त, कृषणपक्ष, निषिद्ध मास, रिक्तादि तिथियां, तारा-अशुद्धि, भू-शयन, मंगलवार, अग्निवान, अग्निपंचक, भद्रा, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र तथा वृश्चिक, कुंभ लग्नादि गृहारम्भ में वर्जित है।

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गृहारंभ और सौरमास :--- 
 गृहारंभ के मुहूर्त में चंद्रमासों की अपेक्षा सौरमास अधिक महत्वपूर्ण, विशेषतः नींव खोदते समय सूर्य संक्रांति विचारणीय है। पूर्व कालामृत का कथन है- गृहारंभ में स्थिर व चर राशियों में सूर्य रहे तो गृहस्वामी के लिए धनवर्द्धक होता है। जबकि द्विस्वभाव (3, 6, 9, 12) राशि गत सूर्य मरणप्रद होता है। अतः मेष, वृष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशियों के सूर्य में गृहारंभ करना शुभ रहता है। मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि के सूर्य में गृह निर्माण प्रारंभ नहीं करना चाहिए। 
 विभिन्न सौरमासों में गृहारंभ का फल :- देवऋषि नारद ने इस प्रकार बताया है। मेषमास-शुभ, वृषमास-धन वृद्धि? मिथुनमास-मृत्यु कर्कमास-शुभ, सिंहमास-सेवक वृद्धि, कन्यामास-रोग, तुलामास-सुख, वृश्चिकमास-धनवृद्धि, धनुमास- बहुत हानि, मकर-धन आगम, कुंभ-लाभ, और मीनमास में गृहारंभ करने से गृहस्वामी को रोग तथा भय उत्पन्न होता है। सौरमासों और चंद्रमासों में जहां फल का विरोध दिखाई दे वहां सौरमास का ग्रहण और चंद्रमास का त्याग करना चाहिए क्योंकि चंद्रमास गौण है। 
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शिलान्यास :- 
 गृहारंभ हेतु नींव खात चक्रम और वास्तुकालसर्प दिशा चक्र में प्रदर्शित की गई सूर्य की राशियां और राहु पृष्ठीय कोण नींव खनन के साथ-साथ शिलान्यास करने, बुनियाद भरने हेतु, प्रथम चौकार अखण्ड पत्थर रखने हेतु, खम्भे (स्तंभ) पिलर बनाने हेतु इन्ही राशियों व कोणों का विचार करना चाहिए। जो क्रम नींव खोदने का लिखा गया था वही प्रदक्षिण क्रम नींव भरने का है। आजकल मकान आदि बनाने हेतु आर.सी.सी. के पिलर प्लॉट के विभिन्न भागों में बना दिये जाते हैं। ध्यान रखें, यदि कोई पिलर राहु मुख की दिशा में पड़ रहा हो तो फिलहाल उसे छोड़ दें। सूर्य के राशि परिवर्तन के बाद ही उसे बनाएं तो उत्तम रहेगा। कतिपय वास्तु विदों का मानना है कि सर्व प्रथम शिलान्यास आग्नेय दिशा में करना चाहिए। 
 वास्तुपुरुष के मर्मस्‍थान--- 
 सिर, मुख, हृदय, दोनों स्तन और लिंग- ये वास्तुपुरुष के मर्मस्थान हैं। वास्तुपुरुष का सिर 'शिखी' में, मुख 'आप्' में, हृदय 'ब्रह्मा' में, दोनों स्तन 'पृथ्वीधर' तथा 'अर्यमा' में और लिंग 'इन्द्र' तथा 'जय' में है (देखे- वास्तुपुरुष का चार्ट)। वास्तुपुरुष के जिस मर्मस्थान में कील, खंभा आदि गाड़ा जाएगा, गृहस्वामी के उसी अंग में पीड़ा या रोग उत्पन्न हो जाएगा।
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वास्तु पुरुष की दिशा विचार :- 
 महाकवि कालिदास और महर्षि वशिष्ठ अनुसार तीन-तीन चंद्रमासों में वास्तु पुरुष की दिशा निम्नवत् रहती है। भाद्रपद, कार्तिक, आश्विन मास में ईशान की ओर। फाल्गुन, चैत्र, वैशाख में नैत्य की ओर। ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण में आग्नेय कोण की ओर। मार्गशीर्ष, पौष, माघ में वायव्य दिशा की ओर वास्तु पुरुष का मुख होता है। वास्तु पुरुष का भ्रमण ईशान से बायीं ओर अर्थात् वामावर्त्त होता है। वास्तु पुरुष के मुख पेट और पैर की दिशाओं को छोड़कर पीठ की दिशा में अर्थात् चौथी, खाली दिशा में नींव की खुदाई शुरु करना उत्तम रहता है। महर्षि वशिष्ठ आदि ने जिस वास्तु पुरुष को 'वास्तुनर' कहा था, कालांतर में उसे ही शेष नाग, सर्प, कालसर्प और राहु की संज्ञा दे दी गई। अतः पाठक इससे भ्रमित न हों। मकान की नीवं खोदने के लिए सूर्य जिस राशि में हो उसके अनुसार राहु या सर्प के मुख, मध्य और पुच्छ का ज्ञान करते हैं। सूर्य की राशि जिस दिशा में हो उसी दिशा में, उस सौरमास राहु रहता है। 
 जैसा कि कहा गया है- ''यद्राशिगोऽर्कः खलु तद्दिशायां, राहुः सदा तिष्ठति मासि मासि।'' यदि सिंह, कन्या, तुला राशि में सूर्य हो तो राहु का मुख ईशान कोण में और पुच्छ नैत्य कोण में होगी और आग्नेय कोण खाली रहेगा। अतः उक्त राशियों के सूर्य में इस खाली दिशा (राहु पृष्ठीय कोण) से खातारंभ या नींव खनन प्रारंभ करना चाहिए। वृश्चिक, धनु, मकर राशि के सूर्य में राहु मुख वायव्य कोण में होने से ईशान कोण खाली रहता है। कुंभ, मीन, मेष राशि के सूर्य में राहु मुख नैत्य कोण में होने से वायव्य कोण खाली रहेगा। वृष, मिथुन, कर्क राशि के सूर्य में राहु का मुख आग्नेय कोण में होने से नैत्य दिशा खाली रहेगी। उक्त सौर मासों में इस खाली दिशा (कोण) से ही नींव खोदना शुरु करना चाहिए। 
       अब एक प्रश्न उठता है कि हम किसी खाली कोण में गड्ढ़ा या नींव खनन प्रारंभ करने के बाद किस दिशा में खोदते हुए आगे बढ़ें? वास्तु पुरुष या सर्प का भ्रमण वामावर्त्त होता है। इसके विपरीत क्रम से- बाएं से दाएं/दक्षिणावर्त्त/क्लोक वाइज नीवं की खुदाई करनी चाहिए। यथा आग्नेय कोण से खुदाई प्रारंभ करें तो दक्षिण दिशा से जाते हुए नैत्य कोण की ओर आगे बढ़ें। विश्वकर्मा प्रकाश में बताया गया है- 'ईशानतः सर्पति कालसर्पो विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु। शेषस्य वास्तोर्मुखमध्य -पुछंत्रयं परित्यज्यखनेच्चतुर्थम्॥' वास्तु रूपी सर्प का मुख, मध्य और पुच्छ जिस दिशा में स्थित हो उन तीनों दिशाओं को छोड़कर चौथी में नींव खनन आरंभ करना चाहिए। इसे हम निम्न तालिका के मध्य से आसानी से समझ सकते हैं।
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जानिए दैनिक कालराहु वास :- 
 अर्कोत्तरेवायुदिशां च सोमे, भौमे प्रतीच्यां बुधर्नैते च।
 याम्ये गुरौ वन्हिदिशां च शुक्रे, मंदे च पूर्वे प्रवदंति काल॥ 
 राहुकाल का वास रविवार को उत्तर दिशा में, सोमवार को वायव्य में,मंगल को पश्चिम में, बुधवार को नैत्य में, गुरुवार को दक्षिण में, शुक्रवार को आग्नेय में व शनिवार को पूर्व दिशा में राहुकाल का वास रहता है। यात्रा के अलावा गृह निर्माण (गृहारंभ), गृहप्रवेश में राहुकाल का परित्याग करना चाहिए। जैसे-सौरमास के अनुसार निकाले गये मुहूर्त के आधार पर आग्नेय दिशा में नींव खनन/शिलान्यास करना निश्चित हो। किंतु शुक्रवार को आग्नेय में, शनिवार को पूर्व दिशा में राहुकाल का वास रहता है। अतः शुक्रवार को आग्नेय दिशा में गृहारंभ हेतु नींव खनन/ शिलान्यास प्रारंभ न करें। वर्तमान समय में उत्तर समय में उत्तर भारत गृह निर्माण के समय कालराहु या राहुकाल का विचार नहीं किया जाता है। जबकि इसका विचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
        भूमि खनन कार्य और शिलान्यास आदि में दैनिक राहुकाल को भी राहुमुख की भांति वर्जित किया जाना चाहिए। सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार गृहारंभ हेतु उत्तम कहे गये हैं। किंतु इन शुभ वारों में कालराहु की दिशा का निषेध करना चाहिए। रविवार, मंगलवार को गृहारंभ करने से अग्निभय और शनिवार में अनेक कष्ट होते हैं। भू- शयन विचार-सूर्य के नक्षत्र से चंद्रमा का नक्षत्र यदि 5, 7, 9, 12, 19, 26वां रहे तो पृथ्वी शयनशील मानी जाती हैं। भूशयन के दिन खनन कार्य वर्जित है। अतः उपरोक्तानुसार गिनती के नक्षत्रों में नींव की खुदाई न करें। 
गृहारंभ के शुभ नक्षत्र : रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा और रेवती आदि वेध रहित नक्षत्र गृहारंभ हेतु श्रेष्ठ माने गये हैं। देवऋषि नारद के अनुसार गृहारंभ के समय गुरु यदि रोहिणी, पुष्य, मृगशिरा, आश्लेषा, तीनों उत्तरा या पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में हों तो गृहस्वामी श्रीमन्त (धनवान) होता है तथा उसके घर में उत्तम राजयोग वाले पुत्र/पौत्रों का जन्म होता है। इन फलों की प्राप्ति हेतु गुरुवार को गृहारंभ करें। आर्द्रा, हस्त, धनिष्ठा, विशाखा, शतभिषा या चित्रा नक्षत्र में शुक्र हो और शुक्रवार को ही शिलान्यास करें तो धन-धान्य की खूब समृद्धि होती है। गृहस्वामी कुबेर के समान सम्पन्न हो जाता है।
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जानिए की कब करें गृहप्रवेश..???
 भूरिपुष्पविकरं सतोरण तायपूर्णकलशेपशेभितम्। 
धूपनन्धबलिपूजितानरं ब्राह्राणध्वनियुतं विशेद गृहम।। 
 बृहतसंहिता के अनुसार फूलों से सजे हुए, बन्दनवार लगे हुए, तोरणों से सुसज्जित, जलपूर्ण कलशों से सुशोभित, देवताओं के विधिपूर्वक पूजन से शुद्ध, ब्राह्राणों के वेदपाठ से युक्त घर में प्रवेश करें। यहां देवतापूजन में वास्तुपूजन तथा वास्तुशंति का भी समावेश है। 
  •  (1) नवीन घर में प्रवेश उत्तरायण में करना चाहिए। माघ, फाल्गुन, ज्येष्ठ और वैशाख में गृहप्रवेश शुभ होता है तथा कार्तिक, मार्गशीर्ष में गृहप्रवेश मध्यम होता है। 
  •  (2) निरन्तर वृद्धि के लिए शुक्ल पक्ष में प्रवेश शुभ माना गया है। शुक्लपक्ष की 2,3,5,6,7,8,10,11 और 13 तिथियां शुभ होती हैं। 49,14वीं तिथि और अमावस्या को कदापि नूतन गृह प्रवेश न करें। 
  •  (3) चित्रा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती और शतभिषा नक्षत्रों में प्रवेश करने से धन, आयु, आरोग्य, पुत्र, पौत्र तथा वंश में वृद्धि होती है। 
  •  (4) गृहस्वामी की जन्म राशि से गोचरस्थ सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शुक्र का प्रबल होना आवश्यक है। 
  •  (5) मंगलवार और रविवार के अलावा अन्य दिन शुभ हैं। 
  •  (6) भद्रा, पंचबाण और रिक्ता तिथियां त्याज्य हैं। 
  •  (7) स्थिर और द्विस्वभाव लग्न (2,5,8,11,3,6,9,12, राशियां) या गृहस्वामी के चंद्र लग्न या जन्म लग्न से 3,6,10,11, राशियां शुभ हैं। गृहप्रवेश लग्न में 1,7,10,5,9,2,3,11 भवों में शुभ ग्रह तथा 3,6,11 भावों में पापग्रह होने चाहिए। 4,8 भाव खाली होने चाहिए। लग्न राशि, गृहस्वामी के जन्म लग्न या जल्म राशि से आठवी राशि नहीं होनी चाहिए। 
  •  (8) नवीन गृह प्रवेश के शुभ अवसर पर उत्तरायण सूर्य, गुरू शुक्रोदय, कलश चक्र शुद्धि, कर्त्ता की नाम राशि से सूर्य-चंद्र बल होना चाहिए। किंतु दग्धा, अमावस्या, रिक्ता, शून्य तिथियां, द्वादशी व शुक्रवार का योग, चर लग्न, नवांश, धनु कुंभ तथा मीन संक्रातियां वर्जित हैं।

गलत स्थान पर किचन/रसोई होने से घर में होती हैं क्लेश

Misplaced-kitchen-kitchen-are-having-trouble-at-home-गलत स्थान पर किचन/रसोई होने से घर में होती हैं क्लेशरसोईघर (किचिन), घर का एक महत्वपूर्ण भाग है। यदि मनुष्य अच्छा भोजन करता है तो उसका दिन भी अच्छा गुजरता है। दुनिया के हर धर्म में रसोईघर को किसी भी भवन/मकान में बेहद अहम माना जाता है। किसी भी घर की रौनक होती है रसोई और गृह लक्ष्मी का भी ज्यादातर समय रसोई में ही बीतता है। ऐसे में रसोई का वास्तु के अनुसार होना बेहद जरूरी है क्योंकि इसका सीधा संबंध हमारे स्वास्थ्य से होता है।स्वच्छ चित्त, प्रसन्न मन और सर्वोत्तम आहार सभी में रसोई की अपनी भूमिका होती है। रसोईघर, आपके घर का अहम हिस्सा है। यहीं भोजन बनता है जिससे परिवार को भोजन मिलता है। रसोईघर परिवार के हर व्यक्ति के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। अच्छे स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए रसोईघर का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह घर का ऐसा स्थान है जहां साल के 365 दिन काम होता है। 
              वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार वास्तुशास्त्र में आवासीय भवनों में सर्वाधिक महत्व रसोई-कक्ष (पाकशाला) को दिया जाता है। चीन में रसोईघर को घर का खजाना (कोष) माना जाता है। घर का यही वह स्थान है, जो अग्नि से सम्बन्धित है। शास्त्रों में अग्नि की दिशा दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) निधार्रित की गई है। अतः गृह-निर्माण में ताप, अग्नि एवं विद्युत उपकरणों आदि के लिए अग्नि कोण उपयुक्त माना गया है।वास्तुशास्त्र के अनुसार व्यक्ति का संतुलित स्वास्थ्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि घर में रसोई कक्ष की स्थिति कैसी है, वह किस दिशा में है और किस दिशा में मुख करके भोजन बनाया जाता है। वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं धन-सम्पदा दोनो को रसोईघर प्रभावित करता है। अतः घर का यह सबसे महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि इसमें बने या पकाये गये भोजन को खाकर ही व्यक्ति बाहरी जगत में जाकर कर्म-क्षेत्र में उतरकर दक्षता-पूर्वक कार्य करते हुए सफलता अर्जित करता है। मुख्य रूप से रसोईघर के लिए भवन का अग्नि कोण ही काम में लेना चाहिए। 
           यदि किसी कारणवश इस दिशा में नहीं बनाया जा सकता, तो रसोई कक्ष को भवन के वायव्य कोण में बनाया जा सकता है, बशर्ते इस कक्ष के अग्नि कोण में ही चूल्हा, गैस या स्टोव रखे जायें। वास्तु नियमों के अनुसार गैस, चूल्हे का प्लेट फार्म अग्नि कोण में पूर्वी दीवार के सहारे एवं वायव्य कोण में रसोईघर है तो भी उस कक्ष के अग्नि कोण में पूर्वी दीवार के सहारे बनाना सर्वाधिक उपयुक्त है। प्लेट फार्म ‘एल’ आकार में पूर्वी एवं दक्षिण की दीवार के सहारे बनाना चाहिए, जिसमें दक्षिणी दीवार के पास रसोई का अन्य सामान रखने के काम मे ले तथा पूर्वी दीवार के पास चूल्हा, स्टोव रखें। इससे बनाने वाली का मुख पूर्व दिशा मे होगा जो कि वास्तुअनुसार सहीं है। वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार वास्तु शास्त्र में भी किचन को लेकर कई टिप्स दिए गए हैं।
 रसोईघर के लिए उपाय
  1. --- विभिन्न ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार रसोईघर को शुभ दिशा में होना चाहिए। यदि रसोईघर सही दिशा या स्थिति में नहीं है तो यह कई प्रकार की समस्या उत्पन्न कर सकता है। 
  2. वैदिक वास्तुशास्त्र के अनुसार रसोईघर के लिए निम्न उपाय हैं...
  3.  ---वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार रसोईघर को घर के पूर्व व दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों दिशाएं वायु और प्रकाश का संचालन करती हैं। 
  4. ---रसोईघर की दीवारों का रंग सफेद रखना चाहिए. सफेद रंग स्वच्छता की निशानी माना जाता है।
  5. ----रसोईघर में टूटे हुए बर्तन, और शीशा कभी नहीं रखने चाहिए। ऐसी चीजें अशुभ साबित हो सकती हैं।
  6.  -----जरूरत न होने पर रसोई का दरवाजा बंद ही रखना चाहिए। 
  7. -----झाड़ू और पोछे को रसोईघर से दूर रखना चाहिए। ऐसी चीजें घर में अन्न की कमी का आभास कराते हैं। -
  8. ---रसोईघर को घर में मुख्य प्रवेश द्वार के सामने नहीं होना चाहिए। ऐसे में विवाद होना संभव है। 
  9. ----रसोईघर में बिजली के अत्यधिक उपकरण नहीं रखने चाहिए। 
  10. ----रसोईघर में पूजा का स्थान नहीं होना चाहिए। 
  11. ---जल और अग्रि साथ-साथ न हों इसके लिए बर्तन धोने का सिंक और पानी के नल चूल्हे से दूर होने चाहिएं। 
  12. ---गैस चूल्हे के ऊपर सामान रखने के लिए अलमारियों का निर्माण नहीं करवाना चाहिए। 
  13. --- आपकी किचन में हवा का आवागमन सुगमता से हो सके, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। 
  14. --- आपकी रसोई घर की दीवार से सटा कर, इसके ऊपर या नीचे टॉयलैट नहीं होना चाहिए। 
  15. ----यदि आपके किचन में बड़ा छज्जा निकला है तो इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव रहता है। 
  16. --- आपकी रसोई घर के एकदम मध्य में बैठकर कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए साथ ही रसोई घर का चूल्हा बाहर बैठे व्यक्ति को दिखाई नहीं देना चाहिए। 
  17. ---चाकू, कैंची या किसी अन्य कटार को रसोईघर की दीवार पर नहीं लटकाना चाहिए। 
  18. ----इस्तेमाल में न आने वाले बर्तन व बासी भोजन को रसोईघर में नहीं रखना चाहिए। 
  19. ---भोजन कक्ष का निर्माण रसोई घर के नजदीक ही करना चाहिए, यथासंभव पूर्व या पश्चिम की तरफ हो।इसके साथ साथ इस बात का भी ध्यान रखें की बैठने का आयोजन इस प्रकार हो कि खाने वाले का मुंह दक्षिण की तरफ न हो।भोजन करते समय चेहरा पूर्व या उत्तर की ओर होना अच्छा माना जाता है। 
  20.  ---रसोईघर में दिन में पर्याप्त रोशनी आनी चाहिए। रसोईघर में अगर दिन में अंधेरा रहता है तो यह वास्तु के लिहाज से ठीक नहीं है और न ही आपकी सेहत के लिए अच्छा है। रसोईघर की दीवारों का रंग कभी फीका नहीं पड़ने दें। रसोई से धुआं निकलने का पूरा प्रबंध होना चाहिए। दीवारों में अगर दरार या टूट फूट हो जाए तो इसकी मरम्मत तुरंत कराएं। 
  21. ----किचन को हमेशा साफ रखें। रात में सोने से पहले किचन की सफाई कर लें। झूठे बर्तन वॉश बेसिन में नहीं छोड़ें। 
  22.  ---रंग का चयन करते समय भी विशेष ध्यान रखें। महिलाओं की कुंडली के आधार पर रंग का चयन करना चाहिए। 
  23. ----रसोई घर में रंगों का आयोजन बहुत हल्का होना चाहिए।वास्तु अनुसार ही रंगों का चयन हो तो रसोई समृद्धशाली बनती है। किचन में हल्का हरा, हल्का नींबू जैसा रंग, हल्का संतरी या हल्का गुलाबी उपयुक्त होता हैं | 
  24. ---किचन में कभी भी ग्रेनाइट का फ्लोर या प्लेटफार्म नहीं बनवाना चाहिए और न ही मीरर जैसी कोई चीज होनी चाहिए, क्योंकि इससे विपरित प्रभाव पड़ता है और घर में कलह की स्थिति बढ़ती है। 
  25. ---पानी के भंडारण, आरओ, पानी फिल्टर और ऐसे सामान जहां पानी संग्रहित किया जाता है, इसके लिए उपयुक्त स्थान उत्तर पूर्व दिशा है।सिंक उत्तर पूर्व दिशा में होना चाहिए। बिजली के उपकरण दक्षिण पूर्व या दक्षिण दिशा में रखना अधिक उपयुक्त माना जाता है। प्रिज को पश्चिम, दक्षिण, दक्षिण पूर्व या दक्षिण पश्चिम दिशा में रखा जा सकता है।
  26.  ----अनाज, मसाले, दाल, तेल, आटा आदि खाद्य सामग्रियों को भंडारण के लिए पश्चिम या दक्षिण दिशा में रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार रसोईघर की कोई भी दीवार शौचालय या बाथरूम के साथ लगी नहीं होनी चाहिए। अगर फ्लैट में रह रहे हैं तो शौचालय और बाथरूम, रसोईघर के नीचे या ऊपर भी नहीं होना चाहिए। 
  27. ---- खाना बनाते समय किचन में हमेशा अच्छे मूड से जाना चाहिए। "कहा जाता है एक हैप्पी कूक इज द बेस्ट कूक"।

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जानिए रसोईघर में सामान रखने के उपयुक्त स्थान --- 
  • ---चूल्हा, स्टोव या गैस, रसोईघर में इस प्रकार से रखा होना चाहिए कि जातक दरवाजे को देख सके. इससे मनुष्य तनावमुक्त होता है। 
  • ---रसोईघर में माइक्रोवेव ओवन को दक्षिण- पश्चिम दिशा में रखना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रसोईघर स्वत: ही सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है।
  •  ---रेफ्रिजरेटर एक इलेक्ट्रिक मशीन है, जिसे ऐसे स्थान या मंडल में रखना चाहिए जो जातक के लिए विशेष प्रेरक के रूप में हो। 
  • ----दक्षिण दिशा में रेफ्रिजरेटर रखने से नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, क्योंकि दक्षिण दिशा का तत्व 'अग्नि' है। जिसके फलस्वरूप दक्षिण दिशा, रेफ्रिजरेटर के ठंडे तापमान से मेल नहीं खाता। 
  • – रसोई घर में यदि वास्तुदोष हो तो पंचररत्न को तांबे के कलश में डालकर उसे ईशान्य कोण यानी उत्तर-पूर्व के कोने में स्थापित करें। 
  • – निर्माण के समय ध्यान रखे की रसोई घर आग्नेय कोण में हो अगर पूर्व में ही रसोईघर किसी और दिशा में बना हो तो उसमें लाल रंग कर उसका दोष दूर किया जा सकता हैं। 
  • – रसोई घर के स्टेंड पर काला पत्थर न लगवाए। 
  • – रसोई घर में माखन खाते हुए कृष्ण भगवान का चित्र लगाएं। इससे आपका घर हमेशा धन-धान्य से भरा रहेगा।
  •  – खाना बनाते समय गृहिणी की पीठ रसोई के दरवाजे की तरफ न हो, यदि ऐसा हो तो गृहिणी के सामने दीवार पर एक आईना लगाकर दोष दूर किया जा सकता है। 
  • – यदि रसोई का सिंक उत्तर या ईशान में न हो और उसे बदलना भी संभव न हो तो लकड़ी या बांस का पांच रोड वाला विण्ड चिम सिंक के ऊपर लगाएं। 
  • – चूल्हा मुख्य द्वार से नहीं दिखना चाहिए। यदि ऐसा हो और चूल्हे का स्थान बदलना संभव नहीं हो तो पर्दा लगा सकते हैं। – यदि घर में तुलसी का पौधा न हो तो अवश्य लगाएं। कई रोगों व दोषों का निवारण अपने आप हो जाएगा। 

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जानिए वास्तु अनुसार आठों दिशानुसार रसोईघर का प्रभाव (लाभ या हानि)---- 
  1. . ईशान- भवन के ईशान कोण मे रसोई कक्ष का होना अत्यन्त अशुभ है। क्योंकि इससे वंश वृद्धि रूक जाती है, धन की हानि, कम लड़के होना, अत्यधिक खर्चे, मानसिक तनाव और निर्धनता की सूचक है। घर की महिलाओं की खाना बनाने मे रूचि नहीं होगी तथा परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है। 
  2.   पूर्व- पूर्व की ओर रसोई होना भी अनुचित है। इससे भी नुकसान होते हैं। वंश परम्परा का रूक जाना, व्यवहार रूखा होना एवं सभी सदस्यों की नीयत खराब होती है। 
  3.  आग्नेय-दक्षिण- पूर्व (आग्नेय) कोण में रसोई या भट्ठी बहुत उत्तम मानी गई है। इस रसोई में बना खाना सभी को संतुष्ट करता है तथा सभी लोग स्वस्थ्य रहते हैं। स्वास्थ्य तथा समृद्धि प्राप्त होती है, लेकिन स्टोर रूम इस कोण में कदापि न बनवायें। 
  4.  दक्षिण- इस दिशा में रसोई रखने से गरीबी, बैचेनी और मानसिक तनाव बने रहेंगे।
  5.  . नैर्ऋत्य- दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) कोण में रसोई कक्ष होने से शारीरिक और मानसिक रोग पैदा होते हैं। गृह कलेष, परेशानियां, दुर्धटना का भय बना रहता है। लापरवाहीवश विषाक्त भोजन बन सकता है। 
  6.   पश्चिम- इस दिशा में रसोई कक्ष होगा तो परिवार के सदस्यों में आए-दिन कलह होगी। गृह-क्लेश के साथ तलाक तक की मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। 
  7.   वायव्य- उत्तर-पश्चिम (वायव्य) कोण रसोई के लिए द्वितीय श्रेष्ठ विकल्प है। अगर वायव्य दिशा में रसोईघर बना हो तो घर की बहुंए एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती पाई जांएगी ओर घर की शांति भंग हो जाएगी। इसलिए वास्तुअनुसार ही रसोईघर को बनाये। 
  8.   उत्तर- यह दिशा रसोई घर के लिए अत्यन्त अशुभ है। यहाँ का रसोईघर विवाद एवं सदाबहार गरीबी का प्रतीक है। रसोईघर अगर उत्तरदिशा में होगी तो समझिये कि आप कुबेर को जला रहे हैं क्योंकि रसोई में अग्नि तत्व प्रघान होता है। इससे घर में जैविक ऐनर्जी का असंतुलन पैदा हो जाता है। खर्चा बहुत ज्यदा बढ़ जाता है। घर में आर्थिक स्थिती खराब होनी शुरू हो जाती है। जो पैसा उघार ले जाता है वह वापस देने का नाम नहीं लेता।

वास्तुविद पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार रसोईघर में भारी सामान अगर उत्तर दिशा में रखा होगा तो भी घन की रूकावट रहेगी। पैसा आयेगा पर रूक रूक कर आयेगा। आप कमाते जाएंगें और पैसा जलता जाऐगा। एक वक्त ऐसा आ जायेगा कि तंग आकर आप अपना मकान बेचने की कोशिश करेगें पर मकान की कोई अच्छी कीमत नहीं मिलेगी क्योंकि उत्तर दिशा में रसोईघर होने से जैविक ऐनर्जी की कमी हो जाती है। इस लिये रसोईघर को वास्तुशास्त्र के नियमो के अनुसार बनाना चाहिये।
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जानिए भोजन बनाते समय मुख की दिशानुसार प्रभाव----
 उत्तर- उत्तर की तरफ मुख करके खाना बनाना अत्यन्त अशुभ है। इससे घर व बाहर विवाद बढ़ेंगे। घर में खर्चा बहुत ज्यदा बढ़ जाता है। घर में आर्थिक स्थिती खराब होनी शुरू हो जाती है। जो पैसा उघार ले जाता है वह वापस देने का नाम नहीं लेता। 
  पूर्व- रसोइया यदि पूर्वाभिमुख होकर भोजन बनाए तो वह प्रसन्नता पूर्वक काम करेगा तथा शास्त्रानुसार भी पूर्व दिशा में मुख खाना बनाने के लिए आदर्श माना गया है। 
  दक्षिण- दक्षिण में मुख करके खाना बनाने से निर्धनता आती है। जोड़ र्दद ,सिर में र्दद ,माइग्रेन होने की समस्या हमेशा बनी रहेगी। 
 पश्चिम- पश्चिम में मुख करके खाना बनाने वाली स्त्री अपने पतियों की तुलना में अपना सौन्दर्य खो देती हैं और शीघ्र ही पतियों से अधिक आयु की दिखाई देने लगती हैं। इस लिये रसोईघर को वास्तुशास्त्र के नियमो के अनुसार बनाना चाहिये।

जानिए वास्तु दोष और कर्ज का सम्बन्ध

      कई बार परिस्थितियों के आगे मजबूर होकर व्यक्ति को कर्ज लेने की नौबत आ जाती है और फिर कर्ज खत्म होने का नाम नहीं लेते। इसका कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। एक कर्ज उतरा नहीं कि दूसरा लेने की नौबत आ जाए और इस स्थिति से छुटकारा न मिल रहा हो तो वास्तु से जुड़े तथ्यों पर ध्यान दें। इससे भी कर्ज से छुटकारा मिल सकता है। न चाहते भी कर्ज खत्म होने का नाम नहीं लेता। जिंदगी में ऐसे कई उत्तर चढ़ाव आते है जिसमे उलझकर व्यक्ति अपने घुटने टेक देता है। 
Read-more-debt-related-architectural-flaw-जानिए वास्तु दोष और कर्ज का सम्बन्ध           उन परिस्थितियों से निकलने के लिए वह कर्जन का सहारा लेता हैऔर उस कर्ज में इतना डूब जाता है की उसमे से निकल पाना मुश्किल हो जाता है। कई बार व्यक्ति कर्ज के चलते अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेते है। लेकिन वे इस स्थिति का पता नहीं लगते की यह सब किन कारणों के चलते हुआ। इसका कारण वास्तु दोष भी है, जिसके कारण कर्ज का बोझ परेशान करता है। एक कर्ज उतरा नहीं, दूसरा लेने की नौबत आ जाती है तथा इस स्थिति से छुटकारा नहीं मिलता। 
         दुनिया मे अधिकांश लोग कर्ज़ मे डूबे हुए रहते हैं| उनकी लाख प्रयत्न करने के बाद भी वो कर्ज़ से मुक्ति नही पा पाते हैं| वो लाख कोशिश के बाद भी उधारी के बोझ मे ही दबे रहते हैं| कई बार कर्ज पर कर्ज चढ़ता जाता है और जीवन में तनाव घिर आता है, ऐसा वास्तु दोष के कारण भी संभव है। यदि छोटे-छोटे उपाय कर लिए जाएं तो कर्ज के बोझ को कम किया जा सकता है इस सबका कारण आपकी वास्तु दोष संबंधी आदत हैं जो आपको कर्ज़ से मुक्त करने मे रुकावट बनी हुई हैं| इसलिए में आज आपको गरीबी एवं कर्ज से बचने के लिए कुछ आसान वास्तु उपाय बता रहे हैं ---- 
  1. दो उचे भवनों घिरा हुआ भवन या भारी भवनों के बीच दबा हुआ भवन भूखण्ड खरीदने से बचें क्योंकि दबा हुआ भवन भूखंड गरीबी एवं कर्ज का सूचक है। 
  2. दक्षिण-पश्चिम के कोने में पीतल या ताँबे का घड़ा लगा दें। 
  3. उत्तर या पूर्व की दीवार पर उत्तर-पूर्व की ओर लगे दर्पण लाभदायक होते हैं। 
  4. दर्पण के फ्रेम पर या दर्पण के पीछे लाल, सिंदूरी या मैरून कलर नहीं होना चाहिए।
  5. दर्पण जितना हलका तथा बड़े आकार का होगा, उतना ही लाभदायक होगा, व्यापार तेजी से चल पड़ेगा तथा कर्ज खत्म हो जाएगा। दक्षिण तथा पश्चिम की दीवार के दर्पण हानिकारक होते है। 
  6. उत्तर-पूर्व का तल कम से कम 2 से 3 फीट तक गहरा करवा दें। 
  7. उत्तर या पूर्व की दीवार पर उत्तर-पूर्व की ओर लगे दर्पण लाभदायक होते हैं। दक्षिण और पश्चिम की दीवार के दर्पण हानिकारक होते हैं। दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण दिशा में भूमिगत टैंक, कुआँ या नल होने पर घर में दरिद्रता का वास होता है || 
  8. अगर आपने किसी से किस्त पे रुपये लिये हैं तो आपको हमेशा कर्ज़ की पहली किस्त मंगलवार को चुकाना चाहिए| अगर ऐसा आप करेंगे तो आप कर्ज से बहुत जल्द मुक्त हो सकते हैं| 
  9. अगर आप के घर या दुकान मे काँच लगा हुआ है या लगाना चाहते हैं तो ध्यान रहें की काँच हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा मे हो| ऐसा करने से ये लाभप्रद साबित होता हैं और कर्ज़ से भी छुटकारा मिलता हैं| 
  10. अगर आप घर बनाना चाह रहे हैं या बना रहे हैं तो ध्यान रहें की घर मे बाथरूम दक्षिण-पश्चिम हिस्से मे नही होना चाहिए| अगर इस दिशा मे बाथरूम बनाए तो आप कर्ज़ मे ओर डूब सकते हैं| लेकिन आपने घर बना लिया हैं और बाथरूम की दिशा दक्षिण-पश्चिम मे हैं तो बाथरूम मे एक नमक का कटोरा रखें, इससे वास्तु दोष कम होता हैं| 
  11. अगर आपके घर मे कांच का फ्रेम हो तो ध्यान रहे की वो लाल या सिंदूरी रंग का ना हो| और अगर कांच हल्का तथा बड़े आकर का हो तो ये आपके लिए उतना ही फ़ायदेमंद होगा| 
  12. घर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में टॉइलट कभी ना बनवाएं। ऐसा होने पर व्यक्ति पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जाता है। 
  13. सभी के घर मे या दुकानों मे पानी पीने की व्यवस्था तो होती हैं, लेकिन हमें ये नही पता होता हैं की हम अपने घर मे पानी की व्यवस्था किस दिशा मे रखें, जिस कारण-वश हम कर्ज़ मे डूबते जाते हैं| इसलिए अगर आपके घर या दुकान मे पानी की व्यवस्था हैं तो उसकी रखने की दिशा उत्तर की और कर दें| तो इससे कर्ज़ से छुटकारा पाने मे मदद मिलेगी क्योंकि ये कर्ज़ से मुक्त दिलाने मे लाभ दायक होता हैं| 
  14. अगर आपके घर या दुकान मे सीढ़ियाँ हैं और वो पश्चिम दिशा की और हैं या पश्चिम दिशा की तरफ से नीचे की और आती हैं तो आप कर्ज़ मे डूब सकते हैं या कर्ज़ मुक्ति से परेशान हो सकते हैं| इसके लिए आप अपने घर या दुकान के सीढ़ियों के नीचे क्रिस्टल को लटका दें| इससे आप कर्ज़ से मुक्त हो सकते हैं| 
  15. हम हमेशा से अपने किचन को सजाने मे कोई भी कसर नही छोड़ते हैं| उसको अच्छा करने के लिए क्या-क्या नही करते हैं हम| लेकिन हम आपको एक बात बताते हैं जो आप ना करें तो आप कर्ज़ से मुक्त हो सकते हैं और आपकी परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी हो सकती हैं| इसके लिए आप अपने किचन मे नीले रंग का उपयोग ना करें क्योंकि इससे आपके घर की आर्थिक स्थिति तो खराब होती ही हैं साथ-साथ परिवार के सदस्यों का स्वस्थ भी खराब हो सकता हैं| 
  16. उत्तर दिशा की ओर ढलान जितनी अधिक होगी संपत्ति में उतनी ही वृद्धि होगी। 
  17. यदि कर्ज से अत्यधिक परेशान हैं तो ढलान ईशान दिशा की ओर करा दें, कर्ज से मुक्ति मिलेगी।
  18. पूर्व तथा उत्तर दिशा में भूलकर भी भारी वस्तु न रखें अन्यथा कर्ज, हानि व घाटे का सामना करना पड़ेगा। -
  19. भवन के मध्य भाग में अंडर ग्राउन्ड टैंक या बेसटैंक न बनवाएँ। 
  20. उत्तर व दक्षिण की दीवार बिलकुल सीधी बनवाएँ।
  21. उत्तर की दीवार हलकी नीची होनी चाहिए।
  22. कोई भी कोना कटा हुआ न हो, न ही कम होना चाहिए। गलत दीवार से धन का अभाव हो जाता है। 
  23. यदि कर्ज अधिक है और परेशान हैं तो ईशान कोण को 90 डिग्री से कम कर दें।
  24. उत्तर-पूर्व भाग में भूमिगत टैंक या टंकी बनवा दें। टंकी की लम्बाई, चौड़ाई व गहराई के अनुरूप आय बढ़ेगी।
  25. अपने घर या दुकान मे देवी लक्ष्मी तथा भगवान कुबेर की प्रतिमा उत्तर दिशा मे स्थापित करें और नियमित रूप से माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा करें| ऐसा करने से आपकी सारी उधारी और कर्ज़ समाप्त हो जाएँगे| 
  26. मकान का मध्य भाग थोड़ा ऊँचा रखें। इसे नीचा रखने से बिखराव पैदा होगा। 
  27. यदि उत्तर दिशा में ऊँची दीवार बनी है तो उसे छोटा करके दक्षिण में ऊँची दीवार बना दें।

 कर्ज मुक्ति हेतु कुछ जरुरी सुझाव--
 कई बार आप मेहनत करने के बावजूद भी घर में बरकत को लेकर परेशान रहते हैं। कहा जाता है घर में सुख-समृद्धि घर के वास्तु या वातावरण पर भी निर्भर करती है। इसलिए आज हम आपको घर में पड़े उस सामान के बारे में बता रहे हैं कि जो कि आपको घर में नहीं रखना चाहिए। 
  1.  कभी भी घर में टूटे-फूटे बर्तन नहीं रखने चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, यदि ऐसे बर्तन घर में रखे जाते हैं तो इससे मां लक्ष्मी असप्रसन्न होती हैं और घर में दरिद्रता का प्रवेश हो सकता है।
  2. कहा जाता है कि घर में टूटा हुआ शीशा रखना एक दोष है। इससे नकारात्मक ऊर्जा घर में सक्रिय हो जाती है और परिवार के सदस्यों को इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है। 
  3. पूजा करते समय दीपक, देवी-देवताओं की मूर्तियां, यज्ञोपवीत (जनेऊ), सोना और शंख, इन 7 चीजों को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। इन्हें नीचे रखने से पहले कोई कपड़ा बिछाएं या किसी ऊंचे स्थान पर रखें। 
  4. आजकल कई लोग रात में बेडरूम में खाना खाते हैं और झूठे बर्तन वहीं छोड़ देते हैं। लेकिन ऐसा करना अशुभ होता है। इसलिए जब कभी भी बेडरूम में खाना खाएं तो झूठे बर्तनों को किचन में या कहीं और रखें। कहा जाता है ऐसा करने से धन की हानि होती है। 
  5. बर्तन और शीशे की तरह खराब घड़ी भी घर में नहीं रखनी चाहिए। घड़ी की स्थिति से ही हमारे घर परिवार की उन्नति होती है, इसलिए घर में खराब और बंद घड़ी को घर में न रखें। 
  6. कभी भी तिजोरी में किसी विवाद से संबंधित पेपर नहीं रखने चाहिए। कहा जाता है कि तिजोरी में विवादित पेपर रखने से जल्दी खत्म नहीं होता और दरिद्रता बढ़ती जाती है। 
  7. वहीं घर के स्टोर रूम के पास या बाथरूम के बगल में पूजा घर नहीं होना चाहिए। ऐसा करना वास्तु के अनुसार सबसे अशुभ होता है। 
  8. घर की रसोई हमेशा अग्रि कोण में हो, गैस चूल्हा भी अग्रि कोण (साऊथ ईस्ट) में, खाना पूर्व की ओर मुंह करके बनाएं, शैंक (बर्तन धोने वाला) हमेशा नार्थ ईस्ट (ईशान कोण) में रखें। शयन कक्ष या रसोई में रात को झूठे बर्तन मत छोड़ें। हमेशा धो-मांज कर रखें। 
  9. शयन कक्ष में मदिरापान तथा कोई दूसरा व्यसन न करें, बैडरूम में कोई डरावना चित्र न लगाएं, अपने बड़े बुजुर्गों के चित्र सिर्फ लॉबी या ड्राइंगरूम में दक्षिण दिशा में लगाएं।
  10. शयनकक्ष में आपका पलंग कमरे के दरवाजे के सामने न हो, पलंग का सर दक्षिण दिशा में और पैर उत्तर दिशा की ओर रहने चाहिएं। 
  11. घर में 3 दरवाजे आमने-सामने एक ही सीध में न हों। 
  12. सीढ़ी के नीचे कोई बिजली का उपकरण न हो, न ही कोई खाने-पीने का सामान होना चाहिए। सीढ़ी कभी भी पश्चिम या दक्षिण में न खुलती हो, इसके बहुत भयावह नुक्सान हैं। 

ऐसा  हो घर का ढलान :--- 
घर का उत्तर-पूर्व भाग का ताल ज्यादा ढलान में होना चाहिए। उत्तर-पूर्व भाग जितना गहरा और जितना ढलान में रहेगा घर में उतनी अधिक सम्पति आएगी। 
 कहाँ पर हो टैंक, कुआं या नल :--- 
घर के दक्षिण दिशा में कभी भी नल, कुआ, हेण्डपम्प, या अन्य कोई जल स्तोत नहीं होना चाहिए। जिस घर्म में ऐसा होता है उस घर में दरिद्रता का वास होता है। 
 कहाँ रखें भारी वस्तु :--- 
घर की उत्तर दिशा एवं पूर्व दिशा में कभी भी भारी वस्तुए को न रखे।ऐसा करने से व्यक्ति कर्ज में और भी डूबता जाता है। 
 दीवार सीधी बनवाएं :----- 
घर बनवाते समय इस बात का खास ध्यान रखे की उत्तर व दक्षिण की दीवार बिलकुल सीधी हो किसी भी प्रकार से वह दीवार टेडी मेडी न बने। घर के सभी कोने एक सामान होना चाहिए। साथ इस बात का भी खास ध्यान रखना चाहिए की घर की उत्तर की दीवार थोड़ी सी नीची होनी चाहिए। 
 कहाँ पर नहीं हो टॉयलेट :---- 
घर के दक्षिण व पश्चिम भाग में कभी भी टॉयलेट नहीं बनवाना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति और भी कर्जा लेना पड़ता है। बाथरूम भूल कर भी नार्थईस्ट (ईशान कोण) में न हो, हमेशा दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-उत्तर पश्चिम टायलेट की सीट पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके बैठें, टायलेट में कांच के बाऊल में क्रिस्टल साल्ट (दरदरा नमक) भर कर रखें, 15 दिन बाद बदल दें, पहला टायलेट के सिंक में डाल दें। अगर किसी कारण टायलेट उत्तर-पूर्व में हो तो इसके दरवाजे पर रोअरिंग लायन का फोटो पेस्ट कर दें।

वास्तु नियम अपनाएं।। जीवन को सुखी और समृद्ध बनाये..

वर्तमान समय में वास्तु शास्त्र का प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अत्यधिक महत्व है क्योंकि वास्तु अनुकूल नहीं होगा तो मानसिक शांति कैसे होगी। सुखमय जीवन के लिए वास्तु देवता की प्रसन्नता आवश्यक है। इसलिए गृह पूजन में 'स्थान देवताभ्यो नम:', 'वास्तु देवताभ्यो नम:' आदि मंत्रों से शांति प्रदान करने का विधान है। प्रत्येक दिशा का अपना महत्व है। दिशाओं का वास्तु शास्त्र से अटूट संबंध है। आवासीय भवन के लिए भूमि खरीदने से पहले मुख्यत: निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए। 
  1. समतल भूमि- समतल भूमि सभी के लिए शुभ होती है- सर्वेषां चैवजनानां समभूमि शुभावता। इस प्रकार समतल भूमि आवास निर्माण के लिए सर्वथा लाभकारी भूमि है। 
  2. गजपृष्ठ भूमि- जो भूमि दक्षिण नैऋृत्य (दक्षिणी-पश्चिमी कोण पर) पश्चिम या वायव्य (उत्तरी-पश्चिमी कोण पर) ऊंची हो वह गजपृष्ठ भूमि कही जाती है। इस भूमि पर बने भवन का निवासी धन-धान्य से युक्त, समृद्धिशाली, दीर्घायु व निरोगी होता है। 
  3. कूर्मपृष्ठ भूमि- जो भूमि मध्य में ऊंची तथा चारो तरफ नीची हो, ऐसे भूखंड को कूर्मपृष्ठ भूमि कहते हैं। कूर्मपृष्ठ भूखंड पर निर्मित भवन में वास करने वाले व्यक्ति को नित्य सुख की प्राप्ति होती है। 
  4. दैत्यपृष्ठ भूमि- जो अग्निकोण तथा उत्तर दिशा में ऊंची व पश्चिमी दिशा में नीची हो उस भूमि को दैत्यपृष्ठ भूमि कहते हैं। यह भूमि शुभ नहीं मानी जाती। ऐसी भूमि पर निवास करने वाला व्यक्ति धन, पुत्र, पशु सहित सभी सुखों से संचित रहता है। ऐसी भूमि यदि अल्प मूल्य में भी प्राप्त हो तो क्रय न करें। 
  5. नागपृष्ठ भूमि- पूरब-पश्चिम को लंबी, उत्तर-दक्षिण को ऊंची तथा बीच में कुछ नीची भूमि को नागपृष्ठ भूमि कहते हैं। इस पर आवास निर्मित करने से उच्चाटन होता है। इस प्रकार के भवन निर्माता को मृत्यु तुल्य कष्ट, पत्नी हानि, पुत्र हानि तथा प्रत्येक पग पर शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार नागपृष्ठ भूमि निम्न कोटि की मानी जाती है। 

Architectural-adopt-rules-Create-and-prosperous-life-वास्तु नियम अपनाएं।। जीवन को सुखी और समृद्ध बनाये..     वस्तुत: व्यक्ति भवन का निर्माण सुख-शांति से रहने के लिए करता है। यदि इन बातों का ध्यान रखकर भवन निर्माण हेतु भूमि का चयन किया जाए तो इच्छित फल की प्राप्ति हो सकती है। अनिष्टकारी भूखंडों से बचाव के लिए तथ्यों का भली-भांति ज्ञान आवश्यक है। इन सबके अतिरिक्त जिस भूमि पर मकान बनाना हो उसका जीवंत होना भी आवश्यक है। कृषि व बागवानी की भूमि सर्वथा जीवंत होती है, जहां वृक्ष हरे-भरे रहते हैं, फसलें हर्षित व प्रवर्धित होती हैं, वह भूमि जीवंत मानी जाती है। जहां उत्तमोत्तम वृक्ष व लताएं रहें, मिट्टी समतल हो, शुष्क अथवा ऊसर न हो, ऐसी भूमि पर निवास करने वाला मनुष्य सुखी रहता है। ऐसी भूमि पर यदि राहगीर भी बैठ जाए तो उसे भी सुख प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है। 
जानिए भूखंडों का फल--- 
 आयताकार भूखंड का भवन सर्वसिद्धिकारक, चतुर्भुजी भूखंड का भवन धनागम कारक, भद्रासन (जिसकी लंबाई, चौड़ाई से अधिक हो) भूखंड का भवन कार्य में सफलता दायक तथा वृत्ताकार भूखंड का भवन शारीरिक पुष्टिकारक होता है। ठीक इसके विपरीत चक्राकार भूखंड का भवन दरिद्रता देने वाला, विषयकारक, शोकदायी, त्रिकोणाकार भूखंड का भवन राजभय कारक, शंकु आकार वाले भूखंड का भवन धन नाशक और पशुओं की हानि देने वाला, बृहन्मुख भूखंड का भवन बंधु-वांधवों का नाश करता है। सामान्यतया भवन निर्माण के लिए वर्गाकार अथवा आयताकार भूखंड उत्तम होता है। आयताकार भूखंड की चौड़ाई, लंबाई से दो गुना या इससे कम हो तो श्रेष्ठ होता है। यदि निकास पूरब या ईशान कोण पर हो तो अत्यंत लाभकारी होता है। यदि बाहर जाने का मार्ग आग्नेय कोण या वायव्य कोण की ओर हो तो उत्तम नहीं माना जाता है। ************************* 
वास्तुशास्त्र में दिशा का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विभिन्न दिशाओं का इन ग्रहों से गहरा संबंध है-(सारणी या टेबल बनायें)-- 
 दिशा स्वामी ग्रहों के स्थान 
पूरब। इंद्र शुक्र 
आग्नेय अग्नि चंद्रमा 
दक्षिण यम यम 
नैऋत्य। निऋति राहु 
पश्चिम। वरुण शनि 
वायव्य। वायु केतु 
उत्तर। कुबेर बृहस्पति 
ईशान शिव। बुध
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 जानिए मिट्टी परीक्षण कैसे करें :-- 
 भूखंड की उत्तर दिशा की ओर लगभग दो फुट गहरा तथा चौड़ा गड्ढा खोदें। गड्ढे की सारी मिट्टी निकालकर अलग रखें और पुन: उसी मिट्टी से गढ्ढे को भरें। यदि गड्ढा भरने पर मिट्टी शेष बचती है अर्थात मिट्टी अधिक निकलती है तो समझे कि इस भूमि पर भवन निर्माण शुभदायक है। यदि मिट्टी कम पड़ जाती है तो समझ लें कि उपयुक्त नहीं है। मिट्टी का द्वितीय परीक्षण तीन फीट का गड्ढा भूखंड के बीच में खोदकर किया जाए। इसमें पूर्णत: पानी भर दें, फिर सौ कदम दूर जाकर पुन: उसी स्थान पर आने से यदि पानी का स्तर वही रह जाता है तो भूमि अत्यंत शुभ मानी जाती है। यदि पानी का स्तर आधे से अधिक हो तो मध्यम, यदि आधे से कम हो तो भूमि का प्रभाव अच्छा नहीं होता है।
  1.  दिशा- भूखंड के चारो ओर सड़क अत्यंत शुभ मानी जाती है। दो या तीन तरफ सड़क हो तो भी भूखंड शुभ होता है। एक तरफ सड़क पूरब या उत्तर की ओर हो तो उचित होता है। पश्चिम या दक्षिण दिशा में भी सड़क होने पर भूखंड खरीदा जा सकता है। 
  2. ढाल- उत्तर या पूरब की ओर ढाल होना अत्यंत शुभ माना गया है। उपरोक्त ढाल के अतिरिक्त ढाल होने पर उपाय करना आवश्यक है। सड़क के अंतिम स्थान पर भूखंड खरीदना शुभ नहीं माना जाता है। 
  3. शल्य शोधन- भूखंड के पास मंदिर, पत्थर, नदी, तालाब, जलाशय, वृक्ष व दबे हुए दूषित पदार्थों की उपस्थिति पर भी विचार कर लेना चाहिए। वास्तु शास्त्र में भूमि का शल्योद्धार करने से भूमि के गर्भ में दबे हुए उन दूषित पदार्थों का बाहर निकालना आवश्यक है, जिनकी उपस्थिति से रोग, भय, बाधाएं तथा अन्य प्रकार के कष्ट उत्पन्न होते हैं। 

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 जानिए की कैसा हो गृह प्रारंभ मुहूर्त- 
 कोई भी भवन बाह्य दृष्टि से भव्य हो सकता है परन्तु वास्तु की दृष्टि शुभ या अशुभ हो सकता है। यदि भवन का निर्माण शुभ मुहूर्त में प्रारंभ होता है तो भवन शुभ होता है अन्यथा अशुभ व दु:खदायी हो सकता है। चैत्र, वैशाख, सावन, कार्तिक, माघ, अगहन व फाल्गुन मास गृहारंभ के लिए उत्तम होते हैं। चैत्र, कार्तिक व माघ मास तभी ग्राह्य हैं जब मेष, वृश्चिक व कुंभ की संक्रांति में हों। ज्येष्ठ, अषाढ़, भाद्रपद, अश्विन और खरमासों में गृहारंभ नहीं होना चाहिए। रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, उत्तराषाढ़, श्रवण व पुष्य गृहारंभ हेतु शुभ है। स्वाती, अनुराधा, अश्विनी, शतमिषा, उत्तराभाद्र आदि मध्यम स्तर के हैं। इसके अतिरिक्त शेष नक्षत्र अशुभ हैं। ********************************
((( जानिए कब और केसा हो गृह प्रवेश का शुभ मुहूर्त-- 
 गृहारंभ के बाद दरवाजा एवं चौखट लगाने का अंतिम रूप से गृहप्रवेश का मुहूर्त महत्व का है। गृहप्रवेश के लिए सूर्य का उत्तरायण होना तथा बृहस्पति व शुक्र का सबल होने के साथ ही अनुष्ठान होना आवश्यक है। वैशाख, ज्येष्ठ और फाल्गुन मास गृहप्रवेश के लिए उत्तम मास हैं। गृह प्रवेश के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया व पंचमी तथा शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी व त्रयोदशी तिथियां शुभ हैं। नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराषाढ़ व चित्रा नक्षत्र श्रेष्ठ हैं। अनुराधा तथा स्वाती नक्षत्र मध्यम तथा शेष में गृह प्रवेश अशुभ है। दिनों में सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार गृह प्रवेश के लिए शुभ दिन हैं। शनिवार को भी शुभ माना गया है लेकिन चोरी होने का भय रहता है। 
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गृह निर्माण से पूर्व दिशा-विदिशाओं का ज्ञान एवं इसका शोधन करना अत्यंत आवश्यक है। दिशा विहीन निर्माण से मनुष्य जीवन भर भ्रमित होकर दु:ख, कष्टादि का भागी होता है। वास्तु शास्त्र में दिशा ज्ञान हेतु सिद्धान्त ज्योतिष के तहत दिक्साधन की प्रक्रिया पूर्वकाल में विभिन्न रूपों में व्यवहृत थी। प्रक्रियान्तर्गत द्वादशांगुल शंकु की छाया से, ध्रुवतारा अवलोकन से और दीपक के संयोग से पूर्वापरादि का साधन उपलब्ध था। किन्तु ये साधन प्र्रक्रियाएं कुछ जटिल व स्थूलप्राय हैं। यही कारण है कि आज चुम्बक यंत्र (कंपास) का प्रयोग किया जा रहा है। दिशाओं के ज्ञान के बाद विदिशाओं अर्थात कोण का ज्ञान भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि दिशाओं के साथ ही विदिशाओं का भी प्रभाव गृह निर्माण पर अनवरत पड़ता रहता है। 
        विदिशा क्षेत्र किसी भी दिशा के कोणीय भाग से 22.5 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक होता है। इस तरह चार दिशा एवं चार विदिशा का पारिमाणिक वृत्त 360 डिग्री में सन्नद्ध आठ दिशाओं का ज्ञान होता है। इन आठों दिशाओं में वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ की जाय तो यह निश्चित हे कि गृहकर्ता सुख-समृद्धि, शांति व उन्नति को प्राप्त करता हुआ चिरस्थायी निवास करता है। दिशाओं में देवी-देवताओं और स्वामी ग्रहों के आधिपत्य से संबंधित बहुत चर्चाएं की गई हैं।
          दिशाओं के देव व स्वामी होने से पृथ्वी पर किसी भूखंड पर निर्माण कार्य प्रारंभ करते समय यह विचार अवश्य कर लेना होगा कि भूखंड के किस भाग में किस उद्देश्य से गृह निर्माण कराया जा रहा है। यदि उस दिशा के स्वामी या अधिकारी देवता के अनुकूल प्रयोजनार्थ निर्माण नहीं हुआ तो उस निर्माणकर्ता को उस दिशा से संबंधित देवता का कोपभाजन होना पड़ता है। इसलिए आठों दिशाओं व स्वामियों के अनुसार ही निर्माण कराना चाहिए। 
  1. पूर्व दिशा- सूर्योदय की दिशा ही पूर्व दिशा है। इसका स्वामी ग्रह सूर्य है। इस दिशा के अधिष्ठाता देव इन्द्र हैं। इस दिशा का एक नाम प्राची भी है। पूर्व दिशा से प्राणिमात्र का बहुत गहरा संबंध है। किन्तु सचेतन प्राणी मनुष्य का इस दिशा से कुछ अधिक ही लगाव है। व्यक्ति के शरीर में इस दिशा का स्थान मस्तिष्क के विकास से है। इस दिशा से पूर्ण तेजस्विता का प्रकाश नि:सृत हो रहा है। प्रात:कालीन सूर्य का प्रकाश संपूर्ण जगत को नवजीवन से आच्छादित कर रहा है। इस प्रकार आत्मिक साहस और शक्ति दिखलाने वाला प्रथम सोपान पूर्व दिशा ही है। जो हर एक को उदय मार्ग की सूचना दे रही है। इस दिशा में गृह निर्माणकर्ता को निर्माण करने अभ्युदय और संवर्धन की शक्ति अनवरत मिलती रहती है। 
  2. दक्षिण दिशा- दक्षिण दक्षता की दिशा है। इसका स्वामी ग्रह मंगल और अधिष्ठाता देव यम हैं। इस दिशा से मुख्यत: शत्रु निवारण, संरक्षण, शौर्य एवं उन्नति का विचार किया जाता है। इस दिशा के सुप्रभाव से संरक्षक प्रवृत्ति का उदय, उत्तम संतानोत्पत्ति की क्षमता तथा मार्यादित रहने की शिक्षा मिलती है। इस दिशा से प्राणी में जननशक्ति एवं संरक्षण शक्ति का समन्वय होता है। इसीलिए वैदिक साहित्य में इस दिशा का स्वामी पितर व कामदेव को भी कहा गया है। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र में प्रमुख कर्ता हेतु शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। वास्तुशास्त्र के अनुरूप गृह निर्माण यदि दक्षिणवर्ती अशुभों से दूर रहकर किया जाए तो गृहस्वामी का व्यक्तित्व, कृतित्व एवं दाक्षिण्यजन्य व्यवहार सदा फलीभूत रहता है। 
  3. पश्चिम दिशा- पश्चिम शांति की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह शनि और अधिष्ठाता देव वरुण हैं। इसका दूसरा नाम प्रतीची है। सूर्य दिन भर प्रवृत्तिजन्य कार्य करने के पश्चात पश्चिम दिशा का ही आश्रय ग्रहण करता है। इस प्रकार योग्य पुरुषार्थ करने के पश्चात थोड़ा विश्राम भी आवश्यक है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को इस दिशाजन्य प्रवृत्ति के अनुरूप ही वास्तु निर्माण मंी निर्देशित कक्ष या स्थान की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। वास्तु के नियमानुसार मनुष्य को प्रवास की स्थिति में सिर पश्चिम करके सोना चाहिए। 
  4. उत्तर दिशा- यह उच्चता की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह बुध और अधिष्ठाता देव कुबेर हैं। किन्तु ग्रंथान्तर में सोम (चंद्र) को भी देवता माना गया है। इस दिशा का एक नाम उदीची भी है। इस दिशा से सदा विजय की कामना पूर्ति होती है। मनुष्य को सदा उच्चतर विचार, आकांक्षा एवं सुवैज्ञानिक कार्य का संकल्प लेना चाहिए। यह संकल्प राष्ट्रीय भावना के परिप्रेक्ष्य में हो किंवा परिवार समाज को प्रेमरूप एकता सूत्र में बांधने का, ये सभी सफल होते हैं। ऐसी अद्भुत संकल्प शक्ति उत्तर दिशा की प्रभावजन्य शक्ति से ही संभव हो सकती है। अभ्युदय का मार्ग सुगम और सरल हो सकता है। 

         स्वच्छता, सामर्थ्य एवं जय-विजय की प्रतीक यह दिशा देवताओं के वास करने की दिशा भी है, इसीलिए इसे सुमेरु कहा गया है। अतएव मनुष्य मात्र के लिए उत्तरमुखी भवन द्वार आदि का निर्माण कर निवास करने से सामरिक शक्ति, स्वच्छ विचार व व्यवहार का उदय और आत्म संतोषजन्य प्रभाव अनवरत मिलता रहता है। शयन के समय उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए। वैज्ञानिक मतानुसार उत्तरी धु्रव चुम्बकीय क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली धु्रव है। उत्तरी धु्रव के तीव्र चुम्बकत्व के कारण मस्तिष्क की शक्ति (बौद्धिक शक्ति) क्षीण हो जाती है। इसलिए उत्तर की ओर सिर करके कदापि नहीं सोना चाहिए। 
  1. आग्नेय कोण- पूर्व-दक्षिण दिशाओं से उत्पन्न कोण आग्नेय कोण है। इस कोण के स्वामी ग्रह शुक्र व अधिष्ठाता देव अग्नि हैं। यह कोण अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्व दिशाजन्य तेज-प्रताप और दक्षिण दिशाजन्य वीर्य-पराक्रम के संयोग से यह कोण अद्भुत है। वास्तुशास्त्र में इस कोण को अत्यधिक पवित्र माना गया है। गृह निर्माण के समय पाकशाला (भोजन कक्ष) की व्यवस्था इसी कोण में सुनिश्चित की जाती है। भोजन सामग्री अग्नि में पककर देव प्रसाद हो जाती है और इसे ग्रहण करने से मनुष्य की समस्त व्यावहारिक क्रियाएं शुद्ध धातुरूप होने लगती हैं। 
  2. नैर्ऋत्य कोण- यह कोण दक्षिण-पश्चिम दिशा से उत्पन्न होता है। इस कोण के स्वामी ग्रह राहु और अधिष्ठाता देव पितर या नैरुति (दैत्य) हैं। यह कोण मनुष्य हेतु कुछ नि:तेजस्विता का कोण है। दक्षिण दिशा वीर्य-पराक्रम और पश्चिम दिशाजन्य शांति-विश्राम की अवस्था के संयोग से उद्भूत यह उदासीन कोण है। दिशा स्वामी ग्रह राहु भी छाया ग्रह है जो सामान्यत: प्रत्येक अवस्था में शुभत्व प्रदान करने में समर्थ नहीं होता है। इसलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार नैर्ऋत्य कोण में किसी भी गृहकर्ता हेतु शयन कक्ष नहीं बनाने की बात कही गई है। अन्यथा शयन कक्ष बनाकर उसमें रहने वाला मनुष्य हमेशा विवाद, लड़ाई-झगड़े में फंसा रहने वाल, आलसी या क्रोधी होकर जीवन भर कष्ट भोगने हेतु बाध्य होता है। अतएव इस कोण की दिशा वाले कमरे को सदा भारी वजनी सामान अथवा बराबर प्रयोग में न आने वाले सामानों से भारा या दबा रखना शुभदायक होता है। 
  3. वायव्य कोण- पश्चिम-उत्तर दिशा से उद्भूत कोण वायव्य कोण है। इसके स्वामी ग्रह चंद्र और अधिष्ठाता देव वायु हैं। पश्चिम के शुद्ध जलवायु और उत्तर दिशाजन्य उच्चतम विचारों के संयोग से यह कोण उत्पन्न होता है। अतएव इस दिशा से वायु का संचरण निर्बाध गति से गृह के अंदर आता रहे, इसकी पूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। इस कोण से आने वाली हवा के मार्ग को अवरुद्ध नहीं करना चाहिए। अवरुद्ध होने से गृहस्वामी मतिभ्रम का शिकार एवं हीनभावना से ग्रस्त हो सकता है। 
  4. ईशानकोण- यह कोण उत्तर-पूर्व दिशा से उत्पन्न होता है। इस कोण के स्वामी ग्रह बृहस्पति और अधिष्ठाता देव ईश (रूद्र) या स्वंय बृहस्पति हैं। ईशान का तात्पर्य देवकोण से भी है। इस विदिशा से उच्चतर विचारों, सत् संकल्पों का उदय होना तथा पूर्व दिशा से प्रगति का मार्ग बतलाने जैसी संयोगात्मक संस्तुति का फल ही ईशान कोण है। किसी ने ईशान का देवता शिव (महादेव) को कहा है। यह भी सही है। क्योंकि शिव तो कल्याण का पर्यायवाची शब्द है। अर्थात यह विदिशा उच्चतर विचारों से ओतप्रोत करते हुए कल्याण व प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। इस कोण में निर्माण कार्य करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक होगा कि यह कोण किसी प्रकार भारी वस्तुओं से ढंका नहीं होना चाहिए। यदि इस कोण के कमरे को अध्ययन कक्ष, पूजा स्थल के रूप में प्रयोग किया जाय तो अत्युत्तम होगा, अन्यथा खुला ही रखना चाहिए। 

      ऐसा करने से गृह स्वामी नित्य अपने को तरोताजा एवं स्वयं में अभिनव तेज के प्रभाव को अनुभव करता हुआ अभ्युदय संकल्प का संयोजन करता रहता है।।
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