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जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों को

वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को एक शुभ ग्रह माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को भौतिक, शारीरिक और वैवाहिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिए ज्योतिष में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग आदि का कारक माना जाता है। 
समझें शुक्र एवम शुक्र के प्रभाव को--
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शुक्र, वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है और मीन इसकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इसकी नीच राशि कहलाती है। शुक्र को 27 नक्षत्रों में से भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। ग्रहों में बुध और शनि ग्रह शुक्र के मित्र ग्रह हैं और तथा सूर्य और चंद्रमा इसके शत्रु ग्रह माने जाते हैं। शुक्र का गोचर 23 दिन की अवधि का होता है अर्थात शुक्र एक राशि में क़रीब 23 दिन तक रहता है।
        ज्योतिष में धन और लक्ष्मी का कारक शुक्र ग्रह को माना गया है। सबसे ज्यादा धन देने में यही ग्रह समर्थ है। शुक्र ग्रह को शुक्राचार्य/दैत्याचार्य भी कहाँ जाता है। वृषभ और तुला राशि का स्वामी शुक्र ही होता है। तुला राशि शुक्र की मूल त्रिकोण अर्थात सबसे प्रिय राशि है। व्यय भाव अर्थात पत्रिका का 12वां स्थान इसकी सबसे प्रिय जगह है। 12वीं राशि मीन में यह उच्च राशि का होता है। इस ग्रह को भोग प्रिय ग्रह कहा गया है। इसलिये पत्रिका के बारहवें भाव जिसे खर्च, शय्या स्थान भी कहा जाता है, वहां यह ग्रह सबसे शानदार परिणाम देता है। यदि आपकी कुंडली में यह ग्रह अच्छी स्थिति में है तो आपको शानदार जीवन जीने को मिलेगा। शुक्र की नीच राशि कन्या होती है। जहा ये ग्रह अच्छे परिणाम नही देता।

शुक्र की शुभ स्थिति--

Know-and-understand-the-diseases-caused-by-Venus-जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों कोपत्रिका में वृषभ, तुला तथा मीन राशि का शुक्र हो तो जातक यदि दरिद्र परिवार में भी जन्मा हो तो अमीर बन जाता है। यदि किसी भी राशि का शुक्र बारहवें भाव में हो तो जातक को वैभवपूर्ण जीवन जीने कॊ मिल ही जाता है। यदि पत्रिका के 6ठे भाव मॆ स्थित होकर भी यह ग्रह जब 12वे स्थान कॊ देखता है तो अच्छे परिणाम देता है। पत्रिका के दूसरे तथा सातवें मॆ बैठा शुक्र शादी के बाद आर्थिक स्थिति को शानदार कर देता है।

पत्नी, प्रेमिका व सुंदर वाहन--

शुक्र ग्रह को प्रेमिका माना गया है। संसार मॆ समस्त तरह का प्रेम इसी ग्रह से देखा जाता है।राधा कृष्ण का दिव्य प्रेम शुक्र ग्रह से ही सम्भव है। संसार मॆ समस्त सुंदरता इस ग्रह से ही है।शानदार तथा महँगे वाहन, मकान इस ग्रह की कृपा से ही सम्भव है।

शनि का परम मित्र हैं शुक्र--

जीवन मॆ कड़ी मेहनत से ही लक्ष्मी प्राप्ति होती है चाहे वह कर्म कैसा भी हो। हां एक बात अवश्य है की आपके कर्मफल भोगना पड़ता है। शनि व शुक्र का विशेष प्रेम है शुक्र की राशि तुला मॆ शनि उच्च राशि का होता है। यानी आपने जी तोड़ परिश्रम किया है तो लक्ष्मी कृपा आपको अवश्य प्राप्त होगी।

स्वच्छता पसंद है शुक्र ग्रह को--

दीवाली के पहले लक्ष्मी पूजन के लिये हम सभी जगह सफाई करते है रंग रोगन भी करते है साफ वस्त्र पहनते है। इस तरह हम शुक्र ग्रह को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। यदि आप स्वच्छ रहते है (निर्धन भी स्वच्छ रह सकता है) तथा कड़ी मेहनत करते है तो निश्चित रूप से आप पर लक्ष्मी मां की कृपा होगी।
भगवान विष्णु, लक्ष्मी तथा भ्रगु ऋषि में समझौता
मां लक्ष्मी हमेशा क्षीरसागर में शेषनाग में विश्राम कर रहे भगवान विष्णु की चरण सेवा करती हैं। एक बार त्रिदेव के क्रोध की परीक्षा हेतु ऋषि भ्रगु ने क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर प्रहार किया था। जिससे रुष्ट होकर माता लक्ष्मी ने ब्राह्मणों कों दरिद्र होने का शाप दिया। बदले में भ्रगु ने भी मां लक्ष्मी को श्राप दिया। इस झगडे को भगवान विष्णु ने सुलझाया। उन्होने कहा, जहाँ ब्राह्मण अपनी पूजापाठ व आशीर्वाद देगा वहा लक्ष्मी को आना ही पड़ेगा साथ ही जो व्यक्ति ब्राह्मणों को दान देगा उसे ही लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।
     ज्योतिषीय ग्रंथों में शुक्र को भोग का कारक ग्रह माना गया है। इसका प्रभाव जातक के भोग करने पर अधिक पड़ता है। उसे जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोगों का अधिक सामना करना पड़ता है।  जब जन्म पत्रिका में शुक्र निर्बल अथवा पीड़ित हो अथवा शुक्र के गोचर काल में जातक को गुप्त रोग, जननेन्द्रिय के पूर्ण रोग, स्त्रियों को प्रदर संतान बंध्यत्व, स्तन रोग, वक्ष ग्रन्थि, पुरुष को शीघ्रपतन, लिंग सिकुड़ना, उपदंश, मूत्र संस्थान के रोग, दवा की विपरीत प्रतिक्रिया, कैंसर, गंडमाला, अधिक सम्भोग के बाद कमजोरी अथवा चन्द्र व चतुर्थ भाव के पीड़ित होने पर हृदयाघात भी हो सकता है। 
खगोलीय दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व---
खगोल विज्ञान के अनुसार, शुक्र एक चमकीला ग्रह है। अंग्रेज़ी में इसे वीनस के नाम से जाना जाता है। यह एक स्थलीय ग्रह है। शुक्र आकार तथा दूरी में पृथ्वी के निकटतम है। कई बार इसे पृथ्वी की बहन भी कहते हैं। इस ग्रह के वायु मंडल में सर्वाधिक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस भरी हुई है। इस ग्रह से संबंधित दिलचस्प बात यह है कि शुक्र सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लिए सबसे तेज़ चमकता है। इसी कारण इसे भोर का तारा या सांझ का तारा कहा जाता है।
         इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि खगोलीय और धार्मिक दृष्टि के साथ साथ ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व कितना व्यापक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित 12 भाव उसके संपूर्ण जीवन को दर्शाते हैं और जब उन पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के जीवन में उसका असर भी दिखाई देता है।
धार्मिक दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व --
पौराणिक मान्यता के अनुसार, शुक्र ग्रह असुरों के गुरू हैं इसलिए इन्हें शुक्राचार्य भी कहा जाता है। भागवत पुराण में लिखा गया है कि शुक्र महर्षि भृगु ऋषि के पुत्र हैं और बचपन में इन्हें कवि या भार्गव नाम से भी जाना जाता था। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष शास्त्रों में शुक्र देव के रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है - शुक्र श्वेत वर्ण के हैं और ऊँट, घोड़े या मगरमच्छ पर सवार होते हैं। इनके हाथों में दण्ड, कमल, माला और धनुष-बाण भी है। शुक्र ग्रह का संबंध धन की देवी माँ लक्ष्मी जी से है, इसलिए हिन्दू धर्म के अनुयायी धन-वैभव और ऐश्वर्य की कामना के लिए शुक्रवार के दिन व्रत धारण करते हैं।

गुरु कृपा प्राप्त करे--

यदि आप धन लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते है तो इसके लिये आपको कड़ी मेहनत, स्वच्छता के अलावा गुरु, ब्राह्मण कृपा व आशीर्वाद आवश्यक है। यदि ब्राह्मण और गुरु रुष्ट है तो आपकी लक्ष्मी अन्यत्र चली जायगी। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि शुक्र के रोग भाव के स्वामी के साथ होने पर जातक को नेत्र में चिन्ह बनता है। शुक्र की महादशा तथा शुक्र की अन्तर्दशा में जातक को विभिन्न रोग हो सकते हैं। 
  • शुक्र यदि द्वितीय भाव में है तो हृदयरोग, नेत्रकष्ट, मानसिक समस्या, चोरी के कारण धन हानि, राजप्रकोप अथवा शत्रु प्रबल होते हैं।
  • शुक्र तृतीय अथवा एकादश भाव में होने पर राजा अर्थात् उच्चाधिकारी से दण्ड, अग्निकाण्ड, भाई से कष्ट तथा कई अन्य कष्ट हो सकते हैं।
  •  शुक्र त्रिकोण अर्थात् लग्न, पंचम अथवा नवम भाव में होने पर जातक अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता है। वह सदैव शंका व संशय में रहता है शारीरिक व मानसिक कष्ट भी प्राप्त होते हैं। इस स्थिति की सम्भावना
  • शुक्र के 4-6-8 अथवा 12वें भाव में होने पर अथवा शुक्र गोचरवश इन भावों में आने पर ही अधिक होती है।

आप यह न समझें कि यदि आपकी पत्रिका में शुक्र पापी है तो आपको केवल यही रोग होंगे, रोग होने में शुक्र किस भाव में तथा किस राशि में स्थित है, इस बात का भी बहुत असर होता है। यहां पर हम पत्रिका में शुक्र किस राशि में होने पर किस रोग की सम्भावना अधिक होती है। इसकी इस लेख द्वारा जानकारी प्राप्त करेंगे।
  1. शुक्र यदि मेष राशि में हो तो जातक को शिरोरोग, शूल, नेत्र रोग तथा सिर पर चोट का भय होता है।
  2. शुक्र के वृषभ राशि में होने पर जातक को तभी रोग होते हैं, जब शुक्र अत्यधिक पीड़ित हो। इनमें आहार नली का संक्रमण, गलसुए, टान्सिल्स, मुख व जिव्हा पर छाले जैसे रोग अधिक होते हैं।
  3. शुक्र के मिथुन राशि में होने पर जातक को गुप्त रोग, चेहरे पर मुंहासे आदि होते हैं। यदि लग्नस्थ शुक्र है तो चर्मविकार के साथ रक्त विकार की भी सम्भावना होती है।
  4. शुक्र के कर्क राशि में होने पर जातक को जलोदर, वक्ष सूजन, अपच, वमन अथवा जी मिचलाने जैसे रोग होते हैं। मंगल की दृष्टि होने पर अक्सर शरीर में जल की कमी से ग्लूकोज की बोतलें चढ़ती हैं।
  5. शुक्र के सिंह राशि में होने पर जातक को हृदयविकार, रीढ़ की हड्डी की पीड़ा व रक्त धरमनियों के रोग अथवा धमनी रक्त का थक्का जमने से हृदयाघात का योग बनता है।
  6. शुक्र के कन्या राशि में होने पर जातक को खूनी अतिसार, थोड़ा भी खाते ही शौच जाना तथा भोजन का न पचना जैसे रोग उत्पन्न होते है। 
  7. शुक्र के तुला राशि में होने पर जातक को मूत्र संस्थान के रोग, शीघ्रपतन तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह जैसे रोग होते हैं।
  8. शुक्र के वृश्चिक राशि में होने पर पुरुष जातक को अण्डकोष के रोग, अल्पवीर्यता, हर्निया की शल्य क्रिया, उपदंश तथा स्त्री जातक को गर्भाशय संक्रमण योनिरोग, श्वेत प्रदर व गुदाद्वार के रोग होते हैं।
  9. शुक्र के धनु राशि में होने पर जातक को गुदा रोग अथवा शल्य क्रिया, फिशर, गुप्तेन्द्रिय रोग, स्नायु रोग, कमर की पीड़ा, दुर्घटना में कमर उतरना जैसे रोग अधिक होते हैं।
  10. शुक्र के मकर राशि में होने पर जातक को घुटनों की पीड़ा व सूजन, त्वचा रोग, कमर से निचले हिस्से में पीड़ा व स्नायु विकार के रोग होते हैं।
  11. शुक्र के कुंभ राशि में होने पर जातक को रक्तवाहिका के रोग, घुटने में पीडा अथवा सूजन, रक्तविकार स्फूर्ति में कमी, काम में मन न लगना आदि रोग होते हैं।
  12. शुक्र मीन राशि में होने पर जातक को पैरों के पंजों के रोग अधिक होते हैं। तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह रोग की संभावना बढ़ जाती है।
जानिए शुक्र ग्रह के मंत्र -

शुक्र का वैदिक मंत्र---
ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

शुक्र का तांत्रिक मंत्र---
ॐ शुं शुक्राय नमः

शुक्र का बीज मंत्र---
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

क्या होगा यदि शुक्र स्थित हो रोग/ऋण/शत्रु (6ठे भाव में) तो --
शुक्र की इस भाव में स्थिति आपके कुल की श्रेष्ठता का द्योतक हो सकती है। आप सुशिक्षित और विवेकवान हो सकते हैं। लेकिन यहां स्थित शुक्र आपको डरपोक बना सकता है अथवा आपको स्त्रियों से अप्रियता भी मिल सकती है। गुरुजनों से भी आपका विरोध रह सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस भाव में शुक्र के शुभ फल अधिक मिलते हैं, मतान्तर से शुक्र यहाँ निष्फल होता है लेकिन अधिक मत शुक्र के शुभ फल देने के हैं। शुक्र के निष्फल होने के मत में जातक शारीरिक रूप से सुखहीन, दुराचारी, अधिक मित्र वाला, मूत्र रोग से ग्रसित, विपरीत लिंग में प्रिय, गुप्तरोगी, समस्त प्रकार के वैभव व सुख से रहित, संकीर्ण मानसिक प्रवृत्ति का, शारीरिक रूप से भी अववस्थ व अक्षम, सदैव दुःखी रहने वाला परन्तु शत्रुनाशक तथा विवाहोपरान्त भाग्योदय अवश्य होता है। दूसरे मत में अर्थात् शुक्र के शुभ फल में जातक अत्यधिक सुख प्राप्ति, धनवान, अधिक शारीरिक सुख प्रापत करने वाला तथा समस्त प्रकार के वैभव को भोगने वाला होता है।
       ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसा जातक अपने मातृपक्ष (मामा-मौसी) के लिये अशुभ होता है। इस भाव में शुक्र यदि पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में हो तो जातक का जीवनसाथी सुन्दर तो होता है परन्तु झगड़ालू प्रवृत्ति का होता है। वह परिवार में सामंजस्य बनाकर चलता है। ऐसे लोगों को )ण से बचना चाहिये क्योंकि यदि उन्होंने एक बार )ण ले लिया तो फिर इस योग के प्रभाव से वह जीवनपर्यन्त )णग्रस्त रहेंगे। एक पुत्री को वैधव्य भोगना पड़ सकता है जिसका पूर्ण खर्चा जातक को ही उठाना पड़ता है। खाने में कोई संयम नहीं रखते हैं। गुप्त रोग के साथ मूत्र संस्थान का संक्रमण भी हो सकता है।
      आपको शत्रुओं से पीडा भी मिल सकती है। हांलाकि आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। आपको भाई-बहनों और मामा से सुख मिलेगा। आपके मामा के कन्या संतान अधिक हो सकती हैं। आपके अच्छे मित्रों की संख्या कम होगी जबकि खराब आदतों वाले मित्र अधिक संख्या में होंगे। आपकी प्रथम संतान पुत्र के रूप में हो सकती है। आपकी संतान अच्छी होगी और आप पुत्र-पौत्रों से युक्त होंगे। किसी भी जन्म कुंडली के छठे भाव में शुक्र  जातक की कुंडली के छठे भाव में बैठा शुक्र जातक को विपरित लिंग की ओर आकर्षित करता है। 
     लग्न का छठा भाव बुध और केतू का माना गया है जो एक दूसरे के शत्रु हैं, लेकिन शुक्र दोनों का मित्र है. इस घर में शुक्र नीच होता है। लेकिन यदि जातक विपरीत लिंगी को प्रसन्न रखता है और सारे और सुविधा उपलब्ध करवाता है तो उसके धन और पैसे में बृद्धि होगी।  ऐसा जातक अपने काम को बिच में अधूरा नहीं छोड़ता है। इस भाव के शुक्र पर हुए मेरे शोध का फल कहता है कि ऐसा जातक संसार के प्रत्येक सुख का भोग करता है लेकिन इस भोग के कारण उसे गुप्त रोग भी होता (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो जातक अत्यधिक यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जीवनसाथी सुन्दर व सुशील होता है परन्तु वह कठोर भाषा का प्रयोग अधिक करता है। 
   जब स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में शुक्र होने पर जीवनसाथी बहुत ही कोमल शरीर का परन्तु स्वभाव बिलकुल विपरीत होता है। संतान कम होती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ऐसा जातक रुपया लगाकर व्यापार में पूर्णतः असफल होता है परन्तु बिना धन के व्यवसाय में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिये जैसे किसी व्यवसाय में कोई ऐसा व्यक्ति धन लगाये जिसे व्यापार का अनुभव न हो तो ऐसे जातक को वह सलाहकार अथवा किसी अन्य रूप में सम्मिलित करे तो फिर जातक व्यापार में बहुत सफल होता है।
    ऐसा होने पर स्त्री पक्ष से आपको कम सुख मिलेगा अथवा कुछ गुप्त परेशानियां रह सकती हैं। हांलाकि विवाह के बाद यदि आपका आहार विहार नियमित और मर्यादित रहेगा तो समस्याएं नहीं होंगी। आपके खर्चे आमदनी से अधिक हो सकते हैं। हो सकता है कि आप उचित स्थान पर खर्च न करके अनुचित जगह पर खर्च करें। हो सकता है कि स्वतंत्र व्यवसाय से भी आपको बहुत लाभ न मिल पाए।
इन उपाय से होगा लाभ -
-- जातक की पत्नी को पुरुषों के जैसे कपडे नहीं पहनने चाहिए और न ही पुरुषों के जैसे बाल रखने चाहिए अन्यथा गरीबी बढती है। 
-- ऐसे जातक को उसी से विवाह करना चाहिए जिस स्त्री के भाई हों।
-- जातक स्त्री हो तो स्वयं या फिर पुरुष हो तो पत्नी अपने बालों में सोने का कि.ल लगाए। 
-- खयाल रखें कि पत्नी नंगे पैर न चले।

जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्ध

Know-your-life-marital-status-and-relationship-of-Venus-जानिए आपके जीवन और वैवाहिक स्थिति पर शुक्र का सम्बन्धआज की इस आधुनिक जीवन शेली में मनुष्य को एक से अधिक जीवन साथी की (सिर्फ शर्रारिक सम्बन्ध ) के लिए जरूरत लगती हैं परन्तु ऐसे जातको के कुंडली के योग ही उनको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! अब बात आती हैं की ऐसे कोन-कोन से योग होते हैं जो हमको एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! वर्तमान में अधिकतर कुंडलियो में शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग फलित होता हैं या जातक एक से अधिक साथियो की प्रति आकर्षित करते हैं ! परन्तु सिर्फ शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध होने से कोई भी ज्योतिषी किसी जातक के चरित्र का आंकलन नहीं कर सकता हैं ! इस योग मैं हमारी कुंडली के भावो का भी योगदान रहता हैं | 
              मेरे विचार से समाज में हो रहे ऐसे कई परिवर्तन इसके कारण हैं. और यह कई कारणों से हो सकता है ...जैसे पति की नपुंसकता , पत्नी का दुर्व्यवहार , समय का अभाव , आपसी समझ का अभाव , वगेरह वगेरह . हमको इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्यों से कोई मतलब नहीं है अपितु इसके ज्योतिषीय कारणों की चर्चा ज़रूर करेंगे |आज के समय में किसी को अच्छे बुरे की परवाह नहीं है और सभी लोग अंधों की तरह अपने स्वार्थों की पूर्ती करने में लगे हुए हैं. हम रोज़ ही अखबारों में पढ़ते रहते हैं की फलां स्त्री का अनैतिक यौन समबन्धों के कारण क़त्ल हो गया, फलां के साथ वैसा हो गया. आजकल स्वाप्पिंग का चलन भी बहुत हो चुका है और हमारे जाने बिना यह बढ़ता ही जा रहा है. कॉलसेंटर कल्चर ने भी स्त्री पुरुष के विवाह पूर्व और विवाहेतर समबन्धों को बढाने में बहुत योगदान दिया है. इन्हीं सब कारणों के चलते विवाह नाम की क्रिया और परिवार नाम का संस्थान बहुत अन्धकार में जा चूका है. 
          यहाँ तक की बड़े परिवारों में रक्त सम्बंधोयों के मध्य ही यौन सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं और किसी को पता नहीं चलता. जब तक पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है. पंचम भाव और पंचम का उपनक्ष्त्र स्वामी विवाह पूर्व प्रेम सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध आदि के होते है अन्य बातों के अलावा, शुक्र काम का मुख्य करक गृह है और रोमांस प्रेम आदि पर इसका अधिपत्य है. मंगल व्यक्ति में पाशविकता और तीव्र कामना भर देता है और शनि गुप्त रास्तों से कामाग्नि की पूर्ती करने को प्रेरित करता है. ज्योतिषशास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न पंचम सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। प्रेम होना अलग बात है और प्रेम का विवाह में परिणत होना अलग बात है। 
            ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।ऐसा नहीं है कि केवल इन्हीं स्थितियो मे प्रेम विवाह हो सकता है। अगर आपकी कुण्डली में यह स्थिति नहीं बन रही है तो कोई बात नहीं है हो सकता है कि किसी अन्य स्थिति के होने से आपका प्रेम सफल हो और आप अपने प्रेमी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करें। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । 
        शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। कुंडली के सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवं उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे | ज्योतिष शास्त्र का एक सर्वमान्य नियम यह है कि स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि तथा उच्चराशि में स्थित ग्रह उस भाव का नाश नहीं करता, बल्कि वह उस भाव के फल की वृद्धि करता है। किन्तु नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित ग्रह भाव को नष्ट कर देता है। अतः मांगलिक योग ग्रह, स्वराशि, मूल त्रिकोण रशि तथा उच्च राशि में होने पर दोषदायक नहीं होता है। किन्तु इस योग को बनाने वाला ग्रह नीच राशि या शत्रु राशि में हो तो अधिक दोष दायक होता है। 
 बृहद पराशर होरा शास्त्र में कहा गया है की—- 
 सुखीकान्त व पुः श्रेष्ठः सुलोचना भृगु सुतः। काब्यकर्ता कफाधिक्या निलात्मा वक्रमूर्धजः।।।
       तात्पर्य यह है कि शुक्र बलवान होने पर सुंदर शरीर, सुंदर मुख, अतिसुंदर नेत्रों वाला, पढने लिखने का शौकीन कफ वायु प्रकृति प्रधान होता है। 
 **** शुक्र के अन्य नामः- 
भृगु, भार्गव, सित, सूरि, कवि, दैत्यगुरू, काण, उसना, सूरि, जोहरा (उर्दू का नाम) आदि हैं। 
 **** शुक्र का वैभवशाली स्वरूपः- 
यह ग्रह सुंदरता का प्रतीक, मध्यम शरीर, सुंदर विशाल नेत्रों वाला, जल तत्व प्रधान, दक्षिण पूर्व दिशा का स्वामी, श्वेत वर्ण, युवा किशोर अवस्था का प्रतीक है। चर प्रकृति, रजोगुणी, स्वाथी, विलासी भोगी, मधुरता वाले स्वभाव के साथ चालबाज, तेजस्वी स्वरूप, श्याम वर्ण केश और स्त्रीकारक ग्रह है। इसके देवता भगवान इंद्र हैं। इसका वाहन भी अश्व है। इंद्र की सभा में अप्सराओं के प्रसंग अधिकाधिक मिलते हैं। यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है. 
           यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है. लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा) सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है. सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं | 
          पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है| जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है. पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है. वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है. अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है.
               एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिफर् गुण मिलान से कुछ नही होता. जैसे - कि यदि शुक्र व् मंगल की युति या द्रष्टि सम्बन्ध बने तो व्यभिचारी योग / कृष्ण योग दोस्त क साथ बनता हैं! यदि शुक्र या मंगल दोनों में से कोई भी गृह नवम भाव कि का स्वामी हो तो जातक क सम्बन्ध अपने देवर( पति को छोटा भाई ) या साली (पत्नी कि छोटी बहन ) क साथ सम्बन्ध बनते हैं ! परन्तु इस योग क मध्य में १२ भाव का सम्बन्ध होना आवश्यक हैं तभी इस योग को फल मिलता हैं! क्यों कि ज्योतिष शास्त्र में १२ भाव को शय्या सुख का भाव बोला जाता हैं और बिना शय्या सुख के दो जातको के मध्य में सम्बन्ध नहीं बन सकता हैं! यदि इस योग में शनि गृह कि युति या द्रष्टि समबन्ध हो तो जातक के सम्बन्ध अपने से बड़े जातक से बनते हैं और यदि रहू /केतु कि युति या सम्बन्ध बने तो नीच लोगो के साथ सम्बन्ध बनते हैं !यदि इस योग क मध्य में सूर्य हो तो किसी बड़े पद के जातक/जातिका से सम्बन्ध बनाते हैं! यदि शुक्र और मंगल के साथ बुध या शनि गृह कि भी युति हो जाये तो जातक सम्लेगिक होता हैं! यह योग यह योग शुक्र व् केतु कि युति होने से भी फलित होता हैं ऐसा कुछ एक कुंडलियो में देखा गया हैं इस योग के भंग होने का योग किसी एक गृह का वक्री होने पर होता हैं परन्तु वो गृह वक्री होकर निर्बल होना चाहिए! 
          अब बात आती हैं कि इस योग का खुलना और छुपा रहने का क्या योग होगा ? उसके कुछ योग इस प्रकार से देखे गए हैं जैसे :- यदि शुक्र व् मंगल की युति या योग पर गुरु कि द्रष्टि हो तो यह योग छुपा रहता हैं क्यों कि गुरु हमारे सभी नवग्रहों में सब से बड़ा हैं और वोह सब कुछ छुपा लेता हैं या उस क निचे सब कुछ छिप जाता हैं!परन्तु गुरु कुंडली में जिस भाव का स्वामी होगा उस भाव से सम्बंधित जीव कि जानकारी में यह योग होगा परन्तु सब से छुपा हुआ ही रहेगा और यदि यह योग ४भव में बने तो भी छुपा हुआ रहता हैं क्यों कि चतुर्थ भाव जमीन के नीचे के भाव को भी दर्शता हैं यह योग क्यों छुपा हुआ रहता हैं इस कि चर्चा हम बाद में करंगे! यदि नवमांश कुंडली में शुक्र और मंगल कि युति किसी भी एक राशी में बने तो भी कृष्ण योग बनता हैं! वैदिक ज्योतिष के अनुसार तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगल होता है और इस भाव में शुक्र होने पर जातक की पत्नी मर्द के समान जातक की हर मुसीबत में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाली होती है| 
              जातक पर आने वाली किसी भी मुशीबत को अपने उपर पहले लेने वाली होती है लेकिन शुक्र यानी की पत्नी में मंगल यानी की पुरुष के ज्यादा गुण होने केकारण जातक को अपनी पत्नी से पूर्ण रूप से शारीरिक सुख नही मिल पाता| यहाँ शुक्र के समय यदि जातक पराई औरत के चक्कर में पड़ता है तो उसको उपरलिखित पत्नी से साथ मिलना के योग कम हो जाता है| अब कई बार हमारे मन में आता हैं कि हम सिर्फ शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग का निर्माण क्यों मानते हैं या हमारे गुरुजनों ने शुक्र और मंगल से ही कृष्ण योग को क्यों फलित माना हैं! ज्योतिष शाश्त्र में शुक्र को प्रेम का कारक मानते हैं और मंगल को उत्तेजना का कारक कहा जाता हैं जब भी प्रेम और उत्तेजना कि युति योगी तो कृष्ण योग का निर्माण होगा 
---मंगल+शुक्र- हर प्रकार के कलाकारों (फिल्मी सितारों) में डांस, ड्रामा एवं स्त्री जाति पर प्रभुत्व और सफलता प्राप्त करने के लिए। 
--यदि कुंडली में शुक्र बलि हो तो जातक का प्रेम निश्छल होता हैं! यदि कुंडली में ५,७,११,१२ भाव कि युति या कोई भी एक सम्बन्ध बने तो कृष्ण योग का उपयोग वियेवासयिक कार्यो में होता हैं और यदि कुंडली में ५,८,१२ भावेशो कि युति या सम्बन्ध बने तो बदनामी का योग भी बनता हैं! क्यों कि अष्टम भाव बदनामी का भाव होता हैं और यदि इस योग में १,५,६,८,१२ व् शनी कि युति हो जाये तो जातक किसी कोर्ट केस में फश जाता हैं! यदि इस योग पर कोई भी ज्योतिषी और प्रकाश डालना चाहे तो उनका स्वागत हैं! 
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यदि सप्तमेश शुक्र-- 
  1. तीसरे घर में हो : बहुत ज्यादा पाप प्रभाव में हो, तब व्यक्ति के उसके भाई की पत्नी के साथ अथवा महिला के उसकी बहिन के पति के साथ सम्बन्ध हो सकते हैं किन्तु वह बहुत पाप प्रभाव में होना चहिये. 
  2. चतुर्थ भाव में हो : और राहू – केतु के साथ हो तब जातक की पति / पत्नी के चाल चलन पर शक किया जा सकता है. 
  3. पंचम भाव में हो : और बहुत अधिक पीड़ित हो तो जातक की पत्नी किसी और के शिशु को जन्म दे सकती है. -
  4. छठे भाव में हो : और बहुत पीढित हो तो व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है , साथ ही शुक्र भी बहुत कमजोर होना चहिये तथा उसका विवाह ऐसी महिला के साथ हो सकता है जो बीमार होगी तथा व्यक्ति को विवाहित जीवन का आनंद नहीं लेने देगी. 
  5.  एकादश भाव में हो : तो व्यक्ति के अनेक सम्बन्ध हो सकते हैं अता दो शादियाँ कर सकता है | 
  • शुक्र और यूरेनस का ख़राब द्रष्टि सम्बन्ध शादी के लिए तैयार लड़कियों से सुख के पूर्ती करवाता है .
  • चन्द्र का शुक्र के साथ खराब सम्बन्ध दुसरे की पत्नियों से सुख दिलवाता है. 
  • शुक्र चन्द्र यूरेनस नेप्तून यदि १,२,५,७,११,में हों तो दुसरे के साथ आनंद प्राप्त करता है.शनि से गोपनीयता बनी रहती है , मंगल से इच्छा को कर्म में परिवर्तित करने की ऊर्जा आती है ,गुरु का अच्छा प्रभाव हो तो सब कुछ ठीक चलता रहता है किन्तु विपरीत प्रभाव हुआ तो शिशु का जन्म हो सकता है और सामने वाली जातक कानून का सहारा ले सकती है और व्यक्ति को बहुत नुक्सान दे सकती है | 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 
  • यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है । 
  • यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं । 
  • लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है । 
  • मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।
  • यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है । 
  • सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 
  • यदि शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है । 
  • यदि शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं । 
  • मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है ।
  • जब मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है । 
  • यदि मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है । 
  • जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो । 
  • किसी जातक की कुंडली में शुक्र चन्द्र का योग ज्यादाअशुभ फल नही देता| यदि किसी पाप ग्रह या शत्रु ग्रह की दृष्टी इन दोनों पर हो तो फिर जातक की माँ और पत्नी के सम्बन्ध अच्छे नही रह पाते| 
  • कुंडली में शुक्र मंगल का योग होने पर शुभ फल मिलते है| जातक अपने भाई बहनों की सहायता करने वाला होता है| यदि इन दोनों पर राहू या केतु की दृष्टी पडती हो तो जातक दिन रात मुशीबत पर मुशीबत झेलता है | जातक की पत्नी को भी काफी समस्या का सामना करना पड़ता है| 
  • सूर्य शुक्र का योग जातक के विवाहिक जीवन में किसी प्रकार की कमी कर देता है हालांकि जातक में आत्मविश्वास बढ़ जाता है| 

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सप्तम भाव और तुला राशि :--- 
  1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है । 
  2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है । 
  3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।
  4.  तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है । 
  5.  दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है 

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  1. ****सुख साधनों का कारक भी है शुक्र:- शुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह] कामेच्छा] वीर्य] प्रेम वासना] रूप सौंदर्य] आकर्षण] धन संपत्ति] व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत] ग्रहस्थ जीवन का सुख] आभूषण] नृत्य] श्वेत और रेशमी वस्त्र] सुगंधित और सौंदर्य सामग्री] चांदी] हीरा] शेयर] रति एवं संभोग सुख] इंद्रिय सुख] सिनेमा] मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य] शैया सुख] काम कला] कामसुख] कामशक्ति] विवाह एवं प्रेमिका सुख] होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।
  2.  ****शुक्र की अशुभताः- यदि आपके जन्मांक में शुक्र जी अशुभ हैं तो आर्थिक कष्ट] स्त्री सुख में कमी] प्रमेह] कुष्ठ] मधुमेह] मूत्राशय संबंधी रोग] गर्भाशय संबंधी रोग और गुप्त रोगों की संभावना बढ जाती है और सांसारिक सुखों में कमी आती प्रतीत होती है। शुक्र के साथ यदि कोई पाप स्वभाव का ग्रह हो तो व्यक्ति काम वासना के बारे में सोचता है। पाप प्रभाव वाले कई ग्रहों की युति होने पर यह कामवासना भडकाने के साथ साथ बलात्कार जैसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है। शुक्र के साथ मंगल और राहु का संबंध होने की दशा में यह घेरेलू हिंसा का वातावरण भी बनाता है। 

 **** जानिए अशुभ शुक्र के लिए क्या करें:- 
अशुभ शुक्र की शांति के लिए शुक्र से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए] जैसे चांदी चावल दूध श्वेत वस्त्र आदि। 
  1.  दुर्गाशप्तशती का पाठ करना चाहिए।
  2. कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करना चाहिए। 
  3. हीरा धारण करना चाहिए। यदि हीरा संभव न हो तो अर्किन, सफेद मार्का, सिम्भा, ओपल, कंसला, स्फटिक आदि शुभवार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण करना चाहिए। 
  4. शुक्र का बीज मंत्र भी लाभकारी होगा। 

  1. 1- ऊँ शं शुक्राय नमः। 
  2. 2- ऊँ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। 
इन मंत्रों का जाप भी अरिष्ट कर शुक्र शांति में विशेष लाभ प्रद माना गया है।
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एक सुशील और समर्पित स्त्री के ---
यदि किसी कुंडली में सप्तम भाव का उपनक्ष्त्र स्वामी शुक्र , शनि अथवा मंगल न हो और वह शनि शुक्र मंगल के नक्षत्र में न विराजमान हो तो वह स्त्री पूर्ण चरित्रवान होगी.यदि उसका लग्न लाभेश के नक्षत्र मैं हो और उसपर गुरु की द्रष्टि हो तो वह निश्चित ही पूर्ण रूप से संयमित होगी | =====================================================
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