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होली 2020 पर बन रहा विशेष त्रिपुष्कर एवम गजकेसरी योग

 इस बार होली 9  मार्च 2020 सोमवार के दिन है उस दिन  चंद्रमा का  प्रभुत्व विशेष रहता है  सोमवार  को शिव का भी  विशेष दिन माना गया है कुछ खास योग उस दिन को और विशेष बनाते हैं ।इस बार होली 2020 पर बन रहा विशेष त्रिपुष्कर एवं गजकेसरी योग-  जोकि बहुत शुभ योग होने से  इस बार होली नवरंग होली रंगों की बहार लेकर आई है.
त्रिपुष्कर एवं गजकेसरी योग बन रहे हैं होली पर..
  • होलिका भद्रा रहित होने और दो शुभ योग (त्रिपुष्कर,गजकेसरी) बनने से इसका प्रभाव भारत के राजनैतिक, आर्थिक स्थिति पर भी  पड़ने की संभावना है. पंडित दयानन्द शास्त्री जी बताते है की फाल्गुन मास की पूर्णिमा यानी कि होली के दिन किए गए उपाय बहुत ही जल्दी शुभ फल प्रदान करते हैं। 
  • इस वर्ष 2020 में  होलिका दहन अत्यंत शुभ योग में है। अक्सर होलिका वाले दिन दहन के समय भद्रा होने से मुहूर्त में बड़ी परेशानी रहती थी। परंतु इस बार ऐसा नहीं है बल्कि इस बार भद्रा रहित, ध्वज एवं गज केसरी योग बन रहा है। त्रिपुष्कर योग 10 मार्च 2020 को बना रहेगा।
  • इस योग में भवन, वाहन, सोना-चांदी के आभूषण या कोई कीमती वस्तु का सुख प्राप्त हो सकता है।
Holi-2020-special-Tripushkar-and-Gajkesari-Yoga- होली 2020 पर बन रहा विशेष त्रिपुष्कर एवम गजकेसरी योग9 मार्च 2020 को सोमवार व पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र होने से इस दौरान ध्वज योग रहेगा, जो यश-कीर्ति व विजय प्रदान करने वाला होता है। वहीं सोमवार को पूर्णिमा तिथि होने से चंद्रमा का प्रभाव ज्यादा रहेगा। क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार सोमवार को चंद्रमा का दिन माना जाता है। इसके साथ ही स्वराशि स्थित बृहस्पति की दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी। जिससे गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा। तिथि-नक्षत्र और ग्रहों की विशेष स्थिति में होलिका दहन पर रोग, शोक और दोष का नाश तो होगा ही, शत्रुओं पर भी विजय मिलेगी। इस दिन की गई शिव पूजा अत्यंत  शुभ फल प्रदान करने वाली होगी. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की इस योग में किया गया कार्य तीन बार होता है और वस्तु का लाभ भी तिगुना मिलता है। इसके अलावा इस बार होली पर गज केसरी योग भी बन रहा है। गज यानि हाथी, केसरी यानि शेर, हाथी और शेर का संबंध यानि राजसी सुख। गज को गणेश जी का रूप माना जाता है। इस योग का फलभाव, राशि, नक्षत्र और गुरु की पोजीशन के आधार पर मिलता है। जब गुरु व चंद्र बलवती होकर गजकेसरी योग  बनाते हैं। इस बार होली पर त्रिपुष्कर और गजकेसरी योग मिलकर जातक की बहुत सी मनोकामना को पूरा करेंगे। 
        इस वर्ष की होलीका दहन के फलस्वरूप भारत के व्यापार जगत में लाभ होगा और गजकेसरी योग व्यापार जगत में मंदी को दूर करेगा। इसके अलावा भारत की प्रभाव राशि मकर है। भारत सरकार के लिए आगे अच्छी योजना बनेगी, शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आएगा। रोजगार की नई योजना बनेगी। इसके साथ ही भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगेगी, महंगाई पर भी नियंत्रण लगेगा।सभी राज्यों के शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन विभागों में तरक्की होगी। इस वर्ष होलिका दहन संपूर्ण भारत के लिए शुभ है। विश्वस्तर में भारत तरक्की करेगा और जीडीपी में भी वृद्धि के आसार हैं। भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगेगी, महंगाई पर भी नियंत्रण लगेगा। परंतु पेट्रोल और डीजल की मूल्य वृ्द्धि होगी, खाद्य पदार्थों के दामों में तेजी आएगी। साथ ही सीमा क्षेत्र पर आतंकी घटनाएं घटेंगी, लेकिन सरकार द्वारा किए गए प्रयास से इन घटनाओं पर लगाम लगेगी। इस वर्ष होलिका दहन संपूर्ण भारत के लिए शुभ है।  विश्व स्तर में भारत तरक्की करेगा। साथ ही सभी राज्यों के शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन विभागों में तरक्की होगी।  

जाने ओर समझें होलाष्टक में क्या करें, क्या ना करें

इस वर्ष 2 मार्च, 2020 से आरम्भ हुआ होलाष्टक 9 मार्च 2020 को समाप्त होगा। 8 दिनों तक चलने वाले होलाष्टक को अशुभ माना गया है। होली से पहले आठ दिनों तक चलने वाला होलाष्टक इस वर्ष 2 मार्च 2020 से शुरू हो चुका है। हिंदू धर्म में होलाष्टक के दिनों को अशुभ माना गया है। होलाष्टक की शुरुआत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होती है।होलाष्टक में दो शब्दों का योग है। होली और अष्टक यहां पर होलाष्टक का अर्थ है होली से पहले के आठ दिन। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन चैत्रकृष्ण प्रतिपदा में रंग खेला जाता है। होलाष्टक के दिन से ही होलिका दहन के लिए लकड़ियां रखी जाती है। जिस जगह होलिका दहन होगा उस जगह होली की लकड़ियां रखना शुरू होता है। भारत में कई जगह रंग को धुल्हैंडी भी कहा जाता है। इसका समापन फाल्गुन की पूर्णिमा को होता है और इसी दिन होलिका दहन की परंपरा है। इस साल 2 मार्च, 2020 से लगने वाला होलाष्टक 9 मार्च को खत्म होगा। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या फाल्गुनी नाम से मनाया जाता है । इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा जाता  है।  
    फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव की शीतलता एवं स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिका दहन किया जाता है।  देश के कई हिस्सों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े काटकर बांध देते हैं और उसे जमीन में गाड़ते हैं। इसे भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है। इसी के नीचे होलिकोत्सव मनाया जाता है।  सत्ययुग में हिरण्यकशिपु, जो पहले विष्णु जी का जय नाम का पार्षद था और शाप के कारण दैत्य के रूप में जन्म लिया था, ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया। वरदान के अहंकार में उसने देवताओं सहित सबको हरा दिया। उधर विष्णु जी ने अपने भक्त के उद्धार के लिए अपना अंश उसकी पत्नी कयाधू के गर्भ में पहले ही स्थापित कर दिया। प्रह्लाद जन्म से ही नारद जी की कृपा से ब्रह्मज्ञानी हो गए थे।एक पौराणिक कथा के अनुसार प्रह्लाद की भक्ति से नाराज होकर हिरण्यकश्यप ने होली से पहले के आठ दिनों में उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट और यातनाएं दीं। इसलिए इसे अशुभ माना गया है।
Know-and-understand-what-to-do-in-Holashtak-Holi-2020- जाने ओर समझें होलाष्टक में क्या करें, क्या ना करें , होली- 2020     प्रह्लाद का विष्णु भक्त होना उनके पिता हिरण्यकशिपु को अच्छा नहीं लगता था। अन्य बच्चों पर विष्णु भक्ति का प्रभाव पड़ता देख, प्रह्लाद को भक्ति से रोकने के लिए हिरण्यकशिपु ने फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी को उन्हें बंदी बना लिया। जान से मारने के लिए तरह-तरह की यातनाएं दीं, लेकिन प्रह्लाद भयभीत नहीं हुए। विष्णु कृपा से हर बार बच गए। इसी प्रकार सात दिन बीत गए। अपने भाई हिरण्यकशिपु की परेशानी देख आठवें दिन उसकी बहन होलिका, जिसे ब्रह्मा जी ने अग्नि से न जलने का वरदान दिया था, अपने भतीजे प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर अग्नि में प्रवेश कर गई। देवकृपा से वह स्वयं ही जल मरी, प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया। तभी से भक्ति पर आए इस संकट के कारण, इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। एक अन्य कथा अनुसार, इन्हीं होलाष्टक के दिनों में भगवान शिव ने कामदेव को भी भस्म किया था।
होली की परंपराएँ---
होली की परंपराएँ बहुत ही प्राचीन हैं परन्तु समय के अनुसार होली खेलने के तरीका में भी परिवर्तन हुआ है। प्राचीन काल में महिलाये इस दिन पूर्ण चंद्र की पूजा करके अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करती थी। इस दिन अधपके फसल को तोड़कर होलिका दहन के दिन होलिका में प्रसाद रूप में चढाकर पुनः प्रसाद खाने का का भी विधान है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से नववर्ष  का  भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हरण की यह पर्व अधिकांशतः यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, नारद पुराण, भविष्य पुराण, पूर्व मीमांसा-सूत्र, कथा गार्ह्य-सूत्र आदि  ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ के एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिला है।
    मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन जग जाहिर है। इसके आलावा प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव के चित्र मिलते हैं। चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ होली खेलते हुए दिखाया गया है। 17वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ रंग खेलते हुए दिखाया गया है।
समझें क्यों नही करने चाहिए होलाष्टक में शुभ कार्य---
होलाष्टक में शुभ कार्य न करने की ज्योतिषीय वजह यह है कि इन दिनों वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। होलाष्टक अष्टमी तिथि से आरंभ होता है। अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की इन 8 दिनों में ग्रह अपने स्थान में बदलाव करते हैं। इसी वजह से ग्रहों के चलते इस अशुभ समय के दौरान किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य करने से व्यक्ति के जीवन में कष्ट, दर्द का प्रवेश होता है। अगर इस समय में कोई विवाह कर ले तो भविष्य में कलह का शिकार या संबंधों में टूट पड़ सकती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहू की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है।  इसी कारण यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में जातकों के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर होती है जिससे वे कई बार गलत निर्णय भी कर लेते हैं जिससे हानि होती है।
जानिए क्या कहते हैं वेद पुराण होलाष्टक के सम्बंध में --
होलाष्टक दोष का उल्लेख ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत मुहूर्त शाखा के ग्रन्थों में मिलता है। होलाष्टक दोष का विषय अति सरल व संक्षिप्त है। इस सम्बन्ध में मात्र दो ही श्लोक हैं। एक श्लोक में यह बताया गया है कि होलाष्टक दोष कब से प्रारम्भ होता है? तथा दूसरे श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि यह दोष किन-किन स्थानों में लागू होता है?

इस सम्बन्ध में शास्त्र प्रमाण देखें - 
मुहूर्त चिन्तामणि पीयूषधारा संस्कृत टीका शुभाशुभप्रकरण श्लोक सं. 40 की टीका पृष्ठ 34 में लिखा है कि

‘‘शुक्लाष्टमीसमारभ्य फाल्गुनस्य दिनाष्टकम्।    
 पूर्णिमावधिकं व्याज्यं होलाष्टकमिदं शुभे।।’’  (शीघ्रबोध श्लोक सं. 137)
‘‘शुतुद्रयां च विपाशायामैरावत्यां त्रिपुष्करे।
 होलाष्टकं विवाहावौत्याज्यमन्यत्र शोभनम्’’       (शीघ्रबोध श्लोक सं. 138)

उपरोक्त प्रमाण श्लोकों की विस्तृत व्याख्या मुहूत्र्त चिन्तामणि के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्री कपिलेश्वर झा जी ने अपनी हिन्दी टीका में इस प्रकार लिखा है। सतलज (शुतुद्री), विपाशा (व्यास), इरावती (रावी) नदियों के तटवर्ती क्षेत्र और त्रिपुष्कर (पुष्कर) क्षेत्र में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा से आठ दिन पहले होलाष्टक के कारण विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। इनसे भिन्न स्थानों में ही विवाहादि कार्य करना चाहिए। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि व्यास, सतलज, इरावती, नदियाँ पंजाब प्रान्त में हैं। व्यास नदी के किनारे होशियारपुर, गुरूदासपुर, मण्डी, काँगड़ा, सुलतान, कपूरथला तथा इरावती (रावी) नदी के किनारे मुलतान, मांतगोमट्टी -लाहौर, अमृतसर, पठानकोट जबकि सतलज नदी के किनारे जालन्धर, लुधियाना, पटियाला, भावलपुर शहर हैं। त्रिपुष्कर क्षेत्र जिसे वर्तमान में पुष्कर कहा जाता है, वह राजस्थान के अजमेर में है। इन्हीं शहरों के समीपवर्ती भू-भाग में होलाष्टक दोष लगता है एवं विवाहादि कार्य वर्जित हैं। इनके अतिरिक्त देश के शेष भूभाग में विवाह प्रतिष्ठादि शुभ मांगलिक कार्य सम्पन्न होंगे। मुहूर्त चिन्तामणि व मुहूर्त गणपति प्रामाणिक ग्रन्थों में देशवश ही होलाष्टक दोष के त्याग करने का शास्त्रादेश है। 
प्रमाण देखिए -
‘‘विपाशैरावतीतीरे शुतुद्रयाश्च त्रिपुष्करे।
 विवाहादिशुभे नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम्।।’’  (मुहूत्र्तचिन्तामणि श्लोक सं. 40)
‘‘ऐरावत्यां विपाशायां शतद्रौ पुष्करत्रये।
 होलिका प्राग्दिनान्यष्टौ विवाहादौ शुभे त्यजेत्।।’’  (मुहूत्र्तगणपति श्लोक सं. 204)

विपाशा (व्यास), इरावती (रावी), शुतुद्री (सतलज) नदियों के निकटवर्ती दोनों ओर स्थित नगर, ग्राम, क्षेत्र में तथा त्रिपुष्कर (पुष्कर) क्षेत्र में होलाष्टक दोष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (होलिका दहन) तिथि के पहले के आठ दिन में विवाह, यज्ञोपवीत आदि शुभ कार्य वर्जित हैं। इस प्रकार लगभग सम्पूर्ण पंजाब प्रान्त में हिमांचल प्रदेश का कुछ भू-भाग तथा राजस्थान में अजमेर (पुष्कर) के समीपवर्ती आसपास के स्थानों (सम्पूर्ण राजस्थान नहीं) में ही विशेष सावधानी के लिए होलाष्टक दोष को मानना शास्त्र सम्मत है। देश के अन्य शेष भू-भागों में होलाष्टक दोष विचार का नियम लागू नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्र सम्मत निर्णय है। उपरोक्त होलाष्टक दोष के सम्बन्ध में अनेक परम्परागत ज्योतिषी व कर्मकाण्डी पुरोहित जिन्हें इस विषय की सुस्पष्ट जानकारी नहीं है, वे देश के विशाल भू-भाग जिन प्रदेशों में इसका दोष लागू नहीं होता है, वहाँ पर भी होलाष्टक दोष का भय दिखाकर अबोध जनता के शुभकार्यों में अनावश्यक रूप से बाधा उत्पन्न कर देते हैं। शास्त्र वचनों के एक भाग को मानना व दूसरे भाग को न मानना विद्वान मनुष्यों का लक्षण कदापि नहीं हो सकता है। इस सम्बन्ध में काशी (वाराणसी) के समस्त पंचागकार बहुत ही स्पष्ट रूप से होलाष्टक के सम्बन्ध में उपर्युक्त प्रमाण श्लोक प्राचीन काल से लिखते चले आ रहे हैं। किन्तु इसके बावजूद कुछ पंडित लोग आज भी वर्तमान समय में होलाष्टक दोष के वास्तविक स्वरूप से अज्ञात होने के कारण स्पष्ट जानकारी के अभाव में समाज को भ्रमित करने का महाशास्त्रीय अपराध करते चले आ रहे हैं।इसी भ्रान्ति के निवारण हेतु काशी के सुप्रसिद्ध पंचांगकार श्रीगणेश आपा जी ने संवत् 2070 (सन् 2013-14) के पंचांग में एवं संवत् 2074 (सन् 2017-18) ई. के अपने पंचांग में फाल्गुन शुक्ल पक्ष में स्पष्ट निर्णय देकर भ्रान्ति निवारण हेतु जन उपयोगी अति महत्त्वपूर्ण सराहनीय कार्य किया है। 
       श्री गणेश आपा जी पंचांग में स्पष्ट निर्णय दिया गया है कि होलाष्टक दोष किन स्थानों पर होता है? पंजाब प्रान्त पुष्कर (अजमेर)  विपाशा (व्यास) इरावती (रावी) शतदु्रम (सतलज) नदियों के तट पर स्थित (धवलपुर, लुधियाना, फिरोजपुर, गुरूदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, कपूरथला........) आदि में होलाष्टक दोष होता है। होलाष्टक दोष केवल विवाह के लिये है, अन्य शुभ कार्यों के लिए नहीं है। अन्य प्रान्तों में होलाष्टक का कोई दोष नहीं होता है। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर ही काशी (वाराणसी) के सभी पंचांगों में होलाष्टक के काल समय में भी विवाह मुहूत्र्त दिये जाते हैं । होलाष्टक दोष के सम्बन्ध में एक बात और भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि जिन स्थानों में होलाष्टक दोष लागू होता है, उन क्षेत्रों में भी विवाह संस्कार के अतिरिक्त छोटे-बडे़ सभी शुभ मांगलिक कार्य जैसे - गृहारम्भ, गृहप्रवेश, मन्दिर देव प्रतिष्ठा-स्थापना, यज्ञादि कार्य, द्विरागमन, वधु प्रवेश, व्यापार आरम्भ, क्रय-विक्रय, कथा पुराण (भागवतादिश्रवण), ग्रह शांति, मंत्र-जप-अनुष्ठान, नवीन कार्य प्रारम्भ, समस्त संस्कार (विवाह पाणिग्रहण संस्कार को छोड़कर) आदि समस्त शुभ कार्य निर्बाध रूप से सम्पन्न होंगे। देश के अन्य क्षेत्रों में जहाँ पर होलाष्टक दोष शास्त्रोक्त प्रमाण से लागू नहीं होता है, उन प्रदेशों में विवाह सम्बन्धी शुभकार्य के साथ ही समस्त शुभकार्य बिना किसी रोक-टोक के निश्चित रूप से सम्पन्न करने चाहिए।
होलाष्टक के दौरान करें ये विशेष पूजा---
  • 1. होलाष्टक के दिनों को भक्तों को लड्डू गोपाल की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। पूजा के दौरान गाय के शुद्ध घी और मिश्री से हवन करना चाहिए। इस विधि से संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।
  • 2. होलाष्टक में जौ, तिल और शक्कर से हवन करने से आपको अपने करियर में तरक्की मिलेगी।
  • 3. होलाष्टक के दिनों में कनेर के फूल, गांठ वाली हल्दी, पीली सरसों और गुड़ से हवन करने से धन-संपत्ति में वृद्धि के योग बनते हैं।
  • 4. इसी के साथ ही अगर आप होलाष्टक के दिनों में भगवान शिव का महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं तो आपके स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। इससे शरीर के सभी रोग दूर होते हैं।

होलाष्टक में नकारात्मकता का प्रभाव---
हिंदू धर्म ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं के आधार पर बताया जाता है कि होलाष्टक के समय में भक्त प्रह्लाद को अनेक प्रकार की यातनाएं दी गई थीं, इसलिए इस 8 दिनों के समय को नकारात्मकता वाला माना जाता है। इसी के चलते इन दिनों में किसी तरह के मांगलिक कार्य से दूर रहा जाता है।
होलाष्टक में करें भगवान की वंदना---
होलाष्टक के आठ दिनों के बीच आपको भगवान का भजन, जप, तप आदि करना चाहिए। कहा जाता है इन दिनों में भक्त प्रह्लाद पर कष्टों की बौछार की गई। जिसके चलते उनके काफी कष्ट हुआ। वहीं इन दिनों भगवान विष्णु या फिर अपने इष्टदेव की आराधना करनी चाहिए। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद के सभी संकटों का निवारण किया था, ठीक वैसे ही भगवान आपके कष्टों को भी दूर करेंगे।
होलाष्टक में भूलकर भी नहीं करने चाहिए ये काम ---
  1. शादी: ये किसी के भी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण लम्हों में से एक होता है। यह वो मौका होता है जब आप किसी के साथ पूरा जीवन व्यतीत करने के वादे करते हैं। यहां से जिंदगी का एक अलग पन्ना भी शुरू होता है। इसलिए शादी को बहुत ही शुभ माना गया है। यही कारण है कि हिंदू धर्म मे होलाष्टक में विवाह की मनाही है।  अत: इन दिनों में विवाह का कार्यक्रम नहीं किया जाना चाहिए। 
  2. नामकरण संस्कार: किसी नवजात बच्चे के नामकरण संस्कार को भी होलाष्टक में नहीं किया जाना चाहिए। हमारा नाम ही पूरे जीवन के लिए हमारी पहचान बनता है। नाम का असर भी हमारे जीवन पर अत्यधिक पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसे शुभ काल में किया जाए।
  3. विद्या आरंभ: बच्चों की शिक्षा की शुरुआत भी इस काल में नहीं की जानी चाहिए। शिक्षा किसी के भी जीवन के सबसे शुभ कार्यों में से एक है। इसलिए जरूरी है कि जब अपने बच्चे को किसी गुरु के देखरेख में दिया जाए तो वह शुभ काल हो। इससे बच्चे की शिक्षा को लेकर अच्छा असर होता है और तेजस्वी बनता है। 
  4. संपत्ति की खरीद-बिक्री: ये कार्य भी होलाष्टक काल में नहीं किया जाना चाहिए। इससे अशांति का माहौल बनता है। संभव है कि आपने जो संपत्ति खरीदी या बेची है, वह बाद में आपके लिए परेशानी का सबब बन जाए। इसलिए कुछ दिन रूककर और होलाष्टक खत्म होने के बाद ही इन कार्यों को हाथ लगाएं। 
  5. नया व्यापार और नई नौकरी: आप नया व्यापार शुरू करना चाहते हैं या फिर कोई नई नौकरी ज्वाइन करना चाहते हैं तो बेहतर है इन दिनों में इसे टाल दें। आज की दुनिया में व्यवसाय या नौकरी किसी के भी अच्छे जीवन का आधार है। इसलिए होलाष्टक के बाद इन कार्यों को करें। इससे सकारात्मक ऊर्जा आपके साथ रहेगी और आप सफलता हासिल कर सकेंगे।

जानिए वर्ष 2020 में कब मनेगी होली एवम कब होगा होलिका दहन

होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।
       भारत में मनाए जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है। हिंदुओं के लिए होली का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। लेकिन होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। वैष्णव परंपरा मे होली को, होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।
इस वर्ष 2020 की  होली पर बना है 3 ग्रहों का बहुत शुभ संयोग, श्रेष्ठ मुहूर्त में ही करें होली का पूजन, मिलेंगे शुभ वरदान---
रंगों का पर्व होली इस वर्ष (सोमवार) 10 मार्च 2020 को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पूर्व 09 मार्च को होलिका दहन होगा। होलिका दहन पर इस बार दुर्लभ संयोग बन रहे हैं।  फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए -
  • 1. पहला, उस दिन 'भद्रा' न हो। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।
  • 2. दूसरी बात, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।
यह रहेगा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त --
होलिका दहन मुहूर्त- शाम 6 बजकर 40 मिनट से 6:52 गोधूलि वेला अथवा 6:28 बजकर 40 मिनट से 08 बजे तक चर का चौघड़िए में ।
भद्रा दोपहर 1 बजकर 11 मिनीट तक
पूर्णिमा तिथि आरंभ- सुबह 3 बजकर 3 मिनट से (9 मार्च 2020)
पूर्णिमा तिथि समाप्त- रात 11 बजकर 16 मिनट तक (9 मार्च 2020)

होलिका दहन 2020 शुभ मुहूर्त 9 मार्च 2020 को यह रहेगा
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त- प्रदोष समय
होलिका दहन मुहूर्त : 18:40 से 21:07: तक

10 मार्च 2020 (रंगावली होली)--
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 8/9मार्च 2020 सुबह 3:03 बजे
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 9 मार्च 2020 रात 11:14 बजे

होलिका दहन की पूजा में रक्षो रक्षोघ्न सूक्त का पाठ होता है। तीन बार परिक्रमा की जाती है। लोग गेहूं,चना व पुआ-पकवान अर्पित करते हैं। सुबह उसमें आलू, हरा चना पकाते और खाते हैं। नहा धोकर शाम में मंदिर के पास जुटते हैं। नए कपड़े पहनकर भगवान को रंग-अबीर चढ़ाते हैं। भस्म सौभाग्य व ऐश्वर्य देने वाली होती है। होलिका दहन में जौ व गेहूं के पौधे डालते हैं। फिर शरीर में ऊबटन लगाकर उसके अंश भी डालते हैं। ऐसा करने से जीवन में आरोग्यता और सुख समृद्धि आती है। 
इस तरह करें होलिका पूजन --
होलिका दहन से पहले होलिका पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए। होलिका पूजन आप घर पर या फिर सार्वजानिक स्थल  पर जाकर भी कर सकते है। आजकल सभी लोग अपने घर पर पूजा ना करके सार्वजानिक स्थल पर ही जाते है। सभी लोग मंदिर या चौराहे पर कंडो, गुलरी और लकड़ी से होलिका सजाते है।
होलिका पूजन के लिए एक थाली में साबुत हल्दी,माला, रोली,फूल, चावल, मुंग, बताशे, कच्चा सूत, नारियल व एक लोटा जल लेकर बैठना चाहिए। इसके अतिरिक्त नई फसल की बालियां जैसे चने की बालियां या फिर गेहू की बालियां भी होनी चाहिए।
Know-when-Holi-and-Holika-Dahan-will-be-celebrated-in-the-year-2020-जानिए वर्ष 2020 में कब मनेगी होली एवम कब होगा होलिका दहन        होलिका पूजन शाम के समय किया जाता है। पूर्व या उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठे , सबसे पहले भगवान गणेश का समरण करे। इसके बाद भगवान नरसिंह को याद करते हुए गोबर से बनी हुई होलिका पर हल्दी, रोली, चावल, मुंग, बताशे अर्पित करने चाहिए। फिर होलिका पर जल चढ़ाये। उसके बाद होलिका के चारो और परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटे, यह परिक्रमा सात बार करनी चाहिए। होलिका पर प्रह्लाद का नाम लेकर फूल अर्पित करे और फिर भगवान को याद करते हुए नए अनाज की बालियां अर्पण करे। अंत में अपना और अपने परिवार का नाम लेकर प्रसाद चढ़ाये। और होलिका दहन के समय होलिका की परिक्रमा करे। फिर होलिका पर गुलाल डालने के बाद अपने बड़ो के पैरो में गुलाल डाल कर उनका आशीर्वाद ले।
           होलिका पूजन से हर प्रकार से बुराई पर जीत प्राप्त होत्ती है। होलिका पूजन परिवार में सुख, समृद्धि और शान्ति लाता है। कई जगह पर लोग होलिका पूजन के दिन व्रत भी करते है व्रत होलिका दहन के बाद ही खोला जाता है।होलिका पूजन पर भद्रा के समय का विशेष ध्यान रखे। भद्रा के समय होलिका पूजन नहीं किया जाता। उत्तर भारत के मध्यप्रदेश एवम राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। 
         होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं। अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियां जलाते हैं। होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है।  होलिका दहन तो रात्रि में होता है, परन्तु महिलाओं द्वारा इस सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है। महिलाएं एक पात्र में जल और थाली में रोली, चावल, कलावा, गुलाल और नारियल आदि लेकर होलिका माई की पूजा करती हैं। इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है और जल चढ़ाया जाता है। होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है।
इस तरह करें होलिका पूजन --
होली पूजन करने का तरीका अलग अलग क्षेत्रो अलग अलग पारम्परिक तरीको से होती है तो इस बात का भी विशेष ध्यान रखे। आप तरीका वही अपनाये जो आपके क्षेत्र में माना जाता है।
होली पर ध्यान रखने योग्य बात---
शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतया वर्जित है। यदि भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन कर दिया तो पीड़ा उठानी पड़ सकती है। इस दिन पुरुषों को भी हनुमानजी और भगवान भैरवदेव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।

जानिए होलिका दहन का महत्व---
होली दहन पर लोग होलिका को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करते हैं. हिंदू शास्त्रों के अनुमान मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने होलिका को आग में जलाकर अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी, इसलिए खुशी में होली का त्योहार मनाया जाता है. इस मान्यता के अनुसार छोटी होली के दिन लोग कुछ लकड़ियां इकठ्ठा करके उन्हें अच्छे से लगाकर होलिका मानते हुए जलाया जाता है।

होलिका दहन की पौराणिक कथा--
 पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है।

समझें होलाष्टक का महत्व--
इस बात का विशेष ध्यान रखें कि होलाष्टक के 8 दिन किसी भी मांगलिक शुभ कार्य को करना शुभ नहीं होता है। इसलिए भूलकर भी कोई शुभ काम न करें। इस दौरान शादी, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, हिंदू धर्म के 16 संस्कार, कोई भी नया व्यवसाय या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। होलिका दहन के बाद ही कोई भी शुभ कार्य का आरंम्भ करें।
    होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जात सकता है. "होलाष्टक" के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है. सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है. धुलेण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। होली की शुरुआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलैण्डी तक रहती है. इसके कारण प्रकृति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है. वर्ष 2020 में 3 मार्च 2020 से 9 मार्च, 2020 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी. होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है।
    होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं जिसके कारण शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिल पाता है. होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी. साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था . जिनमें एक को होलिका और दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है.होलाष्टक एक दिन का पर्व ना होकर जबकि आठ दिन का पर्व है।
होलाष्टक में उग्र रहते हैं सभी ग्रह--

जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए।होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं. इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं. जिसके कारण हानि की आशंका बढ़ जाती है।
     मानव मस्तिष्क पूर्णिमा से 8 दिन पहले कहीं न कहीं क्षीण, दुखद, अवसाद पूर्ण, आशंकित और निर्बल हो जाता है. ये अष्ट ग्रह, दैनिक कार्यकलापों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

होलिका दहन में होलाष्टक की विशेषता --
होलिका पूजन करने के लिये होली से आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी खास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है. जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है. जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है. होली का डंडा स्थापित होने के बाद संबन्धित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है।
होलाष्टक के दिन से शुरु होने वाले कार्य --
सबसे पहले इस दिन, होलाष्टक शुरु होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है. इस दिन इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध कर, इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है. इस दिन जगह-जगह जाकर सूखी लकडियां विशेष कर ऎसी लकडियां जो सूखने के कारण स्वयं ही पेडों से टूट्कर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर चौराहे पर एकत्र कर लिया जाता है।
होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है. इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है. व इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है. अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है. बच्चे और बडे इस दिन से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है.

होलाष्टक में कार्य निषेध --
होलाष्टक मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है. होलाष्टक के दिन से एक ओर जहां उपरोक्त कार्यो का प्रारम्भ होता है. वहीं कुछ कार्य ऎसे भी है जिन्हें इस दिन से नहीं किया जाता है. यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है. अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठिक आठ दिन पूर्व शुरु हो जाते है.
     होलाष्टक के मध्य दिनों में 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता है. यहां तक की अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शान्ति कार्य किये जाते है. इन दिनों में 16 संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है।

कामदेव को किया था भस्म -
होली की एक कहानी कामदेव की भी है। पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया। तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए। कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई। अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

होलिका दहन का इतिहास--
विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी ख़ुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।

होली के पर्व पर करें राशि अनुसार विशेष उपाय​ ---

मेष राशि ---
  • 1. इस राशि के जातक-जातिकाओं को किसी भी प्रकार की कारोबारी, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानी हो या इसका हमेशा भय बना रहता है, मेहनत का उचित फल नहीं मिलता हो। तो होलिका दहन के समय एक तांबे की कटोरी में चमेली का तेल, पांच लौंग और आंवले के पेड़ के पांच पत्ते, थोड़ा सा गुड़। यह सभी समान कटोरी में रख दें। मंगल गायत्री का 108 बार जाप करते हुए समस्त सामग्री को होलिका दहन के समय होलिका में अर्पित कर देना चाहिए। प्रात: काल सुबह होली की थोड़ी सी राख लेकर आएं और उस राख को चमेली के तेल में मिला कर अपने शरीर पर मालिश करें। किसी भी तरह की समस्या होगी उसका निवारण होगा। एक घंटे बाद हल्के गरम पानी से स्नान कर लें।
  • 2. दूसरे दिन ब्रह्ममुर्हूत्त में जहाँ होली जली थी वहाँ की सात चुटकी राख, सात तांबे के छेद वाले सिक्के, लाल कपड़े में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर टांग दें या इस सामग्री को अपनी तिजोरी में रख दें। धन लाभ अवश्य होगा।

वृषभ राशि--
  • 1. इस राशि के जातक-जातिकाओं को यदि व्यापारिक समस्या हो, घर में सुख शांति न हो, लेन-देन के मसलों से परेशानी हो, स्वास्थ्य अनुकूल न रहता हो, कारोबार से लाभ न मिल रहा हो तो चाँदी की कटोरी ले लें और उसमें थोड़ा सा दूध, पांच चुटकी चावल डाल दें, गुलमोहर के पांच पत्ते डाल दें। थोड़ा पांच चुटकी शक्कर, इन सारे सामानों को होलिका दहन के समय शिव गायत्री का 108 बार जाप करके अग्नि को समर्पित कर दें। कैसी भी व्यापारिक समस्या होगी उसका निवारण हो जाएगा।
  • 2. होली के प्रात:काल सफेद कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख और एक सिक्का चाँदी का बांध लें। इस सामग्री को अपनी तिजोरी में रख दें। कारोबारी सारी समस्याओं का निवारण होगा।

मिथुन राशि--
  • 1. अनावश्यक कलह, व्यापार में घाटा, अपनों का विरोध, मानसिक अस्थिरता, इन सारी समस्याओं के निवारण के लिए होलिका दहन के समय कांसे की कटोरी में 50 ग्राम हरे धनिया का रस, 108 दाने साबूत मूंग के, पीपल के पांच पत्ते, कोई भी हरे रंग की मिठाई – इन सारी सामग्रियों को अपने हाथ में रख कर ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे का 108 बार जाप करके इस सामग्री को होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. हरे कपड़े में 3 चुटकी होलिका दहन की राख, 3 हरे हकीक के पत्थर बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर बांध लें या इस सामग्री को तिजोरी में रख दें। कारोबारी समस्या का निवारण अवश्य होगा।

कर्क राशि --

  • 1. मानसिक अस्थिरता रहे, काम में रुचि नहीं रहे, अपनों से धोखा मिला करे, काम बदलने की प्रवृत्ति बढ़े, तो ऐसी अवस्था में सभी समस्याओं के समाधान के लिए एक कटोरी ले लें और उसमें थोड़ा सा दही रख लें, फिर उसमें पांच चुटकी चावल भी डाल लें, अशोक के सात पत्ते और सफेद पेठा की मिठाई ले लें। इन सबको कटोरी में रख कर अपने हाथ में रख लें। महामृत्युंजय का 108 बार जाप करके अग्नि को समर्पित कर दें। इससे सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. प्रात:काल सफेद कपड़े में होलिका दहन की राख 7 चुटकी, 7 गोमती चक्र बांधकर दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान या घर के मुख्य द्वार पर लटका दें अथवा अपनी तिजोरी में रख दें। महालक्ष्मी की कृपा अवश्य होगी।

सिंह राशि---
  • 1. यदि कारोबार में सफलता नहीं मिल रही हो, स्वास्थ्य अनुकूल नहीं हो, कार्यों में अप्रत्याशित बाधा आ रही हो तो होलिका दहन के दिन कांसे की कटोरी में थोड़ा सा घी ले लें, पांच चुटकी गेहूं, पांच चुटकी देसी खाण्ड, अशोक वृक्ष के पांच पत्ते, कटोरी में रखकर अपने हाथ में ले लें और सूर्य गायत्री का 108 बार जाप करके समस्त सामग्री को होलिका को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
  • 2. सुनहरे कपड़े में 5 चुटकी होलिका दहन की राख, तांबे के पत्र पर खुदा हुआ सूर्य यंत्र, पांच तांबे के पुराने सिक्के बांधकर जहाँ धन रखते हैं, यदि वहाँ रख दिया जाए तो व्यावसायिक प्रतिकूलताओं का शमन होगा। एक बात का ध्यान अवश्य रखें, सूर्य यंत्र को खोल कर घी का दिया व धूप अवश्य दिखाएं।

कन्या राशि--
  • 1. किसी काम में स्थिरता नहीं बनती हो, दिए हुए पैसे वापस नहीं मिल रहे हों, अपनों की वजह से हमेशा परेशानी झेलनी पड़ रही हो या कारोबारी या कानूनी समस्या हो तो ताम्बे की कटोरी में आंवले का थोड़ा सा तेल ले लें और पांच पत्ते नीम, पांच इलायची, नारियल से बनी मिठाई, इन सारी सामग्री को कटोरी में डाल कर अपने हाथ में रख लें और 108 बार बुध के बीज मंत्र का जाप करते हुए सारी सामग्री को हालिका में दहन कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. हरे कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख, 11 बलास्त (बीता) हरा धागा, छेद वाले तांबे के सात सिक्के बांध कर दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि के मुख्य द्वार पर टांग दें या अपने तिजोरी में रखने से कारोबार में वृध्दि होगी और सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

तुला राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें चाँदी की कटोरी में पांच छोटी चम्मच गाय के दूध की खीर ले लें, पांच पत्ते शीशम के, गेंदा के पांच फूल, इन सारी सामग्रियों को अपने हाथ में रख कर शिव षडाक्षरी मंत्र यानी ॐ नम: शिवाय का 108 बार जाप करके होलिका दहन के समय यह समस्त सामग्री अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. क्रीम रंग के कपड़े में 7 चुटकी होलिका दहन की राख, 7 कोड़ियां पीली धारी वाली बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। अवश्य लाभ होगा।

वृश्चिक राशि--
  • 1. इस राशि के जातक-जातिका यदि कार्य सफलता के लिए जूझना पड़ रहा हो और तब भी कार्य सफलता न मिल रही हो, कारोबार में लाभ न मिल रहा हो तो इन्हें तांबे की कटोरी में चमेली का तेल डाल कर, पांच साबूत लाल मिर्च, एक बुंदी का लड्डू, पांच गूलर के पत्ते, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में रखकर ॐ हं पवननन्दनाय स्वाहा का 108 बार जाप करके सारी सामग्री अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. लाल कपड़े में 17 चुटकी होलिका दहन की राख, 1 लाल मूंगा बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। कारोबार सम्बंधित सारी समस्या का निवारण होगा।

धनु राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक पीतल की कटोरी में देसी गाय का थोड़ा सा घी, थोड़ा सा गुड़, पांच चुटकी चने की दाल, पांच आम के पत्ते डाल अपने हाथ में रख लें फिर बृहस्पति गायत्री मंत्र का 108 बार जाप करके इन समस्त सामग्रियों को होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. पीले कपड़े में 9 चुटकी होलिका दहन की राख एवं 11 पीली कोड़ियां बांधकर अपनी तिजोरी में रख लें। कारोबार सम्बंधी कष्टों से छुटकारा मिल जाएगा।

मकर राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो, अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल थोड़ा सा लें, उसमें पांच चुटकी काली तिल, पांच बरगद के पत्ते, एक काला गुलाब जामुन मिठाई, इन समस्त सामग्रियों को अपने हाथ में लेकर ॐ शं शनैश्चराय नम: इस मंत्र का 108 बार जाप करके इस समस्त सामग्री को हालिका दहन के समय अग्नि में समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. नीले कपड़े में 11 चुटकी राख, 11 छोटी लोहे की कील बांधकर घर या व्यापारिक संस्था के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

कुम्भ राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो, अथवा अनावश्यक कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें एक स्टील की कटोरी में तिल का तेल, 108 दानें साबूत उड़द के, खेजड़ी (झण्डी) के पांच पत्ते या कदंब के पांच पत्ते, पांच काली मिर्च, कोई भी काले रंग की एक मिठाई, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में रख कर मंगलकारी शनि मंत्र की 108 बार जाप करके होलिका दहन के समय अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. काले कपड़े में 11 चुटकी होलिका दहन की राख, 7 काजल की डिब्बी बांधकर कारोबारी प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

 मीन राशि--
  • 1. यदि व्यापारिक, शारीरिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा हो अथवा अप्रत्याशित कार्य बाधा आ रही हो तो इन्हें कांसे की कटोरी में बादाम का तेल थोड़ा सा उसमें 108 जोड़े चने की दाल के, कोई भी थोड़ी सी पीली मिठाई, आम के पांच पत्ते, एक गांठ हल्दी, इन समस्त सामग्री को अपने हाथ में लेकर ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं गुरवे नम: मंत्र का 108 बार जाप करके इन समस्त सामग्रियों को हालिका दहन के दिन अग्नि को समर्पित कर दें। सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।
  • 2. पीले कपड़े में 7 चुटकी होलिका दहन की राख, तांबे के 7 सिक्के और 11 कौड़ी बांधकर घर, दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर लटका दें। सारी व्यावसायिक पीड़ाओं से छुटकारा मिलेगा।
जानिए इस होली पर किस  राशि  वाले जातक किस रंग से होली खेले ---
  1. मेष - लाल
  2. वृषभ - नीला
  3. मिथुन - हरा
  4. कर्क - गुलाबी
  5. सिंह - आंरेन्ज
  6. कन्या - हरा
  7. तुला - नीला
  8. वृश्चिक - मैरून
  9. धनु - पीला
  10. मकर - नीला
  11. कुम्भ - परपल
  12. मीन - पीला

जानिए होली के दिन किस राशि वाले जातक को कौन सी खुशबू  प्रयोग करनी चाहिए --
  1. मेष - गुलाब
  2. वृषभ - चमेली
  3. मिथुन - चम्पा
  4. कर्क - लवैन्डर
  5. सिंह - कस्तूरी
  6. कन्या - नाग चम्पा
  7. तुला -बेला 
  8. वृश्चिक - रोज मैरी
  9. धनु -- केसर
  10. मकर -मुश्कम्बर
  11. कुम्भ - चन्दन
  12. मीन - लैमन ग्रास

जानिए होलिका दहन से पहले क्या करना चाहिए?
  1. होलिका दहन से पहले आपको और आपके सभी परिवार के सदस्यों को हल्दी का उबटन,सरसो तेल में मिलाकर पूरे बदन पर करना चाहिए।
  2. फिर सूखने के बाद उसे एक कागज में शरीर से छुड़ाकर जमा कर लें।
  3. फिर आप 5 या 11 गाय के उपले, एक मुट्ठी सरसो के दाने, नारियल का सूखा गोला लें।
  4. फिर नारियल के सूखे गोले में जौ,तिल,सरसो का दाना,शक्कर,चावल और घी भर लें।
  5. फिर उसे होलिका की जलती हुई अग्नि में प्रवाहित कर दें। साथ में उबटन के निकाले गए अंश को भी अग्नि में डाल दें ।
  6. होलिका दहन होने से पहले या फिर बाद में शाम के वक्त घर में उत्तर दिशा में शुद्ध घी का दीपक जलाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख शांति आती है।
  7. होलिका का परिक्रमा करने का भी बहुत महत्व है। ऐसा करने से हर तरह की परेशानियां, रोग और दोष खत्म हो जाते हैं। इसलिए आप परिक्रमा जरूर करें।
  8. सबसे पहली बात तो यह है कि रंग जरुर खेले ।
  9. इस दिन रंग खेलने से जीवन में खुशियों के रंग आते है और मनहूसियत दूर भाग जाती है | अगर आप घर से बाहर  जा कर होली नहीं खेलना  चाहते हैं तो घर पर ही  होली खेलिये लेकिन खेलिये जरुर |
  10. सुबह सुबह पहले भगवान को रंग चढ़ा कर ही होली खेलना शुरू कीजिये |
  11.  एक दिन पहले जब होली जलाई जाये तो उसमे जरुर भाग लें | अगर किसी वजह से आप रात में होलीं जलाने के वक्त शामिल न हो पायें तो अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले जलती हुई होली के निकट जाकर तीन परिक्रमा करें | होली में अलसी , मटर ,चना गेंहू कि बालियाँ और गन्ना इनमे से जो कुछ भी मिल जाये उसे होली की आग में जरुर   डालें |
  12. परिवार के सभी सदस्यों के पैर के अंगूठे से लेकर हाथ को सिर से ऊपर पूरा ऊँचा करके कच्चा सूत नाप कर होली में डालें |
  13. होली की विभूति यानि भस्म (राख) घर जरुर लायें पुरुष इस भस्म को मस्तक पर और महिला अपने गले में लगाये, इससे एश्वर्य बढ़ता है |
  14. घर के बीच में एक चौकोर टुकड़ा साफ कर के उसमे कामदेव का पूजन करें |
  15. होलिका वाले दिन कुछ मीठे पुए और पकौड़ी बनायें। इसे अलग निकाल कर रख दे और जब होलिका जले तो उसे होलिका में समर्पित कर दें। ऐसा करने से आपके घर में कभी भी अन्न या खाने की कमी नहीं होगी।आप अन्न से संपन्न होंगे।
  16. होलिका वाले दिन सुबह नहाने से पूर्व पूरे परिवार को सरसों का उबटन लगाएं। इस उबटन के झाड़न को इकठ्ठा कर लें और जब होलिका जले तो उसमे दाल दें। ऐसे कर के आप अपने घर परिवार के सदस्यों पर आने वाली विपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। इससे रोग भी दूर होते हैं।
  17. होलिका जलने के बाद उसकी राख को घर ले आइये और राख को घर के चारो तरफ और दरवाजे पर छिड़ दें। ऐसा करने से घर की निगेटिव एनर्जी ख़त्म होती है और घर में सुख-समृध्दि और धन का वास होता है।
  18. गाय के गोबर में जौ, अरसी, कुश मिलाकर छोटा उपला बना लें और इसे घर के मेन गेट पर लटका कर रख दें ऐसा करने सेे बुरी शक्तियों, टोने -टोटके से घर-परिवार बचा रहता है।
  19. होलिका दहन के अगले दिन इस राख को माथे पर लगाएं। बाएं से दाएं की ओर तीन रेख माथे पर खींचे। पहली रेखा महादेव, दूसरा रेखा महेश्वर और तीसरी रेखा शिव की है। इससे सभी देवता प्रसन्न होंगे।
  20.  मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए होलिका दहन के समय घर से सरसों के कुछ दाने लाएं और उन्हें होलिका दहन के समय होली में समर्पित करें। ज्योतिष पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी धन-धान्य में वृद्धि करती हैं। 

इन उपाय में घर और परिवार की उन्नति का राज छुपा है। होलिका वाले दिन पुरे परिवार को होलिका जलते हुए देखना भी जरुरी होता है।
जानिए होली के दिन क्या करें और क्या न करें ??
  • होली के दिन दाम्पत्य भाव से अवश्य रहें |
  •  होली के दिन मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव न रखें,  इससे साल भर आप शत्रुओं पर विजयी होते रहेंगे |
  • घर आने वाले मेहमानों को सौंफ और मिश्री जरुर खिलायें, इससे प्रेम भाव बढ़ता है |

इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों

Holika-Dahan-in-2016-on-how-and-when-the-day-is-done-and-why-इस वर्ष 2016 में होलिका दहन कब और किस दिन किया जाये और क्यों       हमारी भारतीय सनातन संस्कृति में प्रमुख त्यौहारों को कब और कैसे मनाना चाहिए उसके बारे में भारतीय धर्म ग्रंथों में निर्णय सिंधु , धर्म सिंधु, पुरुषार्थ चिंतामणि, समय प्रकाश, तिथि निर्णय और व्रत पर्व विवेक आदि में उसके नियम स्पष्ट लिखे हुए है । कुछ अल्प ज्ञानी लोग जिनको इन नियमो की जानकारी तो होती नही है वे लोग अपनी अल्प जानकारी के कारण लोगों को भ्रमित करते और त्योहारों को एक दिन की जगह दो दिन करवा देते है इस कारण लोगों की आस्था कम होती हैं ।
         उसी क्रम में इस साल 2016 में "होलिका दहन" को लेकर भ्रम की स्थिति बन रही है उसमे कुछ अल्प ज्ञानी उसको मनाने की दिनांक को सवेरे और सायं काल को मनाने की परिस्थिति उत्पन्न कर रहे हैं ऐसे लोगों और धर्म प्रेमी लोगों के लिए कुछ नियम लिख रहे है । वैसे होलिका दहन के बारे में विभिन्न ग्रंथो में " फाल्गुन पूर्णिमा में प्रदोष के समय होलिका दहन किया जाता है और भद्रा में होलिका दहन पूर्ण रूप से वर्जित हैं विशेष परिस्थिति में भद्रा मुख को छोड़ कर भद्रा के पुच्छ में करने का विधान है और इसके कई नियम और भी है जिनको आप को बताना जरुरी है ।

  1. --- यदि पूर्णिमा दो दिन प्रदोष को व्याप्त कर रही हो तो दूसरे दिन ही प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है । क्योंकि प्रथम दिन प्रदोष भद्रा के कारण दूषित रहता है । 
  2.  -- यदि दूसरे दिन प्रदोष के समय पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तब दूसरे दिन पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या उससे ज्यादा हो और अगले दिन प्रतिपदा वृद्धिगामिनि हो तब दूसरे दिन ही प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होता है । यहाँ प्रतिपदा का ह्रास हो तो पहले दिन भद्रा के पुच्छ या भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा में ही होलिका दहन किया जाता है ।
  3. --- दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करे और पहले दिन निशा काल से पहले भद्रा समाप्त हो जाये तो वहाँ भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए । इस स्थिति में वेद व्यास जी के "भविष्योत्तर पुराण " में लिखे वाक्य को बताना जरुरी है :- 

सार्धयाम प्रयम् वा स्यात् द्वितीये दिवसे यदा । 
प्रतिपद् वर्धमाना तू तदा सा होलिका स्मृता ।। 

       इसका अर्थ यह है की यदि पूर्णिमा साढ़े तीन प्रहर या इससे अधिक समय को व्याप्त करे और उसके साथ प्रतिपदा वृद्धिगामिनी हो तो वहाँ होलिका दहन सायं व्यापिनी पूर्णिमा के कल में करनी चाहिए । यहाँ ध्यान रहे की कोई भी तिथि यदि सार्ध त्रियाम व्यापिनी है तो वह अनिवार्यतः सायं व्यापिनी व्यापिनी अवश्य होती है और सार्ध त्रियाम पूर्णिमा सयम व्यापिनी होने से प्रदोष व्यापिनी ही मणि जाती है अतः वहाँ होलिका दहन शास्त्र सम्मत है । यही बात "पुरुषार्थ चिंतामणि " ग्रन्थ में इस प्रकार स्पष्ट लिखी हूई है ---

 "यदा तु द्वितीय दिने सार्धयाम त्रयं पूर्णिमा प्रतिपदश्च वृद्धि: । 
तदा पूर्णिमान्त्यभागे सायाह्न काल एव दीपनीया होलिका " 

        यानि उपरोक्त लिखित विस्तृत विवेचन का सारांश यह है की क्या इस वर्ष 2016 में ( 22-23 मार्च को) होलिका दहन में भद्रा बनेगी बाधा ???
         होलिका दहन में इस बार भद्रा बाधक बन रहा है। 22 मार्च 2016 दिन मंगलवार को भद्रा कुल 11 घंटे 10 मिनट का होगा जो शाम 2/29बजे से रात 3/19 बजे तक रहेगा। फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र गण्ड योग . दिन मंगलवार होलिका दहन भद्रा के पुच्छ समय रात 03/19 बजे से 05/05बजे तक हो सकेगा। रात 03/19 बजे के बाद होली जलाई जा सकती है। अगले दिन 23 मार्च 2016 को धुलेंडी मनेगी।
       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रतिवर्ष धुलेंडी चैत्र प्रतिपदा को होती है लेकिन इस बार 9 वर्ष बाद फाल्गुन में ही धुलेंडी मनेगी। उन्होंने बताया कि भद्रा में होलिका दहन नहीं करना चाहिए। भद्रा में होली जलाने से राष्ट्र, नगर एवं ग्राम को हानि होती है। धर्म सिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा मुख की रात्रि 02/29 से 03/19 बजे तक रहेगी। उस समय को त्याग करके भद्रा का पुच्छ समय 03/19 बजे से 05/05 बजे तक होलिका दहन करें या फिर प्रातः 05/05 बजे से सूर्योदय तक होलिका दहन श्रेष्ठ होगा।
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